ब्रिटिश प्रशासनिक नीतियाँ

ब्रिटिश प्रशासनिक नीतियाँ: आधुनिक भारत का इतिहास के अंतर्गत ब्रिटिश शासन ने भारत में केंद्रीकृत और संगठित प्रशासनिक ढांचा स्थापित किया, जिसका उद्देश्य प्रभावी नियंत्रण और राजस्व संग्रह था। सिविल सेवा प्रणाली, न्यायिक व्यवस्था, भूमि-राजस्व व्यवस्थाएँ (जैसे स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी, महालवाड़ी) तथा पुलिस-प्रशासन के विकास ने भारतीय प्रशासन पर दीर्घकालिक प्रभाव डाला।

भारत में सिविल सेवाओं का विकास

सिविल सेवाओं की उत्पत्ति

  • ईस्ट इंडिया कंपनी ने सिविल सेवा प्रणाली की शुरुआत की।
  • प्रारम्भ में इसका उद्देश्य कंपनी के वाणिज्यिक कार्यों का प्रबंधन करना था।बाद में यह भारतीय क्षेत्रों के शासन हेतु एक सुव्यवस्थित प्रशासनिक तंत्र में बदल गई।
  • ‘सिविल सेवा’ शब्द का प्रयोग मूलतः कंपनी के उन कर्मचारियों के बीच अंतर करने के लिए किया गया था जो नागरिक या व्यापारिक कार्यों में लगे थे, और वे जो सैन्य एवं नौसैनिक सेवाओं में कार्यरत थे।
  • समय के साथ सिविल सेवकों की शक्ति और प्रशासनिक जिम्मेदारी बढ़ती गईं।

लॉर्ड कॉर्नवालिस की भूमिका (1786–1793)

  • सिविल सेवाओं को संगठित और संस्थागत रूप देने वाले प्रथम गवर्नर-जनरल।
  • भ्रष्टाचार रोकने के लिए उपाय किए, जैसे— 
    • सिविल सेवकों के वेतन में वृद्धि।
    • निजी व्यापार पर कठोर रोक और नियमों का सख्त पालन।
    • उपहार और रिश्वत लेने पर प्रतिबंध।
    • पदोन्नति पूरी तरह वरिष्ठता के आधार पर।
  • अधिनियम और प्रशासनिक नीतियाँ –चार्टर अधिनियम 1793 ने £500 प्रति वर्ष से अधिक वेतन वाले सभी पद अनुबंधित सेवकों के लिए आरक्षित कर दिए।
  • भारतीयों को बाहर रखने के कारण:
    • यह विश्वास की केवल अंग्रेज ही ब्रिटिश हितों की रक्षा कर सकते हैं।
    • यह धारणा कि भारतीय अक्षम और अविश्वसनीय हैं।
    • लाभदायक पदों के लिए यूरोपियों में तीव्र प्रतिस्पर्धा।
    • सिविल सेवाओं से भारतीयों का बहिष्कार
    • कॉर्नवालिस का मत था: “हिंदुस्तान का प्रत्येक निवासी भ्रष्ट है।”

लॉर्ड वेलेजली की भूमिका (1798–1805)

  • सिविल सेवकों के प्रशिक्षण हेतु कलकत्ता में फोर्ट विलियम कॉलेज (1800) की स्थापना की।
  • निदेशक-मंडल (Court of Directors) ने 1806 में फोर्ट विलियम कॉलेज को अस्वीकार कर दिया।
  • इसके स्थान पर इंग्लैंड में हेलीबरी में ईस्ट इंडिया कॉलेज स्थापित किया गया।
  • यहाँ नए भर्ती अधिकारियों को दो वर्ष का प्रशिक्षण दिया जाता था।
चार्टर अधिनियम, 1833
  • सैद्धान्तिक रूप से भारतीयों के लिए सिविल सेवाएँ खोली गईं।
  • लेकिन व्यवहार में इन प्रावधानों को कभी लागू नहीं किया गया।
चार्टर अधिनियम, 1853
  • भर्ती में संरक्षण (Patronage) प्रणाली समाप्त की।
  • सिविल सेवाओं हेतु खुली प्रतियोगिता परीक्षा लागू की।
  • परन्तु व्यवहार में उच्च पदों से भारतीयों को अलग ही रखा गया।
महारानी की उद्घोषणा (1858)
  • 1857 के विद्रोह के बाद जारी की गई।
  • इसमें कहा गया कि भारतीयों को सिविल सेवाओं में— 
    • स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से शामिल किया जाएगा।
भारतीय सिविल सेवा अधिनियम, 1861
  • महत्वपूर्ण पद अनुबंधित सिविल सेवकों के लिए आरक्षित किए गए।
  • परीक्षा की विशेषताएं:
    • इंग्लैंड में आयोजित। 
    • अंग्रेजी भाषा में आयोजित।
    • ग्रीक और लैटिन शास्त्रीय शिक्षा पर आधारित।
  • अधिकतम आयु सीमा कम की गई:
    • 23 वर्ष (1859)
    • 22 वर्ष (1860)
    • 21 वर्ष (1866)
    • 19 वर्ष (1878)
  • सत्येंद्रनाथ टैगोर 1863 में पहले भारतीय आई.सी.एस. अधिकारी बने।
वैधानिक सिविल सेवा (1878–79)
  • लॉर्ड लिटन द्वारा शुरू की गई।अनुबंधित पदों का छठा हिस्सा भारतीयों के लिए आरक्षित।
  • भारतीयों को स्थानीय सरकारों द्वारा नामित किया जाएगा।
  • यह प्रणाली विफल रही और बाद में समाप्त कर दी गई।
  • कांग्रेस की मांगें (1885 के बाद)
    • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने मांग की:
    • आयु सीमा बढ़ाना।
    • भारत और ब्रिटेन में एक साथ परीक्षा आयोजित करना।

एचीसन समिति (1886)

  • लॉर्ड डफरिन द्वारा नियुक्त।
  • सिफारिशें:
    • ‘अनुबंधित’ और ‘गैर-अनुबंधित’ शब्दों को समाप्त करना।
    • सिविल सेवाओं का वर्गीकरण:
      • इंपीरियल सिविल सेवा (इंग्लैंड में परीक्षा)
      • प्रांतीय सिविल सेवा (भारत में परीक्षा)
      • अधीनस्थ सिविल सेवा (भारत में परीक्षा)
    • आयु सीमा बढ़ाकर 23 वर्ष करना।
  • 1893
    • ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स ने एक साथ परीक्षा के लिए प्रस्ताव पारित किया।
    • प्रस्ताव लागू नहीं किया गया।
  • राज्य सचिव किम्बरली ने कहा:
    • “पर्याप्त संख्या में सिविल सेवक हमेशा यूरोपीय होने चाहिए।”

मांटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (1919)

  • यथार्थवादी नीति घोषित की:
    • उत्तरदायी शासन के लिए लोक सेवाओं में अधिक भारतीयों का होना आवश्यक है।
  • सिफारिशें:
    • भारत और इंग्लैंड में एक साथ परीक्षा।
    • एक-तिहाई भर्ती भारत में की जाए।
    • भारतीय भर्ती हर वर्ष 1.5% बढ़ाई जाए।

ली आयोग (1924)

  • सिफारिशें:
    • राज्य सचिव इन सेवाओं के लिए भर्ती जारी रखेंगे:
      • भारतीय सिविल सेवा (ICS)
      • भारतीय वन सेवा
      • इंजीनियरों की सिंचाई शाखा
    • प्रांतीय सरकारें इन सेवाओं के लिए भर्ती करेंगी:
      • शिक्षा
      • चिकित्सा सेवाएं
      • 40% ब्रिटिश, 40% सीधे भर्ती किए गए भारतीय, 20% प्रांतीय सेवाओं से पदोन्नत।
      • 15 वर्षों के भीतर ICS में यूरोपीय और भारतीयों के बीच 50:50 की समानता हासिल करना।
      • एक लोक सेवा आयोग की तत्काल स्थापना।

भारत सरकार अधिनियम, 1935

  • इसमें प्रावधान था:
    • संघीय लोक सेवा आयोग।
    • प्रांतीय लोक सेवा आयोग।
  • सुधारों के बावजूद:
    • वास्तविक नियंत्रण ब्रिटिशों के हाथ में ही रहा।
    • भारतीयकरण से राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण नहीं हुआ।
    • भारतीय नौकरशाही औपनिवेशिक शासन के एजेंट की तरह कार्य करती रही।

औपनिवेशिक काल से पहले भारत में पुलिस व्यवस्था

  • औपनिवेशिक काल से पहले के भारतीय राज्य (मुगल और अन्य देशी राज्य) निरंकुश थे।
  • कोई अलग या औपचारिक पुलिस व्यवस्था नहीं थी।
  • प्राचीन काल से ही गाँवों की रात्रि में सुरक्षा हेतु ‘ग्राम चौकीदारों’ की व्यवस्था विद्यमान थी।
  • मुगल शासन के तहत:
  • फौजदार:
    • क्षेत्र में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी।
  • आमिल:
    • मुख्यतः राजस्व अधिकारी, पर विद्रोहियों से निपटना भी उसका कार्य।
  • कोतवाल:
    • नगरों में कानून-व्यवस्था और अपराध नियंत्रण का प्रभारी।
  • द्वैध शासन (1765–1772) – बंगाल, बिहार, उड़ीसा
    • जमींदार कानून-व्यवस्था के लिए जिम्मेदार थे।इनके अधीन थानेदार एवं अन्य कर्मचारी कार्य करते थे।
    • कर्तव्य: शांति बनाए रखना और अपराध नियंत्रण।
  • परन्तु व्यवहार में जमींदार—
    • अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करते थे।
    • डकैतों से मिलीभगत रखते थे।
    • लूट का हिस्सा अपराधियों के साथ बाँटते थे।
  • प्रारम्भिक ब्रिटिश सुधार
    • 1770:फौजदार और आमिल के पद समाप्त किए गए।
    • 1774 (Warren Hastings):
      • फौजदारों की पुनः नियुक्ति।
      • ज़मींदारों से निम्नलिखित के दमन में सहायता करने के लिए कहा गया:
        • डकैती
        • हिंसा
        • अव्यवस्था
  • 1775:
    • प्रमुख नगरों में फौजदारी थाने स्थापित।
    • इनके अधीन छोटे पुलिस चौकी तंत्रों को  विकसित किया गया।
  • कॉर्नवालिस के पुलिस सुधार (1791)
    • पहली बार नियमित और संगठित पुलिस बल की स्थापना।
    • थानों (सर्किल) की आधुनिक व्यवस्था विकसित की।
    • संरचना—
      • दरोगा (भारतीय) : थाना प्रभारी।
      • जिला स्तर पर पुलिस अधीक्षक (SP)
    • जमींदारों को पुलिस कर्तव्यों से मुक्त किया गया।
  • मेयो के सुधार (1808)
    • प्रत्येक डिवीजन में एक SP की नियुक्ति।
    • SP की सहायता हेतु गुप्तचर (गोयंदे) नियुक्त।
    • समस्याएं—
      • गुप्तचर जनता को परेशान करते थे।
      • स्वयं भी लूटपाट और अत्याचार में लिप्त रहते थे।
    • निदेशक मंडल का आदेश (1814)
      • दरोगा एवं उनके अधीनस्थों की नियुक्ति समाप्त
      • यह आदेश बंगाल को छोड़कर सभी क्षेत्रों में लागू किया गया। 
  • बेंटिक के सुधार (1828–1835)
    • पुलिस अधीक्षक (SP) का पद समाप्त
    • कलेक्टर/मजिस्ट्रेट को जिले का पुलिस प्रमुख बनाया गया।
    • डिवीजन स्तर पर कमिश्नर को SP की भूमिका दी गई।
    • परिणाम—
      • पुलिस व्यवस्था अत्यंत अव्यवस्थित हो गई।
      • कलेक्टर/मजिस्ट्रेट पर अत्यधिक प्रशासनिक बोझ पड़ा।
    • प्रेसीडेंसी नगरों में सबसे पहले कलेक्टर/मजिस्ट्रेट और पुलिस कार्यों का पृथक्करण किया गया।
  • पुलिस आयोग (1860) और पुलिस अधिनियम, 18611
    • 857 के विद्रोह के बाद गठित पुलिस आयोग (1860) की सिफारिशों पर भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 लागू किया गया।
  • सिफारिशें:
    • सिविल कांस्टेबलरी सिस्टम बनाया गया।
    • गांव के चौकीदार को रखा गया लेकिन उसे औपचारिक पुलिस से जोड़ा गया।
    • पदानुक्रमित संरचना:
      • इंस्पेक्टर जनरल (IG) – प्रांतीय स्तर
      • डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (DIG) – रेंज स्तर
      • पुलिस अधीक्षक (SP) – जिला स्तर
    • कोई अखिल भारतीय पुलिस सेवा नहीं बनाई गई।
    • सभी प्रांतों में समान रैंक संरचना लागू की गई।
  • कर्जन के पुलिस सुधार (1902–03)
    • सर एंड्रयू फ्रेज़र की अध्यक्षता में पुलिस आयोग।
    • सिफारिशें—
      • कनिष्ठ अधिकारियों की वरिष्ठ पदों पर पदोन्नति नहीं।वरिष्ठ अधिकारियों की सीधी भर्ती।
      • पुलिस प्रशिक्षण विद्यालयों की स्थापना।
      • सभी प्रांतों में पुलिस बल की संख्या बढ़ाई जाए।
      • जांच हेतु गांवों का दौरा करने की अनुमति।वेतन में वृद्धि।
      • केंद्र में आपराधिक अन्वेषण विभाग (CID) की स्थापना। 
  • खुफिया एजेंसियों का विकास
    • आपराधिक खुफिया विभाग (DCI) भारत सरकार से जुड़ा हुआ था।
    • यह बना—
      • केंद्रीय घरेलू खुफिया एजेंसी
      • विदेशी खुफिया एजेंसी
    • सभी प्रांतों में CID स्थापित किए गए।
    • 1929:
    • CID को विभाजित किया गया:
      • विशेष शाखा
      • अपराध शाखा
  • पुलिस और राष्ट्रीय आंदोलन
    • पुलिस औपनिवेशिक दमन का एक उपकरण बन गई
    • राष्ट्रवादी संघर्षों को दबाने में ब्रिटिश राज की सहायता की
    • सफलतापूर्वक दमन किया
      • डकैती 
      • ठगी 
    • जनता के प्रति दृष्टिकोण 
      • कठोर  
      • सहानुभूति हीन 
    • परिणाम—
      • जनता की सहानुभूति समाप्त।
      • पुलिस को साम्राज्यवादी शासन के एजेंट के रूप में देखा जाने लगा।

ब्रिटिश शासन के अधीन सेना

  • सेना कंपनी के शासन की रीढ़ थी।
  • 1857 से पूर्व सैन्य संरचना
  • दो प्रकार की सैन्य शक्तियाँ थीं—
    • ब्रिटिश साम्राज्ञी की सेना (Queen’s Army)
      • भारत में तैनात क्राउन की टुकड़ियां।
    • कंपनी की सेना (Company’s Army)
      • यूरोपीय रेजीमेंट।
      • ब्रिटिश अधिकारियों के अधीन भारतीय सैनिक।
  • 1857 के विद्रोह के बाद पुनर्गठन
    • मुख्य उद्देश्य—
      • भविष्य में किसी भी विद्रोह को रोकना।
    • लॉर्ड डफरिन (1888) की चेतावनी—
      • “1857 के सबक कभी नहीं भूले जाने चाहिए।
    • ”अन्य उद्देश्य—
      • साम्राज्य की रक्षा करना, विशेषकर—रूस- जर्मनी- फ्रांस
    • एशिया और अफ्रीका में साम्राज्य विस्तार हेतु भारतीय सेना का उपयोग।
    • ब्रिटिश सैनिकों को कब्जा करने वाली सेना (Army of Occupation) के रूप में बनाए रखना।
  • यूरोपीय प्रभुत्व
    • सेना में कम-से-कम एक-तिहाई यूरोपीय सैनिक सुनिश्चित किए गए।
    • निश्चित अनुपात—
      • बंगाल सेना → 1 यूरोपीय : 2 भारतीय
      • मद्रास और बॉम्बे → 2 यूरोपीय : 5 भारतीय
    • यूरोपीयों का एकाधिकार—
      • तोपखाना
      • टैंक
      • सशस्त्र विशेष
      • कोर
    • भारतीय सैनिक—1900 तक घटिया राइफलें दी गई।
    • द्वितीय विश्व युद्ध तक उन्नत हथियारों से वंचित रहे।
  • उच्च सैन्य पद
    • 1918 तक भारतीयों को कमीशंड रैंक नहीं दिए गए।
    • 1914 तक सर्वोच्च पद—
      • सूबेदार
  • सैंडहर्स्ट समिति (1926)
    • 1952 तक 50% भारतीय अधिकारियों का प्रस्ताव।
  • सेना में फूट डालो और राज करो की नीति
    • संतुलन और प्रतिरोध (Balance and Counterpoise) पर आधारित नीति 
    • 1879 की सेना आयोग रिपोर्ट—
      • “भारतीयों के खिलाफ भारतीय।
  • मार्शल रेस सिद्धांत को बढ़ावा
    • प्राथमिकता प्राप्त समुदाय—
      • सिख
      • गोरखा
      • पठान
    • गैर-मार्शल घोषित क्षेत्र—
      • अवध
      • बिहार
      • मध्य भारत
      • दक्षिण भारत
    • ये वे क्षेत्र थे जिन्होंने 1857 के विद्रोह में भाग लिया था।
  • सेना का सांप्रदायिकरण
    • रेजीमेंटों का गठन आधारित था—
      • जाति
      • समुदाय
      • जनजाति
      • क्षेत्र
    • निष्ठा संतुलन हेतु मिश्रित रेजीमेंटें बनाई गई।
    • राष्ट्रवादी प्रभाव को जानबूझकर रोका गया। 
  • सैनिकों का पृथक्करण
    • सैनिकों को नागरिक समाज से अलग रखा गया।
    • उपाय—
      • राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों पर प्रतिबंध।
      • राजनीतिक साहित्य पर रोक।
    • चार्ल्स वुड का कथन—
      • “रेजीमेंटों को एक-दूसरे का प्रतिद्वंद्वी होना चाहिए।
  • समग्र मूल्यांकन
    • पुलिस और सेना ने—
      • औपनिवेशिक हितों
      • ब्रिटिश साम्राज्यवादी नियंत्रण की सेवा की।
    • भारतीय सेना—
      • अत्यधिक खर्चीली थी।
      • राजनीतिक रूप से नियंत्रित थी।
      • राष्ट्र-विरोधी प्रवृत्ति वाली थी।
  • औपनिवेशिक-पूर्व भारत की न्यायिक व्यवस्था
    • न्यायिक प्रणाली में निम्न का अभाव था:
    • उचित प्रक्रियाओं का  
    • न्यायालयों के संगठित पदानुक्रम का 
    •  उच्च से निम्न न्यायालयों तक नियमित श्रेणीकरण का  
    • न्यायालयों के समुचित क्षेत्रीय वितरण का  
  • हिंदू विवाद – जाति-पंचायतों, ग्राम पंचायतों एवं ज़मींदारों द्वारा निपटाए जाते थे।
  • मुस्लिम न्यायिक प्रणाली:
    • काजी संस्था पर आधारित थी।
    • काजी धार्मिक व्यक्ति होते थे।
    • तैनाती—
      • प्रांतीय राजधानियों में
      • नगरों में
      • कस्बों (बड़े गांवों) में
    • राजा और बादशाह
      • न्याय के सर्वोच्च स्रोत माने जाते थे।
      • न्याय प्रायः स्वैच्छिक होता था।
  • कॉमन लॉ प्रणाली की शुरुआत
    • न्यायिक दृष्टांतों पर आधारित कॉमन लॉ प्रणाली की शुरुआत।
    • 1726 में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा मेयर कोर्ट की स्थापना।
      • स्थापना – मद्रास, बॉम्बे, कलकत्ता
    • न्यायिक सुधारों का विस्तार कंपनी के एक ‘शासक शक्ति’ के रूप में रूपांतरण के साथ हुआ।
  • वॉरेन हेस्टिंग्स के अधीन न्यायिक सुधार (1772–1785)जिला दीवानी अदालतें
    • दीवानी विवादों के लिए स्थापित, जिसकी अध्यक्षता कलेक्टर करते थे।
    • लागू कानून—
      • हिंदुओं पर हिंदू कानून
      • मुसलमानों पर मुस्लिम कानून
    • अपील— सदर दीवानी अदालत में।
    • अध्यक्ष 
      • एक अध्यक्ष
      • सुप्रीम काउंसिल के दो सदस्य
  • जिला फौजदारी अदालत
    • आपराधिक मामलों की सुनवाई।
    • अध्यक्षता –  भारतीय अधिकारी।
    • सहायता – क़ाज़ी, मुफ़्ती
    • पर्यवेक्षण – कलेक्टर।
    • मुस्लिम कानून लागू।
    • मृत्युदंड एवं संपत्ति जब्त के लिए—
    • सदर निज़ामत अदालत की स्वीकृति आवश्यक।
      • स्थान— मुर्शिदाबाद।
      • अध्यक्ष—
        • डिप्टी निज़ाम
        • मुख्य क़ाज़ी
        • मुख्य मुफ़्ती

कलकत्ता में सुप्रीम कोर्ट (1774)

  • 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के अंतर्गत स्थापना।
  • प्रथम मुख्य न्यायाधीश एलिजा इम्पे थे।
  • अधिकार क्षेत्र – 
    • कलकत्ता के ब्रिटिश नागरिक
    • अधीनस्थ फैक्ट्रियां
    • भारतीय एवं यूरोपीय
  • अधिकार –
    • मौलिक अधिकार क्षेत्र
    • अपीलीय अधिकार क्षेत्र
  • अन्य न्यायालयों से अधिकार-क्षेत्र संघर्ष।
ब्रिटिश प्रशासनिक नीतियाँ

कॉर्नवालिस के अधीन सुधार (1786–1793):

  • शक्तियों का पृथक्करण
  • आपराधिक न्याय सुधार
    • जिला फौजदारी अदालतें समाप्त।
    • सर्किट कोर्ट स्थापित – कलकत्ता, ढाका, मुर्शिदाबाद, पटना
    • सर्किट कोर्ट – 
      • यूरोपीय न्यायाधीश
      • दीवानी व फौजदारी मामलों में अपीलीय न्यायालय
  • सदर निज़ामत अदालत
    • मुर्शिदाबाद से कलकत्ता स्थानांतरित।
    • इसके अधीन:
      • गवर्नर जनरल
      • सुप्रीम काउंसिल के सदस्य
    • सहायता:
      • मुख्य क़ाज़ी
      • मुख्य मुफ़्ती
  • दीवानी न्याय सुधार
    • जिला दीवानी अदालत का नाम परिवर्तन – 
      • जिला न्यायालय
      • सिटी कोर्ट
      • जिला कोर्ट
    • अध्यक्ष – जिला न्यायाधीश।
    • कलेक्टर
      • केवल राजस्व प्रशासन तक सीमित।
      • मजिस्ट्रेटी अधिकार समाप्त।
  • दीवानी न्यायालयों की पदानुक्रम
    • मुंसिफ की अदालत – भारतीय अधिकारी
    • रजिस्ट्रार की अदालत – यूरोपीय न्यायाधीश
    • जिला न्यायालय – जिला न्यायाधीश
    • चार सर्किट कोर्ट – प्रांतीय अपीलीय
    • न्यायालयसदर दीवानी अदालत – कलकत्ता
    • किंग-इन-काउंसिल
  • कॉर्नवालिस कोड
  • राजस्व प्रशासन और न्यायिक प्रशासन का पृथक्करण।
  • यूरोपीय भी न्यायालयों के अधीन।
  • सरकारी अधिकारी
    • दीवानी न्यायालयों के प्रति उत्तरदायी।
  • कानून की संप्रभुता की स्थापना।

विलियम बेंटिंक के सुधार (1828–1833)

  • चार सर्किट कोर्ट समाप्त।
  • उनके कार्य—
    • कलेक्टरों को सौंपे गए।
    • राजस्व और सर्किट आयुक्त के पर्यवेक्षण में
    • स्थापना – 
      • इलाहाबाद में सदर दीवानी अदालत
      • इलाहाबाद में सदर निज़ामत अदालत
    • उद्देश्य – उच्च प्रांतों के लोगों की सुविधा।
    • भाषा सुधार –
    • पहले –
      • फ़ारसी न्यायालयी भाषा।
      • अब –
    • फ़ारसी या देशी भाषाएँ स्वीकार्य।
    • सुप्रीम कोर्ट में अंग्रेज़ी ने फ़ारसी का स्थान लिया।
  • विधि आयोग एवं विधि संहिताकरण (1833)
    • लॉर्ड मैकाले के अधीन विधि आयोग की स्थापना।
    • उद्देश्य – भारतीय कानूनों का संहिताकरण।
    • परिणाम –
      • सिविल प्रक्रिया संहिता (1859)
      • भारतीय दंड संहिता (1860)
      • आपराधिक प्रक्रिया संहिता (1861)
  • बाद के न्यायिक विकास
  • 1860
    • यूरोपीय:
    • दीवानी मामलों में कोई विशेष विशेषाधिकार नहीं
    • आपराधिक मामलों में: केवल यूरोपीय न्यायाधीशों द्वारा ही मुकदमा चलाया जा सकता था
  • 1865
    • सुप्रीम कोर्ट और सदर अदालतों का विलय
    • उच्च न्यायालयों का गठन:
      • कलकत्ता
      • बंबई
      • मद्रास
  • 1935
    • भारत सरकार अधिनियम, 1935:
    • एक संघीय न्यायालय का प्रावधान किया
    • संघीय न्यायालय:
      • 1937 में स्थापित
      • सरकारों के बीच विवादों का निपटारा किया
      • उच्च न्यायालयों से सीमित अपीलें सुनीं

1857 के बाद प्रशासनिक संरचना में प्रमुख परिवर्तन 

साम्राज्यवादी उद्देश्य
  • औपनिवेशिक सत्ता की प्रमुख चिंता –
    • भारत में ब्रिटिश स्थिति को मजबूत करना।
  • उद्देश्य –
    • ब्रिटिश आर्थिक और वाणिज्यिक हितों को सुरक्षित करना
    • राजनीतिक खतरों से सुरक्षा
    • जब भी संभव हो, विश्व स्तर पर ब्रिटिश प्रभाव का विस्तार
  • निम्न के दौरान प्रतिक्रियावादी नीतियों में परिलक्षित हुआ:
    • लिटन
    • डफरिन
    • लैंसडाउन
    • एल्गिन
    • कर्जन (सबसे प्रमुख)।
1857 के बाद का प्रशासन -केंद्र सरकार

भारत सरकार अधिनियम, 1858

  • इसे भारत के बेहतर शासन के लिए अधिनियम भी कहा जाता है
  • सत्ता का हस्तांतरण: ईस्ट इंडिया कंपनी → ब्रिटिश क्राउन

भारत के राज्य सचिव –

  • भारत का शासन अधिकार भारत सचिव को सौंपा गया।
  • भारत सचिव – 
    • ब्रिटिश मंत्रिमंडल का सदस्य
    • 15 सदस्यों की परिषद द्वारा सहायता प्राप्त
    • ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदायी
  • सत्ता का स्वरूप – 
    • समस्त पहल करने और अंतिम निर्णय सचिव के हाथ में
    • परिषद: केवल सलाहकार
  • परिणाम – 
    • पिट्स इंडिया एक्ट (1784) के अंतर्गत द्वैध शासन समाप्त
    • अंतिम सत्ता ब्रिटिश संसद में निहित।
  • गवर्नर जनरल → वायसराय
    • प्रतिष्ठा बढ़ी, लेकिन वास्तविक अधिकार धीरे-धीरे घटे।
    • सहायता –
      • कार्यकारी परिषद।
    • कार्यकारी परिषद के सदस्य –
      • ब्रिटिश शासन के दौरान विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्षों
      • वायसराय के आधिकारिक सलाहकार 
भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 (केंद्रीय स्तर)
  • वायसराय की कार्यकारी परिषद में –
    • एक पाँचवाँ सदस्य (न्यायविद) जोड़ा गया।
  • विधायी कार्यों हेतु –
    • वायसराय 6 से 12 अतिरिक्त सदस्यों को नामित कर सकता था
    • कम से कम आधे गैर-सरकारी होने आवश्यक
    • गैर-सरकारी सदस्य भारतीय या यूरोपीय हो सकते थे।
  • केंद्रीय विधान परिषद की सीमाएँ
    • परिषद परामर्शदात्री थी, शक्तिशाली नहीं।
  • मुख्य कमजोरियाँ –
    • सरकार की अनुमति के बिना महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा नहीं
    • वित्तीय मामलों पर बिना अनुमति चर्चा निषिद्ध
    • बजट पर कोई नियंत्रण नहीं
    • कार्यपालिका के कार्यों पर चर्चा नहीं
    • विधेयकों को वायसराय की स्वीकृति आवश्यक
    • भारत सचिव स्वीकृत कानून को भी वीटो कर सकता था
  • भारतीय सदस्य –
    • केवल अभिजात वर्ग से
    • राजा, ज़मींदार, दीवान
    • जनमत का प्रतिनिधित्व नहीं

प्रांतीय सरकार

भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 (प्रांतीय स्तर)
  • विधायी शक्तियाँ पुनः प्रदान की गयी – 
    • बॉम्बे
    • मद्रास
  • ये शक्तियाँ 1833 में वापस ले ली गई थी।
  • बाद में -अन्य प्रांतों में भी विधान परिषदों की स्थापना।
प्रांतीय प्रशासनिक संरचना
  • प्रेसीडेंसी—
    • बॉम्बे
    • मद्रास
    • कलकत्ता
  • अन्य प्रांतों की तुलना में अधिक शक्तिशाली।
  • प्रेसीडेंसी का शासन:
    • गवर्नर
    • तीन सदस्यों की कार्यकारी परिषद
    • क्राउन द्वारा नियुक्त
  • अन्य प्रांतों का शासन:
    • लेफ्टिनेंट गवर्नर
    • मुख्य आयुक्त
    • गवर्नर जनरल द्वारा नियुक्त
वित्तीय विकेंद्रीकरण –
  • बाद के दशकों में कुछ विकेंद्रीकरण शुरू किया गया –
  • प्रकृति:
    • प्रशासनिक पुनर्गठन
    • उद्देश्य:
      • राजस्व बढ़ाना
      • खर्च कम करना
    • इसका अर्थ वास्तविक ‘प्रांतीय स्वायत्तता’ (Provincial Autonomy) कदापि नहीं था।
लॉर्ड मेयो के वित्तीय सुधार (1870)
  • प्रांतों को केंद्रीय राजस्व से निश्चित अनुदान दिया गया।
  • इनके प्रशासन के लिए:
    • पुलिस
    • जेल
    • शिक्षा
    • चिकित्सा सेवाएँ
    • सड़कें
  • इन सेवाओं के संचालन में प्रांतों को विवेकाधिकार।
  • महत्त्व –
    • केंद्रीय और प्रांतीय वित्त के पृथक्करण की पहली कड़ी।
लॉर्ड लिटन के सुधार (1877)
  • अतिरिक्त व्यय मद प्रांतों को सौंपे गए –
    • भूमि राजस्व
    • आबकारी
    • सामान्य प्रशासन
    • कानून एवं न्याय
  • प्रांतों को आय में निश्चित हिस्सा – 
    • स्टाम्प
    • आबकारी
    • आयकर
राजस्व विभाजन (1882)
  • सभी राजस्व स्रोतों को तीन श्रेणियों में बांटा गया:
  • सामान्य : पूर्णतः केंद्र को
  • प्रांतीय : पूर्णतः प्रांतों को
  • साझा : केंद्र और प्रांतों में विभाजित
प्रांतीय स्वायत्तता की सीमाएँ
  • केंद्रीय सरकार सर्वोच्च रही
  • प्रांतों पर विस्तृत नियंत्रण बनाए रखा
  • कारण – केंद्र और प्रांत दोनों ही ‘भारत सचिव’ और ब्रिटिश सरकार के अधीन थे।
भारत में ब्रिटिश शासन के तहत स्थानीय निकाय –

विकेंद्रीकरण का उद्देश्य

  • नगरपालिकाओं और जिला बोर्डों के माध्यम से प्रशासनिक विकेंद्रीकरण।
  • ये निकाय प्रशासित करते थे:
    • शिक्षा
    • स्वास्थ्य
    • स्वच्छता
    • जल आपूर्ति
    • सड़कें
    • अन्य बुनियादी नागरिक सुविधाएं
  • मुख्य रूप से स्थानीय करों के माध्यम से वित्तपोषित।
स्थानीय निकायों की स्थापना के कारण
  • अत्यधिक केंद्रीकरण के कारण वित्तीय कठिनाइयों ने विकेंद्रीकरण को आवश्यक बना दिया।
    • बढ़ते आर्थिक संपर्कों के कारण यूरोप में विकसित आधुनिक नागरिक सुविधाओं को भारत में विस्तार करना आवश्यक हो गया।
    • राष्ट्रवादी आंदोलन ने बुनियादी सुविधाओं में सुधार की मांग की।
    • कुछ ब्रिटिश नीति निर्माता ब्रिटिश वर्चस्व को कमजोर किए बिना भारतीयों को प्रशासन से जोड़ना चाहते थे।
    • स्थानीय कल्याण के लिए स्थानीय करों के उपयोग ने ब्रिटिश अनिच्छा की आलोचना का मुकाबला करने में मदद की:शाही खजाने से खर्च करना।

स्थानीय शासन का विकास

अवधि 1864-1868
  • प्रथम स्थानीय निकाय गठित।
  • अधिकांश सदस्य नामित।
  • अध्यक्ष— जिला मजिस्ट्रेट।
  • कर-संग्रह एजेंसियों के रूप में कार्य।
मेयो का प्रस्ताव (1870)
  • वित्तीय विकेंद्रीकरण की शुरुआत।
  • भारतीय परिषद अधिनियम, 1861 पर आधारित।
  • प्रांतों को – 
    • स्थानीय कर लगाने का अधिकार
    • वार्षिक शाही अनुदान
    • कुछ विभाग प्रांतों को हस्तांतरित –
      • चिकित्सा सेवाएँ
      • शिक्षा
      • सड़कें
    • स्थानीय वित्त की शुरुआत को चिह्नित किया।
    • निम्न की आवश्यकता पर जोर दिया गया:
      • स्थानीय हित
      • पर्यवेक्षण
      • धन के प्रबंधन में सावधानी
    • बंगाल, मद्रास, उत्तर-पश्चिमी प्रांत, पंजाब जैसे प्रांतों ने नगरपालिका अधिनियम पारित किए।
रिपन का प्रस्ताव (1882)
  • लॉर्ड रिपन – भारत में स्थानीय स्वशासन के जनक
  • मुख्य विशेषताएँ –
  • स्थानीय निकाय प्रशासन और राजनीतिक शिक्षा के साधन के रूप में परिभाषित कर्तव्यों और स्वतंत्र राजस्व स्रोतों के साथ शहरी और ग्रामीण स्थानीय निकाय।
  • गैर-सरकारी सदस्यों का बहुमतजहां कहीं भी व्यवहार्य हो, वहाँ चुनाव प्रणाली की शुरुआत गैर-सरकारी अध्यक्ष
  • न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप
  • निम्न के लिए सरकारी मंजूरी आवश्यक:
    • ऋण
    • नगरपालिका संपत्ति की बिक्री
    • नए कर
    • अत्यधिक खर्चीले कार्य
    • नियम और उप-नियम
  • रिपन के बाद सीमाएँ
    • निर्वाचित सदस्य अल्पसंख्यक रहे
    • सीमित मताधिकार
    • जिला बोर्डों पर अधिकारी अध्यक्ष
    • सरकार के पास निलंबन व विघटन के अधिकार 
    • नौकरशाही का विश्वास— भारतीय स्वशासन के अयोग्य।
    • लॉर्ड कर्जन ने सरकारी नियंत्रण बढ़ाया।
विकेंद्रीकरण पर रॉयल कमीशन (1908)
  • मुख्य सिफारिशें –
    • शक्तियां प्रदान करके ग्राम पंचायतों को सुदृढ़ करना:
    • छोटे न्यायिक मामले
    • गाँव के काम
    • स्कूल
    • ईंधन और चारे के भंडार
    • पर्याप्त आय स्रोत
  • उप-जिला (तालुका/तहसील) बोर्ड स्थापित करना
    • अलग-अलग कर्तव्य
    • अलग-अलग राजस्व
  • नियमित अनुदान-सहायता (प्रमुख परियोजनाओं को छोड़कर) तथा कराधान शक्तियों पर लगे प्रतिबंधों को हटाना।
  • नगर पालिकाओं को प्राथमिक शिक्षा और वैकल्पिक ‘मिडिल वर्नाकुलर’ (मध्य देशीय भाषा) स्कूलों का प्रबंधन करना था; जबकि सरकार को माध्यमिक शिक्षा, अस्पतालों और पुलिस आदि का कार्यभार संभालना था।
भारत सरकार का प्रस्ताव (1915)
  • 1908 के आयोग के प्रति ‘आधिकारिक प्रतिक्रिया’ को परिलक्षित किया।
  • अधिकांश सिफारिशें लागू नहीं।
  • स्थानीय निकायों की स्थिति अपरिवर्तित। 
  • मई 1918 का प्रस्ताव
  • 20 अगस्त, 1917 की घोषणा (अगस्त घोषणा) के बाद जारी किया गया
  • स्थानीय स्वशासन को—
    • उत्तरदायी शासन की पहली सीढ़ी माना।
  • यह सुझाव दिया गया कि स्थानीय निकायों को अधिक ‘प्रतिनिधित्व पूर्ण’ बनाया जाए और उन्हें नाममात्र की शक्तियों के बजाय ‘वास्तविक अधिकार’ सौंपे जाएं।
द्वैध शासन में स्थानीय स्वशासन (1919)
  • स्थानीय स्वशासन एक ‘हस्तांतरित विषय’ बन गया
  • भारतीय मंत्रियों के अधीन आयावित्त एक ‘आरक्षित विषय’ बना रहा
  • परिणाम:
    • धन की कमी
    • स्थानीय संस्थानों का सीमित विकास।
साइमन कमीशन (1930)
  • अवलोकन:
    • पंचायतों ने बहुत कम प्रगति दिखाई, केवल इन स्थानों के अलावा:
      • संयुक्त प्रांत
      • बंगाल
      • मद्रास
    • निर्वाचित सदस्यों द्वारा स्थानीय कर लगाने में अनिच्छा
    • 1919 के सुधारों के बाद वित्तीय प्रबंधन खराब हो गया
  • सुझाव:
    • दक्षता के लिए प्रांतीय नियंत्रण बढ़ाना (प्रतिगामी कदम)।
  • भारत सरकार अधिनियम, 1935 और उसके बाद
    • प्रांतीय स्वायत्तता शुरू की गई
    • वित्त विभाग लोकप्रिय मंत्रालयों को सौंपा गय
    • सकारात्मक प्रभाव:
      • स्थानीय निकायों के लिए अधिक फंड
      • प्रांतीय और स्थानीय वित्त के बीच कठोर सीमांकन को समाप्त करना।
      • नए प्रांतीय अधिनियमों ने स्थानीय निकायों के अधिकार में वृद्धि की।
  • सीमाएँ:
  • वित्तीय शक्तियाँ कमजोर रहीं
  • नए करों पर प्रतिबंध
    • टर्मिनल टैक्स
    • संपत्ति कर
    • व्यापार और पेशे पर टैक्स
  • प्रांतों ने 1908 में सुझाए गए उदार कराधान शक्तियों को नज़रअंदाज़ किया

निष्कर्ष

  • 1857 के बाद प्रशासनिक परिवर्तन –
    • ब्रिटिश नियंत्रण को सुदृढ़ करने वाले
    • केंद्रीकरण बढ़ाने वाले
    • साम्राज्यवादी शोषण का विस्तार करने वाले
  • भारतीय सहभागिता –
    • सीमित
    • अभिजात वर्ग आधारित
    • अलोकतांत्रिक
  • ब्रिटिश शासन बना रहा—
    • सत्तावादी
    • प्रतिक्रियावादी
    • विदेशी चरित्र का।

फूट डालो और राज करो की नीति

  • अंग्रेजों का उद्देश्य एकजुट जन-प्रतिरोध को रोकना था।
    • इसके लिए सुनियोजित “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनाई गई।
  • निम्न के बीच विभाजन को बढ़ावा दिया गया:
    • राजा बनाम जनता
    • क्षेत्र बनाम क्षेत्र
    • प्रांत बनाम प्रांत
    • जाति बनाम जाति
    • हिंदू बनाम मुसलमान

सांप्रदायिक नीति

  • 1857 के बाद मुसलमानों पर प्रारंभिक दमन किया गया।
  • 1870 के बाद ब्रिटिशों ने शिक्षित मध्यम और उच्च वर्ग के मुसलमानों का समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया।
  • परिणाम—
    • शिक्षित भारतीयों के बीच धार्मिक विभाजन
    • सांप्रदायिक चेतना का मजबूत होना
  • मूल कारण—
    • औपनिवेशिक अल्प विकास और संसाधनों की कमी
जमींदारों और रियासतों के प्रति नीति
  • अंग्रेजों ने राजाओं, ज़मींदारों व बड़े भू-स्वामियों से गठबंधन किया।
  • इन समूहों को “प्राकृतिक” “पारंपरिक” नेता माना गया 
  • परिणाम—
    • किसानों के हितों की उपेक्षा
    • ज़मींदार ब्रिटिश शासन के वफादार समर्थक बने
सामाजिक सुधारों के प्रति नीति
  • अंग्रेजों ने सामाजिक सुधार आंदोलनों से समर्थन वापस ले लिया।
  • कारण—
    • रूढ़िवादी और परंपरावादी वर्गों को नाराज करने का डर।
अविकसित सामाजिक सेवाएं
  • अधिकांश सरकारी व्यय—
    • सेना
    • नागरिक प्रशासन
    • युद्ध
  • न्यूनतम व्यय—
    • शिक्षा
    • स्वास्थ्य
    • स्वच्छता
    • भौतिक अवसंरचना

देशी रियासतों के प्रति ब्रिटिश नीति

ब्रिटिश नीति के मूल उद्देश्य
  • ब्रिटिश नीति दो बिंदुओं पर आधारित थी—
    • देशी रियासतों का उपयोग करना और उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य के ‘सुरक्षा दुर्ग’ के रूप में बनाए रखना।
    • उन्हें पूर्णतः ब्रिटिश सत्ता के अधीन करना
      • इस दृष्टिकोण को अधीनस्थ संघ की नीति के रूप में जाना जाता है।
विलय नीति का परित्याग –

1857 के विद्रोह के बाद, अंग्रेजों ने विलय की नीति छोड़ दी।

रियासतों की संप्रभुता का अंत
  • रियासतों की स्वतंत्रता का भ्रम समाप्त हुआ जब—
    • 1876 में महारानी विक्टोरिया ने “कैसर-ए-हिंद” की उपाधि धारण की।
  • इस अधिनियम ने संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर ‘ब्रिटिश संप्रभुता’ पर बल दिया।
  • लॉर्ड कर्जन के अनुसार—
    • भारतीय राजा ब्रिटिश क्राउन के प्रतिनिधि मात्र थे।
  • समकालीन दृष्टिकोण
  • इतिहासकार एफ.जी. हचिन्स ने कहा:

“अंग्रेजों और राजाओं को एक-दूसरे की आवश्यकता थी;

भारत को इनमें से किसी की आवश्यकता थी या नहीं— यह अत्यंत संदिग्ध था।”

भारत में ब्रिटिश विदेश नीति

1. ब्रिटिश विदेश नीति का स्वरूप
  • भारत में ब्रिटिश विदेश नीति ‘भारतीय जन-कल्याण’ के बजाय ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद’ के हितों द्वारा निर्देशित थी।
  • इसके परिणामस्वरूप –
    • भारत के पड़ोसी देशों के साथ संघर्ष।
  • एशिया और अफ्रीका में ब्रिटिश नीति के प्रमुख लक्ष्य
  • ब्रिटिश सरकार का लक्ष्य
  1. भारतीय साम्राज्य की रक्षा करना, जो सबसे कीमती ब्रिटिश कॉलोनी थी।
  2. ब्रिटिश व्यापारिक और आर्थिक हितों का विस्तार करना।
  3. एशिया और अफ्रीका में प्रतिद्वंद्वी यूरोपीय साम्राज्यवादी शक्तियों (मुख्यतः रूस और फ्रांस) को दूर रखना।
भारत पर बोझ
  • हालांकि ब्रिटिश हितों की पूर्ति हुई, लेकिन इसका सम्पूर्ण भार  भारत को भुगतना पड़ा।
  • भारतीय सैनिकों का रक्त बहाया गया।
श्वेत नस्लवाद
  • ब्रिटिशों ने नस्लीय श्रेष्ठता की विचारधारा बनाए रखी।
  • भारतीयों को वंचित रखा गया –
    • उच्च प्रशासनिक सेवाओं से
    • सैन्य उच्च पदों से
    • रेलवे डिब्बों से
    • क्लबों, होटलों, पार्कों से
  • नस्लवाद का सार्वजनिक प्रदर्शन:
    • शारीरिक शोषण
    • मारपीट
    • हत्याओं को “दुर्घटना” बताया गया
  • उद्देश्य:
    • ब्रिटिशों को प्रमुख नस्ल के रूप में स्थापित करना।
    • प्रशासन पर विशेष नियंत्रण बनाए रखना।

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