जैन धर्म प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, क्योंकि इसकी अहिंसा, सत्य और तपस्या आधारित शिक्षाओं ने भारतीय समाज, संस्कृति और दर्शन को गहराई से प्रभावित किया। यह धर्म आत्मशुद्धि, नैतिक जीवन और मोक्ष की प्राप्ति पर विशेष बल देता है।
जैन धर्म
उत्पत्ति व अर्थ
भगवान महावीर ने जैन धर्म का प्रसार किया, जो एक प्राचीन धर्म है जिसे छठी शताब्दी ईसा पूर्व में प्रमुखता प्राप्त हुई।
जैन धर्म में, तीर्थकर के नाम से जाने जाने वाले प्रसिद्ध प्रशिक्षकों की एक श्रृंखला है।
जैन परंपरा में 24 तीर्थकर हैं। ऋषभदेव को पहला तीर्थकर माना जाता है। अंतिम तीर्थंकर महावीर थे। जैन मान्यताओं को उनके द्वारा बनाया और अंतिम रूप दिया गया।
जैन शीर्षक ‘जिन’ शब्द से आया है, जिसका संस्कृत में अर्थ है विजेता।
भिक्षु-भिक्षुणी – ये संन्यासी जीवन व्यतीत करते थे।
श्रावक-श्राविका – ये गृहस्थ होकर भी संघ के सदस्य थे।
निष्क्रमण – जैन संघ में प्रवेश करने के लिए एक विधि संस्कार
जैन संघ में ऊंच-नीच एवं अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं था।
भिक्षुणी संघ प्रमुख: चन्दना
श्राविका संघ प्रमुख: चेलना
जैन संप्रदाय
दो प्रमुख मत
श्वेतांबर
दिगंबर
वस्त्रधारी
नग्न साधु
स्त्रियाँ मोक्ष की अधिकारी
स्त्रियाँ मोक्ष की अधिकारी नहीं
महावीर विवाहित
महावीर अविवाहित
मल्लीनाथ – स्त्री
मल्लीनाथ – पुरुष
अंग, उपांग ग्रंथ मान्य
अंग, उपांग अस्वीकृत
प्रमुख: स्थूलभद्र
प्रमुख: भद्रबाहु
उपसंप्रदाय:
श्वेतांबर – मूर्तिपूजक, स्थानकवासी, थेरापंथी आदि
दिगंबर – बीसपंथी, तेरापंथी, गुमानपंथी आदि
जैन संगीति
संगीति
वर्ष
स्थान
अध्यक्ष
परिणाम
प्रथम
300 ई.पू.
पाटलिपुत्र
स्थूलभद्र
12 अंगों का संकलन; दो संप्रदाय बने
द्वितीय
512 ई.
वल्लभी (गुजरात)
देवर्धिगणि क्षमाश्रमण
12 अंग व 12 उपांगों का अंतिम संकलन
जैन धर्म के विस्तार के कारण
संघों की सक्रियता
शासकों का संरक्षण – चंद्रगुप्त मौर्य, खारवेल, कदंब, गंग, चालुक्य
सरल भाषा (अर्द्धमागधी)
वैचारिक अपील (अहिंसा, अपरिग्रह)
कला-वास्तुकला – गुफा, मंदिर
जैन धर्म का पतन
महावीर के बाद प्रभावशाली प्रचारकों का अभाव
शासकीय संरक्षण का ह्रास
कठोर तप, आत्मपीड़न
बौद्ध धर्म का प्रसार
ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान
प्रमुख तथ्य
जैन धर्म = नास्तिक दर्शन (ईश्वर-निर्वाणवाद)।
भिक्षुणी संघ की अनुमति महावीर ने नहीं दी (महिलाएँ मोक्ष योग्य)।
संसार = जन्म-मृत्यु का चक्र (संसरण)।
मोक्ष = कर्म क्षय से आत्मा की शुद्धि।
जैन पंचमहाव्रत आज भी जैन समाज का मूल आचार।
कला व वास्तुकला
मूर्तियाँ
गोमेतेश्वर/बाहुबली प्रतिमा – श्रवणबेलगोला, कर्नाटक
अहिंसा की मूर्ति (ऋषभनाथ) महाराष्ट्र मांगी-तुंगी पहाड़ियाँ,
राजस्थान में जैन धर्म
प्रमुख केंद्र: रणकपुर, माउंट आबू (दिलवाड़ा), जैसलमेर, नागौर, चित्तौड़।
मूलसंघ, काष्ठ संघ, लोनकासंघ – श्वेताम्बर परंपरा की शाखाएँ।
भद्रबाहु व चंद्रगुप्त मौर्य के श्रवणबेलगोला में निर्वाण का वर्णन।
जैन साहित्य
भगवान महावीर के उपदेशों को मौखिक रूप से और विधिपूर्वक कई ग्रंथों (शास्त्रों) में, उनके तात्कालिक शिष्यों, जिन्हें गणधर कहा जाता है, और बड़े भिक्षुओं, जिन्हें श्रुत-केवली कहा जाता है, ने संकलित किया।
प्राकृत और अर्धमागधी में लिखने के अतिरिक्त, काल, क्षेत्र और अपना समर्थन करने वाले संरक्षकों के आधार पर जैन भिक्षुओं ने कई अन्य भाषाओं में भी लिखा था। दक्षिण भारत में संगम काल के दौरान उन्होंने तमिल
में लिखा। उन्होंने संस्कृत, शौरसेनी, गुजराती और मराठी में भी लिखा।
जैन साहित्य को व्यापक रूप से दो प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है – ‘जैन आगम नामक धर्मवैधानिक’ या धार्मिक ग्रंथ और धर्मेत्तर साहित्यिक रचनाएं।
जैन साहित्य का विकास
जैन तीर्थंकर के दिव्य उपदेश – समवशरण कहा जाता था , जिसे तपस्वियों और आम लोगों ने सुना।
इन प्रवचनों को श्रुत ज्ञान कहा जाता था और इसमें हमेशा 12 अंग और 14 पूर्व होते थे।
श्रुत ज्ञान को उनके शिष्यों द्वारा सुत्त में परिवर्तित किया।
तत्तावार्थ सूत्र: जैन ग्रंथ उमास्वामी द्वारा संस्कृत में लिखे गए।
इसका एक सूत्र, परस्परोपग्रहो जीवनम्, जैन धर्म का आदर्श वाक्य है।
श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों में प्रामाणिक।
जैन आगम
पवित्र ग्रंथ और इन्हें जैन तीर्थंकरों की शिक्षाएं माना।
मूल रूप से गणधरों द्वारा संकलित किया गया बताया जाता है जो महावीर के करीबी शिष्य थे।
श्वेतांबरों के लिए ये ग्रंथ महत्त्वपूर्ण।
संकलन – प्रथम जैन संगीति (300 ई.पू.) में पाटलिपुत्र में तथा वर्तमान अंगों को मध्य 5 वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान वल्लभी (गुजरात) में आयोजित श्वेतांबर पंथ के भिक्षुओं की परिषद् में पुर्नसंकलित किया गया बताया जाता है।
दिगम्बर संप्रदाय का मानना है कि मूल शिक्षाएं बहुत समय पहले लुप्त गई थी और वे वल्लभी में संकलित आगम का प्राधिकार स्वीकार नहीं करते हैं।
“आगम” में 46 ग्रंथ सम्मिलित हैं. जिनमें से 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्णक, 4 मूलसूत्र, 6 छेदसूत्र, 2 चुलिका सुत्र हैं।
अर्ध-मागधी प्राकृत भाषा में लिखा गया है। अंग, जीवन के सभी प्रकार के लिए आदर, शाकाहार, तपश्चर्या, दया और अहिंसा की कठोर संहिताएं सिखाते हैं।
4 मूलसूत्र –
आचारांग सूत्रः सबसे प्राचीन आगम, क्षमाश्रमण देवर्धिगणि द्वारा पुनः संकलित और संपादित, महावीर की शिक्षाओं के आधार पर संकलित [जैन मुनियों के जीवन के लिए आचार नियम।]\
सूत्रकृतांगः जैन भिक्षुओं के लिए आचार संहिता, तत्वमीमांसा आदि का वर्णन करता है।
स्थानांग सूत्र
समवायांग सूत्र जैन धर्म के सार, खगोल शास्त्र, गणित आदि पर चर्चा।
व्याख्याप्रजनापति या भगवती सूत्र – महावीर के जीवन तथा कृत्यों एवं उनके समकालीनों का वर्णन। इसमें सोलह महाजनपदों का उल्लेख है। [रचना जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय के सुधर्मस्वामी ने की थी, यह जैन प्राकृत में लिखा गया है।
12 उपांग – इसमें ब्राह्मण का वर्णन, प्राणियों का वर्गीकरण, खगोल विधा, काल विभाजन, मरणोपरान्त जीवन का वर्णन आदि।
10 प्रकीर्ण – जैन धर्म से संबंधित विधि विषयों का वर्णन।
6 छेदसूत्र – इसमें भिक्षुओं के लिए उपयोगी नियम तथा विधियों का संग्रह।
नादि सूत्र एवं अनुयोग सूत्र – जैनियों के शब्द कोष है। इसमें भिक्षुओं के लिए आचरण संबंधी बातें है।
दिगंबरों के लिए दो प्राचीनतम ग्रंथ सबसे पवित्र हैं – कर्मप्रभृत (कर्म पर चर्चा) या शतखंडगम और कश्यपप्रभूत।
शतखंडगम
लेखक: पुष्पदंत और भूतबलि
भाषा: प्राकृत
कर्म और उसका आत्मा से संबंध, साथ ही कर्म की प्रकृति।
संक्षिप्त गद्य में लिखा गया, मुख्यतः सूत्रात्मक शैली में ।
छह भागों में विभाजित –
जीव स्थान (जीवित प्राणियों की श्रेणियाँ)
क्षुद्रक बंध (बंधन की सूक्ष्मता)
बन्धस्वामित्व (बंधन का स्वामित्व)
वेदना (धारणा)
महाबंध (महान बंधन)
वर्गणा (कर्मों का विभाजन)
कश्यपप्रभूत।
दूसरी से तीसरी शताब्दी ई. में भिक्षु गुणभद्र द्वारा संकलित ।
180 श्लोक
वीरसेन ने इसे प्राकृत और संस्कृत में लिखना शुरू किया और जिनसेन ने इसे 820 ई. में पूरा किया।
यह भी पूर्वों पर आधारित है ।
यह संसार की वस्तुओं के प्रति वासनाओं – कषायों – या आसक्ति से संबंधित है।
श्वेताम्बर ग्रन्थ
ग्रन्थ
लेखक
ग्रन्थ विवरण
योगशास्त्र
हेमचंद्र
सामान्य लोगों और तपस्वियों के लिए आचरण के नियमों पर एक ग्रंथ तथा भाषा: संस्कृत
त्रिषष्ठिशलाकापुरुषचरित
63 महान प्राणी जो प्रत्येक अर्द्ध-काल चक्र के दौरान प्रकट होते हैं।
परिशिष्टपर्वन
प्रारंभिक जैन शिक्षकों का इतिहास विस्तृत
अर्हन्निति
जैन दृष्टिकोण से राजनीति पर ग्रन्थ
हेमचन्द्र सूरी के अन्य ग्रन्थ – काव्यानुशासन, छन्दानुशासन, सिद्धहैमशब्दानुशासन (प्राकृत और अपभ्रंश का ग्रन्थ), उणादिसूत्रवृत्ति, देशीनाममाला, अभिधानचिन्तामणि, द्वाश्रय महाकाव्य, काव्यानुप्रकाश,अलङ्कारचूडामणि, प्रमाणमीमांसा. वीतरागस्तोत्र
ज्ञानार्णव या योगप्रदीपाधिकार
शुभचंद्र
विभिन्न विषयों पर आधारित एक संस्कृत ग्रन्थ है, जो मुख्य रूप से ध्यान पर केंद्रित
योगदृष्टिसमुच्चय
हरिभद्र सूरी
आठ दृष्टियों का वर्णन किया है जो योग साधना के लिए महत्त्वपूर्ण
शास्त्रवार्तासमुच्चय
ध्यानशतक
समराइच्चकहा
एक राजकुमार के जीवन और उसके द्वारा प्राप्त ज्ञान का वर्णन नैतिक शिक्षा देने के लिए लिखी गई
कल्प सूत्र (जैन तीर्थंकरों की आत्मकथा)
भद्रबाहू (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व – जैन धर्म में अंतिम श्रुत केवलिन), सबसे बड़े जैन भिक्षुओं में से एक थे और चंद्रगुप्त मौर्य के शिक्षक, दिगंबर संप्रदाय के अगुआ
प्राकृत भाषाजैन तीर्थंकरों, विशेषकर पार्श्वनाथ और महावीर की जीवनियाँ सम्मिलित
हरिभद्र सूरी के अन्य ग्रन्थ – श्रावकधर्मविधि, यतिदिनकृत्य,श्रर्मपरीक्षा, महावीरस्तव, समाचारीप्रकरण
दिगम्बर ग्रन्थ
ग्रन्थ
लेखक
विवरण
लीलावतीसार
आचार्य जिनरत्न
यह आत्माओं के एक समूह के जीवन की कहानियां बताता है, जब वे अंतिम मुक्ति के मार्ग पर अवतारों की एक श्रृंखला से गुजरते हैं ।
समयसार
आचार्य कुन्दकुन्द
कर्म, आस्रव, बंध और मोक्ष जैसी जैन अवधारणाओं की व्याख्या।
नियमसार
मोक्ष के मार्ग पर प्रकाश डालता
प्रवचनसार
रत्न करन्द श्रावकचर (जैन गृहस्थ का जीवन)
समंतभद्र स्वामी
दूसरी शताब्दी ईस्वी के आसपासभाषा: संस्कृत
आप्तमीमांसा
सर्वार्थसिद्धि
पूज्यपादा
तत्त्वार्थ सूत्र पर सबसे पुरानी टिप्पणी भाषा: संस्कृत
त्रिशस्तिलक्षणा महापुराण
जिनसेन [प्रसिद्ध जैन भिक्षु वीरसेन के शिष्य]
राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष के शासन काल में रचितदो भाग – पहला भाग (आदि पुराण) – जिनसेन द्वारा संस्कृत में दूसरा भाग (उत्तर पुराण) – गुणभद्र [जिनसेन का शिष्य] अपभ्रंश में
धवला
कश्यपप्रभूत पर टीका
नोट – हरिवंशपुराण ग्रन्थ अन्य जिनसेन ने लिखा था।
अन्य जैन ग्रन्थ
ग्रन्थ
लेखक
विवरण
शिलप्पादिकारम [नूपुर की कहानी”]
इलंगो आदिगल
दूसरी-तीसरी शताब्दी ई. में तमिल साहित्य के सबसे महान महाकाव्यों में से एकग्रंथ के केन्द्र में कण्णगी है जिसने पांड्य वंश के न्याय व्यवस्था की गलती से अपना पति खोने पर उसके राज्य पर अपना प्रतिशोध उतारा।
जीवक चिंतामणी
तिरुतक्कदेवर
तमिल साहित्य का एक महाकाव्य
नलतियर
प्राचीन तमिल ग्रंथ जैन भिक्षुओं द्वारा लिखित
तत्त्वार्थ सूत्र
उमास्वामी
पहली/दूसरी शताब्दी ईस्वीतर्क, ज्ञानमीमांसा, आचार और खगोल विज्ञान परसंस्कृत में महत्त्वपूर्ण जैन रचना है।