गुप्त साम्राज्य प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय माना जाता है। इस काल में कला, साहित्य, विज्ञान और राजनीति का अद्भुत विकास हुआ, जिसके कारण इसे ‘स्वर्ण युग’ के नाम से भी जाना जाता है।
गुप्त साम्राज्य (240 ई0 से 550 ई0 तक)

उत्पत्ति व पृष्ठभूमि
- मौर्य साम्राज्य पतन के बाद भारत की एकता समाप्त।
- कुषाण (उत्तर) व सातवाहन (दक्षिण) सीमित प्रभाव में रहे।
- 4वीं शताब्दी में पूर्वी भारत (मगध) से गुप्त वंश का उदय।
- गुप्त संभवतः कुषाणों के सामंत थे।
- पुराणों में — मागध गुप्त कहा गया।
- स्रोत – विष्णु पुराण, वायु पुराण, भागवत पुराण।
- प्रारंभिक क्षेत्र – मगध व उत्तर-पश्चिम बंगाल तक का गंगा तटीय प्रदेश।
गुप्त काल की उपाधियाँ व विशेषताएँ
- K.M. मुंशी – भारत का स्वर्ण युग
- वार्नेट – भारत का पेरिक्लीज युग
- मैक्समूलर – साहित्य का पुनर्जागरण काल
- R.D. बनर्जी – कला का पुनर्जागरण काल
- मजूमदार व अल्तेकर – गुप्त–वाकाटक युग
अभिलेख व सिक्कों की विशेषता
- रानियों के नाम अभिलेखों में (प्रथम – कुमारदेवी, प्रयाग प्रशस्ति)।
- सिक्कों पर राजा–रानी दोनों की आकृति (चन्द्रगुप्त–कुमारदेवी स्वर्ण मुद्रा)।
उत्पत्ति संबंधी मत
| विद्वान | मत |
| के.पी. जायसवाल | शूद्र / जाट (कीर्तिकौमुदी, चन्द्रगोमिन व्याकरण) |
| हेमचन्द्र राय चौधरी, दशरथ शर्मा | ब्राह्मण (धारण गोत्र – प्रभावती गुप्ता का पूना ताम्रपत्र) |
| रमेश चन्द्र मजूमदार, ओझा | वैश्य |
| अन्य (एलन, अल्तेकर, थापर, शर्मा) | क्षत्रिय / वैश्य मत समर्थक |
प्रारंभिक शासक
श्रीगुप्त (लगभग 240 ई0 280 ई0)
- गुप्तों का आदिपुरुष (गूढ़ पुरुष)
- प्रभावती गुप्ता के पूना ताम्रपत्र अभिलेख में श्रीगुप्त का उल्लेख गुप्त वंश के ‘आदिराज’ के रूप में किया गया है।
- महाराज की उपाधि धारण की।
- श्री गुप्त स्वतंत्र शासक न होकर संभवतः किसी शासन के अन्तर्गत सामन्त थे।
- चीनी यात्री इत्सिंग ने श्री गुप्त को ‘चिलिकितो’ कहा है।
- श्रीगुप्तों ने “श्रीपतनमृगदाय मंदिर” का निर्माण चीनी भिक्षुओं हेतु करवाया।
घटोत्कच (280 ई0 319 ई0)
- लगभग 280 ई0 में श्रीगुप्त ने घटोत्कच को अपना उत्तराधिकारी बनाया, इसने भी महाराज की उपाधि धारण की।
- प्रभावती गुप्ता के पूना एवं रिद्धपुर ताम्रपत्र अभिलेखों में घटोत्कच को गुप्त वंश का प्रथम राजा बताया गया है, इसका राज्य सम्भवतः मगध के आस-पास तक ही सीमित था।
चन्द्रगुप्त प्रथम (319–335/350 ई.)
- गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक, जिसने वंश को शक्ति प्रदान की।
- हेमचन्द्र राय चौधरी – द्वितीय मगध साम्राज्य का संस्थापक।
- राजधानी – पाटलिपुत्र (प्रारंभ में वैशाली नहीं था)।
- उपाधि – महाराजाधिराज (गुप्त वंश में प्रथम)।
- संवतकर्मा – गुप्त संवत (319–20 ई.) चलाया, जो वल्लभी संवत् के समान है।
- सर्वप्रथम प्रयोग – चन्द्रगुप्त द्वितीय के मथुरा अभिलेख में।
- अलबरूनी – यह शक संवत् से 241 वर्ष बाद प्रारंभ हुआ (319 ई.)।
- विवाह – लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी (राजा वृषदेव की पुत्री) से।
- इस विवाह से वैशाली गुप्त साम्राज्य में सम्मिलित हुआ।
- सिक्के – प्रथम स्वर्ण सिक्के जारी किए।
- प्रकार – राजा-रानी, लिच्छवि प्रकार, विवाह प्रकार, राजदम्पति व देवी प्रकार।
- केवल एक चांदी का सिक्का मिला (इसलिए रजतमुद्रा प्रवर्तक नहीं)।
काच विवाद
- फादर हैरास – समुद्रगुप्त ने अपने भाई काच से युद्ध किया।
- काच मुद्राओं पर “सर्वराजोच्छेता” उपाधि अंकित (जो समुद्रगुप्त की है)।
- फ्लीट – काच मुद्राएँ वास्तव में समुद्रगुप्त की ही हैं।
समुद्रगुप्त (335/350–375 ई.)
- जानकारी : प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद स्तंभ लेख)
- रचना : हरिषेण (कवि) [समुद्रगुप्त के दरबार में]
- उत्कीर्ण : तिलभट्ट
- भाषा : अलंकारिक संस्कृत भाषा
- शैली : गद्य + पद्य (चम्पू)
- लिपि : ब्राह्मी लिपि
- प्रयाग प्रशस्ति को प्रकाश मे लाने का श्रेय “एन्ट्रायर” को है।
- यह अभिलेख उसी स्तंभ पर उत्कीर्ण है, जिस पर अशोक का स्तम्भ लेख है।
- समुद्रगुप्त के विजय अभियानों का उल्लेख
- जिसमें समुन्द्रगुप्त के राज्याभिषेक, दिग्विजय एवं व्यक्तित्व पर विशद् प्रकाश डाला गया है तथा कई अधिकारियों के पदों व नामों के उल्लेख से गुप्तकालीन शासन व्यवस्था की जानकारी मिलती है।
- प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को “कविराज”, गायन व संगीत में दक्षता में गुरु तुम्बरू व नारद को लज्जित करने वाला, लाख गायों का दानी, उच्चकोटि का विद्वान, विद्या का संरक्षक एवं धर्म का प्राचीर कहा गया।
- चन्द्रगुप्त के पश्चात् उसका पुत्र समुद्रगुप्त शासक बना।
- विंसेट स्मिथ ने समुद्रगुप्त को ‘भारत का नेपोलियन’ कहा है।
- ऐरण अभिलेख में समुद्रगुप्त को प्रसन्न होने पर कुबेर के समान तथा रुष्ट होने पर यमराज के समान बताया गया। ऐरण अभिलेख में उसे पराक्रम तथा विजय का स्रोत कहा गया।
- समुद्रगुप्त द्वारा जारी किए गए सिक्कों में कुछ पर ‘अश्वमेध पराक्रम’ अंकन है, तो कुछ पर सम्राट को वीणा वादन करते हुए दिखाया गया है।
- चीनी स्रोत के अनुसार श्रीलंका के शासक मेघवर्मन ने समुद्रगुप्त से बोधगया में बौद्धमठ बनाने की अनुमति माँगी।
- समुद्रगुप्त को 100 युद्धों का विजेता बताया गया।
- कृष्णचरित्र का रचयिता समुद्रगुप्त था।
- समुद्रगुप्त द्वारा किए गए अश्वमेघ यज्ञ का उल्लेख प्रयाग प्रशास्ति में नहीं आता है।
- प्रयाग प्रशस्ति पर बीरबल व जहाँगीर का लेख भी मिला है।
समुद्रगुप्त के 6 प्रकार के सोने के सिक्के:
| मुद्रा / प्रतीक | विशेषता / उपाधि |
| गरुड़ | अग्र भाग पर गरुड़ अंकित, पृष्ठ भाग पर सिंहासनारूढ़ समुद्र के साथ दत्तदेवी का अंकन, उपाधि : पराक्रमांक – शब्द उत्कीर्ण |
| धनुर्धारी | उपाधि : अप्रतिरथ |
| परशु | उपाधि : कृतांत परशु |
| अश्वमेध | अग्र भाग पर “अश्वमेध पराक्रमांक” उपाधि, पृष्ठभाग पर दत्तदेवी के साथ अश्वमेध यज्ञ अंकित |
| व्याघ्रहनन | मुख भाग पर “व्याघ्र पराक्रम:” उपाधि अंकित |
| वीणावादिन | समुद्रगुप्त को वीणा बजाते हुए दर्शाया गया, उपाधि – कविराज |
नोट : समुद्रगुप्त को उसके सिक्कों पर “लिच्छवी दौहित्र” भी कहा गया है।
समुद्रगुप्त की विजय –
- समुद्रगुप्त एक महान् शासन, सेनापति, कूटनीतिज्ञ, बहुआयामी प्रतिभा से युक्त यर्थाथवादी व्यक्तित्व था।
- समुद्रगुप्त का साम्राज्य विस्तार में कश्मीर, पश्चिमी पंजाब, पश्चिमी राजपुताना, सिंध और गुजरात के अतिरिक्त शेष सारा भारत सम्मिलित था।
- समुद्रगुप्त ने भारत में एक नए युग की स्थापना की, वह अखिल भारतीय साम्राज्य के आदर्श से प्रेरित हुआ तथा सम्पूर्ण भारत वर्ष को राजनीतिक एकता के सूत्र में बाँधा ।
- उसके दरबारी कवि एवं महासंधिविग्रहक हरिषेण ने प्रयाग प्रशस्ति में अपने आश्रयदाता समुद्रगुप्त के पराक्रम व दिग्विजय का वर्णन किया है।
- समुद्रगुप्त द्वारा अपनाई गई नीतियाँ-
- आर्यावर्त – प्रसभोद्वरण (जड़मूल से उखाड़ फेंकना)
- दक्षिणापथ – ग्रहणमोक्षानुग्रह
- आटविक राज्य – परिचारकीकृत नीति
- सीमावर्ती राज्य – सर्वकरदान, आज्ञाकरण, प्राणगमन
- विदेशी शक्तियों – गुरुत्मंदक स्वविषय भुक्तिशासन याचना (शक, कुषाण)
आर्यवर्त अभियान –
- समुद्रगुप्त ने सर्वप्रथम आर्यवर्त अर्थात् गंगा, यमुना दोआब पर सैनिक अभियान किया। जो दो चरणों में पूरा हुआ।
- नौ राजाओं रूद्रवेद, मतिल, नागदत्त, चन्द्रवर्मन, गणपति, नाग, नागसेन, अच्युत, नंदी एवं बलवर्मा को पराजित किया, जिन्हें राजप्रसभोद्धरण की नीति के तहत साम्राज्य में मिला लिया।
दक्षिण अभियान
- समुद्रगुप्त ने दक्षिण के 12 राज्यों कौशल, महाकान्तर, कोरल, कोट्टूर, पिष्टपुर, एरनपल्ली, कांची, अवमुक्त, वैंगी, पल्लक, देवराष्ट्र, कुस्थलपुर आदि को पराजित किया। लेकिन उसने उन्हें ग्रहणमोक्षानुग्रह की नीति अर्थात् ग्रहण (शत्रु पर अधिकार), मोक्ष (शत्रु को मुक्त करना) एवं अनुग्रह (राज्य को लौटाकर) के तहत फिर मुक्त कर दिया।
- वह जानता था कि इन दूरस्थ भागों पर प्रत्यक्ष शासन असंभव नहीं तो मुश्किल अवश्य था। अतः उसने ग्रहणमोक्षानुग्रह की व्यवहारिक नीति का अवलम्बन किया।
आटविक राज्य
- समुद्रगुप्त ने मध्य भारत के आटविकों को भी परास्त किया व उन्हें अपना भृत्य बना दिया।
सीमावर्ती राज्य
- सीमान्त प्रदेशों के राजतन्त्रात्मक एवं गणतन्त्रात्मक राज्यों में भी भयभीत होकर अधीनता स्वीकार कर ली।
- जिनमें उत्तर पूर्व भारत के समतट डवाक् कामरूप, नेपाल, कर्तपुर व पश्चिमी भारत के नौ गणतन्त्र राज्य आभीर, अर्जुनायन मालव, यौद्धेय, मद्रक, प्रार्जुन, सनकानिक, काक व खरपरिक थे। इनके साथ सर्वदानाज्ञाकरण प्राणायाम की नीति का अवलंबन किया।
विदेशी शक्तियाँ
- देवपुत्र, शाहिशाहानुशाही, शक-मुरूण्ड तथा सिंहल आदि विदेशी शासकों ने समुद्रगुप्त से भयभीत होकर उससें मैत्रीयाचना की, इनके साथ आत्म-निवेदन, कन्योपायान, गुरूत्मदंकित, स्वविषय, भुक्ति, शासन याचना की नीति का अनुसरण किया।
- इस प्रकार समुद्रगुप्त ने भारत के बहुत बड़े भाग को अपने अधीन कर एकता के सूत्र में बाँधा और उससे कहीं अधिक भू-भाग में उसका लोहा माना जाता था, जो उसकी यथार्थवादी नीति का प्रतीक है। स्मिथ ने समुद्रगुप्त उसकी बहादुरी एवं युद्ध कौशल के कारण भारत का नेपोलियन कहा है।
समुद्रगुप्त के दो पुत्र :
- रामगुप्त(375 ई.- 380 ई.) :- उल्लेख गुप्त वंशावली में नहीं मिलता।
- चंद्रगुप्त II (380 ई.- 412/14 ई.)
रामगुप्त (375 ई.-380 ई.)
- समुद्रगुप्त की मृत्यु के बाद रामगुप्त शासक बना, यह कमजोर व निर्बल शासक था।
- रामगुप्त के शासन के समय शकों का आक्रमण हुआ इसने अपनी पत्नी ध्रुवस्वामिनी को शकों को सौंप दिया।
- चन्द्रगुप्त-II ने ध्रुवस्वामिनी को स्वतंत्र करवाया व भाई रामगुप्त की हत्या कर स्वयं शासक बना।
- इस सम्पूर्ण कथा का उल्लेख विशाखदत्त ने अपने ग्रंथ देवीचन्द्र-गुप्तम में किया है।
- रामगुप्त का उल्लेख बाणभट्ट द्वारा रचित हर्षचरितम् व राजशेखर की काव्यमीमांसा में भी मिलता है।
नोट : आधुनिक भारत में राखालदास बनर्जी ने 1924 ई. में सर्वप्रथम रामगुप्त की ऐतिहासिकता को साबित करने का प्रयास किया।
चन्द्रगुप्त द्वितीय (375 ई0 414 ई0)
- समस्त गुप्त राजाओं में समुद्रगुप्त का पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय सर्वाधिक शौर्य एवं वीरोचित गुणों से सम्पन्न था।
- चीनी यात्री फाह्यान चन्द्रगुप्त द्वितीय के काल में भारत आया था। फाह्यान ने ‘फो-क्यों-की’ नामक ग्रंथ लिखा।
- इसके दरबार में कालिदास एवं अमर सिंह जैसे विद्वान रहते थे।
- शकों को पराजित करने की स्मृति में चन्द्रगुप्त द्वितीय ने चांदी के विशेष सिक्के जारी किए।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शकों को पराजित कर ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय की उपाधियाँ – देवक्षी, देवगुप्त, देवराज, तत्परिगृहीत, विक्रमादित्य, विक्रमांक, परमभागवत, राजाधिराऋर्षि
- चन्द्रगुप्त द्वितीय ने सर्वप्रथम वैवाहिक संबंधों द्वारा अपनी स्थिति सुदृढ़ की, उसने नागवंश की कुबेर नागा तथा कदम्ब वंश की राजकुमारी से स्वयं एवं वाकाटक वंश के रूद्रसेन द्वितीय से अपनी पुत्री प्रभावती का विवाह किया। इनसे प्रभावशाली शासकों की मित्रता व संरक्षण प्राप्त हो गया।
- रूद्रसेन द्वितीय की मृत्यु के बाद चन्द्रगुप्त ने अप्रत्यक्ष रूप से वाकाट्क राज्य को अपने राज्य में मिलाकर उज्जैन को अपनी दूसरी राजधानी बनायी।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय ने गुप्त साम्राज्य को अरब सागर तक बढ़ाया और सौराष्ट्र प्रायद्वीप को विजित किया। उसने पश्चिमी भारत के शकों को पराजित किया तथा शक शासक रूद्रसेन तृतीय को हराया। इससे गुजरात, मालवा व कठियावाड़ गुप्त साम्राज्य के अंग बन गए।
- हुणों की सक्रियता को देखते हुए उसने उत्तर पश्चिम के गणराज्यों का विलय कर लिया।
- महरौली अभिलेख से विदित होता है कि उसने पश्चिम में बाहलिक (बैक्ट्रिया) व पूर्व में बंगाल तक अपनी सत्ता का विस्तार किया।
- उज्जैन को दूसरी राजधानी बनाने से राज्य के समुद्री व्यापार एवं गुजरात प्रान्त के संसाधनों में वृद्धि हुई। प्रथम राजधानी पाटलिपुत्र को।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय के दरबार में नवरत्न।
- कालिदास
- वराहमिहिर
- शंकु
- धन्वन्तरी
- क्षपणक
- अमरसिंह
- वेताल भट्ट
- घटकर्पर
- वर रुचि
नोट – आर्यभट्ट नवरत्नों में शामिल नहीं था।
कुमारगुप्त प्रथम (महेन्द्रादित्य / शक्रादित्य)
- काल: 415–455 ई.
- पिता: चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य
- माता: ध्रुवदेवी
- पत्नी: अनन्तादेवी
- 623 मुद्राएँ – बयाना मुद्रा भंडार से प्राप्त।
- शासन के अंतिम समय – पुष्यमित्र जनजातियों का विद्रोह।
- स्कन्दगुप्त के भीतरी स्तंभ लेख से विद्रोह का साक्ष्य।
उपाधियाँ : महेंद्रादित्य, श्रीमहेंद्र, अश्वमहेंद्र, शक्रादित्य (ह्वेनसांग के अनुसार), परमभागवत (गढ़वा अभिलेख)
अभिलेख (18 प्रमुख)
- बिलसड़ लेख – वंशावली ज्ञात, ध्रुव शर्मा का उल्लेख (कार्तिकेय भक्त)
- मंदसौर प्रशस्ति (473 ई.) – कवि वत्सभट्टी रचित, रेशम बुनकरों द्वारा सूर्य मंदिर निर्माण व दशपुर (मंदसौर) का उल्लेख, बंधुवर्मा राज्यपाल
- करमदण्डा अभिलेख (436 ई.) – पृथ्वीसेन द्वारा शिवलिंग स्थापना
- मथुरा लेख (432 ई.) – जैन मुनि दलिताचार्य का उल्लेख
- मानकुंवर लेख (448 ई.) – बुद्धमित्र द्वारा बुद्ध प्रतिमा स्थापना
- उदयगिरि लेख (425 ई.) – पार्श्वनाथ मूर्ति स्थापना
- सांची लेख (450 ई.) – हरिस्वामिनी नामक उपासिका द्वारा दान
- तुमैन लेख (435 ई.) – घटोत्कच गुप्त राज्यपाल; कुमारगुप्त को शरद् सूर्य कहा गया
- गढ़वा अभिलेख – दीनार सिक्कों का उल्लेख, पाटलिपुत्र में “सत्र” का दान
- दामोदरपुर, वैग्राम, धनदैह ताम्रपत्र (432–448 ई.) – भूमि क्रय-विक्रय विवरण, ग्राम प्रशासन: ग्रामिक, महत्तर, कुटुम्बिन, अष्टकुलाधिकारी
→ राज्यपाल: चिरादत्त (पुण्ड्रवर्धन)
सिक्के (14 प्रकार)
- मध्यम भारत में चाँदी के सिक्कों का प्रचलन प्रारम्भ
- प्रतीक: मयूर (कार्तिकेय), अप्रतिघ, गजारूढ़, खड्ग-निहन्ता प्रकार
- खड्ग-निहन्ता मुद्रा: कुमारगुप्त गैंडा मारते हुए
- अश्वमेध व वीणावादन प्रकार (समुद्रगुप्त समान)
- अश्वमेध यज्ञ – दो बार किया
- बयाना से 623 मुद्राएँ, सतारा से 1395 मुद्राएँ मिलीं
धार्मिक व सांस्कृतिक कार्य
- वैष्णव होते हुए भी सहिष्णु
- नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना – “शक्रादित्य” (कुमारगुप्त की उपाधि) द्वारा
→ महायान बौद्ध धर्म का केंद्र, “बौद्धों का ऑक्सफोर्ड” कहा गया
स्कन्दगुप्त (क्रमादित्य / विक्रमादित्य)
- काल: 455–467 ई.
- पिता: कुमारगुप्त प्रथम
- राजधानी: अयोध्या
- धर्म: वैष्णव (परमभागवत)
उपाधियाँ : क्रमादित्य, विक्रमादित्य, शक्रोपम, श्रीपरिक्षिप्तवक्षा, परम भागवत
प्रमुख अभिलेख
- जूनागढ़ लेख – हूण नरेश खुशनेवाज पर विजय; सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण
→ निर्माण: पर्णदत्त का पुत्र चक्रपालित
→ झील मूलतः चन्द्रगुप्त मौर्य काल में पुष्यगुप्त वैश्य ने बनवाई थी - भीतरी अभिलेख (गाजीपुर) – पुष्यमित्र व हूणों पर विजय, “गुप्तवंशैकवीर” कहा गया
→ हूण युद्ध गंगा घाटी में हुआ (“श्रोत्रेषु गंगाध्वनि”) - कहौम स्तम्भ लेख (460 ई.) – ‘शक्रोपम’ उपाधि, भद्र द्वारा 5 जैन तीर्थंकर प्रतिमाएँ
- गढ़वा अभिलेख (467 ई.) – अन्तिम लेख; चित्रकूट स्वामी (राम), अनन्त स्वामी (विष्णु) का उल्लेख
- सूपिया अभिलेख (रीवा, 460 ई.) – गुप्तों को घटोत्कच वंश का बताया
- इन्दौर ताम्रपत्र (465 ई.) – सूर्य मंदिर व दान
सिक्के
- सबसे भारी स्वर्ण मुद्रा (144–146 ग्रेन)
- नयी मुद्राएँ: नन्दी (बैल) प्रकार, वेदिका प्रकार
- चाँदी के सिक्कों का अन्तिम प्रयोग गुप्तों में
- 466 ई. में चीन के सांग सम्राट के दरबार में राजदूत भेजा
स्कन्दगुप्त के उत्तराधिकारी
| शासक | काल | प्रमुख तथ्य |
| पुरुगुप्त | 467–473 ई. | कुमारगुप्त व अनन्तादेवी का पुत्र; बौद्ध धर्मावलंबी; पत्नी – चन्द्रदेवी |
| कुमारगुप्त द्वितीय | 473–476 ई. | मंदसौर अभिलेख (रेशम बुनकरों का जीर्णोद्धार) |
| बुद्धगुप्त | 476–494 ई. | ‘श्रीविक्रम’ उपाधि; परमभट्टारक; दामोदरपुर ताम्रपत्र; बौद्ध मतावलंबी |
| नरसिंहगुप्त बालादित्य | 495–510 ई. | हूण नरेश मिहिरकुल को पराजित कर क्षमादान; बौद्ध अनुयायी; गुरु – वसुबंधु |
| भानुगुप्त | 510 ई. | एरण अभिलेख; सेनापति गोपराज की पत्नी का सती होना – सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय उल्लेख |
| वैन्यगुप्त | 510–? ई. | बंगाल का शासक; गुणैधर अभिलेख – ‘महासामंत’ व ‘पाटक’ का उल्लेख; शैव होते हुए महायान संघ को दान |
| कुमारगुप्त तृतीय | अंतिम प्रमुख शासक | माता मित्रदेवी; ‘चन्द्रादित्य’ उपाधि |
| विष्णुगुप्त | लगभग 550 ई. | गुप्त वंश का अन्तिम शासक |
गुप्त साम्राज्य का पतन
- हूण आक्रमण (खुशनेवाज, मिहिरकुल)
- साम्राज्य तीन भागों में बँट गया (मगध, मालवा, बंगाल)
- प्रांतीय राज्यपाल शक्तिशाली हुए
- मुद्रा व प्रशासनिक अव्यवस्था
गुप्त प्रशासन
सामान्य विशेषताएँ
- गुप्त प्रशासन में मौर्य, सातवाहन, शक व कुषाण प्रशासन के अंश थे।
- मौर्यों जैसा केंद्रीकरण नहीं — विकेन्द्रीकरण व सामन्तवाद बढ़ा।
- राजा का दैवी उत्पत्ति सिद्धांत कमजोर पड़ा; विष्णु का अवतार माना गया।
- राजपद वंशानुगत, पर उत्तराधिकार हमेशा ज्येष्ठ पुत्र को नहीं।
- राजा वर्णाश्रम धर्म का रक्षक — 532 ई. के यशोवर्मन अभिलेख में उल्लेख।
प्रशासनिक प्रवृत्तियाँ
- विकेन्द्रीकरण व सामन्तवाद में वृद्धि
- पराजित शासक अधीन बनते, भूमि अनुदान पाते।
- सम्राट को केवल कर व उपहार देते थे।
- भूमिदान प्रथा
- प्रारंभ में वेतन नकद; बाद में भूमि अनुदान।
- छठी शताब्दी तक अधिकारी (कुमारामात्य) स्वयं भूमिदान देने लगे।
- भूमि के साथ राजस्व व न्यायिक अधिकार भी दिये जाने लगे → सामन्तीकरण।
- एक व्यक्ति, अनेक पद
- हरिषेण – कुमारामात्य, संधिविग्रहिक, महादण्डनायक तीनों पदों पर।
- पदों का वंशानुगत होना
- ध्रुवभूति → हरिषेण → वीरसेन → अनन्तसेन
- पर्णदत्त व पुत्र चक्रपालित (सौराष्ट्र अधिकारी)
केन्द्रीय प्रशासन
- प्रमुख: सम्राट
- उपाधियाँ: महाराजाधिराज, परमेश्वर, परमभट्टारक, एकराट
- नीति: धर्मविजय (कालीदास के रघुवंश में वर्णित)
- विशेष उपाधियाँ:
- अप्रतिरथ – केवल समुद्रगुप्त व चन्द्रगुप्त II
- सर्वराजोच्छेता – केवल समुद्रगुप्त
मंत्रिपरिषद
- कामंदक व कालिदास दोनों में उल्लेख।
- प्रयाग प्रशस्ति में “राजसभा” का उल्लेख।
- मंत्री = परामर्शदाता, अमात्य = कार्यकारी अधिकारी
- अमात्य ब्राह्मण वर्ग से नियुक्त, नियुक्ति सम्राट करता था।
- राजचिह्न: गरुड़
प्रमुख अधिकारी व उनके कार्य
| पद | कार्य / विवरण |
| प्रतिहार / महाप्रतिहार | अन्तःपुर व राजा का रक्षक |
| महाबलाधिकृत / महासेनापति | सेना का प्रमुख |
| महादण्डनायक | मुख्य न्यायाधिकारी |
| महासंधिविग्रहिक | विदेश / सन्धि-विग्रह विभाग |
| महाभण्डाराधिकृत | राजकोष प्रमुख |
| महाअक्षपटलिक | लेखा व रजिस्टर विभाग |
| दण्डपाशिक | पुलिस / दण्डाधिकारी |
| शुल्किक | शुल्क विभाग का प्रधान |
| गोल्मिक / धुवाधिकरणिक | कर / भूमि संग्रह अधिकारी |
| पुरपाल (द्रांगिक) | नगर का प्रमुख अधिकारी |
| कुमारामात्य | सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी |
| अग्रहारिक | दान विभाग का अधिकारी |
प्रसिद्ध अधिकारी: वीरसेन, पृथ्वीसेन, हरिषेण, शिखरस्वामी, अमृतकार्दव
प्रान्तीय प्रशासन
| स्तर | इकाई | अधिकारी | विवरण |
| प्रान्त | भुक्ति / अवनि / देश | उपरिक (भोगिक / भोगपति) | सीधे सम्राट द्वारा नियुक्त |
| जिला | विषय | विषयपति | उपरिक द्वारा नियुक्त; विषय परिषद से सहायता |
| नगर | पुर | पुरपाल (द्रांगिक) | जूनागढ़ लेख में चक्रपालित |
| ग्राम | ग्राम / पेठ | ग्रामिक / भोजक | ग्रामसभा (पंचमण्डली) – महत्तर, अष्टकुलाधिकारी, कुटुम्बिन |
- दामोदरपुर ताम्रपत्र: ग्राम परिषद के ये अधिकारी वर्णित।
- अक्षपटल – लेख सुरक्षित रखने वाला कार्यालय; कर्णिक – लिपिक।
न्याय प्रशासन
- सम्राट सर्वोच्च न्यायाधीश, उसका आसन धर्मासन।
- अनुपस्थिति में न्यायाध्यक्ष = प्राङ्गिवाक।
- न्यायाधीश = दण्डनायक, महादण्डनायक, सर्वदण्डनायक।
- दीवानी व फौजदारी कानूनों का पृथक्करण – बृहस्पति स्मृति।
- चार प्रकार के न्यायालय –
- शासित (राजा का),
- मुद्रित (प्राङ्गिवाक का),
- प्रतिष्ठित (स्थायी),
- अप्रतिष्ठित (अस्थायी)
- पूग (नगर समिति) व कुल (परिवार समिति) विवाद निपटाते थे।
- ग्राम पंचायतें न्याय करती थीं।
- फाह्यान व स्कन्दगुप्त के अनुसार – दण्डविधान कोमल था, मृत्युदण्ड नहीं।
- मृच्छकटिकम् – कायस्थ न्यायालय लेखक के रूप में।
पुलिस विभाग
- अधिकारी – उपरिक, दशापराधिक, चौरोद्धरणिक, दण्डपाशिक।
सेना संगठन
- सेना के चार अंग: पदाति, अश्व, रथ, हाथी + नौसेना।
- प्रमुख अधिकारी:
- महापीलुपति – गजसेना प्रमुख
- भटाश्वपति – अश्वसेना प्रमुख
- रणभाण्डागारिक – युद्धसामग्री प्रमुख
राजस्व व्यवस्था
- राजा भूमि का परम स्वामी।
- कात्यायन: भूमि पर राजा व कृषक दोनों का अधिकार।
- भूमिकर (भाग) – उपज का 1/6 भाग।
- भोग: प्रतिदिन फलों-फूलों की भेंट।
- उद्रंग: स्थायी किसानों पर कर; उपरिकर: अस्थायी किसानों पर।
- भूतोवातप्रत्याय: वस्तुओं पर कर।
- विष्टि: बेगार श्रम (स्मृति व वाकाटक लेखों में)।
- अन्य स्रोत – खान, नमक, गड़ा हुआ धन, भूमि रत्न।
- अग्रहार / ब्रह्मदेय भूमि – करमुक्त दान भूमि।
- भूमिकर संग्रह अधिकारी: धुवाधिकरण।
- भूमि अभिलेख अधिकारी: महाअक्षपटलिक, करणिक।
- भूमि विवाद अधिकारी: न्यायाधिकरण।
गुप्तकालीन आर्थिक जीवन
- गुप्त काल (चौथी–छठी शताब्दी ई.) भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग (Golden Age) कहलाता है — कृषि, शिल्प, व्यापार, कला और विज्ञान सभी क्षेत्रों में असाधारण प्रगति हुई।
1. कृषि व्यवस्था (Agricultural System)
मुख्य स्रोत: स्मृतियाँ, बृहत्संहिता, अमरकोश, फाह्यान, इत्सिंग आदि।
- कृषि आर्थिक जीवन का प्रमुख आधार।
- हल में लोहे का फाल (iron ploughshare) प्रयुक्त होता था।
- तीन फसलें — श्रावण, बसंत, चैत्र/बैसाख ऋतुओं में।
- मुख्य फसलें: धान, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, गन्ना, तिल, सरसों, अदरक, अलसी, दालें, कालीमिर्च आदि।
- अमरकोश: 12 प्रकार की भूमि — क्षेत्र भूमि, वास्तु भूमि, चारागाह भूमि, सिल भूमि, अप्रहत भूमि आदि।
- ह्वेनसांग: पश्चिमोत्तर भारत में गेहूँ–ईख, मगध में धान की प्रचुरता।
- कृषि उन्नयन उपाय:
- बृहत्संहिता में बीजों की गुणवत्ता बढ़ाने और भूमि को उर्वर बनाने के उपाय बताए गए।
- अमरकोश: नदियों से नहरें और तालाब बनाए जाने का उल्लेख।
2. सिंचाई व्यवस्था (Irrigation System)
- सिंचाई रहट/अरघट्ट (घटीयंत्र) से की जाती थी।
- अग्नि पुराण: सिंचाई को राजा के 8 प्रमुख कर्तव्यों में से एक बताया गया।
- स्कन्दगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख:
- सौराष्ट्र के गवर्नर पर्णदत्त के पुत्र चक्रपालित ने सुदर्शन झील का पुनरुद्धार कराया।
- इससे दुर्भिक्ष की स्थिति दूर हुई — सर्वश्रेष्ठ उदाहरण।
- अन्य उदाहरण:
- 458 ई. बोराला लेख — वाकाटक नरेश देवसेन के अधिकारी स्वामिलदेव ने अकोला में झील बनवाई।
- पृथ्वीसेन (वाकाटक): पृथ्वीसमुद्र तालाब।
- कदम्ब शासक काकुस्थवर्मन: झील व जलाशयों का निर्माण कराया।
- सिंचाई व्यवस्था के कारण कृषि उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई।
3. भूमि के प्रकार (Types of Land)
भूमि को आर्थिक उपयोगिता के आधार पर वर्गीकृत किया गया
- क्षेत्र – खेती योग्य भूमि
- वास्तु – निवास हेतु भूमि
- खिल – जोती न गई भूमि
- अप्रहत – जंगली भूमि
- सद्वल – घास का मैदान
- पंकिल – कीचड़युक्त भूमि
- कच्छ – नदी या जलाशय के पास की भूमि
- जलप्रायमनुपम – पानी से भरी भूमि
- शर्करा – कंकरीली भूमि
- मरू – रेतीली भूमि
- नदीमातृक – नदी से सिंचित भूमि
- देवमातृक – वर्षा से सिंचित भूमि
- अदेवमातृक – कृत्रिम सिंचाई वाली भूमि
अमरकोश: कुल 12 प्रकार की भूमि का उल्लेख।
4. भू-धारण पद्धति (Land Tenure System)
भूमि स्वामित्व संबंधी व्यवस्था “नीवी धर्म प्रणाली” कहलाती थी।
मुख्य शब्दावली व अर्थ:
- नीवी धर्म: भूमि का दान; भूमि स्थायी संपत्ति मानी जाती थी।
- अक्षय नीवी धर्म: स्थायी पूंजी न्यास; ब्याज से धार्मिक या शैक्षणिक कार्य।
- नीवी धर्म क्षय: भूमि का स्वामित्व किसी अन्य को देने पर समाप्त।
- अप्रदा धर्म: भूमि उपभोग की जा सकती थी, पर बेची नहीं जा सकती थी।
- अप्रदा नीवी धर्म: सीमित उपभोग अधिकार; राज्य पुनः भूमि वापस ले सकता था।
- भूमिछिद्र न्याय: जो भूमि को जोतकर उपजाऊ बनाए, वही उसका स्वामी; पर खनिजों पर राज्य का अधिकार।
- भूमि दान प्रथा: कुषाण काल से आरंभ, पर गुप्तकाल में अत्यधिक लोकप्रिय हुई।
5. भूमि मापन (Land Measurement)
मापन की इकाइयाँ:
- अंगुल → सबसे छोटा माप
- नल → धातु की छड़ या रस्सी
- आढ़वाप, द्रोणवाप, कुल्यवाप, पाटक → बड़े माप
- धनु, दण्ड → भूमि माप उपकरण
अनुपात:
4 आढ़वाप = 1 द्रोणवाप
8 द्रोणवाप = 1 कुल्यवाप
5 कुल्यवाप = 1 पाटक
भूमि अधिकारी:
- क्षेत्रकर – भूमि मापने वाला अधिकारी
- पुस्तपाल व विषयपति – भूमि बिक्री की अनुमति देने वाले अधिकारी
6. पशुपालन (Animal Husbandry)
- कामन्दकीय नीतिसार: गोपालन वैश्य का व्यवसाय बताया गया।
- अमरकोश: पालतू पशु – गाय, भैंस, ऊँट, घोड़ा, बकरी, भेड़, गधा, कुत्ता, बिल्ली आदि।
- बैल – हल चलाने व बोझ ढोने के लिए प्रमुख।
7. उद्योग एवं शिल्प (Industry & Craftsmanship)
मुख्य उद्योग:
धातु शिल्प (Metal Craft)
- दिल्ली का मेहरौली लौह स्तंभ — जंगरहित धातु-कला का अद्भुत उदाहरण।
- सुलतानगंज बुद्ध प्रतिमा — ताम्रकला का उत्कृष्ट नमूना।
- गुप्त स्वर्ण मुद्राएँ — कलात्मक व शुद्ध (दीनार कहलातीं)।
- सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएँ — कुमारगुप्त प्रथम के काल में।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय: चाँदी व ताँबे के सिक्के जारी।
वस्त्र उद्योग (Textile Industry)
- अमरकोश में रेशम, मलमल, लिलन, सूती व ऊनी वस्त्रों का उल्लेख।
- कालिदास: महीन कपड़ों का उल्लेख।
- विदेशी बाजारों में भारतीय वस्त्रों की भारी मांग।
- रेशम बुनाई की प्रक्रिया का पूरा विवरण मिलता है।
आभूषण कला (Jewellery Art)
- बृहत्संहिता में 22 प्रकार के रत्नों का वर्णन।
- स्वर्ण, रजत व रत्नों से आभूषण निर्माण।
काष्ठ व हाथीदाँत कला (Wood & Ivory Art)
- भीत (इलाहाबाद के पास) से हाथीदाँत की मुहरें मिलीं।
8. श्रेणी-संगठन (Guilds & Trade Associations)
- गुप्तकाल में श्रेणियाँ अत्यंत विकसित थीं।
- शिल्पी व व्यापारी श्रेणी/निगम/गण के रूप में संगठित।
- श्रेणियाँ बैंक की तरह कार्य करती थीं — ऋण व ब्याज देकर धार्मिक कार्यों में सहयोग।
- श्रेणियाँ आर्थिक रूप से सम्पन्न व सामाजिक रूप से उपयोगी कार्य करतीं — जैसे धर्मशालाएँ, जलाशय, मंदिर।
- मन्दसौर ताम्रपत्र — दशपुर के तन्तुवाय (जुलाहे) श्रेणी ने सूर्य मंदिर बनाया।
- श्रेणियाँ अपने मामलों में स्वतंत्र, इनके प्रमुख को ‘ज्येष्ठक’ कहा गया (वंशानुगत पद)।
- नालंदा व वैशाली से श्रेणियों की मुहरें मिलीं।
- गढ़वा अभिलेख: चन्द्रगुप्त II ने धार्मिक कार्य हेतु पूंजी श्रेणियों में जमा कराई।
- नारद व बृहस्पति स्मृति: श्रेणी प्रशासन का विवरण।
संरचना
| संस्था | विवरण |
| श्रेणी | विभिन्न जातियों के व्यापारियों का समूह |
| निगम | एक नगर के व्यापारियों का संगठन |
| श्रेष्ठिकुलिकनिगम | श्रेष्ठि, शिल्पी व श्रेणी का संयुक्त संगठन |
| जेठक / ज्येष्ठक | श्रेणी का मुखिया |
| श्रेष्ठि | निगम का प्रधान, बैंकर/साहूकार |
| कुलिक | शिल्पी वर्ग |
| सार्थवाह | व्यापारिक कारवाँ का नेता |
तक्षशिला का शासन व्यापारिक निगम द्वारा चलाया जाता था।
9. व्यापार एवं वाणिज्य (Trade & Commerce)
आन्तरिक व्यापार:
- सड़कें व नदियाँ मुख्य परिवहन माध्यम।
- राजनीतिक स्थिरता + स्वर्ण मुद्राएँ = व्यापार उत्कर्ष।
- मुख्य वस्तुएँ: दैनिक उपयोग व विलासिता दोनों।
- सार्थ: भ्रमणशील व्यापारी।
- नारद-स्मृति: व्यापारिक आचार संहिता।
- फाह्यान: देश में शान्ति व सुरक्षा; अपराध नगण्य।
- मुख्य नगर: उज्जैन (मुख्य केन्द्र), भृगुकच्छ, प्रतिष्ठान, प्रयाग, विदिशा, मथुरा, ताम्रलिप्ति।
विदेशी व्यापार:
- संपर्क: चीन, श्रीलंका, फारस, अरब, इथोपिया, बैजंटाइन साम्राज्य।
- निर्यात: रेशम, मसाले, वस्त्र, मोती, नील, हाथीदाँत।
- आयात: रेशम (चीनांशुक), घोड़े (अरब, ईरान, बेक्ट्रिया)।
- मुख्य बंदरगाह:
- पश्चिमी तट – भृगुकच्छ (भड़ौच), कैम्बे, सोपारा, कल्याण।
- पूर्वी तट – ताम्रलिप्ति, घंटशाला, कदूरा।
- ताम्रलिप्ति: सबसे बड़ा सामुद्रिक व्यापार केन्द्र; चीन, श्रीलंका व इंडोनेशिया से संपर्क।
- गुप्त साम्राज्य एशिया की प्रमुख समुद्री शक्ति था।
गुप्त काल के सिक्के
- गुप्त सिक्के सर्वाधिक प्रभाव कुषाण सिक्कों से।
- स्रोत: भारत के विभिन्न भागों से 16 सिक्का-निधियाँ प्राप्त।
- सबसे प्रसिद्ध: बयाना (भरतपुर, राजस्थान) → 1821 सिक्के।
- चन्द्रगुप्त II – 983, कुमारगुप्त I – 628, स्कन्दगुप्त – 1 सिक्का।
- सोने की मुद्राएँ: सर्वाधिक (राजाओं के चित्र अंकित), दीनार कहलाती।
- दीनार = 16 रूपक (वेग्राम ताम्रलेख)।
- चाँदी का सिक्का: रूपक; ताँबा: माषक।
- रामगुप्त: प्रथम तांबे के सिक्के जारी।
- चन्द्रगुप्त II: पश्चिमी शकों की विजय के बाद प्रथम चाँदी के सिक्के।
- कुमारगुप्त I: गंगा घाटी में चाँदी के सिक्के, दरब मिश्रित सिक्के (गुजरात–काठियावाड़)।
- वजन: चाँदी के सिक्के 24–36 ग्रेन।
- सामान्य जन: वस्तु-विनिमय या कौड़ियों से लेन-देन (फाह्यान)।
प्रमुख सिक्का प्रकार:
- पर्यंक प्रकार
- चक्रविक्रम प्रकार (विष्णु अंकन, चन्द्रगुप्त II)
- कृतान्त परशु प्रकार
- धनुर्धर, खड्गहस्त, सिंहनिहंता, गजारूढ़, व्याघ्रनिहंता
- दण्ड व ध्वज प्रकार
- छत्र प्रकार (केवल चन्द्रगुप्त II, कुमारगुप्त I, घटोत्कचगुप्त)
- वीणावादन प्रकार, अश्वमेध प्रकार
गुप्त शासकों ने प्राचीन भारत में सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएँ चलायीं।
गुप्त काल सामाजिक जीवन
वर्ण व्यवस्था
- समाज चार वर्णों में विभाजित, जन्माधारित।
- कौटिल्य व वराहमिहिर – वर्णों के लिए अलग बस्तियाँ।
- घर के आकार – ब्राह्मण (5 कमरे), क्षत्रिय (4), वैश्य (3), शूद्र (2)।
- भूमिदान से आदिवासी जातियाँ ब्राह्मण समाज में मिलीं → जातियाँ बढ़ीं।
- कारीगर श्रेणियाँ भी जातियों में बदलीं → जाति गतिशीलता बढ़ी।
न्याय में वर्ण आधारित नियम
- परीक्षा: ब्राह्मण (तुला), क्षत्रिय (अग्नि), वैश्य (जल), शूद्र (विष)।
- कात्यायन – मुकदमें में अभियुक्त के विरुद्ध गवाही समान जाति का व्यक्ति ही दे सकता था।
- नारद – सभी वर्णों से साक्षी लिये जा सकते थे।
- नारद के अनुसार चोरी करने पर ब्राह्मण का अपराध सबसे अधिक व शूद्र का अपराध सबसे कम था।
ब्राह्मण वर्ग
- अन्य वर्णों के कर्म अपनाए। चारूदत्त (मृच्छकटिकम्) व्यापारी था।
- क्षत्रिय कर्म करने वाले ब्राह्मण ब्रह्मक्षत्र कहलाए।
- मयूरशर्मन (कदम्ब वंश) – ब्राह्मण होकर क्षत्रिय बना, 18 अश्वमेध यज्ञ।
- मनु – दस वर्षीय ब्राह्मण सौ वर्षीय क्षत्रिय से श्रेष्ठ।
- भूमिदान से ब्राह्मण भू-स्वामी बने → कृषि विस्तार।
क्षत्रिय वर्ग
- हूण बाद में राजपूत क्षत्रिय कुलों में शामिल।
- ह्वेनसांग – क्षत्रिय सरल, पवित्र, मितव्ययी।
- विदेशी जातियों के आगमन व अन्तर्जातीय विवाह से वर्णसंकर जातियाँ बनीं।
वैश्य वर्ग
- व्यवसाय व कृषि; उपनाम – वणिक, श्रेष्ठि, सार्थवाह।
- अमरकोश – कृषक वैश्य वर्ग में।
- गुप्तोत्तर काल में वैश्य-शूद्र स्थिति समान।
- महाभारत – मांस, मद्य, चमड़ा, लोहा बेचना निषिद्ध।
शूद्र वर्ग
- सैनिक कार्यों में भी।
- याज्ञवल्क्य – शूद्र व्यापारी, कृषक, कारीगर बन सकते।
- ह्वेनसांग – शूद्र = कृषक।
- स्थिति में सुधार; सौराष्ट्र, मालवा के शूद्र राजा।
- सिंध व मतिपुर के राजा शूद्र (ह्वेनसांग)।
- शूद्रों को महाभारत, रामायण, पुराण सुनने का अधिकार मिला।
- कृष्ण भक्ति कर सकते थे।
- मत्स्यपुराण – शूद्र भी भक्ति से मोक्ष पा सकता है।
अस्पृश्यता
- चाण्डाल समाज से पृथक, गांव के बाहर रहते।
- फाह्यान – शहर में प्रवेश पर ड्रम बजाते थे।
- संख्या बढ़ी; मांसाहारी, मछली पकड़ने का कार्य।
- अमरकोश में वर्णसंकरों को शूद्र जाति में रखा गया।
कायस्थ वर्ग
- याज्ञवल्क्य स्मृति – पहला उल्लेख;
- गुप्त अभिलेखों में प्रथम कायस्थ / ज्येष्ठ कायस्थ।
- लेखन, लेखा-जोखा, कर कार्य।
- मुद्राराक्षस में उल्लेख।
- महत्तार – ग्राम वृद्ध या मुखिया।
दास प्रथा
- मनु – 7 प्रकार, नारद – 15 प्रकार।
- स्थिति दयनीय पर दास मुक्ति का विधान (नारद)।
- कात्यायन – ब्राह्मण दास नहीं बन सकता।
- भूमि के विभाजन से दास प्रथा कमजोर हुई।
स्त्रियों की स्थिति
- साहित्य में आदर्श, पर व्यवहार में स्थिति गिरी।
- कालिदास – स्त्रीरत्न कहा, पर पर्दा प्रथा का उल्लेख।
- याज्ञवल्क्य – स्त्री का विवाह ही उपनयन है; शिक्षा का अधिकार नहीं।
- नारद – व्यभिचारिणी स्त्री का सिर मुंडाना चाहिए।
- स्त्रीधन की अवधारणा – कात्यायन व याज्ञवल्क्य समर्थन करते हैं।
- सती प्रथा – प्रथम साक्ष्य एरन अभिलेख (510 ई.) में।
- स्त्रीधन पर प्रथम अधिकार – पुत्री का।
- विधवा पुनर्विवाह – कुछ परिस्थितियों में मान्य (पति मृत, संन्यासी, पतित आदि)।
- देवदासी प्रथा – कालिदास के मेघदूत व महाकाल मंदिर में उल्लेख।
- कामसूत्र – गणिकाओं का प्रशिक्षण।
- वैश्य-शूद्र महिलाओं को अधिक स्वतंत्रता।
गुप्तकाल की धार्मिक दशा
सामान्य स्थिति
- गुप्तकाल ब्राह्मण धर्म (हिन्दू धर्म) के पुनरुत्थान का काल था।
- मूर्ति पूजा व मंदिर निर्माण की परंपरा का आरंभ गुप्तकाल से हुआ।
- धर्म की सहिष्णु नीति के कारण सभी धर्म (हिन्दू, बौद्ध, जैन) फलते-फूलते रहे।
सूर्य उपासना
- कुमारगुप्त के मन्दसौर शिलालेख में सूर्य पूजा का उल्लेख।
- स्कन्दगुप्त का इन्दौर ताम्रलेख भी सूर्य उपासना से आरंभ होता है।
- ‘देव विष्णु’ नामक ब्राह्मण ने सूर्य मंदिर में दीप जलाने हेतु निधि दान की।
हिन्दू धर्म के दो प्रमुख संप्रदाय
1. वैष्णव संप्रदाय
- गुप्त शासक वैष्णव धर्म के अनुयायी थे — सिक्कों पर “परमभागवत” उपाधि।
- विष्णु-लक्ष्मी का प्रथम उल्लेख जूनागढ़ अभिलेख में।
- विष्णु के वाहन गरुड़ का अंकन समुद्रगुप्त व चन्द्रगुप्त द्वितीय के सिक्कों पर।
- सिक्कों पर लक्ष्मी की प्रतिमा विष्णुपत्नी के रूप में।
- स्कन्दगुप्त का जूनागढ़ लेख व बुद्धगुप्त का एरण स्तंभ लेख विष्णु स्तुति से प्रारंभ।
- अवतारवाद की लोकप्रियता — मत्स्य से लेकर बुद्ध व कल्कि तक 10 अवतार।
- बुद्ध को विष्णु का अवतार बताने की परंपरा अग्नि, मत्स्य, भागवत पुराणों में।
- हरिहर मूर्ति (शिव-विष्णु संयुक्त) की परंपरा प्रारंभ।
- बादामी गुफा (6वीं सदी) में हरिहर की सबसे प्राचीन मूर्ति।
- देवगढ़ (झाँसी) का दशावतार मंदिर — वैष्णव कला का उत्कृष्ठ उदाहरण (पंचायतन शैली)।
- नारायण, संकर्षण, लक्ष्मी जैसे अवैदिक देवता वैष्णव धर्म में समाहित।
2. शैव संप्रदाय
- गुप्त शासकों की सहिष्णुता से शैव धर्म भी फला-फूला।
- शिव-पार्वती संयुक्त मूर्तियाँ और अर्धनारीश्वर प्रतिमा (भीटा, इलाहाबाद) का निर्माण।
- त्रिमूर्ति पूजा (ब्रह्मा-विष्णु-महेश) की शुरुआत।
- शैव धर्म के चार संप्रदाय –
- शैव
- पाशुपत
- कापालिक
- कालामुख
- अर्धनारीश्वर रूप में शिव-शक्ति का एकीकरण।
- एकमुखी व चतुर्मुखी लिंग की परंपरा का प्रारंभ।
- मथुरा स्तंभलेख (380 ई.) – पाशुपताचार्य आर्योदित, उपमितेश्वर व कपिलेश्वर लिंग स्थापना।
- लकुलीश – पाशुपत मत के संस्थापक (कुशिक के शिष्य)।
- वीरसेन (चन्द्रगुप्त द्वितीय का मंत्री) ने उदयगिरि में शिव मंदिर बनवाया।
- कुमारगुप्त के मंत्री पृथ्वीसेन ने शिव मंदिर को दान दिया।
- स्कन्दगुप्त के सिक्के – बैल की आकृति (शैव आस्था)।
- कालिदास की रचनाओं में – गोकर्ण, काशी विश्वनाथ, उज्जैन के महाकाल का उल्लेख।
- कुमारगुप्त के सिक्के – मयूर पर आरूढ़ कार्तिकेय।
बौद्ध धर्म
- गुप्तकाल में महायान संप्रदाय प्रमुख रहा।
- माध्यमिक व योगाचार शाखाओं का विकास।
- प्रमुख आचार्य – आर्यदेव, असंग, वसुबन्धु, मैत्रेयनाथ, दिङ्नाग (तर्कपुंगव)।
- फाह्यान के अनुसार कश्मीर, अफगानिस्तान, पंजाब बौद्ध केंद्र।
- कपिलवस्तु, श्रावस्ती, कुशीनगर उजड़े मिले।
- फाह्यान – मगध के नगर सम्पन्न, व्यापारी बौद्ध धर्म के समर्थक।
- इत्सिंग के अनुसार श्रीगुप्त ने मृगशिखावन में चीनी तीर्थयात्रियों हेतु मंदिर बनवाया।
(नालन्दा का दूसरा नाम मृगशिखावन)। - समुद्रगुप्त ने श्रीलंका के राजा मेघवर्ण को बोधगया में विहार बनाने की अनुमति दी।
- चन्द्रगुप्त द्वितीय कालीन साँची लेख (काकनादबोट) – बौद्ध आम्म्रकार्दव का दान उल्लेख।
- कुमारगुप्त प्रथम के काल में नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना – 100 गाँवों का राजस्व।
- बौद्ध धर्म धीरे-धीरे पतन की ओर, परन्तु राज्य सहिष्णु।
जैन धर्म
- फाह्यान ने उल्लेख नहीं किया परंतु व्यापारी वर्ग में लोकप्रिय।
- मथुरा व वल्लभी – श्वेताम्बर केंद्र; 513 ई. वल्लभी सभा, अध्यक्ष देवर्धिगणि क्षमाश्रमण।
- पुण्ड्रवर्धन (बंगाल) – दिगम्बर केंद्र।
- मद्र (कहौम लेख, 460–461 ई.) ने पाँच जैन तीर्थंकरों (ऋषभदेव, शांतिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ, महावीर) की मूर्तियाँ स्थापित कराईं।
- मथुरा लेख – कुमारगुप्त काल में हरिस्वामिनी नामक महिला द्वारा दान।
- जैन मुनि सर्वनन्दी (458 ई.) – लोकविभंग ग्रंथ।
- आचार्य सिद्धसेन – न्यायवार्ता।
- देवनन्दि (जैनेन्द्र व्याकरण के रचयिता) – सर्वार्थसिद्धि ग्रंथ।
- मगध, कलिंग, मथुरा, उदयगिरि, तमिलनाडु तक प्रसार, पर मगध अब केंद्र नहीं रहा।
गुप्त काल में विज्ञान
भारतीय गणित की प्रमुख विशेषताएँ
- गुप्तकाल में गणित, खगोलशास्त्र, ज्योतिष और भौतिक विज्ञान का उल्लेखनीय विकास हुआ।
- इस काल में शून्य का सिद्धान्त तथा दशमलव प्रणाली (Decimal System) का विकास हुआ।
- शून्य का आविष्कार भारतीयों ने ई.पू. 2वीं सदी में किया।
- अरबों ने शून्य एवं दशमलव प्रणाली भारत से सीखी और इसे यूरोप में फैलाया।
- अंग्रेज़ी में इसे Arabic numerals कहा जाता है, पर अरब लोग इसे “हिन्दसा” (Indian numerals) कहते थे।
- चीन ने दशमलव पद्धति भारत से बौद्ध भिक्षुओं द्वारा, और यूरोप ने अरबों से सीखी।
आर्यभट्ट (476 ई.)
- प्रमुख कृति: आर्यभट्टीयम् (चार भाग — दशगीतिकापाद, गणितपाद, कालक्रियापाद, गोलपाद)
- पृथ्वी को गोलाकार बताया और कहा कि यह अपनी धुरी पर घूमती है।
- परन्तु उनका दृष्टिकोण पृथ्वी-केंद्रित (Geocentric) था — सभी ग्रह पृथ्वी के चारों ओर घूमते हैं।
- वर्ष की अवधि: 365.2586805 दिन बताई।
- वर्गमूल, घनमूल निकालने की विधि दी।
- वर्णांक पद्धति का प्रतिपादन किया।
- बीजगणित के जनक कहे जाते हैं।
- पाई (π) का सटीक मान निकाला।
- सूर्यग्रहण व चन्द्रग्रहण की वैज्ञानिक व्याख्या की।
- टीकाकार: भास्कर प्रथम (अश्मक तंत्र / आर्यभट्टीय भाष्य)।
वराहमिहिर (6वीं सदी)
- निवास: अवन्ति (उज्जैन)।
- प्रमुख ग्रंथ:
- पंचसिद्धांतिका
- वृहज्जातक
- लघुजातक
- वृहत्संहिता
- योगयात्रा, योगमाया, विवाहपटल
- पंचसिद्धांतिका में पाँच सिद्धांत — पितामह, वशिष्ठ, रोमक, पौलिश, सूर्य।
- रोमक व पौलिश पर यूनानी प्रभाव।
- वशिष्ठ सिद्धांत के अनुसार वर्ष = 365.25 दिन।
- चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर, और पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है — यह सिद्धान्त सबसे पहले वराहमिहिर ने कहा।
- शून्य को प्रतीक रूप में (एक आँख के रूप में) पहली बार दर्शाया।
- स्थानमान दशमलव प्रणाली का प्रयोग।
- वृहत्संहिता – भारत के भूगोल, समाज, धर्म, स्थापत्य और कृषि पर विश्वकोशीय ग्रंथ।
- टीकाकार: भटोत्पल (10वीं सदी, कश्मीर)।
भास्कर प्रथम (600–680 ई.)
- रचनाएँ: महाभास्कर्य, लघुभास्कर्य, अश्मक तंत्र (आर्यभट्टीय भाष्य)।
- कहा – “शून्य से विभाजन पर संख्या शून्य ही रहती है।”
ब्रह्मगुप्त (598 ई., भीनमाल – जालौर, राजस्थान)
- रचनाएँ: ब्रह्मस्फुट सिद्धांत (628 ई.), खण्डखाद्यक (665 ई.), वेदांग ज्योतिष, ध्यानग्रह।
- ब्रह्मस्फुट सिद्धांत में 9 खगोलीय उपकरणों (Astronomical Instruments) का वर्णन तथा गणना विधियाँ दीं।
- गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत का प्रतिपादन – “पृथ्वी सभी वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है।”
- शून्य, ऋणात्मक संख्याएँ और गणितीय संक्रियाओं की स्पष्ट व्याख्या।
- अरबों में ज्योतिष के प्रचारक।
- इनके ग्रंथों का अरबी अनुवाद —
- अल-फजारी और अल-बेरूनी द्वारा →
- “सिन्द-हिन्द / अल-हिन्द वल-हिन्द”, “अल-अरकन्द”।
- अल-फजारी और अल-बेरूनी द्वारा →
अन्य गणितज्ञ
| गणितज्ञ | प्रमुख कृति | योगदान |
| भास्कर द्वितीय (भास्कराचार्) | सिद्धांत शिरोमणि (लीलावती, बीजगणित, ग्रहगणित, गोला) | कलन गणित (Calculus) के जनक |
| महावीराचार्य | गणितसार संग्रह | बीजगणित का विस्तृत विवेचन |
| श्रीधराचार्य | त्रिशति | वर्ग समीकरण सूत्र (Quadratic Formula) |
2. चिकित्सा विज्ञान (Medicine)
चरक संहिता
- गुप्तकाल तक चरक संहिता एक प्रसिद्ध आयुर्वेद ग्रंथ था (रचना पूर्वकालीन)।
- ज्ञान की परंपरा: एत्रेय → अग्निवेश → चरक → दृढ़बल (पुनःसंपादन, 4–5वीं सदी ई.)
- इसे अग्निवेश प्रणाली भी कहा जाता है।
- इसमें आयुर्वेद के मूल सिद्धांत, निदान, औषधि व चिकित्सा पद्धतियाँ वर्णित हैं।
सुश्रुत संहिता
- गुप्तकालीन शल्य चिकित्सक – सुश्रुत।
- उपदेष्टा: धन्वन्तरि।
- 6 खंड, 184 अध्याय, 121 उपकरणों का उल्लेख।
- प्रमुख विषय:
- शल्य चिकित्सा (Surgery)
- घाव उपचार, टांके लगाना, तीर निकालना
- मोतियाबिंद ऑपरेशन, पथरी निकालना, प्लास्टिक सर्जरी
- भ्रूण विज्ञान, शरीर विज्ञान, नेत्र व दंत रोग
- इसे “शल्य चिकित्सा का जनक ग्रंथ” कहा जाता है।
अन्य आयुर्वेदाचार्य
| विद्वान | प्रमुख ग्रंथ | विशेषता |
| वाग्भट्ट (600 ई.) | अष्टांग हृदय, अष्टांग संग्रह | आयुर्वेद का संकलन |
| धन्वन्तरि | निघण्टु गायत्री | विक्रमादित्य के दरबार के चिकित्सक |
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चरक, सुश्रुत और वाग्भट्ट को “आयुर्वेदत्रयी” तथा उनकी रचनाओं को “वृहत्त्रयी” कहा जाता है
3. धातु विज्ञान (Metallurgy)
- महरौली का लौह स्तंभ (चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य कालीन) –
→ गुप्तकालीन धातु कला का सर्वोत्तम उदाहरण। - इस्पात निर्माण की कला भारत में सर्वप्रथम विकसित हुई।
- भारतीय इस्पात का निर्यात ई.पू. 4वीं सदी में ही शुरू हो गया।
- यह विश्व में प्रसिद्ध हुआ “उट्ज (Wootz Steel)” के नाम से।
- गुप्तकाल में धातु मिश्रण (Alloy Making) और जंगरोधक तकनीक विकसित हुई।
4. रसायन विज्ञान (Chemistry)
- वैशेषिक दर्शन की शाखा में अणु सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ — गुप्तकाल में इसे वैज्ञानिक रूप मिला।
- नागार्जुन – महान रसायनाचार्य, जिन्होंने रस चिकित्सा प्रणाली विकसित की।
- → धातुओं की भस्म (सोना, चाँदी, ताँबा आदि) से रोगों की चिकित्सा की।
- → रसायन का उद्देश्य – दीर्घायु, स्वास्थ्य और अमृत प्राप्ति।
मौर्योत्तर काल
- मौर्य सम्राट वृहद्रथ की हत्या के बाद पुष्यमित्र शुंग ने 185 ई.पू. में मौर्य साम्राज्य का अंत किया।
- मौर्योत्तर काल (200 ई.पू. से गुप्त साम्राज्य के उद्भव तक) में कोई बड़ा साम्राज्य स्थापित नहीं हुआ, लेकिन यह काल ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है।
- इस समय मध्य एशिया से सांस्कृतिक संबंध बने और विदेशी तत्व भारतीय समाज में घुलमिल गए। यूनानियों ने भारतीय धर्म और संस्कृति को अपनाया और भारतीय समाज में समाहित हो गए।
- इस काल में भारत विभिन्न क्षेत्रीय और स्थानीय राजवंशों में विभाजित था।
जानकारी के स्त्रोत-
- गार्गी संहिता, पंतजलि के महाभाष्य, दिव्यावदान, कालिदास के मालविकाग्निमित्र तथा बाणभट्ट के हर्षचरित व इतिहासकार कल्हण की ऐतिहासिक पुस्तक राजतंरगिणी।
- अश्वघोष, जिसने संस्कृत में बुद्धचरित, सौदरानन्द महाकाव्य व सूर्यालंकार और सारीपुत्र प्रकरण लिखे।
- शून्यवाद, सापेक्षवाद व माध्यमिक सूत्र के प्रवर्तक नागार्जुन भी इसी कालखण्ड के प्रसिद्ध दार्शनिक हुए हैं जो सार्थक, जानकारी प्रदान करते है ।
- चरक संहिता के रचयिता महर्षि चरक के अलावा चीनी इतिहास ग्रन्थ व चीनी यात्री हवेग्सांग की यात्रा विवरण, तिब्बती इतिहासकार तारानाथ के साथ साथ बौद्ध विद्वान वसुमित्र व बौद्ध साहित्य त्रिपिटक, “मिलिन्दपन्ह” भी हमें विदेशी आक्रमणकारियों की जानकारियाँ उपलब्ध करवाता है।
- कौशाम्बी, सारनाथ व मथुरा की कनिष्क कालीन मुद्राएँ भी सही संकेत देती है। यह सिक्के बहुत महत्वपूर्ण स्त्रोत है क्योंकि उन पर शासकों के नाम अंकित है।
- सिकन्दर के साथ आयें नियार्कस, आनेसिक्रिटस और एरिस्टोब्युलस जैसे लेखको के विवरण।
यूनानी आक्रमण का उद्देश्य एवं प्रभाव
- सिकन्दर की जल्दी ही मृत्यु हो जाने के कारण यूनानी भारत में स्थायी बस्ती नहीं बसा सके।
- सिकन्दर के आक्रमण की तुलना में भारतीय यूनानियों की उत्तर पश्चिम सीमान्त प्रदेशों पर अधिकार अधिक समय तक रहा था।
- बैक्ट्रियां के यूनानियों ने इस प्रदेशों पर लगभग दो शताब्दियों तक शासन किया और इसलिए सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए यह समुचित समय था, यद्यपि भारतीय यूनानी शासन की देन उत्तर पश्चिमी क्षेत्र तक ही मानी जाती रही है तथापि उसके भारतीय प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता है।
- वास्तव में यूनानी विशेषताएँ भारत में ही आत्मसात् होकर मुख्य धारा में विलीन हो गई।
मौर्योत्तर काल मुद्रा (सिक्के)-
- यूनानी प्रभाव से पूर्व भारतीय चांदी के चिन्हित सिक्के तकनीकी रूप से कम श्रेष्ठ। सिक्कों पर किसी का नाम या तिथि नहीं लिखी होती।
- भारतीय यूनानी पहले शासक थे जिन्होंने सोने के ऐसे सिक्कों की ढ़लाई की जिन पर राजा का नाम, उपाधि और तिथि अंकित होती थी।
- निर्माण कला का श्रेष्ठता के कारण वह बेहतर होते थे।
- चूँकि यूनानी ग्रहणशील थे – कभी-कभी भारतीय मौद्रिक तकनीकी को अपनाकर भी प्रयोग करते थे।
कला और मूर्तिकला के क्षेत्र
- उन्होंने उत्तर-पश्चिम भारत में हेलेनिस्टिक कला से परिचय कराया, जिसने बाद में गंधार कला शैली का रूप लिया।
- भारतीय और यूनानी मिश्रण से उत्तर पश्चिम में कला की प्रसिद्ध गांधार शैली का विकास हुआ।
- भारतीय यूनानी शासन में खगोल शास्त्र, साहित्य, भवन निर्माण और धर्म के क्षेत्र में भी अपनी छाप छोड़ी।
- साथ ही नए जल और थल मार्गों के खुलने से भारत और यूनान के मध्य व्यापार और वाणिज्य का विस्तार हुआ।
व्यापार-वाणिज्य-
- भारत रत्न, हाथी दाँत मसाले और अच्छे वस्त्रों जैसी वस्तुओं की यूनान में काफी मांग थी जबकि भारतीय बाजार में भी यूनान से आने वाली विलास सामग्री और श्रृंगार-प्रसाधनों की भरमार थी।
- राजा एटीयोकस चतुर्थ द्वारा लगभग 166 ई.पू. पूरे यूनान में एक प्रदर्शनी का आयोजन -जिसमें भारत के मसाले और हाथी दाँत में वस्तुएँ प्रदर्शित थी।
- समकालीन सिक्कों की एक बड़ी संख्या में कम से कम 30 भारतीय यूनानी शासकों के नाम मालूम हो जाते हैं। उत्तर में काबुल तथा दिल्ली के निकट मथुरा में मेनान्दर के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
नोट – भारतीय यूनानियों का इतिहास मुख्यतः इन्हीं सिक्कों की सहायता से लिखा गया है। इन सिक्कों पर यूनानी भाषा में अनुश्रुतियाँ अंकित है, बाद में खरोष्ठी तथा ब्राह्मी लिपि भी मिलती है। इन प्रमाणों को समझने में कहीं-कहीं कठिनाई भी होती है, क्योंकि कुछ राजाओं के नाम एक से थे। इसलिए एक शासन के समय के सिक्कों को दूसरे से अलग करना आसान नहीं है। सिक्के इस युग के बढ़ते हुए व्यापार संबंधों पर प्रकाश डालते हैं।
