भूकंपीय तरंगें पृथ्वी की परतों से अलग-अलग गति से यात्रा करती हैं, परावर्तित और अपवर्तित होकर इसकी संरचना की जानकारी देती है ।
- S and P तरंगों के घुमावदार पथ घनत्व भिन्नताओं को इंगित करते हैं।
- p-तरंगें (संपीड़न तरंगें) बाहरी और आंतरिक कोर दोनों से यात्रा कर सकती हैं, लेकिन वे काफी धीमी और अपवर्तित होती हैं, जो तरल बाहरी कोर और ठोस आंतरिक कोर का संकेत देती हैं।
- s-तरंगें 2900 किमी की गहराई के बाद गायब हो जाती हैं, जो एक तरल बाहरी कोर का संकेत देती हैं।
यह पृथ्वी की तीन परतों को पहचानने में मदद करता है: भूपर्पटी, 2. प्रवार, 3. क्रोड।
- भूपर्पटी: यह पृथ्वी का सबसे बाहरी ठोस हिस्सा है। महाद्वीपीय क्रस्ट (लगभग 30 किमी) की तुलना में महासागरीय क्रस्ट पतला (लगभग 5 किमी) है। क्रस्ट के प्रमुख घटक तत्व सिलिका (Si) और एल्युमिनियम (Al) हैं और इस प्रकार, इसे अक्सर SIAL कहा जाता है। भूपर्पटी में पदार्थों का औसत घनत्व 3g/cm3 है।
- प्रवार या मेंटल: क्रस्ट से 2900 किमी की गहराई तक फैला हुआ है। मेंटल में एस्थेनोस्फीयर शामिल है, जहाँ ज्वालामुखी विस्फोट के लिए मैग्मा उत्पन्न होता है। मेंटल के प्रमुख घटक तत्व सिलिकॉन और मैग्नीशियम हैं और इसलिए इसे सिमा भी कहा जाता है।
- क्रोड: 2900 किमी से लेकर पृथ्वी के केंद्र तक 6371 किमी गहराई तक फैली हुई, क्रोड पृथ्वी की सबसे गहरी परत है। यह मुख्य रूप से लोहे (Fe) और निकल (Ni) से बनी है और इसलिए इसे निफ़े (NIFE) भी कहा जाता है। इसका घनत्व लगभग 11 ग्राम / सेमी³ है और इसे दो भागों में विभाजित किया गया है: बाहरी क्रोड, जो 2900 और 5150 किमी गहराई के बीच एक तरल अवस्था में है, और आंतरिक क्रोड- सघन और 5150 से 6371 किमी गहराई तक फैला हुआ है।

पृथ्वी के आंतरिक भाग की परतों (क्रस्ट, मेंटल और कोर) को एक दूसरे से अलग करने वाले संक्रमण क्षेत्रों को असंबद्धता कहा जाता है. इन असंबद्धताओं के नाम ये हैं:
- कोनार्ड असंबद्धता – ऊपरी भू-पर्पटी और निचली भू-पर्पटी के मध्य 5 से 10 किमी. की गइराई पर स्थित संक्रमण क्षेत्र।
- मोहो असंबद्धता – निचली भू-पर्पटी और ऊपरी मैण्टल के बीच लगभग 100 किमी. की गहराई पर स्थित संक्रमण क्षेत्र।
- रेपटी असंबद्धता – लगभग 700 किमी. की गहराई पर स्थित ऊपरी और निचले मैण्टल के मध्य में स्थित संक्रमण क्षेत्र।
- गुटेनबर्ग असंबद्धता – लगभग 2900 किमी. की गहराई पर स्थित निचले मैण्टल और ऊपरी क्रोड के मध्य संक्रमण क्षेत्र।
- लेहमन असंबद्धता – बाह्य और आंतरिक क्रोड के मध्य लगभग 5100 किमी. की गहराई पर स्थित संक्रमण क्षेत्र।

महासागरों के अंदर प्लेटों के अपसरण से मैग्मा निकलता है इस मैग्मा के जमने के फलस्वरूप जलमग्न कटको का निर्माण होता है। ये कटक सामान्यतः महासागर के मध्य में होते हैं अतः इन्हें मध्य महासागरीय कटक भी कहा जाता है।कटको के निर्माण की यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है , जो समुद्री परत के निर्माण (सागर नितल प्रसरण) के लिए उतरदायी होती है।
इसका सबसे अच्छा उदाहरण मध्य अटलांटिक कटक है, जो अटलांटिक महासागर में पश्चिमी द्वीप समूह से लेकर दक्षिण में बॉवेट द्विप तक विस्तृत है।


| आयाम | सियाल | सीमा |
| पूर्ण रूप | Si (सिलिका) + Al (एल्यूमीनियम) | Si (सिलिका) + Ma (मैग्नीशियम) |
| स्थान | सबसे बाहरी परत (महाद्वीपीय क्रस्ट) | सियाल के नीचे (महासागरीय क्रस्ट और ऊपरी मैंटल) |
| गहराई | 50-300 किमी | 1000-2000 किमी |
| औसत घनत्व | 2.9 ग्राम/सेमी³ | 2.9 – 4.7 ग्राम/सेमी³ |
| प्रमुख तत्व | सिलिका और एल्युमिनियम | सिलिका और मैग्नीशियम |
| अम्लता/क्षारीयता | अम्लीय प्रकृति | क्षारीय प्रकृति |
| प्रमुख चट्टानें | ग्रेनाइट, बेसाल्टिक चट्टानें, अन्य महाद्वीपीय चट्टानें | बेसाल्ट, गैब्रो (माफिक चट्टानें) |
| ज्वालामुखीय गतिविधि | सीधे लावा का उत्पादन नहीं करती | ज्वालामुखीय विस्फोटों के दौरान लावा का स्रोत |

स्वैस ने पृथ्वी की भूपर्पटी की आन्तरिक अवस्था को मुख्यतः रासायनिक संरचना के आधार पर विभाजित किया है।
1. सियाल (SiAl)
- परत में सिलिका एवं एल्यूमीनियम Si+Al की प्रधानता होती हैं। इसलिए इसे सियाल कहा जाता है।
- औसत घनत्व 2.9 तथा औसत गहराई 50 से 300 किमी.।
- अम्ल की मात्रा प्रमुख है।
- इसमें चट्टानी पत्थर, बेसाल्टिक चट्टानें, ग्रेनाइट चट्टानें आदि शामिल हैं।
2. सीमा (SiMa)
- परत में सिलिका एवं मैग्नीशियम की प्रधानता होती हैं, इसलिए इस परत को (Si+Ma= SiMa) कहा जाता है।
- घनत्व 2.9 से 4.7 तथा गहराई 1000 से 2000 किमी. हैं।
- बेसाल्ट और गेब्रो चट्टानें।
- क्षारीय प्रकृति
- ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान लावा इसी परत से निकलता है।
3. नीफे (Ni e)
- परत में निकल एवं फेरस की प्रधानता होती है। इसलिए इस परत को नीफे (Ni + fe = Nife) कहा जाता है।
- घनत्व 11 है तथा भू केंद्र तक विस्तृत।
- चुंबकीय गुण

