राजस्थान के मुख्य पशु मेले :-
| मेले | स्थान | महीना | विशेषता |
| पुष्कर मेला | पुष्कर, अजमेर | कार्तिक शुक्ल एकादशी | ऊंट, घोड़े और गायों का सबसे बड़ा मेला। |
| परबतसर मेला | नागौर | माघ (जनवरी-फरवरी) | ऊंट, बैल और घोड़ों का व्यापार। |
| रामदेवरा मेला | रामदेवरा, जैसलमेर | भाद्रपद (अगस्त-सितंबर) | बाबा रामदेव जी की पूजा; ऊंट व्यापार। |
| मल्लीनाथ मेला | तिलवाड़ा, बाड़मेर | चैत्र (मार्च-अप्रैल) | ऊंट, घोड़े और बैल। |
| चंद्रभागा मेला | झालावाड़ | कार्तिक पूर्णिमा | गायों और ऊंटों का प्रमुख व्यापार। |
आर्थिक महत्व: (लगभग 61% भू-भाग मरुस्थल है जहां पशुपालन जीवनयापन का महत्वपूर्ण साधन है इसलिए पशुमेलों का महत्व बहुत बढ़ जाता है )
- व्यापारिक गतिविधियाँ: पशु मेलों में विभिन्न नस्लों के पशुओं की खरीद-बिक्री होती है, जिससे किसानों और व्यापारियों को आर्थिक लाभ मिलता है। उदाहरण के लिए, नागौर मेला में नागौरी बैलों की बिक्री प्रमुख आकर्षण है।
- स्थानीय व्यवसायों को बढ़ावा: मेलों के दौरान हस्तशिल्प, वस्त्र और आभूषणों की बिक्री बढ़ती है, जिससे कारीगरों और दुकानदारों की आय में वृद्धि होती है। पुष्कर मेला में स्थानीय हस्तशिल्प की मांग विशेष रूप से अधिक होती है।
- पर्यटन और आतिथ्य उद्योग का विकास: मेलों के कारण पर्यटकों की संख्या में वृद्धि होती है, जिससे होटलों, रेस्तरां और परिवहन सेवाओं को लाभ मिलता है। बीकानेर ऊंट मेला में देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों से स्थानीय पर्यटन उद्योग को मजबूती मिलती है।
सांस्कृतिक महत्व:
- पारंपरिक कला और संस्कृति का संरक्षण: मेलों में लोक संगीत (लंगा एवं माँगनियार) , नृत्य (कालबेलिया) और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, जो राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित करते हैं। मल्लीनाथ पशु मेला में लोक कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं।
- सामाजिक एकता और समुदायिक सहभागिता: मेलों में विभिन्न समुदायों के लोग एकत्रित होते हैं, जिससे सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं और सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता है।
- धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियाँ: मेलों के दौरान धार्मिक अनुष्ठान, पूजा और आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं, जो श्रद्धालुओं की आस्था को प्रगाढ़ करते हैं। जैसे रामदेवरा मेला (सामुदायिक सद्भावना का प्रतीक)
राजस्थान अपनी रंग-बिरंगी संस्कृति के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध है, जो यहां के मेलों और त्योहारों में झलकती है, इसलिए एक लोकप्रिय कहावत है “सात वार नौ त्यौहार”।

मुख्य विशेषताएं:
- त्यौहार धार्मिक बहुलवाद और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देते हैं। उदाहरण; बाबे री बीज, गोगामेडी
- ये त्यौहार लोगों के जीवन में खुशी और उत्साह के सूचक हैं। उदाहरण;तीज
- त्यौहार वैज्ञानिक स्वभाव से भरे होते हैं यानी त्यौहारों से जुड़े व्रत शरीर को स्वस्थ रखते हैं।
- त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक हैं, दशहरा, घुड़ला
- पशु व्यापार के लिए एक मंच के रूप में कार्य करता है अर्थात तेजाजी पशु मेला, चंद्रभागा पशु मेला
- ये त्यौहार नैतिक और मूल्य आधारित समाज को बढ़ावा देते हैं।
- तीज, खेजड़ली शहीदी मेला जैसे त्यौहार प्रकृति के साथ मनुष्य के अटूट बंधन को दर्शाते हैं।
- पाबूजी मेला, मेहंदीपुर बालाजी मेला जैसे कुछ त्योहार बीमारियों के इलाज का काम करते हैं।
- करवा चौथ, तीज जैसे त्यौहार पति-पत्नी के अटूट रिश्ते और प्यार का प्रतीक हैं।
- त्यौहार सामाजिक भलाई के लिए त्याग का प्रतीक है उदाहरण:मुहर्रम
- वे पर्यटन को बढ़ावा देते हैं;और रोजगार पैदा करते हैं।
- ये अवसर राज्य की पारंपरिक कलाकृतियों और हस्तशिल्प को प्रदर्शित करने के लिए एक असाधारण मंच के रूप में काम करते हैं।
- मेले और त्यौहार मनोरंजन, खेल जैसे ऊंट उत्सव, मरू महोत्सव (मिस मूमल प्रतियोगिता), पतंग उत्सव आदि का केंद्र हैं।
एक ओर ये त्यौहार समृद्ध सांस्कृतिक मूल्यों को आगे बढ़ाकर ‘संस्कृति के संरक्षक’ के रूप में कार्य करते हैं, दूसरी ओर वे राज्य के आर्थिक विकास को बढ़ावा देते हैं।
