जलवायु – मानसून, जलवायु विशेषताएँ, वर्षा का वितरण एवं जलवायु प्रदेश

हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole – IOD) = हिंद महासागर में तापमान का अंतर → यह मानसून और वर्षा के पैटर्न को प्रभावित करता है।

यह एल नीनो (El Niño) के प्रभावों को भारतीय मानसून पर या तो कम कर सकता है या और अधिक बढ़ा सकता है।

  • सकारात्मक IOD (पश्चिमी भारतीय महासागर में अधिक गर्मी) – यह अधिक वर्षा लाता है, मानसून को मजबूत करता है और अरबी सागर में चक्रवातों को उत्पन्न करता है।
  • नकारात्मक IOD (पूर्वी भारतीय महासागर में अधिक गर्मी) – यह वर्षा को कम कर देता है, जिससे अक्सर सूखा पड़ता है और बांगलादेश की खाड़ी में चक्रवातों को उत्पन्न करता है।
जलवायु का प्रकारक्षेत्रवार्षिक वर्षा
Cwg(शुष्क सर्दियों के साथ मानसून प्रकार)गंगा के मैदान के अधिकांश भाग, पूर्वी राजस्थान, असम और मालवा पठार में100 – 200 cm
Dfc(कम गर्मी के साथ ठंडी, आर्द्र सर्दियाँ)सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और असम के कुछ हिस्से~200 cm

(answer 10 marker se diya hai– 5 m me isko short me direct likhna hai)

 वर्षा का वितरण: भारत में औसत वार्षिक वर्षा लगभग 125 सेमी है, लेकिन इसमें स्थानिक विविधताएँ बहुत अधिक हैं

  1. उच्च वर्षा वाले क्षेत्र (200 सेमी से अधिक): पश्चिमी घाट और पश्चिमी तटीय मैदानों की ढलानें; मेघालय की पहाड़ियाँ (गारो, खासी और जैन्तिया), पूर्वी हिमालय के दक्षिणी ढलान, असम, अरुणाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल।
  2. मध्यम वर्षा वाले क्षेत्र (100-200 सेमी): गुजरात के दक्षिणी भाग, पूर्वी तमिलनाडु, ओडिशा, झारखंड, बिहार, पूर्वी मध्य प्रदेश को कवर करने वाले पूर्वोत्तर प्रायद्वीप, उप-हिमालय के साथ उत्तरी गंगा का मैदान और कछार घाटी और मणिपुर।
  3. कम वर्षा वाले क्षेत्र (50-100 सेमी): पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, जम्मू और कश्मीर, पूर्वी राजस्थान, गुजरात और दक्कन का पठार।
  4. अपर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्र (50 सेमी और कम): प्रायद्वीप के कुछ हिस्से, विशेष रूप से आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र, लद्दाख और अधिकांश पश्चिमी राजस्थान।

वर्षा वितरण को प्रभावित करने वाले कारक:

  1. मानसूनी हवाएँ: वर्षा का वितरण काफी हद तक दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्व मानसून से प्रभावित होता है, जिसमें अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की शाखाएँ विभिन्न क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं।
  2. समुद्र से दूरी: तट के किनारे वाले क्षेत्रों में अधिक वर्षा होती है।
  3. हवा की दिशा: अरावली पहाड़ियों के समानांतर बहने वाली अरब सागर शाखा के कारण राजस्थान में अपर्याप्त वर्षा होती है।
  4. चक्रवाती गतिविधि: लौटता हुआ मानसून अंडमान सागर के ऊपर उत्पन्न होने वाले चक्रवाती दबावों के कारण व्यापक वर्षा लाता है, जो विशेष रूप से कोरोमंडल तट को प्रभावित करता है।
  5. स्थलाकृति: पश्चिमी घाट, हिमालय और तटीय क्षेत्रों जैसे क्षेत्रों में भौगोलिक उठाव और हवाओं के अभिसरण के कारण अधिक वर्षा होती है।
  6. वृष्टि छाया प्रभाव: पर्वत श्रृंखलाओं की वर्षा छाया में स्थित क्षेत्र, जैसे कि पश्चिमी घाट के पूर्व में स्थित क्षेत्र, नमी से भरी हवाओं के अवरुद्ध होने के कारण कम वर्षा का अनुभव करते हैं।

अल नीनो एक जलवायवीय घटना/ जटिल मौसम तंत्र  है जिसके अंतर्गत  पेरू तट के पास गर्म जलधारा का प्रवाह होने लगता है , यह गर्म जल धारा हर तीन से 7 साल में प्रवाहित होती है। चुंकि यह जलधारा दिसंबर में क्रिसमस के समय प्रकट होती है अतः  इसे ‘बालक ईसा’ (चाइल्ड क्राइस्ट ) के नाम से भी जाना जाता है  

अल नीनो भारतीय मानसून पर विपरीत प्रभाव डालती है। अल नीनो के कारण पेरू तट के निकट समान्य से कम वायुदाब हो जाने के कारण यहाँ से दक्षिणी-पूर्वी व्यापारिक पवनों को धकेलने वाला बल क्षीण हो जाता है। इसके स्थान पर यहाँ व्यापारिक पवनों को आकर्षित करने वाला या खींचने वाला बल प्रभावी हो जाता है। इस कारण इन व्यापारिक पवनों का एशिया की ओर प्रवाह भी कमजोर पड़ जाता है ।

परिणामस्वरूप  भारतीय मानसून कमज़ोर पड़ जाता है एवं वर्षा देर से एवं औसत से कम प्राप्त होती है।

भारत में गर्मियों में दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाएँ चलती हैं और सर्दियों में उत्तर-पूर्वी मानसून । मानसून एक जटिल मौसम विज्ञान संबंधी घटना है, जिसकी तीव्रता, अवधि और वर्षा के स्थानिक वितरण को विभिन्न कारक प्रभावित करते हैं:

  1. भूमि और समुद्र का अलग-अलग तापमान: गर्मियों के दौरान, भारतीय उपमहाद्वीप आस-पास के महासागरों की तुलना में तेज़ी से गर्म होता है, जिससे भूमि पर कम दबाव का क्षेत्र बनता है। यह हिंद महासागर से नम हवा को खींचता है, जिससे दक्षिण-पश्चिम मानसून की शुरुआत होती है।
  2. अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ): ITCZ, जो गर्मियों के महीनों के दौरान उत्तर की ओर स्थानांतरित हो जाता है, दक्षिणी गोलार्ध से नमी से भरी हवाओं के अभिसरण के लिए एक केंद्र बिंदु के रूप में कार्य करता है, जो मानसून की शुरुआत और प्रगति में सहायता करता है।
  3. तिब्बत पठार और उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (कोटेश्वरम सिद्धांत):
    1. ग्रीष्मकालीन तापन: ग्रीष्मकाल (जून) के दौरान, तिब्बती पठार के तीव्र तापन के कारण हवा ऊपर उठती है, जिससे निम्न दाब बनता है। पठार से उठने वाली हवा मेडागास्कर के पूर्व में दक्षिणी हिंद महासागर में उतरती है, जिससे मस्कारेन हाई बनता है।
    2. TEJS का निर्माण: कोरिओलिस बल के तहत तिब्बत से चलने वाली हवा उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (TEJS) बनाती है।
    3. मानसून की हवाओं पर प्रभाव: TEJS हिंद महासागर और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच दबाव के अंतर को बढ़ाता है, जिससे मानसूनी हवा की तीव्रता बढ़ जाती है।
    4. सोमाली जेट स्ट्रीम अफ्रीका के पूर्वी तट से निकलने वाली एक निचली वायुमंडलीय जेट स्ट्रीम है और मानसून के मौसम में भारत की ओर बहती है। यह हिंद महासागर से नमी का परिवहन करके भारतीय मानसून की तीव्रता को बढ़ाती है।
  4. उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम की भूमिका (यिन का सिद्धांत):
    1. मानसून की शुरुआत: STWJ की दक्षिणी शाखा का उत्तर की ओर बढ़ना और भारत में मानसून की शुरुआत एक दूसरे से जुड़ी हुई है। 
    2.  पश्चिमी विक्षोभ: जेट स्ट्रीम की दक्षिणी शाखा भारत में सर्दियों के मौसम की स्थितियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। यह भूमध्य सागर से चक्रवाती विक्षोभ भी लाती है, जिससे उत्तर-पश्चिमी भारत में “मावठ” के रूप में जानी जाने वाली वर्षा होती है जो रबी की फसलों के लिए फायदेमंद होती है।
  5. एल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO): प्रशांत महासागर में ENSO घटनाएँ, विशेष रूप से एल नीनो और ला नीना भारतीय मानसून को प्रभावित करती हैं। एल नीनो मानसून को कमज़ोर करता है, जबकि ला नीना समुद्र की सतह के तापमान और वायुमंडलीय परिसंचरण को बदलकर इसे बढ़ाता है।
  6. हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD): पश्चिमी हिंद महासागर में गर्म पानी की विशेषता वाला एक सकारात्मक IOD भारतीय उपमहाद्वीप पर मानसून की वर्षा को बढ़ाता है, जबकि एक नकारात्मक IOD का विपरीत प्रभाव पड़ता है।
  7. स्थानीय कारक (स्थलाकृति और भूमि-समुद्र वितरण): भारतीय उपमहाद्वीप की स्थलाकृति, जैसे कि पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट और हिमालय पर्वतमाला, भूगर्भीय प्रभावों के माध्यम से वर्षा के वितरण को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती है। तटीय क्षेत्रों और पर्वत श्रृंखलाओं के करीब के क्षेत्रों में इन भौगोलिक विशेषताओं के कारण अधिक वर्षा होती है।

भारत में स्थलरुद्ध और संवहन वर्षा के प्रकार

स्थलरुद्ध वर्षा (Orographic Rainfall): जब आर्द्र वायु धाराएँ पर्वत श्रृंखलाओं के कारण ऊपर उठती है, तो संघनन होता है और वर्षा होती है। पर्वत भारत में वर्षा वितरण को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं।

  1. हिमालय: हिमालय पर्वत श्रृंखला साइबेरियाई ठंडी हवाओं को रोकती है, जिससे भारत में उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु बनती है। यह पर्वत बंगाल की खाड़ी से आने वाली मानसूनी हवाओं को विभाजित करता है, जिससे उत्तर-पूर्वी भारत में भारी वर्षा होती है, खासकर मासिनराम और चेरापूंजी में। उत्तर भारत के मैदानों में भी वर्षा होती है, जो निम्न दबाव क्षेत्रों के कारण होती है।
  2. अरावली: अरावली पर्वत श्रृंखला दक्षिण-पश्चिम मानसून को नहीं रोकती है, जिससे पश्चिमी राजस्थान में कम वर्षा होती है, क्योंकि हवाएँ पर्वतों के समानांतर चलती हैं।
  3. पश्चिमी घाट: ये पर्वत पश्चिमी ढलानों पर भारी वर्षा प्राप्त करते हैं (250 सेमी तक), जबकि पूर्वी ढलान और दक्कन पठार वर्षा छाया क्षेत्र में आते हैं और 38 सेमी से कम वर्षा प्राप्त करते हैं।
  4. पूर्वी घाट: यह क्षेत्र बंगाल की खाड़ी के मानसून की वर्षा छाया में स्थित है, जिससे यहां वर्षा कम होती है, विशेष रूप से आंध्र प्रदेश और ओडिशा के कुछ हिस्सों में।
  5. अराकान योमा: यह पर्वत श्रृंखला दक्षिण-पश्चिम मानसून हवाओं को मोड़ती है, जो फिर बंगाल की खाड़ी की शाखा में शामिल होती हैं, और भारत में वर्षा लाती हैं।

संवहन वर्षा (Convectional Rainfall):

संवहन वर्षा तब होती है जब पृथ्वी की सतह गर्म होती है, जिससे इसके पास की हवा ऊपर उठती है। जैसे ही गर्म और आर्द्र हवा ऊपर उठती है, वह ठंडी हो जाती है और बादल बनाती है। ये बादल भारी वर्षा लाते हैं, जो अक्सर गरज और बिजली के साथ होती है।

भारत में संवहन वर्षा का पैटर्न:

  • पूर्व-मानसून वर्षा: मानसून से पहले भारत में अत्यधिक भूमि गर्मी के कारण पूर्व-मानसून वर्षा होती है।
    • केरल और कर्नाटक में मैंगो शावर : मई और जून में यह वर्षा होती है, जो आम को पकाने में मदद करती है और मानसून के आगमन का संकेत देती है।
    • काल बैसाखी: पश्चिम बंगाल और असम में अप्रैल और मई में काल बैसाखी के दौरान तेज आंधी और ओले के साथ तूफान आते हैं।
    • दक्षिणी भारत: महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में ग्रीष्म काल में संवहन वर्षा होती है, जब भूमि गर्म हो जाती है, जिससे तूफान और भारी वर्षा होती है।
    • गंगा के मैदान: उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में ग्रीष्म काल में भूमि के अत्यधिक गर्म होने के कारण संवहन वर्षा होती है, जिससे आंधी और वर्षा होती है।
    • उत्तर-पूर्वी भारत: असम, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में संवहन वर्षा होती है, जो अक्सर बंगाल की खाड़ी से आर्द्रता द्वारा बढ़ाई जाती है, जिससे ग्रीष्मकाल में भारी वर्षा होती है।

    भारत में स्थल रुद्ध और संवहन वर्षा दोनों वर्षा के प्रमुख प्रकार हैं। पर्वतों के कारण हवाएँ ऊपर उठती हैं और भारी वर्षा होती है, जबकि संवहन वर्षा भूमि के अत्यधिक गर्म होने से होती है, जिससे गरज-चमक के साथ वर्षा और तूफान आते हैं। इन दोनों प्रकारों का मिश्रण भारत के विविध वर्षा पैटर्न को आकार देता है।

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