कृषि विकास: उत्पादन और उत्पादकता

कृषि उत्पादकता दी गई इनपुट से प्राप्त कृषि उत्पादों की मात्रा है। भारत में इसे प्रति इकाई भूमि पर उपज (किलो/हेक्टेयर) से मापा जाता है।

मुख्य रुझान

  1. फसल उत्पादकता में वृद्धि (किग्रा./हेक्टेयर)

                                   (2007-08 से 2011-12 के औसत की तुलना 2024-25 से)

फसल / समूह2007-08 से 2011-12 का औसत (किग्रा./हेक्टेयर)2024-25 (किग्रा./हेक्टेयर)वृद्धि (%)
अनाज (Cereals)1617253756.90%
दलहन (Pulses)48177360.71%
खाद्यान्न (Food Grains)1291194050.27%
तिलहन (Oilseeds)1144153734.35%
गन्ना (Sugarcane)614327683525.07%
कपास (Lint)42848413.08%
ग्वार बीज (Guar Seed)40966261.86%

2. 2025-26 अग्रिम अनुमान (लाख टन में):

  • कुल खाद्यान्न: 283.98 लाख टन (–8.28 प्रतिशत)
    • खरीफ: 89.55 लाख टन (–21.61 प्रतिशत)
    • रबी: 194.43 लाख टन (–0.49 प्रतिशत)
  • अनाज: 236.85 लाख टन (–11.56 प्रतिशत)
  • दालें: 47.13 लाख टन (+12.75 प्रतिशत)
  • तिलहन: 100.46 लाख टन (+7.18 प्रतिशत)

राष्ट्रीय स्थिति (2023-24): राजस्थान सरसों एवं रेपसीड (43.43%), बाजरा (41.34%), कुल तिलहन (23.61%) और ग्वार (88.80%) में देश में प्रथम स्थान पर है।

बागवानी: हाल के वर्षों में फलों के अंतर्गत क्षेत्रफल में लगभग 35% की वृद्धि हुई है तथा उत्पादन में 52.7% की वृद्धि हुई है। सब्जियों और मसालों में भी स्थिर वृद्धि दर्ज की गई है।

समग्र मूल्यांकन: दीर्घकालिक उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है (विशेषकर दालों और अनाज में), लेकिन अल्पकालिक उत्पादन वर्षा पर निर्भरता के कारण अत्यधिक अस्थिर बना हुआ है।

उत्पादकता सुधार के लिए किए गए नीतिगत हस्तक्षेप

राजस्थान सरकार ने केंद्र सरकार की योजनाओं के साथ समन्वय कर उत्पादकता बढ़ाने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाई है:

  1. बीज सुधार: मुख्यमंत्री बीज स्वावलंबन योजना — किसानों द्वारा प्रमाणित बीज उत्पादन को प्रोत्साहन, 50% सब्सिडी।
  2. मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन: मृदा स्वास्थ्य कार्ड तथा गोवर्धन जैविक उर्वरक योजना (जैविक खाद इकाई पर 50% सब्सिडी)।
  3. सिंचाई दक्षता: “प्रति बूंद अधिक फसल” के अंतर्गत माइक्रो-इरिगेशन का विस्तार तथा सौर पंप।
  4. बागवानी विकास: MIDH के अंतर्गत प्याज, किन्नू, आम आदि के लिए उत्कृष्टता केंद्र।
  5. प्रौद्योगिकी प्रोत्साहन: नमो ड्रोन दीदी योजना, कृषि क्लीनिक तथा राज-एआईएमएस डिजिटल प्लेटफॉर्म।
  6. कटाई उपरांत एवं विपणन: PM-FME (प्रसंस्करण इकाइयों पर 35% सब्सिडी), e-NAM (173 मंडियों का एकीकरण) तथा AIF के तहत भंडारण अवसंरचना।
  7. छत्र एवं लचीली योजनाएँ: PM-RKVY (कैफेटेरिया दृष्टिकोण) तथा कृषि उन्नति योजना राज्य-विशिष्ट आवश्यकताओं के लिए।
  8. जैविक एवं एग्रोफॉरेस्ट्री: परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) तथा राष्ट्रीय एग्रोफॉरेस्ट्री नीति के अंतर्गत एग्रोफॉरेस्ट्री को प्रोत्साहन।

राजस्थान कृषि प्रतिस्पर्द्धा परियोजना (RACP) राजस्थान सरकार द्वारा शुरू की गई एक विश्व बैंक-वित्तपोषित पहल है, जिसका उद्देश्य जलवायु-अनुकूल प्रथाओं, कुशल जल प्रबंधन व मजबूत बाजार संपर्क के माध्यम से राज्य के चयनित क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता व किसानों की आय को सतत रूप से बढ़ाना है।

क्रियान्वयन एजेंसी: कृषि विभाग के अंतर्गत राजस्थान कृषि प्रतिस्पर्द्धा परियोजना प्रबंधन एवं क्रियान्वयन सोसाइटी (RACPMIS)

उद्देश्य

  1. राज्य के चयनित क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता व किसानों की आय को सतत रूप से बढ़ाना।
  2. राजस्थान की शुष्क व अर्ध-शुष्क परिस्थितियों के अनुकूल जलवायु-लचीली कृषि को बढ़ावा देना।
  3. जल-उपयोग दक्षता व प्रबंधन में सुधार करना, राज्य की मूल संरचनात्मक बाधा को संबोधित करते हुए।
  4. किसानों की मूल्य प्राप्ति में सुधार हेतु बाजार संपर्क व कृषि-मूल्य श्रृंखलाओं को मजबूत करना।

प्रमुख घटक

  1. वाटरशेड विकास व जल संचयन: सिंचाई उपलब्धता को स्थिर करने हेतु सामुदायिक स्तर पर जल संरक्षण अवसंरचना का निर्माण।
  2. फार्म-जल प्रबंधन व सिंचाई अवसंरचना: सूक्ष्म सिंचाई व संबंधित प्रौद्योगिकियों के माध्यम से खेत स्तर पर जल-उपयोग दक्षता में सुधार।
  3. कृषि व बागवानी विविधीकरण: किसानों को पारंपरिक फसल पद्धति से आगे बढ़कर उच्च-मूल्य बागवानी व विविधीकृत खेती प्रणालियों की ओर प्रोत्साहित करना।
  4. पशुधन विकास व पशु स्वास्थ्य सेवाएं: संबद्ध पशुधन क्षेत्र को मजबूत करना, जो फसल खेती के साथ आय स्थिरता प्रदान करता है।
  5. कृषि-व्यवसाय व बाजार पहुंच हेतु समर्थन: किसानों को खरीदारों से जोड़ने व बिचौलिया नुकसान कम करने हेतु फसल-पश्चात व बाजार अवसंरचना का निर्माण।
  6. किसान समूहों व FPO को मजबूत करना: छोटे किसानों के बीच सामूहिक सौदेबाजी शक्ति व इनपुट/आउटपुट समेकन क्षमता का निर्माण।

राजस्थान का कृषि परिवर्तन पारंपरिक खेती से परे तेजी से दो स्तंभों पर निर्भर करता है — भौतिक अवसंरचना (सिंचाई, भंडारण, विपणन) व प्रौद्योगिकी-संचालित हस्तक्षेप (ड्रोन, डिजिटल प्लेटफॉर्म, मृदा निदान) — दोनों ही क्षेत्र की प्राकृतिक बाधाओं को प्रबंधित, उत्पादकता-वर्धक प्रणालियों में बदलने हेतु केंद्रीय हैं।

अवसंरचना विकास की भूमिका

  1. सिंचाई अवसंरचना: बजट 2026-27 में राज्यभर में सिंचाई सुविधा कार्यों हेतु ₹11,300 करोड़ से अधिक आवंटित, जो उत्पादकता पर संरचनात्मक जल-निर्भरता बाधा को सीधे संबोधित करता है।
  2. भंडारण व गोदाम: राजस्थान राज्य भंडारण निगम (RSWC) 36 जिलों में 97 गोदाम संचालित करता है जिसकी क्षमता 17.25 लाख मीट्रिक टन है (दिसंबर 2025); औसत उपयोग 48% (8.25 लाख मीट्रिक टन) रहा, SC/ST किसानों (70%) व FPO (60%) हेतु भारत में सर्वाधिक छूट के साथ जो फसल-पश्चात भंडारण लागत कम करती है।
  3. सहकारी भंडारण नेटवर्क: सहकारी संस्था योजनाओं के तहत 8,912 गोदाम बनाए गए हैं, जो कृषि उपज भंडारण व PDS खाद्यान्न वितरण दोनों का समर्थन करते हैं।
  4. नई कृषि मंडियां व बाजार अवसंरचना: बांसवाड़ा, दौसा व श्रीगंगानगर में नई कृषि मंडियां स्वीकृत, साथ ही सवाई माधोपुर में सब्जी मंडी, जो किसानों की बाजार पहुंच व मूल्य प्राप्ति में सुधार करती है।
  5. कस्टम हायरिंग सेंटर: 500 कस्टम हायरिंग सेंटर (₹96 करोड़) छोटे व सीमांत किसानों को व्यक्तिगत स्वामित्व लागत के बिना मशीनीकृत उपकरणों तक पहुंच प्रदान करते हैं।
  6. कोल्ड चेन व प्रसंस्करण अवसंरचना: 250 मीट्रिक टन व 500 मीट्रिक टन क्षमता के गोदाम निर्माणाधीन (₹20 करोड़), साथ ही प्याज व सब्जी (अलवर), किन्नू (श्रीगंगानगर) व आम (बांसवाड़ा) हेतु उत्कृष्टता केंद्र फसल-विशिष्ट मूल्य श्रृंखलाओं को मजबूत करते हैं।

प्रौद्योगिकी हस्तक्षेपों की भूमिका

  1. नमो ड्रोन दीदी योजना: 1,070 कृषि ड्रोन की खरीद हेतु 3% ब्याज सबवेंशन के साथ महिला-नेतृत्व वाली ड्रोन सेवाओं को बढ़ावा, जो नैनो-यूरिया व कीटनाशक के सटीक प्रयोग को सक्षम बनाती है।
  2. एग्री स्टैक PMU: किसानों को डेटा-संचालित परामर्श, सटीक इनपुट प्रबंधन, फसल योजना समर्थन व बाजार बुद्धिमत्ता प्रदान करता है — साक्ष्य-आधारित खेती निर्णयों हेतु एक डिजिटल रीढ़।
  3. मृदा स्वास्थ्य निदान: 4.79 लाख मृदा नमूने एकत्र किए गए व 4.15 लाख मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किए गए (2025-26 दिसंबर तक), जो संतुलित उर्वरक प्रयोग को सक्षम बनाता है।
  4. कृषि क्लीनिक: जिला मुख्यालयों में स्थापित (2024-25 में 20 स्थापित, 2025-26 में 13 और निर्माणाधीन) विशेषज्ञ मृदा परीक्षण, फसल परामर्श व कीट/रोग उपचार सेवाएं प्रदान करने हेतु।
  5. मुख्यमंत्री बीज स्वावलंबन योजना: प्रौद्योगिकी-सक्षम किसान-नेतृत्व वाला बीज उत्पादन, 1.12 लाख क्विंटल वितरित व सुधरी किस्मों को लोकप्रिय बनाने हेतु 31.50 लाख मुफ्त बीज मिनीकिट के साथ।
  6. सौर-संचालित कृषि प्रौद्योगिकी: 50,000 सौर पंप (₹1,500 करोड़) व पावर टिलर, डिस्क हल, कल्टीवेटर हेतु सब्सिडी, तथा 500 सौर फसल ड्रायर, जो ऊर्जा लागत कम करते हुए उत्पादकता में सुधार करते हैं।

आगे सुधार हेतु उपाय

  1. सिंचाई कवरेज का विस्तार: वर्षा निर्भरता कम करने हेतु प्रमुख परियोजनाओं (ERCP-PKC लिंक, नर्मदा नहर) के पूरा होने में तेजी लाना, साथ ही सूक्ष्म सिंचाई का विस्तार।
  2. गोदाम उपयोग बढ़ाना: स्थापित क्षमता के विरुद्ध केवल 48% उपयोग होने के साथ, लक्षित जागरूकता अभियान व किसान समूहीकरण (FPO के माध्यम से) क्षमता उपयोग में सुधार कर सकते हैं।
  3. एग्री स्टैक एकीकरण को गहरा करना: व्यापक किसान अपनाने हेतु सभी जिलों में स्थानीय भाषा, मोबाइल-प्रथम इंटरफेस के साथ डिजिटल परामर्श सेवाओं का विस्तार करना।
  4. ड्रोन व सटीक कृषि का विस्तार: महिला-नेतृत्व वाले SHG के व्यापक हिस्से तक पहुंचने हेतु वर्तमान संख्या से परे नमो ड्रोन दीदी कवरेज बढ़ाना।
  5. कोल्ड चेन अवसंरचना मजबूत करना: बागवानी फसलों (फल, सब्जियां) हेतु कोल्ड स्टोरेज विस्तार को प्राथमिकता देना जहां फसल-पश्चात नुकसान आमतौर पर सबसे अधिक होता है।
  6. जलवायु-लचीली प्रौद्योगिकी एकीकृत करना: उत्कृष्टता केंद्रों व प्राकृतिक खेती क्लस्टरों (वर्तमान में 2,000, 2.50 लाख किसानों को कवर करते हुए) का अधिक जिलों तक विस्तार करना।

अवसंरचना व प्रौद्योगिकी मिलकर राजस्थान की कृषि को पूर्णतः वर्षा-निर्भर, विखंडित प्रणाली से एक अधिक लचीले, डेटा-सूचित व बाजार-संबद्ध क्षेत्र की ओर स्थानांतरित कर रहे हैं — विकसित राजस्थान@2047 के अन्नदाता स्तंभ को प्राप्त करने हेतु एक केंद्रीय संक्रमण, बशर्ते निरंतर प्रौद्योगिकी विस्तार के साथ-साथ मौजूदा अवसंरचना में उपयोग अंतराल को बंद किया जाए।

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