• POSH अधिनियम, 2013 की धारा 2(फ) के अनुसार “कर्मचारी (Employee)” वह व्यक्ति है जो किसी कार्यस्थल पर नियमित, अस्थायी, संविदा, प्रशिक्षु, स्वयंसेवक या दैनिक वेतनभोगी के रूप में कार्य करता हो, चाहे उसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नियुक्त किया गया हो तथा वेतन मिले या न मिले। 
  • इसमें घरेलू कामगार भी सम्मिलित हैं।
  • यह परिभाषा अत्यंत व्यापक है, जिससे कार्यस्थल पर उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को यौन उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान की जा सके। 
  • इसका उद्देश्य केवल स्थायी कर्मचारियों तक सुरक्षा सीमित न रखकर असंगठित एवं संवेदनशील वर्गों को भी संरक्षण देना है। इस प्रकार POSH अधिनियम कार्यस्थल पर सुरक्षित एवं सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित करता है।
  • POSH अधिनियम, 2013 की धारा 2(घ) के अनुसार “जिला अधिकारी” वह अधिकारी है जिसे राज्य सरकार द्वारा किसी जिले के लिए अधिसूचित किया जाता है। 
  • सामान्यतः यह दायित्व जिला मजिस्ट्रेट, अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट या समकक्ष अधिकारी को सौंपा जाता है।
  • “जिला अधिकारी (District Officer)” की भूमिका
    • जिला अधिकारी का मुख्य कार्य अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना है। 
    • वह स्थानीय समिति (Local Committee) का गठन करता है, शिकायत निवारण व्यवस्था की निगरानी करता है तथा कार्यस्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। 
    • इसके अतिरिक्त, वह जागरूकता कार्यक्रमों, प्रशिक्षण एवं अधिनियम के अनुपालन की देखरेख भी करता है। 
    • इस प्रकार जिला अधिकारी POSH अधिनियम के प्रशासनिक एवं संस्थागत क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

धारा 19 प्रत्येक नियोक्ता (सरकारी या निजी) पर लैंगिक उत्पीड़न को रोकने, जागरूकता पैदा करने, जांच के दौरान सहायता प्रदान करने और अधिनियम का सख्त अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य कर्तव्य लागू करती है। यह जिम्मेदारी को ‘प्रतिक्रियात्मक’ (reactive) से ‘सक्रिय’ (proactive) की ओर स्थानांतरित करती है।

प्रत्येक नियोक्ता का यह कर्तव्य होगा कि वह:

  • कार्यस्थल पर एक सुरक्षित कार्य वातावरण प्रदान करे, जिसमें कार्यस्थल पर संपर्क में आने वाले व्यक्तियों से सुरक्षा भी शामिल है।
  • कार्यस्थल के किसी सहजदृश्य स्थान (conspicuous place) पर लैंगिक उत्पीड़न के दंडात्मक परिणाम और आंतरिक समिति (ICC) के गठन के आदेश को प्रदर्शित करे।
  • कर्मचारियों के लिए नियमित रूप से कार्यशालाएं और जागरूकता कार्यक्रम तथा आंतरिक समिति के सदस्यों के लिए ओरिएंटेशन कार्यक्रम आयोजित करे।
  • शिकायतों के निपटान और जांच करने के लिए आंतरिक समिति (ICC) या स्थानीय समिति (LCC) को आवश्यक सुविधाएं प्रदान करे।
  • आंतरिक समिति या स्थानीय समिति के समक्ष प्रत्यर्थी (आरोपी) और गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करने में सहायता करे।
  • आंतरिक समिति या स्थानीय समिति को जांच के संबंध में आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराए।
  • यदि महिला भारतीय दंड संहिता (IPC/BNS) या किसी अन्य कानून के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज करना चाहती है, तो उसे सहायता प्रदान करे।
  • अपराधी के विरुद्ध (भले ही वह कर्मचारी न हो) दंड विधि के तहत कार्रवाई शुरू करे, जहाँ लैंगिक उत्पीड़न हुआ है।
  • लैंगिक उत्पीड़न को सेवा नियमों के तहत कदाचार (Misconduct) माने और उसके अनुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करे।
  • आंतरिक समिति द्वारा रिपोर्टों के समय पर प्रस्तुत किए जाने की निगरानी करे।
  • नोट: “यह अधिनियम जिम्मेदारी को व्यक्तियों से हटाकर संस्थागत जवाबदेही पर केंद्रित करता है।”

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