शहरी और ग्रामीण स्थानीय सरकार भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक सशक्त बनाता है। यह प्रणाली नागरिकों की स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति, प्रशासनिक विकेंद्रीकरण तथा जनभागीदारी सुनिश्चित करती है। शहरी क्षेत्रों में नगर निकाय तथा ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज संस्थाएँ इसके प्रमुख स्वरूप हैं।
स्थानीय सरकार की अवधारणा
- स्थानीय स्वशासन का अर्थ:– स्थानीय स्वशासन, प्रशासन की एक प्रणाली है जहाँ लोगों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुनी गई स्थानीय संस्थाएं गाँवों, कस्बों या शहरों जैसी स्थानीय समुदायों के मामलों का प्रबंधन करती हैं।
- स्थानीय सरकार की अवधारणा लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों “सार्थक भागीदारी और उद्देश्यपूर्ण जवाबदेही” को मजबूती देती है।
- यह शासन का वह स्तर है, जो आम नागरिकों के सबसे करीब होता है और उन्हें स्थानीय मुद्दों में भाग लेने का अवसर प्रदान करता है।
महत्वपूर्ण कथन
- जवाहरलाल नेहरू –“स्थानीय स्वशासन लोकतंत्र की सच्ची पद्धति का आधार है और होना भी चाहिए”
- लार्ड ब्राइस – “स्थानीय स्वशासन प्रजातंत्र के लिए प्रशिक्षण स्थली या पाठशाला का काम करती हैं”
- डी. टाकविले – “नागरिकों की स्थानीय सभाए स्वतंत्र राष्ट्रों की वास्तविक शक्ति है”
- महात्मा गांधी – “स्थानीय संस्थाएं मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के अध्ययन की प्रयोगशाला हैं”
भारत में स्थानीय सरकार की अवधारणा का विकास
- प्रारंभिक विकास: अंग्रेजों ने सबसे पहले 1667 में मद्रास नगर परिषद की स्थापना की, जिसे 1687 में नगर निगम का दर्जा दिया गया।
- राजस्थान में शुरुआत: 1864 में माउंट आबू में राजस्थान की पहली नगरपालिका स्थापित की गई।
- लॉर्ड मेयो का विकेंद्रीकरण प्रस्ताव (1870): स्थानीय शासन के विकास के लिए विकेंद्रीकरण की पहल की।
- लॉर्ड रिपन का योगदान (1882): ‘भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक’ कहे जाने वाले लॉर्ड रिपन (1880-1884) ने जिला बोर्ड, ग्राम पंचायत, और न्याय पंचायतों का गठन किया। उनका 1882 का संकल्प स्थानीय स्वशासन का ‘मैग्नाकार्टा’ माना जाता है।
- रायल कमीशन (1907): हॉब हाउस की अध्यक्षता में गठित इस कमीशन ने 1909 में स्थानीय स्वशासन पर अपनी रिपोर्ट दी।
- 1919 का भारत शासन अधिनियम (मान्टेग्यू चेम्स फोर्ड अधिनियम): इस अधिनियम ने स्थानीय स्वशासन को वैधानिक स्वरूप दिया और इसे हस्तांतरित विषयों में शामिल किया।
- बीकानेर की पहल: राजस्थान में बीकानेर प्रथम रियासत थी जिसने 1928 में ग्राम पंचायत अधिनियम बनाया। उसके बाद जयपुर, सिरोही, भरतपुर, करौली ने ग्राम पंचायत अधिनियम बनाया ।
आधुनिक काल और संविधान में स्थान
- 1935 का भारत सरकार अधिनियम: स्थानीय स्वशासन को राज्य सूची में रखा गया।
- 1987 में स्थानीय सरकार के संस्थानों की समीक्षा शुरू हुई।
- 1989 में पी.के. थुंगन समिति ने इन्हें संवैधानिक मान्यता देने की सिफारिश की।
- 1992 में 73वां और 74वां संवैधानिक संशोधन पारित किया गया, जिससे पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ।
- अनुच्छेद 40 (राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत): राज्य को ग्राम पंचायतों के गठन और उन्हें स्वायत्तता देने के निर्देश दिए गए।
- गांधीजी का ग्राम स्वराज: गांधीजी ने अपनी पुस्तक “My Picture of Free India” में ग्राम स्वराज की परिकल्पना रखी, जिसमें आत्मनिर्भर ग्रामों का उल्लेख किया।
- Note : 1964-67 – प्रथम पीढ़ी के पंचायती राज संस्थाओं का अवसान

ग्रामीण स्थानीय स्वशासन (पंचायती राज)
- “गांवों के लोगों को व पंचायतों को अधिकार दो, वे हजार गलतियाँ करेंगे, पर घबराने की आवश्यकता नहीं है ”- नेहरू
- महात्मा गांधी के अनुसार “भारत की आत्मा गांवों में बसती है इसलिए गांवों को आत्मनिर्भर बनाए
- ग्राम सभा की परिकल्पना ग्रामवासियों के एक ऐसे संस्थागत मंच के रूप में की गई है, जिसमें यह सुनिश्चित किया जाता है कि गांव की प्रत्येक आवाज को सुना जाए। समाज के प्रत्येक वर्ग की आवश्यकताओं और चिंताओं का निराकरण किया जाए। विकेन्द्रीकरण आंदोलन द्वारा लोकतांत्रिक मूल्यों को तृण-मूल (Grass root) स्तर तक सामाजिक-आर्थिक एवं राजनैतिक व्यवस्था के रूप में स्थापित किया जाना पंचायती राज का उद्देश्य है। महात्मा गांधी जी ने कहा था कि “यदि गाँव नष्ट होते हैं तो भारत नष्ट हो जाएगा।”
पंचायती राज व्यवस्था का विकास
- ग्रामीण विकास में जनसहभागिता बढ़ाने के लिए के.एम. मुंशी समिति की सिफारिश पर 2 अक्टूबर, 1952 को ‘सामुदायिक विकास कार्यक्रम’ लागू किया गया । 2 अक्टूबर 1953 को “राष्ट्रीय सविस्तार योजना” लागू की गई।
- इन कार्यक्रमों के लिए अमेरिका के फोर्ड फाउण्डेशन ने आर्थिक सहायता दी। लेकिन सरकारी मशीनरी (नौकरशाही) के अत्यधिक हस्तक्षेप व जनसहभागिता की कमी के कारण यह कार्यक्रम असफल रहा ।
बलवन्त राय मेहता समिति (1957)
- गठन – जनवरी 1957 (योजना आयोग द्वारा, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय।)
- रिपोर्ट सौंपी – 24 नवम्बर 1957 को राष्ट्रीय विकास परिषद् को
- रिपोर्ट का शीर्षक – ‘लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण’
- उद्देश्य – सामुदायिक विकास कार्यक्रम व राष्ट्रीय प्रसार सेवा कार्यक्रम की असफलता का मूल्यांकन/जांच करने हेतु तथा इनके बेहतर क्रियान्वयन के लिए सुझाव देने के लिए
- बलवंत राय मेहता ने अपने प्रतिवेदन में प्रशासनिक हस्तक्षेप के कारण इन दोनों कार्यक्रमों को असफल बताया तथा यह सिफारिश की कि सामुदायिक कार्यों में लोगों की भागीदारी सांविधिक प्रतिनिधि निकायों के माध्यम से आयोजित की जाए । उन्होंने भारत में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण लागू करने की अनुशंसा की थी ।
- बलवन्त राय मेहता समिति की सिफारिश पर सर्वप्रथम 2 अक्टूबर, 1959 में नागौर जिले के बगदरी गांव (राजस्थान) से तात्कालिक प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने ‘त्रिस्तरीय पंचायती राज’ व्यवस्था का शुभारम्भ किया।
- 11 अक्टूबर, 1959 के आन्ध्रप्रदेश प्रदेश (महबूबनगर जिले के शादनगर खंड) में पंचायती राज व्यवस्था को लागू किया गया।
- इस प्रकार पंचायती राज व्यवस्था को लागू करने वाला प्रथम राज्य राजस्थान तथा दूसरा आन्ध्रप्रदेश था।
- 11 अक्टूबर, 1959 को आन्ध्रप्रदेश भारत का पहला राज्य बना जहाँ पंचायत राज संस्थाओं के चुनाव हुए।
- लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण शब्द बलवंत राय मेहता ने दिया था इसलिए इनको लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का जनक कहा जाता है ।
- बलवंत राय मेहता को भारत में पंचायती राज का शिल्पकार कहा जाता है ।
बलवन्त राय मेहता समिति की मुख्य सिफारिशें –
- त्रिस्तरीय पंचायती राज की स्थापना की जानी चाहिए।
- ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत (प्रति 1 हजार जनसंख्या पर)
- खण्ड स्तर पर पंचायत समिति (प्रति 5 हजार आबादी पर)
- जिला स्तर पर जिला परिषद्। (प्रति 50 हजार आबादी पर)
- पंचायत समिति स्तर यानि मध्यवर्ती स्तर, पंचायती राज का मुख्य आधार होगा अर्थात पंचायत समिति पर विशेष बल। पंचायत समिति (खंड स्तर) कार्यकारी निकाय के रूप में होगी जबकि जिला परिषद की भूमिका सलाहकारी, समन्वयक एवं पर्यवेक्षण की होगी।
- ग्राम पंचायत का चुनाव प्रत्यक्ष एवं सीधा होगा जबकि पंचायत समिति एवं जिला समिति का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होगा ।
- जिला कलेक्टर को जिला परिषद का अध्यक्ष होना चाहिए ।
- इन संस्थाओं के प्रभावी कार्यक्रम के लिए पर्याप्त संसाधन हस्तांतरित किया जाए और भविष्य में शक्तियों का केंद्रीकरण किया जाए ।
- नोट :
- ऐसा राज्य जिसकी जनसँख्या 20 लाख से कम वहां पंचायतीराज का ढांचा द्विस्तरीय हो सकता है अर्थात वहां खण्ड स्तर (पंचायत समिति) नहीं होगी ।
- 1965 के बाद देश में पंचायती राज व्यवस्था के चुनाव में अनियमितता उत्पन्न हुई । इसके लिए विभिन्न समितियों एवं कार्य दलों का गठन किया गया जिन्होंने अपनी-अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपी ।
1965 के बाद पंचायतीराज व्यवस्था के पतन के कारण
- धन की कमी
- राजनीतिक चेतना की कमी
- आंतरिक मतभेद
- नियमित चुनाव प्रणाली का अभाव
- अधिकारों का विकेन्द्रीकरण नाममात्र का
| समितियाँ |
| जी रामचंद्रन समिति – 1966 में पंचायतीराज प्रशिक्षण केन्द्रों पर गठित समिति दया चौबे समिति – 1976 में सामुदायिक विकास एवं पंचायतीराज पर गठित समिति |
अशोक मेहता समिति (1977)
- गठन – दिसंबर 1977 में, जनता पार्टी की सरकार ने अशोक मेहता की अध्यक्षता में पंचायती राज संस्थाओं पर एक समिति को गठन किया।
- रिपोर्ट – अगस्त 1978 में
- उद्देश्य – देश में पतनोन्मुख पंचायती राज पद्धति को पुनर्जीवित और मजबूत करने हेतु 132 सिफारिशें कीं
- सिफारिशें –
- त्रिस्तरीय पंचायती राज पद्धति को द्विस्तरीय पद्धति में बदलना चाहिए। अर्थात् ग्राम पंचायत के स्थान पर मंडल पंचायते गठित की जाये।
- समिति ने जिला स्तर को सर्वाधिक महत्व दिया तथा इसे जनपद स्तर पर योजनाओं के निर्माण के लिए उत्तरदायी और कार्यकारी निकाय के रूप में माना ।
- ‘न्याय पंचायत’ को विकास पंचायत से अलग निकाय के रूप में रखा जाना चाहिए। एक योग्य न्यायाधीश द्वारा इनका सभापतित्व किया जाना चाहिए।
- पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता दी जानी चाहिए।
- जिला कलक्टर सहित सभी अधिकारी जिला परिषद के अधीन रखे जाये।
- संस्थाओं के चुनाव दलगत आधार पर करवाए जाये। पंचायतों के चुनावों में सभी स्तरों पर राजनीतिक दलों की आधिकारिक भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- पंचायतों में SC और ST समुदायों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित की जानी चाहिए।
- पंचायतों में महिलाओं के लिए एक तिहाई स्थान आरक्षित किए जाने चाहिए।
- पंचायती राज व्यवस्था में स्वयं सेवी संस्थाओं की भूमिका बढ़ाई जाये।
- पंचायतीराज संस्थाओं को करारोपण और अपने संसाधन जुटाने की शक्तियां प्रदान की जाएं।
- जिला स्तरीय एजेंसियों के माध्यम से पंचायतीराज संस्थाओं की नियमित सामाजिक लेखा परीक्षा कराई जाए।
- राज्य सरकारों को पंचायतीराज संस्थाओं के कार्यक्रमों में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना चाहिए।
- “पंचायतीराज वित्त निगम” की स्थापना का सुझाव दिया गया।
- पंचायतों के विघटन के बाद 6 महीने के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य होना चाहिए।
- पंचायतीराज संस्थाओं के चुनावों की जिम्मेदारी राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को सौंपी जाए, जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त से परामर्श करें।
- प्रत्येक राज्य में पंचायतीराज विभाग की स्थापना की जानी चाहिए।
- पंचायतीराज संस्थाओं के मामलों की निगरानी के लिए राज्य मंत्रिपरिषद में एक पंचायतीराज मंत्री की नियुक्ति होनी चाहिए।
संबंधित तथ्य
- जनता पार्टी सरकार के भंग होने के कारण केंद्रीय स्तर पर समिति की सिफारिशों पर कोई कार्यवाही नहीं हो सकी।
- कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश ने समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए पंचायतीराज संस्थाओं के पुनरुद्धार के लिए कदम उठाए।
- समिति ने 1959-1969 के समय को पंचायतीराज का उत्थान काल कहा।
- 1978 में संसद में पंचायतीराज से संबंधित एक निजी विधेयक प्रस्तुत किया गया।
दांतेवाला समिति (1978)
- दाँतेवाला समिति ब्लॉक योजना के लिए संस्थागत और वैचारिक ढांचे का सुझाव देने के लिए 1977 में भारत सरकार द्वारा नियुक्त एक समिति थी। समिति ने 1978 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
- दाँतेवाला समिति मुख्य रूप से ब्लॉक/खंड-स्तरीय योजना और ग्रामीण ऋण से संबंधित है।
- इसने सिफारिश की कि ब्लॉक/खंड-स्तर पर योजनाओं (नियोजन) का निर्माण भारत में ग्रामीण विकास की आधारशिला होनी चाहिए।
- इसने ग्रामीण गरीबों को ऋण प्रदान करने के लिए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRB) की स्थापना की भी सिफारिश की।
- गांव, जनपद और राष्ट्रीय स्तर की योजनाओं को आपस में जोड़कर एकीकृत करने पर बल दिया।
हनुमन्त राव कार्यकारी समूह (1984)
- 1984 में सी.एच. हनुमन्त राव की अध्यक्षता में जिला योजना के संबंध में कार्यकारी समूह का गठन।
- किसी मंत्री या कलेक्टर के अंतर्गत अलग से जिला योजना संस्था बनाने की अनुशंसा की।
- विकेन्द्रित योजना में कलेक्टर की महत्त्वपूर्ण भूमिका सुनिश्चित करने का सुझाव।
- नियोजन प्रक्रिया में पंचायतीराज संस्थाओं का सक्रिय सहयोग लेने की सिफारिश।
जी.वी.के. राव समिति(1985)
- 1985 में योजना आयोग ने ग्रामीण विकास और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के लिए मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा के लिए जी.वी.के. राव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। समिति ने रिपोर्ट 1986 में दी।
- इस समिति ने पाया कि पंचायतीराज व्यवस्था में नौकरशाही का प्रभाव बढ़ने से लोकतांत्रिक विकास प्रक्रिया कमजोर हो गई है। इसके परिणामस्वरूप, पंचायतीराज संस्थाओं को “बिना जड़ वाली घास” कहा गया।
- समिति ने पंचायती राज पद्धति को मजबूत और पुनर्जीवित करने हेतु कई महत्वपूर्ण सिफारिशें कीं, जो इस प्रकार थीं-
- पंचायतीराज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा दिया जाए ।
- पंचायतीराज को चार-स्तरीय बनाया जाए
- गाँव स्तर पर ग्राम सभा
- मण्डल स्तर पर मण्डल पंचायत
- जिला स्तर पर जिला परिषद्
- राज्य स्तर पर राज्य विकास परिषद् (जिसके अध्यक्ष मुख्यमंत्री हों)।
- जिला स्तरीय निकाय, अर्थात् जिला परिषद को लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया जाना चाहिये।
- जिला परिषद् के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में ‘जिला विकास आयुक्त ‘ के पद का सृजन किया जाना चाहिए।
- प्रभावी जिला नियोजन विकेंद्रीकरण के लिए राज्य स्तर के कुछ नियोजन कार्यों को जिला स्तर पर हस्तांतरित किया जाना चाहिए ।
- पंचायती राज संस्थानों में नियमित निर्वाचन होने चाहिए ।
- इसमें स्वयंसेवी संगठनों को विकेंद्रीकरण प्रक्रिया में भाग लेने पर जोर दिया गया।
- समिति ने विकेंद्रित क्षेत्रीय प्रशासन की अपनी योजना में पंचायती राज को स्थानीय आयोजना एवं विकास में प्रमुख भूमिका प्रदान की। यहाँ इसी बिन्दु पर जी.वी.के.राव समिति रिपोर्ट 1986, प्रखंड स्तरीय आयोजना पर दाँतवाला समिति, 1978 तथा जिला आयोजना पर हनुमंत राव समिति रिपोर्ट 1984 से अलग है।
- नोट
- इस समिति को कार्ड समिति के नाम से भी जाना जाता है ।
एल.एम. सिंघवी समिति(1986)
- 1986 में राजीव गांधी सरकार ने “लोकतंत्र व विकास के लिए पंचायती राज संस्थाओं का पुनरुद्धार’ पर एक अवधारणा पत्र तैयार करने के लिए एक समिति का गठन एल.एम. सिंहवी की अध्यक्षता में किया।
- सिफारिशें –
- पंचायतीराज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की जानी चाहिए।
- पंचायतीराज के नियमित, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए संवैधानिक प्रावधान किए जाने की सिफारिश की गई।
- गांवों के समूहों के लिए न्याय पंचायतों की स्थापना की जाए।
- ग्राम सभा को प्रत्यक्ष लोकतंत्र की इकाई के रूप में स्थापित किया जाए। इसने ग्राम सभा को प्रत्यक्ष लोकतंत्र की मूर्ति बताया ।
- पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव, विघटन और कार्यों से संबंधित विवादों के समाधान के लिए न्यायिक अभिकरणों का गठन किया जाए।
| संबंधित तथ्य |
| लक्ष्मीमल सिंघवी जोधपुर के प्रसिद्ध कानूनविद् थे।सिंघवी समिति की सिफारिश पर पंचायतीराज को संवैधानिक दर्जा दिया गया, जो 73वें संविधान संशोधन 1992 के तहत 24 अप्रैल 1993 को लागू हुआ।लोकपाल शब्द का प्रयोग सबसे पहले लक्ष्मीमल सिंघवी ने किया।18वां प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलनओडिशा सरकार के सहयोग से 08-10 जनवरी 2025 को भुवनेश्वर, ओडिशा में आयोजित किया गया। 2025 का विषय: “विकसित भारत में प्रवासी भारतीयों का योगदान” है।2003 से प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन हर साल आयोजित किए जाते रहे हैं, हालांकि 2015 से इसका प्रारूप संशोधित किया गया, और अब यह हर दो साल में एक बार मनाया जाता है।प्रथम प्रवासी भारतीय दिवस 7-9 जनवरी, 2003 को नई दिल्ली में मनाया गया। |
पी. के. थुंगन समिति(1988)
- 1988 में, संसद की सलाहकार समिति की एक उप-समिति पी. के. थुंगन की अध्यक्षता में राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे की जांच करने के उद्देश्य से गठित की गयी।
- इस समिति में पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए सुझाव दिया।
- अनुशंसाएं –
- पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्राप्त होनी चाहिए।
- पंचायती राज संस्थाओं का पांच वर्ष का निश्चित कार्यकाल होना चाहिए।
- एक संस्था के सुपर सत्र की अधिकतम अवधि छह माह होना चाहिए।
- पंचायती राज के तीन स्तरों पर जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण होना चाहिए।
- महिलाओं के लिए भी आरक्षण होना चाहिए।
- इसी समिति की अनुशंसा पर इन संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने हेतु विधेयक तैयार किये गये।
- 1989 में पंचायत राज संस्थाओं हेतु 64वाँ तथा नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा देने हेतु 65वाँ संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में लाये गये।
गाडगिल समिति (1988)
- 1988 में वी.एन गाडगिल की अध्यक्षता में एक नीति एवं कार्यक्रम समिति का गठन कांग्रेस पार्टी ने किया था।
- इस समिति से इस प्रश्न पर विचार करने के लिए कहा गया कि ”पंचायती राज संस्थाओं को प्रभावकारी कैसे बनाया जा सकता।’”
- अनुशंसाएँ –
- पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया जाये।
- पचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल पाँच वर्ष सुनिश्चित कर दिया जाये।
- अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा महिलाओं के लिए आरक्षण होना चाहिए।
- पंचायती राज संस्थाओं को कर लगाने, वसूलने तथा जमा करने का अधिकार होगा।
अन्य समितियाँ
- हनुमंत राव समिति (1983)
- हरलाल सिंह खर्रा समिति (1990)
संवैधानिकरण के प्रयास
- एम.एल. सिंघवी समिति व पी.के. थुंगन समिति की सिफारिशों के उपरान्त राजीव गांधी की सरकार ने स्थानीय व शहरी निकायों को संवैधानिक मान्यता देने हेतु जुलाई 1989 में क्रमशः 64वां व 65वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया।
- लोकसभा में पारित होने के बाद संघीय व्यवस्था में केन्द्र के बढ़ते दखल के मुद्दे पर यह राज्यसभा में पारित नहीं हो पाया।
- राजीव गांधी को आधुनिक पंचायतीराज का जनक कहा जाता है।
- फिर 1992 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की सरकार ने 73वां संविधान संशोधन कर पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया और यह 24 अप्रैल, 1993 से प्रभाव में आया। इस संशोधन के बाद राज्यों के लिए पंचायती राज संस्थाओं की स्थापना करना बाध्यता हो गई।
- 22 दिसम्बर, 1992 को यह विधेयक लोकसभा द्वारा पारित किया गया। 17 राज्यों द्वारा इसका अनुमोदन किया गया क्योंकि ‘ पंचायती राज सातवीं अनुसूची से सम्बन्धित विषय था जो कि संसद के विशेष बहुमत एवं आधे से अधिक राज्यों द्वारा अनुमोदित किया जाना था।
- संविधान संशोधन से पहले स्थानीय स्वशासन से संबंधित निम्न समस्याएँ थी-
- समय पर चुनाव नहीं होना।
- संस्थाओं के कार्य निर्धारित नहीं थे।
- धन का अभाव।
- राज्य सरकारों का अत्यधिक हस्तक्षेप।
73वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992
स्थानीय ग्रामीण स्वशासन
- प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने संसद में 73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया, जिसे लोकसभा और राज्यसभा ने क्रमशः 22-23 दिसंबर 1992 को पारित किया।
- 17 राज्यों की विधानसभाओं द्वारा अनुमोदन के बाद, 20 अप्रैल 1993 को राष्ट्रपति ने इसे स्वीकृति दी।
- अधिनियम 24 अप्रैल 1993 को प्रभाव में आया।
- इस अधिनियम के लिए जो संयुक्त प्रवर-समिति बनी उसके अध्यक्ष राजस्थान से सांसद श्री नाथूराम मिर्धा थे।
- केंद्र सरकार ने 2010 में हर वर्ष 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया ।
- 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संघीय व्यवस्था की तीसरी इकाई के रूप में संवैधानिक दर्जा दिया गया। राज्यों के लिए यही अनिवार्य था कि अधिनिमय लागू होने से अधिकतम 1 वर्ष के भीतर अधिनियम के अनुसार पंचायती राज संस्थाओं का गठन करना होगा।
- संविधान में यह स्पष्ट आरेखित है कि पंचायत राज संस्थाओं की स्थापना जनसंख्या के आधार पर की जायेगी। जनसंख्या का निर्धारण राज्य विधानमण्डल द्वारा किया जाता है।
- 73वें संविधान संशोधन के बाद, सबसे पहले पंचायती राज अधिनियम मई 1993 में कर्नाटक ने लागू किया।
- पहले पंचायती राज चुनाव मई-जून 1994 में मध्य प्रदेश में कराए गए।
पंचायतों से संबंधित प्रावधान
- भाग-4 (नीति-निदेशक तत्त्व) में अनुच्छेद 40 के अनुसार “राज्य ग्राम पंचायतों का स्थानीय स्वशासन की इकाइयों के रूप में विकास करेगा।”
- पंचायती राज अनुसूची-7 के अनुसार – “राज्य सूची” का विषय है। प्रविष्टी संख्या – 5 पर दर्ज है – स्थानीय स्वशासन
- भाग-9
- अनुच्छेद 243 – 243(O) (कुल अनुच्छेद – 16)
- अनुसूची – 11 वीं
- कुल विषय – 29
पंचायतों से संबंधित अनुच्छेद
| क्र.सं. | अनुच्छेद | विषय-वस्तु |
| 1 | 243 | परिभाषाएँ |
| 2 | 243 A | ग्राम सभा |
| 3 | 243 B | पंचायतों का गठन |
| 4 | 243 C | पंचायतों की संरचना |
| 5 | 243 D | स्थानों का आरक्षण |
| 6 | 243 E | पंचायतों की अवधि आदि |
| 7 | 243 F | सदस्यता के लिये निरर्हताएँ |
| 8 | 243 G | पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व |
| 9 | 243 H | पंचायतों द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्तियाँ और उनकी निधियाँ |
| 10 | 243 I | वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लियेवित्त आयोग का गठन |
| 11 | 243 J | पंचायतों के लेखाओं की संपरीक्षा |
| 12 | 243 K | पंचायतों के लिये निर्वाचन |
| 13 | 243 L | संघ-राज्य क्षेत्रोंं में लागू होना |
| 14 | 243 M | इस भाग का कतिपय क्षेत्रोंं पर लागू न होना |
| 15 | 243 N | विद्यमान विधियों और पंचायतों का बने रहना |
| 16 | 243 O | निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्ज़न |
11वीं अनुसूची में शामिल 29 विषय
| क्र.सं. | विषय |
| 1 | कृषि (कृषि विस्तार शामिल)। |
| 2 | भूमि विकास, भूमि सुधार कार्यान्वयन, चकबंदी और भूमि संरक्षण। |
| 3 | लघु सिंचाई, जल प्रबंधन और जल-विभाजक क्षेत्र का विकास। |
| 4 | पशुपालन, डेयरी उद्योग और कुक्कुट पालन। |
| 5 | मत्स्य उद्योग। |
| 6 | सामाजिक वानिकी और फार्म वानिकी। |
| 7 | लघु वन उपज। |
| 8 | लघु उद्योग जिसके अंतर्गत खाद्य प्रसंस्करण उद्योग भी शामिल हैं। |
| 9 | खादी, ग्राम उद्योग एवं कुटीर उद्योग। |
| 10 | ग्रामीण आवासन। |
| 11 | पेयजल। (गांवों में पानी की व्यवस्था) |
| 12 | ईंधन और चारा। |
| 13 | सड़कें, पुलिया, पुल, फेरी, जलमार्ग और अन्य संचार साधन। |
| 14 | ग्रामीण विद्युतीकरण, जिसके अंतर्गत विद्युत का वितरण शामिल है। |
| 15 | अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत। |
| 16 | गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम। |
| 17 | शिक्षा, जिसके अंतर्गत प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय भी हैं। |
| 18 | तकनीकी प्रशिक्षण और व्यावसायिक शिक्षा। |
| 19 | प्रौढ़ और अनौपचारिक शिक्षा। |
| 20 | पुस्तकालय।(हर पंचायत में पुस्तकालय होना चाहिए) |
| 21 | सांस्कृतिक क्रियाकलाप। |
| 22 | बाज़ार और मेले। |
| 23 | स्वास्थ्य और स्वच्छता (अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और औषधालय)। |
| 24 | परिवार कल्याण। |
| 25 | महिला और बाल विकास। |
| 26 | समाज कल्याण (दिव्यांग और मानसिक रूप से मंद व्यक्तियों का कल्याण)। |
| 27 | दुर्बल वर्गों का तथा विशिष्टतया अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का कल्याण। |
| 28 | सार्वजनिक वितरण प्रणाली। |
| 29 | सामुदायिक आस्तियों का अनुरक्षण। |
73वें संशोधन का प्रमुख प्रावधान
- इन्हें दो भागों में बाँटा जा सकता है।
- अनिवार्य प्रावधान
- ऐच्छिक प्रावधान
अनुच्छेद 243 : परिभाषाएँ
- ग्राम और ज़िला स्तरों के बीच के मध्यवर्ती स्तर का निर्धारण राज्य का राज्यपाल लोक अधिसूचना द्वारा मध्यवर्ती स्तर के रूप में विनिर्दिष्ठ करता है।
अनुच्छेद 243(A) : ग्राम सभा
- अनुच्छेद 243(A) के तहत् प्रत्यक्ष प्रजातंत्र की इकाई के रूप में ग्राम सभा की स्थापना का प्रावधान ।
- ग्राम सभा – सभी व्यस्क मतदाता जिनका नाम मतदाता सूची में उल्लिखित है, से मिलकर ग्राम सभा का गठन होगा।
- ग्राम पंचायत अपने कार्य हेतु ग्राम सभा के प्रति ज़िम्मेदार है ।
- ग्राम सभा दो कार्य करती है-
- ग्राम पंचायत द्वारा गत वर्ष किये गये कार्यों की जाँच करना।
- ग्राम सभा के इस कार्य को सामाजिक अंकेक्षण कहा जाता है।
- इसकी अध्यक्षता सरपंच के द्वारा की जाती है तथा इसकी बैठक बुलाने का अधिकार सरपंच के पास है।
- 73वें संविधान संशोधन में ग्राम सभा की वर्ष में दो बैठकें अनिवार्य थीं, लेकिन 1999 में इनकी संख्या बढ़ाकर 4 कर दी गई।
- वर्तमान समय में 01 वर्ष में कुल 4 बैठकें (26 जनवरी, 01 मई, 15 अगस्त, 2 अक्टूबर)
- संविधान के अनुसार, हर 6 महीने में कम से कम 1 बैठक अनिवार्य है।
- बैठक का समय, तिथि और स्थान का निर्धारण सरपंच करता है, और उसकी अनुपस्थिति में उपसरपंच यह कार्य करता है।
- यदि सरपंच व उपसरपंच दोनों अनुपस्थित हों, तो ग्राम सभा के सदस्य अध्यक्ष का चयन करते हैं।
- बैठक की सूचना आकस्मिक परिस्थितियों में 3 दिन पूर्व, जबकि सामान्य परिस्थितियों में 7 दिन पूर्व दी जाती है।
- राजस्थान में विशेष परिस्थितियों में 8 मार्च और 14 नवंबर को दो अतिरिक्त बैठकें बुलाई जा सकती हैं।
- ग्राम सभा में कोरम (गणपूर्ति) कुल सदस्यों का 1/10 निर्धारित है।
- ग्राम सभा को प्रत्यक्ष लोकतंत्र की प्रथम इकाई कहा जाता है।
- राजस्थान में पहली ग्राम सभा 1999 में मुहाना (जयपुर) में गठित की गई।
- राजस्थान में वार्ड सभा का गठन वर्ष 2002 में किया गया, और यह भारत का एकमात्र राज्य है जहाँ वार्ड सभा का उल्लेख है।
- ग्राम विकास की सभी योजनाओं का मूल्यांकन ग्राम सभा के द्वारा किया जाता है।
अनुच्छेद 243(B) : पंचायतों का गठन
- प्रत्येक राज्य में ग्राम, मध्यवर्ती और ज़िला स्तर पर पंचायतों का गठन किया जाएगा।
- मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का उस राज्य में गठन नहीं किया जा सकेगा जिसकी जनसंख्या 20 लाख से अधिक ना हो।
- अनुच्छेद 243(B) के तहत पंचायती राज को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है।
- संवैधानिक उपबन्धों के अनुसार भारत में पंचायती राज संस्थाएँ त्रिस्तरीय है न कि चार स्तरीय। पश्चिमी बंगाल में भी 1973 के बाद से त्रिस्तरीय है।
- पश्चिमी बंगाल में 1963-73 तक (10 वर्ष) ही चार स्तरीय थी, उसके बाद से अब तक त्रिस्तरीय।
- दिल्ली में अभी तक पंचायती राज व्यवस्था लागू नहीं हैं।
- मध्यवर्ती स्तर नहीं यानि सिर्फ द्वि-स्तरीय पंचायती राज तीन राज्यों गोवा, सिक्किम, मणिपुर, तथा तीन संघ शासित क्षेत्रों दादरा नगर हवेली व दमन द्वीप, पुड्डुचेरी तथा लक्षद्वीप में है।
- चार UT अण्डमान निकोबार, चण्डीगढ़, जम्मू-कश्मीर व लद्दाख में त्रिस्तरीय है।
- जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनिमय, 2019 के प्रवर्तन में आने से जम्मू-कश्मीर संघ एवं लहाख राज्य क्षेत्रों पर भाग 9 अनु. 243ठ) लागू होने से वहाँ भी अब पंचायतों के तीन स्तर होंगे।
- राज्यों एवं संघ राज्य क्षेत्रों में मध्यवर्ती/खण्ड स्तर पर पंचायतों के नाम:-
- पंचायत समिति : बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखण्ड, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, अण्डमान और निकोबार, चण्डीगढ़।
- आंचलिक समिति: असम
- जनपद पंचयात: छत्तीसगढ़
- तालुका पंचायत : गुजरात, कर्नाटक
- ब्लॉक विकास बोर्ड: जम्मू कश्मीर, लद्दाख
- क्षेत्र पंचायत: उत्तरप्रदेश, उत्तराखण्ड
- पंचायत युनियन कौंसिल तमिलनाडु
- जनपद समिति मध्यप्रदेश
अनुच्छेद 243(C) : पंचायतों की संरचना
- ग्राम पंचायत :-
- यह त्रिस्तरीय पंचायती राज का आधार है। यह सरपंच व वार्ड पंचों से मिलकर बनती है।
- बैठक – 15 दिन में एक बार होती है जिसका कोरम 1/3 होता है।
- उपसरपंच के चुनाव के लिए आयोजित बैठक ग्राम पंचायत की पहली बैठक होती है। इस चुनाव में सरपंच भी मत देता है तथा उसके मत का मूल्य 2 के बराबर माना जाता है।
- यह उल्लेखनीय है कि पंचायत समिति और जिला परिषद् के अध्यक्ष के निर्वाचन की पद्धति ( अप्रत्यक्ष पद्धति) का संविधान में ही उपबन्ध [ अनु. 243ग(5) (ख) ] है वहीं ग्राम पंचायत के अध्यक्ष की निर्वाचन की रीति का संविधान में उल्लेख नहीं है अपितु उसे राज्य के विधान मण्डल की विधि पर छोड़ दिया है । इन सभी पदों के लिए आवश्यक न्यूनतम आयु 21 वर्ष हैं।
- अविश्वास प्रस्ताव –
- उपसरपंच व सरपंच को इसके द्वारा हटाया जाता है।
- पहले दो वर्ष तक यह प्रस्ताव नहीं लाया जाता है।
- प्रस्ताव लाने हेतु 1/3 सदस्यों का समर्थन आवश्यक होता है।
- पारित करने हेतु न्यूनतम 3/4 समर्थन आवश्यक होता है।
- यदि प्रस्ताव असफल हो जाये तो 1 वर्ष तक वापस नहीं लाया जा सकता है तथा अंतिम एक वर्ष में नहीं लाया जाता है।
- पंचायत समिति-
- एक लाख की जनसंख्या पर इसका गठन होता है। इस जनसंख्या पर 15 वार्ड होते है।
- पंचायत समिति के निर्वाचित सदस्य अपने में से प्रधान व उपप्रधान का चुनाव करते है।
- जिला परिषद्-
- 10वीं अनुसूची के अंतर्गत दलबदल कानून यहाँ लागू नहीं होता है।
- किसी जिले की 4 लाख ग्रामीण जनसंख्या पर इसका गठन होता है। इस जनसंख्या पर 17 वार्ड होते है।
- 1 लाख अतिरिक्त जनसंख्या पर 2 अतिरिक्त वार्ड होते है।
- जिला परिषद् के निर्वाचित सदस्य अपने में से जिला प्रमुख व उपजिला प्रमुख का चुनाव करते है।
- सभी पदाधिकारियों को पीठासीन अधिकारी पद व गोपनीयता की शपथ दिलाते है।
- निर्वाचन के 30 दिन के भीतर उन्हें शपथ लेनी होती है अन्यथा स्थान रिक्त माना जाता है।
- ग्राम पंचायत के चुनाव को छोड़कर अन्य संस्थाओं के चुनाव दलीय आधार पर होते है।
अनुच्छेद 243(D) : स्थानों का आरक्षण
- अनु. जाति और अनु.जनजाति के वर्गों हेतु प्रत्येक स्तर पर जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण, जो बारी-बारी से आवर्तित (रोटेशन) होता रहता है। अरुणाचल प्रदेश में अनुसूचित जातियों’ के लिए आरक्षण नहीं है। इसे 83वें संविधान संशोधन 2000 द्वारा हटाया गया था।
- आरक्षित स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक तिहाई स्थान, यथास्थिति अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जन जातियों के लिए आरक्षित रहेंगे। अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान राज्यों की इच्छा पर छोड़ दिया गया।
- हालांकि संविधान संशोधन नहीं हुआ लेकिन 19 राज्य, राजस्थान सहित महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान कर चुके हैं।
- महिलाओं के लिए प्रारंभ में 1/3 (33%) आरक्षण था, जिसे राजस्थान में 2003 में बढ़ाकर 50% किया गया, और 2010 के चुनावों में लागू किया गया।
- OBC के लिए प्रारंभ में आरक्षण 15% था, जिसे 4 अक्टूबर 1999 को बढ़ाकर 21% कर दिया गया।
- प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या के कम से कम एक तिहाई स्थान (st/sc स्त्रियों के लिए आरक्षित स्थान शामिल) स्त्रियों के लिए आरक्षित रहेंगे।
- प्रत्येक स्तर पर पंचायतों में अध्यक्षों के पदों की कुल संख्या के कम से कम 1 तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित रहेंगे।
- राज्य द्वारा पिछड़े वर्ग को पंचायत में स्थानों के या पंचायतों के अध्यक्ष के पदों के लिए आरक्षण दिया जा सकता है।
- पंचायत राज संस्थाओं में अनुसूचित जाति व जनजाति को दिया गया आरक्षण अनुच्छेद 334 के अधीन लागू होगा। यह बात महिला आरक्षण पर लागू नहीं होगी।
- कोई राज्य विधानमण्डल महिला आरक्षण को 1/3 से अधिक करना चाहे तो कर सकता है।
अनुच्छेद 243(E) : पंचायतों की अवधि आदि
- पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल सामान्यत: 5 वर्ष होता है।
- कार्यकाल समाप्ति से पूर्व चुनाव आवश्यक है।
- कार्यकाल समाप्त होने से पहले पंचायत को भंग किया जा सकता है।
- भंग होने की स्थिति में 6 माह के भीतर नए चुनाव कराना अनिवार्य है।
- अगर कार्यकाल 6 माह से कम है तो चुनाव आवश्यक नहीं। पुनर्गठित पंचायत का कार्यकाल शेष अवधि के लिए, होता है ना कि पूरे 5 साल के लिए।
- पंचायतों से संबंधित अविश्वास प्रस्ताव कार्यकाल के दो वर्ष बाद लाया जा सकता है, जिसमें 1/3 सदस्यों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं, और प्रस्ताव पारित करने के लिए 3/4 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है।
- यदि अविश्वास प्रस्ताव एक बार अस्वीकृत हो जाए, तो अगले 1 वर्ष तक इसे पुनः नहीं लाया जा सकता।
- अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर चुनाव शेष कार्यकाल के लिए ही होंगे, जिन्हें 1 माह के भीतर करवाना अनिवार्य है।
अनुच्छेद 243(F) : सदस्यता के लिये निरर्हताएँ
- उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष होगी।
- अन्य सभी योग्यताओं का निर्धारण राज्य विधान मण्डल द्वारा किया जाएगा।
- स्थानीय नागरिक होना अनिवार्य।
- मतदाता सूची में नाम दर्ज होना चाहिए।
- न्यूनतम आयु 21 वर्ष होनी चाहिए।
- अयोग्यता के आधार पर सदस्यता समाप्त हो सकती है, यदि:
- लाभ का पद ग्रहण कर लिया हो।
- सरकारी पद पर कार्यरत हो।
- नैतिक रूप से अयोग्य हो या किसी कारणवश पद से हटाया गया हो।
- मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम हो।
- 1995 के बाद, यदि किसी सदस्य के दो से अधिक संतान हैं, तो उसकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है।
- पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा-19 के तहत वसुंधरा राजे सरकार ने शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य की थी, जिसे 2018 में राज्य सरकार ने समाप्त कर दिया।
अनुच्छेद 243(G) : पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व
- पंचायतें आर्थिक और सामाजिक न्याय से जुड़े कार्यक्रम बनाकर उनका क्रियान्वयन करती हैं।
- 11वीं अनुसूची के अंतर्गत पंचायतों को 29 विषयों पर कानून बनाने की शक्ति दी गई।
- 2010 तक इनमें से 21 विषय पंचायतों को हस्तांतरित किए जा चुके थे।
अनुच्छेद 243(H) : पंचायतों द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्तियाँ और उनकी निधियाँ
- जो कर राज्य सरकार द्वारा लगाये जायेगें उनका राज्य सरकार व पंचायती राज इकाइयों के मध्य वितरण किया जा सकेगा और जो कर पंचायती राज संस्थाऐं आरोपित करेंगी उन्हें न केवल एकत्र कर सकेंगी अपितु उनका व्यय भी अपने स्तर पर कर सकेंगी।
अनुच्छेद 243(I) : वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लिये वित्त आयोग का गठन
- राज्यपाल द्वारा प्रत्येक 5 वर्ष में राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाएगा।
- राज्य वित्त आयोग पंचायतों को करों, राज्य संचित निधि से सहायता तथा वित्तीय सुदृढ़ीकरण के संबंध में राज्यपाल को रिपोर्ट देगा।
- राज्य वित्त आयोग संवैधानिक निकाय है।
- संविधान में इसकी सदस्य संख्या उल्लेखित नहीं है।
- अनुच्छेद 243 Y के तहत यहीं आयोग नगरपालिकाओं के संदर्भ में यह सब कार्य करता है।
- राजस्थान में अब तक 5 बार वित्त आयोग बन चुका है।
अनुच्छेद 243(J) : पंचायतों के लेखाओं की संपरीक्षा
- राज्य विधानमण्डल विधि बनाकर पंचायतों के लेखों खातों की देखभाल व परीक्षण के लिए उपबंध कर सकती है।
अनुच्छेद 243(K) : पंचायतों के लिये निर्वाचन राज्य निर्वाचन आयोग
- पंचायतों के चुनाव करवाने हेतु राज्यपाल द्वारा राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना की जायेगी।
- यह आयोग निर्वाचन नामावली तैयार करेगा तथा चुनाव सम्पन्न करवायेगा।
- निर्वाचक नामावली तैयार कराने का और पंचायतों के निर्वाचनों के संचालन, अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण इस राज्य निर्वाचन आयोग में निहित होगा।
- यह एक सदस्यीय आयोग है जिसका मुखिया राज्य निर्वाचन आयुक्त कहलाता है।
- राजस्थान में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी को इस पर नियुक्त किया जाता है। इस हेतु उन्हें राज्य सरकार में 5 वर्ष का सचिव के पद का अनुभव होना चाहिए।
- इनका कार्यकाल 5 वर्ष तथा सेवानिवृत्ति आयु 65 वर्ष है।
अनुच्छेद 243(L) : संघ-राज्य क्षेत्रोंं में लागू होना
- इस संबंध में राष्ट्रपति निर्देश दे सकता है।
- भारत का राष्ट्रपति किसी भी संघ राज्य क्षेत्र अपवादों अथवा संशोधनों के साथ लागू करने के लिए निर्देश दे सकता है।
अनुच्छेद 243(M) : इस भाग का कतिपय क्षेत्रोंं पर लागू न होना
- भाग-9 के प्रावधान निम्न राज्यों व क्षेत्रों में लागू नहीं होते।
- नागालैण्ड, मेघालय, मिजोरम राज्य में।
- मणिपुर के पर्वतीय क्षेत्रों में।
- पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के पर्वतीय क्षेत्र, जहाँ दार्जिलिंग गोरखा हिल परिषद् कार्यरत हैं।
- 244(1) में वर्णित अनुसूचित क्षेत्रों व जनजाति क्षेत्रों मे लेकिन संसद, अधिनियम बनाकर 244 में वर्णित इन क्षेत्रों में पंचायती राज को लागू कर सकती है।
- 5 वीं अनुसूची तथा अनुच्छेद-244( 1) में 10 राज्यों में अनुसूचित क्षेत्र है – महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, मध्यप्रदेश, तेलंगाना,ओडिशा, हिमाचल प्रदेश ,गुजरात
- Note:
- 1994 में अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज लागू करने हेतु “दलीप सिंह भूरिया समिति” का गठन किया गया।
- 244(1) का संबंध अनुसूचि 5 (10 राज्य) व 244(2) का संबंध अनुसूचि 6 (असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम) से है।
पेसा अधिनियम, 1996
- 1994 में अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज लागू करने हेतु ‘दिलीप सिंह भूरिया समिति’ का गठन किया गया।
- भूरिया समिति की सिफारिश पर ‘ पंचायती राज अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार अधिनियम’ – 1996 में बनाया गया।
- ‘भूरिया समिति’ की सिफारिशों के आधार पर संसद में वर्ष 1996 में ‘पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रोंं का विस्तार) विधेयक’ प्रस्तुत किया गया। दिसंबर 1996 में दोनों सदनों से पारित होने के उपरांत 24 दिसंबर को राष्ट्रपति की सहमति के पश्चात् ‘पेसा अधिनियम’ अस्तित्व में आया।
- इसे पेसा (PESA- Panchyati raj Extention in (Scheduled Area) कहा जाता है। पेसा अधिनियम (PESA Act) पहले 9 राज्यों, फिर तेलंगाना निर्माण के बाद से 10 राज्यों में लागू है।
- राज्यों में पेसा अधिनियम के तहत् संस्थागत व नियम समरुपता के लिए संघीय पंचायती राज मंत्रालय ने 2006 में बी.डी. शर्मा की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। पेसा अधिनियम के तहत् रीति-रिवाजों, परम्पराओं व सामुदायिक संसाधनों के प्रबंध के लिए ग्रामसभा को विशिष्ट शक्तियाँ दी गई हैं।
- पेसा अधिनियम के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
- संविधान के भाग 9 के पंचायतों से जुड़े प्रावधानों को जरूरी संशोधन के साथ अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तारित करना।
- जनजातीय जनसंख्या को स्वशासन प्रदान करना।
- जनजातीय समुदायों की परम्पराओं एवं रिवाजों की सुरक्षा तथा संरक्षण करना।
- किसी क्षेत्र को संविधान की पांचवी अनुसूची के तहत् अनुसूचित क्षेत्र घोषित करने की शक्ति राष्ट्रपति को है। राष्ट्रपति ऐसा आदेश सम्बन्धित राज्य के राजयपाल से परामर्श करके समय-समय पर ऐसे आदेश जारी करता है।
- राजस्थान के आठ जिलें (बांसवाड़ा, डूंगरपुर एवं प्रतापगढ़ सम्पूर्ण जिले, पाली, उदयपुर, राजसमन्द, चित्तौड़गढ़ और सिरोही आंशिक रूप से) के 5697 गांव हैं, जिनमें 50 प्रतिशत से ज्यादा अनुसूचित जनजाति की आबादी के कारण अनुसूचित क्षेत्र घोषित किए गए है।
- राजस्थान में निम्नलिखित जनजातियां प्रमुख रूप से पाई जाती हैं:
- मीणा (जयपुर, उदयपुर)
- भील (उदयपुर)
- कंजर (कोटा)
- सहरिया (बारां)
- डामोर (डूंगरपुर)
- कधौड़ी (झाड़ोल, उदयपुर)
- गरासिया (सिरोही)
ग्राम सभा
- अन्धविश्वास (Superstiton) और भूतसिद्धि (Sorcery), जादू (Magic) आदि पर चर्चा राजस्थान पेसा नियम (2011) में यह प्रावधान किया गया है कि अन्धविश्वास, भूतसिद्धि और जादू सम्बन्धी मामलों पर ग्राम सभा की खुली बैठक में विचार विमर्श किया जाएगा।
- राजस्थान में PESA अधिनियम के तहत ग्राम सभाओं को 20 सदस्यों की शांति समिति बनाने का अधिकार दिया गया है।
- अनुच्छेद 243(N) : विद्यमान विधियों और पंचायतों का बने रहना
- अनुच्छेद 243(O) : निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्ज़न
- न्यायालय पंचायतों के निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन, उन क्षेत्रों में सीट आवंटन आदि में दखलअंदाजी नहीं कर सकता।
|
स्तर |
निम्न स्तर (ग्राम पंचायत) |
मध्यम स्तर (पंचायत समिति) |
उच्च स्तर (जिला परिषद) |
|
कुल संख्या |
11,341 |
352 |
33 |
|
प्रशासनिक अधिकारी |
ग्राम विकास अधिकारी (VDO) |
खंड विकास अधिकारी (BDO) |
मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) |
|
राजनीतिक अधिकारी |
सरपंच |
प्रधान |
जिला प्रमुख |
|
निर्वाचन प्रक्रिया |
|
|
|
|
आयु सीमा |
21 वर्ष |
21 वर्ष |
21 वर्ष |
|
गणपूर्ति |
1/10 |
1/10 |
1/10 |
राजस्थान पंचायती राज प्रणाली – शपथ, त्यागपत्र, बैठक और निर्वाचित सदस्य संख्या
| शपथ ग्रहण प्रक्रिया | |
| स्तर | शपथ ग्रहण कराने वाला अधिकारी |
| ग्राम पंचायत | वार्ड पंच, उपसरपंच, सरपंच को पीठासीन अधिकारी शपथ दिलाता है। |
| पंचायत समिति | पंचायत समिति सदस्यों को पीठासीन अधिकारी शपथ दिलाता है।प्रधान व उपप्रधान को उपखंड अधिकारी शपथ दिलाता है। |
| जिला परिषद | जिला परिषद सदस्यों को पीठासीन अधिकारी शपथ दिलाता है।जिला प्रमुख और उप जिला प्रमुख को जिला कलेक्टर शपथ दिलाता है। |
| त्यागपत्र प्रक्रिया | |
| पद | त्यागपत्र सौंपने वाला अधिकारी |
| वार्ड पंच, उपसरपंच, सरपंच | खंड विकास अधिकारी (BDO) |
| पंचायत समिति सदस्य, उपप्रधान | प्रधान |
| प्रधान | जिला प्रमुख |
| जिला परिषद सदस्य, उप जिला प्रमुख | जिला प्रमुख |
| जिला प्रमुख | संभागीय आयुक्त |
| बैठक आयोजित करने की न्यूनतम अवधि | |
| स्तर | बैठक की न्यूनतम आवश्यकता |
| ग्राम पंचायत | 15 दिन में कम से कम 1 बैठक अनिवार्य |
| पंचायत समिति | 1 माह में कम से कम 1 बैठक अनिवार्य |
| जिला परिषद | 3 माह में कम से कम 1 बैठक अनिवार्य |
| निर्वाचित सदस्यों की संख्या | ||
| स्तर | न्यूनतम सदस्य संख्या | अतिरिक्त सदस्य चयन प्रक्रिया |
| ग्राम पंचायत | 1 पंच (3000 की आबादी तक) | प्रति 1000 की वृद्धि पर 2 अतिरिक्त वार्ड पंच |
| पंचायत समिति | 15 सदस्य (1 लाख की आबादी तक) | 1 लाख से अधिक होने पर प्रत्येक 15,000 की वृद्धि पर 2 अतिरिक्त सदस्य |
| जिला परिषद | 17 सदस्य (4 लाख की आबादी तक) | 4 लाख से अधिक होने पर प्रत्येक 1 लाख की वृद्धि पर 2 अतिरिक्त सदस्य |
| पदेन सदस्य | |
| स्तर | पदेन सदस्य |
| ग्राम पंचायत | ग्राम विकास अधिकारी (VDO), संबंधित पंचायत समिति व जिला परिषद सदस्य |
| पंचायत समिति | खंड विकास अधिकारी (BDO), संबंधित क्षेत्र के विधायक, सांसद, जिला परिषद सदस्य, पंचायत समिति में आने वाले सभी ग्राम पंचायतों के सरपंच, विधायक द्वारा मनोनीत व्यक्ति |
| जिला परिषद | मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO), जिले के सभी सांसद (लोकसभा व राज्यसभा), सभी विधायक (विधानसभा व विधान परिषद), जिले के सभी प्रधान, सांसद द्वारा मनोनीत सदस्य, जिला कलेक्टर |
| वेतन विवरण | |
| पद | वेतन (रु.) |
| सरपंच | 4,800 |
| प्रधान | 8,400 |
| जिला प्रमुख | 12,000 |
- नोट: वित्तीय वर्ष 2022-23 के बजट में सरपंच, प्रधान और जिला प्रमुख के वेतन में 20% वृद्धि की घोषणा की गई थी।
ऐच्छिक प्रावधान
- 73वें संशोधन अधिनियम के कुछ प्रावधानों को लागू करना या न करना, राज्यों की इच्छा पर छोड़ा गया। वे प्रावधान हैं-
- पंचायती राज संस्थाओं का नामकरण।
- M.P. व M.L.A. वगैरा को पंचायती राज संस्थाओं में प्रतिनिधित्व देना।
- पिछड़े वर्गों (OBC) को आरक्षण।
- पंचायती राज संस्थाओं विभिन्न शक्तियाँ, कार्य व वित्तीय अधिकार आदि देना।
- कार्य –
- अनुच्छेद 243A के तहत इन संस्थाओं के लिए 29 कार्य निर्धारित किये गये हैं। इन 29 कार्यों का तालेख 11वीं अनुसूची में है।
- इन 29 कार्यों में से कितने कार्य पंचायत राज संस्थाओं को देने है यह राज्य विधानमण्डल पर छोड़ा गया है।
- राजस्थान में इन 29 में से 23 कार्य इन संस्थाओं को दिये जा चुके है।
- अनुच्छेद 243H के तहत राज्य विधानमण्डल इन संस्थाओं को कर लगाने की भी शक्ति दे सकता है।
- 73वें संशोधन के द्वारा निम्न मामलों में जिम्मेदारी राज्य विधानमण्डल पर छोड़ी गई है-
- जनसंख्या का निर्धारण करना
- ग्राम सभा के कार्यों का निर्धारण करना
- सरपंच के चुनाव की प्रक्रिया
- अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का आरक्षण
- 21 वर्ष की आयु को छोड़कर अन्य योग्यताओं का निर्धारण
- 11वीं अनुसूची में उल्लेखित कार्यों को देना
- महिलाओं को 1/3 से अधिक आरक्षण देना
- अंकेक्षण।
- दिल्ली में अभी तक पंचायती राज व्यवस्था लागू नहीं हैं।
राज्यों एवं संघ राज्य क्षेत्रों में पंचायतों के नाम
- गुजरात
- ग्राम पंचायत
- तालुका पंचाय
- जिला पंचायत
- हरियाणा
- ग्राम पंचायत
- पंचायत समिति
- जिला परिषद्
- मध्य प्रदेश
- ग्राम पंचायत
- प्रखंड पंचायत
- जिला पंचायत
- तमिलनाडु
- ग्राम पंचायत
- पंचायत संघ
- जिला पंचायत
- उत्तर प्रदेश
- ग्राम पंचायत
- क्षेत्र पंचायत
- जिला पंचायत
- उत्तराखंड
- ग्राम पंचायत
- मध्यवर्ती पंचायत
- जिला पंचायत
- पश्चिम बंगाल
- ग्राम पंचायत
- पंचायत समिति
- जिला परिषद्
- कर्नाटक
- ग्राम पंचायत
- तालुका पंचायत
- जिला पंचायत
स्वायत्त जिला परिषद (एडीसी)
- स्वायत्त जिला परिषदों (एडीसी) के बारे में
- एडीसी स्थानीय स्वशासन निकाय हैं जिनकी स्थापना भारत के कुछ क्षेत्रों, मुख्यतः पूर्वोत्तर राज्यों में जनजातीय समुदायों के अधिकारों और स्वायत्तता की रक्षा के लिए की गई है
- वे विशिष्ट जनजातीय बहुल क्षेत्रों पर शासन करने, रीति-रिवाजों, परंपराओं और जनजातीय हितों के संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार हैं।
- भारत के संविधान की छठी अनुसूची के अधीन वर्तमान में 10 (दस) स्वायत्त परिषदों/स्वायत्त जिला परिषदों (एडीसी) का गठन किया गया है। राज्य-वार (ADC) निम्नानुसार हैं:-
- असम
- कार्बी आंगलांग स्वायत्त परिषद
- नॉर्थ काचर हिल्स स्वायत्त परिषद
- बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद
- असम
- मेघालय
- खासी हिल्स स्वायत्त जिला परिषद
- जयतिया हिल्स स्वायत्त जिला परिषद
- गारो हिल्स स्वायत्त जिला परिषद
- त्रिपुरा
- त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद
- मिजोरम
- लाई स्वायत्त जिला परिषद
- मारा स्वायत्त जिला परिषद
- चकमा स्वायत्त जिला परिषद
- मणिपुर में एडीसी का विकास:
- मणिपुर में एडीसी का विकास भारत के संविधान की छठीं अनुसूची के अनुसार ना होकर 1971 में संसद के एक अधिनियम मणिपुर (पहाड़ी क्षेत्र) जिला परिषद अधिनियम, 1971के तहत की गई है।
- चंदेल एडीसी
- चुआचांदपुर एडीसी
- सदर हिल एडीसी, कांगपोकपी
- मणिपुर उत्तर एडीसी, सेनापत
- तामेंगलांग एडीसी
- उखरुल एडीसी
पंचायती राज से संबंधित विभिन्न दल एवं समितियाँ
- न्याय पंचायतों पर अध्ययन दल (1962) – जी.आर. राजगोपाल
- पंचायती राज आंदोलन में ग्राम सभा की स्थिति पर अध्ययन (1963) – आर.आर. दिवाकर
- पंचायत राज संस्थाओं की बजट एवं लेखा प्रक्रिया पर अध्ययन दल(1963) – एम.रामाकृष्णैयूया
- पंचायती राज वित्त पर अध्ययन दल (1963) – के. संथानम
- पंचायती राज चुनाव पर गठित समिति (1965) – के. संथानम
- सामुदायिक विकास एवं पंचायती राज पर गठित समिति (1976) – श्रीमती दया चौबे
छावनी मण्डल / परिषद
- छावनी क्षेत्र में सिविल जनसंख्या के प्रशासन के लिए छावनी परिषद की स्थापना की जाती है।
- यह केंद्रीय सरकार के रक्षा मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन कार्य करता है।
- यह ब्रिटिश शासनकाल में 1924 छावनी मण्डल अधिनियम के द्वारा स्थापित है।
- 2006 के छावनी अधिनियम द्वारा छावनी अधिनियम 1924 को निरस्त कर दिया गया।
- छावनी मण्डलों का गठन संविधान की सातवीं अनुसूची में संघीय सूची की तीसरी प्रविष्टि में है।
- इसे संवैधानिक स्तर प्राप्त नहीं है।
- छावनियां सेना स्टेशनों से बिल्कुल भिन्न हैं। सेना स्टेशन पूरी तरह से सशस्त्र बलों के प्रयोग तथा आवास के लिए हैं तथा इन्हें एक कार्यकारी आदेश के अंतर्गत स्थापित किया गया है। जबकि छावनियां ऐसे क्षेत्र हैं जहां सेना तथा सिविल आबादी दोनों का अस्तित्व है।
- एक छावनी परिषद में आंशिक रूप से निर्वाचित या नामित सदस्य शामिल होते हैं।
- निर्वाचित सदस्य 3 वर्ष की अवधि के लिए, जबकि नामित सदस्य (पदेन सदस्य) उस स्थान पर लंबे समय तक रहते है ।
- छावनी मण्डल में आधे सदस्य सेना के अधिकारी तथा आधे सदस्य असैनिक नागरिक होते है, जिनका निर्वाचन होता है।
- छावनी मण्डल का अध्यक्ष सैनिक छावनी का सर्वोच्च अधिकारी होता है और सभा की अध्यक्षता करता है। उप सभापति असैनिक नागरिकों में से लिया जाता है।
- परिषद के उपाध्यक्ष का चुनाव उन्हीं में से निर्वाचित सदस्यों द्वारा 3 वर्ष की अवधि के लिए होता है।
- निर्वाचित असैनिक सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष होता है। सैनिक अधिकारियों का कार्यकाल उनके उस छावनी में पद पर बने रहने तक होता है।
- छावनी परिषद के कार्यकारी अधिकारी की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा होती है।
- वर्तमान में भारत में लगभग 62 छावनी मण्डल हैं।
- राजस्थान में छावनी मण्डल नसीराबाद, जिला अजमेर में है। इसकी स्थापना वर्ष 1818 में हुई थी।
- न्यास पत्तन:
- न्यास पत्तन की स्थापना बंदरगाह क्षेत्रों जैसे-मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और अन्य में मुख्य रूप से दो उद्देश्यों के लिए की जाती है:
- बंदरगाहों की सुरक्षा व व्यवस्था ।
- नागरिक सुविधाएं प्रदान करना।
- न्यास पत्तन की स्थापना बंदरगाह क्षेत्रों जैसे-मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और अन्य में मुख्य रूप से दो उद्देश्यों के लिए की जाती है:
- न्यास पत्तन का गठन संसद के एक अधिनियम द्वारा किया गया है। इसमें निर्वाचित और गैर-निर्वाचित दोनों प्रकार के सदस्य सम्मिलित हैं।
74वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992
- भारत में शहरी स्थानीय स्वशासन का विकास
| ऐतिहासिक पृष्ठभूमि | |
| वर्ष | घटना |
| 29 सितंबर 1687 | भारत में प्रथम नगर निगम मद्रास में स्थापित किया गया। |
| 1793 चार्टर एक्ट | चार्टर एक्ट के माध्यम से बंबई, मद्रास और कोलकाता में नगर निगम स्थापित किए गए। |
| 1864 | राजस्थान में प्रथम नगरपालिका माउंट आबू में स्थापित की गई। |
| 1866 में अजमेर, 1867 ब्यावर (प्रथम निर्वाचित) तथा 1868 में जयपुर में नगर पालिका का गठन हुआ। | |
| 1919 | भारत शासन अधिनियम के तहत शहरी निकायों का प्रस्ताव पारित किया गया। |
| 1935 | शहरी स्थानीय स्वशासन को राज्य सूची का विषय बनाया गया, जो वर्तमान में भी लागू है। |
| स्वतंत्रता के बाद शहरी स्थानीय स्वशासन में सुधार | ||
| संविधान संशोधन | वर्ष | महत्वपूर्ण घटनाएँ |
| 65वाँ संशोधन | 1989 | राजीव गांधी सरकार द्वारा शहरी स्थानीय स्वशासन को संवैधानिक दर्जा देने का प्रयास, लेकिन लोकसभा से पारित होने के बाद राज्यसभा में पारित नहीं हो सका। |
| 74वाँ संविधान संशोधन | 1992 | प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव द्वारा शहरी स्थानीय स्वशासन को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया। |
| लोकसभा एवं राज्यसभा में पारित | दिसंबर 1992 | संविधान संशोधन को मंजूरी मिली। |
| राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर | 20 अप्रैल 1993 | विधेयक को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुई। |
| देशभर में प्रभावी | 1 जून 1993 | शहरी स्थानीय स्वशासन पूरे भारत में लागू हुआ। |
| राजस्थान में लागू | 1 अगस्त 1994 | राजस्थान में शहरी स्थानीय स्वशासन प्रभावी हुआ। |
- भारत में 8 प्रकार की शहरी स्वशासन प्रणाली पाई जाती है।
- नगर निगम (Municipal Corporation)
- नगर परिषद / नगरपालिका (Municipal Council)
- अधिसूचित क्षेत्र समिति (Notified Area Committee)
- नगरीय क्षेत्र समिति (Town Area Committee)
- छावनी मंडल (Cantonment Board)
- टाउनशिप (Township)
- बंदरगाह न्यास (Port Trust)
- विशेष / एकल उद्देश्य अभिकरण (Special Purpose Agency)
- स्थानीय नगरीय स्वशासन से संबंधित प्रावधान
- शहरी स्थानीय शासन राज्य सूची का विषय है।
- भाग- 9(क)
- अनुच्छेद 243 P – 243 ZG (18 अनुच्छेद )
- अनुसूची – 12 वीं
- कुल विषय – 18
नगरीय स्वशासन से संबंधित अनुच्छेद
| क्र.सं. | अनुच्छेद | विषय-वस्तु |
| 1 | 243 P | परिभाषा |
| 2 | 243 Q | नगरपालिकाओं का गठन |
| 3 | 243 R | नगर निकायों की संरचना |
| 4 | 243 S | वार्ड समितियों का गठन व संरचना |
| 5 | 243 T | स्थानों का आरक्षण |
| 6 | 243 U | नगरपालिका की अवधि |
| 7 | 243 V | सदस्यता के लिए आयोग्यता |
| 8 | 243 W | नगर निकायों की शक्तियां और दायित्व |
| 9 | 243 X | कर लगाने व कोष एकत्र करने की शक्तियां |
| 10 | 243 Y | वित्त आयोग का गठन |
| 11 | 243 Z | नगरपालिकाओं के लेखा का अंकेक्षण |
| 12 | 243 ZA | नगरपालिकाओं का चुनाव |
| 13 | 243 ZB | संघ शासित प्रदेशों में लागू |
| 14 | 243 ZC | कतिपय क्षेत्रों में इस भाग का लागू नहीं होना |
| 15 | 243 ZD | जिला योजना के लिए समिति |
| 16 | 243 ZE | महानगर योजना के लिए समिति |
| 17 | 243 ZF | नगरपालिकाएं तथा विद्यमान कानूनों का जारी रहना |
| 18 | 243 ZG | चुनावी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक |
