राजस्थान पंचायती राज प्रणाली: अधिनियम, चुनाव एवं संस्थाएँ
राजस्थान पंचायती राज प्रणाली: अधिनियम, चुनाव एवं संस्थाएँराजस्थान की राजनीति का एक महत्वपूर्ण विषय है, जो ग्रामीण स्वशासन की संरचना, विधिक आधार और संस्थागत व्यवस्था को स्पष्ट करता है। इसमें पंचायती राज अधिनियम, चुनाव प्रक्रिया तथा विभिन्न स्तरों पर कार्यरत संस्थाओं की भूमिका का अध्ययन किया जाता है। यह विषय विकेंद्रीकरण, जनभागीदारी और ग्रामीण प्रशासन को समझने में सहायक है।
राजस्थान पंचायती राज संस्थाएं एवं स्थानीय स्वशासन
भारत में ब्रिटिश शासनकाल में लॉर्ड रिपन को भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक माना जाता है। वर्ष 1882 में उन्होंने स्थानीय स्वशासन सम्बंधी प्रस्ताव दिया।
1919 के भारत शासन अधिनियम के तहत प्रान्तों में दोहरे शासन की व्यवस्था की गई तथा स्थानीय स्वशासन को हस्तान्तरित विषयों की सूची में रखा गया।
राजस्थान के नागौर जिले में 2 अक्टूबर, 1959 को पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई।
73वें संविधान संशोधन अधिनियम 1992 द्वारा पंचायती राज शासन को संवैधानिक संस्थाओं का स्तर प्रदान किया गया
74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा नगरीय स्थानीय शासन को संवैधानिक दर्जा दिया गया है।
पंचायती राज संस्थाओं को संविधान की 11वीं अनुसूची में वर्णित 29 विषय दिये गये है।
राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994
प्रवर्तन:
23 अप्रैल 1994 को लागू किया गया, 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के बाद।
नोट: 24 अप्रैल, 1993 को 73वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 सम्पूर्ण भारत में लागू हुआ। इस कारण से 24 अप्रैल को पंचायत राज दिवस के रूप में मनाया जाता है।
प्रमुख संशोधन:
सितंबर 1994: अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) हेतु आरक्षण की व्यवस्था।
दिसंबर 1994: जन प्रतिनिधियों के लिए 2 से अधिक संतान न होने का प्रावधान।
दिव्यांग संतान की स्थिति में 2018 से शिथिलता।
2008: पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण 50% किया गया।
ग्राम पंचायत
न्यूनतम पंच-9
तीन हजार से अधिक जनसंख्या पर प्रति एक हजार या उसके किसी भाग के लिए 2 अतिरिक्त पंच
निर्वाचित सदस्यों द्वारा त्यागपत्र विकास अधिकारी (BDO) को
पंचायत समिति –
प्रधान, उपप्रधान व सदस्य
निर्वाचित सदस्य
पदेन सदस्य
(i) सभी पंचायतों के सरपंच
(ii) सम्बन्धित क्षेत्र के राज्य विधान सभा सदस्य
न्यूनतम -15
01 लाख से अधिक जनसंख्या होने पर। प्रत्येक अतिरिक्त 15 हजार या उसके भाग के लिए 2 अतिरिक्त सदस्य निर्वाचित सदस्यों द्वारा त्यागपत्र प्रधान को
जिला परिषद्-
जिला प्रमुख, उप जिला प्रमुख व सदस्य
निर्वाचित सदस्य
देन सदस्य
(i) जिले के सभी पंचायत समितियों के प्रधान
(ii) जिले की सभी लोकसभा के सदस्य, राज्य सभा सदस्य व
विधानसभा सदस्य
न्यूनतम 17
4 लाख से अधिक जनसंख्या हीने पर। प्रत्येक अतिरिक्त 1 लाख या उसके भाग के लिए 2 अतिरिक्त सदस्य
निर्वाचित सदस्यों द्वारा त्यागपत्र जिला प्रमुख को
त्यागपत्र की प्रक्रिया:
अध्यक्ष:
सरपंच: विकास अधिकारी को।
प्रधान: जिला प्रमुख को।
जिला प्रमुख: संभागीय आयुक्त को।
उपाध्यक्ष:
उपसरपंच: विकास अधिकारी को।
उपप्रधान: प्रधान को।
उपजिला प्रमुख: जिला प्रमुख को।
सदस्यता संबंधित नियम:
कोई व्यक्ति दो पंचायती राज संस्थाओं का सदस्य नहीं हो सकता।
14 दिनों के भीतर उस संस्था को सूचित करना अनिवार्य है जिसमें सेवा देना चाहता है।
2009: एक से अधिक स्थानों से चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाया गया।
राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 की प्रमुख विशेषताएं:
राजस्थान पंचायतीराज अधिनियम, 1994 सम्पूर्ण राज्य में 23 अप्रैल 1994 से लागू हुआ
ग्राम पंचायत की माह में दो बार बैठक होती है।
कार्यकाल – 05 वर्ष
भंग होने पर 6 माह के अंदर ही पुनः चुनाव करवाना अनिवार्य है।
यदि भंग की हुई संस्था का कार्यकाल निर्धारित कार्यकाल से 06 महीने से कम रह गया है तो चुनाव करवाये जाने आवश्यक नहीं होगें।
किसी पंचायती राज इकाई के भंग हो जाने के पश्चात नई पंचायती राज इकाई, उस शेष अवधि के लिए ही कार्य करेगी जितनी अवधि के लिए वह इकाई कार्य करती, यदि वह भंग नहीं होती।
कोई भी व्यक्ति, राजस्थान पंचायती राज अधिनियम द्वारा अभिव्यक्ततः प्राधिकृत के सिवाय दो या अधिक पंचायती राज संस्थाओं का सदस्य नहीं होगा।
सचिव, ग्राम पंचायत या ग्रामसेवक को पंचायत सलाहकार समिति का अध्यक्ष बनाया गया है।
राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 की महत्वपूर्ण धाराएं
धारा – 88:- अभिलेखों की माँग का अधिकार
धारा – 89:- राजस्थान पंचायत समिति और ज़िला परिषद सेवा के गठन का प्रावधान
ग्राम विकास अधिकारी का पद
धारा – 90 :- ज़िला स्थापना समिति का गठन एवं कार्य
धारा – 91 :- पंचायत समितियों और ज़िला परिषद के कर्मचारियों के विरूद्ध कार्यवाही व दंड के प्रावधान
धारा – 94 :- राज्य सरकार को किसी पंचयतीराज संस्था को विघटित करने की शक्ति प्राप्त है ।
धारा – 101 :- सरकार को किसी पंचयतीराज संस्थाओं की सीमा में परिवर्तन करने की शक्ति प्राप्त है।
अध्याय – 4A – किसी गाँव के आबादी क्षेत्र का विनियम
राजस्थान पंचायती राज (संशोधन) अध्यादेश, 2000
7 जनवरी 2000 को अध्यादेश जारी
ग्रामसभा के स्थान पर वार्ड सभा की व्यवस्था की गई है। इस सभा की वर्ष मे कम-से-कम दो बैठकें अवश्य होंगी।
दो से अधिक बच्चे होने पर व्यक्ति पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो जायेगा।
पंचायत स्तर पर स्थायी समिति एवं सतर्कता समिति के गठन का प्रावधान है।
पंचायतीराज संस्थाओ का सशक्तिकरण हेतु प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र एवं उपकेन्द्र पंचायतीराज के अधीन कर दिए गये है। इन संस्थाओं पर तकनीकी नियन्त्रण चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग का रहेगा, लेकिन प्रशासनिक नियन्त्रण जिला परिषद का होगा।
ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित ‘ब’ श्रेणी के आयुर्वेदिक औषधालयों का नियन्त्रण पंचायतीराज संस्थाओं को सौंपा गया है, लेकिन इन पर तकनीकी नियन्त्रण आयुर्वेदिक विभाग का ही रहेगा।
पंचायती संस्थाओं में चुनाव लड़ने हेतु अतिरिक्त योग्यता
पंचायतीराज अधिनियम 1994 की धारा 19 में संशोधन (2015) कर सरपंच के चुनाव हेतु 8वीं पास तथा जिला परिषद् व पंचायत समिति के सदस्य के लिए 10वीं पास होना आवश्यक था। अनुसूचित क्षेत्र के सरपंच हेतु 5वीं पास होना आवश्यक था। किन्तु फरवरी, 2019 से राजस्थान पंचायती राज (संशोधन) अधिनियम, 2019 द्वारा यह प्रावधान हटा दिया गया है।
शौचालय होना आवश्यक
राज. प.रा. (द्वितीय संशोधन), अधिनियम, 2015 द्वारा यह उपबन्ध किया कि घर में कार्यशील स्वच्छ शौचालय रखना हो और उसके परिवार का कोई भी सदस्य खुले मे शौच के लिए नहीं जाता हो। [धारा 19 (द)]
राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था में सुधार हेतु बनी समितियाँ
सादिक अली समिति (1964):
उद्देश्य: पंचायत राज संस्थाओं की असफलता के कारणों का पता लगाना।
गिरधारी लाल व्यास समिति (1973):
उद्देश्य: पंचायत राज संस्थाओं की सफलता के संदर्भ में सुझाव देना।
हरलाल सिंह खर्रा समिति (1990):
उद्देश्य: जिला परिषद की भूमिका को प्रभावी बनाने के संदर्भ में सुझाव देना।
कटारिया समिति (2009):
उद्देश्य: पंचायतों को अधिक अधिकार देने हेतु सिफारिश करना।
सिफारिश: पंचायतों को सभी 29 विषय सौंपने की सिफारिश।
प्रकाशन:
कुरुक्षेत्र: इंदिरा गांधी ग्रामीण विकास और पंचायती राज विभाग द्वारा प्रकाशित।
राजस्थान विकास: राजस्थान के पंचायती राज विभाग द्वारा प्रकाशित।
2 अक्टूबर, 2010 को वी.एस. व्यास समिति की सिफारिश पर पंचायतों को 5 विभागों को सौंपा गया है –
कृषि
प्रारम्भिक शिक्षा
महिला एवं बाल विकास
चिकित्सा तथा स्वास्थ्य
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता।
73वें संविधान संशोधन के बाद 1995 में राजस्थान में पहली बार चुनाव करवाए गए जबकि 73वें संशोधन के अनुरूप चुनाव करवाने वाला पहला राज्य कर्नाटक था।
पंचायतीराज से संबंधित संस्थाएँ
संस्थान
स्थान
स्थापना वर्ष
मुख्य उद्देश्य
हरिश्चंद्र माथुर राजस्थान राज्य लोक प्रशासन संस्थान
जयपुर
14 नवंबर 1957 (प्रारंभ में जोधपुर, 1963 में स्थानांतरण)
लोक प्रशासन से संबंधित प्रशिक्षण प्रदान करना
इंदिरा गांधी पंचायतीराज एवं ग्रामीण विकास संस्थान
जयपुर
1984
पंचायतीराज एवं ग्रामीण विकास से संबंधित पदाधिकारियों व जनप्रतिनिधियों को प्रशिक्षण देना
पंचायत प्रशिक्षण केंद्र
डूंगरपुर
—
पंचायतीराज पदाधिकारियों के प्रशिक्षण हेतु केंद्र
पंचायतों से संबंधित मुख्य संशोधन व नियम
राजस्थान पंचायतीराज अधिनियम 1994 में सन् 2000 में संशोधन कर पंचायतों में स्थायी समितियों का प्रावधान किया गया।
6 माह से अधिक किसी भी निर्वाचन क्षेत्र को बिना प्रतिनिधित्व के नहीं रखा जा सकता।
ग्राम पंचायत स्तर पर लोक सुनवाई/जन सुनवाई अधिकारी → ग्राम विकास अधिकारी (VDO) होता है।
ग्राम सभा की बैठकों की कार्यवाही का ब्यौरा ग्राम विकास अधिकारी रखता है।
देश में पहली बार पंचायतीराज दिवस → 24 अप्रैल 2010 को मनाया गया।
राजस्थान की प्रथम महिला सरपंच → छगन बहन गोलछा (खींचन, फलोदी, जोधपुर)।
राजस्थान की प्रथम महिला जिला प्रमुख → नगेन्द्र बाला (कोटा)।
1960 से 1995 तक पंचायतीराज चुनाव पंचायतीराज विभाग द्वारा कराए गए।
1995 के बाद से सभी चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा कराए गए।
अब तक कुल 11 पंचायतीराज चुनाव संपन्न हो चुके हैं, जिनमें 5 पंचायतीराज विभाग और 6 राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा आयोजित किए गए।
राजस्थान में पंचायतीराज चुनाव
चुनाव का क्रम
आयोजन वर्ष
आयोजक संस्था
1
1960
पंचायतीराज विभाग
2
1965
पंचायतीराज विभाग
3
1978
पंचायतीराज विभाग
4
1981
पंचायतीराज विभाग
5
1988
पंचायतीराज विभाग
6
1995
राज्य निर्वाचन आयोग
7
2000
राज्य निर्वाचन आयोग
8
2005
राज्य निर्वाचन आयोग
9
2010
राज्य निर्वाचन आयोग
10
2015
राज्य निर्वाचन आयोग
11
2020
राज्य निर्वाचन आयोग
ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008
प्रारंभ और उद्देश्य:
ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008, 2 अक्टूबर 2009 से लागू हुआ।
इसका उद्देश्य नागरिकों को सस्ती, त्वरित, और सुलभ न्याय उनके दरवाजे पर उपलब्ध कराना है।
न्यायालय की संरचना और अधिकारिता:
यह न्यायालय प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समान माना जाता है।
दीवानी और आपराधिक दोनों प्रकार के लघु विवादों के निपटारे के लिए सक्षम है।
स्थिति के अनुसार यह मोबाइल अदालत के रूप में भी काम करता है।
न्यायाधिकारियों की नियुक्ति:
ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 की धारा 3 (5) के अनुसार, राज्य सरकारें उच्च न्यायालय के परामर्श से न्यायाधिकारी की नियुक्ति करती हैं।
न्यायाधिकारी प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के स्तर का अधिकारी होता है।
स्थापना और संचालन:
ग्राम न्यायालय प्रत्येक पंचायत के लिए स्थापित किया जाता है।
ग्राम न्यायालय की पीठ मध्यवर्ती पंचायत मुख्यालय पर स्थापित होती है।
2009 में “ग्राम न्यायालय की स्थापना और संचालन के लिए राज्य सरकारों को सहायता” नामक योजना शुरू की गई।
प्रावधान और आदेश:
ग्राम न्यायालय द्वारा पारित आदेश की हैसियत हुक्मनामे के बराबर होती है।
यह न्यायालय प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से निर्देशित होता है, जब तक उच्च न्यायालय द्वारा अन्य नियम निर्धारित न किए जाएँ।
स्थापना की अनिवार्यता:
अधिनियम ग्राम न्यायालयों की स्थापना को अनिवार्य नहीं बनाता है।
प्रगति:
15 राज्यों ने अब तक 481 ग्राम न्यायालय अधिसूचित किए हैं।
10 राज्यों में 309 ग्राम न्यायालय सुचारू रूप से कार्यरत हैं।
राजस्थान में 45 ग्राम न्यायालय अधिसूचित और कार्यरत हैं।
इतिहास:
भारतीय विधि आयोग ने 1986 की अपनी 114वीं रिपोर्ट में ग्राम न्यायालयों की स्थापना का प्रस्ताव दिया था।
ग्राम न्यायालय की विशेषताएँ:
न्यायालय स्थानीय स्तर पर न्याय प्रदान करता है।
विवादों का शीघ्र समाधान करता है।
न्याय प्रक्रिया सस्ती और सरल होती है।
यह मोबाइल अदालत के रूप में भी कार्य करता है।
न्यायालय के आदेश और निर्णयों का कानूनी महत्व हुक्मनामे के समान है।