राजस्थान का भौगोलिक विभाजन: राजस्थान भूगोल के अंतर्गत राज्य के भौगोलिक विभाजन का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। राजस्थान को इसकी स्थलाकृति, जलवायु और प्राकृतिक विशेषताओं के आधार पर विभिन्न भौगोलिक भागों में विभाजित किया गया है। इनमें प्रमुख रूप से अरावली पर्वतमाला, थार मरुस्थल, पूर्वी मैदान तथा दक्षिण-पूर्वी पठारी क्षेत्र शामिल हैं, जो राज्य की प्राकृतिक एवं आर्थिक संरचना को प्रभावित करते हैं।
राजस्थान के भौगोलिक विभाजन
- वर्तमान भू-आकृतियों के आधार पर, राजस्थान को चार भौगोलिक भागों में विभाजित किया गया है:
- उत्तर पश्चिमी रेगिस्तानी क्षेत्र
- अरावली पर्वतमाला और पहाड़ी क्षेत्र
- पूर्वी मैदान
- दक्षिण-पूर्वी पठार (हाड़ौती पठार)
| उत्तर पश्चिमी रेगिस्तान | अरावली पर्वतमाला | पूर्वी मैदान | हाड़ौती पठार | |||
| शुष्क | अर्द्ध शुष्क | |||||
| क्षेत्र % | 61 | 9 | 23 | 7 | ||
| जनसंख्या% | 40 | 10 | 39 | 11 | ||
| भाग | टेथिस सागर | गोंडवाना | टेथिस सागर | गोंडवाना | ||
| समय | प्लेस्टोसीन | प्री कैंब्रियन | प्लेस्टोसीन | क्रेटेशियस | ||
| मिट्टी | रेतीली | पर्वतीय | कछारी | काली | ||
| जिलों | 15 | 13 | 10 | 7 | ||
| वर्षा | 0-20 सेमी. | 20-40 सेमी. | 40-60 सेमी. | 60-80 सेमी. | 80-120 सेमी. | |
| जलवायु | शुष्क और अर्ध-शुष्क | उप-आर्द्र | आर्द्र | अति आर्द्र | ||
| वनस्पति (कोपेन) | ज़ेरोफाइट्स, कांटेदार पौधे और स्टेपी (सबसे बड़ा) | शुष्क पर्णपाती | शुष्क और आर्द्र | सवाना (वागड़ हाड़ौती + मां.आबू) | ||
- वी.सी. मिश्रा की पुस्तक के अनुसार राजस्थान को भौगोलिक दृष्टि से 7 भागों में विभाजित किया गया है।
- घग्गर मैदान
- शुष्क क्षेत्र
- अर्ध-शुष्क क्षेत्र
- अरावली क्षेत्र
- पूर्वी कृषि भूमि
- चंबल व बीहड़ क्षेत्र
- दक्षिणपूर्वी क्षेत्र

उत्तर-पश्चिमी राजस्थान
- उत्पत्ति :
- चतुर्थक युग (क्वाटरनरी) या प्लेइस्टोसीन काल में निर्मित इस मरुस्थल का ढाल उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर है।
- पर्मो-कार्बोनिफेरस काल के दौरान ने पश्चिमी राजस्थान टेथिस सागर से ढका हुआ था।
- यहाँ स्थित खारे पानी की झीलों को महासागर के अवशेष माना जाता है।
- थार मरुस्थल :
- थार मरुस्थल का लगभग 85% भाग भारत में स्थित है, तथा शेष 15% पाकिस्तान में।
- मरुस्थल का 60% से अधिक भाग राजस्थान में (62%) स्थित है, और शेष भाग गुजरात, पंजाब तथा हरियाणा में विस्तृत है।
- क्षेत्रफल : 1.75 लाख km2
- यह सबसे बड़ा भौतिक क्षेत्र है, जो राजस्थान के कुल क्षेत्रफल का 61% क्षेत्र में विस्तृत है तथा इसमें 15 जिले शामिल हैं। (नए ज़िले भी शामिल)
- उत्तरी जिले: श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़।
- मध्य जिले: चूरू, झुंझुनूं, सीकर, नागौर, डीडवाना-कुचामन, जोधपुर, फलौदी, पाली।
- पश्चिमी जिले: जालोर, बाड़मेर, बालोतरा, जैसलमेर, बीकानेर।
- यह सबसे बड़ा भौतिक क्षेत्र है, जो राजस्थान के कुल क्षेत्रफल का 61% क्षेत्र में विस्तृत है तथा इसमें 15 जिले शामिल हैं। (नए ज़िले भी शामिल)
- जनसंख्या
- उत्तर-पश्चिमी राजस्थान में राज्य की 40% आबादी निवास करती है, यद्यपि शुष्क जलवायवीय परिस्थितियों के कारण यहाँ जनसंख्या घनत्व सबसे कम है।
- विशेषताएँ
- यह क्षेत्रफल में सबसे बड़ा क्षेत्र है और इसे तीन समानांतर पट्टियों मरुस्थली, बांगर व रोही, में विभाजित किया जा सकता है: जो पश्चिम से पूर्व की ओर विस्तृत हैं।
- यहाँ रेत के टीले पाए जाते हैं जिन्हें स्थानीय बोली में ‘धोरे’ कहा जाता है।
- वर्षा :- 25 सेमी से 50 सेमी वार्षिक (अरावली का वर्षा छाया क्षेत्र)
- जलवायु :- शुष्क और अर्ध-शुष्क प्रकार की जलवायु पाई जाती है।
- मिट्टी :- बलुई मिट्टी।
- प्रमुख चट्टानें:- अवसादी चट्टानें। जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, चूरू, हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर में रेत और चट्टानों के विशाल भूभाग पाए जाते हैं, जिनमें मुख्य रूप से चूना पत्थर शामिल है।
- वनस्पति:- शुष्क जलवायु में उगने वाले पौधे और कांटेदार झाड़ियाँ, कैक्टस, खजूर का पेड़।
- कृषि मुख्यतः खरीफ की फसल का उत्पादन बड़ी मात्रा में होता है; मुख्य फसलें बाजरा, मोठ और ग्वार हैं।
- 25 सेमी सम वर्षा रेखा इसे दो भागों में विभाजित करती है (दो प्रमुख क्षेत्रों और 6 उप-क्षेत्रों में विभाजित)।
- उत्तर-पश्चिमी रेगिस्तान, जिसे थार रेगिस्तान के नाम से भी जाना जाता है , दो भागों में विभाजित है

शुष्क रेगिस्तान (राठी क्षेत्र)
- शुष्क रेगिस्तान को पुनः 2 भागों में विभाजित किया गया है।
- बालुका स्तूप मुक्त क्षेत्र जो शुष्क रेगिस्तान का 41.5% को कवर करता है
- इस क्षेत्र में बालुका स्तूप की अपेक्षा ‘चट्टानी मरुस्थल’ पाया जाता है।
- ‘चट्टानी मरुस्थल’ जिसे ‘हमादा’ कहा जाता है ,का विस्तार जैसलमेर (पोकरण , लोदरवा , रामगढ़), बालोतरा व फलौदी में सार्वोधिक है
- बालुका स्तूप मुक्त क्षेत्र जो शुष्क रेगिस्तान का 41.5% को कवर करता है
- ‘चट्टानी मरुस्थल’ जिसे ‘हमादा’ कहा जाता है ,का विस्तार जैसलमेर (पोकरण , लोदरवा , रामगढ़), बालोतरा व फलौदी में सार्वोधिक है
- रेग– यह एक मिश्रित रेगिस्तान है जो हम्मादा के आसपास पाया जाता है, यह जैसलमेर, बलोतरा और फलौदी में विस्तृत है।
- इर्ग :- इसे सम्पूर्ण मरुस्थल एवं विशाल मरुस्थल कहा जाता है। यह जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, नागौर, चूरू, सीकर, झुंझुनू आदि में फैला हुआ है।
- लाठी सीरीज:-
- पोखरण से लेकर जैसलमेर के मोहनगढ़ तक 60 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में एक भूमिगत जल पट्टी फैली हुई है।
- इस पट्टी को प्राचीन सरस्वती नदी के अवशेष माना जाता है।
- इस क्षेत्र में सेवन (लीलन), धामन व करड जैसी पौष्टिक घास भी पाई जाती है।
- नखलिस्तान (ओएसिस):
- रेगिस्तान में स्थित प्लाया झीलों (अस्थायी झीलों) के पास निर्मित।
- रेगिस्तान में हरियाली से घिरा एक स्थान।

- आकल वुड फॉसिल पार्क (जैसलमेर):
- इन जीवाश्मों के निर्माण का काल जुरासिक काल है। (180 मिलियन वर्ष से पहले)
- कुलधरा – पहला कैक्टस उद्यान यहीं स्थित है ।

2. बालुका स्तूप युक्त क्षेत्र:
- यह शुष्क रेगिस्तान के 58.5% को कवर करता है
- बालुका स्तूप हवा द्वारा महीन मिट्टी के जमाव से निर्मित भौगोलिक संरचनाएं हैं।
- श्री मैकी के अनुसार (1979) राजस्थान में 8 प्रकार के रेत के टीले पाए जाते हैं।
- जैसलमेर में अधिकतम बालुका स्तूप पाए जाते है।
- जोधपुर में सभी प्रकार के बालुका स्तूप पाए जाते हैं।
बालुका स्तूप के प्रकार
- अनुदैर्ध्य/रेखीय बालुका स्तूप :-
- ये बालुका स्तूप प्रचलित हवाओं के समानांतर बनते हैं, जिन्हें अनुदैर्ध्य/रेखीय बालुका स्तूप भी कहा जाता है।
- ये रेत के टीले अधिकतर जैसलमेर, बीकानेर, सूरतगढ़ (श्री-गंगानगर) में पाए जाते हैं।

- अनुप्रस्थ बालुका स्तूप :-
- ये बालुका स्तूप प्रचलित हवाओं के समकोण (लंबवत) पर बनते हैं।
- ये रेत के टीले अधिकतर बाड़मेर, जोधपुर, रावतसर (हनुमानगढ़) के कुछ भाग, सूरतगढ़ (श्री गंगानगर), चूरू और झुंझुनू में पाए जाते हैं।

- बरखान :-
- ये अर्धचंद्राकार रेत के टीले हैं।
- पवन सम्मुख (उत्तल ढलान) व पवन विमुख (अवतल ढलान) है।
- यह मुख्य रूप से शेखावाटी क्षेत्र में, विशेष रूप से चूरू में पाए जाते है।
- मरुस्थलीकरण में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है क्योंकि ये रेत के टीले अत्यधिक गतिशील होते हैं।

- परवलयिक बालुका स्तूप :-
- यह अधिकतर बरखान के विपरीत दिशा में व राजस्थान में अधिकतम पाए जाते है।
- हेयरपिन की आकृति के समान ।
- जैसलमेर , बीकानेर, जोधपुर

- तारानुमा बालुका स्तूप :–
- हवा की दिशा बदलने से आकृतियाँ बनती हैं।
- रेत के टीलों की कई भुजाएँ होती हैं। ये तारों की तरह दिखते हैं और बनते हैं जब रेत के टीले विभिन्न दिशाओं से आकर मिलते हैं।
- अधिकतर मोहनगढ़, पोकरण (जैसलमेर), सूरतगढ़ (गंगानगर), व बीकानेर में पाए जाते हैं।

- स्रबकॉपीस / नेबखा:-
- ये अधिकतर झाड़ियों के आसपास बनते हैं।
- हवा द्वारा वनस्पतियों के आसपास रेत जमा होने के कारण इसका निर्माण हुआ।

- सीफ़ बालुका स्तूप :–
- बरखान की फैली हुई भुजा को सीफ़ कहते हैं।
- बरखान के निर्माण के दौरान, जब हवा की दिशा बदलती है, तो बरखान की एक भुजा आगे की ओर फैल जाती है, जिससे एक संरचना बनती है जिसे सीफ़ बालुका स्तूप कहा जाता है। जो शेखावाटी और जैसलमेर में पाये जाते है

- अवरोधक बालुका स्तूप :-
- ये रेत के टीले किसी अवरोध (जैसे पहाड़ी या अन्य बाधा) के कारण बनते हैं।
- प्रमुख स्थान – पुष्कर, बूढ़ापुष्कर नागौर, जोबनेर और सीकर पहाड़ियाँ।
- नेटवर्क बालुका स्तूप
- ये रेत के टीले रेगिस्तान के उत्तरपूर्वी भाग में पाए जाते हैं। इनका व्यापक विस्तार क्षेत्र हनुमानगढ़ से हिसार (हरियाणा) तक फैला हुआ है।
अर्ध-शुष्क रेगिस्तान
- अर्ध-शुष्क रेगिस्तान, जिसे बागड़ क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है, यह भौगोलिक विभाजन शुष्क रेगिस्तान और अरावली क्षेत्र के बीच स्थित है।
- 25 सेमी व 50 सेमी सम वर्षा रेखा के मध्य स्थित भौतिक विभाजन को अर्ध-शुष्क रेगिस्तान कहा जाता है।
- अर्ध-शुष्क रेगिस्तानी क्षेत्र को पुनः 4 भागों में विभाजित किया गया है

- घग्घर मैदान–
- यह रेगिस्तान का उत्तरी भाग है जो गंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में भी फैला हुआ है। इसे नाली या पाट क्षेत्र कहा जाता है जो घग्घर नदी द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी से निर्मित है
- नाली – हनुमानगढ़ में घग्घर नदी द्वारा निर्मित मैदानी क्षेत्र को स्थानीय भाषा में नाली कहा जाता है।
- घग्घर दोआब – सतलुज और घग्घर नदियों के बीच की उपजाऊ भूमि को घग्घर दोआब क्षेत्र के नाम से जाना जाता है।
- घग्घर नदी बेसिन में पाई जाने वाली बलुई मिट्टी को काठी/बग्गी कहा जाता है।
- थली – रेगिस्तान में स्थित ऊंचे भूभाग को थाली कहा जाता है, जो मुख्यतः बीकानेर और चूरू में पाया जाता है।
- यह अत्यधिक सिंचित क्षेत्र, जो क्षारीयता की समस्या से ग्रसित है।
- शेखावाटी आंतरिक अपवाह क्षेत्र:-
- यह अर्ध-शुष्क क्षेत्र झुंझुनू, सीकर, चूरू व उत्तरी नागौर में विस्तारित है यह मध्यम और कम ऊंचाई के रेत के टीलों से ढका एक रेतीला मैदान है।
- इसे बांगर क्षेत्र भी कहा जाता है
- इस क्षेत्र में बरखान बालुका स्तूप प्रमुखता से पाए जाते है।
- यह अंतर्देशीय जल निकासी वाला क्षेत्र है।इस क्षेत्र में ऐसी नदियाँ और नाले हैं जो थोड़ी दूरी तक बहने के बाद विलुप्त हो जाते हैं। मेंढा, कांतली, खारी, रूपनगढ़ इस क्षेत्र की प्रमुख नदियाँ हैं।
- तोरावाटी :– कांतली नदी के जलग्रहण क्षेत्र को तोरावाटी कहा जाता है।
- जोहड़ :- कच्चे पानी के कुओं को जोहड़ कहा जाता है।

- सर/सरोवर:– रेत के टीलों के बीच पानी जमा होने से बने जल निकाय। उदाहरण: जस्सुसर, मानसर, सालासर।
- इस क्षेत्र में कई खारे पानी की झीलें (सांभर,डीडवाना-कुचामन) और रण {सुजानगढ़, ताल छापर परिहारा (चूरू)} स्थित हैं।
- बीड:- इस क्षेत्र में चारागाह को बीड़ कहते हैं। यह राजस्थान राज्य के संरक्षण क्षेत्र में सूचीबद्ध है।
लूणी बेसिन (गोड़वाड़ क्षेत्र)
- विस्तार – जोधपुर, जालौर, पाली, बालोतरा व बाड़मेर।
- लूनी व इसकी सहायक नदियों द्वारा निर्मित जलोढ़ मैदान जिसे ‘लूनी बेसिन’ या लूनी – जवाई बेसिन’ कहा जाता है।कच्छ के रण से सटे कुछ क्षेत्रों में जमीन पर भी खारापन दिखाई देता है।
- मिट्टी– नवीन जलोढ़ जो संपूर्ण लूनी बेसिन के 47.51 प्रतिशत हिस्से को कवर करती है।
- यह 35,000 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यह पश्चिमी राजस्थान का सबसे आर्द्र क्षेत्र है।
- लूणी बेसिन की मुख्य नहर – नर्मदा नहर
- यह क्षेत्र समतल है, लेकिन इसमें कुछ पहाड़ियाँ भी स्थित हैं, जिनमें से मुख्य पहाड़ियाँ निम्नलिखित हैं:
- छप्पन की पहाड़िया – बालोतरा में मोकलसर गांव से सिवाना तक लगभग 11 किलोमीटर लंबी और 1.5 किलोमीटर चौड़ी गोलाकार 56 पहाड़ियों के इस समूह को छप्पन की पहाड़िया’ कहा जाता है। ग्रेनाइट की प्रचुर मात्रा व्याप्त होने के कारण में इसे ‘ग्रेनाइट पर्वत’ कहा जाता है।
- पीपलूद (बालोतरा) इसे रेगिस्तान का माउंट आबू या राजस्थान का छोटा माउंट आबू कहा जाता है। यह पश्चिमी राजस्थान में सबसे अधिक वर्षा वाला स्थान है। हल्देश्वर महादेव का मंदिर पीपलूद में स्थित है।
- जालौर की सिवाणा पहाड़ियाँ – यह क्षेत्र ग्रेनाइट के भंडारों के लिए प्रसिद्ध है (जालौर को ग्रेनाइट शहर कहा जाता है)। ग्रेनाइट और मलानी रायोलाइट से बनी पहाड़ियाँ गुंबदों और इंसलबर्गों के रूप में पाई जाती हैं। ये पहाड़ियाँ मंडालिया, हेमवास, रावनिया, चोटिला, खेजरला, काकनी और मोगरा खुर तक फैली हुई हैं।
- मलानी पहाड़ियां – चूना पत्थर के भंडार के लिए प्रसिद्ध।
- नाकोड़ा पहाड़ियाँ (बालोतरा)– यह जैन धर्म का एक धार्मिक स्थल है। यहाँ पार्श्वनाथ मंदिर बना हुआ है, जिसे नाकोड़ा भैरव के नाम से जाना जाता है।
- सेंद्रा पहाड़ियाँ (ब्यावर) में सर्पेंटाइन सहित विभिन्न आकृतियों की चट्टानें पाई जाती हैं।
- “नेहड का रण” यह क्षेत्र मुख्य रूप से जालौर में स्थित है।
- “काला भूरा डूँगर” यह इस बेसिन के पूर्व में पाली में स्थित है।
- लूनी और उसकी सहायक नदियों लिलडी, सुकडी, जवाई, जोजडी और बांडी के अपवाह क्षेत्रों में जलोढ़ मैदान पाए जाते हैं।
- पचपदरा इस क्षेत्र का प्रमुख क्षारीय क्षेत्र है जहाँ नमक का उत्पादन होता है।
नागौरी उच्च भूमि :-
- नागौर और अजमेर में फैले रेतीले बंजर बालुका स्तूप मुक्त क्षेत्र हैं।
- यह 300 से 500 मीटर ऊँचाई पर स्थित भूभाग।
| नागौरी उच्चभूमि क्षेत्र का वर्गीकरण | |
| मकराना श्रेणी | सफेद संगमरमर जमाव क्षेत्र |
| गोठ – मांगलोद श्रेणी | जिप्सम निक्षेपण क्षेत्र |
| जायल श्रेणी | फ्लोराइड युक्त जल |
- यह क्षेत्र अरावली पर्वत श्रृंखला से अलग एक उच्चभूमि क्षेत्र है। यहाँ मुख्य रूप से आतंरिक अपवाह तंत्र पाया जाता है।
- इस क्षेत्र के पूर्वी हिस्से में खारे पानी की झीलें जैसे सांभर, डीडवाना , नवा व कुचामन स्थित हैं।
- इन झीलों में नमक का स्रोत
- मिट्टी के नीचे पाई जाने वाली अभ्रकयुक्त चट्टानें जिनसे नमक केशिका क्रिया द्वारा सतह पर आता है, जो की वाष्पीकरण क्रिया से सोडियम क्लोराइड में परिवर्तित हो जाती है।
- वर्षाकाल में प्रवाहित छोटी नदियाँ पानी के साथ नमक के कणों को एकत्रित करके लाती हैं (अंतर्देशीय जल निकासी)। जिससे मृदा सोडियम क्लोराइड की अधिकता हेतु कृषि हेतु अनुपयुक्त है।
- कूबड़ पट्टी – खारे पानी के वाष्पीकरण के कारण गड्ढों में नमक जमा हो जाता है, जिनमें फ्लोराइड लवणों की मात्रा अधिक होती है। यह कूबड़नुमा पट्टी नागौर व अजमेर की सीमाओं के बीच पाई जाती है, लेकिन जायल से पुष्कर तक का क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित है।
- फ्लोरोसिस रोग स्थानीय निवासियों में बहुत आम है, जिसमें दांत पीले हो जाते हैं, हड्डियां टेढ़ी हो जाती हैं, पीठ झुक जाती है जिसके कारण लोगों में कूबड़ निकल आते हैं, इसलिए इसे कूबड़ पट्टी /बांका पट्टी कहा जाता है।
राजस्थान के रेगिस्तान से संबंधित तथ्य
- प्लाया और खडीन झीलें
- पश्चिमी जैसलमेर में अस्थायी झीलों को प्लाया झीलें कहा जाता है।
- खडीन झीलें
- खडीन पश्चिमी जैसलमेर में पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा विकसित की गई थी। जो इन झीलों का उपयोग वे कृषि के लिए करते थे।
- इन झीलों में मुख्य रूप से रबी की फसलें बोई जाती हैं। खडीन व प्लाया झीले मुख्य रूप से पश्चिमी जैसलमेर में पाई जाती हैं।


- रन
- रेगिस्तानी दलदली, खारी और बंजर भूमि को रन/टाट/ढाढ़ कहा जाता है।ये सर्वाधिक जैसलमेर और बाड़मेर में पाए जाते हैं। उदाहरण:- तालछापर, पड़िहारा, (चूरू) थोब (बालोतरा), पोकरण, भाकरी (जैसलमेर), बाप (फलौदी) हैं।
- पीवणा
- यह पीले रंग के सांप की एक प्रजाति है जो मुख्य रूप से जैसलमेर में पाई जाती है।
- बाप बोल्डर क्ले:-
- बोल्डर क्ले मुख्य रूप से जोधपुर में पाई जाती है।
- नोट:- वर्तमान में फलोदी में (राजपत्रित अधिसूचना -2024 के अनुसार)
- हिमनदों या बर्फ की चादरों से निक्षेपण द्वारा निर्मित तलछट और बड़े पत्थरों को बोल्डर क्ले कहा जाता है।
- बोल्डर क्ले का निर्माण काल पर्मो-कार्बोनिफेरस माना जाता है (250-280 मिलियन वर्ष पूर्व)।

- धोरे व धरियन:-
- बालुका स्तूपों के खिसकने को धरियन और लहरदार प्रकार के बालुका स्तूपों को धोरे के नाम से जाना जाता है।
- धोरे व धारियान मुख्य रूप से जैसलमेर में पाए जाते है।
- मरुस्थल मार्च:-
- मरुस्थल विस्थापन को ‘मरुस्थल का मार्च’ कहा जाता है।
- बरखान बालुका स्तूप मरुस्थलीकरण में सर्वाधिक योगदान देते हैं।
- राजस्थान में मरुस्थल मार्च की दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर है।
- बालसन:-
- रेगिस्तान में पहाड़ों के बीच पाए जाने वाले जलकुंड या झीलों को बालसन कहा जाता है,उदाहरण – सांभर झील।
राजस्थान में अरावली श्रृंखला
- निर्माण और भूवैज्ञानिक संरचना:-
- अरावली का विकास-
- अरावली श्रृंखला का विकास प्री-कैम्ब्रियन युग (लगभग 2500 मिलियन वर्ष पूर्व) में मैग्मा के जमने के कारण आग्नेय चट्टानों के रूप में हुआ है।
- संकुचन की प्रक्रिया के कारण, यह एक प्राचीन वलित पर्वत में विकसित हुआ, जिसे पेनेप्लेनेशन (पेनेप्लेन) का एक उदाहरण माना जाता है।
- राजस्थान में अरावली पर्वतमाला का आधार
- अरावली पर्वतमाला का आधार टोंक ज़िले में दृश्य होता है ,जहां इसकी चट्टान संरचनाएं सतह के नीचे पाई जाती हैं।
- राजस्थान में अरावली पर्वतमाला की प्राम्भिक चट्टानें आर्कियन श्रृंखला से सम्बंधित हैं, जो ठोस, दानेदार और जीवाश्म रहित है
- इस श्रृंखला में ग्रेनाइट, नीस और शिस्ट खनिज पाए जाते हैं।
- विंध्यन श्रृंखला का प्रभाव: वर्तमान में, अरावली पर्वतमाला का अधिकांश भाग विंध्यन श्रृंखला की चट्टानों से बना है, जो इसे एक अवशिष्ट पर्वत के रूप में वर्गीकृत करता है।
- प्रोफेसर पारिख के अनुसार, राजस्थान में विंध्यन चट्टानें पूर्व में धौलपुर से चित्तौड़गढ़ तक और पश्चिम में नागौर से बिरमानिया तक फैली हुई हैं।
- प्रायद्वीपीय पठार का भाग: भू-आकृति विज्ञान की दृष्टि से, अरावली पर्वतमाला भारतीय प्रायद्वीपीय पठार का एक हिस्सा है।
- विस्तार और भौगोलिक स्थिति
- विस्तार: भारत में यह पालनपुर (गुजरात) से रायसीना हिल्स (दिल्ली) तक 692 किलोमीटर तक फैली हुई है। राजस्थान में यह खेड़ब्रह्मा (गुजरात सीमा) से खेतड़ी (झुंझुनू) तक 550 किलोमीटर तक विस्तृत है।

- ऊंचाई: 600-900 मीटर, औसत – 930 मीटर।
- विस्तार दिशा: दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर।
- शामिल जिले-9:- सिरोही, उदयपुर, राजसमंद, अजमेर, जयपुर, सीकर, झुंझुनू, दौसा, अलवर (वी.सी. मिश्रा के अनुसार)
- हरिमोहन सक्सेना की पुस्तक के अनुसार 7 जिले
- इसकी ऊंचाई दक्षिण से उत्तर-पूर्व की ओर घटती जाती है। सिरोही जिले में स्थित माउंट आबू का गुरुशिखर अरावली की सबसे ऊंची चोटी है, जिसकी ऊंचाई 1722 मीटर है।
- कर्नल जेम्स टॉड ने इसे “संतों का शिखर” कहा है। यह हिमालय और नीलगिरी के बीच की सबसे ऊंची चोटी है।
- जलवायु और पारिस्थितिकी
- वर्षा:- वार्षिक औसत वर्षा 50-90 सेमी।
- जलवायु:- अर्ध-शुष्क जलवायु।
- मिट्टी के प्रकार: काली, भूरी, लाल (पहाड़ी मिट्टी)।
- वनस्पति और जैव विविधता:- यहां शुष्क पर्णपाती वन पाए जाते हैं।
- प्रमुख वृक्ष: धोक, बबूल, नीम।
- पुष्प प्रजातियाँ:- गुलाब, बोगनविलिया, हिबिस्कस।
- कृषि और आर्थिक गतिविधियाँ
- प्रमुख फसलें:
- खरीफ (मानसून) फसलें: मक्का।
- रबी (शीतकालीन) फसलें: गेहूं, चना, सरसों।
- प्रमुख फसलें:
- अरावली का विभाजन :- अरावली को तीन भागों में विभाजित किया गया है\
- उत्तरी अरावली:- 450 मीटर औसत ऊंचाई
- विस्तार:-यह खेतड़ी (नीम का थाना) और सांभर (जयपुर) के मध्य स्थित है।
- जिले:- झुंझुनू, जयपुर, सीकर, अलवर, खैरथल-तिजारा, कोटपूतली-बहरोड़।
- उत्तरी अरावली:- 450 मीटर औसत ऊंचाई
उत्तरी अरावली की पर्वत चोटियाँ
| पर्वतीय चोटियाँ | ऊंचाई (मीटर में) |
| रघुनाथगढ़ (सीकर) | 1055 मीटर |
| मलखेत (सीकर) | 1052 मीटर |
| लोहागर्ल (झुंझुनू) | 1051 मीटर |
| भोजगढ़ (झुंझुनू) | 997 मीटर |
| खो (जयपुर) | 920 मीटर |
| हर्षनाथ (सीकर) | 820 मीटर |
| भैरांच (अलवर) | 792 मीटर |
| बारबरा (जयपुर) | 786 मीटर |
| बाबई (झुंझुनू) | 780 मीटर |
| बिलाली (अलवर) | 775 मीटर |
| मनोहरपुरा (जयपुर) | 747 मीटर |
| सिरावास (अलवर) | 651 मीटर |
| भानगढ़ (अलवर) | 649 मीटर |
| जयगढ़ (जयपुर) | 648 मीटर |
| नाहरगढ़ (जयपुर) | 599 मीटर |
| टिप्पणी:- मेंथा नदी का उद्गम स्थल मनोहरपुरा, बाणगंगा नदी का उद्गम बैराठ से, रूपारेल नदी का उद्गम सेवर पहाड़ियों से होता है। | |
- मध्य अरावली:- औसत ऊंचाई 500-700 मीटर है।
- विस्तार:- सांभर (जयपुर) से देवगढ़ (राजसमंद) तक
- जिले:– अजमेर, ब्यावर, राजसमंद, जयपुर व पाली, भीलवाड़ा, टोंक के कुछ हिस्से
- ग्रेनाइट, संगमरमर और क्वार्ट्ज चट्टानें पाई जाती हैं
मध्य अरावली की पर्वत चोटियाँ
| पर्वतीय चोटियाँ | ऊंचाई |
| मोरारजी/टॉडगढ़ (ब्यावर) | 934 मीटर |
| तारागढ़ (अजमेर) | 873 मीटर |
| नाग पहाड़ (अजमेर) | 795 मीटर |
- मध्य अरावली:- औसत ऊंचाई 500-700 मीटर है।
- विस्तार:- सांभर (जयपुर) से देवगढ़ (राजसमंद) तक
- जिले:– अजमेर, ब्यावर, राजसमंद, जयपुर व पाली, भीलवाड़ा, टोंक के कुछ हिस्से
- ग्रेनाइट, संगमरमर और क्वार्ट्ज चट्टानें पाई जाती हैं
- दक्षिणी अरावली
- देवगढ़ (राजसमंद) से खेड़ब्रह्मा (सिरोही-गुजरात) सीमा तक।
- जिले:– राजसमंद, सिरोही, जालौर, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, सलुंबर व पाली के कुछ हिस्से।
- दक्षिणी अरावली को पुनः दो भागों में विभाजित किया गया है:–
- आबू अरावली:- यह मुख्य रूप से सिरोही, जालौर व पाली में स्थित है।\
- मेवाड़ अरावली:- यह मुख्य रूप से उदयपुर, सलूम्बर , चित्तौड़गढ़ और राजसमंद में स्थित है। जरगा (1431 मीटर – उदयपुर) मेवाड़ अरावली की सबसे ऊंची चोटी है।
- नोट:- ए. एम. हेरॉन के अनुसार अरावली का निर्माण।
| दिल्ली सुपर ग्रुप | ||
| अलवर समूह | अजबगढ़ समूह | राइलो समूह |
दक्षिणी अरावली की पर्वत चोटियाँ
| पर्वत चोटियाँ | ऊंचाई |
| गुरू शिखर (सिरोही) | 1722 मीटर |
| शेर (सिरोही) | 1597 मीटर |
| देलवाड़ा (सिरोही) | 1442 मीटर |
| जरगा (उदयपुर) | 1431 मीटर |
| अचलगढ़ (सिरोही) | 1380 मीटर |
| कुंभलगढ़ (राजसंमद) | 1224 मीटर |
| धोनिया (माउंट आबू) | 1183 मीटर |
| ऋषिकेश (सिरोही) | 1017 मीटर |
| कमलनाथ (उदयपुर) | 1001 मीटर |
| सज्जनगढ (उदयपुर) | 938 मीटर |
| सायरा (उदयपुर) | 900 मीटर |
| लीलागढ़ (उदयपुर-राजसमंद) | 874 मीटर |
| नागपानी | 867 मीटर |
| गोगुंदा | 840 मीटर |
| रोजा भाकर (जालौर) | 730 मीटर |
| कटाडा | 450 मीटर |
| ऋषभदेव | 400 मीटर |
अरावली के पठार
- उड़िया पठार
- यह दक्षिणी अरावली में सिरोही ज़िले में स्थित है।
- उड़िया पठार की ऊंचाई 1360 मीटर है।
- यह राजस्थान का सबसे ऊँचा पठार है।
- भोराठ
- यह दक्षिणी अरावली में उदयपुर (गोगुंदा पहाड़ी) से लेकर राजसमंद (कुंभलगढ़ पहाड़ी) तक स्थित है।
- भोराठ पठार की ऊंचाई 1224 मीटर है।
- आबू ब्लॉक
- यह एक पठार है।
- अबू पठार दक्षिणी अरावली में सिरोही ज़िले में स्थित है।
- अबू पठार की ऊंचाई 1200 मीटर है।
- अबू ब्लॉक बाथोलिथ संरचना का एक उदाहरण है।
- मेसा पठार
- यह चित्तौड़गढ़ में स्थित (620 मीटर) है।
- क्षेत्रफल के हिसाब से राजस्थान का सबसे लंबा पठार।
- लसाडिया
- यह स्थान दक्षिण अरावली में जयसमंद झील के पूर्व में प्रतापगढ़ के बीच स्थित है।
- यह एक बंजर पठार है।
- ऊपरमाल पठार
- यह भैंसरोडगढ़ (चित्तौड़गढ़) और बिजोलिया (भीलवाड़ा) के बीच स्थित है।
- क्रांसका व कंकणवारी पठार
- यह अलवर में स्थित है और उत्तरी अरावली का हिस्सा है।
- ये पठार अलवर (सरिस्का अभयारण्य) में स्थित हैं।
- भोमट पठार
- दक्षिण उदयपुर, उत्तर डूंगरपुर और पूर्वी सिरोही में स्थित।
- मानदेशरा पठार
- भैंसरोडगढ़ (चित्तौड़गढ़) जिले में स्थित है।
| अरावली पर्वत श्रृंखला के दर्रे | स्थान |
| सोमेश्वर, हाथी गुड़ा, कामली, गोरम, पगल्या, जीलवा नाल | राजसमंद |
| अधिकांश दर्रे राजसमंद में स्थित हैं। | |
| पगाल्या दर्रा | यह मेवाड़ (राजसमंद) को मारवाड़ (पाली) से जोड़ता है। |
| हाथी गुडा (राजसमंद) | यह राजसमंद, उदयपुर व सिरोही को जोड़ता है। |
| ढेबर (सलूम्बर) | पहले यह उदयपुर में था। जयसमंद झील इसी दर्रे में स्थित है, इसलिए इसे ढेबर झील भी कहा जाता है। |
| केवड़ा, फुलवारी, हाथी | उदयपुर |
| बर दर्रा | बर पाली मारवाड़ को अजमेर (ब्यावर) से जोड़ता है, N. H -162 और N. H. -25 यहां से गुजरते है। |
| देसुरी दर्रा (पाली) | पाली को राजसमंद से जोड़ता है |
| परवारिया दर्रा, सूरा दर्रा व बर दर्रा | ब्यावर में स्थित |
| सूरा घाट | यह व्याबर को भीलवाड़ा से जोड़ता है। |
| परवेरिया दर्रा | ब्यावर को मसुदा से जोड़ता है |
| शिवपुरी दर्रा | यह व्याबर को विजयनगर से जोड़ता है। |
| स्वरुप घाट दर्रा, जिलवाड़ा दर्रा उदाबारी दर्रा | अजमेर |
| कछवाली दर्रा | टॉडगढ़, व्याबर |
| अरनिया दर्रा | अजमेर |
| पीपल दर्रा | टॉडगढ़ (अजमेर) में सबसे अधिक ऊँचाई पर स्थित दर्रा |
| देबारी दर्रा | चित्तौड़गढ़ को उदयपुर से जोड़ता है |
| बोरंग दर्रा | यह सिरोही को उदयपुर से जोड़ता है |
महत्वपूर्ण तथ्य
- देशहरो – उदयपुर में जारगा और रागा पहाड़ियों के बीच स्थित क्षेत्र। यह क्षेत्र वनस्पति से समृद्ध है।
- मेरवाड़ा पहाड़ियाँ – अजमेर के पास स्थित पहाड़ियों को मेरवाड़ा पहाड़ियां कहा जाता है।
- गिरवा – पर्वतों की श्रृंखला या तश्तरी के आकार की पहाड़ियों को गिरवा कहा जाता है। उदयपुर शहर गिरवा पहाड़ियों में स्थित है।
- वृत्ताकार पहाड़ियाँ – बाड़मेर और बालोतरा में पाई जाती है। बालोतरा में अधिकतम।
- घोड़े के नाल की आकृति की पहाड़ियाँ – बारां
- अर्धचंद्राकार पहाड़ियाँ – बूंदी
- भाकर – सिरोही और जालौर के पश्चिम में सपाट और ऊबड़-खाबड़ क्षेत्र स्थानीय भाषा में ‘भाकर’ कहलाता है। उदाहरण रोजा और इसराना भाकर
- मगरा – उदयपुर का उत्तर पश्चिमी भाग
- पीडमॉन्ट पहाड़ी – तलहटी पर्वत या पर्वत श्रृंखला के आधार पर स्थित वह क्षेत्र है जो अपरदन द्वारा निर्मित होता है। यह मुख्यतः देवगढ़ (राजसमंद) में पाया जाता है।
- इन्सेलबर्ग – सिरोही पर्वत के माउंट आबू में मुख्य रूप से पाए जाने वाले, हवा के अपरदन से निर्मित सपाट ढलान वाली चट्टानी पहाड़ी या अनियमित पठार को इन्सेलबर्ग कहा जाता है।
- बैथोलिथ आबू ब्लॉक में बैथोलिथ प्रकार की संरचना पाई जाती है।
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महत्वपूर्ण पहाड़ियाँ |
ज़िले |
जसवंतपुरा पहाड़ियाँ :- डोरा पर्वत इन पहाड़ियों की चोटी है।
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जालौर |
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राजसमंद |
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जयपुर |
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कोटपूतली-बहरोड़ |
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उदयपुर |
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टिप्पणी: पहला रोपवे सुंधा माता मंदिर (जालौर) में और दूसरा रोपवे मछला मगरा उदयपुर में। |
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सीकर |
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जैसलमेर |
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कारौली |
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जोधपुर |
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बाड़मेर (सिवाणा) |
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सिरोही |
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अजमेर |
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सवाई – माधोपुर |
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अलवर |
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बूँदी |
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भीलवाड़ा |
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ब्यावर |
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पाली |
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कोटा, झालावाड़ |
अरावली का महत्व:
- जल विभाजक: यह राजस्थान के अपवाह तंत्र को दो भागों अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में विभाजित करता है। राजस्थान की अधिकांश नदियों का उदगम स्थल अरावली हैं। यह कई मीठे पानी की झीलों का स्रोत है। (जैसे – नक्की, पीछोला, आनासागर)
- प्राचीन सभ्यताओं की जननी: (आहड़, बैराठ, गणेशवर व गिलुंड) व आधुनिक (जयपुर, अजमेर व उदयपुर)।
- खनिजों का स्त्रोत स्थल: इस क्षेत्र में धारवाड़ श्रृंखला की उपस्थिति के कारण ग्रेनाइट और नीस क्वार्ट्जाइट चट्टानें प्रमुखता से पाई जाती है।
- धात्विक खनिज: लौह अयस्क, तांबा, सीसा, जस्ता, टंगस्टन, चांदी आदि।
- मरुस्थलीकरण के विरुद्ध अवरोधक:- अरावली पर्वत श्रृंखला थार रेगिस्तान व उपजाऊ मैदान के बीच एक प्राकृतिक अवरोध का काम करती है, व मरुस्थलीकरण को पूर्व की ओर फैलने से रोकती हैं।
- जैव विविधता: (वनस्पति और जीव-जंतु) कई प्रकार के पौधों और जानवरों को आश्रय प्रदान करती हैं।
- यह क्षेत्र लुप्तप्राय ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, ब्लैकबक, तेंदुआ, बाघ और लकड़बग्घे सहित कई उल्लेखनीय वन्यजीव प्रजातियों का आश्रयस्थल है।
- पर्यटन: यहां के प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक किले, वन्यजीव अभयारण्य और आध्यात्मिक स्थल प्रतिवर्ष लाखों पर्यटकों को आकृष्ट करते हैं, जिससे स्थानीय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को लाभ होता है।
- राजस्थान की जलवायु पर प्रभाव: अरावली पर्वतमाला दक्षिण-पश्चिम मानसून के समानांतर है, जिससे यह मानसूनी हवाओं को अवरुद्ध नहीं कर पाती है, परिणामस्वरूप राजस्थान का अधिकांश भाग शुष्क और अनुपजाऊ रहता है।
अरावली ग्रीन वॉल परियोजना
- उद्देश्य : अरावली ग्रीन वॉल परियोजना का उद्देश्य भूमि क्षरण से निपटने के लिए अरावली पर्वत श्रृंखला के आसपास एक 1400 किलोमीटर लंबा और 5 किलोमीटर चौड़ा हरित गलियारा विकसित करना है।
- प्रेरणा : यह परियोजना अफ्रीका की ग्रेट ग्रीन वॉल पहल जो सेनेगल से जिबूती तक फैली हुई है, से प्रेरित है।
- भौगोलिक क्षेत्र: यह परियोजना हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और दिल्ली के 29 ज़िलों के लगभग 60 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को शामिल करेगा ।

- शुरुआत: इसका शुभारंभ 25 मार्च 2023 को केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री द्वारा हरियाणा के टिकली गांव से किया गया था।
- भूमि पुनसंरक्षण: विशेष रूप से राजस्थान (81%), गुजरात (15.8%), हरियाणा (1.7%) और दिल्ली (1.6%) में 11.5 लाख हेक्टेयर तक अनुपजाऊ हो चुकी भूमि को 2027 तक पुनर्संरक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है ।
- जैव विविधता संरक्षण: अरावली क्षेत्र में स्थानीय वृक्ष (जैसे अर्जुन, ढाक, खेजड़ी, बरगद) लगाकर जैव विविधता को बढ़ावा देना,जिससे भारतीय भेड़िया, तेंदुआ और भालू जैसी लुप्तप्राय प्रजातियों को आश्रय प्रदान किया जा सके ।
- जल संरक्षण : प्रारंभिक चरण में 75 जल निकायों का पुनरुथान कर भूजल पुनर्भरण और मृदा नमी संरक्षण को प्रोत्साहन देना।
- वायु प्रदूषण में कमी: राजस्थान से दिल्ली तक धूल भरी आंधियों को कम करके वायु गुणवत्ता में सुधार करना जो दिल्ली के पीएम 2.5 स्तरों में 40% का योगदान देता है।
- रोजगार सृजन: : 5 करोड़ वृक्षारोपण का लक्ष्य ।
अरावली से सम्बंधित वर्तमान मुद्दा
- ऊंचाई आधारित नई परिभाषा: केंद्र सरकार ने क़ानूनी पहचान के रूप में 100 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली पर्वतमाला का भाग माना।
- वैज्ञानिक मानचित्रण से बदलाव:- यह भारत के वन सर्वेक्षण की 3 डिग्री ढलान पद्धति के विपरीत है।
- बड़े पैमाने पर बहिष्करण का जोखिम: दिल्ली एनसीआर और राजस्थान में अरावली पर्वतमाला भूभाग में स्थित कई क्षेत्रो को प्राप्त संरक्षण छीन सकता था।
- खनन संबंधी चिंताए – खनन पर प्रतिबंध लगने पर भी, मान्यता रद्द होने से शहरीकरण और अचल संपत्ति के विस्तार की संभावना।
- दीर्घकालिक पारिस्थितिक प्रभाव : विशेषज्ञों द्वारा खंडित संरक्षण के कारण जल संकट, लू, धूल भरी आंधी और जैव विविधता के नुकसान में वृद्धि की चेतावनी दी गई है।
- अरावली पहाड़ियों पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
- 20 नवंबर, 2025 को दिए गए अपने फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र के नेतृत्व वाली समिति की परिभाषा को स्वीकार किया।
- इसमें कहा गया है कि: केवल वे पहाड़ियाँ जो स्थानीय भूभाग से 100 मीटर या उससे अधिक ऊँची होती हैं, उन्हें अरावली श्रृंखला में शामिल किया जाएगा।
- #Save aravali इस फैसले के बाद जन आंदोलन शुरू हुआ। अंततः केंद्र सरकार ने सिफारिशों पर अपना रुख स्पष्ट किया।
- दिल्ली से गुजरात तक फैली संपूर्ण अरावली पर्वतमाला को अवैध खनन से बचाने और संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) द्वारा अरावली पर्वतमाला में किसी भी प्रकार के नए खनन पट्टे देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए राज्यों को निर्देश जारी किए गए।
- यह प्रतिबंध पूरे अरावली भूभाग पर समान रूप से लागू होता है और इसका उद्देश्य पर्वत श्रृंखला की अखंडता को संरक्षित करना है।इन निर्देशों का उद्देश्य गुजरात से लेकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र तक फैली एक सतत भूवैज्ञानिक श्रृंखला के रूप में अरावली पर्वतमाला की रक्षा करना और सभी अनियमित खनन गतिविधियों को रोकना है।
पूर्वी मैदानी क्षेत्र
- पूर्वी मैदान का निर्माण प्लीस्टोसीन काल में हुआ था।
- यह मैदान उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी से बना है, जो अरावली और हाड़ौती पठार के बीच प्रवाहित नदियों द्वारा सिंचित है।
- यह भूभाग 23 प्रतिशत क्षेत्रफल और 39% जनसंख्या घनत्व को शामिल करता है।
- राजस्थान का पूर्वी मैदानी क्षेत्र चंबल, बनास, बाणगंगा और उनकी सहायक नदियों द्वारा सिंचित है, जो गंगा के मैदान का ही एक विस्तारित भाग है।
- राजस्थान के 10 जिले पूर्वी मैदानी क्षेत्र में स्थित हैं।
- ज़िले –सवाई माधोपुर, करौली, धौलपुर, भीलवाड़ा, टोंक, भरतपुर, जयपुर, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, बांसवाड़ा।
- ढलान –पूर्वी मैदानी क्षेत्र का ढलान दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर है, लेकिन विशेष रूप से इसके भागों की बात करें तो, दक्षिणी भाग का ढलान पश्चिम की ओर है (माही नदी खम्भात की खाड़ी की ओर)।
- चंबल बेसिन – दक्षिण से उत्तर की ओर, बनास बेसिन – पश्चिम से पूर्व की ओर।
- वर्षा– प्रति वर्ष 50-80 सेमी
- मृदा – जलोढ़ मिट्टी
- जलवायु– आर्द्र जलवायु
- कुओं द्वारा अधिकतम सिंचाई, राजस्थान का सबसे उपजाऊ क्षेत्र और उच्चतम जनसंख्या घनत्व।
- कृषि– अधिकतम कृषि विकसित क्षेत्र, जिसे ‘राजस्थान का अन्न भंडार’ कहा जाता है।

- बनास – बाणगंगा बेसिन –
- बनास नदी बेसिन:-
- बनास और उसकी सहायक नदियों के मैदान को दक्षिण में मेवाड़ का मैदान और उत्तर में मालपुरा करौली का मैदान कहा जाता है।बेड़च, खारी, मानसी, मोरेल और बाणगंगा, बनास नदी की मुख्य सहायक नदियाँ हैं।
- यह मैदान पूर्व और उत्तर-पूर्व की ओर ढलान वाला है। इस क्षेत्र में सपाट चोटी वाली अलग-थलग पहाड़ियाँ हैं। मैदान की औसत ऊँचाई 280 से 500 मीटर के बीच है।
- बनास मैदान को पुनः 2 भागों में विभाजित किया गया है।
- मेवाड़ का मैदान-
- बनास के दक्षिणी मैदान को मेवाड़ मैदान के नाम से जाना जाता है।
- इसका विस्तार राजसमंद, भीलवाड़ा और चित्तौड़गढ़ में है। यहाँ अधिकांशतः भूरी मिट्टी पाई जाती है।

- मालपुरा – करौली मैदान –
- बनास के उत्तरी मैदान को मालपुरा-करौली मैदान के नाम से जाना जाता है। इसका विस्तार अजमेर, सवाई माधोपुर और टोंक तक है। इस मैदान में भूरी मिट्टी पाई जाती है।
- मालपुरा – करौली मैदान – ए. एम. हेरॉन द्वारा इसे “तीसरा पेनेप्लेन” कहा जाता है।
- बाणगंगा मैदान :-
- बाण गंगा का मैदान जयपुर, कोटपूतली-बहरोड़, दौसा, भरतपुर में स्थित है। यहाँ जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है।
- रोही मैदान:- जयपुर और भरतपुर के बीच बाण गंगा और यमुना नदियों के बीच स्थित मैदानी क्षेत्र को रोही दोआब क्षेत्र के नाम से जाना जाता है।
- खेराड मैदान:- यह शाहपुरा (भीलवाड़ा) और टोंक जिले में फैला हुआ एक ऊबड़-खाबड़, अनियमित मैदानी क्षेत्र है।
- मलखेराड – टोंक जिले का मालपुरा क्षेत्र।
- बाण गंगा का मैदान जयपुर, कोटपूतली-बहरोड़, दौसा, भरतपुर में स्थित है। यहाँ जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है।
- चम्बल का मैदान:-
- चंबल नदी के अवनालिका अपरदन से निर्मित बंजर मैदान को खड्ड या डांग मैदान के नाम से जाना जाता है।
- चंबल का मैदान कोटा, बूंदी, करौली, धौलपुर और सवाई माधोपुर में फैला हुआ है।
- ढलान और ऊँचाई
- चंबल बेसिन का ढलान पूर्व दिशा की ओर है। इसकी ऊँचाई समुद्र तल से 150 से 300 मीटर के बीच है।
- राजस्थान के जिले:
- कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़, सवाई माधोपुर, करौली, धौलपुर
- इस बेसिन में नवीन जलोढ़ निक्षेप पाए जाते हैं। चंबल बेसिन की सबसे प्रमुख भू-आकृति बीहड़ (बंजर भूमि) है।
- राजस्थान के जिले:
- चंबल बेसिन का ढलान पूर्व दिशा की ओर है। इसकी ऊँचाई समुद्र तल से 150 से 300 मीटर के बीच है।
- बीहड़ के गठन का कारण:- चंबल नदी के कारण होने वाला अवनालिका अपरदन।
- बीहड़ का वितरण: सवाई-माधोपुर, करौली व धौलपुर ज़िले।
- बीहड़ के अधिकतम घनत्व वाला क्षेत्र: धौलपुर।
- बीहड़ का सर्वाधिक विस्तार: सवाई माधोपुर।
- “करौली” को “बीहड़ की रानी” के नाम से जाना जाता है।
- माही बेसिन
- राजस्थान के दक्षिणी मैदान को वागड़ मैदान कहा जाता है, जिसका विस्तार बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और डूंगरपुर तक है व इसे छप्पन बेसिन, भाटी मैदान कहा जाता है।
- छप्पन मैदान – बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ के बीच 56 छोटी नदियों और वितरिकाओं के समूह से बने मैदान को छप्पन मैदान कहते हैं।
- कांठल – प्रतापगढ़ में माही नदी के जलग्रहण क्षेत्र को कंठाल कहा जाता है। प्रतापगढ़ का प्राचीन नाम कांठल था, इसलिए माही को भी इसी नाम से “कांठल की गंगा” के नाम से जाना जाता है।
- यहां लाल दोमट मिट्टी पाई जाती है – जो चावल और मक्का व गन्ने की खेती के लिए उपयुक्त है। ढलान – पश्चिम की ओर है, औसत ऊंचाई 200-400 मीटर है।
- राजस्थान के पूर्वी मैदान का महत्व
- कृषि उत्पादकता
- इस क्षेत्र में बलुई और जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है, जो अत्यधिक उपजाऊ होती है। प्रमुख फसलों में गेहूं, जौ, सरसों, गन्ना, चना और धान शामिल हैं।
- कुऍं, ट्यूबवेल व बांध जैसी पर्याप्त सिंचाई सुविधाएं उपलब्ध हैं।
- जनसंख्या घनत्व
- उपजाऊ भूमि, पानी की उपलब्धता और रोजगार के अवसरों के कारण जनसंख्या घनत्व अधिक है। शहरीकरण की दर भी काफी अधिक है।
- जनसंख्या घनत्व
- कृषि उत्पादकता
- अवसरंचनात्मक ढांचा
- सड़क, रेलवे, बिजली आपूर्ति, शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं विकसित हैं। जयपुर जैसे शहर महत्वपूर्ण प्रशासनिक और वाणिज्यिक केंद्रों के रूप में कार्य करते हैं।
- औद्योगिक विकास
- जयपुर, अलवर, भीलवाड़ा और अजमेर प्रमुख औद्योगिक केंद्र हैं। इस क्षेत्र में वस्त्र, धातु, सीमेंट, ऑटोमोबाइल और हस्तशिल्प जैसे उद्योगों का विकास हुआ है।
- औद्योगिक विकास
- सड़क, रेलवे, बिजली आपूर्ति, शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं विकसित हैं। जयपुर जैसे शहर महत्वपूर्ण प्रशासनिक और वाणिज्यिक केंद्रों के रूप में कार्य करते हैं।
- जैव विविधता
- भरतपुर का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान एक प्रसिद्ध पक्षी अभयारण्य है। सर्दियों के दौरान कई प्रवासी पक्षी इस क्षेत्र में आते हैं।
- सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व
- जयपुर, अलवर और करौली जैसे शहर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। किले, मंदिर और धरोहर स्थल इस क्षेत्र की पहचान का प्रतिनिधित्व करते हैं।
दक्षिण-पूर्वी पठार
- यह पठार क्रीटेशस अवधि में ज्वालामुखी विस्फोट से उत्पन्न बेसाल्ट लावा से बना था।।
- राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी पठार को हाड़ौती के नाम से जाना जाता है। यह राजस्थान का 7 प्रतिशत क्षेत्रफल व 11 प्रतिशत आबादी को शामिल करता है।
- दक्षिण-पूर्वी पठार को दो प्रमुख भागों और पांच उप- भागों में विभाजित किया जाता है।
दक्कन लावा पठार –
- यह हाड़ौती के दक्षिणी भाग में मध्य प्रदेश के मालवा पठार के विस्तार के रूप में स्थित है।
- इसका विस्तार मालवा व ऊपरमाल का क्षेत्र है।
- मालवा क्षेत्र:- यह प्रतापगढ़ व झालावाड़ में मालवा पठार के विस्तार क्षेत्र में स्थित है।
- ऊपरमाल क्षेत्र :- यह एक पठारी क्षेत्र है जो भीलवाड़ा (बिजोलिया) से चित्तौड़गढ़ (भैंसरोडगढ़) तक फैला हुआ है।
- यह बलुआ पत्थर और चूना पत्थर की चट्टानों से बना है।

विंध्यन कगार
- यह हाड़ौती के दक्षिण-पूर्व में फैला हुआ है। यह कगार बनास और चंबल नदियों के बीच लगातार दक्षिण-पूर्व और पूर्व दिशा की ओर फैली हुई है।
- विंध्यन कगार में लाल पत्थर, चूना पत्थर, कोटा पत्थर, बलुआ पत्थर जैसी कई चट्टानें और खनिज पाए जाते हैं। इनमें से लाल पत्थर और बलुआ पत्थर सबसे अधिक मात्रा में पाए जाते हैं।
- विंध्यन कगार को पुनः 2 भागों में विभाजित किया गया है:
- डांग:- करौली, धौलपुर और सवाई माधोपुर।
- हाड़ौती:- बारां, झालावाड़, कोटा, बूंदी।
- हाड़ौती को पुनः 5 उप- भागों में विभाजित किया गया है।
- अर्धवृत्ताकार पहाड़ियाँ – हाड़ौती पठार पर पर्वत श्रृंखलाओं का अर्धवृत्ताकार फैलाव है, जिन्हें क्रमशः बूंदी और मुकुंदरा पर्वत श्रृंखलाओं के नाम से जाना जाता है।
- बूंदी पहाड़ियाँ – बूंदी जिले में स्थित 96 किलोमीटर लंबी अर्धवृत्ताकार पहाड़ियाँ, जिनकी सबसे ऊँची चोटी सत्तूर (353 मीटर) है।
- मुकुंदरा पहाड़ियाँ (कोटा-झालावाड़) – हाड़ौती पठार लगभग 120 किलोमीटर लंबी अर्धवृत्ताकार पर्वत श्रृंखला से बना है।औसत ऊँचाई समुद्र तल से 335 से 503 मीटर है। इसकी सबसे ऊँची चोटी चाँदवाड़ी (517 मीटर) है। काली सिंध नदी इन पर्वत श्रृंखलाओं से होकर बहती है और गगरोन में आहू नदी से मिलती है।
- नदी निर्मित मैदान – बूंदी और मुकुंदरा पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा लगभग 7,885 वर्ग किलोमीटर का मैदानी क्षेत्र चंबल नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा निर्मित है।
- शाहबाद उच्चभूमि क्षेत्र – यह हाड़ौती पठार का अपेक्षाकृत ऊँचा क्षेत्र है। रामगढ़ गाँव के पास एक अनोखी पर्वत श्रृंखला है। यह एक समतल क्षेत्र पर दूरस्थ रूप से निर्मित है।नोट – रामगढ़ पहाड़ियाँ – बूंदी और बारां के बीच स्थित ये पहाड़ियाँ बूंदी जिले में घोड़े की नाल के आकार की पहाड़ियाँ कहलाती हैं।
- झालावाड़ पठार – मुकुंदरा पर्वत श्रृंखलाओं के दक्षिण में लगभग 6183 वर्ग किलोमीटर का पठारी क्षेत्र है जिसकी ऊँचाई 300 से 450 मीटर है। यह मालवा पठार का अभिन्न अंग है। यहाँ काली मिट्टी पाई जाती है।
- डग गंगधार उच्चभूमि क्षेत्र – यह झालावाड़ के ऊपर स्थित लावा से निर्मित एक उच्चभूमि क्षेत्र है। नोट – कुंडला पहाड़ियाँ – कोटा के चारों ओर कुंडलित पहाड़ियों को कुंडला पहाड़ियाँ कहा जाता है।

- बूंदी में स्थित प्रमुख दर्र
- रामगढ़ दर्रा
- लाखेरी दर्रा
- खटकर दर्रा
- जेठवास दर्रा
- बूंदी दर्रा
महान सीमा भ्रंश
- यह चित्तौडग़ढ़, भीलवाड़ा, बूंदी, करौली, धौलपुर व सवाई- माधोपुर में विस्तारित है।
- महान सीमा भ्रंश अरावली के पूर्व व हाड़ौती क्षेत्र के उत्तर-पूर्व की ओर स्थित है।
- महान सीमा भ्रंश शाखाओं वाली विपरीत भ्रंश है जो प्रायद्वीपीय भारत से उप-हिमालय तक फैली हुई है। इसका निर्माण विवर्तनिक दबावों के कारण हुआ है।
- भूगर्भीय प्रभाव: महान सीमा भ्रंश क्षेत्र की स्थलाकृति, खनिज संसाधनों, जल प्रवाह और मिट्टी की संरचना को प्रभावित करता है।
- मुकुंदरा पर्वतमाला राजस्थान की विंध्य पर्वतमाला का ही एक विस्तार है।
- राजस्थान का दक्षिणी-पूर्वी भागयह हाड़ौती क्षेत्र के अंतर्गत आता है।

- हाड़ौती पठार की विशेषताएं
- राजस्थान का दक्षिणी- पूर्वी भाग हाड़ौती क्षेत्र कहलाता है
- भूगर्भिक संरचना
- क्रिटेशियस काल की बेसाल्टिक चट्टानों से निर्मित।
- प्रमुख खनिज संसाधन: बलुआ पत्थर, लाल पत्थर, कोटा स्टोन, चूना पत्थर
- मिट्टी और कृषि
- ज्वालामुखी गतिविधि और लावा के विखंडन के कारण काली मिट्टी (वर्टिसोल) की प्रधानता है।
- प्रमुख फसलें: सोयाबीन, धनिया (राजस्थान में सबसे अधिक उत्पादन), कपास, गन्ना
- अपवाह तंत्र
- चंबल नदी (राजस्थान की सबसे बड़ी वितरिका) इस क्षेत्र से होकर बहती है।
- अन्य प्रमुख नदियाँ: कालीसिंध, आहू, परवन,घोड़ापछाड, कुन्नू, पार्वती। राजस्थान की अधिकांश नदियाँ हाड़ौती से होकर बहती हैं, जिससे गंभीर मृदा अपरदन होता है।
- वर्षा और जलवायु
- बंगाल की खाड़ी का मानसून हाड़ौती मार्ग से राजस्थान में प्रवेश करता है।
- यह शाखा राजस्थान की कुल वर्षा में लगभग 90% का योगदान करती है।
- राजस्थान में सबसे अधिक वर्षा (80 सेंटीमीटर से अधिक) और आर्द्रता वाला क्षेत्र ह
- औद्योगिक और जनजातीय विशेषताएं
- कोटा को “राजस्थान का औद्योगिक शहर” कहा जाता है।
- इंद्रप्रस्थ औद्योगिक क्षेत्र कोटा में स्थित है।
- बारां जिला सहरिया जनजाति का निवास स्थान है।
