भाषा एवं साहित्य

भाषा एवं साहित्य: राजस्थानी कला व संस्कृति के अध्ययन में भाषा एवं साहित्य का महत्वपूर्ण स्थान है। राजस्थान में मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती आदि अनेक बोलियाँ प्रचलित हैं, जो यहाँ की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाती हैं। लोक साहित्य, वीर गाथाएँ, भक्तिकाव्य तथा लोकगीत राजस्थान की समृद्ध साहित्यिक परंपरा को अभिव्यक्त करते हैं।

राजस्थानी भाषा की बोलियाँ, राजस्थानी भाषा का साहित्य और लोक साहित्य

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  • राजस्थान की मातृभाषा – राजस्थानी तथा राजभाषा – हिन्दी 
  • 14 सितम्बर – हिन्दी दिवस तथा 21 फरवरी को राजस्थानी भाषा दिवस 
  • लोकोक्ति “पाँच कोस पर पानी बदले, सात कोस पर बाणी” प्रदेश की भाषायी विविधता को दर्शाती है
  • राजस्थानी भाषा की पारंपरिक लिपि –  महाजनी (मुडिया)
  • मुंडिया लिपि के आविष्कारक – टोडरमल 
  • भरतेश्वर बाहुबलि घोर – राजस्थानी भाषा का प्राचीनतम ग्रन्थ ”वज्रसेन सूरि” द्वारा रचित ” 

राजस्थानी भाषा उल्लेख एवं नामकरण

  • कुवलयमाला –
    • 8वीं (वि.सं. 835 / 913 ई.) शताब्दी में उद्योतन सूरी द्वारा रचित
    • इसमें हूणों के आक्रमणों के प्रमाण मिलते हैं
    • ग्रंथ में 18 देशी भाषाओं का उल्लेख जिनमें एक मरु भाषा (मारवाड़ी) भी है
  • आइन-ए-अकबरी
    • अबुल फ़ज़ल द्वारा रचित; मारवाड़ी भाषा का उल्लेख
  • पिंगल शिरोमणि
    • कवि कुशल लाभ द्वारा रचित; इसमें भी मारवाड़ी भाषा का संदर्भ मिलता है
  • ‘राजपूताना’ शब्द का प्रथम प्रयोग जॉर्ज थॉमस (1800 ई.)
  • दी एनाल्स एण्ड एंटीक्वीटीज ऑफ राजस्थान – 1829 ई.
    • कर्नल जेम्स टॉड द्वारा, राजस्थान’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग
    • राजस्थान, रायथान एवं रजवाड़ा जैसे शब्दों का उल्लेख
  • लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया – 1908 ई.
    • जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा,  ‘राजस्थानी’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 
    • प्रथम वैज्ञानिक वर्गीकरण

डॉ मोतीलाल मनेरिया के अनुसार राजस्थानी भाषा का वंश वृक्ष

Language and Literature | भाषा एवं साहित्य

राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति

  • वैदिक संस्कृत → लौकिक संस्कृत
  • लौकिक संस्कृत के जटिल होने पर → पाली
  • पाली के जटिल  होने पर → प्राकृत
  • प्राकृत के जटिल होने पर → अपभ्रंश
  • अपभ्रंश से → राजस्थानी भाषा का विकास

राजस्थानी भाषा के विकास से तीन अपभ्रंश भाषाएँ जुड़ी मानी जाती हैं, फिर भी अधिकांश विद्वानों के अनुसार राजस्थानी भाषा का विकास मरुगुर्जरी अपभ्रंश से हुआ

विद्वानभाषा की उत्पत्ति के संबंध में मत
शौरसेनी अपभ्रंशडॉ एल पी टैसीटोरीमहावीर प्रसाद शर्मा 
नागर अपभ्रंशडॉ. जॉर्ज ए. ग्रियर्सनपुरुषोत्तम मनेरिया 
मरुगुर्जरी अपभ्रंशडॉ. मोतीलाल मनेरियाके. एम मुंशी 
सौराष्ट्री अपभ्रंश डॉ सुनीति कुमार चटर्जी
पहलूडिंगलपिंगल
क्षेत्रपश्चिमी राजस्थानपूर्वी राजस्थान
रचनाकारमुख्यत: चारण कवियों द्वारा रचितमुख्यत: भाट कवियों द्वारा रचित
उत्पत्तिगुर्जरी अपभ्रंश से विकसितशौरसेनी अपभ्रंश से विकसित
भाषा संरचनाशुद्ध राजस्थानीराजस्थानी और ब्रज भाषा का मिश्रण
प्रमुख रसवीर रस (वीरता का भाव)श्रृंगार रस (प्रेम और सौंदर्य का भाव)
प्रमुख ग्रन्थ राजरुपक, अचलदास खींची री वचनिका, राव जैतसी रो छंद, ढोला मारु रा दूहा, रूकमणि हरण, सगत रासो आदि।पृथ्वीराजरासो, विजयपाल रासो खुमाण रासो, वंश भास्कर आदि।

बोलियों का वर्गीकरण

केलॉग का वर्गीकरण (1876) : 

  • पुस्तक – “ए ग्रामर ऑफ द हिंदी लैंग्वेज” 
  • हिंदी क्षेत्र की बोलियों को छ: उपभाषा समूहों में विभाजित
  • जैसे – मारवाड़ी, मेवाड़ी, मारवाड़ी, जयपुरी और हाड़ौती 

एल.पी. टेस्सीटोरी का वर्गीकरण :

टैस्सीटोरी ने राजस्थान और मालवा की बोलियों को दो भागों में विभाजित किया:

  • पश्चिमी राजस्थानी (मारवाड़ी)
  • पूर्वी राजस्थानी (ढूंढाड़ी)

डॉ. जॉर्ज ए. ग्रियर्सन का वर्गीकरण :

ग्रियर्सन ने राजस्थानी बोलियों का विस्तृत वर्गीकरण प्रस्तुत किया:

  • पश्चिमी राजस्थानी: मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढटकी, थली, बीकानेरी, बागड़ी, शेखावाटी, खेराड़ी, गोड़वाड़ी, देवड़ावाटी।
  • उत्तरपूर्वी राजस्थानी: अहीरवाटी, मेवाती।
  • मध्यपूर्वी राजस्थानी: ढूंढाड़ी, तोरावाटी, खड़ी जयपुरी, काठैड़ी, राजावाटी, अजमेरी, किशनगढ़ी, चौरासी, नागरचाल, हाड़ौती (रिवाड़ी सहित)।
  • दक्षिणपूर्वी राजस्थानी: मालवी (रांगड़ी, सौंधवाड़ी)।
  • दक्षिणी राजस्थानी: निमाड़ी।

राजस्थानी भाषा की बोलियाँ

मारवाड़ी : 

  • क्षेत्र – जोधपुर, नागौर, जैसलमेर, पाली, शेखावाटी के कुछ भाग
  • क्षेत्रफल की दृष्टि से सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा 
  • उत्पत्ति – 8 वीं सदी, शौरसेनी प्राकृत के गुर्जरी अपभ्रंश से हुई, जिसका प्राचीन नाम मरूभाषा था
  • प्राचीनतम प्रमाण कुवलयमाला ग्रंथ से मिलता है
  • महत्त्व: सबसे अधिक बोली जाने वाली, राजस्थानी भाषा का मानक रूप, राजस्थान की मरुभाषा
  • उपबोलियाँ: थली, देवड़ावाटी, गोडवाड़ी, ढटकी, ढाटी (बाड़मेर), खैराड़ी, शेखावाटी
  • मारवाड़ी की शिल्पगत विशेषता – सोरठा, छंद, मांड राग
  • डिंगल – मारवाड़ी बोली का साहित्यिक रूप 
  • अधिकांश जैन साहित्य मारवाड़ी बोली में ही लिखा गया।
  • उदा. मीराबाई के पद, प्राचीन जैन साहित्य, चारण साहित्य, राजिया रा सोरठा (पूर्वी मारवाड़ी) व वेलि कृष्ण रूकमणी री (उत्तरी मारवाड़ी) जैसी रचनाएँ
  • उपबोलियाँ – शेखावाटी, गोडवाड़ी, मेवाड़ी (मोतीलाल मनेरिया द्वारा), वागड़ी, नागौरी, ढटकी, ढाटी, थली, देवड़ावाटी, बीकानेरी, सिरोही, नागौरी एवं खैराड़ी

मेवाड़ी : 

  • क्षेत्र: उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा
  • इसमें साहित्यिक रचना कम हुई , मारवाड़ी के बाद राजस्थान की दूसरी महत्त्वपूर्ण बोली 
  • ‘ए’ और ‘ओ’ की ध्वनि का विशेष प्रयोग 
  • प्रकार –
    • पर्वती मेवाड़ी (पहाड़ी क्षेत्र)
    • मैदानी मेवाड़ी (मैदानी क्षेत्र)
  • महाराणा कुंभा के नाटक एवं कीर्ति स्तंभ पर लिखित प्रशस्ति, जगत अम्बिका मंदिर में उत्कीर्ण शिलालेख इसी भाषा में है।
  • बावजी चतुर सिंह ने मेवाड़ी में वेग सूत्र, भगवद्गीता सांख्यकारिका लिखे
  • धावड़ी उदयपुर की एक बोली है
  • मोतीलाल मनेरिया ने मेवाड़ी को मारवाड़ी की ही एक उपबोली माना है 

ढूंढाड़ी : 

  • क्षेत्र: जयपुर, टोंक, दूदू (प्राचीन ढूंढार क्षेत्र), किशनगढ़
  • विशेषता: ब्रजभाषा और गुजराती प्रभाव, “छे” शब्द का प्रयोग, काई-कुई भाषा भी कहते हैं 
  • उपबोलियाँ: तोरावाटी, राजावाटी, नागरचोल, चौरासी, हाड़ौती, काठेड़ी, उदयपुरवाटी, अजमेरी, किशनगढ़ी इत्यादि 
  • उपनाम – झाड़शाही बोली/जयपुरी बोली
  • ढूँढ़ाड़ी का सबसे प्राचीनतम प्रमाण – 18वीं सदी के ग्रन्थ ‘आठ देस गूजरी’ में 
  • दादूपंथ का अधिकांश साहित्य इसी बोली में 

मेवाती : 

  • क्षेत्र: अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली 
  • विशेषत: मेव जाति के मुसलमानों द्वारा बोली जाती है।
  • ब्रज भाषा का प्रभाव, पश्चिमी हिन्दी और राजस्थानी बोली के मध्य सेतु का कार्य 
  • उदा. संत लालदास, चरणदास, दयाबाई, सहजोबाई, डूंगरसिंह इत्यादि की रचनाओं में मेवाती बोली  – ‘सहज प्रकाश’, ‘सोलह तिथि’, ‘दयाबोध’ तथा ‘विनयमालिका’
  • उप बोलियाँ – खड़ीमेवाती, कठेर मेवाती, राठी मेवाती, ब्राह्मण मेवाती, बीघोता, भयाना मेवाती आदि

मालवी : 

  • क्षेत्र: मालवा क्षेत्र से सटे क्षेत्र (प्रतापगढ़, कोटा, झालावाड़)
  • गुजराती एवं मराठी भाषा का न्यूनाधिक प्रभाव
  • उपबोलियाँ: राँगड़ी, नीमाड़ी, सोंडवाड़ीं, पाटवी, रतलामी , उमठवाड़ी
    • रांगड़ी बोली – मारवाड़ी और मालवी का मिश्रण 
    • नीमाड़ी बोली- दक्षिणी झालावाड़ और चित्तौड़गढ़ के कुछ भाग

अहीरवाटी (राठी) : 

  • क्षेत्र: मुंडावर व बहरोड़, कोटपुतली (बांगड़ू और मेवाती का संगम क्षेत्र)
  • राठी नाम – अहीर जाति का निवास क्षेत्र होने के कारण यह क्षेत्र राठ/हीरवाल और इसकी भाषा राठी  
  • ‘अलीबख्श’ (अलवर के रसखान) के ख्याल नाट्य, जोधराज का ‘हम्मीर रासो’ तथा शंकरराव का भीमविलास इसी भाषा में लिखे हुए हैं

उपबोली

क्षेत्र

तोरावाटी 

  • मुख्यत: जयपुर व सीकर की बोली तोरावाटी प्रदेश – कांतली नदी का अपवाह क्षेत्र 

राजावाटी

  • जयपुर के पूर्वी भाग, सवाई माधोपुर 

नागर चोल

  • सवाई माधोपुर के पश्चिमी तथा टोंक के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों में

गोड़वाड़ी

  • क्षेत्र – जालौर, पाली, सिरोही
  • लूणी नदी के खारे पानी का अपवाह क्षेत्र गोडवाड़ प्रदेश
  • प्रमुख केन्द्र – बाली (पाली)
  • उपबोलियाँ – सिरोही, बालवी, खणी, महाहड़ी आदि
  • नरपति नाल्ह कृत बीसलदेव रासो इसी बोली की रचनाएँ है.

देवड़ावाटी

  • क्षेत्र – सिरोही
  • सिरोही के देवड़ा शासकों की बोली

सोंडवाडी 

  • झालावाड़ 

चौरासी

  • जयपुर जिले के दक्षिण-पश्चिमी भाग व टोंक के पश्चिमी भाग (दूदू क्षेत्र) में प्रचलित

हाड़ौती

  • क्षेत्र – कोटा, बूँदी, बारां, झालावाड़
  • विशेषता: ढूंढाड़ी की उपबोली, “छै” शब्द का प्रयोग
  • कवि सूर्यमल्ल मिश्रण के काव्य ग्रंथ इसी बोली में रचित। 
  • 1875 ई. में एम. केलांग ने अपनी पुस्तक ‘हिन्दी ग्रामर’ में ‘हाड़ौती’ शब्द का भाषा के अर्थ में प्रथम प्रयोग किया

खैराड़ी

  • ढूँढाड़ी, मेवाड़ी व हाड़ौती का मिश्रण
  • क्षेत्र – शाहपुरा, बूँदी, दक्षिणी टोंक 
  • मीणाओं की प्रिय बोली
  • विशेष – माल खैराड़ी बोली मालपुरा में

शेखावाटी

  • ढूँढाड़ी से प्रभावित, खड़ी व कर्कश बोली 
  • क्षेत्र – सीकर, चूरू, झुंझुनू

थली बोली

  • बीकानेर के आसपास के क्षेत्रों में 

वागड़ / बागड़ी

  • क्षेत्र – डूंगरपुर, बांसवाड़ा
  • मेवाड़ी, मालवी व गुजराती का प्रभाव 
  • उपनाम – भीली बोली (ग्रियर्सन) 
  • डॉ हीरालाल माहेश्वरी इसे स्वतंत्र भाषा नहीं मानते 
  • च’ और का उच्चारण ‘स’ से, था के स्थान पर ‘हतो’ का प्रयोग  
  • संत मावजी की रचनाएँ इसी में

ढाटी (धाती)

  • मुख्यत: बाड़मेर क्षेत्र में 

ढटकी

  • बीकानेर, जोधपुर व जैसलमेर क्षेत्रों में 

जागरोती

  • करौली क्षेत्र 

अजमेरी

  • अजमेर जिले के ग्रामीण क्षेत्रों की बोली

किशनगढ़ी

  • किशनगढ़ के सीमावर्ती क्षेत्र

काठेड़ी

  • मुख्यत: सवाई माधोपुर, दौसा, दक्षिणी जयपुर  

पचवारी

  • लालसोट से सवाई माधोपुर के मध्यवर्ती क्षेत्र 

धावड़ी 

  • उदयपुर 

राजस्थानी साहित्य का इतिहास 11वीं शताब्दी से शुरू होता है

  • प्राचीन काल – वीर गाथा काल (1050-1450 ई.)
  • पूर्व मध्य काल – भक्ति काल (1450 से 1650 ई.)
  • उत्तर मध्य काल श्रृंगार, रीति एवं नीति परक काल (1650 से 1850 ई.)
  • आधुनिक काल, विविध विषयों एवं विधाओं से युक्त(1850 से अद्यतन)

साहित्यिक रचना

रचनाकार

वर्णन / ऐतिहासिक महत्त्व

भरतेश्वर बाहुबली घोर

वज्रसेन सूरि

  • राजस्थानी भाषा में लिखा सबसे प्राचीन जैन ग्रंथ (1168 ई.)

भरतेश्वर बाहुबली रास

शालिभद्र सूरी

  • संवत उल्लेख के साथ प्रथम राजस्थानी रचना 

हम्मीर महाकाव्य

नयनचन्द्र सूरी

  • रणथम्भौर के चौहान वंश का इतिहास, अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण (1299-1301) तथा हम्मीरदेव चौहान की वीरता का वर्णन 
  • चौहान राजपूतों की उत्पत्ति सूर्यवंश से बताई गई है।

हम्मीर रासो 

शारंगधर 

  • अहीरवाटी बोली की रचना
  • संस्कृत भाषा का ग्रंथ
  • रणथम्भौर राजा हम्मीर व मुस्लिम शासक अलाउद्दीन खिलजी के बीच हुए युद्ध का विवरण

नोट – अन्य हम्मीर रासो (महेश व कवि जोधराज ने भी रचना की है)

हम्मीरायण 

भाण्डऊ  व्यास 

  • हम्मीर के बारे में जानकारी 

हम्मीर मद मर्दन

जयसिंह सूरी

  • जैत्रसिंह व इल्तुतमिश के युद्ध (भूताला युद्ध) का वर्णन 

हम्मीर हठ 

चंद्रशेखर 

  • हम्मीर के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश  

वीर मायण

बादर ढाढ़ी

  • खेड के राव मल्लीनाथ एवं उनके भतीजे गोविन्द द्वारा किए युद्धों का वर्णन

अमरसार

पं. जीवाधर

  • 16वीं सदी में रचित
  • महाराणा प्रताप एवं अमरसिंह प्रथम, दास प्रथा, सैनिक वेशभूषा, मल्लयुद्ध, पशु-युद्ध 
  • तत्कालीन सांस्कृतिक जीवन की जानकारी

एकलिंग महात्म्य

महाराणा कुंभा (कान्ह व्यास द्वारा पूर्ण)

  • गुहिलोत (गुहिल) वंश की वंशावली, वर्णाश्रम व वर्ण व्यवस्था पर प्रकाश
  • तुलना पुराणों से की जाती है
  • भाषा संस्कृत

राजवल्लभ

मण्डन

  • 14 अध्यायों में विभक्त
  • 15वीं सदी की वास्तुकला, नगर, द्वार, मंदिर, बाज़ार, राजप्रासाद, दुर्ग का विवरण

राजविनोद

सदाशिव भट्ट

  • 16वीं सदी में रचित
  • अजीत सिंह का दरबारी विद्वान
  • बीकानेर नरेश कल्याणमल के शासनकाल की जानकारी 
  • रहन-सहन, रीति-रिवाज, खान-पान एवं आर्थिक स्थिति

राज रत्नाकर

सदाशिव भट्ट

  • महाराणा राजसिंह के समय का सामाजिक चित्रण एवं दरबारी जीवन का वर्णन।

राजविलास 

मान कवि

  • मेवाड़ महाराजा राजसिंह की उपलब्धियों का वर्णन 
  • उदयपुर नगर निर्माण व राजसमंद झील के निर्माण की जानकारी जानकारी

कर्मचन्द वंशोत्कीर्तन काव्यम्

जयसोम

  • बीकानेर के राठौड़ों का इतिहास, बीकानेर दुर्ग का निर्माण, राज्य विस्तार तथा दान-पुण्य संस्थाओं की जानकारी

अमरकाव्य वंशावली

रणछोड़ भट्ट तैलंग

  • भाषा – संस्कृत 
  • बप्पा रावल से राणा राजसिंह तक का मेवाड़ी इतिहास 
  • जौहर, दीपावली, होली आदि त्योहारों का वर्णन

पृथ्वीराज विजय

जयानक

  • 12वीं सदी के उत्तरार्द्ध में संस्कृत में पुष्कर में रहकर लिखा  
  • पृथ्वीराज चौहान की वंशावली और उपलब्धियाँ 

पृथ्वीराज रासो

चन्दबरदाई (पृथ्वीराज वलादि भट्ट)

  • पिंगल भाषा का यह ग्रन्थ हिन्दी भाषा का प्रथम उपलब्ध महाकाव्य
  • चन्दबरदाई के दत्तक पुत्र जल्हण ने  पूरा किया 
  • प्रसिद्ध विरोक्ति – “चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चुके चौहान”

भट्टिकाव्य

भट्टि

  • 15वीं सदी में रचित
  • जैसलमेर राज्य की राजनीतिक व सामाजिक स्थिति। 
  • जैसलमेर के शासक भीम की मथुरा-वृंदावन यात्रा का वर्णन

प्रबंध चिंतामणि

मेरुतुंग

  • 1305 ई. में 
  • पृथ्वीराज चौहान के शासन प्रबंध की जानकरी 

प्रबंध कोष  

राजशेखर 

  • भाषा – संस्कृत 
  • प्रतिहार महेंद्रपाल, महिपाल का दरबारी कवि

अजितोदय

जगजीवन भट्ट

  • 17वीं सदी में रचित
  • महाराजा जसवंत सिंह प्रथम एवं अजीत सिंह के समय के युद्ध, संधियाँ, विजय तथा रीति-रिवाज

पद्मावत

मलिक मोहम्मद जायसी

  • 1540 ई. में रचित महाकाव्य
  • रतन सिंह एवं अलाउद्दीन खिलजी के मध्य युद्ध (1301 ई.) का वर्णन

कान्हड़दे प्रबंध

पद्मनाभ

  • जालोर के शासकों की उपलब्धियों
  • इसे राजस्थानी महाकाव्य कहा जाता है
  • अलाउद्दीन की जालोर विजय का वर्णन

विश्व वल्लभ

चक्रपाणि मिश्र 

  • 1577 ई. में संस्कृत में रचित
  • चक्रपाणि महाराणा प्रताप के दरबारी पंडित
  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (विशेषत: उद्यान विज्ञान) पर आधारित ग्रंथ

बुद्धि विलास 

शाह बख्ताराम 

  • जयपुर की स्थापना और निर्माण की आँखों देखी जानकारी
  • प्रधान संपादक – पदमश्री जिन विजय मुनि
  • प्रकाशन – राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान ( जोधपुर )

बुद्धि रासो

जानकवि

  • मुस्लिम लेखक द्वारा पंचतंत्र पर रचित उस्तक
  • कायम खो रासो भी इन्हीं की रचना है

दयालदास री ख्यात 

दयालदास

  • अन्य नाम – बीकानेर के राठौड़ाँ री ख्यात
  • बीकानेर राज्य का वर्णन
  • राव बीका से लेकर महाराजा सरदार सिंह के राज्यारोहण तक का विस्तृत

बाँकीदास री ख्यात 

बांकीदास 

  • अन्य नाम – जोधपुर राज्य की ख्यात
  • जोधपुर नरेश मानसिंह जी के दरबारी कवि
  • ख्यात जयपुर एवं जोधपुर की स्थापना तिथि
  • गिरी-सुमेल युद्ध का वर्णन

नैणसी री ख्यात

मुहनौत नैणसी

  • राजस्थान की सबसे प्राचीनतम ख्यात, राजस्थानी भाषा में 
  • राजपूतों की 36 शाखाओं का वर्णन 
  • मुंशी देवी प्रसाद ने नैणसी को राजपूताने का अबुल फ़ज़ल कहा

मारवाड़ रा परगना री विगत

मुहनौत नैणसी

  • राजस्थान का गजेटियर / गाँव री ख्यात / सर्वसंग्रह 
  • परगनों की रेख चाकरी भूमि किस्म ,फसल, सिंचाई साधन, जातिवार घर संख्या का वर्णन

मुण्डियार री ख्यात

मुण्डियार गाँव के चारण 

  • विषय मारवाड़ के राठौड़, राठौड़ों की ख्यात भी कहा जाता है
  • राव सीहा – महाराजा जसवंतसिंह प्रथम तक का वर्णन

वेली किसन रुक्मणी री व गंगा लहरी

पृथ्वीराज राठौड़ “पीथल”

  • पाँचवाँ वेद व 19वाँ पुराण (दूरसा आढा)
  • रचना गागरोन दुर्ग में, डिंगल भाषा में
  • पृथ्वीराज को टेस्सीटोरी ने ‘डिंगल का हैरोस ’

वंशभास्कर

सूर्यमल्ल मिश्रण 

  • पिंगल काव्य ग्रंथ, बूंदी राज्य का विस्तृत इतिहास 
  • इनके दत्तक पुत्र मुरारिदान ने वंश भास्कर को पूरा किया
  • अन्य प्रमुख ग्रंथ – वीर सतसई (डिंगल भाषा), धातु रूपावली, सती रासो, बलवंत विलास, रामरंजाट

नाभिनन्दन जिनोधार प्रबंध

कक्कड़ सूरी

  • 14वीं सदी में संस्कृत भाषा में रचित, पाँच अध्यायों में विभक्त। 
  • कीरातबपुर (वर्तमान किराडू) एवं उकेशपुर (वर्तमान ओसियाँ) के मध्यकालीन नगरों के आर्थिक एवं धार्मिक जीवन का वर्णन।

पद्मिनी चरित्र चौपाई

लभ्योदेय उपाध्याय

  • 17वीं सदी की सामाजिक व्यवस्था का विस्तृत उल्लेख मिलता है।

ढोला-मारू रा दूहा

कवि कल्लोल

  • वि.सं. 1530 में रचित श्रृंगारिक काव्य
  • नरवर के राजकुमार ढोला (आयु 3 वर्ष) एवं पूंगल की राजकुमारी मरवण ( आयु 1.5 वर्ष) की प्रेमकथा चित्रण

गोरा बादल री चौपाई

हेमरत्न सूरी

  • राजपूत काल की धदालीन युद्ध प्रणाली का वर्णन
  • राणा प्रताप एवं साधु जेतमल के मध्य संबंधों की जानकारी

सौभाग्य महाकाव्य

सोम सूरी

  • 15वीं सदी में रचित
  • महाराणा कुम्भा का काल, तत्कालीन शिक्षा प्रणाली, मेवाड़ी चित्रकला शैली के उद्भव-विकास तथा देलवाड़ा के देवकूल के धार्मिक एवं व्यापारिक जीवन की जानकारी।

सगत रासो 

गिरधर आसिया

  • महाराणा प्रताप के छोटे भाई शक्ति सिंह का चरित्र वर्णन

खुमाण रासो

दौलत विजय

  • वि.सं. 1767–1790 तक मेवाड़ के गुहिल राजाओं की वंशावली
  • बप्पा रावल से राजसिंह

बीसलदेव रासो

नरपति नाल्ह

  • गोडवाड़ी बोली की मुख्य रचना
  • प्रेम कथा आधारित ग्रंथ – सांभर के राजा बीसलदेव तथा मालवा के राजा भोज की पुत्री राजमति 
  • विग्रहराज चतुर्थ का वर्णन

सिंहल सूत्र एवं वल्कल चिरी

समय सुंदर

  • 16वीं सदी की सामाजिक स्थिति की जानकारी। 
  • 16वीं शताब्दी की राजस्थानी एवं गुजराती लोककथाओं का संग्रह।

अचलदास खींची री वचनिका

शिवदास गाड़ण

  • राजस्थान की सर्वश्रेष्ठ वचनिका
  • रचना गागरोन दुर्ग में की
  • वीर रस, चम्पू काव्य 
  • गागरोन के खींची राजा अचलदास और माण्डू बादशाह होशंगशाह के युद्ध (1423 ई.) का वर्णन

श्रृंगार हार

हम्मीर

  • 13वीं शताब्दी में रचित
  • 20 भाषा रागों, 15 जनक रागों एवं 58 देशी रागों का वर्णन ।

सूरज प्रकाश

करणीदान

  • जोधपुर शासक अभयसिंह का वर्णन

वीर विनोद

श्यामलदास

  • श्यामलदास “केसर-ए-हिन्द” के नाम से प्रसिद्ध
  • रचना मेवाड़ के महाराणा सज्जनसिंह के काल में
  • उदयपुर राज्य का इतिहास

फाटका जंजाल 

शिवचंद्र भरतिया 

  • आधुनिक राजस्थान का पहला साहित्यकार 
  • राजस्थानी साहित्य का भारतेंदु हरिश्चंद्र 
  • अन्य रचनाएँ – कनक सुंदर, केसर विलास विश्रांत प्रवास
  • यह नाटक सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करता है और सुधारवादी विचारधारा को उजागर करता है।

विजयदान देथा – 

  • जन्म 1928 में बोरुंदा (जोधपुर)
  • रूपायन शोध संस्थान के सह-संस्थापक
  • किताबें – बाताँ री फुलवारी, अलेखूं हिटलर, तीड़ोराव, माँ रो बदलो, बापू के तीन हत्यारे, चौधरायन की चतुराई 
  • कृतियों पर बनी फ़िल्में: दुविधा, चरणदास चोर, परिणति, पहेली
  • पुरस्कार:
    • 1975 – केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार 
    • 1992 – भारतीय भाषा परिषद् पुरस्कार
    • 2002 – बिहारी पुरस्कार
    • 2006 – साहित्य चौथमनी पुरस्कार
    • 2007 – पद्मश्री पुरस्कार
    • 2011 – रघुवीर सहाय सम्मान
    • 2012 – प्रथम राजस्थान रत्न

लक्ष्मी कुमारी चुंडावत – 

  • रानी जी के नाम से प्रसिद्ध 
  • जन्म – 1916 देवगढ़ ठिकाना 
  • किताबें – कै रे चकवा बात, अमोलक बातां, लव स्टोरीज ऑफ राजस्थान, टाबरां  री बातों, हुंकारो दो सा, मूमल, हिंदुकश के उस पार, सूली रा सूया माथे, गजबण (सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार 1965), रजवाड़ों के रीति-रिवाज
  • पुरस्कार
    • 1984 पद्मश्री – देवनारायण बगड़ावत की महागाथा के लिए
    • 2012 राजस्थान रत्न पुरस्कार 
    • सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार 1965 – गजबण (रूसी कथाओं के राजस्थानी अनुवाद)
    • संयुक्त राष्ट्र संघ के निरस्त्रीकरण 1978 सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व

कन्हैयालाल सेठिया – 

  • जन्म: 11 सितम्बर 1919, सुजानगढ़ (चूरू)
  • गांधीजी के साथ खादी, दलित उत्थान एवं सविनय अवज्ञा आंदोलन आंदोलन में भागीदारी  
  • विधा: राजस्थानी कविता
  • प्रमुख पंक्तियाँ: “आ तो सूरज ने सरमावे…”
  • पुरस्कार: 
    • स्वर्ण कमल (राष्ट्रपति का सर्वोच्च सम्मान) 
    • 1976 – केंद्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार (लीलटाँस)
    • 1987 सूर्यमल्ल मिश्रण पुरस्कार (सबद)
    • 1988 मूर्तिदेवी पुरस्कार (निर्ग्रंथ) 
    • टांटिया पुरस्कार (सतवादी)
    • 2004 – पद्मश्री 
    • 2012 – राजस्थान रत्न
  • साहित्य: – रमणियां रा सोरठा, गळगचिया, मींझर, कूंकंऊ, धर कूंचा धर मंजळां, मायड़ रो हेलो, सबद, सतवाणी, अघरीकाळ, दीठ, कक्को कोड रो, लीकलकोळिया , हेमाणी, पीथल और पाथल, जमीन रो धनी कुन, धरती धोरा री लीलंटास, निग्रंथ, किन घड़ियों में बेसुध सोये मारवाड़ के सपूत, मींझर, वनफूल, अग्निवीणा (इस कविता के करण राजद्रोह का आरोप लगा)
अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथरचयिता
वीरवंश रंगयमुनादत्त शास्त्री
जयसिंह कल्पद्रुमदेवभट्ट
राजप्रकाशकिशोरदास
जगत सिंह काव्यरघुनाथ
जगत विलासनंदराम
बुद्धि रासो जाल्ह
नरसी जी रो मायरोरतना खाती
रामरासा श्रीकृष्ण भट्ट कवि कलानिधि
राम रासोमाधोदास
शारंगधर संहिताशारंगधर (आयुर्वेद ग्रंथ)
राव जैतसी रो छंदबीठू सूजा
रणमल छंद श्रीधर व्यास 
राग कल्पद्रुमकृष्णानंद व्यास
नेह तरंगराव बुद्धसिंह 
किरतार बावनीदुरसा आढा
स्वतंत्र बावनी तेजकवि  
राजस्थानी शब्दकोशसीताराम लालस
प्राचीन लिपिमाला G.H ओझा 
रूठी रानीकेसरी सिंह बारहठ
गोरा-बादलचन्द्रशेखर
चेतावनी रा चुंगटिया कन्हैया लाल सेठिया 

राजस्थानी साहित्य के रूप

रासो (Raso)

  • ऐसा साहित्य जिसमें किसी राजा की कीर्ति, विजय, युद्ध – संग्रामों में वीरता का विस्तृत वर्णन हो
  • उदाहरण:
रासोकवी
पृथ्वीराज रासो चन्द्रबरदाई
बीसलदेव रासो नरपति नाल्ह
सगत रासो गिरधर आसिया
खुमाण रासो दलपत विजय
रतन रासो कुम्भकर्ण
छत्रपति रासो काशी छंगाणी
हम्मीर रासो जोधराज
क़ायम खां रासोकवि जान
जवान रासो सीताराम रत्नू
बिन्है रासो राव महेशदास
बीसलदेव रासौ नरपति नाल्ह

ख्यात (Khyat)

  • संस्कृत ‘ख्याति’ से लिया गया; अर्थ – लोकप्रियता या प्रसिद्धि
  • प्रारम्भ – मुग़ल बादशाह अकबर (1556-1605 ई.) के शासनकाल से 
  • देशी शासकों द्वारा अपने सम्मान, विशेष कार्य और सफलताओं का उल्लेख
  • मुख्यत: दो प्रकार:
    1. वात संग्रह – ऐतिहासिक घटनाओं का स्वतंत्र वर्णन
      • बांकीदास री ख्यात, मुहणौत नैणसी री ख्यात
    2. सलंग्न ख्यात – राजाओं का क्रमानुसार इतिहास वर्णन
      • बीकानेर रा राठौड़ा री ख्यात (दयालदास)

विगत (Vigat)

  • शासक, परिवार, राज्य क्षेत्र के प्रमुख व्यक्ति और सामाजिक – राजनीतिक परिस्थितियों की जानकारी 
  • मारवाड़ रा परगना री विगत (मुहणौत नैणसी)

वचनिका (Vachnika)

  • मिश्रित राजस्थानी में रचित साहित्य, जिसमें महान शासक या राजवंश की उपलब्धियाँ वर्णित होती हैं।
  • राजस्थानी साहित्य में गद्य-पद्य मिश्रित काव्य को वचनिका की संज्ञा दी गई है।
  • 2 प्रकार
    • पद्यबद्ध : इसमें 8-8 या 20-20 मात्राओं के तुकयुक्त पद होते हैं।
    • गद्यबद्ध : इसमें मात्राओं का नियम लागू नहीं होता।
  • शैली: चम्पू शैली की तुकांत रचना (अन्त्यानुप्रास के साथ)
  • उदा: वचनिका राठौड़ रतनसिंह महेसदासोत री, अचलदास खींची री वचनिका

मरस्या (Marsya)

  • किसी राजा या वीर पुरुष की मृत्यु के बाद शोक व्यक्त करने हेतु रचना
  • इसमें प्रेरणादायक कार्य और चारित्रिक गुण का वर्णन
  • उदा: राणे जगपत रा मरस्या (मेवाड़ महाराणा जगतसिंह पर)

परची (Parchi)

  • राजस्थानी पद्यबद्ध साहित्य, जिसमें संत महात्माओं का जीवन परिचय मिलता है।
  • उदाहरण: मीराबाई री परची, कबीर री परची, संत दादू री परची

सिलोका (Siloka)

  • संस्कृत शब्द श्लोक का बिगड़ा हुआ रूप
  • ये साधारण पढ़े-लिखे लोगों द्वारा लिखे गये, इसलिए ये जनसाधारण की भावनाओं को आमजन तक पहुँचाते हैं
  • जनसाधारण की भावनाओं को आमजन तक पहुँचाने के लिए लिखा गया।
  • उदाहरण: राठौड़ कुसलसिंह रो सिलोको, राव अमरसिंह रा सिलोका

रूपक (Roopak)

  • किसी वंश या व्यक्ति विशेष की उपलब्धियों या घटना का वर्णन
  • उदाहरण: सूरजप्रकाश (कविया करणीदान), राजप्रकाश (किशोरदास), महायशप्रकाश (आशिया मानसिंह)

साखी (Sakhi)

  • ‘साक्षी’ शब्द से बना है। इसका अर्थ है ‘आँखों देखी बात का वर्णन करना’
  • संत कवियों ने अपने द्वारा अनुभव किये गये ज्ञान का वर्णन
  • छंद: सोरठा
  • उदाहरण: कबीर की साखियाँ

दवावैत (Davavait)

  • ऐसे ग्रंथ जिनमें उर्दू और फारसी शब्दावलियों का प्रयोग होता
  • शैली: कलात्मक गद्य + तुकांत वर्णन
  • विषय: कहानी के नायक का गुणगान, राज्य, वैभव, युद्ध, आखेट आदि
  • उदा: राजा जयसिंह री दवावैत, अखमाल देवड़ा री दवावैत

वात (Vaat)

  • कथावाचक निरंतर कहानी सुनाता है और श्रोता  उसका समर्थन या ‘हुँकारा’ देता है 
  • पौराणिक पात्रों की उपलब्धियों की कथा, जीवन के हर पक्ष, युद्ध, धर्म, दर्शन, मनोरंजन पर प्रकाश, सती प्रथा, बाल-विवाह, बहुविवाह, पर्दा, दहेज इत्यादि का भी चित्रण
  • शैली: चम्पू (गद्य-पद्य मिश्रित)
  • उदाहरण: वीरमदेव सोनगरा री वात (पद्मनाभ), पाबूजी री वात, ढोलामारू री वात (कुशालचंद), कान्हड़दे री वात

झूलणा 

  • राजस्थानी काव्य का मात्रिक छन्द है। इसमें चौबीस अक्षर के वर्णिक छन्द के अंत में यगण (छंदशास्त्र द्वारा प्रतिपादित आठ गणों में से एक) 
  • प्रमुख झूलणा काव्य रचनाएँ:
  • अमरसिंह राठौड़ रा झूलणा
  • राजा गजसिंह-रा-झूलणा

झमाल  

  • झमाल भी राजस्थानी काव्य का एक मात्रिक छन्द है
  • इसमें पहले पूरा दोहा, फिर पांचवें चरण में दोहे के अंतिम चरण की पुनरावृति की जाती है। छठे चरण में दस मात्राएँ होती है। इस प्रकार दोहे के बाद चांद्रायण फिर उल्लास छंद रखकर सिंहावलोकन रीति से पढ़ा जाता है
  • ‘राव इन्द्रसिंह री झमाल’ प्रसिद्ध

कक्का 

  • कक्का उन रचनाओं को कहते हैं, जिनमें वर्णमाला के बावन वर्ण में से प्रत्येक वर्ण से रचना का प्रारम्भ किया जाता है।

बही 

  • एक विशेष प्रकार की बनावट का रजिस्टर जिसमें इतिहास सम्बन्धी कई उपयोगी सामग्री दर्ज की हुई मिलती हैं 
  • राव व बड़वे अपनी बही में आश्रयदाताओं के नाम और उनकी मुख्य उपलब्धियों का ब्यौरा लिखते थे। इसी प्रकार ‘राणी मंगा’ जाति के लोग कुँवरानियों व ठकरानियों के नाम और उनकी संतति का विवरण अपनी बही में लिखते थे। यह कार्य पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता था
  • प्रमुख रचनाएँ : 
    • चित्तौड़-उदयपुर पाटनामा री बही
    • पाबूदान री बही
    • जोधपुर राणी मंगा री बही

प्रशस्ति 

  • राजस्थान में मंदिरों, दुर्गद्वारों, कीर्तिस्तम्भों आदि पर राजाओं की उपलब्धियों का प्रशंसा युक्त वृत्तान्त 
  • राजाओं का वंशक्रम, युद्ध अभियानों, पड़ोसी राज्यों से संबंध, उनके द्वारा निर्मित मंदिर, जलाशय, बाग-बगीचों, राजप्रासादों आदि का वर्णन
  • इनसे तत्कालीन समय की राजनैतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक दशा का ज्ञान होता है
  • प्रशस्तियों में यद्यपि अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन मिलता है, फिर भी इतिहास निर्माण में ये उपयोगी है

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