राजस्थानी हस्तशिल्प

राजस्थानी हस्तशिल्प राजस्थान की समृद्ध परंपरा, लोकजीवन और शिल्पकला का जीवंत प्रतीक हैं। यह विषय राजस्थानी कला व संस्कृति के अंतर्गत महत्वपूर्ण स्थान रखता है, क्योंकि इसके माध्यम से राज्य की ऐतिहासिक विरासत और रचनात्मकता का परिचय मिलता है। वस्त्र, आभूषण, मिट्टी व लकड़ी के शिल्प आदि इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।

राजस्थान ऐतिहासिक रूप से इन कलाओं के विकास में अत्यंत समृद्ध रहा है। इसका प्रमाण तृतीय शताब्दी के आहत सिक्कों (नगर) तथा विराटनगर बौद्ध चैत्य में उपयोग किए गए 26 लकड़ी के स्तंभों से मिलता  है। वर्तमान में राजस्थानी बांधनी, कुन्दन मीनाकारी, हैण्ड ब्लॉक प्रिटिंग वस्त्र, कीमती हीरे-जवाहरात एवं जड़ाऊ आभूषण, ब्लू पॉटरी आदि हस्तकला के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। इसलिए राजस्थान को अब तक कुल 22 से अधिक GI टैग मिल चुके है।

शिल्पकला GI TAG 
कोटा डोरिया 2006
कोटा डोरिया (Logo)2011
ब्लू पॉटरी – जयपुर 2009
ब्लू पॉटरी (Logo)2017
मोलेला कला 2009
मोलेला कला (Logo)
राजस्थान की कठपुतलियाँ 2009
कठपुतली (Logo)
सांगानेरी हैंड ब्लॉक प्रिंट 2010
फुलकारी 2011
बगरू हैंड ब्लॉक प्रिंट 2012
थेवा कला 2014
पोकरण पॉटरी 2018
नाथद्वारा पिछवाई 2023
कोफ्तगिरी – उदयपुर 2023
कशीदाकारी – बीकानेरी2023
बंधेज कला – जोधपुर 2023
उस्ता कला – बीकानेर 2023
केर साँगरी – थार डेज़र्ट 2025
अश्वगंधा (नागौर) 2026

वस्त्र पर हस्तकला

प्रमुख प्रिंट / छपाई

प्रिंट / छपाई

व्याख्या

दाबू प्रिंट

  • प्रसिद्ध केन्द्र – छीपों का आकोला गाँव, चित्तौड़गढ़।
  • रंगाई-छपाई के दौरान जिस जगह पर कपड़ों में रंग नहीं चढ़ाना हो, उसे ‘लुई या लुगदी’ से दबा दिया जाता है तथा इसी लुई या लुगदी को ‘दाबू’ कहा जाता है।
  • उपयोग – बेडशीट, चूँदड़ी, कपड़ों साड़ियों आदि पर किया जाता है।
  • मुम्बई के सफेद लट्ठे पर इनकी रंगाई-छपाई की जाती है।
  • विभिन्न प्रकार के दाबू  
    • मोम का दाबू – सवाई माधोपुर
    • गेहूँ के बींधण का दाबूसांगानेर, बगरू
    • मिट्टी का दाबूबालोतरा 
    • किरयाना पद्धति दाबू – बालोतरा originally kya tha ?? should i continue further or wait for responses?
    • ग्वार + मिट्टी का दाबू – अकोला चित्तौड़ 
    • चूना + गोंद का दाबूभीलवाड़ा 
    • मेण का दाबू – उदयपुर

सांगानेरी प्रिंट

  • इसमें काले और लाल रंगों का अधिक प्रयोग
  • छपाई लट्ठा (किशनगढ़) या मलमल (जोधपुर) पर की जाती है 
  • गमछा, साफा, तकिया, दुपट्टा, ओढ़नी आदि छापने में 
  • नामदेव छीपा कारीगरों द्वारा (तुर्क्याछीपा – मुस्लिम छीपा कारीगर)  
  • प्रसिद्ध कलाकार – मुन्नालाल गोयल, अवधेश कुमार पाण्डे
  • 2010 में सांगानेरी प्रिंट को G.I. टैग मिला
  • अन्य विशेष-
    • ढोला मारू प्रिंट – बालोतरा
    • रूपाहली व सुनहरी छपाई – किशनगढ़, चित्तौड़गढ
    • तिरंगा प्रिंट – आलूदा, दौसा

जाजम / आजम प्रिंट

  • प्रमुख केन्द्र – अकोला, चित्तौड़गढ़
  • लाल व हरे रंग का प्रयोग, दाबू पद्धति में छपाई 
  • ज्यामिति पैटर्न, फूल- पत्ती का आलेखन 
  • गाड़िया लोहारों की महिलाओं के कपड़े इसी प्रिंट में बनाए जाते हैं।

मलीर प्रिंट

  • मुख्य केन्द्र – बालोतरा
  • काले व कत्थई रंग का अधिक प्रयोग
  • प्रमुख कलाकार – मो. यासीन छीपा

अजरक प्रिंट

  • मुख्य केंद्र – बालोतरा
  • विशेषता – दोनों तरफ से छपाई, ज्यामितीय अंलकरण
  • तुर्की शैली का अधिक प्रभाव  
  • नीलेलाल रंग तथा का अधिक प्रयोग
  • प्रसिद्ध कलाकार- मो. यासीन, रणमल खत्री।

बगरू प्रिंट

  • प्राकृतिक रंगों का प्रयोग, पृष्ठाधार हरे रंग का 
  • दाबू – गेहूँ के बींधण का 
  • यह कपड़े पर बेल-बुंटों की छपाई हेतु प्रसिद्ध है।
  • 2012 में G.I. टैग मिला।
  • प्रमुख कलाकार – रामकिशोर छीपा 2009 पद्म श्री
  • सांगानेरी प्रिंट और बगरू में प्रमुख अन्तर –
    • सांगानेरी प्रिंट के निर्माण लकड़ी के छापों का  जबकि बगरू में दाबू का प्रयोग 
    • सांगानेरी में कपड़े का आधार सफेद जबकि बगरू में नीला / काला / मटमैला होता है 
    • बगरू प्रिंट में आवश्यक रूप से प्राकृतिक रंगों का प्रयोग जबकि सांगानेरी प्रिंट में यह बाध्यता नहीं

बाटिक / वातिक प्रिंट 

  • कपड़े पर मोम की परत चढ़ा कर चित्रण करना 
  • प्रसिद्ध कलाकार – उमेशचंद्र शर्मा (खंडेला), आर.बी. रायजादा, अब्दुल मजिद

रेवड़ी / खड्डी छपाई

  • गोंद मिश्रित मिट्टी से लाल रंग की ओढ़नियों पर छपाई की जाती है, इसके बाद लकड़ी के छापों द्वारा सोने-चाँदी के तलक की छपाई की जाती है।
  • जयपुर एवं उदयपुर प्रसिद्ध
  • टुकड़ी छपाई – जालौर और मारोठ (नागौर) प्रसिद्ध

अन्य प्रमुख छपाइयाँ

  • चित्तौड़गढ़, कोटा, किशनगढ़ – रुफहली छपाई
  • आहड़, भीलवाड़ा – चूनरी-मोतियों की छपाई
  • मारोठ, कुचामन – सुनहरी छपाई
  • लाडनूँ (नागौर) – लाडनू प्रिंट
  • भीलवाड़ा – मांडल (अम्रक) छपाई
  • जालोर, मारोठ – टुकड़ी छपाई
  • जयपुर, उदयपुर – खड़दी छपाई

रंगाई का कार्य

सवाई जयसिंह द्वारा स्थापित 36 कारखानों में सीवन खाना (कपड़े सिलना), रंग खाना (कपड़े रंगना) व छापाखाना (कपड़े छापना) आदि प्रमुख कारखाने थे।

  • रंगरेज – वस्त्रों की रंगाई-छपाई करने वाला मुस्लिम कारीगर
  • रंगारा – वस्त्रों की रंगाई-छपाई करने वाला हिन्दु कारीगर
  • छीपा या छींपा – कपडों पर छपाई व रंगाई का कार्य करने वाले को ‘छींपा’ कहा जाता है
  • नीलगर – नील के रंग से वस्त्र रंगकर छपाई का काम करने वाले कारीगर

बंधेज – जयपुर

  • कपड़ों को बाँधकर रंगना ही बंधेज कहलाता है
  • इसे Tie & Die या बाँधों और रंगो के नाम से जाना जाता है
  • बंधेज का कार्य करने वाले व्यक्ति को ‘बंधारा, चढ़ावा व रंगरेज’ कहा जाता है
  • सीकर के फूल भाटी व बाघ भाटी ने बंधेज कला की नींव रखी
  • अन्य नाम – मोठड़ा, दानेदार बंधाई 
  • प्रमुख वस्त्र – घाघरा, चूँदड़ी (ओढ़नी), साफे, पगड़ी  
  • घटचोला साड़ी – बंधेज़ कार्य की प्रसिद्ध साड़ी 
  • रेटा – सिंधी मुसलमान स्त्रियों द्वारा पहनी गई गहरे लाल/काले रंग की सफेद टिपनी वाली चूनरी 
  • वर्ष 2023 में G.I. टैग मिला।
  • प्रसिद्ध कलाकार – रंगरेज मो. तैय्यब खान (जोधपुर), मुबारक छीपा व खाजु छीपा (सुजानगढ़, चूरू), मो. यासीन

पोमचा

  • बंधेज ओढ़ने का एक प्रकार 
  • प्रचलन – शेखावाटी एवं पूर्वी राजस्थान में 
  • स्त्रियों के ओढ़ने का एक वस्त्र जो बच्चे के जन्म पर नवजात शिशु की माँ के लिए मातृपक्ष की ओर से आता है।
  • यह मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं –
    • लाल-पीला पोमचा – बेटे के जन्म पर पीहर पक्ष द्वारा 
    • लाल-गुलाबी पोमचा – बेटी के जन्म पर पीहर द्वारा 
  • चीड़ का पोमचा – काले रंग की, विधवा स्त्री द्वारा, हाड़ौती में 
  • पाटोदा का लूगड़ा – पीले पोमचे का एक प्रकार लक्ष्मणगढ़ (सीकर), तथा मुकन्दगढ़ (झुंझुनू) का प्रसिद्ध

लहरिया

  • प्रमुख केंद्र – जयपुर, पाली।
  • लहरिया कई रंगों में बनाये जाते हैं। जैसे एक, दो, तीन, पाँच और सात
  • लहरिया – आड़ी धारिया केवल एक ओर से हो
  • मोठड़ा – दोनों ओर से एक दूसरे को काटती हुई धारियाँ 
  • राजशाही लहरिया, समुद्र लहर नामक लहरिया(जयपुर) के रंगरेज व नीलरंग रंगते थे।
  • जयपुर – लहरिया व पोमचा प्रसिद्ध 
  • बीकानेर – लहरिया व मोठड़ा दोनों ही प्रसिद्ध 

चूनड़ी

  • जोधपुरी, शेखावाटी(बारीक बंधेज की) चूनड़ी प्रसिद्ध है।
  • मामा चूनड़ी – भांजी को मामा की ओर से विवाह के अवसर पर
  • बडूली चूनड़ी – वधू को वर पक्ष की ओर से भेजी जाने वाली
  • प्रकार – सुआ, बेल, मोठड़ा, चौखाना, धनक 

पीळा

  • पीले रंग की ओढ़नी जिसके पल्लों पर डब्बीदार या दानेदार बंधाई होती है व जिसके बीचों-बीच पतंग की आकृति में कई वर्ग अनेक रंगों में होते हैं और बीच में लाल रंग का एक बड़ा वृत्त होता है जिसे स्थानीय भाषा में लड्डू /पीळा व सेवरा कहते  है।
  • नामकरण के अवसर पर जापे वाली स्त्री पीहर पक्ष की ओर से प्राप्त पीला ओढ़नी को ओढ़ती है।

मलयगिरि

  • इसका रंग भूरा होता है तथा इस रंग को कई मिश्रणों (चंदन मिलाकर) से तैयार किया जाता था व इस रंग में रंगा हुआ वस्त्र वर्षों तक सुगंधित रहता था।
  • महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय की अंगरखिया अभी तक सुगंधित है।

अमोवा

  • एक ही प्रकार की रंग की रंगतों में खाकी से मिलती जुलती रंगत अमोवा कहलाती है।
  • शिकार पर जाते समय लोग इसका प्रयोग करते थे।

जसोल की जट पट्टी

  • इसको जिरोही, भाकला, गंदहा के नाम से जाना जाता है
  • बकरी के बालों से बनता है 
  • प्रमुख केन्द्र – जसोल गाँव, बाड़मेर

बुनाई का कार्य

कोटा डोरिया या मसूरिया साड़ी

  • 2 प्रकार की साड़ी
    • डोरिया – सूती तथा सादी साडी, डोरा कोटा से मंगाया जाता है, इसलिए नाम कोटा डोरिया 
    • मसूरिया – बारीक रेशम की साड़ी, इसमें चौकड़ी मसूर दाल के दाने के बराबर
  • 1761 ई. में कोटा के दीवान झाला जालिम सिंह ने मैसूर के बुनकर अहमद मसूरिया को कोटा बुलवाया और यहाँ हथकरघा उद्योग की स्थापना कर साड़ी बुनना शुरू किया, उसी के नाम पर इसका नाम मसूरिया साड़ी पड़ा 
  • कैथून (कोटा) की मसूरिया व मांगरोल (बारां) की कोटा डोरिया भी प्रसिद्ध है।
  • मुख्य कलाकार – श्रीमती जैनब 
  • कैथून → बुनकरों का गाँव 
  • कोटा डोरिया साड़ी + लोगो (LOGO) → G.I. टैग मिला 
  • G.I. टैग प्राप्त करने वाली राजस्थान की पहली हस्तकला है।

दरी 

  • टांकला (नागौर): यह गाँव अपनी मजबूत और आकर्षक दरियों के लिए प्रसिद्ध
  •  सालावास (जोधपुर) और लवाण (दौसा) अन्य प्रसिद्ध स्थान दरी निर्माण हेतु 
  • जेल की दरियाँ: जयपुर और बीकानेर की जेलों के कैदियों द्वारा बुनी गई दरियाँ 

गलीचा और कालीन (Carpets and Rugs)

  • पृष्ठभूमि: गलीचा निर्माण की कला मूलत: ईरान (फारस) से भारत आई थी। जयपुर में इसे महाराजा मानसिंह प्रथम के समय प्रारंभ किया गया था।
  • विएना/फारसी गलीचे –  बीकानेर
  • धौलपुर की कांता देवी: बहरावती गाँव की कांता देवी ने गलीचा निर्माण में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त की है

नमदा

  • नमदा को ऊनी गलीचा या चटाई भी कहा जाता है। 
  • प्रसिद्ध केंद्र – टोंक, बीकानेर 

पटु, बरड़ी, शॉल, लोइयाँ

  • ऊन से बनने वाले कलात्मक वस्त्र
  • हीरावल शॉल – जैसलमेर, पुरुषों के लिए प्रसिद्ध
  • यह ‘चौकला भेड़ (भारतीय मेरिनो) की ऊन’ से तैयार की जाती है।
  • ‘खेसले’ – लेटा गाँव (जालौर), मेड़ता (नागौर), गुढ़ा बालोतान गाँव प्रसिद्ध
  • लोई – नापासर (बीकानेर)
  • आलूदा का तिरंगा – दौसा  
  • मलमल का कार्य – मथानियाँ (जोधपुर)

कढ़ाई

कढ़ाई

व्याख्या

जरदोजी

सुनहरे धागों से निर्मित कढ़ाई 

कामदानी 

वस्त्रों शिफॉन आदि पर महीन सोने व चाँदी के तारों से की जाने वाली कढ़ाई 

मुकेश

सूती या रेशम के कपड़े पर बादले से छोटी – छोटी बिंदकी की कढ़ाई 

गोटा 

  • वस्त्रों पर सोने और चाँदी के परतदार तारों से किया कढ़ाई का काम
  • प्रमुख प्रकार – लप्पा(चौड़ा गोटा), लप्पी(कम चौड़ाई), किरण, बाँकड़ी, गोखरू, बिजिया, मुकेश, नक्शी आदि
  • बिजिया – गोटों के फूल
  • जयपुर का गुलाल गोटा देशभर में प्रसिद्ध है
  • जयपुर और सीकर ( खंडेला )

कशीदाकारी

  • भरत – पश्चिमी राजस्थान में कशीदाकारी को भरत कहते हैं 
    • मोची भरत – बाड़मेर 
    • मोती भरत – जालौर 
    • हुरमजी – सिंध के सीमावर्ती क्षेत्र में, इसे कच्ची भरत / सिंधी भरत भी कहते हैं 
  • बाड़मेर जिले की ‘रमाबाई’ को इसके लिए राज्यस्तरीय पुरस्कार दिया गया।
  • शुरुआत – बीकानेर के मेघवाल समुदाय की महिलाओं द्वारा कपड़े मिररवर्क का प्रयोग कर विवाह एवं माँगलिक कार्यों में उपहार देने हेतु, वर्तमान में वृहद् स्तर पर प्रयुक्त 
  • बीकानेर कशीदाकारी GI टैग (2023)

आभूषण हस्तशिल्प

मीनाकारी – जयपुर

  • सोने-चांदी पर की गई नक्काशी में रंगीन काँच के पाउडर की सहायता से भरकर किया गया रंग-बिरंगा काम या रंग भरने की कला 
  • कच्छवाहा शासक राजा मानसिंह द्वारा लाहौर से लायी गई, लाहौर में यह कला मुगलों द्वारा फारस से लायी गई
  • 4 प्रकार – तैयारी, बूंद तिला/शबनम/छटवाँ , लाल ज़मीन, सफेद चलवा 
  • मुख्य रंग – लाल एवं हरा 
  • मुख्य कलाकारकुदरत सिंह (1988 पद्मश्री), मुन्नालाल,  दुर्गासिंह, काशीनाथ, कैलाशचंद्र
  • पंजाब से जयपुर आकर बसने वाले कलाकार – हरिसिंह, अमरसिंह, किशनसिंह, गोभासिंह, श्यामसिंह, घीसासिंह
  • विभिन्न सतह पर की गई मीनाकारी
चाँदी पर मीनाकारी- नाथद्वाराजिंक पर मीनाकारी – जोधपुर
ताँबा पर मीनाकारी – भीलवाड़ाकागज पर मीनाकरी – अलवर
सोने पर मीनाकारी – प्रतापगढ़लाख पर मीनाकारी – बीकानेर
चंदन पर मीनाकारी – चूरूमार्बल पर मीनाकारी – जयपुर
पीतल पर मीनाकारी-जयपुर अलवरकाँच पर मीनाकारी – रेतवाल (कोटा)

थेवा कला – प्रतापगढ़

  • प्रारंभनाथूजी सोनी द्वारा (1707), राजा सावंतसिंह द्वारा प्रोत्साहन (1765) नाथूजी को ‘राजसोनी’ उपाधि एवं जागीर दी 
  • काँच पर सोने का सूक्ष्म चित्रांकन ही थेवा कला है
  • प्रारंभ में हीरे-पन्नो पर, वर्तमान में ‘रंगीन बेल्जियम काँच’ का प्रयोग किया जाता है
  • काँच का रंग – लाल नीला या हरा 
  • थेवा कला में नारी श्रृंगार के आभूषण सजावटी वस्तुएँ व देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को अलंकृत रूप दिया जाता है।
  • सिर्फ़ प्रतापगढ़ के सोनी परिवार के पुरुषों द्वारा बंद कमरे में (यह परिवार इस कला को गोपनीय रखता है, इसलिए परिवार की बेटियों को भी यह कला नहीं सिखायी जाती) 
  • प्रमुख कलाकार – जगदीश सोनी, गिरीश कुमार सोनी, महेश राज सोनी-पद्मश्री (2015), रामप्रसाद सोनी, बेनीराम सोनी रामविलास सोनी
  • अंतरराष्ट्रीय स्तर लोकप्रियता – जस्टिन वकी द्वारा 
  • G.I. टैग – 2014, नवम्बर, 2002 में डाक टिकिट जारी
  • राजस्थान की एकमात्र कला जिसका नाम एनसाइक्लोपीड़िया ऑफ ब्रिटेनिका में दर्ज है।

तारकशी 

  • चाँदी के पतले तारों द्वारा आभूषणों का निर्माण करने की कला
  • प्रमुख केंद्र – नाथद्वारा और जयपुर   

बरक / वर्क – जयपुर 

  • मशीनों से खींचकर अथवा हथौड़े से कूटकर सोने अथवा चाँदी को अत्यन्त पतले, झिल्ली के समान बनाए गए ‘पत्तर’ को बरक कहते हैं।
  • बरकसाज – बरक बनाने वाला 
  • तबक़ / वर्क – चाँदी के तार को हिरण की खाल के मध्य रखकर पीटने के पश्चात् बनने वाला बारीक पत्तर के समान टुकड़ा

जड़ाई

  • सोने अथवा चाँदी के आभूषणों में नग/नगीना को लगाने की क्रिया, जयपुर प्रसिद्ध
  • जड़िया – नगों की जड़ाई करने वाले कारीगर
  • पटवा – आभूषणों को डोर में पोकर पहनने योग्य बनाने वाला कारीगर  
  • कुन्दन कला – सोने प्लेटिनम आभूषणों में रत्नों की जड़ाई

धातु हस्तशिल्प

कोफ्तगिरी

  • लोहे पर सोने या चाँदी की सूक्ष्म कसीदाकारी, मुख्यत: हथियारों, तलवार, ढाल, खंजर इत्यादि के अलंकरण हेतु  
  • कलाकार – कोफ्तगार
  • क्षेत्र – मुख्यत: मेवाड़ (उदयपुर के सिकलीगर),चित्तौड़गढ़, उदयपुर, अलवर के तलवारसाज, जयपुर 
  • लोहे में सोने की कारीगरी, जो जयपुर व अलवर की प्रसिद्ध है।
  • G.I. टैग – कोफ्तगिरी (उदयपुर) 2023 
  • प्रसिद्ध कलाकार – डॉ. श्यामलता, राजेश गहलोत, दुर्गेश।

तहनिशा

  • पीतल की वस्तुओं में डिज़ाइन को गहरा खोद कर उस खुदाई में सोने का पतला तार भर दिया जाता है। 
  • प्रमुख केंद्र – जयपुर तथा अलवर

कलईगिरि

  • ताँबा, पीतल आदि धातुओं के बर्तनों पर की जानी वाली चमक, कलईगिरि कहलाती है 
  • कलईगिरी द्वारा बर्तन की सतह का वातावरण के साथ क्रिया कर होने वाली ऑक्सिडाइज़ेशन की प्रक्रिया को भी अवरुद्ध किया जाता है 
  • कलईगर – कलई करने वाला कारीगर

बादले

  • प्रमुख केन्द्र – जोधपुर
  • पानी भरने के बर्तन जो जिंक से बने होते हैं और इन पर कपड़े या चमड़े की परत चढ़ाई जाती है
  • इसमें पानी लम्बे समय तक ठण्डा रहता है

मुरादाबादी काम – जयपुर 

  • पीतल के बर्तनों पर खुदाई करके की नक्कासी 
  • कलाकार – नूर मोहम्मद, गफूर खान, रज़्ज़ाक़ कुरैशी

मृण्य हस्तशिल्प

ब्लैक पॉटरी – कोटा, सवाई माधोपुर

  • चीनी मिट्टी के बर्तनों पर काले रंग की चित्रकारी
  • राजस्थान की सबसे सस्ती पॉटरी
  • इसका उपयोग कप, प्लेटे, गमलेदान, कुड़ेदान आदि बनाने में
  • बनास नदी की मिट्टी का उपयोग

ब्लू पॉटरी

  • चीनी मिट्टी के बर्तनों पर नीले रंग की चित्रकारी
  • पात्र सामान्यत: सफेद रंग के, अलंकरण में पृष्ठभूमि में नीला आसमानी या पीला रंग दिया जाता है 
  • यह कला मूल रूप से चीन और फारस की है जो मुगलकाल में भारत आई तथा राजस्थान में इसकी शुरुआत जयपुर में सवाई रामसिंह-द्वितीय (1835-1880 ई.) के काल में हुई।
  • जयपुर निवासी चूड़ामन और कालू कुम्हार ने यह कला दिल्ली के भोला नामक कलाकार से सीखकर राजस्थान में इसकी शुरुआत की
  • विधि – बर्तनों पर काँच, कथीरा, सागी, क्वार्ट्ज पाउडर और मुल्तानी मिट्टी का घोल चढ़ाया जाता है तथा बर्तनों पर फूल-पत्तियों, देवी-देवताओं व अन्य दृश्यों के चित्र बनाये जाते हैं व तैयार पॉटरी को 800° सेन्टीग्रेड तापमान में पकाया जाता है।
  • कृपाल सिंह शेखावत
    • इस कला को देश-विदेश में पहचान दिलाई – 1974 पद्मश्री
    • नीले रंग के अलावा भी अन्य 25 रंगों का और प्रयोग 
    • जिसे ब्लू पॉटरी की कृपाल शैली के नाम से जाना जाता है।
  • प्रसिद्ध महिला कलाकार – स्वर्गीय नाथी बाई [कमलादेवी चट्टोपाध्याय, राजमाता गायत्री देवी द्वारा  भी इस कला को समर्थन]
  • वर्तमान में प्रमुख कलाकार- त्रिलोकचन्द, दुर्गालाल, गिरिराज, हनुमान सहाय, भगवान सहाय व भैंरू खारवाड़, आदि

कागजी पॉटरी – अलवर, जयपुर

  • बर्तनों पर अत्यंत महीन जालीदार काम , इन बर्तनों में तरल पदार्थों को नहीं रखा जा सकता है 

सुनहरी पॉटरी

  • प्रसिद्ध – बीकानेर की सुनहरी पॉटरी

पोकरण पॉटरी – पोकरण

  • यह परमाणु नगरी पोकरण (जैसलमेर) की स्थानीय टेराकोटा पोट्स कला है। इस कला की विशेषता पोकरण शहर की लाल मिट्टी है। लाल व कत्थई रंग की माटी से बने मृद् पात्रों को लकड़ी की सहायता से पारम्परिक तरीके से अवाड़ा में पकाया जाता है। पकने के बाद इन मृद् पात्रों का रंग हल्के गुलाबी जैसा हो जाता है
  • इन मृदपात्रों को लकड़ी के अवाड़ा में पकाने से पूर्व खढ़िया, गेरू, पीले व काले रंग से पारम्परिक शैली में अलंकरण व बेल-बूटों का रूपांकन किया जाता है। इस कला में पुरुषों के साथ-साथ महिलाएँ भी रंगांकन तथा अलंकरण में योगदान देती है
  • पोखरण पॉटरी (जैसलमेर) को GI टैग प्राप्त है

टेराकोटा

  • राजसमंद जिले का मोलेला ग्राम प्रसिद्ध
  • स्थानीय लोकदेवताओं की मूर्तियां, सांचो का प्रयोग नहीं होता 
  • विधि – बनास नदी की काली चिकनी मिट्टी में 25 प्रतिशत गधे की लीद मिलाकर उसको जमीन पर थापा जाता है और हाथ और साधारण औजार से ही आकृति उभारी जाती है। एक सप्ताह तक सूखने के बाद आग में इन्हें 800°C ताप में पका कर गैरू रंग कर अलंकृत किया जाता है
  • बनास नदी के निकट वाले उन दो स्थानों जहाँ से मिट्टी निकाली जाती है  – अवला तालाब तथा सोलह की छापर
  • कलाकार – खेमराज कुम्हार, मोहनलाल कुम्हार (पद्मश्री), राजेंद्र कुम्हार, गगन बिहारी दाधीच (मोलेला आर्ट का जादूगर)
  • G.I. टैग – मोलेला मृण शिल्पकला + इसके logo को
  • अन्य मुख्य केंद्र
    • हरजी (जालौर)- यहाँ मामाजी के घोड़े बनाये जाते हैं।
    • बसवा (दौसा)- मिट्टी के विविध, चित्राकर्षक अलंकरण वाले बर्तनों के लिए प्रसिद्ध (कुंजा के लिए प्रसिद्ध)
    • बू-नरावता- मिट्टी के खिलौने, गुलदस्ते, गमले आदि कलाकृतियों के लिए प्रसिद्ध
    • मेहटोली (भरतपुर)- मृत्तिका शिल्प के लिए प्रसिद्ध
    • निम्बला गाँव (बाड़मेर) – सेलडी से बनी मूर्तियाँ प्रसिद्ध 
    • लाख पॉटरी – बीकानेर
    • हरी पॉटरी – जोधपुर
  • हिंगाण – देवी देवताओं की मिट्टी से बनी मूर्तियां

काष्ठ हस्तशिल्प

कठपुतली

  • कठपुतली का उद्भव स्थल राजस्थान को माना जाता है।
  • कठपुतली कला का जनक – देवीलाल सामर।
  • देवीलाल सामर ने लोककला मंडल, उदयपुर द्वारा इस कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाने का कार्य किया। इसके लिए उन्हें सन् 1968 में पद्मश्री से नवाजा गया।
  • कठपुतली की प्रमुख कहानियाँ-पृथ्वीराज संयोगिता, राजा विक्रमादित्य की सिंहासन बतीसी और अमरसिंह राठौड़ का खेल।
  • अरडू की लकड़ियों से कठपुतलियाँ बनायी जाती है।
  • प्रमुख केन्द्र- उदयपुर, चित्तौडगढ़ तथा जयपुर का कठपुतली नगर।
  • 2009 में इस कला को G.I. टैग मिला।
  • 2017 में कठपुतली कला LOGO को G.I. टैग मिला।

कावड़

  • जन्मदाता – प्रभात सुथार
  • लकड़ी से निर्मित मंदिरनुमा काष्ठ कलाकृति
  • इसके कई कपाट व द्वार होते हैं जिन पर देवी-देवताओं के धार्मिक व पौराणिक कथाओं से संबंधित प्रसंग चित्रित होते हैं कथावाचन के साथ साथ कावड़ के द्वार खुलते जाते हैं तथा अंतिम द्वार खुलने पर राम लक्ष्मण व सीता माता की मूर्ति दिखती है 
  • भगवान राम के जीवन से संबंधित प्रसंग होने पर इसे राम की कावड़ भी कहते हैं। जिसके कारण इसे चलता-फिरता देवघर भी कहते हैं।
  • प्रमुख स्थलबस्सी (चित्तौड़गढ़) गाँव के खैरादियों द्वारा 
  • प्रमुख चित्रकार – माँगीलाल मिस्त्री, द्वारिका, सत्यनारायण
  • कावड़ को पूरा लाल रंग से रंगा जाता है, जिसके ऊपर काले रंग से धार्मिक व पौराणिक कथाओं को चित्रित किया जाता है।

बेवाण

  • यह लकड़ी से निर्मित सिंहासन है, जिस पर ठाकुरजी जी की मूर्ति की श्रृंगारित करके बैठाया जाता है
  • अंनंत चतुर्दशी एवं देवझूलनी एकादशी को बेवाण की झाँकी निकली जाती है

खाण्डा / खांडे

  • मांगलिक अवसरों पर (विशेषतया: होली) पर बनायी जाने वाली लकड़ी से निर्मित तलवारनुमा आकृति, खाण्डा कहलाती है।

चौपड़े

  • शुभ मांगलिक अवसरों पर कुंकुम, चावल, अक्षत आदि रखने के लिए बनाया कई खानों का लकड़ी का कलात्मक पात्र। 

तोरण

  • विवाह के समय वधू के घर के मुख्य प्रवेश द्वार पर बाँधी हुई लकड़ी की कलाकृति जिसके ऊपरी सतह पर चिड़ा/ तोता बना होता है।
  • इसे खेजड़ी या बेर की लकड़ी से बनाया जाता है।
  • तोरण शक्ति का प्रतीक है।
  • निर्माण – जयपुर का त्रिपोलिया बाजार प्रसिद्ध

पातरे – तिरपणी

  • श्वेताम्बर जैनों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक विशेष लकड़ी का पात्र 
  • रोहिड़े की लकड़ी, खिरणी की लकड़ी (उदयपुर)  
  • निर्माण – खैरादी (बढ़ई) जाति के लोग
  • क्षेत्र – पीपाड़(जोधपुर), जैतारण और बाड़मेर

बाजोट 

  • ये लकड़ी से बने चतुष्कोणीय आकृति (चौकी’ या ‘छोटी मेज’) होते हैं, जिनका प्रयोग भोजन या पूजा के समय थाली को रखने हेतु किया जाता है। 
  • लकड़ी के आभूषण – नाई गाँव, उदयपुर

पलाण / पलाणी

  • ऊँट के ऊपर बैठने या सामान लादने के लिए इस्तेमाल होने वाली काठी
  • शेखावाटी क्षेत्र में इसे खटाल्यों कहते हैं 

काष्ठ तीर-कमान  

  • बॉडीगामा (डूंगरपुर)
  • चंदूजी का गड़ा (बाँसवाड़ा)

गोफण 

  • पक्षियों को भगाने हेतु पत्थर फेंकने के लिए चमड़े की बनी पट्टी जिसके दोनों सिरों पर डोरी होती है 
  • साधारण भाषा में गुलेल में लगी हुई पट्टी जहाँ पत्थर को रखकर रस्सी को पीछे खींचा जाता है 
  • रामदेव जी के काष्ठ / कपड़े के घोड़े – रामदेवरा जैसलमेर 
  • जेठाना (डूंगरपुर) – लकड़ी की मूर्तियों के लिए 
  • लकड़ी के खिलौने – गणगौर, तोरण – चित्तौड़गढ़

पत्थर हस्तशिल्प

सिलावट – पत्थर की मूर्ति बनाने वाले कारीगर 

  • किशोरी गाँव (थानागाजी) – लाल पत्थर व संगमरमर की मूर्तियाँ
  • तलवाड़ा – काले पत्थर की मूर्तियाँ 
  • जयपुर – संगमरमर की मूर्तियाँ

लाख हस्तशिल्प

  • प्रसिद्ध केन्द्र – जयपुर
  • प्रमुख कलाकार – जयपुर निवासी अयाज अहमद
  • उपकरण – चूड़ियाँ, पशु-पक्षी तथा अन्य सजावटी सामान
  • हाथी दाँत की चूड़ियाँ – जोधपुर 
  • मणिहार – लाख का कार्य करने वाला व्यक्ति
  • जन्दरी – चूड़ियाँ को आकार देने वाला लकड़ी से बना यंत्र 
  • भोफड़ी – लाख से बनी चूड़ियाँ

कुट्टी / पेपरमेशी हस्तशिल्प

  • प्रमुख केन्द्र – जयपुर
  • लोकप्रिय – सवाई रामसिंह द्वितीय (1835-1880 ई.) के शासनकाल से 
  • ‘कुट्टी’ – कागज, चाक, फेवीकोल, गोंद व मिट्टी के घोल से निर्मित लुगदी
  • इस कला में कागज, चाक, मिट्टी, गोंद आदि को गलाकर व पीसकर लुगदी बना ली जाती है। इच्छित आकृति बनाने हेतु उस वस्तु के साँचे में तैयार लुगदी को दबा दिया जाता है। सूखने पर खड़िया या चाइना कले से फिनिशिंग देते हुए इच्छित रंग दे दिया जाता है। 
  • इस कुट्टी से चौपाये पशु और पक्षी बनाये जाते हैं।

चर्म हस्तशिल्प

उस्ताकला या मुनव्वती कला

  • ईरान में फली फूली, मुग़लकाल में भारत आई  
  • ये चित्रकारी उस्ता चित्रकारों (उस्ताद) द्वारा की जाती है जिनको अनूपसिंह जी लाहौर से लेकर आए थे 
  • उस्ता कला अपेक्षाकृत व्यापक अभिव्यक्ति है जिसमें विविध कलारूपों और तकनीकों का मिश्रण शामिल है
  • सामान्यत: ऊँट के चमड़े पर मीनाकारी, हवेली-महलों पर की सुनहरी मीनकारी
  • प्रसिद्ध कलाकार – हिसामुद्दीन उस्ता (1986 पद्मश्री), मो. हनीफ उस्ता, इकबाल उस्ता, आयूब उस्ता, जावेद हसन 
  • GI Tag – 2023
  • कैमल हाइड ट्रेनिंग सेंटर – ‘उस्ता कला’ (स्वर्ण मीनाकारी) के संरक्षण और विकास के लिए

अन्य महत्वपूर्ण स्थल

  • भीलवाड़ा व कपासन (चित्तौड़गढ़) में नारियल की कलात्मक चूड़ियाँ (पट्टे) बनाने का काम होता है।
  • कण्ठियाँ (मालाएँ) बनाने का काम अंता (बारां) में बहुतायत से होता है।
  • दीनानाथ जी की गली जयपुर में जूट की गुड़िया, पर्स, जूते आदि बनाने का काम होता है।
  • जयपुर में हड्डियों की चूड़ियाँ, आभूषण एवं अन्य सजावटी सामान बनाने का कार्य होता है।
  • सिरोही में तलवारें एवं ढालें बनाने का काम सिरोही में होता है
उत्पादज़िला
खेलों का सामानहनुमानगढ़ 
चन्दन की मूर्तियों का कामचूरू 
गुलाब के फूल व गुलकन्दअजमेर 
मयूर बीड़ी का कारखानाटोंक 
फाड़ चित्रण भीलवाड़ा 
तिलपट्टी ब्यावर 
सुंघनी नसवार ब्यावर
हाथ से निर्मित कागजघोसुण्डा 
मोजड़ियाँ जोधपुर

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