मध्यकालीन ललित कला

मध्यकालीन ललित कला भारतीय संस्कृति की सौंदर्यपरक अभिव्यक्ति का सशक्त स्वरूप है, जिसमें चित्रकला, मूर्तिकला, वास्तुकला और संगीत का समृद्ध विकास दिखाई देता है। प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत विषय के अंतर्गत यह कला तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक परिवेश को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम मानी जाती है।

प्रांतीय शैली (मांडू, गुजरात, बंगाल और जौनपुर)

वास्तुकला की प्रांतीय ‘शैलियां

  • इस अवधि के दौरान इंडो-इस्लामी शैली ने स्थानीय स्थापत्य शैलियों को भी प्रभावित करना आरंभ कर दिया था। बंगाल, बीजापुर, जौनपुर और मांडू वास्तुकला के विकास के महत्वपूर्ण केंद्र बन चुके थे।

बंगाल शैली 

  • वास्तुकला की बंगाल शैली की विशेषता ईंटों और काले संगमरमर का प्रयोग थी। 
  • इस अवधि के दौरान बने मस्जिदों में ढलवां ‘बांग्ला छतों’ का उपयोग जारी रहा। पहले इसका मंदिरों के लिए उपयोग किया जाता था।
  • उदाहरण –  गौर की कदम रसूल मस्जिद, पांडुआ की अदीना मस्जिद आदि।

मालवा शैली

  • मालवा के पठार में स्थित धार और मांडू के नगर वास्तुकला के प्रमुख स्थल बन गए थे। 
  • यहां के भवनों की सबसे प्रमुख विशेषता विभिन्न रंगों के प्रस्तरों और संगमरमरों का प्रयोग था। 
  • भवनों में विशालकाय खिड़कियां लगी थीं जो शायद यूरोपीय प्रभाव का परिणाम थीं और ये मेहराब एवं स्तंभों के शैलीकृत प्रयोग से अलंकृत थे।
  • यहाँ तक कि सीढ़ियों का उपयोग भी निर्माण का सौंदर्यबोध बढ़ाने के लिए किया गया था। 
  • हालांकि, वास्तुकला की इस शैली में मीनारों का उपयोग नहीं किया गया था।
  • वास्तुकला की पठान शैली के रूप में भी ज्ञात मालवा शैली निम्नलिखित विशेषताओं के चलते इस अवधि की पर्यावरण अनुकूलन के सर्वश्रेष्ठ नमूनों में से एक है – 
    1. विशालकाय खिड़कियों का उपयोग भवनों और कक्षों को भली-भांति हवादार बनाता था।
    2. मंडप थोड़े धनुषाकार होते थे। यह विशेषता उन्हें हवादार बनाती थी और गर्मियों में भी ये भवन ठंडे बने रहते थे।
    3. परिसर में जल भंडारण हेतु ‘बावड़ी’ के रूप में ज्ञात कृत्रिम जलाशयों का निर्माण करवाया गया था।
    4. भवनों के निर्माण में स्थानीय पत्थर और संगमरमर की सुलभता का लाभ उठाया गया था। 
    5. तुगलकों द्वारा प्रचलित बट्टार प्रणाली का उपयोग करके भवनों को मजबूत बनाया गया था।
  • उदाहरण – रानी रूपमती का मंडप, जहाज महल, अशरफी महल [एक मदरसा] आदि।

मांडू की वास्तुकला 

  • मांडु नगर मध्य प्रदेश में इन्दौर से 60 मील की दूरी पर स्थित है।   
  • मांडु की स्थिति प्राकृतिक रूप से बहुत सुरक्षित है।
  • उसकी इसी सामरिक विशेषता को देखकर परमार राजपूतों, अफगानों और मुगलों ने इसे अपना आवास बनाया। 
  • होशंगशाह द्वारा 1401-1561 ई. में स्थापित गौरी राजवंश की राजधानी के रूप में इस शहर ने काफी मशहूरी पाई। । 
  • उसके बाद मांडु का इतिहास सुल्तान बाज बहादुर और रानी रूपमती के प्रेम प्रसंगों से जुड़ा रहा। 
हिंडोला महल 
  • एक बड़े रेल पुल की तरह दिखाई देता है जिसकी दीवारें बड़े-बड़े असमानुपातिक पुस्तों पर टिकी हुई हैं।  
  • सुल्तान का दीवाने आम था, [सुल्तान अपनी प्रजा को दर्शन दिया करता था।] 
  • हिंडोला का प्रभाव उत्पन्न करने के लिए इन दीवारों पर ढाल का बखूबी इस्तेमाल किया गया है। 
जहाज महल 
  • दो-मंजिली इमारत, शक्ल पानी के जहाज जैसी। 
  • दो जलाशयों के बीच में स्थित है और इसकी छत, बरामदे, बारजे और मंडप मानों पानी पर लटके हुए हैं।
  • निर्माण – सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी ने । 
  • इसमें नहरें व नालियाँ हैं और छत पर तरण-ताल बना हुआ है।
रानी रूपमती का मंडप 
  • दक्षिणी प्राचीर पर बना हुआ है जहां से नर्मदा घाटी का अति सुंदर दृश्य दिखाई देता है। 
होशंगशाह का मकबरा 
  • इसमें सुंदर गुंबद, संगमरमर की जाली का काम, ड्योढ़ियाँ, प्रांगण, मीनारें और बुर्जे देखने लायक हैं। 
  • इसे अफ़गान शैली के पौरुष/मर्दानगी का उदाहरण माना जाता है लेकिन इसका जालीदार काम, उकेरे हुए टोड़े और तोरण निर्माण कार्य की कोमलता प्रकट करते हैं।

जौनपुर शैली

  • शर्की शासकों के संरक्षण में जौनपुर कला और सांस्कृतिक गतिविधियों का महान केंद्र बन गया था। 
  • वास्तुकला की इस शैली को शर्की शैली के रूप में भी जाना जाने लगा था और पठान शैली की भांति इसमें भी मीनारों के उपयोग से बचा गया था। 
  • यहां के भवनों की एक अनूठी विशेषता प्रार्थना हॉल के केंद्र और बगल के खण्डों में विशाल स्क्रीनों पर चित्रित मोटे और सशक्त अक्षरों का उपयोग है। 
  • उदाहरण – अटाला मस्जिद, आदि

बीजापुर शैली 

  • आदिल शाह के संरक्षण के अंतर्गत बीजापुर शैली या वास्तुकला की दक्कन शैली का विकास हुआ। 
  • उसने अनेक मस्जिदों, मकबरों और महलों का निर्माण करवाया था। 
  • इनका अनूठापन 3-मेहराबों वाले अग्रभाग और बल्बनुमा गुंबदों का उपयोग था। ये सभी लगभग गोलाकार और संकरी गर्दन वाले थे। 
  • उसने कार्निस का उपयोग भी प्रचलित किया। 
  • बीजापुर शैली की एक प्रमुख विशेषता इसकी छतों का व्यवहार था। छतें किसी भी स्पष्ट सहारे के बिना टिकीं थीं। 
  • लोहे के क्लैम्पों और गारे के मजबूत प्लास्टर का उपयोग भवनों को मजबूती देने के लिए किया गया था। 
  • दीवारें समृद्ध नक्काशियों से अलंकृत थीं।
  • उदाहरण – बीजापुर में गोल गुम्बद, आदिल शाह का मकबरा।

गोल गुम्बद 

  • बीजापुर, कर्नाटक में स्थित। 
  • बीजापुर के आदिलशाही राजवंश के सातवें सुल्तान मुहम्मद आदिलशाह (1626-56 ई.) का मकबरा है। 
  • स्वयं सुल्तान ने अपने जीवन काल में बनवाना शुरू किया था। इसका काम पूरा न होने के बावजूद यह एक शानदार इमारत है।
  • मकबरे में कई छोटी-बड़ी इमारतें हैं, जैसे- भीतर आने के लिए विशाल दरवाजा, एक नक्कारखाना, एक मस्जिद और एक सराय जो दीवारों से घिरे एक बड़े बाग के भीतर स्थित है।
  • सल्तनतकालीन चित्रकला के अवशेष सीरी एवं बेगमपुर के मध्य स्थित मखदूमवली मस्जिद से प्राप्त होते हैं।
  • नियामतनामा (पाकशास्त्र का एक ग्रन्थ) एवं मिफताह उल फुजाला (फारसी शब्दकोष) से लघुचित्र प्राप्त होते हैं।
  • नियामतनामा की खोज राबर्ट स्कैलटन ने की थी।
  • इस्लाम में जीवित प्राणियों के चित्र बनाना प्रतिबन्धित होने के कारण अधिकांश सल्तनत कालीन सुल्तानों ने चित्रकला में रूचि नहीं ली।
  • सल्तनत कालीन चित्रकला का प्रथम उल्लेख बैहाकी द्वारा लिखित गजनवियों के इतिहास में मिलता है।
  • फुतूह-उस-सलातीन के अनुसार इल्तुतमिश के समय में चीन के चित्रकार दिल्ली आये।
  • शम्स-ए-सिराज अफीफ ‘तारीख-ए-फिरोजशाही’ में सल्तनत कालीन चित्रकला का कुछ वर्णन देता है। उसके अनुसार फिरोज तुगलक ने यह आदेश दिया कि आरामगृहों में हिन्दू नरेशों के चित्र नहीं लगाने चाहिये।
  • मालवा, जौनपुर व बंगाल के सुल्तानों ने चित्रकला को संरक्षण दिया।
  • सल्तनत चित्रकला की चौर पंचाशिका, लौर चंदा और इंडो पर्शियन शैली की चित्रकला ने मुगल चित्रकला का मार्ग प्रशस्त किया।
  • सर्वप्रथम 1947 ई. में हरमन गोइट्स ने ‘दी जनरल ऑफ दी इण्डियन सोसाइटी ऑफ ओरिएन्टल आर्ट’ में अपने लेख में कहा कि दिल्ली सल्तनत के काल में चित्रकला का अस्तित्व था।
  • मध्यकालीन चित्रकला की प्रारम्भिक अवस्था जो एलोरा एवं अजन्ता के अवशेषों के साथ मिली हुई है, की विशेषताएँ है- पैनी रेखाएं, पैने कोण, रंगीन मॉडलिंग का अभाव तथा रंग बिरंगी सजावट की तरफ झुकाव ।

इस्लाम व संगीत

  • इस्लाम में संगीत वर्जित, फिर भी सुल्तानों ने संरक्षण दिया।
  • तुर्क अपने साथ रबाब और सारंगी लाए।

अमीर खुसरो

  • मध्यकालीन संगीत का संस्थापक
  • सितार (वीणा + तम्बूरा का समन्वय) एवं तबला (मृदंग में परिवर्तन) का श्रेय।
  • कव्वाली, कौल, तराना का प्रचलन।
  • 19 रागों (जैसे—तिलक, औनम, सनम आदि) को प्रचलित करने पर नायक उपाधि।

मुख्य संगीत ग्रंथ

  • संगीत रत्नाकर – शारंगदेव द्वारा (1210–47)।
    • टीकाएँ – कल्लीनाथ, केशव, सिंह भूपाल।
  • पहली बार हिन्दुस्तानी–कर्नाटक संगीत का विभाजन (14वीं सदी, गुजरात)।
  • संगीत सुधाकर – हरिपाल देव को समर्पित।
  • घुनियात-उल-मुन्या – मलिक शमसुद्दीन अबू राजा द्वारा; अर्थ–इच्छा का आनंद।
  • रागदर्पण (फिरोज तुगलक काल) का फारसी अनुवाद।
  • लज्जत-ए-सिकन्दरी – सिकंदर लोदी काल।
  • गुनयात-उल-मुन्या – 1375, प्रथम मुस्लिम द्वारा संगीत ग्रंथ।
  • मानसिंहमान कौतूहल (ध्रुपद का विकास)।
  • स्वरमेल कलानिधि – रमामात्य, विजयनगर।
  • अन्य ग्रंथ:
    • संगीत शिरोमणि इब्राहीम शाह शर्की काल
    • संगीतराज, संगीत मीमांसामहाराणा कुम्भा
    • रागतरंगिणी लोचन कवि
    • संगीत दर्पणदामोदर
    • संगीत चूड़ामणि जगदेकमल्ल
    • रागविबोध सोमदेव

चित्रकला की पहाड़ी शैलियां

  • चित्रकला की इस शैली का विकास मुगल आधिपत्य की छत्रछाया के अधीन आने वाले उप-हिमालयी राज्यों में हुआ। 
  • छोटे राज्यों में फल-फूल रही कई शैलियां थीं जो ‘पहाड़ी’ चित्रकला के अंतर्गत आती हैं। इनमें जम्मू से लेकर अल्मोड़ा तक फैली लगभग 22 रियासतों के दरबारों की चित्रशालाएं सम्मिलित थीं। 
  • इसलिए, पहाड़ी चित्रकला को दो समूहों में बांटा जा सकता है:
    • जम्मू या डोगरा शैलीः उत्तरी श्रृंखला
    • बशौली एवं कांगड़ा शैलीः दक्षिणी श्रृंखला
  • चित्रित विषय पौराणिक कथाओं से लेकर साहित्य तक से सम्बन्धित थे जिसमें नई तकनीकों का प्रयोग किया गया। 
  • एक सामान्य पहाड़ी चित्रकला शैली कैनवास में कई आकृतियां लाती थी और ये सभी गतिशीलता से भरी होती थीं। 
  • प्रत्येक आकृति संरचना, रंग और रंजकता में भिन्न थी। 
  • इस शैली की दो सबसे महान चित्रकार ‘नैनसुख’ और ‘मनकू’ थे।

बशौली शैली

  • 17वीं सदी में पहाड़ी शैली में बनाए गए चित्रों को बशौली शैली कहा जाता है। 
  • यह प्रारंभिक चरण था और इसकी विशेषता कमल की पंखुड़ियों सदृश बड़ी आंखें तथा घटते चले जाने वाले बालों की रेखा के साथ भाव अभिव्यक्ति करने वाला अर्थपूर्ण चेहरा था। इन चित्रों में बहुतायत में प्राथमिक रंगों अर्थात् लाल, पीले और हरे रंग प्रयोग किया गया था। 
  • इस शैली में कपड़ों पर चित्रण की मुगल तकनीक का प्रयोग किया जाता था, लेकिन इसने अपनी स्वयं की शैली और तकनीक का विकास किया।
  • इस शैली के पहले संरक्षक राजा कृपाल सिंह थे। उन्होंने भानुदत्त की रसमंजरी, गीत-गोविंद और रामायण के चित्रों का चित्रण करने का आदेश दिया। 
  • इस शैली का सबसे प्रसिद्ध चित्रकार देवी दास था। वह राधा कृष्ण और राजाओं के छविचित्र का उनकी पोशाक में और सफेद कपड़ों में अपने चित्रण के लिए प्रसिद्ध था। 
  • रंगों की विषमता इस शैली से जुड़ी हुई है और उन्होंने शैलीगत ढंग से मालवा चित्रकला से भी उधार लिया।

कांगड़ा शैली

  • मुगल साम्राज्य के पतन के बाद कई कलाकार कांगड़ा क्षेत्र में चले गए क्योंकि 1774 में उन्हें राजा गोवर्धन सिंह से संरक्षण मिला था। इससे चित्रकला की गुलेर कांगड़ा शैली का जन्म हुआ। 
  • इसका सबसे पहले विकास गुलेर में हुआ तत्पश्चात् यह कांगड़ा में आयी। 
  • यह शैली राजा संसार चंद के संरक्षण में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गयी। उसकी चित्रकला की विशेषता संवेदनशीलता और बुद्धिमत्ता थी जिसका अन्य शैलियों में अभाव था।
  • सबसे लोकप्रिय विषय – गीत गोविंद, भागवत पुराण, बिहारीलाल की सतसई और नल-दमयंती थे। कृष्ण की रासलीला के दृश्य बहुत प्रमुख थे। चित्रों का दूसरा बहुत ही प्रसिद्ध समूह ‘बारह महीने’ अथवा ‘बारह मासा’ का है जिसमें कलाकार ने मनुष्य की भावनाओं पर बारह महीनों के प्रभाव को आगे लाने का प्रयास किया है। 
  • यह भावपूर्ण शैली 19वीं सदी तक लोकप्रिय बनी रही। 
  • कांगड़ा शैली कुल्लू, चंबा और मंडी के दरबार में विकसित होने वाली अन्य चित्रशालाओं की जनक शैली बन गयी।

रागमाला चित्रकला

  • रागमाला चित्रकला विभिन्न भारतीय संगीत रागों का चित्रण करने वाली रागमाला या ‘रागों की माला’ पर आधारित मध्यकालीन भारत की दृष्टांत योग्य चित्रकला की श्रृंखला है। 
  • रागमाला चित्र 16वीं और 17वीं ‘शताब्दी में आरंभ होने वाली भारतीय चित्रकला की अधिकांश शैलियों में बनाए गए थे और आज पहाड़ी रागमाला, राजस्थान या राजपूत रागमाला, दक्कनी रागमाला और मुगल रागमाला के रूप में तद्नुसार इनका नाम लिया जाता है।
  • इन चित्रों में प्रत्येक राग का एक विशेष भाव में नायक और नायिका (हीरो और हिरोइन) की कहानी का वर्णन करने वाले रंग से वैयक्तिकरण किया गया है। यह ऋतु तथा दिन और रात के उस समय का भी वर्णन करता है जिसमें कोई विशेष राग गाया जाता है। 
  • रागमाला में उपस्थित छह प्रमुख राग हैं- राग भैरव, दीपक, श्री, माल्कौस, मेघ और हिंडोल।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

error: Content is protected !!
Scroll to Top
Telegram WhatsApp Chat