चोल वंश

चोल वंश प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के दक्षिणी भाग में एक शक्तिशाली और प्राचीन राजवंश के रूप में स्थापित हुआ। इस वंश ने प्रशासन, समुद्री व्यापार, कला व स्थापत्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल कीं, विशेषकर राजराज चोल और राजेंद्र चोल के शासनकाल में।

चोल वंश

चोल वंश परिचय 

  • दक्षिण भारत का प्राचीनतम वंश माना जाता है। 
  • उदय – संगमकाल (3 शताब्दी) में परन्तु राजनीतिक उत्थान नवीं शताब्दी में हुआ था।
  • चोल राज्य आधुनिक कावेरी नदी घाटी, कोरोमण्डल, त्रिचिरापल्ली एवं तंजोर तक विस्तृत था।
  • इनकी पहली राजधानी ‘उत्तरी मनलूर’ थी।
  • कालान्तर में उरैयुर तथा तंजावुर चोलों की राजधानी बनी। 
  • चोलों का शासकीय चिह्न ‘बाघ’ था।
  • चोल का शाब्दिक अर्थ – घूमना

स्त्रोत 

  • चोलों के विषय में प्रथम जानकारी पाणिनी कृत ‘अष्टाध्यायी’ से मिलती है। 
  • इस विषय में जानकारी के अन्य स्रोत हैं-कात्यायन कृत वार्तिक, महाभारत, संगम साहित्य, टॉलमी आदि। 

नोट – 

  • अशोक के दूसरे एवं तीसरे शिलालेखों में चोल साम्राज्य का उल्लेख मिलता है।
  • संगम साहित्य में चोल शासक करिकाल तथा उसकी राजधानी उरैयूर का वर्णन है।

चोल वंश अभिलेख :

  1. लीडन दानपत्र लेख, तंजौर अभिलेख – राजराज प्रथम के बारे में जानकारी।
  2. करन्दे अभिलेख – राजेन्द्र प्रथम के बारे में जानकारी मिलती है

चोल वंश प्रमुख शासक

उरवप्पहर्रे इलन जेत चेन्नी – 

  • चोल राजवंश का प्रथम शासक 
  • इसने अपनी राजधानी उरैयुर में स्थापित की। 
  • युद्ध में प्रयुक्त होने वाले अपने सुन्दर रथों के लिए प्रसिद्ध।

करिकाल – 

  • साम्राज्य विस्तारवादी शासक ने अपने शासन के आरम्भिक वर्षों में ‘वण्णि’ नामक स्थान पर वेलरि तथा अन्य ग्यारह शासकों की संयुक्त सेना को पराजित कर प्रसिद्धि प्राप्त की। 
  • उसकी दूसरी महत्त्वपूर्ण सफलता थी वहैप्परन्दलई के 9 छोटे-छोटे शासकों की संयुक्त सेना को पराजित करना। 
  • संगम साहित्य के अनुसार करिकाल ने कावेरी नदी के मुहाने पर ‘पुहार’ पत्तम (कावेरी पट्टनम) की स्थापना की। 
  • शक्तिशाली नौ सेना रखने वाला करिकाल शायद संगम-युग का सबसे महान् एवं पराक्रमी शासक था। 
  • ‘पट्टिनपालै’ कृति के उल्लेख के आधार पर करिकाल ने उरैयुर को अपनी राजधानी बनाया। 
  • उसकी प्रशंसा में संगम साहित्य के अनेक कविताओं की रचना हुई। 
  • करिकाल चोलों का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण शासक था, जिसका अर्थ होता है ‘जले हुए पैर वाला व्यक्ति’।

ईसा की तृतीय शताब्दी से 9वीं शताब्दी तक चोलों का इतिहास अंधेरे में था, पर 9वीं शताब्दी के मध्य ही चोल नरेश विजयालय द्वारा पल्लवों के अवशेष पर चोल शक्ति का पुनः उद्धार किया। यह चोल राजवंश साम्राज्य 9वीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक विद्यमान रहा। चोल साम्राज्य के उत्थान में भिन्न- भिन्न शासकों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

विजयालय (850 ई. – 875 ई.)

  • 9वीं शताब्दी में चोल वंश का संस्थापक विजयालय था जिसने पल्लवों से सत्ता प्राप्त की।
  • विजयालय ने पाण्ड्य शासकों से तंजौर को छीन कर उरैयुर के स्थान पर इसे अपने राज्य की राजधानी बनाया।
  • नरकेसरी की उपाधि धारण की।

आदित्य प्रथम (875 ई. – 907 ई.)

  • विजयालय के पुत्र आदित्य I ने ‘कोदंडराम’ की उपाधि धारण की।
  • आदित्य प्रथम ने अपनी साम्राज्य विस्तारवादी महत्त्वाकांक्षा के वशीभूत होकर पल्लव नरेश अपराजित को पराजित कर उसकी हत्या कर दी और इस तरह पल्लव राज्य पर चोलों का अधिकार हो गया। 
  • पल्लवों के अतिरिक्त उसने पाण्ड्यों एवं कलिंग देश के राजाओं को भी पराजित किया। 

परान्तक प्रथम (907 ई. – 953 ई.)

  • पांड्य नरेश राजसिंह II को पराजित कर पाण्ड्यों की राजधानी मदुरा पर अधिकार कर  ‘मदुरैकोण्ड’ की उपाधि धारण की।
  • परांतक II सुंदर चोल के नाम से प्रसिद्ध था।
  • परांतक प्रथम के उत्तरमेरुर अभिलेख से चोलकालीन “स्थानीय स्वशासन” की जानकारी मिलती है।
  • परान्तक द्वितीय को सुन्दर चोल भी कहा गया।

नोट – 953 ई. से लेकर 985 ई. तक चोल साम्राज्य में राजनीतिक उठापटक रही, इस दौरान उत्तम चोल (973-985 ई.) जिसने पहली बार सोने के सिक्के चलाए ऐसा करने वाला प्रथम शासक था। परान्तक प्रथम के पश्चात अरिमौलिवर्मन अथवा राजराज प्रथम प्रसिद्ध चोल शासक हुआ। 

राजराज प्रथम (985-1014 ई.)

  • राजराज प्रथम के शासन के तीस वर्ष चोल साम्राज्य के सर्वाधिक गौरवशाली वर्ष थे।
  • प्रथम सबसे प्रतापी शासक था।
  • इसने अपने पितामह पराकान्त प्रथम की ‘लौह एवं रक्त’ की नीति का पालन करते हुए ‘राजराज’ की उपाधि ग्रहण की।
  • राजराज I (985-1014) मुम्माडि चोलदेव, जयगोंड, चोल मार्तंड आदि नामों से भी जाना जाता था।
  • राजराज प्रथम ने अपने शासन के 9वें वर्ष में सामरिक अभियान प्रारम्भ किया। 
  • राजराज प्रथम ने बड़े पैमाने पर सैनिक अभियान कर दक्षिण के पाण्ड्यों व चेर, पश्चिमी गंगों, उत्तर में कलिंग तक उत्तरी श्रीलंका, मालद्वीप आदि को विजित किया।
    • इस अभियान के अन्तर्गत सर्वप्रथम इसने चोल विरोधी गठबंधन में शामिल पाण्ड्य, चेर एवं श्रीलंका के शासकों पर आक्रमण किया। 
    • इस संयुक्त मोर्चे को नष्ट करने के लिए उसने सर्वप्रथम चेर नरेश भास्करवर्मन को पराजित किया। 
    • राजराज ने पाण्ड्य शासक अमर भुजंग को पराजित कर राजधानी ‘मदुरा’ को अपने कब्जे में कर लिया।
    • इसके बाद राजराज प्रथम ने श्रीलंका के शासक महेन्द्र-v  पर आक्रमण कर उसकी राजधानी ‘अनुराधापुरम’ को बुरी तरह नष्ट कर दिया। इस अभियान में राजराज ने अपने द्वारा जीते गये प्रदेश का नाम ‘मामुण्डी चोलमण्डलम’ रखा एवं ‘पोलोन्नरुवा’ को उसकी राजधानी बनाया। संभवतः इस विजय के बाद राजराज प्रथम ने ‘जगन्नाथ’ का विरुद धारण कर पोलोन्नरुवा का नया नाम ‘जगजाथमंगलम्’ रखा। 
    • अपने शासनकाल के अन्तिम दिनों में राजराज प्रथम ने मालद्वीप को विजित किया।
  • 1000 ई. में इसने भू-सर्वेक्षण किया ताकि भू-राजस्व का निर्धारण किया जा सके।
  • स्थानीय स्वशासन को प्रोत्साहन दिया।
  • एक दूत मण्डल चीन भेजा।
  •  वह धर्म-सहिष्णु, कला एवं विद्वता का संरक्षक था। 
  • शैलेन्द्र शासक श्रीमार विजयोतुंग वर्मन को नागपट्टनम में बौद्ध विहार की अनुमति दी तथा तंजौर में राजराजेश्वर का मन्दिर बनाया।
  • राजराज-I शैव मतानुयायी था तथा उसने शिवपादशेखर की उपाधि धारण की।
रचनाकार कृति
पद्मगुप्तनवसाहसांकचरित
विल्हण विक्रमांकदेवचरित
हेमचन्द्र कुमारपालचरित
नयचन्द्र सूरिहम्मीरकाव्य
जयानक पृथ्वीराज विजय
वाक्पति गौडवहो
संध्याकर नन्दी रामपालचरित
क्षेमेन्द्र वृहत्कथामंजरी

राजेन्द्र I (1014-1044)

  • इसकी उपलब्धियों के बारे में सही जानकारी तिरुवालंगाडु एवं करंदाइ अभिलेखों से मिलती है। 
  • अपने विजय अभियान के प्रारम्भ में इसने पश्चिमी चालुक्यों, पाण्ड्यों, एवं चेरों को पराजित किया। 
  • लगभग 1017 ई.  में श्रीलंका को पूर्णरूपेण विजित किया गया तथा तत्कालीन शासक महेन्द्र V को बंदी बनाया गया।
  • राजेन्द्र प्रथम ने उत्तर-पूर्वी भारतीय प्रदेशों को जीतने के लिए विशाल हस्ति प्रधान सेना का इस्तेमाल किया।
  • राजेन्द्र चोल के उत्तर की ओर किए गए सैन्य अभियान में गंग शासक [मधुकामार्नव ] तथा पाल शासक (महीपाल) को पराजित किया गया। इस अभियान की सफलता पर राजेन्द्र I ‘गंगैकोण्डचोल’ की उपाधि धारण की। साथ ही गंगईकोंडचोलपुरम नामक नगर का निर्माण किया गया उसमें मन्दिर, तालाब आदि निर्मित कराये। 
  • उसने सिंचाई हेतु चोलगंगम नामक एक बड़े तालाब का भी निर्माण करवाया।
  • राजेन्द्र प्रथम ने श्री विजय (शैलेन्द्र) शासक विजयोत्तुंग वर्मन को पराजित कर जावा, सुमात्रा एवं मलाया प्रायद्वीप पर अधिकार कर लिया
  • राजेन्द्र प्रथम कला, साहित्य एवं शिक्षा का संरक्षक था, उसने एक वैदिक महाविद्यालय भी स्थापित किया। उसने चीन से सांस्कृतिक व व्यापारिक संबंध स्थापित किए।

राजाधिराज प्रथम (1044-1052 ई.) 

  • राजेन्द्र I के बाद राजाधिराज I (1044-1052) उसका उत्तराधिकारी बना 
  • उसने चालुक्य नरेश सोमेश्वर को हराकर चालुक्य राजधानी कल्याणी पर अधिकार कर लिया। इस विजय के उपलक्ष्य में राजाधिराज ने ‘विजय राजेन्द्र’ की उपाधि धारण की। 
  • कोप्पम युद्ध में राजाधिराज-I सोमेश्वर के साथ युद्ध करते हुए शहीद हो गया तथा उसके छोटे भाई राजेन्द्र-II का राज्याभिषेक युद्धभूमि में ही किया गया।

राजेन्द्र-II (1052-1064 ई.) 

  • कोप्पम की युद्ध भूमि में ही सोमेश्वर प्रथम को पराजित किया था।
  • इस विजय के उपलक्ष्य में “कोल्हापुर” में एक विजय स्तंभ का निर्माण करवाया तथा अपना राज्याभिषेक करवाया था।
  • 1062 ई. में कुंडलसंगम (कर्नाटक) के युद्ध में सोमेश्वर प्रथम को पुन: पराजित किया।

वीर राजेन्द्र (1064-1070 ई.) 

  • 1066 ई. इसने कल्याणी के शासक सोमेश्वर प्रथम को पराजित किया था ।
  • सोमेश्वर ने अगले वर्ष पुन: लड़ने की चुनौती दी थी।
  • 1067-68 ई. कुंडलसंगम के युद्ध में सोमेश्वर प्रथम बीमार होने के कारण स्वयं न आकर अपनी सेना को वीर राजेन्द्र से लड़ने भेजा था।
  • वीर राजेन्द्र ने सोमेश्वर की सेना को पराजित किया था।
  • तुंगभद्रा नदी के किनारे “विजय स्तंभ”“राजकेशरी” की उपाधि धारण की थी।
  • विजयवाड़ा (बैजवाड़ा) के युद्ध में वेंगी चालुक्यों को पराजित कर वेंगी पर पुन: चोलों का अधिकार स्थापित किया था।

नोट – वीर राजेन्द्र की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों में उत्तराधिकार संघर्ष हुआ, जिसमें अधिराजेन्द्र विजयी रहा व शासक बना।

चोल शासक अधिराजेन्द्र की जन विद्रोह के समय में हत्या कर दी गई।

कुलोत्तुंग प्रथम (1070-1120 ई.) 

  • कुलोत्तुंग I चोल – चालुक्य वंश का प्रथम शासक था।
  • कौन? – मूलत: यह वेंगी चालुक्य शासक राजेन्द्र द्वितीय था, जिसने अधिराजेन्द्र की मृत्यु के बाद चोल साम्राज्य पर अधिकार कर अपना राज्याभिषेक “कुलोत्तुंग प्रथम” के नाम से करवाया था।
  • रामानुज को इनके कारण श्रीरंगम छोड़ना पड़ा।
  • इसके समय भी अनेक जन विद्रोह हुए।
  • 1076 ई. में सिंहल द्वीप (श्रीलंका) ने अपने आप को स्वतंत्र कर लिया था।
  • 1078/79 कल्याणी शासक विजयादित्य (विक्रमादित्य) के साथ हुए युद्ध में इसने कल्याणी शासक को पराजित कर गंगवाड़ी पर अधिकार कर लिया था।
  • पाण्डेय व चेरों ने भी विद्रोह किए परन्तु उनका दमन कर दिया था। 
  • इसने भूमि का दो बार सर्वेक्षण करवाया।
  • कलिंग आक्रमण :-
    • कुलोत्तुंग ने दो बार कलिंग पर आक्रमण किया था :-
      • 1096 ई. – दक्षिण कलिंग के विद्रोह का दमन करने हेतु।
      • 1110 ई. – कलिंग शासक अनंतवर्मन को पराजित कर कलिंग पर अधिकार कर लिया था।
  • उपाधि – श्रीभुवनचक्रवर्तिन (तीनों लोकों का स्वामी)
  • कुलोत्तुंग I के शासनकाल में 1077 में 72 व्यापारियों के एक दूतमंडल को चीन भेजा गया।
  • कुलोत्तुंग I ने ‘शुंगमतर्वित’ (करों को हटाने वाला) की उपाधि धारण की।
  • उसके शासनकाल में भूमि का पुनः सर्वेक्षण कराया गया।
  • 1120 ई. में इसकी मृत्यु के साथ ही चोलों का पतन प्रारंभ हो गया था।
  • कुलोत्तुंग II के शासनकाल में चिदम्बरम् मंदिर में स्थित गोविन्दराज की मूर्ति को समुद्र में फेंक दिया गया। कालान्तर में प्रसिद्ध वैष्णव संत रामानुजाचार्य ने उक्त मूर्ति का पुनः उद्धार करके उसे तिरुपति मंदिर में स्थापित किया।
  • कुलोत्तुंग II के दरबार में तमिल रामायण के लेखक कम्बन रहते थे।

विक्रम चोल ने त्याग समुद्र की उपाधि ग्रहण की।

राजेन्द्र-III (1246-1279 ई.) 

  • चोल वंश का अंतिम शासक।
  • इसी ने मदुरै के पाण्ड्य शासक सुन्दर पाण्ड्य, चेर, काकतीय व होयसल पर विजय प्राप्त की थी।
  • सुंदर पाण्ड्य ने राजेन्द्र-III पर आक्रमण कर पराजित किया व इसे अपना सामंत बना लिया था।
  • चोल साम्राज्य का विभाजन पाण्ड्य व होयसेलों में हो गया था।

चोल प्रशासन

  • चोल प्रशासन केन्द्रीय नियंत्रण के साथ – साथ स्थानीय स्वायत्तता के लिए प्रसिद्ध था।
  • राजा की मृत्यु के बाद- ज्येष्ठाधिकार था।
  • उपराजा का अधिकार सामान्यत: राजकुमारियों को दिया जाता था।

केन्द्रीय प्रशासन

  • चोल शासन का स्वरूप राजतन्त्रात्मक व वंशानुगत था। 
  • राजा प्रशासन का प्रधान था व उसकी सहायता हेतु अनेक अधिकारीगण थे। 
  • राजा के निजी सहायकों को उद्द्मकुटुम कहा जाता था। उडेनकुट्टम में आदेशों को लिपिबद्ध करने का कार्य किया जाता था। 
  • उच्चस्तरीय अधिकारी पेरून्दनम व निम्न स्तरीय अधिकारी सीरुतरम कहलाते थे। 
  • ओलेनायकम् प्रधान सचिव होता था।
  • राजा के मौखिक आदेश- ‘तिरुवायकेल्लि’ कहलाता था।

सैन्य संगठन- 

  • चोल नरेशों ने साम्राज्य की सुरक्षा एवं विजयों की दृष्टि से विशाल सेना का गठन किया। जिसके पदाति, अश्वारोही, गजारोही तीन अंग थे। 
  • चोलों की 4 प्रकार की सेना थी- 1. पैदल सेना, 2.  अश्व सेना, 3. गज सेना, 4. जल सेना
  • रथ सेना का उल्लेख नहीं मिलता है।
  • ‘कुंजिर-मल्लर’ गजारोही दल को, ‘कुदिरैच्चैवगर’ अश्वारोही दल को, ‘बिल्लिगढ़’ धनुर्धारी दल को, ‘सैगुन्दर’ भाला से प्रहार करने में निपुण सैनिकों को एवं ‘वेलैक्कोर’ राजा के अति विश्वसनीय अंगरक्षक को कहते थे। 
  • सेना गुल्मों व छावनियों (कडगम) में रहती थी। 
  • चोल काल में सेना की टुकड़ी का नेतृत्व करने वाले को नायक तथा सेनाध्यक्ष को महादण्डनायक कहा जाता था। 
  • इनके अतिरिक्त चोलों ने एक शक्तिशाली नौ सेना बनाई। चोल शासक अपने जहाजों को व्यापारिक एवं सैनिक दोनों कार्यों के लिए प्रयुक्त करते थे। 
  • चोल नरेश राजराज प्रथम ने नौ सेना द्वारा उत्तरी श्रीलंका, मालद्वीप एवं लक्षद्वीप को विजित कर साम्राज्य विस्तार किया। 
  • राजेन्द्र प्रथम की नौ सेना ने अपनी विजय वैजयन्ती गांगेय क्षेत्र, सिंहल द्वीप, बंगाल की खाड़ी के पार जावा, सुमात्रा एवं मलय प्रायद्वीप पर फहरा दी। इस समय बंगाल की खाड़ी चोल झील बन गई। 
  • महाबलिपुरम तथा कावेरी पट्टनम मुख्य चोल बन्दरगाह थे।

नोट – वीरतापूर्वक लड़ने वाले सैनिकों को क्षत्रिय शिरोमणि की उपाधि दी जाती थी।

न्याय व्यवस्था- 

  • राजा सर्वोच्च न्यायाधीश होता था। 
  • चोल अभिलेखों में राजा के धर्मासन का अंतिम न्याय प्राप्त करने के स्थान के रूप में उल्लेख है। जहाँ पर राजा धर्मासनभट्ट, जो स्मृतिशास्त्र ज्ञाता ब्राह्मण विद्वान होता था, की सहायता से न्याय करता था। 
  • न्याय के लिए नियमित न्यायालयों का गठन किया गया एवं ग्राम न्यायालय जातीय पंचायत का विधान था। 
  • छोटे विवादों पर स्थानीय निगम निर्णय देते थे। 
  • चोलों की दण्ड व्यवस्था में आर्थिक दण्ड एवं सामाजिक अपमान के दण्ड का विधान था। 
  • प्रायः आर्थिक दण्ड काशु (सोने का सिक्का) के रूप में देना पड़ता था।

राज्य की आय के स्त्रोत- 

  • राज्य की आय का मुख्य साधन भू-राजस्व था। 
  • भू-राजस्व निर्धारित करने से पूर्व भूमि का सर्वेक्षण, वर्गीकरण एवं नाप-जोख कराया जाता था। तत्कालीन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि राजराज प्रथम एवं कुलोत्तुंग के पैर की माप ही भूमि की लम्बाई मापने की इकाई बनी। 
  • भूमिकर भूमि की उर्वरा एवं वार्षिक फसल चक्र देखने के बाद निर्धारित किया जाता था। संभवतः चोल काल में भूमि कर उपज का एक तिहाई हिस्सा हुआ करता था। 
  • चोल अभिलेखों भूमि कर के अतिरिक्त अन्य करों का उल्लेख मिलता है, जो इस प्रकार है –
आयमराजस्वकर
मनैइरैगृहकर
कदैइरैव्यापारिक प्रतिष्ठानों पर लगने वाला कर
मगन्मैव्यवसाय कर
आजीवकाशुआजीविका पर लगने वाला कर
  • राजस्व विभाग का उच्च अधिकारी वरित्पोत्तगकक् कहा जाता था। 
  • व्यापार-वाणिज्य, आयात-निर्यात, सिंचाई कर आदि आय के अन्य साधन थे। 
  • राजस्व प्रशासनिक एवं जनहितोपयोगी कार्यों आदि पर व्यय होता था।
  1. इनके सिक्कों पर – व्याघ्र, मछली, धनुष, वराह का अंकन होता था।
  2. दक्षिण भारत में वराह प्रकार का सिक्का सबसे ज्यादा प्रचलित था।
  3. ताँबे के सिक्के हेतु ‘काकणी’ शब्द का प्रयोग किया गया था।
  4. उत्तम चोल प्रथम चोल शासक जिसने सोने के सिक्के चलाए।

प्रान्तीय प्रशासन 

  • साम्राज्य विभिन्न प्रान्तों में विभाजित था। जिन्हें मण्डलम् कहा जाता था। इनके प्रशासक को ‘मण्डल मुडालि’ कहते थे। मण्डल-मुडालि सामान्यतः राजपरिवार के सदस्य होते थे, जिन्हें राजा नियुक्त करता था। 
  • प्रान्तों के अपने अधिकारी, सेना एवं न्यायालय होते थे। 
  • प्रान्तों का विभाजन क्रमशः वलनाडु (कोट्टम), नाडु (जिला), कुर्रम (ग्राम समूह) एवं ग्राम में होता था।

स्थानीय प्रशासन – 

  • चोल प्रशासन की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता ग्रामीण एवं नगरीय स्तर पर स्थानीय स्वायत्तता की व्यवस्था थी। जो प्रतिनिधि संस्थाओं उर, सभा, महासभा एवं नगरम् के द्वारा संचालित होता था। 
  • इनके सदस्यों के लिए शैक्षणिक, आर्थिक तथा नैतिक योग्यताएं अनिवार्य थी। 
  • निर्वाचित सदस्यों को ‘पेरु मक्कल’ कहा जाता था। 
  • ये सदस्य समितियों, जिन्हें ‘वारियम’ कहा जाता था, के माध्यम से सिंचाई व्यवस्था, भूमि विवरण, लगान एवं करों की वसूली, मन्दिरों की देखरेख, न्याय आदि प्रशासनिक कार्यों की देखभाल करते थे। 
  • उर सामान्य वयस्क पुरुष कर दाताओं की सभा थी, जबकि सभा, महासभा में सिर्फ ब्राह्मण सदस्य होते थे। इनको आन्तरिक स्वायत्तता प्राप्त थी। केन्द्रीय हस्तक्षेप न के बराबर था। 
  • वस्तुतः ग्राम लघु गणतंत्र ही थे, इस प्रकार चोल प्रशासन सुसंगठित एवं कार्य कुशल शासन था।
  • नगरम व्यापारिक समुदाय की प्रशासनिक सभा जिसमें केवल व्यापारी वर्ग ही शामिल था।
  1. समाज में क्षत्रिय एवं वैश्य का अस्तित्व नहीं था।
  2. वलंगै (दायीं भुजा वाले) तथा इड़गै (बायीं भुजा वाले) विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग थे।
  3. वैष्णव संतों को आलवार तथा शैव संतों को नयनार कहा जाता था।
  4. चोल शासनकाल में शैव एवं वैष्णव दोनों धर्मों  का प्रचार हुआ।
  5. अधिकांश चोल शासक शैव मतानुयायी थे।
  6. चोलकालीन वैष्णव मत के प्रधानाचार्य रामानुज विशिष्टा ने द्वैतवाद मत का प्रतिपादन किया।

चेर 

  • केरल पुत्र के नाम से चर्चित चेर राज्य आधुनिक कोंकण, मालाबार का तटीय क्षेत्र, उत्तरी त्रावणकोर एवं कोचीन तक विस्तृत था
  • चेर राज्य का राजकीय चिह्न ‘धनुष’ था।
  • उदियनजेरल चेर राजवंश का प्रथम राजा था। इसकी राजधानी मरन्दै थी।
  • शेनगुट्टुवन चेरों का सबसे महान शासक था। इसे ‘लालचेर’ भी कहा जाता था। शेनगुट्टुवन ने ‘कण्णगी पूजा’ (पतिनी पूजा) प्रारम्भ की। इसने अधिराज की उपाधि धारण की।
  • चेर शासक सेईयै को हाथी जैसी आँखों वाला कहा जाता है।

पांड्य 

  • पांड्य राज्य का सर्वप्रथम उल्लेख पाणिनि की अष्टध्यायी में मिलता है। मेगस्थनीज ने भी कहा है कि इस राज्य पर एक औरत का शासन था।
  • पांड्य राज्य की राजधानी मदुरै थी तथा इसका राजचिह्न मछली (मत्स्य) था।
  • पांड्य राज्य मदुरै, रामनाथपुरम, तिरुनेलवेली, तिरूचिरापल्ली एवं ट्रावनकोर तक विस्तृत था।
  • नेडियोन पांड्य राजवंश का प्रथम शासक था। नेडियोन का शाब्दिक अर्थ ‘लम्बा आदमी‘ होता है। इसने समुद्र की पूजा प्रारम्भ कराई थी।
  • नेडियोन के पश्चात् मुदुकुडुमी शासक बना। इसने ‘पालशालै’ (यज्ञशालाएँ बनवाने वाला) की उपाधि धारण की।

शासन व्यवस्था :

  • संगमकालीन शासन व्यवस्था में वंशानुगत राजतंत्र की प्रथा प्रचलित थी।
  • राजा अपनी सभा ‘नालवै’ में प्रजा की कठिनाइयों पर विचार करता था।
  • ‘मनरम’ सर्वोच्च न्यायालय होता था जिसका सर्वोच्च न्यायाधीश राजा होता था।
  • राजा के आवास पर सशस्त्र महिलाएँ रक्षक के रूप में रहती थीं।
  • सेना के कप्तान की उपाधि ‘एनाडी’ थी। युद्ध में मृत सैनिकों की पत्थर की मूर्तियाँ बनाई जाती थी।

आर्थिक स्थिति :

  • तमिल प्रदेश अपनी उर्वरता के लिए प्रसिद्ध था। कावेरी डेल्टा बहुत उपजाऊ था। कृषि आर्थिक व्यवस्था का मुख्य आधार थी। यहाँ धान, रागी तथा गन्ने की खेती होती थी। इसके अतिरिक्त अन्य अनाज, फल, गोलमिर्च और हल्दी की पैदावार होती थी।
  • ‘अरिकामेडु’ एक प्रसिद्ध व्यापारिक केन्द्र था जहाँ से वस्तुएँ भारत के विभिन्न भागों में भेजी जाती थीं।
  • तमिल प्रदेश में गोलमिर्च का अत्यधिक उत्पादन होता था जिसे ‘यवनप्रिय’ कहा गया है।
  • पुहार चोल का, शालियूर पांड्य का तथा बंदर नोरा तोण्डी चेर राज्य का महत्त्वपूर्ण बंदरगाह था। ‘
  • अवनम संगम काल में बाजार को कहते थे।
  • उरैयूर सूती कपड़ों के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था।
  • संगमकाल में सर्वाधिक व्यापार रोमन राज्य के साथ था।

धर्म :

  • संगमकाल में वैदिक व ब्राह्मण धर्म का सर्वाधिक प्रचलन था। 
  • तमिल क्षेत्र में मुरुगन, शिव, बलराम, कृष्ण, मरियम्मा (परशुराम की माता), येलम्मा (सीमा की देवी) आदि की उपासना की जाती थी।
  • मुरुगन तमिलों का सर्वश्रेष्ठ देवता था। मुरुगन की पूजा काफी प्राचीन थी। इनके सम्मान में वेलनाडल उल्लासमय नृत्य किया जाता था।
  • मुरुगन को सुब्रह्मण्यम भी कहा जाता था तथा इसका एकीकरण स्कंद कार्तिकेय के साथ किया गया। मुरुगन का प्रतीक कुक्कुट (मुर्गा) था।
  • पुहार के वार्षिक उत्सव में इन्द्र की पूजा होती थी।
  • लोगों को कर्म, पुनर्जन्म तथा भाग्य पर विश्वास था।

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