भारत के सांस्कृतिक आधार: सिंधु एवं वैदिक काल भारत की सांस्कृतिक संरचना को समझने के लिए सिंधु एवं वैदिक सभ्यताएँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत विषय के अंतर्गत इन कालों का अध्ययन भारतीय समाज, धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक विकास की मूल रूपरेखा प्रस्तुत करता है। साथ ही, छठी शताब्दी ई.पू. की श्रमण परम्परा तथा नये धार्मिक विचार आजीवक, बौद्ध और जैन भी भारतीय सांस्कृतिक आधार के महत्वपूर्ण अंग माने जाते हैं।

सिन्धु सभ्यता
सिन्धु सभ्यता परिचय
- सिंधु घाटी सभ्यता आद्य ऐतिहासिक काल की एक शहरी सभ्यता है, जो भारत में शहरीकरण के पहले चरण का प्रतिनिधित्व करती है।
- इसका उदय नवपाषाण काल के अंतिम चरण में अधिशेष उत्पादन के कारण हुआ। जहां ताम्र पाषाण काल ग्रामीण अवस्था को दर्शाता है, वहीं सिंधु घाटी सभ्यता शहरी संस्कृति का प्रतीक है।
सिन्धु का अतीत –
- 1826 ई.: चार्ल्स मैसन ने एक लेख में प्राचीनतम नगर हड़प्पा के होने की बात कही।
- 1834 ई.: बर्नेश ने नदी किनारे ध्वस्त किले का उल्लेख।
- 1851-53 ई.: अलेक्जेंडर कनिंघम ने हड़प्पा का सर्वेक्षण किया और 1856 ई. में इसका मानचित्र जारी किया।
- 1856 ई.: कराची से लाहौर रेलवे लाइन बिछाते समय जॉन और विलियम बर्टन ने हड़प्पा के टीले से ईंटें निकालीं।
- 1861 ई.: भारतीय पुरातत्व विभाग की स्थापना हुई, जिसके पहले निदेशक कनिंघम बने।
- 1872-81 ई.: कनिंघम ने हड़प्पा से पाषाण औजार और मोहरें प्राप्त कीं।
- 1899-1905 ई.: लॉर्ड कर्जन ने भारतीय पुरातत्व और प्राचीन स्थलों के संरक्षण का आदेश दिया। 1902 ई.: जॉन मार्शल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक बने।
- 1924 ई.: जॉन मार्शल ने हड़प्पा सभ्यता की खोज की घोषणा की।
- जॉन मार्शल ने ‘मोहनजोदड़ो एण्ड इंडस सिविलाइजेशन’ नामक पुस्तक लिखी थी।
- 1940 के दशक में, मॉर्टिमर व्हीलर ने हड़प्पा स्थलों की खुदाई की।
- 1950 के दशक के बाद: कालीबंगा, लोथल, राखीगढ़ी और धोलावीरा जैसे भारतीय स्थलों की खुदाई की गई।
सभ्यता का नामकरण
- हड़पा सभ्यता [हड़प्पा पहला स्थल जो इस सभ्यता से संबंधित पाया गया]
- कांस्य युगीन सभ्यता [तांबे में टिन मिलाकर कांसे का निर्माण।]
- आद्य ऐतिहासिक सभ्यता
- सभ्यता को सिंधु घाटी सभ्यता नाम जॉन मार्शल ने दिया था। (अन्य प्रमुख नाम – सिंधु सरस्वती सभ्यता)
सिन्धु सभ्यता काल निर्धारण
- सभ्यता के काल निर्धारण को लेकर विद्वानों में पर्याप्त मत दिये गए हैं हालांकि सर्वाधिक मान्य मत 2500 ईसा पूर्व से लेकर 1800 ईसा पूर्व के मध्य हैं
- NCERT के अनुसार:
- प्रारंभिक हड़प्पा काल: 3300–2600 ई.पू.
- परिपक्व हड़प्पा काल: 2600–1900 ई.पू.
- उत्तर हड़प्पा काल: 1900–1300 ई.पू.
- रेडियो कार्बन विधि के अनुसार 2350 ईसा पूर्व से 1750 ईसा पूर्व
- यह विधि प्राचीन सभ्यताओं प्राचीन जीवाश्मों की अवधि और और कॉल निर्धारण को ज्ञात करने में उपयोगी है। जिसे अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय के प्रो. एफ लिब्बी ने विकसित किया।
- जॉन मार्शल – 3200-2700 ईसा पूर्व।
- मार्टिन व्हीलर – 2500-1500 ईसा पूर्व
- माधोस्वरूप वत्स – 3500-2700 ईसा पूर्व
- अर्नेस्ट मैके – 2800- 2500 ईसा पूर्व
सिन्धु घाटी सभ्यता का उद्भव
हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति के विषय में दो प्रमुख सिद्धांत हैं:
1. विदेशी उद्भव का सिद्धांत
- समर्थक – गार्डन चाइल्ड, मार्टिन व्हीलर, डीडी कोसंबी।
- मुख्य तर्क:
- सभ्यता की उत्पत्ति पर मेसोपोटामिया का प्रभाव बताया।
- मार्टिन व्हीलर ने इसे “मेसोपोटामिया सभ्यता का उपनिवेश” कहा।
- गार्डन चाइल्ड ने इसे “मेसोपोटामिया का पूर्वी विस्तार” माना।
- डीडी कोसंबी ने हड़प्पा और मेसोपोटामिया के पूर्वजों को एक ही समुदाय से संबंधित बताया।
- अपने तर्क के समर्थन में प्रमाण – मेसोपोटामिया और हड़प्पा के अन्न के कोठारों का निर्माण लकड़ी से तथा दोनों सभ्यताओं का सामाजिक स्तर एक सम्मान।
नोट – मेसोपोटामिया सभ्यता भारत के पश्चिम में इराक में दजला फरात नदियों के बीच में स्थित है। यह हड़प्पा सभ्यता की समकालीन सभ्यता थी।
- हड़प्पा सभ्यता को पूर्णरूपेण मसोपोटेमिया प्रभाव से युक्त नहीं माना जा सकता क्योंकि दोनों सभ्यताओं के तुलनात्मक अध्ययन से इनमे कई अंतर दिखाई देते है –
| मेसोपोटामिया सभ्यता | हड़प्पा सभ्यता |
| मुहरें बेलनाकार | मुहरें चौकोर और आयताकार। |
| नगरीय और ग्रामीण स्वरूप | पूरी तरह नगरीय स्वरूप। |
| पुरोहित शासन का प्रमाण | पुरोहित शासन का प्रमाण नहीं। |
| लिपि: कीलाक्षर | लिपि: चित्राक्षर। |
| कच्ची ईंटों का उपयोग | पक्की ईंटों का उपयोग। |
भारतीय उत्पत्ति का सिद्धांत
- समर्थक: रोमिला थापर, राजाराम, नटवर झा।
- मुख्य तर्क:
- हड़प्पा सभ्यता के विकास में भारत के उत्तर-पश्चिम की प्राचीन ग्रामीण संस्कृतियों का योगदान।
- बलूचिस्तान (कुल्ली नाल) और राजस्थान (सौंथी) जैसे स्थलों से प्राप्त सामग्री हड़प्पा सभ्यता से मिलती-जुलती है।
सिंधु सभ्यता की उत्पत्ति के सिद्धांत
| विद्वान / इतिहासकार | सभ्यता की उत्पत्ति का सिद्धांत |
| डॉ. लक्ष्मण स्वरूप एवं रामचंद्र आर्य | आर्य मूल से सम्बन्ध |
| गार्डन चाइल्ड, क्रेमर, मार्शल | सुमेरियन (सुमेर से सम्बन्ध) |
| राखलदास बनर्जी, सुनीति चटर्जी | द्रविड़ मूल से सम्बन्ध |
| अमलानंद घोष, धर्मपाल अग्रवाल | सोंधी संस्कृति से सम्बन्ध |
| फ़ेयर सर्विस, रोमिला थापर | ग्रामीण / बलूची ग्रामीण संस्कृति से सम्बन्ध |
| मोर्टिमर व्हीलर | पश्चिम एशिया से ‘सभ्यता के विचारों’ का प्रवसन |
| ई.जे.एच. मैके | सुमेर से लोगों का पलायन |
सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार
- सभ्यता का क्षेत्रफल: 12,99,600 वर्ग किमी।
नोट – हड़प्पा सभ्यता और समकालीन संस्कृतियों का विस्तार भारत और पाकिस्तान में लगभग 15 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में था।
- वर्तमान में नवीन स्थल प्रकाश में आने के कारण अब इसका आकार – विषमकोणीय चतुर्भुजाकार (वास्तविक स्वरूप त्रिभुजाकार था)
- पूर्व से पश्चिम 1600 किमी और उत्तर से दक्षिण लगभग 1400 किमी तक विस्तृत है।
- इस सभ्यता से संबधित लगभग 1500 से अधिक पुरा स्थल प्रकाश में आए जिनमें स्थल (हड़पा, मोहन जोदड़ो, चहुंदड़ो, कालीबंगा, बनावली, राखीगड़ी, धौलावीरा, लोथल, सुरकोटड़ा) नगरी कृत है।
नोट – इस सभ्यता की बस्तियों का सर्वाधिक संकेंद्रण सरस्वती नदी तथा इसकी सहायक नदी घग्घर खाकरा नदी के मध्य था। वर्तमान में हड़प्पा सभ्यता के अधिकांश स्थल सरस्वती व दृषदती नदियों के क्षेत्र से प्राप्त हो रहे हैं।
सिंधु सभ्यता की उत्पत्ति के सिद्धांत


- सैंधव सभ्यता का भौगोलिक विस्तार उत्तर में मांडा (जम्मू) से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने तक तथा पश्चिम में सुत्कागेंडोर से लेकर पूर्व में आलमगीरपुर (मेरठ) तक था।

नोट –
- अमलानन्द घोष ने ’सोथी संस्कृति‘ का हड़प्पा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान माना है।
- मोहनजोदड़ो की बहुसंख्यक जनता भूमध्यसागरीय प्रजाति की थी।
4 प्रकार की प्रजातियाँ / निर्माता
- प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड
- भूमध्यसागरीय
- अल्पाइन
- मंगोलायड
सिन्धु सभ्यता स्थल
| अफगानिस्तान | शोर्तुघई, मुंडीगाक |
| पाकिस्तान | |
| सिंध | मोहनजोदारो, लाखनजोदारो, लरकाना, चहुँदड़ो, अल्लाहदिनो, आमरी, कोटदीजी, अलीमुराद |
| पंजाब | हड़प्पा, गनवेरीवाला, जलीलपुर |
| बलूचिस्तान | बालाकोट, मेहरगढ़, राणाघुण्डई, नौशारो, सोत्काकोह, सुत्कागेंडोर, डाबरकोट, क्वेटा घाटी, कुल्ला [कुल्ली] |
| ख़ैबर पख़्तूनख़्वा [👉 पाक का नया प्रान्त 2018 में बना] | रहमान ढेरी, शेरी खान तरकाई, डेरा इस्माइल खान |
| भारत | |
| जम्मू कश्मीर | मांडा |
| उत्तर प्रदेश | आलमगीरपुर, बडगांव, हुलास, सनौली |
| गुजरात | धौलवीरा, लोथल, सुर कोटड़ा, रंगपुर, रोजदी, मलवान, देसलपुर, प्रभातपट्टन, भगतराव, कोटड़ा भदली (Kotada Bhadli), बाबरकोट, बेट द्वारका, गोला धोरो, लोटेश्वर, पाबुमठ, नागेश्वर |
| नोट – हाल ही में कोटड़ा भादली (गुजरात) की भी खोज हुई है, जहाँ से डेयरी उत्पादन के साक्ष्य मिले हैं।सिन्धु सभ्यता के नवीनतम स्थल – थार का मरुस्थल– वैंगीकोट व गुजरात में करीमशाही खोजे गए हैं। | |
| राजस्थान | कालीबंगा, बरोर, करणपुरा |
| हरियाणा | बनावली, राखीगढ़ी, भिरड़ाणा/भिर्राणा, बालू,कुणाल, मीताथल, फरमाना, जोगनखेडा |
| पंजाब | रोपड़ (पंजाब), बाड़ा, संघोंल (जिला फतेहगढ़, पंजाब), चक 86 |
| महाराष्ट्र | दैमाबाद, सांगली |
हड़पा कालीन नगरों को तीन कालो में विभाजित करके देखा जाता है
- प्राक् हड़पी स्थल / प्रारंभिक हड़प्पा काल: 3000–2600 ईसा पूर्व(मेहरगढ़, कुल्ली, नाल, आमरी, कोट दीजि, हड़प्पा, कालीबंगां, राखीगढ़ी, धोलावीरा, सुरकोटड़ा, बनावली)
- परिपक्व हड़प्पा काल (शहरी चरण): 2600–1900 ईसा पूर्व
- उत्तर हड़प्पा काल (पतन का चरण): 1900–1700 ईसा पूर्व – रोज़दी, रंगपुर
नोट –
- तीनों कालों के स्थल – सुरकोटड़ा धोलावीरा, राखीगढ़ी एवं मांडा
- परिपक्व हड़प्पा काल के दौरान शहरीकरण अपने चरम पर था और इसके बाद इसका पतन शुरू हो गया।
प्रारंभिक चरण
- सिंधु क्षेत्र (मेहरगढ़) विश्व के उन क्षेत्रों में से एक है, जहाँ कृषि और पशुपालन बहुत प्रारंभिक काल में ही शुरू हो गए थे।
- यह ज्ञात नहीं है कि सिंधु क्षेत्र की नवपाषाण संस्कृतियों और बाद की शहरी सभ्यता के बीच कोई निरंतरता थी या नहीं।
- प्रारंभिक हड़प्पा काल में इस पूरे क्षेत्र में गाँव और कस्बों का विकास हुआ, जबकि परिपक्व हड़प्पा काल में शहरी केंद्र उभरे।
सिंधु सभ्यता का राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक जीवन
राजनीतिक जीवन
- हड़प्पा सभ्यता व्यापार और वाणिज्य पर आधारित थी, जिसमें व्यापारी वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
- पिग्गट और व्हीलर का मत है कि सुमेर और अक्कद की भाँति मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में भी पुरोहित लोग शासन करते थे। ये शासक प्रजा के हित का पूरा ध्यान रखते थे। सम्भवतः मोहनजोदड़ो और हड़प्पा उनके राज्य की दो राजधानियाँ थी।
- हंटर के अनुसार, ‘मोहनजोदड़ो का शासन राजतंत्रात्मक न होकर जनतंत्रात्मक था।’
- मैके के अनुसार यहाँ जनप्रतिनिधि का शासन था।
- विद्वान स्टुअर्ट पिग्गट ने हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को जुड़वां राजधानी के रूप में बताया।
सामाजिक जीवन
- सिंधु सभ्यता का समाज मुख्यतः भूमध्यसागरीय प्रजाति का था, जबकि निग्रो प्रजाति अनुपस्थित थी।
- समाज में मुख्यतः चार वर्ग थे – विद्वान, योद्धा, व्यापारी, श्रमिक।
- मातृसत्तात्मक समाज: हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से बड़ी संख्या में नारी मृण्मूर्तियाँ प्राप्त हुईं।
- परिवार: समाज की मुख्य इकाई।
- लोग शाकाहारी और मांसाहारी दोनों थे।
- सौंदर्य प्रसाधन: चहुँदड़ो से लिपस्टिक, काजल, और इत्र के साक्ष्य। हालांकि इस सभ्यता के लोग आडंबर व सुंदरता के बजाय उपयोगिता पर ज्यादा बल देते थे।
- इस सभ्यता में सामान्यत मनोरंजन गतिविधियाँ मछली पकड़ना, शिकार करना, पशु पक्षियों को लड़ाना, चौपड़ व पासा खेलना आदि था।
- एक मुद्रा पर ढोलक का चित्र सिन्धु सरस्वती सभ्यता वासियों की वाद्य कला में रुचि का प्रमाण है। आखेट व संगीत के भी प्रमाण मिले है।
- सिंधु सभ्यता के लोग शांतिप्रिय थे। युद्ध का कोई साक्ष्य प्राप्त नहीं होता है।
सिंधु घाटी सभ्यता का आर्थिक जीवन
- सिंधु सभ्यता के आर्थिक जीवन का प्रमुख आधार कृषि, पशुपालन, शिल्प व व्यापार थे।
कृषि
- सभ्यता नदियों के आस पास विकसित – अतः यहाँ कृषि विकसित अवस्था में थी।
- अधिशेष उत्पादन: अन्नागारों में सुरक्षित रखा जाता था।
- मुख्य फसलें: गेहूँ, जौ, ज्वार, दाल, मटर, रागी, साम्बा। कपास, खजूर, तिल व चावल का भी उत्पादन होता था।
- जुताई के लिए लकड़ी के हल का प्रयोग होता था। [बनावली तथा मोहनजोदड़ो से मिट्टी के हल का साक्ष्य प्राप्त।] फसल कटाई ताँबे के हाँसिये और पत्थर के फलक से।
- प्राक् हड़प्पा कालीन कालीबंगा से आड़ी व तिरछी हल रेखाओं से जुता हुआ खेत मिला है जो कि दोहरी फसल का संकेत देता है।
- अफ़गानिस्तान में शोर्तुघई नामक हड़प्पा स्थल से नहरों के कुछ अवशेष मिले हैं, परंतु पंजाब और सिंध में नहीं। मोहनजोदड़ो के घरों से कुओं के साक्ष्य भी प्राप्त।
- गुजरात एवं राजस्थान से चावल के साक्ष्य प्राप्त।
- धान की भूसी का साक्ष्य लोथल एवं रंगपुर एवं कपास की कृषि का विश्व में प्राचीनतम साक्ष्य मेहरगढ़ से प्राप्त।
पशुपालन
- सिंधु घाटी सभ्यता में पशुपालन महत्त्वपूर्ण था।
- पशुओं में मुख्यतः कुबड़ वाला सांड इसके अलावा बिना कुबड़वाले बैल, भैन्स, भेड़, बकरी, कुत्ते, गधे, खच्चर, सुअर आदि।
- गुजरात के लोग सामान्यतः हाथी पालते थे। कालीबंगां से ऊंट की हड्डियों के साक्ष्य प्राप्त। राणागुंडई से घोड़े के दांत, सुरकोटड़ा से घोड़े की हड्डियाँ, एस.आर. राव के अनुसार रंगपुर व लोथल से घोड़े की मिट्टी की मूर्तियां प्राप्त हुई है।
नोट – सामान्यत सिंधु घाटी के लोग घोड़ा, शेर, बाघ आदि को पालतू नहीं बनाया जाता था। जहाँ घोड़े का अंकन किसी भी मुहर पर नहीं मिलता। वही गाय की आकृति किसी मृणमूर्ति, एवं मृदभांड पर नहीं मिलती।
व्यापार वाणिज्य
- सिंधु घाटी सभ्यता की अर्थव्यवस्था मुख्यतः वाणिज्य और व्यापार पर आधारित थी।
- आंतरिक और विदेशी व्यापार उन्नत अवस्था में था।
- हड़प्पा और मोहनजोदड़ो प्रमुख व्यापारिक मार्गों पर स्थित थे।
- बाह्य व्यापार मुख्यतया मेसोपोटामिया, अफगानिस्तान, बहरीन, ओमान सुमेर, सीरिया आदि देशों के साथ होता था
- मेसोपोटामिया के विभिन्न नगरों से सिन्धु सरस्वती सभ्यता की लगभग 24 मोहरे मिली है। लोथल से एक बटन के समान गोलाकार मोहर मिली है। ऐसी मोहरे बहरीन द्वीप, फारस की साड़ी और मेसोपोटामिया के उप नगर से मिली है।
- ओमान में हड़प्पा सभ्यता का एक मटका/ मर्तबान प्राप्त हुआ है। इसके अतिरिक्त, मेसोपोटामिया में हड़प्पा सभ्यता की बाट, पाँसे और मनके भी मिले।
- मेसोपोटामिया और सुमेर के शासक सरगौन ने दिलमुन (बहरीन) और मेलुहा (सिंधु सभ्यता) से जहाजों के आने जाने का उल्लेख किया है। दिलमन को उगते हुए सूरज तथा हाथियों का देश कहा गया।
आयात निर्यात
| आयात की जाने वाली वस्तुएँ | प्राप्ति स्थल (क्षेत्र) |
| सोना | अफगानिस्तान, फारस, कर्नाटक के कोलार की खानों (मैसूर) |
| चाँदी | ईरान, अफगानिस्तान |
| ताँबा | बलूचिस्तान, खेतड़ी (राजस्थान) |
| टिन | अफगानिस्तान, ईरान (मध्य एशिया) |
| लाजवर्द मणि (नीलरत्न) | बदख्शाँ (अफगानिस्तान), |
| फिरोजा | ईरान |
| शिलाजीत | हिमालय क्षेत्र |
| सीसा | राजस्थान, दक्षिण भारत |
| सेलखड़ी | राजस्थान, गुजरात, बलूचिस्तान |
| शंख एवं कौड़ियाँ | सौराष्ट्र (गुजरात), दक्षिण भारत |
| हरित मणि | दक्षिण भारत |
| गमेड़ (मणका बनाने हेतु) | गुजरात |
निर्यात
- प्रमुख रूप से हाथीदांत, सीप की वस्तुएं, अनाज, कपास निर्यात किया जाता था।
- मेसोपोटामिया के एक ग्रंथ से ज्ञात होता है कि अक्कद साम्राज्य के समय में मेलुहा (सिन्धु घाटी सभ्यता) से आबनूस, ताँबे, सोने, लालमणि और हाथीदाँत का निर्यात होता था।




यातायात के साधन
- आंतरिक व्यापार में मुख्यत: बैल गाड़ी और ठेला गाड़ी का प्रयोग किया जाता था। बाह्य व्यापार के लिए नावों का उपयोग किया जाता था।
- लोथल का विशेष रूप से बंदरगाह के रूप में महत्त्वपूर्ण स्थान था।
माप तौल के साधन
- व्यापार के लिए वस्तुओं के विनिमय एवं माप तौल की एक निश्चित व्यवस्था थी।
- बाट के आकार घनाकार और गोलाकार थे, जो चर्ट जैसार और अगेट से बने होते थे।
- इन बाटों के निचले मानदंड द्विआधारी तथा उपरी मानदंड दशमलव प्रणाली का अनुसरण करते थे।
- बाट एक श्रृंखला में क्रमशः बढ़ते क्रम में 1,2,4,8,16,32,64 तक होते थे। छोटे भार माप की 16वीं श्रेणी का वज़न लगभग 13.63 ग्राम था।
- उन्होंने एक मापने का पैमाना भी इस्तेमाल किया, जिसमें एक इंच लगभग 1.75 सेंटीमीटर के बराबर होता था।
- धातु से बने तराजू के पलड़े भी मिले।
- जहां मोहनजोदड़ो से सीप के बने बाट प्राप्त हुए है वहीं लोथल से हाथीदांत के स्केल प्राप्त।
शिल्प और उद्योग
- वस्त्र उद्योग – इस काल में सूती वस्त्र का उत्पादन महत्वपूर्ण था। मोहन जोदड़ो से सूती वस्त्र के धागे तथा कालीबंगा में मिट्टी के बर्तन पर सूती कपड़े की छाप मिली है। कपास की खेती के प्रमाण मिले हैं। कताई – बुनाई की तकलियाँ व तकुए भी मिले हैं।
- धातु उद्योग – उत्खनन में ताँम्बे व काँसे से निर्मित कलाकृतियां मिली है। ताम्र उपकरणों में मछली पकड़ने के काँटे, आरियां, तलवारें, दर्पण, छेणी, चाकू, भालाग्र, बर्तन आदि मिले हैं। काँसे की प्रसिद्ध नर्तकी की मूर्ति, बैल कुत्ते व पक्षियों की कलाकृतियाँ मिली हैं। हड़प्पावासी चर्ट (एक प्रकार का कठोर पत्थर) से बने ब्लेड, तांबे की वस्तुएँ, हड्डी तथा हाथी दाँत के औज़ारों का उपयोग करते थे। उनके शस्त्रों में बाणाग्र , भाले की नोक, कुल्हाड़ी और फरसे शामिल थे। हालांकि, उन्हें लोहे का ज्ञान नहीं था।
- मणके निर्माण का उद्योग – लोथल और चहुँदड़ो से मणके बनाने के कारखाने मिले हैं। ये मणके सोने, चाँदी, ताम्बे, पीली मिट्टी, शैलखड़ी, कीमती पत्थर, सीपी, शंख आदि से बनाए जाते थे।
- हड़प्पा सभ्यता की अर्थव्यवस्था में हस्तशिल्प उत्पादन का महत्वपूर्ण स्थान था। मनकों और आभूषणों का निर्माण, शंख की चूड़ियों का निर्माण, और धातु-शिल्प यहाँ की प्रमुख हस्तकलाएँ थीं। हड़प्पावासी कार्नेलियन, जैस्पर, क्रिस्टल, स्टेटाइट, तांबा, कांस्य, सोना और शंख, फैयेंस तथा टेराकोटा (पकी हुई मिट्टी) का उपयोग करके मनकों और आभूषणों का निर्माण करते थे।
नोट – रोहरी चर्ट – चर्ट एक बारीक दानेदार अवसादी चट्टान है, जो पाकिस्तान के रोहरी क्षेत्र में पाई जाती थी। हड़प्पावासी इस पत्थर का उपयोग पत्थर के ब्लेड और औज़ार बनाने के लिए करते थे।
सिंधु सभ्यता का धर्म
- मंदिर के साक्ष्य नहीं मिले, लेकिन जॉन मार्शल ने मोहनजोदड़ो से एक भवन का साक्ष्य पाया, जिसमें धार्मिक चिन्ह मिले थे।
- स्वास्तिक के प्रमाण प्राप्त हुए हैं।
- जल पूजा, मातृ देवी की पूजा और पृथ्वी पूजा के प्रमाण मिलते हैं। हड़प्पा से प्राप्त मुहर में स्त्री के गर्भ से पौधा निकलता हुआ दिखाया गया है, जो पृथ्वी पूजा का संकेत है।
- पशुपति शिव की पूजा का प्रमाण भी मिलता है, साथ ही लिंग पूजा और पशु पूजा के भी साक्ष्य प्राप्त होते हैं, खासकर कुबड़ा सांड की पूजा होती थी।
- वृक्ष पूजा में पीपल, नीम और बबूल के वृक्षों की पूजा होती थी। एक मुहर में दो पीपल के वृक्ष के बीच देवता को दिखाया गया है, जिनकी पूजा सात मानव आकृतियाँ कर रही हैं।
- नाग पूजा और अग्नि पूजा का भी प्रचलन था। कालीबंगां और लोथल से अग्निकुंड के साक्ष्य मिले हैं।
- अंत्येष्टि संस्कार के प्रमाण प्राप्त हुए हैं, जिनमें पूर्ण समाधिकरण, दाह संस्कार और आंशिक समाधिकरण शामिल हैं।
- हड़प्पा संस्कृति की समाधियों में मिट्टी के बर्तन, आभूषण, गहने, ताम्रदर्पण और मनके पाए गए हैं, जिससे संकेत मिलता है कि उनका मृत्यु के बाद के जीवन में विश्वास था।
सिन्धु सभ्यता का पतन
इसके कारणों में जलवायु परिवर्तन, मेसोपोटामिया के साथ व्यापार का घटाव, और निरंतर सूखा होने के कारण नदियों और जल संसाधनों का सूख जाना प्रमुख रूप से बताए जाते हैं। आक्रमण, बाढ़ और नदियों के मार्ग का परिवर्तन भी सिंधु सभ्यता के विनाश के कारणों के रूप में उद्धृत किए जाते हैं। समय के साथ, लोग सिंधु क्षेत्र से दक्षिणी और पूर्वी दिशाओं में पलायन करने लगे।
| मत / पतन का कारण | इतिहासकार |
| प्रशासनिक शिथिलता | जॉन मार्शल |
| जलवायु परिवर्तन | ऑरेल स्टाइन |
| बाढ़ के कारण नष्ट हुई। | एसआर राव, अर्नेस्ट मैके एवं जॉन मार्शल |
| रावी एवं घघर नदी के मार्ग बदलने से क्रमशः हड़प्पा एवं कालीबंगा का पतन। | मधोस्वरूप वत्स, लैंब्रिक एवं डेल्स |
| भू तात्विक परिवर्तन। | एम.आर.साहनी, आर.एल.राइक्स, जॉर्ज एफ. डेल्स, एच.टी. लैम्ब्रिक |
| जल प्लावन या विवर्तनिकी विक्षोभ | एमआर साहनी एवं आर.एल.राइक्स |
| मोहनजोदाड़ो के लोगों की आग लगाकर हत्या कर दी गयी। | डी.डी. कोसाम्बी |
| विदेशी आक्रमण व आर्य आक्रमण | गार्डन चाइल्ड, मार्टीमर ह्वीलर, डी.एच.गार्डन, स्टुअर्ड पिण्ट |
| जल की कमी | अमलानंद घोष और डीपी अग्रवाल |
आकस्मिक पतन का सिद्धांत
- हड़प्पा सभ्यता के आकस्मिक पतन संबंधी सिद्धांत में मुख्यतः आर्य आक्रमण, बार बार नदी का मार्ग परिवर्तन, जल प्लावन या विवर्तनिकी विक्षोभ, सुखा आदि कारणों को उत्तरदायी माना गया है।
- आर्य आक्रमण: गार्डन चाइल्ड और व्हीलर जैसे इतिहासकारों ने आर्य आक्रमण को हड़प्पा सभ्यता के पतन का कारण बताया। व्हीलर ने यह माना कि इंद्र, जो ऋग्वेद में दुर्गों को नष्ट करने वाले देवता के रूप में वर्णित हैं, का प्रतीकात्मक अर्थ आर्य आक्रमण से जुड़ा हुआ था।
- मोहनजोदड़ो से 38 नर कंकाल मिले हैं, जिन पर धारदार अस्त्रों के घाव है।
- ऋग्वेद में इंद्र को पुरंदर (दुर्गों को नष्ट करने वाला) और वृत्तासुर हंता (बांधों को नष्ट कर जल को मुक्त कराने का श्रेय) कहा गया है।
- हड़प्पा स्थित कब्रिस्तान H से ऐसा नर कंकाल प्राप्त हुआ है, जो अपने आकार- प्रकार में हड़प्पा कालीन निवासियों से भिन्न है। इसे किसी आक्रमणकारी का कंकाल माना गया है।
- ऋग्वेद में हर यूपिया शब्द का उल्लेख है, जिसकी पहचान हड़प्पा के रूप में की गई है। हालांकि, इस सिद्धांत को आधुनिक शोधों से चुनौती दी गई है,
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स्थल |
स्थान/नदी/सागर तट |
खोज/उत्खननकर्ता |
प्राप्त साक्ष्य |
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हड़प्पा |
पंजाब [पाक] – माण्टगोमरी [वर्तमान – साहीवाल जिला] में रावी – बायें तट |
1st जानकारी 1826 – चार्ल्स मेंसन1921 – दयाराम साहनी ने सर्वेक्षण और 1923 से नियमित उत्खनन |
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मोहनजोदड़ो[सिन्धी – ‘मृतकों का टीला’] |
लरकाना जिला [सिन्ध पाक] – में सिन्धु नदी के दाये तट पर |
राखालदास बनर्जी -1922 ई.जे.एच. मैके तथा मार्शलउत्खनन – 1922 – 30 के मध्य जॉन मार्शल के निर्देशन में करवाया गया |
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चहुंदड़ो |
मोहनजोदड़ो से 80 मील दक्षिण में सिन्धु नदी के किनारे |
1931 ई. – एन.जी. मजूमदार |
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लोथल |
भोगवा नदी एव साबरमती के तट पर गुजरात में |
डा. एस. आर. राव – 1954उत्खनन एस.आर. राव ने 1957-58 ई. के मध्य करवाया। |
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कालीबंगा [शाब्दिक अर्थ है ̵ काले रंग की चूड़ियां] |
हनुमानगढ़ – राजस्थान में घग्घर नदी के बाएँ तट पर |
अमलानंद घोष – 1953 |
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धोलावीरा |
गुजरात के कच्छ जिले के भचाऊ तालुकामनहर एव मन-सेहरा नादियों के बीच |
उत्खननकर्ता – रविन्द्र सिंह बिष्ट – वर्ष 1991खोजकर्ता – जगपति जोशी – 1967-681st खोज – 1960 के दशक में धोलावीरा गांव के रहने वाले शंभूदान गढ़वी |
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सुरकोटदा |
गुजरात |
जे.पी. जोशी – 1964 |
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रोपड़ |
सतलज नदी |
सन् 1950 में खोज – बी.बी. लाल ने।1953-56 ई. में यज्ञदत्त शर्मा ने उत्खनन करवाया। |
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कोटदीजी |
सिंधु नदी |
फजल अहमद खाँ |
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रंगपुर |
मादर नदी |
इसकी खुदाई 1957-58 – S रंगनाथ राव ने |
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आलमगीरपुर |
मेरठ [UP] हिन्डन नदी |
खोज में ‘भारत सेवक समाज’संस्था का विशेष योगदान रहा तथा उत्खनन 1958 में यशदत शर्मा ने करवाया। |
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सुत्कागेंडोर |
ब्लूचिस्तान प्रान्त [पाक] दाश्क नदी |
ऑरेल स्टाइन 1929 |
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बनावली |
हरियाणा के हिसार जिले। सरस्वती नदी के किनारे |
रवीन्द्र सिंह बिस्ट – 1973 – 74 |
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अमरी |
सिंधु नदी के तट पर |
एन.जी. मजूमदार – 1935 |
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कुणाल |
फतेहाबाद (हरियाणा ) |
जे.पी. जोशी एव आर.एस.विष्ट (1974) |
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राखीगढ़ी |
हरियाणा हिसार में सरस्वती / दृषद्वती नदियों के शुष्क क्षेत्र |
खोज रफीक मुगल और सुरजभान ने की थी।उत्खनन व्यापक पैमाने पर 1997-1999 ई.- अमरेन्द्र नाथ द्वारापहली बार खुदाई – 1963 ई. में |
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दैमाबाद |
अहमदनगर (महाराष्ट्र ), प्रवरा नदी के बाएँ तट पर |
बी.पी. बोपर्दिकर |
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भिरड़ाना |
फतेहाबाद जिला [हरियाणा] |
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सिंधु घाटी सभ्यता में मिट्टी की वस्तुएँ
| मिट्टी की वस्तुएं | प्राप्त स्थल |
| मिट्टी की नाव (खिलौना रूप में) | लोथल* |
| मिट्टी का हल (खिलौना रूप में) | बनावली* |
| मिट्टी की बैलगाड़ी* | मोहनजोदड़ो* |
| मिट्टी की दो नारी मृण्मूर्ति | बनावली (भारत में एकमात्र यहाँ से नारी मृण्मूर्ति मिली है) |
| मछली, कछुआ व घड़ियाल की मृण्मूर्ति* | हड़प्पा |
| घोड़ा की मृण्मूर्ति* | लोथल, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा |
| आक्रामक वृ्षभ की मृण्मूर्ति | मोहनजोदड़ो |
| वृ्षभ की मृण्मूर्ति | मोहनजोदड़ो |
सिंधु घाटी सभ्यता में घोड़े के साक्ष्य
| स्थल | घोड़े के साक्ष्य |
| लोथल | घोड़े का जबड़ा/मृण मूर्ति |
| मोहनजोदड़ो | मिट्टी की मृण्मूर्ति |
| राणा घुंडई | घोड़े के दांत |
| सुरकोटड़ा | घोड़े के कंकाल |
सिन्धु सभ्यता के मुख्य बंदरगाह नगर
| बंदरगाह नगर | अवस्थित नदी तट (Location: River Bank) |
| लोथल | भोगवा एवं साबरमती के संगम पर (खम्भात की खाड़ी) |
| भगतराव | किम नदी |
| सुत्कागेंडोर | दास्क या दश्मक नदी (मकरान तट पर) |
| बालाकोट | विंडर/विंडर नदी |

सिंधु/हड़प्पा सभ्यता की वास्तुकला
सिंधु/हड़प्पा सभ्यता में नगर नियोजन
- सैंधवकालीन सुव्यवस्थित भवन निर्माण व नगर नियोजन उन्नत स्थापत्य कला का प्रमाण है। तत्कालीन नगर नियोजन कला की तुलना वर्तमान के स्मार्ट नगरों से की जाती है। सैंधवकालीन नगरों का निर्माण योजनाबद्ध तरीकों से किया जाता था जिसमें कलात्मक सौंदर्य के स्थान पर उपयोगिता पर अधिक बल दिया जाता था।
हड़प्पा सभ्यता के मुख्य नगर थे:
- हड़प्पा (पंजाब, पाकिस्तान)
- मोहनजोदड़ो (सिंध, पाकिस्तान)
- धोलावीरा, लोथल, सुरकोटड़ा (गुजरात)
- कालीबंगा (राजस्थान)
- बनावली, राखीगढ़ी (हरियाणा)
मुख्य विशेषताएँ
1. योजनाबद्ध नगर (Grid Pattern)
- नगर आयताकार ग्रिड पैटर्न।
- सड़के N–S तथा E–W दिशा में।
- कालीबंगा की सड़के: 1.8, 3.6, 5.4, 7.2 मी.
- मुख्य सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं।
2. दो भागों में नगर
उच्चवर्ती –
- पश्चिम में, ऊँची भूमि पर, दुर्गीकृत, चौड़ी दीवार।
- बड़े सार्वजनिक भवन: अन्नागार, प्रशासनिक भवन, स्तंभित हाल।
- कम जनसंख्या, बड़े भवन, पक्की ईंटें।
निम्नवर्ती –
- पूर्व में, सतह पर, आम लोगों का निवास।
- सामान्यतः बिना सुरक्षा दीवार।
- अपवाद: कालीबंगा (दोनों भाग घिरे),
लोथल–सुरकोटड़ा (एक ही दीवार),
चहुंदड़ो (दुर्गीकृत नहीं),
धोलावीरा (तीन भाग + मध्य नगर केवल यहीं)।
3. भवन व घर
- घर: 3–4 कक्ष, आंगन, रसोई, स्नानागार, शौचालय, कुआँ।
- मोहनजोदड़ो: 700+ कुएँ।
- कुछ घर दो मंजिला (सीढ़ियों के कारण)।
- तीन प्रकार: निवास गृह, सार्वजनिक भवन, सार्वजनिक स्नानागार।
4. ईंटें व निर्माण
- पक्की व कच्ची ईंटें।
- पक्की ईंटों का मानक अनुपात—1:2:4
- घर: 7×14×28 सेमी
- शहर की दीवार: 10×20×40 सेमी
- अंग्रेजी बांड शैली।
- नालियाँ व स्नानघर—पक्की ईंटों + जिप्सम से जलरोधक।
5. जल निकास प्रणाली
- विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्राचीन जल निकासी।
- घरों की छोटी नालियाँ → मुख्य ढकी नालियाँ।
- जिप्सम/चूने से प्लास्टर।
- मैनहोल (तरमोखे) + चेंबर (शोषगर्त)।
- व्यक्तिगत व सार्वजनिक स्वच्छता पर जोर।
6. विशाल स्नानागार – मोहनजोदड़ो
- स्थान: उत्तरी भाग, कृत्रिम टीले पर।
- आकार: 39×23×8 फीट
- ईंटों की सीढ़ियाँ, चारों तरफ बरामदे।
- जलरोधक बिटुमेन + जिप्सम गारा।
- पास में कुआँ, 8 छोटे स्नानागार।
- धार्मिक अनुष्ठान, पुरोहितों के कक्ष।
- सर जॉन मार्शल: “विश्व का आश्चर्य”।
- कौशांबी ने पुष्कर/कमलताल से तुलना की।
7. विशाल अन्नागार
मोहनजोदड़ो अन्नागार
- स्थान: स्नानागार के पश्चिम में।
- 45.71×15.23 मी.
- 27 कोठरियाँ, हवा हेतु व्यवस्था।
- राजकीय भंडार हेतु (कर का अनाज)।
हड़प्पा अन्नागार
- ऊँचे चबूतरे पर।
- दो खण्ड, क्षेत्रफल: 55×43 मी
8.जलाशय, स्टेडियम, गोदी
धोलावीरा
- 16 जलाशय।
- मुख्य जलाशय: 95×11.42×4 मी चट्टान काटकर।
- स्टेडियम: 283×45 मी, दर्शक दीर्घाएँ।
लोथल—गोदी (Dockyard)
- पक्की ईंटों का ढांचा।
- आकार: 214×36 मी, गहराई 3.3 मी।
- उत्तरी दीवार में 12 मी चौड़ा द्वार—भोगवा नदी से जुड़ा।
- राव: “फिनिशिया व रोम की तुलना में अधिक उन्नत।”
- वर्तमान विशाखापत्तनम डॉकयार्ड से बड़ा।
9. अन्य जल संरचनाएँ
- मोहनजोदड़ो—700+ कुएँ।
- कालीबंगा—स्नानागार, नालियाँ।
- मनहर—चट्टान काटकर तालाब।
- बनावली—सुरक्षा हेतु खाई।
10. जल प्रबंधन
- मानसून पर निर्भर कृषि → नहरें, तालाब, जलाशय।
- वर्षा जल संचयन संरचनाएँ।
- लोथल—सबसे उन्नत हाइड्रोलिक संरचनाएँ।
- अल्लाहदीनो—छोटे व्यास के कुंए (हाइड्रोलिक दबाव से जल उठता)।
11. आधुनिक शहरों के लिए सीख (IVC → Modern India)
- ग्रिड पैटर्न — भीड़ नियंत्रण, व्यवस्थित विकास (जैसे चंडीगढ़)।
- बंद जल निकासी + कचरा पृथक्करण — संक्रामक रोगों से बचाव।
- आवासीय व सार्वजनिक क्षेत्रों का स्पष्ट विभाजन — ट्रैफिक कम।
- प्राकृतिक प्रकाश व वेंटिलेशन — ऊर्जा बचत।
- धोलावीरा जैसी जल संरक्षण तकनीकें — जल संकट से बचाव (चेन्नई उदाहरण)।
मूर्तिकला
1. प्रस्तर (पाषाण) मूर्तियाँ
मोहनजोदड़ो – पुरोहित/योगी की मूर्ति
- सामग्री: सेलखड़ी पत्थर, पारदर्शी वस्त्र।
- स्थिति: केवल सिर–वक्ष भाग शेष।
- वस्त्र: त्रिफुलिया आकृति युक्त शाल, बाएँ कंधे से दाएँ भुजा के नीचे।
- मुद्रा/रूप:
- नेत्र अधखुले, दृष्टि नाक के अग्रभाग पर।
- सुंदर नाक, होंठ आगे निकले, बीच की गहरी रेखा।
- दाढ़ी, मूंछें, गलमूंछ उभरी हुई।
- कान के सीप जैसी आकृति, बीच में छेद।
- बालों के बीच में मांग, सिर पर साधारण फीता।
- दाहिनी भुजा पर बाजूबंद, गर्दन पर छोटे छेद (हार का संकेत)।

हड़प्पा – दो उल्लेखनीय धड़
- लाल बलुआ पत्थर का धड़
- युवा पुरुष, शरीर का सूक्ष्म अध्ययन।
- सिर व भुजाएं जोड़ने हेतु गर्दन/कंधों में गड्ढे।
- कंधे मांसल, पेट थोड़ा बाहर।

- स्लेटी चूना पत्थर का धड़ (नृत्य-मुद्रा)
- आकर्षक अंग-विन्यास।\
- हड़प्पा + मोहनजोदड़ो की प्रस्तर मूर्तियाँ – त्रिआयामी कला का उत्कृष्ट उदाहरण।
- चूना पत्थर की भेड़–हाथी संयुक्त मूर्ति (भेड़ का शरीर/सींग + हाथी की सूंड) भी मिली।
2. धातु मूर्तियाँ (ताँबा + कांसा)
तकनीक: लुप्त मोम विधि।
प्रसिद्ध मूर्तिया
- कालीबंगा – ताँबे का वृषभ।
- लोथल – ताँबे का कुत्ता व पक्षी।
- मोहनजोदड़ो – कांस्य नर्तकी (सबसे प्रसिद्ध)।
- दैमाबाद – रथ, गोल पहिए, लंबा चालक, ढाले हुए बैल (एम.के. धवलीकर: उत्कृष्ट शिल्प)।
कांस्य नर्तकी की मूर्ति
- ऊँचाई: 10.5 सेमी (4.1 इंच)।
- द्रवीय मोम विधि से निर्मित।
- मुद्रा: त्रिभंग, दायाँ हाथ कमर पर, बाएँ हाथ में अनेक चूड़ियाँ।
- रूप: सांवली त्वचा, दायें हाथ पर कड़ा-बाजूबंद, गले में कोड़ी का हार।
- बड़ी आँखें, चपटी नाक, शरीर में प्राकृतिक लय व ऊर्जा।

वृषभ की कांस्य प्रतिमा (मोहनजोदड़ो)
- आक्रामक मुद्रा, सिर दाईं ओर घूमे हुआ।
- गले में रस्सी, भारी-भरकम शरीर।

कांस्य तकनीक का विकास
- 2500 BCE – IVC, मोहनजोदड़ो की नर्तकी (सबसे प्राचीन)।
- 1500 BCE – दैमाबाद की कांस्य मूर्तियाँ।
- कुषाण काल – चौसा (बिहार) से जैन तीर्थंकर कांस्य प्रतिमाएँ।
- 5th–7th Century CE –
- जैन कांस्य (अकोटा, बड़ौदा)।
- बुद्ध प्रतिमाएँ (सारनाथ/गुप्त शैली), महाराष्ट्र के फोफनर – वाकाटककालीन, अमरावती प्रभाव।
- 8th–10th Century – कश्मीर व हिमाचल की बौद्ध/हिन्दू कांस्य प्रतिमाएँ।
- 10th–12th Century – तमिलनाडु में कांस्य कला चरम पर।
- विजयनगर (16th Century) – तिरुपति में कृष्णदेवराय व रानियों की आदमकद कांस्य प्रतिमाएँ।
3. मृण्मूर्तियाँ (Terracotta)
- सामग्री: काँचली मिट्टी (लाल मिट्टी + क्वार्ट्ज पाउडर)।
- तकनीक: पिंचिंग विधि।
- प्रकार: मनुष्य, पशु; नारी मूर्तियाँ अधिक → मातृसत्तात्मक संकेत।
- कालीबंगा व लोथल की नारी-मूर्तियाँ हड़प्पा/मोहनजोदड़ो से भिन्न।
- मूर्तियाँ अपेक्षाकृत कम परिष्कृत; बड़ी आँखें, चोंच जैसी नाक।
- दाढ़ी-मूंछ वाले पुरुषों की छोटी आकृतियाँ – संभवतः देवता।
- अन्य:
- पहिएदार गाड़ियाँ
- सीटियाँ
- पशु-पक्षी
- खेल सामग्री (पासे, गिट्टियाँ, चकरीएक-सींग वाले देवता का मुखौटा भी मिला।

मातृका प्रतिमाएँ
- भद्दी, अपरिष्कृत, खड़ी मुद्रा।
- उन्नत उरोज, हार, कमर पर अध-वस्त्र, करधनी।
- सिर पर पंखा-जैसा आवरण, दोनों ओर प्यालेनुमा उभार।
- गोल आँखें, चोंच जैसी विशाल नाक, मुँह चीरा हुआ-सा।
मृदभांड कला
मुख्य विशेषताएँ
- लाल रंग के मृदभांड सबसे अधिक प्रचलित।
- अधिकांश बर्तन कुम्हार की चाक से बने — हाथ से बने बहुत कम।
- बर्तनों पर लिपियाँ अंकित — “अभिलेख युक्त मृदभांड”।
- चित्रित वस्तुएँ — मानव, मछली, तालाब, हिरण, हाथी, बाघ, बतख आदि।
- काली पट्टिकायुक्त लाल मृदभांड (Black Striped Red Ware–BSRW)
→ निर्यात किए जाते थे, इसलिए यह व्यावसायिक उद्योग था। - कुछ बर्तनों पर ज्यामितीय आकृतियाँ, वनस्पति, पशु आकृतियाँ (काले रंग से चित्रित)।
- लोथल से विशेष मृदभांड — कौआ और लोमड़ी की आकृति उत्कीर्ण।
प्रकार (Types of Pottery)
सादा मृदभांड (Plain Pottery)
- संख्या में सबसे अधिक।
- लाल चिकनी मिट्टी के बने; कभी-कभी लाल या स्लेटी लेप।
- उपयोग — अनाज, पानी का भंडारण, घरेलू कार्य।
- कुछ पर घुंडीदार (knobbed) सजावट।
चित्रित मृदभांड (Painted Pottery)
- लाल आधार पर काले रंग से चित्रण।
- मुख्यतः — ज्यामितीय आकृतियाँ, पौधे, जानवर।
- सजावटी और आनुष्ठानिक उद्देश्यों के लिए।

बहुरंगी मृदभांड (Polychrome Pottery) — बहुत दुर्लभ
- छोटे कलश।
- रंग — लाल, काला, हरा, सफेद, पीला।
- ज्यामितीय डिज़ाइन।
उत्कीर्णित मृदभांड (Incised Pottery) — दुर्लभ
- उत्कीर्ण सजावट मुख्यतः पैंदे और तश्तरियों पर।
छिद्रित पात्र (Perforated Jars)
- तल में एक बड़ा छिद्र और दीवारों पर छोटे छेद।
- सम्भवतः छानने (filtering) के लिए उपयोग।
सूक्ष्म/सजावटी पात्र (Miniature Pottery)
- आकार अक्सर ½ इंच से भी कम।
- अत्यंत सुंदर, पूरी तरह सजावटी — उच्च कौशल का प्रमाण।
आकार व प्रकार (Shapes & Forms)
- स्टैंड पर रखी थालियाँ
- भंडारण मटके
- छिद्रयुक्त मटके
- प्याले
- S-आकृति के मटके
- कटोरे, प्लेटें, थालियाँ
- घरेलू उपयोग के विविध बर्तन
लगभग सभी बर्तनों में सुंदर मोड़ (curvature) — सीधे कोणीय रूप बहुत कम।
हड़प्पा कला और शिल्प के अन्य आयाम
काष्ठ शिल्प
- उन्नत काष्ठ शिल्प – इसका प्रमाण लोथल की मुहर पर जहाज का अंकन।
- नदी मार्ग के व्यापार हेतु नौका निर्माण के प्रमाण भी मिले — यह उन्नत शिल्प कौशल दर्शाता है
मुद्राएँ (Seals)
- निर्माण सामग्री
- प्रमुखतः सेलखड़ी (Steatite)
- कभी–कभी गोमद, चकमक पत्थर, तांबा, कांस्य, मिट्टी, हाथीदांत
- लोथल व देसलपुर – ताँबे की मुहरें
- मुद्राओं पर आकृतियाँ
- एक सींग वाला साँड़ (Unicorn), गैंडा, बाघ, हाथी, जंगली भैंसा, बकरा, साकिन, मगरमच्छ।
- गाय का साक्ष्य नहीं।
- कल्पित पशु, अर्द्ध -मानव–अर्द्ध -पशु आकृतियाँ।
- लोथल व मोहनजोदड़ो – 1–1 मुहर पर नाव का चित्र।
- अधिकांश मुहरों पर 3–8 अक्षरों की सिंधु लिपि।
- अब तक लगभग 3500 मुहरें खोजी जा चुकी हैं।
- मोहनजोदड़ो में लगभग इतनी ही मुहरें मिली थीं।
- मुद्राओं के प्रकार
- वर्गाकार (सबसे सामान्य), आयताकार, बेलनाकार, वृत्ताकार
- उद्देश्य
- मुहरों का उपयोग कई उद्देश्यों के लिए किया जाता था:
- व्यावसायिक उद्देश्य
- व्यापार और संचार, विशेष रूप से मेसोपोटामिया और लोथल के बीच होने वाले व्यापार में
- ताबीज़ (कुछ मुहरों में छेद होता था, संभवतः उन्हें पहनने के लिए या मृतकों के साथ रखने के लिए)
- मुहरों का उपयोग कई उद्देश्यों के लिए किया जाता था:
- मानक मुद्रा
- मानक आकार 2 × 2 इंच
- सेलखड़ी पर उकेरी गई चित्रात्मक लिपि (अभी तक अपठित)
विशेष मुहरें
1. पशुपति मुहर
- मोहनजोदड़ो से, सेलखड़ी निर्मित
- जॉन मार्शल – इसे पशुपति शिव माना
- आकार : 3.53 × 3.53 सेमी, मोटाई 0.64 सेमी
- मानव आकृति पद्मासन में
- दाईं ओर – हाथी, बाघ
- बाईं ओर – गैंडा, भैंसा
- नीचे – 2 हिरण
- सिर पर – बड़े सींगों वाला मुकुट
- अत्यंत महीन नक्काशी → उन्नत शिल्प कौशल

2. कूबड़दार बैल (Unicorn) मुहर
- मोहनजोदड़ो से
- सबसे अधिक मिलने वाली डिजाइन

ताँबे की पट्टियाँ (Tablets)
- वर्गाकार/आयताकार
- एक ओर मानव आकृति, दूसरी ओर अभिलेख
- नोकदार औजार से सावधानीपूर्वक अंकन
- संभवतः बाजूबंद की तरह पहचान हेतु उपयोग

लिपि
- यह लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है।
- इसे प्रकृति में चित्रात्मक माना जाता है।
- लिखने की शैली ‘बौस्ट्रोफेडन’ (boustrophedon) पैटर्न पर आधारित थी:
- पहली पंक्ति दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी।
- दूसरी पंक्ति बाईं से दाईं ओर लिखी जाती थी।
खोज और प्रारंभिक अध्ययन
- सबसे पहले 1875 में अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा इसकी जानकारी दी गई।
लिपि के अन्य नाम
- सर्पिल लिपि
- गोमूत्राक्षर
- बौस्ट्रोफेडन लिपि
लिपि को पढ़ने के प्रयास
- लिपि को पढ़ने का प्रयास करने वाले पहले भारतीय विद्वान: नटवर झा।
विशेषताएं
- लगभग 64 मूल चिह्न।
- लगभग 400 चित्रात्मक प्रतीक।
- मछली का प्रतीक सबसे अधिक बार दिखाई देता है।
साक्ष्य
- मुहरों और बर्तनों जैसी वस्तुओं पर पाए गए; हड़प्पा के ‘कब्रिस्तान H’ (Cemetery H) से उल्लेखनीय साक्ष्य मिले हैं।
संग्रह (Corpus)
- अब तक लगभग 2500 अभिलेख खोजे जा चुके हैं।
- सबसे लंबे अभिलेख में 26 अक्षर हैं।
सिंधु सभ्यता में वैज्ञानिक ज्ञान
गणित
- गणितीय प्रतीकों की उपस्थिति संख्याओं, जोड़ और गुणा के ज्ञान को दर्शाती है।
चिकित्सा ज्ञान
- कालीबंगा में, एक बच्चे की खोपड़ी मिली है जिसमें छह छेद किए गए थे; यह ‘ट्रेफिनेशन’ (एक शल्य चिकित्सा प्रक्रिया) के प्रचलन का संकेत देता है।
धातु विज्ञान
- इस सभ्यता के पास उन्नत धातु विज्ञान का ज्ञान था, जिसमें धातु ढलाई की तकनीकें और औजारों तथा उपकरणों का निर्माण शामिल था।
वैदिक संस्कृति [1500-600 BC]
वैदिक सभ्यता के निर्माता –
- वैदिक सभ्यता भारत की अति प्राचीन विकसित ग्रामीण सभ्यता थी जिसका स्थापना भारत के उत्तरी मैदानों में की गयी।
- इस सभ्यता के लोगो ने विकास के क्षेत्र में अनेक तकनीको की शुरुआत की और विश्व के सबसे पहले लिपिबद्ध साहित्यों का लेखन किया अत: ऐसी सभ्यताओ के मूल निर्माताओ के मूल निवास को लेकर आकर्षण के विषय के साथ में विद्वानों में मतभेद भी दिखाई देता है।
आर्यों का मूल निवास स्थान
- हड़पा सभ्यता के पश्चात वैदिक संस्कृति का प्रारंभ।
- वैदिक संस्कृति के निर्माताओं को आर्य को माना जाता है।
- आर्य संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ – श्रेष्ठ।
- साथ ही यह प्रजाति का सूचक ना होकर एक विशेष प्रकार की भाषा बोलने वाले समूह का सूचक है जहां तक इनके मूल निवास के बात की जाए तो इतिहासकारों में आज भी पर्याप्त मतभेद का विषय बना हुआ है।
आर्यों के मूल निवास स्थान के विषय में प्रमुख विद्वानों के मत
| विद्वान / लेखक | आर्यों का मूल निवास स्थान (मत) |
| मैक्समूलर, रोथ्स | मध्य एशिया |
| गाइल्स | हंगरी या डेन्यूब नदी घाटी |
| पेंका, हर्ट | जर्मन स्कैन्डिनेविया |
| नेहरिंग, गार्डन चाइल्ड | दक्षिण रूस |
| बाल गंगाधर तिलक | उत्तरी ध्रुव |
| गंगानाथ झा | ब्रह्मर्षि देश |
| अविनाश चन्द्र दास, डॉ. सम्पूर्णानन्द | सप्त सैंधव प्रदेश |
| दयानंद सरस्वती एवं पार्टिजर | तिब्बत |
| एन.सी.ई.आर.टी. | आल्प्स पर्वत के पूर्व में यूरेशिया के पास |
| राजबली पाण्डेय | मध्य भारत |
| एल.डी. कल्ला | कश्मीर / हिमालय |
| डी.एस. त्रिवेदी | देविका प्रदेश (मुल्तान) |
| बेनफ़े | काला सागर (Black Sea) |
| एडवर्ड मेयर | पामीर का पठार |
| ब्रेंडस्टीन | यूराल पर्वत के दक्षिण में कॉकेशस का मैदान |
- आर्यों के मूल निवास स्थान को लेकर मैक्स मूलर ने ईरानी ग्रंथ जेंद अवेस्ता से इनके आगमन की तिथि 1600 ईपू. / 1400 ई.पू. निर्धारित किया। ,
- अभिलेखीय साक्ष्य को आधार को बनाया जाए तो दो महत्वपूर्ण साक्ष्य है –
- कस्सी अभिलेख (ईरान), बोगाज कोई अभिलेख (एशिया माइनर तुर्की) इसमें देवता इंद्र, मित्र और वरुण और नास्त्य का उल्लेख है।
आगमन तिथि के विद्वानों का मत
| मैक्स मूलर | 1200-1000 ईसा पूर्व |
| बाल गंगाधर तिलक | 6000 ईसा पूर्व |
| नोट – 1500 ईसा पूर्व सार्वाधिक मान्य मत। | |
- अद्यतन स्रोतों में अविनाश ओझा के सप्त सैन्धव प्रदेश के रूप में आर्यों के मूल निवास की अवधारण को अधिक बल मिलता है। अविनाश चन्द्र ने अपने समर्थन में वेदों में वर्णित ऋग्वैदिक कालीन नदियों, भौगोलिक अवस्थितियो तथा हिमालय की मूंज्वंत पर्वत चोटी का उल्लेख किया।
वैदिक काल का विभाजन
वैदिक काल को अध्ययन की सुविधा के दृष्टिकोण से विंटर निट्ज ने दो कालो में विभक्त किया जाता है –
ऋग्वैदिक काल (1500-1000 BC) – पूर्व वैदिक काल
- इस काल में काले और लाल रंग के मृदभांड मिले है। इसके अलावा गेरूए रंग के भी मृदभांड भी मिले है।
- ऋग्वेद में लोहे का उल्लेख नहीं है । लोहे का सर्वप्रथम साक्ष्य 1000 BC के आसपास उत्तर प्रदेश के एटा जिले के अतरंजी खेड़ा नामक स्थान से प्राप्त हुआ है चूंकि मिट्टी के बर्तनों की प्राचीनता लगभग 1500 ईसा पूर्व में, लोहे की खोज 1000 ईसा पूर्व के आसपास हुई है। इस प्रकार इन्ही कालो के मध्य ऋग्वैदिक काल को रख जाता है।
उत्तर वैदिक काल (1000-600 BC)
- इस काल में मानव को लोहे का ज्ञान था साथ ही इस काल में चित्रित मृदभांड बनने प्रारंभ हुए जो लोहे से संबधित थे। इसलिए उत्तर वैदिक काल की उच्च सीमा 1000 ईसा पूर्व मानी गई। इसके अलावा महाजनपदों का उल्लेख छठी शताब्दी ईसा पूर्व हुआ।
- इस काल की निम्न सीमा 600 ईसा पूर्व निर्धारित की गई।
आर्यों का भौगोलिक क्षेत्रफल
पूर्व वैदिक कालीन आर्यों का भौगोलिक क्षेत्र
- ऋग्वेद में सप्त सैंधव प्रदेश का उल्लेख है जिसकी सात नादिया सिंधु, सरस्वती, वितस्ता (झेलम), अस्किनी (चेनाब), परुष्णी (रावी), विपासा (व्यास), सतुद्री (सतलज)।
- इन नदियों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है की आर्य सर्वप्रथम पंजाब तथा अफगानिस्तान क्षेत्र में बसे।
- इसके अलावा ऋग्वेद में चार अन्य नदियों के नाम का भी उल्लेख है जैसे कुम्भा, गोमती व स्वास्तु, कुर्रम प्रमुख नदी है।
उत्तर वैदिक आर्यों का भौगोलिक क्षैत्र
- उत्तर वैदिक कालके आर्यों का सीमा विस्तार की बात की जाए तो पश्चिमी सीमा अफगानिस्तान, पूर्वी सीमा बिहार – सदानीरा नदी तक।
नोट – उत्तर वैदिक कालीन ग्रंथ शतपथ ब्राह्मण में विदेथ माधव की कथा का वर्ण है।
महत्त्वपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र
| नाम | वर्णन |
| ब्रह्मवर्त | सरस्वती व दृषद्वती नदियों के बीच का क्षेत्र |
| सप्तसैंधव | सिंधु व उसकी सहायक नदियों का प्रदेश |
| आर्यावर्त | हिमालय से विंध्य तक, पूर्व से पश्चिम समुद्र तक का क्षेत्र |
| मूजवंत पर्वत | हिमालय की चोटी – सोमरस के लिए प्रसिद्ध |
वैदिक कालीन नदियां
- ग्रंथों में वैदिक ग्रंथों में कुल 31 नदियों का उल्लेख किया गया है जिनमें 25 नदिया महत्वपूर्ण है।
- ऋग्वेद के दसवें मंडल नदी सूक्त में 21 नदियों का उल्लेख है इनमें से सिंधु नदी का सबसे अधिक उल्लेख मिलता है। आर्यों के आर्थिक दृष्टिकोण सबसे महत्वपूर्ण नदी मानी जाती हैं। इसे हिरणयानी दीपा गया है जबकि आर्यों की सबसे पवित्र नदी सरस्वती नदी थी जिससे नदीतमा, देवीतमा कहां जाता है क्योंकि वेदिक ऋचाओं की रचना सरस्वती नदी के किनारे हुई हैं।
नोट – ऋग्वेद में समुद्र शब्द का प्रयोग विशाल जल राशि के रूप में किया गया। ऋग्वेद में हिमालय पर्वत का उल्लेख है जिसे हिमावत कहा गया साथ ही मुंजवती चोटी का उल्लेख है।मरुस्थल के लिए धन्व शब्द का प्रयोग किया गया।
ऋग्वैदिक काल

ऋग्वेद का काल निर्धारण (Scholars’ Views)
| विद्वान | काल निर्धारण (ई.पू.) |
| मैक्समूलर | ऋग्वेद: 1200–1000, उत्तर वैदिक संहिताएँ: 1000–800, ब्राह्मण ग्रंथ: 800–600 |
| लुडविग | 1100 |
| जेकॉबी | 3000 |
| माइकल विटजैल | 1200–1000 (पुरु जन में संहिताकरण) |
| बाल गंगाधर तिलक | 6000 |
| मौरिज विंटरनिट्ज (ऑस्ट्रिया) | 2500–2000 |
| बोगजकोई अभिलेख (सीरिया, 1380 ई.पू.) | इन्द्र, मित्र, वरुण, नासत्य – ऋग्वेदिक देवताओं का उल्लेख |
राजनीतिक जीवन
- इस युग में राजनैतिक व्यवस्था कबीलाई पद्धति पर आधारित थी। आर्यों के छोटे छोटे कबीले होते थे जहाँ सभी निर्णय मिल जुल कर लिए जाते थे। ऋग्वेद में पांच कबीलों को पञ्च जन्य कहा गया है जिनमे अनु, दुह्य, तुर्वस, यदु, क्रीवी।
- आर्यों की राजनीतिक जीवन का लोकप्रिय स्वरुप राजतंत्रात्म्क था हालांकि गणतंत्रात्म्क व्यवस्था का भी उल्लेख मिलता है।
- राजा का राज्याभिषेक होता था इस तरह राज्याभिषेक का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है।
- राजा का पद वंशानुगत होता था राजा को कोई नियमित कर प्राप्त नहीं होता था किन्तु उसे बलि नामक स्वैच्छिक कर प्राप्त होता था।
- इस काल में राजा लगभग निरंकुश नहीं होता था क्यूंकि राजा की शक्तियों पर अंकुश रखने के लिए कुछ कबीलाई संस्थाए थी।
- सभा
- इसमें श्रेष्ठ एवं कुलीन जन भाग लेते थे।
- इसके अध्यक्ष को सभापति तथा सदस्यों को सभ्य कहा जाता है।
- इसकी तुलना आधुनिक राज्यसभा से की जाती है।
- समिति
- इसके सदस्य सामान्य जन होते थे।
- इसके अध्यक्ष को ईशान या पति कहा जाता।
- यद्यपि राजा का पद वंशानुगत था, समिति के सदस्यों द्वारा राजा का निर्वाचन होता था।
- इसकी तुलना आधुनिक लोकसभा से की जाती थी
- विदथ
- यह सबसे प्राचीन संस्था थी जो सैनिक तथा असैनिक तथा धार्मिक मामलो के कार्यो को देखती थी।
- परिषद
- एक जनजातीय सैनिक सभा
- सभा
नोट –
- राजतंत्र के अतिरिक्त ऋग्वेद में गैर राजतंत्रात्मक राज्य का उल्लेख है जिसे गण कहा गया। गण का प्रमुख गणपति या ज्येष्ठक होता था
- ऋग्वेद में विदथ (122), गण (46), समिति (9) व सभा (8) बार चर्चा मिलती है
प्रशासन
- प्रशासन की सबसे बड़ी इकाई जन होती थी जिसके प्रधान को जनस्य गोपा या राजा कहा जाता था।
- जन का विभाजन विश में तथा प्रमुख – विशपति।
- विश का विभाजन ग्राम में तथा प्रमुख – ग्रामणी।
- ग्राम का विभाजन कुल / कुटुंब परिवार / गृह में होता था जिसका प्रमुख कुलप या गृहपति कहलाता था।
- ऋग्वेद में नगर शब्द का उल्लेख नहीं है।
- नगर शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम उत्तर वैदिक कालीन ग्रन्थ तैतरीय आरण्यक में मिलता है।
- ऋग्वेद में जन (275), विष (107) व ग्राम (13) बार उल्लेख किया गया है।
- ऋग्वेदिक काल में प्रशासन का प्रमुख राजा होता था जिसकी सहायता के लिए पुरोहित (राजा का मुख्य परामर्श दाता), सेनापति ( सेनाप्रमुख), व्राजपति (चारागाह प्रमुख), स्पश (गुप्तचर), पुरप (दुर्ग का अधिकारी), सूत (रथकार) जैसे लोग होते थे।
नोट –
- इस काल में सबसे बड़ा अपराध पशु चोरी था। इसके लिए कठोर दंड का प्रावधान था। इस काल में स्थायी सेना का अभाव था। अपराधियों के लिए इसमें विशिष्ट शब्द मिलते हैं—
- मुष्णन्तः (अन्न चुराने वाले), निचेरव (चोरी हेतु घूमने वाले), परिचर (बाजार/बगीचों में चोरी करने वाले) और कुलुञ्च (घर/खेत लूटने वाले)।
- पुलिस के लिए ‘उग्र’ शब्द का प्रयोग मिलता है।
- ऋग्वेद में ‘जीवगृभ’ शब्द शत्रु को जीवित पकड़ने या युद्धबंदी के लिए प्रयुक्त हुआ है।
- ऋग्वेद के 7 वें मंडल का दशराज्ञ युद्ध
- त्रित्सु जन के राजा सुदास ने महर्षि वशिष्ठ के मार्गदर्शन में यह युद्ध विश्वामित्र के संघ के विरुद्ध जीता। डी.डी. कौशांबी के अनुसार, यह संघर्ष परुष्णी नदी के दोआब पर नियंत्रण के लिए हुआ था।
- सुदास ने भरत समुदाय का नेतृत्त्व किया, जबकि पुरु जन के राजा दस राजाओं के संघ का नेतृत्त्व कर रहे थे।
मुख्य शब्दावली
| शब्द | अर्थ |
| गविष्टि / गवेषणा / गोषु | युद्ध |
| गवयुति / गोचर्मन | दूरी का माप |
| गोमत | समृद्ध व्यक्ति |
| दुहितृ | बेटी |
| गोधूलि / संगव | संध्या / प्रातःकाल |
| उर्वरजीत | इन्द्र की उपाधि |
| निष्क | स्वर्ण वस्तु / हार |
| बलि | कर या उपहार |
- खान पान
- आर्य मांसाहारी व शाकाहारी दोनों थे। भोजन में दूध, दही, घी आदि का महत्त्व था।
- यव (जौ) के सत्तू को क्रमशः दूध तथा दही में डालकर क्षीरपकोदन नामक भोजन बनाते थे।
- माँसाहारी भोजन में मुख्यतः भेड़, बकरी मांस का प्रयोग करते थे।
नोट – ऋग्वेद में चावल, नमक व मछली का उल्लेख नहीं है।
- वस्त्र
- तीन प्रकार के
- नीवी – शरीर के निचले हिस्से में पहना जाता था।
- वासस् – शरीर के मध्य भाग
- अधिवासस् – शरीर को ऊपर से ढकने वाला।
- तीन प्रकार के
- इस काल में दास प्रथा विद्यमान थी। दासो को केवल घरेलू कार्यों में लगाया जाता था। कृषि कार्यों में नहीं।
ऋग्वैदिक कालीन नदियाँ
| क्र. म. | प्राचीन नाम | वर्तमान नाम | स्थान / टिप्पणी |
| 1 | शतुद्रि (शुतुद्रि) | सतलज (Sutlej) | पंजाब से होकर बहने वाली नदी |
| 2 | विपासा | व्यास (Beas) | हिमाचल प्रदेश में उद्गम |
| 3 | अस्किनी | चिनाब (Chenab) | जम्मू-कश्मीर से बहती |
| 4 | परुष्णी (इरावती) | रावी (Ravi) | पंजाब क्षेत्र |
| 5 | वितस्ता | झेलम (Jhelum) | कश्मीर घाटी |
| 6 | सिन्धु | सिंध (Indus) | सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वैदिक नदी |
| 7 | सुषोमा | सोहन (Sohan) | झेलम की सहायक |
| 8 | गोमती (गोमल) | गोमल नदी | अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा क्षेत्र |
| 9 | क्रुमु | कुर्रम नदी | अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र |
| 10 | सरस्वती | घग्घर–हाकरा नदी | सबसे पवित्र वैदिक नदी |
| 11 | दृषद्वती | चौतंग (हरियाणा) | सरस्वती की सहायक |
| 12 | सदानीरा | गंडक (Gandak) | बिहार की नदी |
| 13 | आपया | – | दृषद्वती की सहायक |
| 14 | आर्य / नदी सूक्त की पहली नदी | गंगा | पहली नदी के रूप में वर्णित |
प्रमुख देवताओं का विशिष्ट विवरण
| देवता | विशेषता / सम्बद्ध कार्य | महत्वपूर्ण तथ्य |
| इन्द्र | युद्ध, वर्षा व बादल का देवता | 250 सूक्त; शस्त्र – वज्र (दधीचि की अस्थियों से निर्मित); पुरन्दर, देवराज |
| अग्नि | यज्ञ देवता; मध्यस्थ | 200 बार उल्लेख; सहस्त्र खम्भों का महल |
| सोम | देवताओं का पेय; आनंद व प्रभुत्वता | ऋग्वेद का पूरा 9वाँ मंडल सोम को समर्पित |
| वरुण | जलनिधि; ऋतस्य गोपा | नैतिक शक्ति का देवता; विश्व के संयोजक |
| मरुत्स | तूफान देवता | इन्द्र के साथी |
| विष्णु | विश्व का संरक्षक; तीन पाद | आगे चलकर वैष्णव धर्म का प्रमुख |
| मित्र | शपथ व प्रतिज्ञा का देवता | सामाजिक अनुबंध |
| पूषन | चरवाहों व पशुओं का देवता | रथ को बकरे खींचते थे |
| अश्विन | युग्म देवता; वैद्य व चिकित्सक | ‘नासतृ’ भी कहा गया |
| यम | मृत्यु के देवता | मनुष्य का प्रथम मृत |
| सूर्य/सविता | सर्वदर्शी व जीवनदाता | गायत्री मंत्र में सविता रूप |
| सरस्वती | ज्ञान व नदी देवी | नदीनां माता |
ऋग्वैदिक देवियाँ
| देवी | सन्दर्भ / विशेषता |
| पृथ्वी | जगत की माता; द्यौस-पृथ्वी युगल |
| अरण्यानी | जंगल (वन) की देवी |
| ऊषा | प्रातःकाल की देवी; सौंदर्य व नवजीवन का प्रतीक |
| सिन्धु | नदी देवी |
| अदिति | देवों की महामाता; 12 आदित्यों की जननी |
| सरस्वती | ज्ञान व वाणी की देवी; “नदीनां माता” |
| इला | आराधना व भूमि से जुड़ी देवी |
| पुरामधि | उर्वरता की देवी |
| दिशान | वनस्पति की देवी |
| सूर्यी | सूर्य की पुत्री |
देवता (Deities)
| शब्द | उल्लेख (ऋग्वेद) |
| इन्द्र | 250 बार |
| अग्नि | 200 बार |
| सोम देवता | 144 बार |
| विष्णु | 100 बार |
| वरुण | 30 बार |
| बृहस्पति | 11 बार |
| रुद्र | 3 बार |
वर्ण (Social Classes)
| शब्द | उल्लेख (ऋग्वेद) |
| ब्राह्मण | 15 बार |
| क्षत्रिय | 9 बार |
| वैश्य | 1 बार |
| शूद्र | 1 बार |
परिवार / समाज
| शब्द | उल्लेख (ऋग्वेद) |
| राजा | 1 बार |
| जन | 275 बार |
| विश्व | 170 बार |
| राष्ट्र | 10 बार |
| ग्राम | 13 बार |
| पिता | 335 बार |
| माता | 234 बार |
| वर्ण | 23 बार |
| सभा | 8 बार |
| समिति | 9 बार |
| विदर्भ | 122 बार |
| गण | 46 बार |
| सेना | 20 से अधिक बार |
स्थान/अन्य शब्द
| शब्द | उल्लेख (ऋग्वेद) |
| कृषि | 33 बार |
| बृज (गोशाला) | 45 बार |
| गाय | 176 बार |
| पृथ्वी | 1 बार |
सरिता/नदी (Rivers)
| शब्द | उल्लेख (ऋग्वेद) |
| गंगा | 1 बार |
| यमुना | 3 बार |
उत्तर वैदिक काल
स्त्रोत
- उत्तरवैदिक कालीन सभ्यता की जानकारी के स्रोत तीन वैदिक संहिताएँ—यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद
- ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक ग्रन्थ एवं उपनिषद ग्रन्थ हैं।
- यहाँ यह ध्यातव्य है कि वेदांग वैदिक साहित्य के अन्तर्गत परिगणित नहीं होते हैं।
उत्तरवैदिक आर्यों का भौगोलिक विस्तार
- उत्तरवैदिक काल में आर्यों की भौगोलिक सीमा का विस्तार गंगा के पूर्व में हुआ।
- शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, विदेथ माधव ने गंडक (सदानीरा) नदी तक आर्य सभ्यता का विस्तार किया।
- सप्तसैंधव प्रदेश से आगे बढ़ते हुए आर्यों ने सम्पूर्ण गंगा घाटी पर प्रभुत्व जमा लिया। इस प्रक्रिया में कुरु एवं पांचाल ने अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त की।
- प्रमुख राज्य: कुरु, पांचाल, कोशल, काशी, और विदेह।
- कुरु: राजधानी – आसन्दीवत; क्षेत्र – कुरुक्षेत्र, दिल्ली, मेरठ। कुरु जाति कई छोटी-छोटी जातियों के मिलने से बनी थी, जिनमें पुरुओं और भरतों के भी दल थे।
- पांचाल: राजधानी – कांपिल्य; क्षेत्र – बरेली, बदायूं, फर्रुखाबाद। यह जाति कृषि जाति से निकली थी जिसका सुंजयों और तुर्वशों का सम्बन्ध था।
- महत्वपूर्ण शासक:
- कुरु: परीक्षित (अथर्ववेद में वर्णित), जनमेजय।
- पांचाल: प्रवाहण जैवालि, ऋषि आरुणि, श्वेतकेतु।
- आर्य सभ्यता का विस्तार उत्तरवैदिक काल में विन्ध्य में दक्षिण में नहीं हो पाया था।
राज पद की उत्पत्ति के सिद्धान्त
उत्तरवैदिक साहित्य में राज्य एवं राजा के प्रादुर्भाव के विषय में अनेक सिद्धान्त मिलते हैं–राजा के पद के जन्म के बारे में ऐतरेय ब्राह्मण से सर्वप्रथम जानकारी मिलती है।
- सैनिक आवश्यकता का सिद्धान्त – ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार, देवासुर संग्राम में पराजय का कारण नेतृत्व का अभाव था। देवताओं ने सोम को राजा बनाया, जिससे विजय प्राप्त हुई। तैत्तिरीय ब्राह्मण में भी इंद्र को सर्वाधिक सबल होने के कारण राजा बनाने का उल्लेख।
- समझौते का सिद्धान्त – शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, अनावृष्टि काल में कमजोरों पर अत्याचार रोकने के लिए समाज ने सबसे योग्य व्यक्ति को राजा चुना। जनता ने अपने अधिकार राजा को सौंप दिए।
- दैवी सिद्धान्त – राजा को दैवी शक्ति का प्रतीक माना गया। राजसूय, अश्वमेध, और वाजपेय जैसे यज्ञों से राजा की दिव्यता और सामर्थ्य स्थापित होती।
- राजसूय यज्ञ – राज्याभिषेक के समय। सम्राट का पद प्राप्त करने के लिए किया जाता था। इसमें रत्नि नामक अधिकारियों के घरों में देवताओं को बलि दी जाती थी।
- अश्वमेध यज्ञ – तीन दिनों तक चलने वाला यज्ञ। विजय और सम्प्रभुता का प्रतीक। इसमें घोड़ा प्रयुक्त होता था।
- वाजपेय यज्ञ – सत्रह दिनों तक चलता, राजा की रथ-दौड़ होती।
राजा देवता का प्रतीक समझा जाता था। अथर्ववेद में राजा परीक्षित को ‘मृत्युलोक का देवता‘ कहा गया है।
- राजा के कार्य – न्याय और सैनिक संचालन। प्रजा और कानून का रक्षक। शत्रुओं का संहार।
राजा स्वयं दण्ड से मुक्त था परन्तु वह राजदण्ड का उपयोग करता था। सिद्धान्ततः राजा निरंकुश होता था परन्तु राज्य की स्वेच्छाचारिता कई प्रकार से मर्यादित रहती थी।
नियंत्रण और मर्यादा:
- जनता की सहमति की उपेक्षा नहीं।
- मंत्रिपरिषद, सभा, और समिति राजा की स्वेच्छाचारिता पर रोक लगातीं।
- धर्म राजा की निरंकुशता पर अंकुश लगाता।
प्रशासनिक संस्थाए
- जन परिषदों का पतन:
- विदथ: पूर्णतया लुप्त।
- सभा और समिति: अस्तित्व था, लेकिन अधिकार सीमित। संपन्न और धनी लोगों का प्रभाव।
- स्त्रियाँ सभा-समिति में भाग नहीं ले पाती थीं।
पदाधिकारी
- पुरोहित, सेनानी एवं ग्रामिणी के अलावा उत्तरवैदिक कालीन ग्रन्थों में हमें संग्रहीता (कोषाध्यक्ष), भागद्ध (कर संग्रह करने वाला), सूत (राजकीय चारण, कवि या रथ वाहक), क्षतु, अक्षवाप (जुए का निरीक्षक), गोविकर्तन (आखेट में राजा का साथी), पालागल जैसे कर्मचारियों का उल्लेख प्राप्त होता है।
- सचिव: मंत्रियों के लिए प्रयुक्त।।
- बलि और शुल्क के रूप में कर अनिवार्य।
- राजा न्याय का सर्वोच्च अधिकारी होता था। अपराध सम्बन्धी मुकदमों में व्यक्तिगत प्रतिशोध का स्थान था। दैवी न्याय का प्रयोग।
- निम्न स्तर पर प्रशासन व न्यायकार्य ग्राम पंचायतों के जिम्मे था, जो स्थानीय झगड़ों का फैसला करती थी।
आश्रम व्यवस्था
- आश्रम व्यवस्था भारतीय समाज की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अवधारणा थी, जो व्यक्ति के जीवन को चार चरणों में बाँटकर व्यक्तिगत और सामाजिक कर्तव्यों को पूरा करने की रूपरेखा प्रस्तुत करती है। “आश्रम” शब्द “श्रम” से निकला है, जिसका अर्थ है प्रयास या परिश्रम।
- उत्तरवैदिक काल में केवल तीन आश्रमों का ही उल्लेख वहीँ जाबालोपनिउपनिषद में चार आश्रमों का उल्लेख मिलता है जबकि छान्दोग्योपनिषद् में केवल तीन आश्रमों का।
- वैदिक व्यवस्था में मनुष्य की आयु 100 वर्ष मानी गई और इसे चार बराबर भागों में बाँटा गया:
ब्रह्मचर्य आश्रम (जन्म से -25 वर्ष):
- यह आश्रम विद्या और शक्ति की साधना का चरण है।
- विद्यार्थी ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए शिक्षा प्राप्त करते थे।
- यज्ञोपवीत (उपनयन संस्कार) के बाद प्रवेश होता था।
- ब्राह्मण, क्षत्रिय, और वैश्य क्रमशः 8 से 10 वर्ष, 10 से 14 वर्ष और 12 से 16 वर्ष की आयु में प्रवेश करते थे।
- इस काल में तप, संयम, और विद्याओं में निपुणता को महत्व दिया जाता था।
- जीवन पर्यंत शिक्षा प्राप्त करने वाले बालक को नैष्ठिक तथा बालिका ब्रह्मवादनीय कहा गया।
- जीविकोपार्जन हेतु वेद – वेदान्त पढ़ने वाला अध्यापक उपाध्याय कहलाता था।
गृहस्थ आश्रम (26-50 वर्ष):
- सामाजिक और पारिवारिक जीवन का चरण।
- गृहस्थ आश्रम को श्रेष्ठ माना गया क्योंकि यह समाज के पालन और स्थायित्व का आधार था।
- कर्तव्य:
- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की पूर्ति।
- माता-पिता की सेवा, पत्नी व संतानों का पालन-पोषण।
- विभिन्न ऋणों (देव, ऋषि, पितृ) से उऋण होने के लिए यज्ञ और अन्य धार्मिक कृत्य।
वानप्रस्थ आश्रम (51-75 वर्ष):
- गृहस्थ आश्रम के उत्तरार्ध में व्यक्ति संसारिक वस्तुओं का त्याग कर वन में रहने जाता था।
- नियम:
- केवल फल और मूल का सेवन।
- भिक्षा पर निर्भरता।
- गृह सम्पत्ति का त्याग।
- पत्नी चाहे तो साथ जा सकती थी।
- वर्षा के अतिरिक्त वानप्रस्थी को किसी ग्राम मे एक से अधिक रात्रि के लिए विश्राम नही करना चाहिए।
- उद्देश्य: इंद्रिय संयम और आध्यात्मिक चिंतन।
सन्यास आश्रम (76-100 वर्ष):
- अंतिम चरण, जिसमें व्यक्ति सभी सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर आत्मा और मोक्ष की खोज करता था।
- “सम्यक रूप से त्याग” इसका मूल भाव है।
- सामाजिक जीवन से दूर रहकर केवल ज्ञान, तप, और सेवा में रत रहना।
- यह विचार बाद में अधिक प्रचलित हुआ, और माना जाता है कि इसका पूर्ण विकास बुद्धकाल के बाद हुआ।
पुरुषार्थ का अर्थ
- “पुरुषार्थ” का शाब्दिक अर्थ है, “पुरुष के लिए जो अर्थपूर्ण और अभीष्ट है।” यह आदर्शों और मूल्यों का वह समूह है, जिनका अनुसरण मनुष्य को अपने जीवन में करना चाहिए।
- भारतीय दर्शन में पुरुषार्थ को चार मुख्य भागों में विभाजित किया गया है:
धर्म (सदाचार-आचरण):
- इसका संबंध सदाचार, कर्तव्य पालन, नैतिकता से है।
- यह समाज और व्यक्ति की स्थिरता के लिए आवश्यक है।
- अधर्म: वह जिससे व्यवस्था और सद्गुण समाप्त हो जाए।
- धर्म का पालन जीवन के हर पक्ष को संतुलित करता है।
अर्थ (भौतिक समृद्धि):
- अर्थ का संबंध धन, साधनों, और संसाधनों की प्राप्ति से है।
- मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करता है। धर्मानुसार अर्थ अर्जित करना आदर्श माना गया है।
काम (इच्छा और भोग):
- काम का अर्थ केवल भोग-विलास नहीं, बल्कि इच्छाओं और कामनाओं से है। काम की परिभाषा है – कम्यते जनैरिति कामः सुखः।
- यह वह प्रेरक शक्ति है, जो मनुष्य को कार्य करने के लिए प्रेरित करती है।
- काम का संयमित और धर्मानुसार भोग आदर्श है।
मोक्ष (मुक्ति):
- मोक्ष का अर्थ आत्मा की मुक्ति और जीवन-मरण के चक्र से छुटकारा पाना है।
- यह मुक्ति संयमित जीवन एवं विधि-नियमों के अधीन होनी चाहिए।
- यह आध्यात्मिक विकास का अंतिम लक्ष्य है।
निष्कर्ष – प्रथम तीन पुरूषार्थ का सम्बन्ध मनुष्य के सांसारिक जीवन से है, जबकि चौथे पुरूषार्थ का सम्बन्ध अध्यात्म से है। भारतीय संस्कृति में पुरूषार्थ का दर्शन सम्पूर्ण जीवन दृष्टि से है जिसमें लौकिक जीवन के विभिन्न पक्षों के साथ साथ व्यक्ति के पारलौकिक अथवा आध्यात्मिक सम्बन्ध भी शामिल है।
धार्मिक स्थिति
- ऋग्वैदिक कालीन धार्मिक प्रवृतिया इस युग में भी जारी रही किन्तु कुछ परिवर्तनों के साथ नई प्रवृतियों ने भी स्थान ग्रहण कर लिया।
- प्रकृति की उपासना और बहुदेववाद जारी रहा। यज्ञ और हवन दैनिक जीवन का हिस्सा थे। नकारात्मक प्रवृत्तियाँ: यज्ञ खर्चीले हो गए। तंत्र-मंत्र, जादू-टोना, वशीकरण की अवधारणा। पशु बलि और नर बलि का प्रचलन।
- उत्तरवैदिक आर्यों के धार्मिक जीवन में मुख्यत: तीन परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं – देवताओं की महत्ता में परिवर्तन, अराधना की रीति में परिवर्तन तथा धार्मिक उद्देश्यों में परिवर्तन।
- इंद्र के स्थान पर प्रजापति सर्वोच्च देवता बने। रुद्र और विष्णु दो अन्य प्रमुख देवता। वरुण जल देवता बन गए। पूषन शूद्रों के देवता माने जाने लगे।
- यज्ञों में विविधता। पुरोहित वर्ग का गठन: ऋग्वेद: होता, सामवेद: उद्गाता, यजुर्वेद: अध्वर्यु, अथर्ववेद: ब्रह्म
- मृत्यु की चर्चा सर्वप्रथम शतपथ ब्राह्मण तथा मोक्ष की चर्चा सर्वप्रथम उपनिषद् में मिलती है। पुनर्जन्म की अवधारणा वृहदराण्यक उपनिषद् में तथा निष्काम कर्म के सिद्धान्त का प्रतिपादन सर्वप्रथम ईशोपनिषद् में किया गया है।
- प्रमुख यज्ञ
- अग्निहोतृ यज्ञ – पापों के नाश और स्वर्ग की ओर ले जाने वाले नाव के रूप में वर्णित
- सोत्रामणि यज्ञ में पशु एवं सुरा की आहुति
- पुरुषमेघ यज्ञ – पुरुषों की बलि, सर्वाधिक 25 यूपों (यज्ञ स्तम्भ) का निर्माण
- अश्वमेध यज्ञ -राजा द्वारा साम्राज्य विस्तार के लिए, सांडों तथा घोड़ों की बलि।।
- राजसूय यज्ञ – राजा के राज्याभिषेक से सम्बन्धित
- वाजपेय यज्ञ राजा द्वारा अपनी शक्ति के प्रदर्शन हेतु, रथदौड़ का आयोजन।
ऋण व यज्ञ की अवधारणा
ऋण
- भारतीय ऋषियों ने तीन (त्रिऋण) की व्यवस्था की है।
- ये ऋण है- देव ऋण, ऋषि ऋण व पितृ ऋण इन ऋणों से मुक्त होने पर ही मुक्ति सम्भव है। ये ऋण मनुष्य के सामाजिक दायित्वों से सम्बन्धित है।
- पितृ ऋण – सन्तानोत्पत्ति द्वारा मानव जाति की निरंतरता सुनिश्चित करना।
- ऋषि ऋण – ऋषियों से प्राप्त ज्ञान का संवर्धन और परंपरा का निर्वहन।
- देव ऋण – देवताओं के प्रति हमारा दायित्व जिसे यज्ञादि से पूरा किया जाता है। यह ऋण मनुष्य को सृष्टि से जोड़ता है। अतः मनुष्य को समस्त प्राणियों कीट पतंगे, पशु पक्षियों को भोजन व सूर्य चन्द्र की स्तुति कर सृष्टि की निरन्तरता में हमें योगदान करना चाहिए।
- पांच महायज्ञ – भारतीय सस्कृति में प्रत्येक गृहस्थ के लिए पाँच महायज्ञ का भी आवश्यक प्रावधान किया गया है।
- ब्रह्म या ऋषि यज्ञ – स्वाध्याय व ऋषि के विचारों का अनुशीलन करना।
- देवयज्ञ- देवताओं की स्तुति, पूजा, और प्रार्थना।
- पितृ यज्ञ- माता-पिता, गुरु, वृद्धजनों की सेवा और सम्मान।
- भूत यज्ञ- विभिन्न प्राणियों (गाय, चींटी, कौआ, कुत्ते आदि) को भोजन देना और अतिथियों की सेवा।
- नृप यज्ञ – सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिए कार्य करना।
वैदिक काल में होने वाले सोलह संस्कार
| संस्कार | व्याख्या |
| गर्भाधान संस्कार | गर्भाधान के पूर्व उचित काल और आवश्यक धार्मिक क्रियाएँ । |
| पुंसवन संस्कार | गर्भ में स्थित शिशु को पुत्र का रूप देने के लिए देवताओं की स्तुति कर पुत्र प्राप्ति की याचना |
| सीमानतोनयन संस्कार | गर्भवती स्त्री को अमंगलकारी शक्तियों से बचाने के लिए किया गया संस्कार। |
| जातकर्म संस्कार | पिता द्वारा पुत्र का मुंह का देखकर स्नान कर जात कर्म किया जाता है । दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाया जाता है शिशु को |
| नामकरण संस्कार | शिशु का नाम रखने के लिए जन्म के 10वें या 12वें दिन किया जाने वाला संस्कार। |
| निष्क्रमण संस्कार | निष्क्रमण संस्कार बालक के जन्म के 12वें दिन से 4 महीने तक कभी भी बालक को सूर्य अथवा चन्द्र दर्शन करवाने के लिए किया जाता हैं । |
| अन्नप्राशन | जन्म के छठें मास में बालक को पहली बार अन्न का आहार देने की क्रिया । |
| चूड़ाकर्म संस्कार | शिशु के पहले या तीसरे वर्ष में सिर के बाल पहली बार मुण्डवाने पर किया जाने वाला |
| कर्णवेध | शिशु के तीसरे एवं पाँचवें वर्ष में किया जाने वाला संस्कार, जिसमें शिशु के कान बींधे जाते हैं । |
| विद्यारम्भ संस्कार | 5 वर्ष की आयु में जब बच्चे की विद्या प्रारंभ करनी होती है तब देवताओं की स्तुति कर गुरु के समीप बैठकर अक्षर ज्ञान रवाने हेतु किया जाने वाला संस्कार । |
| उपनयन | इस संस्कार द्वारा बालक को शिक्षा के लिए गुरु के पास ले जाया जाता था ।ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को ही उपनयन का अधिकार था ।इस दिन बालक जनेऊ धारण करता हैं [यज्ञोपवीत]। जनेऊ धारण करने का उत्तम दिन रक्षाबन्धन को माना जाता हैं ।जनेऊ सूत के तीन धागों की होती है जिसमे तीन गांठे लगी होती है । |
| वेदारम्भ | वेदों के पठन-पाठन का अधिकार लेने हेतु किया गया संस्कार । |
| केशांत संस्कार | सामान्यतः 16 वर्ष की आयु में किया जाने वाला संस्कार, जिसमें ब्रह्मचारी की दाढ़ी एवं मूँछ को पहली बार काटा जाता हैं । |
| समावर्तन संस्कार | शिक्षा समाप्ति पर किया जाने वाला संस्कार, जिसमें विद्यार्थी अपने आचार्य को गुरुदक्षिणा देकर उसका आशीर्वाद ग्रहण करता था तथा स्नान करके घर लौटता था ।स्नान के कारण ही ब्रह्मचारी को ‘स्नातक‘कहा जाता था।समावर्तन संस्कार के पश्चात् विवाह होने तक ब्रह्मचारी को ‘स्नातक’ के नाम से जाना जाता था। |
| विवाह संस्कार | वर वधु के परिणय सूत्र में बंधने के समय किया जाने वाला संस्कार। |
| अंत्येष्टि संस्कार | निधन के बाद होने वाला संस्कार। |
राजनीतिक स्थिति (प्रारंभिक एवं उत्तर वैदिक काल)
| विषय | ऋग्वैदिक काल (1500–1000 BCE) | उत्तर वैदिक काल (1000–600 BCE) | अन्य महत्वपूर्ण बिंदु |
| शासन | सीमित वंशानुगत विशेषताओं तथा सभाओं और कुलीनों के प्रबल प्रभाव वाली जनजातीय राजशाही। | केंद्रीकृत राजसत्ता | उत्तर वैदिक में “महाजनपद” की नींव (600 BCE तक) |
| युद्ध का आधार | पशुधन के लिए (गविष्टि) | भूमि के लिए | भूमि युद्ध ने साम्राज्यों को जन्म दिया |
| प्रशासनिक इकाई | जन → विश → ग्राम → कुल | जनपद → विश → ग्राम → कुल | ‘जन’ = जनजाति, ‘जनपद’ = स्थायी क्षेत्र |
| सभा-संस्था | सभा, समिति, विदथ, गण – महत्वपूर्ण | प्रभाव में कमी | ऋग्वेद: सभा व समिति = “राजा की दो आँखें” |
| राजकीय अधिकार | सीमित, कुलीनों पर निर्भर | विस्तृत, राजा सर्वोपरि | उत्तर वैदिक काल → “सम्राट” शब्द का प्रयोग |
| प्रमुख युद्ध | दसराज युद्ध (सुदास) | भरत + पूरु = कुरु; महाभारत युद्ध | कुरु-पांचाल महाशक्ति बने |
| साहित्य | ऋग्वेद | यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, ब्राह्मण ग्रंथ | उपनिषद रचना भी इसी काल में |
सामाजिक स्थिति
| विषय | ऋग्वैदिक काल | उत्तर वैदिक काल | अन्य महत्वपूर्ण बिंदु |
| व्यवस्था का आधार | वर्ण आधारित (कर्म) | वर्ण + जाति आधारित (जन्म) | प्रारंभिक वैदिक में सामाजिक गतिशीलता थी |
| वर्ण व्यवस्था | चतुर्वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) | जन्म आधारित | उत्तर वैदिक में वर्ण कठोर हुआ |
| स्त्रियों की स्थिति | शिक्षा, यज्ञ में भागीदारी, स्वतंत्रता | पतन, दहेज, कन्यादान | मैत्रेयी, गार्गी जैसी विदुषी स्त्रियाँ प्रारंभिक वैदिक में |
| आश्रम व्यवस्था | नहीं | चार आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास) | जीवन दर्शन को व्यवस्थित किया |
| विवाह | स्वतंत्रता, प्रेम विवाह संभव | 8 प्रकार के विवाह | मनुस्मृति → विवाह को धर्म मानती है |
| नियोग प्रथा | सांकेतिक | व्यावहारिक | महाभारत कालीन उदाहरण |
विवाह व्यवस्था
| विषय | ऋग्वैदिक काल | उत्तर वैदिक काल | अन्य महत्वपूर्ण बिंदु |
| विवाह प्रणाली | स्वतंत्रता, प्रेम विवाह (यम-यमी, सूर्य-अश्विन आदि) | 8 प्रकार के विवाह | विवाह को “संस्कार” माना गया |
| विवाह के प्रकार | स्पष्ट उल्लेख नहीं | 8 प्रकार – ब्रह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, गंधर्व, असुर, राक्षस, पैशाच | मनुस्मृति वर्गीकरण – पहले 4 श्रेष्ठ, बाकी निंदनीय |
| स्त्रियों की स्थिति | सम्मानित, शिक्षा का अधिकार | अधीन, दहेज प्रथा | उत्तर वैदिक में स्त्री = केवल गृहस्थी तक सीमित |
| विवाह उद्देश्य | धर्म + प्रजनन | धर्म + सामाजिक प्रतिष्ठा | गंधर्व विवाह → प्रेम विवाह का प्रमाण |
आर्थिक स्थिति
| विषय | ऋग्वैदिक काल | उत्तर वैदिक काल | अन्य महत्वपूर्ण बिंदु |
| आधार | जीवन-निर्वाह | अधिशेष उत्पादन | लौह-औज़ार से उपज बढ़ी |
| प्रमुख पेशा | पशुपालन | कृषि (बैलों से खींचे हल) | हल/अन्न पर यज्ञ-सूक्त भी |
| गौण पेशा | कृषि (ऋग्वेद में संकेत) | व्यापार/वाणिज्य | कारीगर/शिल्प: तक्षक, कुम्हार, स्वर्णकार |
कर, मुद्रा, व्यापार
| विषय | ऋग्वैदिक काल | उत्तर वैदिक काल | अन्य महत्वपूर्ण बिंदु |
| कर-आरोपण | स्वैच्छिक भेंट | अनिवार्य | “भोग, भाग, बलि” आदि; शुल्क = सीमा-कर |
| कर-अधिकारी | नियमित नहीं | नियमित | कर-संग्रह के पद उभरते हैं |
| व्यापार | स्थानीय/लघु | छोटा-लेकिन बढ़ता | सार्थवाह, वाणिज/सेठ शब्द आगे चलकर |
| मुद्रा | नियमित सिक्के नहीं; वस्तु-विनिमय | निष्क, सतमान (धातु के टुकड़े/वजन) | ठप्पे-वाले सिक्के महाजनपद/शक्य पूर्व |
धार्मिक स्थिति, देवता, पुरोहित
| विषय | ऋग्वैदिक काल | उत्तर वैदिक काल | अन्य महत्वपूर्ण बिंदु |
| प्रमुख पद्धति | स्तोत्र-उच्चारण | यज्ञ/आहुति (अग्नि) | यज्ञ सामाजिक-आर्थिक केंद्र |
| गौण पद्धति | यज्ञ | घृताहुति/पशुबलि (सीमित) | |
| उद्देश्य | पुत्र, धन, पशु और दीर्घायु की कामना | मोक्ष का विचार भी | उपनिषद = दार्शनिक मोड़ |
| देवताओं की संख्या | “33 देवता” परंपरा | देवताओं का मानवीकरण | 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य + इन्द्र/प्रजापति |
| प्रमुख देव | इन्द्र (≈250 सूक्त), अग्नि (≈200), सोम (≈114) | प्रजापति/ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र/पशुपति | इन्द्र = वज्रधारी; अग्नि = यज्ञवाहक |
| पुरोहित | होत (ऋग्वेद), उद्गाता (सामवेद), अध्वर्यु (यजुर्वेद), ब्राह्मण (अथर्व/निरीक्षक) | ब्राह्मण वर्ग सर्वोपरि | अक्सर पूछा जाता है: “किस वेद से कौन पुरोहित?” |
भौगोलिक विस्तार
| विषय | ऋग्वैदिक काल | उत्तर वैदिक काल | अन्य महत्वपूर्ण बिंदु |
| सामान्य क्षेत्र | सप्त-सिंधु | गंगा-यमुना दोआब तक पूर्वगमन | कुरु-पांचाल, कोशल-विदेह उभरते हैं |
| उत्तर सीमा | काबुल/अफगान क्षेत्र का संकेत | हिमालय/उत्तरी बिहार | |
| पूर्व सीमा | सरस्वती/सिन्धु तंत्र | गंगा | |
| दक्षिण सीमा | विंध्य के उत्तर | विंध्य | |
| नदियाँ (महत्व) | सरस्वती, सिंधु | गंगा, यमुना | ऋग्वेद में सरस्वती/सिन्धु का बार-बार; उत्तर वैदिक में गंगा प्रमुख |
| हिमालय | बहुत कम उल्लेख | बार-बार उल्लेख | पूर्व की ओर विस्तार का सूचक |
| समुद्र | कम उल्लेख | अधिक उल्लेख | समुद्री चेतना का विकास |
हड़प्पा संस्कृति vs वैदिक संस्कृति
| विषय | हड़प्पा सभ्यता | वैदिक सभ्यता | अतिरिक्त बिंदु |
| नगर नियोजन | नियोजित नगर, जाल प्रणाली वाली सड़कें, पक्के मकान, सार्वजनिक भवन (ग्रेट बाथ, अन्नागार), उन्नत जल-निकासी प्रणाली | अनियोजित, ग्राम-आधारित बस्तियाँ, प्रारंभिक वैदिक में अर्ध-खानाबदोश जीवन, उत्तर वैदिक में “पुर” (किले) | हड़प्पा: मोहनजोदड़ो का ग्रेट बाथ, धोलावीरा का तीन भागों में विभाजन (गढ़, मध्य नगर, निचला नगर) |
| ईंट | पक्की ईंटें (1:2:4 अनुपात), मानकीकृत, जल-निकासी और भवन निर्माण में उपयोग | सीमित प्रयोग, मुख्यतः लकड़ी या कच्ची ईंटें, उत्तर वैदिक में प्रयोग बढ़ा | हड़प्पा: मानकीकृत ईंटें तकनीकी उन्नति दर्शाती हैं |
| लिपि | चित्रात्मक लिपि (लगभग 400 चिन्ह, अपठित), मुहरों व मिट्टी के बर्तनों पर | कोई लिपि नहीं, मौखिक परंपरा (श्रुति), वेद मौखिक रूप से संरक्षित | हड़प्पा की लिपि व्यापार और प्रशासन में उपयोगी थी |
| धातु | कांसा, तांबा, सोना, चांदी (कांस्य युग), औज़ार, आभूषण | प्रारंभिक कांसा व सोना, उत्तर वैदिक लोहा (Iron Age, 1000 BCE से), हथियार व कृषि उपकरण | हड़प्पा में लोहे का अभाव, वैदिक में लोहा ने क्रांति लाई |
| कृषि | जौ, गेहूं, कपास, मटर, दालें, तिल, सरसों, सर्दी की फसलें (रबी), सिंचाई (धोलावीरा में जलाशय) | धान, गेहूं, जौ, यव, वर्षा आधारित, हल का प्रयोग | हड़प्पा: कपास का सबसे प्राचीन प्रमाण (मेहरगढ़) |
| पशुपालन | बैल, भैंस, हाथी, ऊँट, घोड़े का प्रमाण विवादास्पद (सुरकोटड़ा) | गाय, घोड़ा, बैल, भेड़, घोड़े का महत्व (अश्वमेध यज्ञ) | हड़प्पा पशु व्यापार में उपयोगी, वैदिक में गाय को धन का प्रतीक माना गया |
| अर्थव्यवस्था | अधिशेष उत्पादन, समुद्री व्यापार (लोथल), वजन माप प्रणाली, मेसोपोटामिया से व्यापार | निर्वाह कृषि, पशुपालन, वस्तु विनिमय, उत्तर वैदिक में स्थानीय व्यापार | हड़प्पा: Dilmun, Mesopotamian texts में उल्लेख |
| धर्म | प्रकृति पूजा, मातृदेवी, पशुपति महादेव, कोई मंदिर नहीं, ग्रेट बाथ धार्मिक संभावना | यज्ञ-केंद्रित, इंद्र, अग्नि, वरुण, कोई मूर्ति पूजा नहीं | हड़प्पा मुहरों पर पशुपति मूर्ति; वैदिक वेदों में यज्ञ व निष्ठा |
| समाज | वर्ग-आधारित (class-based, कोई वर्ण नहीं), मातृसत्तात्मक प्रभाव (मातृदेवी मूर्तियाँ), दफन में असमानता (आभूषण) | वर्ण-आधारित (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र), पितृसत्तात्मक समाज | वैदिक समाज में जन्म पर आधारित वर्ण व्यवस्था |
| संस्कृति का स्वभाव | रक्षात्मक, शांतिप्रिय, व्यापारिक, तकनीकी | आक्रामक, युद्धप्रिय, यज्ञ व सैन्यवादी | हड़प्पा में कोई बड़े हथियार नहीं, वैदिक में इंद्र जैसे योद्धा देवता |
| मिट्टी के बर्तन | लाल रंग के चित्रित बर्तन (Red Ware), ज्यामितीय डिजाइन, पीपल पत्ती | चित्रित धूसर बर्तन (Painted Grey Ware), साधारण डिजाइन | हड़प्पा मानकीकृत उत्पादन करते थे, वैदिक PGW गंगा घाटी से जुड़ा |
| दफन प्रथाएँ | ईंट-लाइन वाले कब्र, सामूहिक दफन, आभूषण के साथ | प्रारंभिक दफन, उत्तर वैदिक में दाह-संस्कार | हड़प्पा में कोई भव्य कब्र नहीं, वैदिक में दाह का उल्लेख ऋग्वेद में |
| कला व शिल्प | मूहरें, मूर्तियाँ (नृत्यांगना, दाढ़ी वाला पुरुष), मोती, धातु कार्य, स्टीटाइट मुहरें, कारखाने | साहित्यिक (वेद, मौखिक कविता), कोई भौतिक कला | हड़प्पा कला में उन्नति, वैदिक साहित्यिक समृद्धि |
| वस्त्र | कपास सर्वप्रथम, रंगाई व बुनाई | ऊन, चमड़ा; कपास कम उल्लेखित | हड़प्पा कपास व्यापार में उपयोगिता, वैदिक में वस्त्र क्षेत्रीय |
| पतन के कारण (Causes of Decline) | जलवायु परिवर्तन, सरस्वती नदी का सूखना, बाढ़, 1900 BCE तक पतन | लागू नहीं (उदय काल), आर्यं प्रवास से प्रभाव | हड़प्पा पर्यावरणीय व आर्थिक कारणों से पतन, वैदिक 1500 BCE से उदय |
