रासायनिक और जैविक हथियार

रासायनिक और जैविक हथियार आधुनिक प्रौद्योगिकी का ऐसा विनाशकारी रूप हैं, जिनका उपयोग युद्ध या आतंकी हमलों में जीवों को हानि पहुँचाने के लिए किया जाता है। ये हथियार रासायनिक तत्वों या रोगजनक जीवाणुओं और विषाणुओं के माध्यम से कार्य करते हैं, जिससे व्यापक स्तर पर जान-माल का नुकसान हो सकता है।

रासायनिक और जैविक युद्ध (CBW) में शत्रुओं को नुकसान पहुंचाने या मारने के लिए रसायनों, बैक्टीरिया, वायरस, विषाक्त पदार्थों या ज़हरीले तत्वों का हथियार के रूप में उपयोग किया जाता है।

  • रासायनिक युद्ध में जहां दुश्मनों पर हमला करने या उन्हें अक्षम करने के लिए विषाक्त एजेंटों का इस्तेमाल किया जाता है, वहीं जैविक युद्ध में नुकसान पहुंचाने के लिए जीवित सूक्ष्मजीवों (बैक्टीरिया, वायरस) या उनके उप-उत्पादों (टॉक्सिन) का इस्तेमाल किया जाता है। 
  • इन घातक पदार्थों को पहुंचाने के साधन, जैसे मिसाइल, बम या स्प्रे, को रासायनिक और जैविक हथियार कहा जाता है। =
  • प्रभाव:
    • व्यक्तिगत और सामूहिक हानि।
    • मानव जीवन, कृषि और पर्यावरण को गंभीर नुकसान।
    • तेजी से फैलने वाली महामारियों और दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों की संभावना।

रासायनिक हथियार

रासायनिक हथियार सामूहिक विनाश के हथियार (WMD) का एक प्रकार है जो लोगों, जानवरों या पौधों को नुकसान पहुँचाने, मारने या अक्षम करने के लिए रासायनिक पदार्थों का उपयोग करते हैं। ये हथियार खतरनाक हैं क्योंकि ये अदृश्य होते हैं, तेज़ी से फैल सकते हैं और व्यापक पीड़ा का कारण बन सकते हैं।

  • रासायनिक हथियार आमतौर पर तोपखाने के गोले, मिसाइलों, बमों या एरोसोल स्प्रे के माध्यम से वितरित किए जाते हैं। 
  • क्लोरीन और फॉस्जीन गैसें हैं, लेकिन अन्य एजेंट अक्सर तरल बूंदों या ठोस कणों के रूप में मौजूद होते हैं।
रासायनिक और जैविक हथियार
रासायनिक हथियारों के विरुद्ध रक्षा
  • सुरक्षात्मक उपकरण : गैस मास्क, रासायनिक सूट और अभेद्य (Impermeable) कपड़े।
  • प्रतिरोधी दवाएँ (Antidotes) : उदाहरण – एट्रोपिन (Atropine) तंत्रिका एजेंटों (Nerve Agents) के प्रभाव को निष्क्रिय करने में सहायक होती है।
रासायनिक हथियारों का ऐतिहासिक उपयोग
  • प्रथम विश्व युद्ध (1915): पहला रासायनिक हथियार प्रयोग (जर्मनी द्वारा क्लोरीन गैस) → 1917: जर्मनी द्वारा मस्टर्ड गैस का प्रयोग।
  • द्वितीय विश्व युद्ध: जर्मनी ने नरसंहार के लिए ज़ाइक्लोन-बी गैस का प्रयोग किया (युद्ध के मैदानों पर नहीं)।
  • 1960 का दशक: दंगा नियंत्रण के लिए गैर-घातक एजेंटों का प्रयोग → वियतनाम युद्ध: शत्रु के आवरण को नष्ट करने के लिए शाकनाशी (एजेंट ऑरेंज) का प्रयोग किया गया
  • 1980 का दशक: इराक ने ईरान-इराक युद्ध में और कुर्दों के खिलाफ रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया।
  • आतंकवादी हमले: जापान में औम शिनरिक्यो जैसे समूहों द्वारा इस्तेमाल (1995 में टोक्यो सबवे पर सरीन गैस का इस्तेमाल करके हमला)।

हाल के उदाहरण:

  • 2017 में कुआलालंपुर हवाई अड्डे पर VX नर्व एजेंट का उपयोग करके उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग-उन के सौतेले भाई किम जोंग-नाम की हत्या।
  • सीरिया गृह युद्ध (2011-वर्तमान):
    • रासायनिक हथियार निषेध संगठन (OPCW) ने रासायनिक हथियारों के उपयोग के कई उदाहरणों की पुष्टि की, जिसमें 2013 का गौटा हमला (सरीन गैस) शामिल है।
    • सीरिया के डौमा (2018) में क्लोरीन गैस के इस्तेमाल के आरोप।
  • एलेक्सी नवाल्नी मामला (2020) : रूसी विपक्षी नेता एलेक्सी नवाल्नी को नोविचोक (Novichok) तंत्रिका एजेंट से विषाक्त किया गया, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी निंदा हुई। 
  • रूस पर हालिया आरोप (यूक्रेन संघर्ष) : यूक्रेनी बलों के खिलाफ क्लोरोपिक्रिन (Chloropicrin) के उपयोग का आरोप लगाया गया है।
अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया
  • 1899 हेग कन्वेंशन: रासायनिक हथियारों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का पहला प्रयास।
  • 1925 जिनेवा प्रोटोकॉल : रासायनिक एजेंटों के प्रथम उपयोग (First Use) पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन उत्पादन, भंडारण और प्रतिशोध में उपयोग की अनुमति थी।
  • 1960-1980 के दशक: संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा रासायनिक निरस्त्रीकरण (Chemical Disarmament) के लिए विभिन्न प्रयास किए गए।
  • 1990: अमेरिका और सोवियत संघ ने रासायनिक हथियारों का उत्पादन बंद कर दिया।
  • 1992: रासायनिक हथियार सम्मेलन (Chemical Weapons Convention – CWC)
    • संयुक्त राष्ट्र (UN) द्वारा अनुमोदित (Ratified), 1997 में प्रभावी हुआ।
    • रासायनिक हथियारों के विकास, उत्पादन, भंडारण और उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध।
नैतिक और पर्यावरणीय निहितार्थ:
  • मानवीय प्रभाव: रासायनिक हथियार अंधाधुंध विनाशकारी होते हैं और अक्सर निर्दोष नागरिकों को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। दीर्घकालिक प्रभाव: प्रभावित लोगों में स्वास्थ्य समस्याएं, आनुवंशिक विकार, और स्थायी विकलांगता हो सकती है।
  • पर्यावरणीय क्षति: हरबिसाइड (Herbicides) और अन्य रासायनिक एजेंटों के कारण वनों की कटाई (Deforestation), मिट्टी का क्षरण (Soil Degradation), और जल प्रदूषण (Water Contamination) हुआ है।
चुनौतियाँ एवं भविष्य के खतरे:
  • पुराने हथियारों से खतरा : पुराने रासायनिक हथियारों (CW Stockpiles) का क्षरण उन्हें रिसाव (Leakage) और अप्रत्याशित विस्फोट के लिए अधिक संवेदनशील बनाता है।
  • सुरक्षा संबंधी चिंताएँ : गैर-राज्य अभिनेता (Non-State Actors), जैसे आतंकी संगठनों द्वारा इन हथियारों के दुरुपयोग का खतरा। ड्रोन तकनीक के विकास से नए प्रकार के प्रसार (Dissemination Methods) की संभावना बढ़ी है।
  • राजनीतिक चुनौतियाँ: रासायनिक हथियार कन्वेंशन जैसे अंतर्राष्ट्रीय संधियों का पालन करने के लिए पारदर्शिता और सहयोग की आवश्यकता होती है, जो राजनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
  • जटिल प्रक्रिया: रासायनिक हथियारों को नष्ट करने के लिए उन्नत सुविधाओं और तकनीक की आवश्यकता होती है, जो महंगी और जटिल होती हैं।

रासायनिक हथियार सम्मेलन (CWC), 1997

इतिहास (History)
  • 1925 जिनेवा प्रोटोकॉल → रासायनिक हथियारों के उपयोग पर प्रतिबंध, लेकिन स्वामित्व (Possession) की अनुमति।
  • 1993: CWC पर हस्ताक्षर के लिए खोला गया।
  • 29 अप्रैल 1997: आधिकारिक रूप से लागू।

रासायनिक हथियार सम्मेलन (CWC) एक संधि है जो सीमित अपवादों (जैसे अनुसंधान, चिकित्सा, दवा उपयोग) के साथ रासायनिक हथियारों और उनके पूर्ववर्ती साधनों के उपयोग, उत्पादन, भंडारण और हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगाती है। 

  • इसका प्रबंधन रासायनिक हथियारों के निषेध संगठन (OPCW) द्वारा किया जाता है।
  • प्रतिबंध: रासायनिक हथियारों का उपयोग, उत्पादन और हस्तांतरण → मौजूदा भंडारों का विनाश।
  • सदस्य देश: 193 देश, जिनमें सीरिया (2013 से) और फिलिस्तीन (2018) शामिल हैं।
  • अपवाद:
    • इजराइल: हस्ताक्षरित लेकिन अनुसमर्थित नहीं
    • गैर-हस्ताक्षरकर्ता: मिस्र, उत्तर कोरिया, दक्षिण सूडान
विषैले रसायन (हथियार के रूप में सूचीबद्ध नहीं)
  • क्लोरीन गैस: अत्यधिक जहरीली लेकिन शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए उपयोग की जाती है → रासायनिक हथियार के रूप में सूचीबद्ध नहीं है।
  • व्हाइट फॉस्फोरस: विषैला (Toxic) लेकिन CWC के तहत कानूनी, यदि गैर-घातक उद्देश्यों (Non-Toxic Purposes) के लिए उपयोग किया जाए। उदाहरण: सैन्य उद्देश्यों के लिए प्रकाश उत्पन्न करने (Illumination) में उपयोग किया जा सकता है, लेकिन हथियार के रूप में नहीं।

कन्वेंशन के मुख्य बिंदु

  • निषेध:
  • रासायनिक हथियारों का उत्पादन और उपयोग
  • रासायनिक हथियारों और उत्पादन सुविधाओं को नष्ट करना 
  • रासायनिक हथियारों के उपयोग के मामले में सहायता।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग:
  • प्रासंगिक क्षेत्रों में रसायन विज्ञान के शांतिपूर्ण उपयोग को प्रोत्साहित करना।
  • नियंत्रित पदार्थों (Controlled Substances) के उत्पादन, स्थानांतरण और उपयोग को OPCW द्वारा विनियमित किया जाता है।
सीडब्ल्यूसी संधि की समय-सीमा और चरण

कटौती चरण

  • चरण I: अप्रैल 2000 तक 1%
  • चरण II: अप्रैल 2002 तक 20% (खाली गोला-बारूद, पूर्ववर्ती रसायन और हथियार प्रणालियों को नष्ट करना)
  • चरण III: अप्रैल 2004 तक 45%
  • चरण IV: अप्रैल 2007 तक 100% (अप्रैल 2012 से आगे कोई विस्तार नहीं)
रासायनिक हथियारों के नष्ट करने संबंधी प्रगति (2019 तक)
  • घोषित 72,304 मीट्रिक टन रासायनिक एजेंटों में से 97.51% नष्ट कर दिए गए।
  • 57% गोला-बारूद और कंटेनर नष्ट कर दिए गए।
  • अल्बानिया, भारत, इराक, लीबिया, सीरिया, अमेरिका और दक्षिण कोरिया ने अपने घोषित रासायनिक हथियारों के भंडार को नष्ट करने का काम पूरा कर लिया है।
नियंत्रित पदार्थ (3 श्रेणियाँ):
  1. अनुसूची 1: मुख्य रूप से रासायनिक हथियारों के लिए उपयोग किए जाने वाले रसायन → सीमित उत्पादन, प्रति देश अधिकतम 1 टन। (उदाहरण: सल्फर मस्टर्ड, नर्व एजेंट)
  2. अनुसूची 2: सीमित गैर-हथियार उपयोग वाले रसायन → निर्माण की घोषणा करनी होगी। (उदाहरण: थियोडिग्लाइकोल)
  3. अनुसूची 3: व्यापक नागरिक उपयोग वाले रसायन → यदि उत्पादन >30 टन/वर्ष है तो घोषणा करनी होगी। (उदाहरण: फॉस्जीन)

सत्यापन:

  • OPCW द्वारा रासायनिक हथियार उत्पादन सुविधाओं और उद्योगों का निरीक्षण।
  • रासायनिक हथियारों के उपयोग के मामले में सहायता करता है।

रासायनिक हथियार निषेध संगठन (OPCW)

  • मुख्यालय: द हेग, नीदरलैंड्स
  • अधिदेश:
    • CWC दायित्वों के अनुपालन का सत्यापन। 
    • रासायनिक हथियारों और उनके उत्पादन सुविधाओं का विनाश। 
    • रासायनिक हथियारों के उपयोग की जांच और पड़ताल।
  • 2013 नोबेल शांति पुरस्कार: OPCW को रासायनिक हथियारों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत वर्जित (Taboo) करने में योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

भारत का रुख:

  1. निरस्त्रीकरण और रासायनिक प्रौद्योगिकियों के शांतिपूर्ण उपयोग को सक्रिय रूप से बढ़ावा देता है।
  2. भारत 14 जनवरी 1993 को रासायनिक हथियार सम्मेलन (CWC) का हस्ताक्षरकर्ता बना और 2 सितंबर 1996 को इसकी पुष्टि की।
  3. जून 1997 में, भारत ने 1,044 टन सल्फर मस्टर्ड के भंडार की घोषणा की।
  4. 2009 तक, भारत ने अपना पूरा रासायनिक हथियार भंडार नष्ट कर दिया था, ऐसा करने वाला दक्षिण कोरिया और अल्बानिया के बाद तीसरा देश बन गया।
परमाणु अप्रसार के प्रति भारत की प्रतिबद्धता
  • विधायी उपाय: CWC का पालन सुनिश्चित करने के लिए, भारत ने वर्ष 2000 में रासायनिक हथियार सम्मेलन अधिनियम पारित किया, जिसके तहत राष्ट्रीय प्राधिकरण (NACWC) की स्थापना की गई, जो संधि के प्रावधानों को लागू करने की निगरानी करता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: दिसंबर 2024 में, भारत ने OPCW सहायता गतिविधियों के समर्थन हेतु €10,000 का योगदान दिया।
रासायनिक हथियार नियंत्रण में हालिया प्रगति
  • OPCW जांच: सीरिया द्वारा सीडब्ल्यूसी के कथित गैर-अनुपालन की जांच चल रही है।
    • उत्तर कोरिया जैसे देशों को संधि में शामिल होने के लिए वैश्विक दबाव।
  • प्रवर्तन को सुदृढ़ करना: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) OPCW के साथ मिलकर उल्लंघनों से निपटने में सक्रिय भूमिका निभा रही है।
  • तकनीकी प्रगति: रासायनिक एजेंटों की उत्पत्ति का पता लगाने के लिए उन्नत फोरेंसिक तकनीकों का विकास।

जैविक हथियार

  • जैविक हथियार जीवित सूक्ष्मजीव (बैक्टीरिया, वायरस, फंगस आदि) या उनके विषाक्त पदार्थ (टॉक्सिन) होते हैं, जिन्हें मानव, पशु या फसलों को नुकसान पहुंचाने के लिए तैयार किया जाता है।
  • ये संक्रामक रोगों को फैला सकते हैं या ऐसे विषैले पदार्थ उत्पन्न कर सकते हैं जो घातक या अक्षम करने वाले होते हैं।

जैविक हथियारों की विशेषताएँ

  • अदृश्यता: जैविक हथियार एजेंटों का पता लगाना मुश्किल है।
  • संक्रामकता: वे आबादी के बीच तेजी से फैल सकते हैं।
  • दोहरे उपयोग की प्रकृति: कई जैविक एजेंटों के शांतिपूर्ण उपयोग भी होते हैं, लेकिन इन्हें सैन्य उद्देश्यों के लिए भी परिवर्तित किया जा सकता है।

प्रकार 

जैविक हथियार आमतौर पर सूक्ष्मजीवों और उनके विषाक्त पदार्थों से बने होते हैं, जिन्हें चार प्रमुख समूहों में विभाजित किया जाता है:

  1. बैक्टीरिया: एंथ्रेक्स, टुलारेमिया, प्लेग, टाइफस जैसी बीमारियाँ फैलाते हैं।
  2. वायरस: एन्सेफलाइटिस, स्मॉलपॉक्स (1979 में नियमित टीकाकरण बंद होने के बाद से विशेष रूप से भयावह) फैला सकते हैं।
  3. बायोटॉक्सिन: जीवों से प्राप्त विष, जैसे राइसीन (अरंडी की फलियों से) और बोटुलिनम टॉक्सिन (क्लोस्ट्रीडियम बैक्टीरिया से)।
  4. कवक: उदाहरण के लिए, आलू का झुलसा और गेहूं का कंडुआ, फसलों को नष्ट करने के लिए उपयोग किया जाता है।

जैविक युद्ध के ऐतिहासिक उदाहरण

  • 200 ई.पू.: हैनिबल ने दुश्मन के जहाजों पर ज़हरीले साँपों का इस्तेमाल किया।
  • 1155: सम्राट बारब्रोसा ने इटली के पानी के कुओं में ज़हर मिला दिया।
  • 1346: मंगोलों ने क्रीमिया में शहर की दीवारों पर प्लेग से संक्रमित शवों को फेंका।
  • 1763: अंग्रेजों ने मूल अमेरिकियों को चेचक से संक्रमित कंबल दिए।
  • 1940: जापान ने चीन में प्लेग से संक्रमित पिस्सू गिराए।
  • प्रथम विश्व युद्ध: जर्मनी ने रोमानिया में घोड़ों को ग्लैंडर्स से संक्रमित किया।
  • द्वितीय विश्व युद्ध: जापान ने चीनी नागरिकों और कैदियों पर जैविक हथियारों का परीक्षण किया।
  • 2001: अमेरिका में सीनेटरों और पत्रकारों को एंथ्रेक्स-संक्रमित पत्र भेजे गए।

महामारी के खतरे और जैव-युद्ध:

  • महामारियाँ (जैसे 1918 की स्पेनिश फ्लू) स्वाभाविक रूप से या जैविक हथियारों के उपयोग से उत्पन्न हो सकती हैं।
  • जैव आतंकवाद (बायोटेररिज्म) का खतरा: 9/11 के बाद 2001 के एंथ्रेक्स हमले ने जैविक हथियारों के वास्तविक खतरे को उजागर किया। पत्रों में एंथ्रेक्स स्पोर भेजे गए, जिससे 5 लोगों की मौत और कई संक्रमित हुए। इस घटना के बाद अमेरिका में बड़ा संघीय प्रतिक्रिया अभियान चलाया गया।

जैविक हथियारों के खतरे और जोखिम

  • व्यापक जनहानि: व्यापक संक्रमण, मृत्यु और दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभाव।
  • महामारियाँ: कुछ रोगजनक यदि हथियार के रूप में उपयोग किए जाएँ, तो वैश्विक महामारी उत्पन्न कर सकते हैं।
  • मनोवैज्ञानिक प्रभाव: जैविक युद्ध का खतरा आतंक और सामाजिक अव्यवस्था पैदा कर सकता है।
  • पता लगाने और बचाव की चुनौती: रासायनिक हथियारों की तुलना में जैविक हथियारों का पता लगाना और रोकथाम करना कठिन होता है।

अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन और प्रोटोकॉल

1925 जिनेवा प्रोटोकॉल 

  • युद्ध में रासायनिक और जैविक हथियारों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया, हालांकि इसमें मजबूत प्रवर्तन उपायों का अभाव था।

जैविक हथियार सम्मेलन (1972)

  • पूरा नाम: जीवाणु (जैविक) और विषैले हथियारों के विकास, उत्पादन और भंडारण के निषेध और उनके विनाश पर कन्वेंशन
  • उद्देश्य: जैविक हथियारों के विकास, उत्पादन, भंडारण, अधिग्रहण, हस्तांतरण और उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है।
  • लागू हुआ: 26 मार्च 1975
  • हस्ताक्षरकर्ता: 187 देश (जुलाई 2024 तक)
  • यह पहली संधि थी जिसने सामूहिक विनाश के हथियारों (WMDs) की एक पूरी श्रेणी पर प्रतिबंध लगाया।
  • संधि की भूमिका में जैविक हथियारों को “मानव विवेक के लिए घृणित” कहा गया है।
History:
  1. 1925 जिनेवा प्रोटोकॉल: जैविक हथियारों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया (लेकिन स्वामित्व या विकास की अनुमति दी)।
  2. 1969: अमेरिका ने आक्रामक जैविक हथियार कार्यक्रमों को समाप्त किया।
  3. 1972 BWC वार्ता: अमेरिका और सोवियत संघ ने रासायनिक और जैविक हथियारों को अलग-अलग मुद्दों के रूप में स्वीकार किया।
  4. मार्च 1975: BWC प्रभावी हुआ और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जैविक हथियारों पर प्रतिबंध लागू किया गया।

प्रमुख आर्टिकल :

  • अनुच्छेद I: जैविक हथियारों के विकास और अधिग्रहण पर प्रतिबंध।
  • अनुच्छेद II: जैविक हथियारों के भंडार और संबंधित उपकरणों के नष्ट किए जाने की अनिवार्यता।
  • अनुच्छेद III: किसी भी राष्ट्र को जैविक हथियारों के स्थानांतरण पर प्रतिबंध।
  • अनुच्छेद VI: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में उल्लंघन की शिकायत दर्ज कराने की अनुमति।
  • अनुच्छेद X: शोध के लिए जैविक एजेंटों के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देता है।

​​जैविक हथियार सम्मेलन (BWC) के सामने चुनौतियाँ

  1. तकनीकी जोखिम:
    • बायोटेक्नोलॉजी (CRISPR, सिंथेटिक बायोलॉजी, AI, रोबोटिक्स) में प्रगति से जैविक हथियारों के विकास की संभावना बढ़ सकती है।
    • उभरती हुई प्रौद्योगिकियां हथियार बनाने को बढ़ा सकती हैं लेकिन महामारी की तैयारी में भी सुधार कर सकती हैं।
    • सिंथेटिक बायोलॉजी और जीनोमिक तकनीकों के कारण शांतिपूर्ण और सैन्य उपयोग के बीच का अंतर धुंधला हो जाता है।
  2. (Verification Difficulties) सत्यापन की कठिनाइयाँ:
    • जैविक हथियारों का उत्पादन छोटे पैमाने पर संभव है, जिससे निगरानी मुश्किल होती है।
    • दोहरे उपयोग वाली तकनीकें (जैसे टीके और चिकित्सा उपचार) निगरानी को और जटिल बना देती हैं।
    • जैविक एजेंटों को तेजी से नष्ट किया जा सकता है, जिससे निरीक्षण बाधित होते हैं।
  3. वित्तीय मुद्दे:
    • धन की कमी के कारण बैठकों में देरी होती है।
    • कार्यशील पूंजी निधि: कार्यक्रम की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए स्वैच्छिक योगदान पर निर्भर।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्ताव 1540 (2004)

  • स्वीकृत: 28 अप्रैल 2004
  • उद्देश्य: गैर-राज्य तत्वों (जैसे आतंकवादी संगठनों) को परमाणु, रासायनिक और जैविक हथियार (WMDs) प्राप्त करने से रोकना।

मुख्य बिंदु

  1. प्रतिबंध: कोई भी राष्ट्र गैर-राज्य तत्वों को WMDs प्राप्त करने में सहायता नहीं करेगा।
  2. राष्ट्रीय कानून: प्रत्येक देश को WMD प्रसार को अपराध घोषित करने के लिए सख्त कानून लागू करने होंगे।
  3. सामग्री सुरक्षा: संवेदनशील सामग्रियों (जैसे समृद्ध यूरेनियम, एंथ्रेक्स) की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।
  4. निर्यात नियंत्रण: दोहरे उपयोग वाली तकनीकों (जैसे सेंट्रीफ्यूज) की निगरानी और नियंत्रण करना आवश्यक होगा।

भारत का जैविक हथियारों पर रुख

अक्टूबर 2002 में, राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भारत की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा था : “भारत जैविक हथियार नहीं बनाएगा। यह मानवता के लिए क्रूर है।”

भारत के दृष्टिकोण के प्रमुख पहलू:

  1. BWC के प्रति प्रतिबद्धता: भारत ने 15 जुलाई 1974 को जैविक हथियार सम्मेलन (BWC) की पुष्टि की।
  2. कोई जैविक हथियार कार्यक्रम नहीं: भारत की नीति जैविक हथियारों के न रखने और न उपयोग करने की है।
  3. जैव-रक्षा क्षमताएँ: रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  4. बायोटेररिज्म की तैयारी: भारत ने अपने रोग निगरानी नेटवर्क और निगरानी क्षमताओं को मजबूत किया है।
  5. विनियामक उपाय: भारत सामूहिक विनाश के हथियार और उनकी डिलीवरी प्रणाली (WMD) अधिनियम, 2005 की धारा 13 के माध्यम से जैविक एजेंटों और संबंधित दोहरे उपयोग वाली वस्तुओं के हस्तांतरण को नियंत्रित करता है।

ऑस्ट्रेलिया ग्रुप

  • 43 देशों (ईयू सहित) का एक अनौपचारिक मंच जो विशिष्ट रसायनों, जैविक एजेंटों और दोहरे उपयोग वाली विनिर्माण सुविधाओं और उपकरणों के निर्यात को प्रतिबंधित करने के लिए लाइसेंसिंग उपायों को लागू करता है जो रासायनिक या जैविक हथियारों (CBW) के प्रसार को सुविधाजनक बना सकते हैं।
  • ऑस्ट्रेलिया समूह में भाग लेने वाले सभी देश रासायनिक हथियार सम्मेलन (CWC) और जैविक हथियार सम्मेलन (BWC) के पक्षकार हैं।
  • इसका गठन ईरान-इराक युद्ध (1980-1988) के दौरान इराक द्वारा रासायनिक हथियारों के उपयोग के कारण हुआ था।
  • भारत 19 जनवरी 2018 को ऑस्ट्रेलिया समूह में शामिल हुआ।
    • सदस्यता से “जैव प्रौद्योगिकी और रसायन के गतिशील उद्योग क्षेत्रों में आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा को मजबूत करने” में मदद मिलेगी, साथ ही परमाणु अप्रसार उद्देश्यों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी। ऑस्ट्रेलिया ग्रुप में जगह मिलने से एनएसजी (NSG) सदस्यता के लिए मामला मजबूत होगा।
  • हालांकि, समूह की सफलता सीमित रही है। यह उन देशों के खिलाफ प्रतिबंध या अन्य दंडात्मक उपाय नहीं लगा सकता है जो रासायनिक हथियार प्राप्त करते हैं या उन समूह सदस्यों के खिलाफ जो संगठन के नियंत्रणों को अनदेखा करना चुनते हैं।
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