NAM (गुट निरपेक्ष आंदोलन) शीत युद्ध के दौरान 1955 में गठित हुआ था, जिसका उद्देश्य नाटो और वर्सा संधि के खेमों से स्वतंत्र रहना था। बदलते वैश्विक परिदृश्य में NAM की प्रासंगिकता निम्नलिखित बिंदुओं में स्पष्ट होती है:
- संयुक्त राष्ट्र सुधार: NAM संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को लोकतांत्रिक, पारदर्शी और प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने की वकालत करता है।
- संप्रभुता की रक्षा: NAM सदस्य देशों की आत्मनिर्णय और क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन करता है, और किसी भी प्रकार की आक्रामकता का विरोध करता है।
- स्वतंत्र विदेश नीति: भारत जैसे देश आज भी NAM के सिद्धांतों पर चलते हुए स्वतंत्र विदेश नीति को प्राथमिकता देते हैं।
- औपनिवेशिकता-विरोधी रुख: यह आंदोलन विकासशील देशों को उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद से बचाने में मदद करता है।
- दक्षिण-दक्षिण सहयोग: NAM विकासशील देशों को एक ऐसा मंच प्रदान करता है, जहां वे साझा चुनौतियों का समाधान कर वैश्विक मामलों में अपना प्रभाव बढ़ा सकते हैं।
- बहुपक्षवाद और शांति: NAM शांति, कूटनीति और सह-अस्तित्व को बढ़ावा देता है, और संयुक्त राष्ट्र के लोकतंत्रीकरण की वकालत करता है।
- सक्रिय गुट-निरपेक्षता (ANA): वर्तमान संदर्भ में NAM देशों को वैश्विक मुद्दों के समाधान के लिए सक्रिय और रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाने पर जोर देता है।
इस प्रकार, बदलते वैश्विक परिप्रेक्ष्य में NAM आज भी वैश्विक शक्ति संतुलन और बहुपक्षीय सहयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
लगभग ढाई साल से चल रहा रूस-यूक्रेन युद्ध, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप का सबसे बड़ा संघर्ष है। इस युद्ध का वैश्विक राजनीति और भारत की कूटनीतिक रणनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा है।
वैश्विक राजनीति पर युद्ध का प्रभाव | भारत की कूटनीतिक एजेंडा पर युद्ध का प्रभाव |
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युद्ध का समाधान G20 घोषणा में भारत द्वारा दिये गये निम्न सिद्धांतों में निहित है :
- संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों का पूर्ण पालन।
- संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए कूटनीतिक प्रयासों और संवाद को प्राथमिकता।
- युद्ध के बजाय शांति पर ध्यान केंद्रित करना।
