राजस्थान की राजनीति में नवीन आयाम और चुनौतियाँ

राजस्थान की राजनीति के निर्धारक:

  1. जाति-आधारित राजनीति: जाति टिकट वितरण, राजनीतिक नियुक्तियों और मतदाता व्यवहार को प्रभावित करती है। शुरुआत में राजपूतों और जाटों का वर्चस्व था, लेकिन 1970 के बाद गुर्जर, मीना, मेघवाल आदि जैसी अन्य जातियों को प्रमुखता मिली।
  2. पिछले 25 वर्षों में कांग्रेस और भाजपा के बीच बारी-बारी से सत्ता परिवर्तन में सत्ता-विरोधी कारक ने प्रमुख भूमिका निभाई है।
  3. राज्य के राजनीतिक दलों का अभाव: राष्ट्रीय दलों – भाजपा और कांग्रेस ने क्षेत्रीय दलों पर भारी पड़ गये हैं।
  4. समूहों की प्रधानता: कांग्रेस (व्यास बनाम सुखाड़िया, गहलोत बनाम पायलट) और भाजपा (शेखावत बनाम हरिशंकर भाभड़ा) के भीतर गुटबाजी उल्लेखनीय है।
  5. दलबदल की राजनीति:एम.एल. सुखाड़िया, भैरोसिंह और अशोक गहलोत जैसे नेताओं ने सत्ता हासिल करने के लिए इसका इस्तेमाल किया।
  6. एमएल सुखाड़िया, बीएस शेखावत और अशोक गहलोत जैसे दिग्गजों को मुख्यमंत्री पद तक पहुंचाने में निर्दलीय विधायकों ने अहम भूमिका निभाई।
  7. सामंतवाद का प्रभाव: स्वतंत्रता के बाद के प्रारंभिक काल (स्वतंत्र पार्टी, राम राज्य परिषद का गठन) में स्पष्ट। दीया कुमारी और वसुंधरा राजे के लिए महारानी जैसी उपाधियों का उपयोग सामंतवादी मानसिकता को दर्शाता है।
  8. स्थानीय मुद्दे: ईआरसीपी, पेपर लीक, जल संकट, महिला सुरक्षा और कृषि ऋण जैसी चिंताएँ ।

भारत में 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक लगा आपातकाल एक ऐसा दौर था जिसने राष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ राज्यों की राजनीति को भी गहराई से प्रभावित किया। राजस्थान, जो उस समय कांग्रेस पार्टी के अधीन था, भी इससे अछूता नहीं रहा। 

राजस्थान की राजनीतिक दिशा पर प्रभाव:

  1. राजनीतिक दमन और विपक्ष का ह्रास: आपातकाल के दौरान राज्य सरकार ने केंद्र के निर्देशों का पालन करते हुए विपक्षी नेताओं, कार्यकर्ताओं, और आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया।
    • जनसंघ,राष्ट्रवादी नेता, और आरएसएस से जुड़े अनेक लोगों को नजरबंद या जेल भेजा गया।
    • प्रेस पर सेंसरशिप लगने से लोकतांत्रिक विमर्श को दबा दिया गया।
  2.  कांग्रेस का वर्चस्व: राजस्थान में कांग्रेस पार्टी का प्रभाव इस दौर में चरम पर था।
    • राज्य में कांग्रेस शासित मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी और बाद में जगन्नाथ पहाड़िया व अन्य नेताओं ने इंदिरा गांधी के आदेशों का अक्षरशः पालन किया।
    • प्रशासन पर कांग्रेस का सीधा नियंत्रण हो गया, जिससे एकतरफा नीतियाँ लागू की गईं।
  3. नवनिर्माण और नसबंदी कार्यक्रम
    • संजय गांधी के ‘पांच सूत्रीय कार्यक्रम’ के अंतर्गत राजस्थान में भी नसबंदी, कस्बों की साफ-सफाई, और शहरी विकास को जोर-शोर से लागू किया गया।
    • इन कार्यक्रमों को बलपूर्वक लागू किए जाने से जनता में असंतोष फैला, विशेषकर ग्रामीण और गरीब तबकों में।
  4. जन असंतोष और विपक्ष का पुनर्गठन
    • आपातकाल के दौरान राजनीतिक दमन और जन विरोधी नीतियों के कारण जनता में गहरी नाराज़गी उत्पन्न हुई।
    • विपक्षी दलों ने जनता पार्टी के रूप में एकता बनाई, जिसमें राजस्थान के भी अनेक क्षेत्रीय नेता प्रमुख भूमिका में थे (जैसे भैरोसिंह शेखावत)।
  5. 1977 के चुनावों में कांग्रेस की हार
    • आपातकाल की समाप्ति के बाद हुए 1977 के आम चुनावों में राजस्थान में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा।
    • जनता पार्टी ने राज्य की 25 में से 21 लोकसभा सीटें जीत लीं।
    • राज्य विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस को पराजय मिली और भैरोसिंह शेखावत के नेतृत्व में राजस्थान में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।

निष्कर्ष:आपातकाल के दौरान राजस्थान में राजनीतिक दिशा एकदलीय अधिनायकवाद की ओर मुड़ी, परंतु इससे उत्पन्न जन असंतोष ने राज्य की राजनीति को नया मोड़ दिया। इससे लोकतांत्रिक चेतना का विस्तार, विपक्ष का सशक्तिकरण, और राजनीतिक वैकल्पिकता की भावना का उदय हुआ, जिसने आगे चलकर राज्य की राजनीति को अधिक प्रतिस्पर्धी और बहुपक्षीय बनाया।

पिछले बीस वर्षों (लगभग 2000 से 2020 तक) में राजस्थान की राजनीतिक जनसांख्यिकी (Political Demography) में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए हैं। इन परिवर्तनों ने राज्य की चुनावी राजनीति, मतदाता व्यवहार, और सत्ताधारी दलों की रणनीतियों को काफी प्रभावित किया है।

  1. जातिगत समीकरणों में परिवर्तन
    • पारंपरिक रूप से राजस्थान की राजनीति जाट, राजपूत, ब्राह्मण, और दलित वोट बैंक के इर्द-गिर्द घूमती रही है।
    • हाल के वर्षों में ओबीसी (विशेषकर गुर्जर और मीणा समुदाय) की राजनीतिक हिस्सेदारी और महत्व बढ़ा है।
    • जातीय आंदोलनों (जैसे गुर्जर आरक्षण आंदोलन) ने नई राजनीतिक चेतना और ध्रुवीकरण को जन्म दिया।
  1. शहरीकरण और मध्यम वर्ग का उदय
    • शहरी मतदाताओं की संख्या में वृद्धि और इंटरनेट-साक्षर युवा वर्ग के उदय ने राजनीतिक मुद्दों को बदला है।
    • अब विकास, रोजगार, शिक्षा, और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे जातीय या पारंपरिक मुद्दों से आगे निकल चुके हैं।
  1. महिलाओं की भागीदारी
    • महिलाओं की राजनीतिक सक्रियता बढ़ी है, खासकर पंचायती राज और स्थानीय निकायों में।
    • महिलाओं का मतदान प्रतिशत अब पुरुषों के बराबर या कभी-कभी अधिक हो गया है।
  1. राजनीतिक दलों की रणनीतियों में बदलाव
    • भारतीय जनता पार्टी (BJP) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) ने अपने प्रचार में जातीय संतुलन, युवा नेतृत्व, और सामाजिक मीडिया का व्यापक प्रयोग किया है।
    • क्षेत्रीय दलों का प्रभाव सीमित रहा है, लेकिन निर्दलीय उम्मीदवार और स्थानीय प्रभावशाली चेहरे निर्णायक भूमिका निभाने लगे हैं।
  1. घुमंतू और अल्पसंख्यक समुदायों की भूमिका
    • पारंपरिक रूप से हाशिये पर रहे समुदायों (जैसे मुसलमान, भील, गाड़िया लोहार आदि) ने भी राजनीतिक चेतना विकसित की है और उनका मतदान व्यवहार अधिक संगठित हुआ है।

निष्कर्ष: राजस्थान की राजनीतिक जनसांख्यिकी अब पहले से अधिक विविध, जागरूक, और मुद्दा-आधारित हो चुकी है। जाति और धर्म जैसे कारकों का प्रभाव अभी भी है, लेकिन विकास, शिक्षा, और युवाओं की आकांक्षाएं राजनीति को एक नई दिशा में ले जा रही हैं।

राजनीतिक चन्दे  की वर्तमान स्थिति लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अखंडता को कैसे कमजोर करती है, और इसके भीतर पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कौन से सुधार प्रस्तावित किए जा सकते हैं?

राजनीतिक फंडिंग से तात्पर्य राजनीतिक दलों या उम्मीदवारों को उनकी गतिविधियों, अभियानों और समग्र कामकाज का समर्थन करने के लिए प्रदान किए गए वित्तीय योगदान से है।

चुनावों में पार्टी के बढ़ते खर्चों को पूरा करने के लिए पार्टियाँ अक्सर निम्नलिखित संसाधनों पर निर्भर रहती हैं:

  • व्यक्तिगत : आरपीए की धारा 29बी व्यक्तियों को 100% कर छूट के साथ राजनीतिक दलों को दान देने की अनुमति देती है।
  • राज्य/सार्वजनिक फंडिंग: भारत में, मीडिया पहुंच और परिवहन सब्सिडी जैसी अप्रत्यक्ष फंडिंग विधियों की अनुमति है, जबकि प्रत्यक्ष फंडिंग निषिद्ध है।
  • कॉर्पोरेट फंडिंग: कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 182 द्वारा शासित, निगम राजनीतिक दलों को दान दे सकते हैं।
  • चुनावी बॉन्ड  योजना: 2017 में पेश की गई, चुनावी बॉन्ड योजना पंजीकृत राजनीतिक दलों को गुमनाम दान की सुविधा प्रदान करती है।
  • चुनावी ट्रस्ट योजना, 2013: सीबीडीटी द्वारा शासित, चुनावी ट्रस्ट कंपनियों और व्यक्तियों से प्राप्त योगदान को राजनीतिक दलों  में वितरित करते हैं।
  • अन्य स्रोतों में चेक, कूपन की बिक्री, क्राउड-फंडिंग आदि शामिल हैं।

परन्तु , ये तंत्र भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।

  1. काले धन का प्रवाह: ₹20,000 से कम के दान के लिए प्रकटीकरण अनिवार्यता की अनुपस्थिति पार्टियों को नकद दाताओं पर भरोसा करने में सक्षम बनाती है। यह छह प्रमुख राष्ट्रीय दलों की आय का लगभग 75% है, जो काले धन के प्रवाह में योगदान देता है।

( कुछ राजनीतिक दलों द्वारा बताए गए दान शून्य थे, जबकि उनके ऑडिट किए गए खातों के विवरण में भारी मात्रा में प्राप्ति दिखाई गई, जो 20,000 रुपये की सीमा से नीचे नकद में बड़े पैमाने पर लेनदेन को साबित करती है।)

  1. अज्ञात दान: अज्ञात स्रोतों में ‘चुनावी बॉन्ड के माध्यम से दान’, ‘कूपन की बिक्री’, ‘राहत कोष’, ‘विविध आय’, ‘स्वैच्छिक योगदान’ और ‘बैठकों/मोर्चों से योगदान’ शामिल हैं। ऐसे दानदाताओं के स्वैच्छिक योगदान का विवरण सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध नहीं है।
  2. विदेशी दान: वर्तमान में, आरपी अधिनियम और विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए), 2010 के तहत किसी भी विदेशी दान की अनुमति नहीं है। हालांकि, प्रारंभिक चरणों में विदेशी दान को अलग करने की कोई व्यवस्था नहीं है।
  3. क्रोनी पूंजीवाद: 7.5% लाभ सीमा को हटाने से कंपनियां राजनीतिक दलों को 100% मुनाफा दान करने में सक्षम हो जाती हैं, जिससे संभावित रूप से क्रोनी पूंजीवाद को बढ़ावा मिलता है।
  4. अपारदर्शी चुनावी बांड तंत्र में परिवर्तन: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने “संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) में नागरिकों को प्रदत सूचना के अधिकार” का उल्लंघन करने के लिए आरपी अधिनियम की धारा 29 सी, कंपनी अधिनियम की धारा 182 (3) और आयकर की धारा 13 ए (बी) में संशोधन को रद्द कर दिया। 

सुधार की आवश्यकता:

  1. चुनावों के लिए राज्य वित्त पोषण: इंद्रजीत गुप्ता समिति  मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के राज्य द्वारा आंशिक वित्त पोषण का समर्थन करती है।
  2. राष्ट्रीय चुनावी कोष: चुनावी बॉन्ड के विकल्प के रूप में, पार्टियों को प्राप्त वोटों  और दानदाताओं के योगदान के आधार पर आवंटन किया जाना 
  3. चुनावी वित्त पर विधि आयोग की सिफ़ारिशों (255वीं रिपोर्ट) को स्वीकार करना
  4. राजनीतिक दलों का ऑडिट: वेंकटचलैया समिति की रिपोर्ट (2002) ने पार्टी की आय और व्यय के ऑडिट और प्रकटीकरण के लिए सख्त नियामक ढांचे की सिफारिश की है।
  5. वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं से सीख : फ्रांस ने 1995 में सभी प्रकार की कॉर्पोरेट फंडिंग पर प्रतिबंध लगा दिया है और व्यक्तिगत दान की सीमा 6,000 यूरो कर दी है।
  6. कॉर्पोरेट दान पर सख्त नियम, विशेषकर घाटे में चल रही कंपनियों से
  7. ईसीआई की सिफ़ारिशें
    1. गुमनाम दान का खुलासा: पारदर्शिता बढ़ाने के लिए 2,000 रुपये से अधिक के सभी दान की रिपोर्टिंग अनिवार्य करें।
    2. डिजिटल या चेक लेनदेन: किसी एक इकाई/व्यक्ति को 2,000 रुपये से अधिक के खर्च के लिए डिजिटल लेनदेन या चेक हस्तांतरण को अनिवार्य बनाएं।
    3. नकद दान को सीमित करें: किसी पार्टी को प्राप्त कुल धनराशि में से नकद दान को 20% या अधिकतम 20 करोड़ रुपये तक सीमित करें, जो भी कम हो।
    4. अलग बैंक खाता: प्रत्येक मैदान में उतरने वाले उम्मीदवार को चुनाव उद्देश्यों के लिए एक अलग बैंक खाता खोलना होगा और सभी खर्चों और प्राप्तियों को इस खाते के माध्यम से भेजना होगा।
    5. विदेशी दान को अलग करें: आरपी अधिनियम और एफसीआरए, 2010 के अनुसार विदेशी दान को पार्टी फंड में प्रवेश करने से रोकने के लिए उपयुक्त चुनावी सुधार लागू करें।

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