राजस्थान की जनजातियाँ एवं उनकी परंपराएँ

जनसंख्या की दृष्टि से यह राजस्थान का चौथा सबसे बड़ा जनजाति समूह है , जिसे भारत सरकार ने विशेष पिछड़ी जनजाति (PVTG ) में सम्मिलित किया है 

  • यह मुख्यतः बारां जिले के किशनगंज व शाहबाद तहसीलों में निवास करते हैं।इसके अलावा यह जनजाति मध्यप्रदेश और छतीसगढ़  में भी निवास करती है ।
  • एकांकी परिवार, बहुपत्नी प्रथा, नाता प्रथा इनमें प्रचलित है।
  • सीताबाड़ी मेला (बांरा) इनका पवित्र स्थान है। 
  • इनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार वनोत्पाद व स्थानांतरित कृषि है।
  • स्थान: मुख्य रूप से सिरोही के आबू रोड और पिंडवाड़ा तहसील, पाली जिले के बाली और उदयपुर के गोगुंदा और कोटड़ा तहसील में पाए जाते हैं।
  • गांव और आवास: घरों को ‘घेर’ और गांवों को ‘फलिया’ कहा जाता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन:

  • विवाह के प्रकार: मोर बधिया, पहरावाना, ताड़ना विवाह (दुल्हन की कीमत दूल्हे के परिवार द्वारा चुकाई जाती है)। विधवा विवाह, प्रेम विवाह भी इनमें प्रचलित हैं।
  • पारिवारिक संरचना: पिता के मुखिया के रूप में एकल परिवारों में रहते हैं।
  • सामाजिक विभाजन: तीन वर्गों में विभाजित: मोती न्यात, नेनकी न्यात और निचली न्यात।
  • मेले: अंबाजी के पास कोटेश्वर मेला, देवला के पास चित्र विचित्र मेला और गोगुंदा का गणगौर मेला।
  • नृत्य: मुख्य नृत्यों में वालर, गरबा, गैर, मोरिया और गौर शामिल हैं।
  • बोली: गुजराती, भीली, मेवाड़ी और मारवाड़ी का मिश्रण।
  • पोशाक और भेष: पुरुष धोती, कमीज और सिर पर तौलिया पहनते हैं। टैटू बनवाने की परंपरा, जिसमें महिलाओं के माथे और ठोड़ी पर टैटू होते हैं।
  • धर्म: शिव, भैरव और दुर्गा की पूजा करते हैं।

अर्थव्यवस्था:

  • कृषि, पशुपालन, लकड़ी काटने और वन उत्पाद संग्रह पर आधारित है।
  • कस्बों और शहरों में मजदूरी के काम में तेजी से शामिल हो रहे हैं।
  • सामुदायिक खेती का एक रूप ‘हारी बावरी’
  • ‘सोहरी’ (कोठी) में खाद्यान्न का भंडारण करें।

राजस्थान की जनजातीय आबादी में भील दूसरे स्थान पर हैं, जो मुख्य रूप से बांसवाड़ा, डूंगरपुर और उदयपुर जिलों में केंद्रित हैं। वे भारत की सबसे पुरानी जनजातियों में से हैं, जो भीली और वागरी बोलियाँ बोलती हैं। सामाजिक रूप से पितृसत्तात्मक, वे मुख्य रूप से किसान और पारंपरिक रूप से प्रसिद्ध तीरंदाज हैं।

पर्यावास और आवास:

  • असमान और वन भूमि: भील आमतौर पर असमान और वन भूमि पर निवास करते हैं, जो प्रकृति के साथ उनके घनिष्ठ संबंध को दर्शाता है।
  • पारंपरिक आवास: उनके घर बांस और लकड़ी का उपयोग करके बनाए जाते हैं, जो उनके आसपास आसानी से उपलब्ध सामग्री होती है।
  • क्षेत्रीय भेद: 
    • पालवी भील: ऊंची पहाड़ियों पर रहने वाले भील ‘पालवी’ कहलाते हैं।
    • वागरी भील: मैदानी इलाकों में रहने वाले भीलों को ‘वागरी’ कहा जाता है।

सामाजिक जीवन:

  • पितृवंशीय गौत्र-भीलों के कई पितृवंशीय गौत्र होते हैं जिन्हें ‘अटक’ कहा जाता है।  
  • विवाह प्रथाएँ- कई प्रकार जैसे- मोर बान्दिया विवाह, अपहरण विवाह, देवर विवाह, विनिमय विवाह, सेवा विवाह एवं क्रय विवाह के तरीके प्रचलित है। 
  • परिवार संरचना –भीलों में संयुक्त परिवारों की तुलना में एकांकी परिवार अधिक पाए जाते हैं
  • ग्राम संरचना – इनके छोटे गांव को फला और बड़े गांव को पाल कहते हैं।
  • सांस्कृतिक प्रथाएं
    • नृत्य  : गवरी एवं घूमर भीलों के प्रमुख नृत्य है
    • मेले और त्यौहार:
      •  श्रावण मास में पार्वती के पूजन का “गवरी” पर्व इनका विशिष्ट उत्सव है।
      • भील समुदाय का प्रसिद्व बेणेश्वर मेला प्रतिवर्ष माघ शुक्ल पूर्णिमा के दिन माही, सोम व जाखम नदियों के संगम पर स्थित बेणेश्वर नामक स्थान पर भरता है।
  • पारंपरिक पोशाक और आभूषण: भील पुरुष प्रायः कमीज या अंगरखी तथा तंग धोती (ठेपाडा) पहनते हैं और सिर पर साफा (पोत्या) पहनते हैं। स्त्रियों के पहनावे में घाघरा, लूगडी व चोली शामिल है।भील पुरुष व महिलाएँ चाँदी, पीतल, गिलट आदि धातुओंके आभूषण पहनते हैं। गोदना का प्रचलन भी पाया जाता है। 
  • धार्मिक परंपराएं:भील हिन्दुओं के सभी देवी-देवताओं के साथ साथ स्थानीय लोकदेवताओं जैसे धराल, बीरसा मुण्डा, कालाजी गोराजी, माताजी, गोविन्द गुरू, लसोड़िया महाराज आदि की पूजा करते हैं।

अर्थव्यवस्था:

  • खानाबदोश जीवन शैली: परंपरागत रूप से, भील एक बहुत गरीब जनजाति रही है, जो अक्सर खानाबदोश जीवन शैली जीते हैं।
  • खेती और पशुपालन की ओर संक्रमण: कई भील अब विभिन्न स्थानों पर खेती की गतिविधियों में परिवर्तित हो गए हैं।
    • पहाड़ी ढलानों पर खेती को ‘चिमाता’ कहा जाता है, जबकि मैदानी इलाकों में खेती को ‘दजिया’ कहा जाता है।
    • खेती के अलावा, भील अपनी आर्थिक गतिविधियों के एक हिस्से के रूप में पशु पालन भी करते हैं।
  • वन-आधारित आजीविका: मछली पकड़ना, शिकार करना और  बच्चों और महिलाओं द्वारा वन उत्पादों का संग्रह करना  उनकी आर्थिक प्रणाली का एक अभिन्न अंग है।
    • महुआ का पेड़ भीलों के बीच महत्व रखता है, संभवतः इसके आर्थिक मूल्य के साथ-साथ सांस्कृतिक महत्व के कारण भी।
  • दिहाड़ी मजदूरी की ओर संक्रमण: वर्तमान में, कुछ भीलों ने आसपास के शहरों और कस्बों में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करना भी शुरू कर दिया है, जो उनकी आर्थिक गतिविधियों में बदलाव का संकेत है।

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