2015 में स्थापित, नीति आयोग ने योजना आयोग को प्रतिस्थापित किया ताकि बाजार-प्रेरित, सहकारी संघीय अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से पूरा किया जा सके, जिससे केंद्रीकृत योजना से गतिशील नीति थिंक टैंक मॉडल में परिवर्तन हुआ।
प्रमुख योगदान और परिवर्तन:
- जमीनी स्तर और सहकारी संघवाद: शासकीय परिषद के माध्यम से राज्यों को नीति निर्माण में शामिल करता है, जिससे स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर राज्य-विशिष्ट विकास रणनीतियाँ प्रोत्साहित होती हैं।
- नीति थिंक टैंक: विभिन्न क्षेत्रों (जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन) में विशेषज्ञ इनपुट, वास्तविक समय डेटा और नीति अनुसंधान प्रदान करता है। उदाहरण: गिग अर्थव्यवस्था, डिजिटल स्वास्थ्य, एसडीजी आदि पर रिपोर्ट।
- लचीला योजना मॉडल: कठोर पंचवर्षीय योजनाओं को 3-वर्षीय कार्ययोजना, 7-वर्षीय रणनीति और 15-वर्षीय दृष्टिकोण के साथ प्रतिस्थापित किया, जिससे अनुकूलनशीलता सुनिश्चित होती है।
- प्रतिस्पर्धी संघवाद: एसडीजी सूचकांक और स्वास्थ्य सूचकांक जैसे प्रदर्शन-आधारित रैंकिंग के माध्यम से राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को शासन में सुधार के लिए प्रोत्साहित करता है। उदाहरण: आकांक्षी जिला कार्यक्रम, एसडीजी भारत सूचकांक।
- परिणाम-उन्मुख शासन: निधि आवंटन के बजाय प्रभाव मूल्यांकन और मापने योग्य परिणामों पर ध्यान केंद्रित करता है।
- आकांक्षी जिलों का समर्थन: वास्तविक समय निगरानी, डेटा-प्रेरित योजना और समावेशी विकास के लिए क्षेत्रीय एकीकरण के साथ पिछड़े क्षेत्रों को लक्षित करता है।
- नवाचार और स्टार्ट-अप को बढ़ावा: अटल नवाचार मिशन (एआईएम) जैसे पहल उद्यमिता, स्टार्ट-अप और स्कूल-स्तरीय नवाचार को प्रोत्साहित करते हैं।
- वैश्विक सहयोग और एसडीजी स्थानीयकरण: राष्ट्रीय नीतियों को सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के साथ संरेखित करता है और नीति सर्वोत्तम प्रथाओं में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सुगम बनाता है।
योजना आयोग से नीति आयोग तक का संक्रमण (2015 में) एक केंद्रीकृत आर्थिक नियंत्रण से एक अधिक सहयोगात्मक, संघीय और गतिशील नीति निर्माण संस्था की ओर बदलाव को दर्शाता है। यह भारत की विकास योजना को 21वीं सदी की चुनौतियों और आकांक्षाओं के अनुरूप बनाता है।
योजना आयोग की सीमाएँ:
- शीर्ष-से-नीचे दृष्टिकोण– केंद्रीकृत नीतियाँ अक्सर राज्य-स्तरीय विविधताओं और ज़मीनी हकीकतों की उपेक्षा करती थीं।
- पुरानी संरचना- पंचवर्षीय योजनाएँ कठोर हो गई थीं और बदलती वैश्विक व घरेलू आर्थिक परिस्थितियों से कटी हुई थीं।
- कमज़ोर संघीय भागीदारी- राज्यों की भागीदारी सीमित थी, जिससे असंतोष और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में स्वामित्व की कमी रही।
- धीमी नीति प्रतिक्रिया- योजना निर्माण और क्रियान्वयन में नौकरशाही की देरी से यह तात्कालिक शासन के लिए अनुपयुक्त साबित हुआ।
- नीति नवाचार की तुलना में संसाधन आवंटन- ध्यान वित्तीय वितरण पर था न कि परिणाम आधारित, प्रमाण-आधारित सुधारों पर।
नीति आयोग की स्थापना व संरचना:
- 2015 में योजना आयोग को हटाकर एक आधुनिक नीति थिंक टैंक के रूप में गठित।
- प्रधानमंत्री अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, उपराज्यपाल व विशेषज्ञ इसकी संचालन परिषद में शामिल।
- संरचना सहकारी एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद, नवाचार और तात्कालिक नीति प्रतिक्रिया को प्रोत्साहित करती है।
मुख्य कार्यात्मक अंतर:
| पैरामीटर | योजना आयोग | नीति आयोग |
| दृष्टिकोण | केंद्रीकृत, शीर्ष-से-नीचे | निचले-से-ऊपर, सहकारी संघवाद |
| भूमिका | संसाधन आवंटक | नीति सलाहकार और ज्ञान भागीदार |
| योजना उपकरण | पंचवर्षीय योजनाएँ | स्ट्रैटेजी@75, विज़न दस्तावेज़ |
| राज्य भागीदारी | सीमित | सक्रिय, संचालन परिषद के माध्यम से |
| वित्तीय शक्तियाँ | बजट नियंत्रण था | कोई वित्तीय नियंत्रण नहीं |
भारत की विकास नीति पर प्रभाव:
- राज्य सशक्तिकरण में वृद्धि-
- एसडीजी स्थानीयकरण और आकांक्षात्मक ज़िला कार्यक्रम में राज्यों की सक्रिय भूमिका।
- प्रदर्शन-आधारित रैंकिंग से प्रतिस्पर्धी संघवाद को बढ़ावा।
- साक्ष्य-आधारित और तकनीक-आधारित नीति निर्माण-
- वास्तविक समय डैशबोर्ड का उपयोग (जैसे नीति हेल्थ इंडेक्स, शिक्षा सूचकांक)।
- डेटा-आधारित निर्णय और स्थानीयकृत हस्तक्षेपों को प्रोत्साहन।
- नवाचार और भविष्य की तैयारी-
- एआई, ईवी और डिजिटल इकोनॉमी जैसे अग्रिम नीति क्षेत्रों में अग्रणी।
- अटल इनोवेशन मिशन और India@100 रोडमैप की शुरुआत।
- केंद्र-राज्य तालमेल में सुधार-
- संचालन परिषद की बैठकों से राष्ट्रीय लक्ष्यों के साथ राज्यों का संरेखण।
- तकनीकी और नीति सहायता के माध्यम से राज्य क्षमता निर्माण में मदद।
- विकास के नए मॉडल-
- ‘सनराइज़ सेक्टर्स’ (जैसे सर्कुलर इकोनॉमी, गिग इकोनॉमी, ब्लॉकचेन) पर फोकस।
- राज्यों में नीति मॉडल की पुनरावृत्ति हेतु SITs (State Institution for Transformation) का गठन।
- निजी क्षेत्र व सिविल सोसाइटी की भागीदारी-
- शिक्षा, स्वास्थ्य व बुनियादी ढाँचे में PPP मॉडल को प्रोत्साहन।
- समावेशी शासन हेतु NGO व थिंक टैंकों की भागीदारी।
- बेहतर निगरानी व मूल्यांकन-
- इनपुट आधारित से आउटपुट/आउटकम आधारित निगरानी में बदलाव।
- प्रभाव मूल्यांकन हेतु विकास निगरानी एवं मूल्यांकन कार्यालय (DMEO) की स्थापना।
- आत्मनिर्भरता (आत्मनिर्भर भारत) पर फोकस-
- स्थानीय नवाचार और ‘मेक इन इंडिया’ को नीति मार्गदर्शन से समर्थन।
- COVID-19 आर्थिक पुनरुद्धार योजनाओं में महत्वपूर्ण योगदान।
चुनौतियाँ और आलोचनाएँ:
- वित्तीय शक्तियों की कमी; क्रियान्वयन लागू कराने की शक्ति नहीं।
- मौजूदा मंत्रालयों के साथ कार्यों का ओवरलैप टकराव का कारण बनता है।
- अब भी संस्थागत पहचान और अधिकार का विकासशील चरण।
योजना आयोग से नीति आयोग की ओर संक्रमण भारत की परिपक्व होती लोकतांत्रिक और आर्थिक संरचना को दर्शाता है। यह विकेंद्रीकरण, नवाचार और तात्कालिक डेटा के माध्यम से विकास योजना को नया स्वरूप देता है। यदि नीति आयोग को अधिक कार्यात्मक स्वायत्तता और क्रियान्वयन की शक्ति दी जाए, तो इसका प्रभाव और अधिक बढ़ाया जा सकता है।

