संशोधित PKC-ERCP लिंक परियोजना राजस्थान और मध्य प्रदेश के बीच एक अंतर-राज्यीय नदी जोड़ो परियोजना है, जो पूर्वी राजस्थान में जल की कमी को दूर करने हेतु पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ERCP) को पार्वती-कालीसिंध-चंबल (PKC) लिंक के साथ जोड़ती है।
प्रमुख विशेषताएं
- कवरेज: पूर्वी राजस्थान के 17 जिलों में पेयजल एवं औद्योगिक जल की उपलब्धता सुनिश्चित करती है।
- सिंचाई प्रभाव: 2.51 लाख हेक्टेयर नई सिंचाई क्षमता (2.21 लाख हेक्टेयर प्रत्यक्ष + शोधित अपशिष्ट जल से 30,000 हेक्टेयर) सृजित करती है और मुख्यतः स्प्रिंकलर (सूक्ष्म सिंचाई) प्रणाली से 1.52 लाख हेक्टेयर मौजूदा सिंचित क्षेत्र को पुनर्बहाल करती है।
- लागत: राजस्थान भाग की DPR, जिसकी लागत ₹89,644 करोड़ है, 29 जुलाई 2025 को केंद्रीय जल आयोग को प्रस्तुत की गई।
- प्रगति: नवनेरा बैराज एवं ईसरदा बांध का निर्माण पूर्ण; तीन पैकेजों (रामगढ़ बैराज, महलपुर बैराज, नवनेरा पंप हाउस आदि) पर ₹9,416.70 करोड़ का कार्य जारी; आगे के फीडर/जलाशय कार्यों हेतु ₹13,895 करोड़ के आवंटन पत्र जारी।
- अतिरिक्त विशेषताएं: परियोजना संचालन हेतु सौर ऊर्जा उत्पादन तथा पर्यावरण संरक्षण हेतु नहर किनारे वृक्षारोपण शामिल है।
राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है, लेकिन जल संसाधनों की दृष्टि से यह काफी कमजोर है। देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 10.4% हिस्सा होने के बावजूद, राज्य में उपलब्ध जल संसाधन मात्र 1.16% ही हैं।
वर्तमान स्थिति
- भूजल स्तर में निरंतर गिरावट: पिछले दो दशकों में अत्यधिक निकासी के कारण कई क्षेत्रों में भूजल स्तर 1-2 मीटर प्रति वर्ष की दर से गिर रहा है। जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर और बाड़मेर जैसे जिलों में यह समस्या और गंभीर है।
- अति-शोषण वाले क्षेत्र: राज्य के कई ब्लॉकों को केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा “ओवर-एक्सप्लॉइटेड” घोषित किया गया है। कुल 244 ब्लॉकों में से लगभग 100 से अधिक में भूजल दोहन अनुमत सीमा से ज्यादा है।
- जल की गुणवत्ता: कई क्षेत्रों में भूजल में फ्लोराइड, नाइट्रेट, लवणता और आर्सेनिक की मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक पाई जाती है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
- कृषि पर निर्भरता: सिंचाई के लिए ट्यूबवेलों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जिससे भूजल पर दबाव बढ़ा है।
प्रमुख चुनौतियाँ
- अत्यधिक दोहन: कृषि, घरेलू उपयोग और औद्योगिक जरूरतों के कारण भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है।
- अनियमित वर्षा और जलवायु परिवर्तन: कम वर्षा, बढ़ती गर्मी और अनियमित मानसून भूजल पुनर्भरण को प्रभावित कर रहे हैं।
- प्रदूषण: कृषि रसायनों, औद्योगिक अपशिष्ट और सीवेज के कारण भूजल दूषित हो रहा है।
- तकनीकी और संस्थागत कमियाँ: पुरानी सिंचाई पद्धतियाँ, जागरूकता की कमी और समन्वित प्रबंधन का अभाव।
- जनसंख्या दबाव: बढ़ती आबादी और शहरीकरण से माँग बढ़ रही है, जबकि आपूर्ति सीमित है।
सरकारी प्रयास और समाधान
राज्य सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं। जल जीवन मिशन, अटल भूजल योजना, मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान 2.0, वर्षा जल संचयन संरचनाएँ और सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियाँ (ड्रिप, स्प्रिंकलर) इनमें प्रमुख हैं। भूजल पुनर्भरण के लिए चेक डैम, तालाबों का जीर्णोद्धार और सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।
भारत का सबसे बड़ा राज्य राजस्थान मुख्यतः शुष्क एवं अर्ध-शुष्क है, जहां वर्षा कम एवं अनियमित (औसत ~575 मिमी) होती है। कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और सिंचाई महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भौगोलिक, जलवायुीय एवं मानवीय कारकों से जल संसाधन गंभीर संकट में हैं। सतत प्रबंधन खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका एवं विकसित राजस्थान @2047 के लिए आवश्यक है।
प्रमुख चुनौतियां
- जल की कमी एवं असमान वितरण
- पश्चिमी जिलों (बाड़मेर, जैसलमेर) में तीव्र कमी। भूजल एवं अंतर्संवादी नदियों (इंडस, गंगा प्रणाली) पर निर्भरता। पूर्वी भाग में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति।
- भूजल का अतिकृषण
- सिंचाई में 83% से अधिक जल उपयोग। आधे से अधिक जिलों में अतिकृषण, जल स्तर गिरावट, लवणता व कुओं का सूखना। प्रति व्यक्ति उपलब्धता राष्ट्रीय औसत से कम।
- जल की गुणवत्ता
- फ्लोराइड, लवणता एवं नाइट्रेट प्रदूषण। स्वास्थ्य समस्याएं (फ्लोरोसिस) एवं मिट्टी की उर्वरता ह्रास।
- अक्षम सिंचाई प्रथाएं
- बाढ़ सिंचाई प्रचलित → जल ह्रास, जलजमाव एवं मिट्टी की लवणता। जलवायु परिवर्तन से वाष्पीकरण बढ़ा।
- कार्यान्वयन एवं नीतिगत चुनौतियां
- पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ERCP) जैसी परियोजनाओं में विलंब। अंतरराज्यीय विवाद, अपर्याप्त धनराशि।
- जलवायु परिवर्तन
- अनियमित मानसून, सूखा एवं तापमान वृद्धि।
सतत जल प्रबंधन के उपाय
- कुशल सिंचाई प्रौद्योगिकी
- ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई का विस्तार (PMKSY, राजस्थान कृषि इंफ्रा मिशन)। दक्षता 30-40% से बढ़ाकर 70-80% करना।
- वर्षा जल संचयन एवं जलसंभर प्रबंधन
- पारंपरिक संरचनाओं (जोहड़, फार्म पॉन्ड) का पुनरुद्धार। मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान का विस्तार।
- भूजल नियमन एवं पुनर्भरण
- राजस्थान राज्य जल नीति का सख्ती से क्रियान्वयन। कृत्रिम पुनर्भरण, छत संचयन। वॉल्यूमेट्रिक मूल्य निर्धारण।
- नहर आधुनिकीकरण
- ERCP पूर्ण करना। नहर लाइनिंग। सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई एवं पाइपलाइन।
- फसल पैटर्न परिवर्तन
- कम पानी वाली फसलों (बाजरा, दालें) को प्रोत्साहन। सटीक कृषि एवं ड्रोन उपयोग।
- संस्थागत एवं तकनीकी उपाय
- जल उपयोग दक्षता ब्यूरो। रिमोट सेंसिंग (SRSAC)। जल उपयोगकर्ता समितियां। जल जीवन मिशन एवं अतल भूजल योजना से एकीकरण।
जल की कमी राजस्थान की कृषि वृद्धि की बाधा है। प्रौद्योगिकी, पारंपरिक ज्ञान, समुदाय भागीदारी एवं मजबूत शासन से सतत प्रबंधन संभव है। इससे उत्पादकता बढ़ेगी एवं जलवायु प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होगी।
