हाल ही में, 22वें विधि आयोग ने भारत में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने पर नए सिरे से विचार मांगे हैं। समान नागरिक संहिता भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 (राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत) में उल्लिखित है, जिसमें कहा गया है: “राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।”
- यूसीसी: वर्तमान में, भारतीय निजी क़ानून काफी जटिल है, जिसमें प्रत्येक धर्म अपने विशिष्ट कानूनों का पालन करता है। समान नागरिक संहिता पूरे देश के लिए एक कानून प्रदान करेगी, जो सभी धार्मिक समुदायों पर उनके व्यक्तिगत मामलों जैसे विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने आदि पर लागू होगा।
लाभ | क्रियान्वयन में चुनौतियाँ |
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भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार (Part III) और राज्य के नीति निदेशक तत्व (Part IV) के रूप में दो महत्वपूर्ण भाग हैं।
- मौलिक अधिकार न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय (justiciable) हैं और नागरिकों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता व समानता सुनिश्चित करते हैं।
- नीति निदेशक तत्व गैर-न्यायिक (non-justiciable) हैं, लेकिन ये सामाजिक-आर्थिक न्याय व कल्याणकारी राज्य की दिशा में मार्गदर्शक हैं।
इन दोनों के बीच अन्तःक्रिया (interplay) प्रारंभिक समय में संघर्षमय रही, लेकिन न्यायपालिका ने समय के साथ संतुलन स्थापित किया।
संघर्ष के मुख्य बिंदु:
1. प्रारंभिक वर्षों में मौलिक अधिकारों की प्रधानता:
- चम्पकम दोरैराजन मामला (1951):
अनुच्छेद 15 के उल्लंघन पर जाति आधारित आरक्षण को असंवैधानिक ठहराया गया।
➤ न्यायालय ने कहा कि नीति निदेशक तत्व, मौलिक अधिकारों को वरीयता नहीं दे सकते।
2. पहला संविधान संशोधन (1951):
➤ अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया जिससे पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की अनुमति मिली। यह DPSPs की रक्षा की दिशा में कदम था।
3. संपत्ति अधिकार विवाद:
- भूमि सुधार कानूनों को लागू करने में नीति निदेशक तत्वों (जैसे अनुच्छेद 39(b), (c)) और संपत्ति के अधिकार (अनुच्छेद 31, अब हटाया गया) में टकराव हुआ।
- संसद ने अनुच्छेद 31A, 31B व नवीं अनुसूची जोड़ी जिससे ऐसे कानून न्यायिक समीक्षा से बाहर हो सकें।
न्यायिक विकास और संतुलन की स्थापना:
1. गोलकनाथ मामला (1967):
➤ संविधान संशोधन द्वारा मौलिक अधिकारों को नहीं बदला जा सकता।
➤ इससे संसद की शक्ति सीमित हुई और न्यायपालिका सर्वोच्च बनी।
2. केशवानंद भारती मामला (1973):
➤ बुनियादी ढांचे का सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) स्थापित हुआ।
➤ संसद संशोधन कर सकती है, पर संविधान की मूल भावना को क्षति नहीं पहुँचा सकती।
3. मिनर्वा मिल्स मामला (1980):
➤ 42वें संशोधन में DPSPs को FRs से ऊपर रखने का प्रयास असंवैधानिक ठहराया गया।
➤ न्यायालय ने कहा, दोनों में संतुलन ही संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है।
4. उन्नी कृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश (1993):
➤ शिक्षा का अधिकार, अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार में शामिल किया गया।
➤ परिणामस्वरूप, 86वां संविधान संशोधन हुआ और अनुच्छेद 21A जोड़ा गया।
5. ओल्गा टेलिस मामला (1985):
➤ जीविका का अधिकार भी जीवन के अधिकार का हिस्सा माना गया, जो नीति निदेशक तत्वों (अनु. 39(a)) से प्रेरित था।
सहयोगात्मक दृष्टिकोण (Complementarity):
- नीति निदेशक तत्वों ने मौलिक अधिकारों की व्याख्या व विस्तार में भूमिका निभाई है।
- जनहित याचिकाओं के माध्यम से न्यायपालिका ने अनेक DPSPs को मौलिक अधिकारों में समाहित किया है (जैसे: पर्यावरण, स्वास्थ्य, रोजगार)।
चुनौतियाँ:
- न्यायिक सक्रियता से कभी-कभी अधिकारों और नीति तत्वों की सीमाएं धुंधली होती हैं।
- संसद DPSPs का उपयोग कर कभी-कभी FRs को प्रतिबंधित करने का प्रयास करती है।
मौलिक अधिकार और नीति निदेशक तत्व संविधान की आत्मा के दो पहिये हैं। न्यायपालिका ने केशवानंद भारती और मिनर्वा मिल्स जैसे मामलों के माध्यम से दोनों के बीच संतुलन स्थापित कर, संविधान के मूल ढांचे की रक्षा की है।
आज आवश्यकता है कि इन दोनों को पूरक दृष्टिकोण से देखा जाए, ताकि भारत न्यायपूर्ण, समतामूलक और कल्याणकारी राज्य की दिशा में आगे बढ़ सके।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘लोकतांत्रिक’ शब्द का अर्थ न केवल राजनीतिक लोकतंत्र है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र भी है।
राजनीतिक लोकतंत्र: यह सुनिश्चित करता है कि सत्ता लोगों के पास हो।
- सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (अनुच्छेद 326): 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी नागरिकों के लिए मतदान का अधिकार सुनिश्चित करता है।
- चुनाव और प्रतिनिधित्व (अनुच्छेद 324-329): नियमित चुनाव सुनिश्चित करते हैं कि लोग अपने प्रतिनिधि चुनें।
- मौलिक अधिकार (भाग III, अनुच्छेद 12-35): कानून के समक्ष समानता (14), अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) आदि जैसे अधिकारों की गारंटी देता है।
- स्वतंत्र न्यायपालिका (अनुच्छेद 124-147): मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 32) के प्रवर्तन के लिए उपाय और कानून का शासन सुनिश्चित करता है।
सामाजिक लोकतंत्र: समानता और सामाजिक न्याय पर ध्यान केंद्रित करता है, जिसका उद्देश्य असमानताओं को कम करना है।
- राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत (डीपीएसपी): सामाजिक और आर्थिक न्याय प्राप्त करने के लिए दिशा-निर्देश। (भाग IV, अनुच्छेद 36-51)
- धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध। (अनुच्छेद 15)
- आरक्षण नीतियाँ: सीमांत समूहों के लिए शिक्षा और नौकरियों में कोटा प्रदान करती हैं। (अनुच्छेद 15(4),15(5), 15(6) 16(4), 16 (6), 46)
- अस्पृश्यता का उन्मूलन: जाति के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है। (अनुच्छेद 17)
- उपाधियों का उन्मूलन- कोई भी उपाधि, जो सैन्य या शैक्षणिक सम्मान से इतर हो, राज्य द्वारा प्रदान नहीं की जाएगी। (अनुच्छेद 18)
- अल्पसंख्यकों के अधिकार: अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की रक्षा करता है। (अनुच्छेद 29-30)
- नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता: राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा (अनुच्छेद 44)
- श्रमिकों के स्वास्थ्य, शक्ति की रक्षा करता है और बाल श्रम को रोकता है। (अनुच्छेद 39 (e))
आर्थिक लोकतंत्र: आर्थिक निर्णय लेने में श्रमिक और समुदाय की भागीदारी पर जोर देना, समानता को बढ़ावा देना, असमानता को कम करना।
- सार्वजनिक रोजगार के मामलों में अवसर की समानता (अनुच्छेद 16)
- न्यूनतम असमानताएँ: राज्य आय में असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा, तथा स्थिति, सुविधाओं और अवसरों में असमानताओं को समाप्त करने का प्रयास करेगा (अनुच्छेद 38 (2))
- सामुदायिक संसाधनों का वितरण: अनुच्छेद 39 (b) राज्य को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देता है कि भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण आम भलाई के लिए वितरित किया जाए।
- धन संकेन्द्रण की रोकथाम: अनुच्छेद 39 (c) आजीविका के पर्याप्त साधनों का अधिकार: अनुच्छेद 39 (a) यह सुनिश्चित करता है कि नागरिकों, पुरुषों और महिलाओं दोनों को आजीविका के पर्याप्त साधनों का अधिकार है।
- समान कार्य के लिए समान वेतन: अनुच्छेद 39 (d) पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन का आदेश देता है।
- श्रमिकों के अधिकार: काम की न्यायसंगत और मानवीय स्थिति और मातृत्व राहत (अनुच्छेद 42) और जीवन निर्वाह मजदूरी (अनुच्छेद 43) सुनिश्चित करता है।
- भूमि सुधार: कुछ अधिनियमों और विनियमों का सत्यापन। (नौवीं अनुसूची और अनुच्छेद 31(b))
इस प्रकार, भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना करते हैं, जबकि निर्देशक सिद्धांत आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना करते हैं। ये प्रावधान सभी नागरिकों के लिए राजनीतिक भागीदारी, सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता सुनिश्चित करते हैं, तथा न्यायपूर्ण और समावेशी समाज की दिशा में प्रयास करते हैं।
