भारतीय समाज के समक्ष चुनौतियाँ एवं मुद्दे – दहेज, तलाक, भ्रष्घाचार, गरीबी, वेश्वावृत्ति, बेरोजगारी और नशाखोरी

Sol –

  • दहेज निषेध अधिनियम, 1961: दहेज देना, लेना, या देने या लेने के लिए उकसाना अपराध माना गया है। (बीएनएस में धारा 85 और 86) → न्यूनतम पांच साल की जेल और कम से कम 15,000 रुपये का जुर्माना या दी गई दहेज की राशि
  • धारा 498ए, भारतीय दंड संहिता: दहेज के लिए किसी महिला का उत्पीड़न अपराध माना गया है।
  • धारा 304बी, भारतीय दंड संहिता: “दहेज मृत्यु” को परिभाषित करती है। (भारतीय न्याय संहिता की धारा 80)
  • घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005: कानूनी सुरक्षा की एक और परत प्रदान करता है।
  • राजस्थान दहेज निषेध नियम, 2004 → सरकारी सेवक घोषणाएँ

Sol –

दहेज प्रथा एक सामाजिक बुराई है जो महिलाओं के लिए गंभीर समस्याएं पैदा करती है । जैसे:-

नकारात्मक प्रभाव:

  1. हिंसा और मृत्यु: दहेज की माँग पूरी न होने पर हिंसा और आत्महत्या (उदाहरण: विस्मया मामला, 2021)।
  2. आर्थिक बोझ: गरीब परिवार कर्ज़ में डूब जाते हैं।
  3. लैंगिक भेदभाव: बेटियों की बजाय बेटों को प्राथमिकता, कन्या भ्रूण हत्या (जैसे हरियाणा का असंतुलित लिंगानुपात)।
  4. देर से विवाह: दहेज न दे पाने पर लड़कियाँ अविवाहित रह जाती हैं।
  5. मानसिक तनाव: उत्पीड़न से अवसाद, आत्महत्या जैसी समस्याएँ।
  6. शिक्षा में कमी: लड़कियों की पढ़ाई से ज्यादा दहेज के लिए बचत को महत्व।
  7. असमानता: स्त्रियों को बोझ समझा जाता है, जिससे लैंगिक असमानता बढ़ती है।

समाधान :

  • महिला सशक्तिकरण: लड़कियों की शिक्षा, कौशल विकास और रोज़गार को बढ़ावा दें।
  • दहेज-मुक्त विवाह: मानसिकता में बदलाव लाएं, “दुल्हन ही दहेज है” को बढ़ावा दें।
  • वर पक्ष की सोच बदलें: लड़कों और उनके परिवारों में संवेदनशीलता और ईमानदारी विकसित करें।
  • सामुदायिक अभियान: दहेज की नैतिक, कानूनी और सामाजिक हानियों के प्रति जागरूकता फैलाएँ।
  • कानूनों का सख्ती से पालन:
    • दहेज निषेध अधिनियम (1961): दहेज लेना/देना/माँगना अपराध; गैर-जमानती और गंभीर अपराध।
    • IPC 304B / BNS 80: दहेज मृत्यु (7 वर्ष से आजीवन कारावास)।
    • IPC 498A / BNS 85-86: दहेज उत्पीड़न व क्रूरता के खिलाफ।
    • घरेलू हिंसा अधिनियम (2005): महिलाओं को दहेज से जुड़ी हिंसा से संरक्षण।
  • अंतरजातीय/प्रेम विवाह को प्रोत्साहन: दोनों पक्षों को साथी चुनने की आज़ादी मिलनी चाहिए।

Sol –

2017 में, सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने तत्काल तीन तलाक की प्रथा को असंवैधानिक घोषित कर दिया, और सरकार से इसके खिलाफ कानून बनाने का आग्रह किया।

  फैसले का महत्व:

  1. तत्काल तीन तलाक को अमान्य करना
  2. लैंगिक समानता को बढ़ावा देना: अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार की रक्षा करना – पहले, एक मुस्लिम पुरुष तीन बार “तलाक” बोलकर अपनी पत्नी को तलाक दे सकता था, जबकि महिलाओं में इस क्षमता का अभाव था।
  3. मुस्लिम महिलाओं का सशक्तिकरण:
  4. इस प्रथा को इस्लाम की आवश्यक प्रथा के रूप में मान्यता नहीं दी गई
  5. अदालत ने निर्देश दिया कि नागरिकों के कल्याण पर नकारात्मक प्रभाव डालने वाली ऐसी प्रथाएं अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित नहीं हैं।
  6. महिलाओं की गरिमा (अनुच्छेद 21): इस बात पर जोर देना कि लैंगिक समानता और महिलाओं की गरिमा पर समझौता नहीं किया जा सकता।
  7. अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव – पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे कई इस्लामी देशों के साथ तालमेल बिठाना, जिन्होंने पहले ही इस प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया है।

Sol –

2 मार्क्स में केवल नाम काफ़ी है….

कानूनी ढांचा

विनियामक ढांचा

कानूनी ढांचा:

  • भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 लोक सेवकों द्वारा भ्रष्टाचार के संबंध में और उन लोगों के लिए भी दंड का प्रावधान करता है जो भ्रष्टाचार के कृत्य को बढ़ावा देने में शामिल हैं।
  • 2018 के संशोधन ने लोक सेवकों द्वारा रिश्वत लेने के साथ-साथ किसी भी व्यक्ति द्वारा रिश्वत देने दोनों को अपराध घोषित कर दिया।
  • धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) 2002 का उद्देश्य मनी लॉन्ड्रिंग की घटनाओं को रोकना है और भारत में ‘अपराध की आय’ के उपयोग पर रोक लगाना है।
  • कंपनी अधिनियम, 2013 कॉर्पोरेट प्रशासन और कॉर्पोरेट क्षेत्र में भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी की रोकथाम प्रदान करता है।
  • भारतीय दंड संहिता, 1860बेनामी लेनदेन (निषेध) अधिनियम, 1988

विनियामक ढांचा

  • लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013
    • वे एक “लोकपाल” का कार्य करते हैं और कुछ सार्वजनिक पदाधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों और संबंधित मामलों की जांच करते हैं।
  • केंद्रीय सतर्कता आयोग: इसका कार्य सतर्कता प्रशासन की निगरानी करना और भ्रष्टाचार से संबंधित मामलों में कार्यपालिका को सलाह देना और सहायता करना है।
  • आयकर जांच महानिदेशालय
  • केंद्रीय जांच ब्यूरो

Sol –

भारत में भ्रष्टाचार की व्यापकता में योगदान देने वाले समाजशास्त्रीय कारक

  1. पारदर्शिता का अभाव: छिपी हुई सरकारी प्रक्रियाएँ भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती हैं।
  2. कमज़ोर संस्थाएँ: अप्रभावी कानून प्रवर्तन भ्रष्टाचार को दंडित करने में विफल रहता है।
  3. दंड से बचने की धारणा: दंड से बचने की धारणा भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है।
  4. कम वेतन: सरकारी अधिकारी आय बढ़ाने के लिए रिश्वत ले सकते हैं।
  5. नौकरशाही लालफीताशाही: जटिल प्रक्रियाएँ लोगों को रिश्वत देने के लिए मजबूर करती हैं।
  6. जटिल आर्थिक वातावरण: कई परमिट व्यवसाय में रिश्वतखोरी को बढ़ावा देते हैं।
  7. राजनीतिक हस्तक्षेप: राजनेता अधिकारियों पर भ्रष्ट कार्य करने के लिए दबाव डालते हैं।
  8. मुखबिर सुरक्षा का अभाव: प्रतिशोध के डर से रिपोर्ट नहीं दी जाती।
  9. सामाजिक असमानता: शक्तिशाली व्यक्तियों द्वारा भ्रष्ट कार्यों के लिए अपने  प्रभाव का उपयोग। 
  10. स्वीकार्यता: भ्रष्टाचार को “हर कोई करता है” के रूप में सामान्य माना जाना।

Solution

भ्रष्टाचार का सांस्कृतिक विचलन सिद्धांत

  • भ्रष्टाचार तब होता है जब समाज के मूल्य गलत प्रथाओं जैसे रिश्वतखोरी और पक्षपात को सामान्य रूप से स्वीकार करते हैं।
  • सामाजिक स्वीकृति → नैतिक निंदा का अभाव→ भ्रष्टाचार एक आदत बन जाता है।
  • व्यक्ति सामाजिक स्वीकृति और सफलता के लिए इन विकृत सांस्कृतिक मानदंडों के अनुरूप व्यवहार करते हैं।
  • भ्रष्टाचार को केवल व्यक्तिगत नैतिक विफलता नहीं, बल्कि एक सामूहिक सांस्कृतिक पैटर्न के रूप में देखा जाता है।
  • भ्रष्टाचार इसलिए सामान्य हो जाता है क्योंकि परिवार, सहकर्मी और संस्थान इसका प्रबल विरोध नहीं करते।
  • यह दर्शाता है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है → कानूनों के साथ-साथ सांस्कृतिक सुधार की भी आवश्यकता है।

भ्रष्टाचार एक आर्थिक अपराध और एक सामाजिक समस्या है। चर्चा कीजिए

Sol –

आर्थिक अपराध के रूप में भ्रष्टाचार

सामाजिक समस्या के रूप में भ्रष्टाचार

सार्वजनिक धन का दुरुपयोग: विकास निधियों की घूस और गबन के ज़रिए हेराफेरी।

जनता का विश्वास कमजोर: सरकार में भरोसा घटता है, जिससे विरोध और अशांति बढ़ती है।

निवेश में कमी: निवेशक भ्रष्ट देशों से बचते हैं, जिससे आर्थिक विकास प्रभावित होता है।

असमानता को बढ़ावा: गरीब वर्ग भ्रष्टाचार से अधिक पीड़ित होता है।

काला धन और समानांतर अर्थव्यवस्था: बेहिसाब संपत्ति का निर्माण, कर संग्रह में कमी।

भाई-भतीजावाद को बढ़ावा: योग्यता की अनदेखी कर सिफारिश और संबंधों को तरजीह।

संसाधनों का गलत आवंटन: योजनाएं जन-हित के बजाय घूस के आधार पर दी जाती हैं।

नैतिक ह्रास: भ्रष्टाचार सामाजिक रूप से स्वीकृत बनता है, नैतिक मूल्य कमजोर होते हैं।

सेवा वितरण में अक्षमता: योजनाओं का लाभ पात्र व्यक्तियों तक नहीं पहुँचता।

संस्थाओं की कमजोरी: न्यायपालिका, चुनाव और पुलिस जैसी संस्थाओं की साख घटती है।

गरीबी का दुष्चक्र सिद्धांत तर्क देता है कि गरीबी का कारण बनने वाले विभिन्न कारक इस तरह से काम करते हैं कि एक गरीब व्यक्ति कभी भी उनसे बाहर नहीं निकल सकता है। उदाहरण के लिए – बेरोजगारी गरीबी को जन्म देती है, गरीब लोगों को अच्छी शिक्षा नहीं मिल सकती, अच्छी शिक्षा के बिना कोई रोजगार नहीं है। 

यह  एक सकारात्मक प्रतिक्रिया प्रणाली के रूप में कार्य करती है, जहां गरीबी की प्रारंभिक अवस्था ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करती है, जिनसे इससे बाहर निकलना कठिन होता जाता है, और इस प्रकार गरीबी पीढ़ियों तक कायम रहती है।

Sol –

गरीबी एक जटिल सामाजिक मुद्दा है जो केवल आर्थिक अभाव से कहीं आगे तक फैला हुआ है। यह सामाजिक बहिष्कार से जटिल रूप से जुड़ा हुआ है, जो विभिन्न आयामों में प्रकट होता है।

  • आर्थिक अभाव→ भोजन और आश्रय जैसी बुनियादी ज़रूरतों का अभाव→भारत में पाँच वर्ष से कम आयु के 35% बच्चे स्टंटिंग का शिकार है (NFHS-5)
  • सीमित शिक्षा→ गरीबी अच्छी शिक्षा तक पहुँच को सीमित करती है→गरीब बच्चे कम वित्तपोषित स्कूलों में जाते हैं।
  • सामाजिक पूंजी से वंचित होना → निम्न सामाजिक स्थिति के कारण नेटवर्क कमजोर →कम अवसर 
  • राजनीतिक पूंजी से वंचित होना → निर्णय लेने की  प्रक्रिया में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व।
  • स्वास्थ्य असमानताएँ→ सीमित स्वास्थ्य सेवा के कारण स्वास्थ्य की कम देखभाल → केवल 19.7% ग्रामीण आबादी और 30.1% शहरी आबादी के पास स्वास्थ्य बीमा था (NSSO)।
  • रोज़गार भेदभाव→नौकरी में भेदभाव और कम मज़दूरी→PLFS अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के बीच उच्च बेरोज़गारी दर दिखाता है, जो सीमित रोज़गार अवसरों का संकेत देता है।
  • सामाजिक कलंक→ गरीबी कलंक और बहिष्कार का कारण बनती है→25% बेघर व्यक्तियों को भेदभाव का सामना करना पड़ा
  • कानूनी और राजनीतिक बहिष्कार→ नागरिक प्रक्रियाओं में सीमित भागीदारी और कानूनी प्रतिनिधित्व तक पहुँच
  • सांस्कृतिक अलगाव और डिजिटल विभाजन→ सांस्कृतिक अलगाव की ओर ले जाता है→ इंटरनेट तक पहुँच नहीं। केवल 14.9% ग्रामीण परिवारों (NSSO) के पास इंटरनेट।

Sol –

पहलू

संरचनात्मक बेरोजगारी

चक्रीय बेरोजगारी

परिभाषा

यह तब होती है जब बाज़ार में उपलब्ध नौकरियों और बेरोज़गार आबादी के पास मौजूद कौशल के बीच अंतर होता है।

आर्थिक मंदी और वस्तुओं और सेवाओं की मांग में कमी से संबंधित बेरोज़गारी।

कारण 

अर्थव्यवस्था में दीर्घकालिक परिवर्तन, जैसे तकनीकी प्रगति या उद्योग में बदलाव।

अर्थव्यवस्था में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव, जैसे मंदी या आर्थिक सुस्ती।

प्रभाव 

दीर्घकालिक बेरोजगारी पैदा करता है जो अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण पुनर्प्रशिक्षण या बदलाव के बिना नहीं सुधर सकती।

अस्थायी बेरोज़गारी का कारण बनता है जो आर्थिक स्थितियों में सुधार के साथ कम हो जाती है।

उदाहरण 

आईटी क्षेत्र के उदय ने उपयुक्त कौशल की कमी के कारण कई पारंपरिक श्रमिकों को बेरोजगार बना दिया।

कोविड-19 महामारी के कारण मांग में कमी से खुदरा और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में नौकरियाँ चली गईं।

भारत दो सबसे बड़े अफीम उत्पादक क्षेत्रों के बीच स्थित है: गोल्डन ट्रायंगल (थाईलैंड, म्यांमार, लाओस, वियतनाम) और गोल्डन क्रिसेंट (पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान)।

  • जनस्वास्थ्य संकट: भारत में 2.1% लोग ओपिओइड्स का उपयोग करते हैं (2018 अध्ययन)।
  • आंतरिक सुरक्षा को  खतरा:
    • भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में सीमा पर कच्चे मार्गों के कारण ड्रग तस्करी रोकना मुश्किल है।
    • ड्रग व्यापार से आतंकवाद और उग्रवाद को वित्तीय सहायता मिलती है, जिससे आंतरिक सुरक्षा को खतरा होता है।
    • पूर्वोत्तर भारत के बच्चे ड्रग तस्करों के रूप में उपयोग किए जाते हैं (झूठे आजीविका के वादे)।
    • अर्थव्यवस्था को क्षति : कालाबाजारी को बढ़ावा , अफीम की लत लोगों की उत्पादकता कम करती है।

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