भारतीय वास्तुकला (सिंधु सभ्यता से ब्रिटिश काल तक)

खजुराहो के मंदिर (9वीं–11वीं शताब्दी ई., चंदेल वंश द्वारा निर्मित, मध्य प्रदेश) यूनेस्को सूचीबद्ध नागर शैली के अद्भुत उदाहरण हैं। इनकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:

  • नागर शैली:
    • मंदिरों में वक्राकार शिखर (जैसे कंदारिया महादेव मंदिर का 31 मीटर ऊँचा शिखर और 84 छोटे शिखर) प्रमुख हैं।
    • मंदिर उच्च मंच (जगती) पर बने हैं, जैसे लक्ष्मण मंदिर का 3.5 मीटर ऊँचा मंच।
    • कई मंडप (प्रवेश मंडप, सभा मंडप), जैसे विश्वनाथ मंदिर में।
  • सूक्ष्म नक्काशी:
    • इन मंदिरों में 30,000 से अधिक बलुआ पत्थर की मूर्तियाँ हैं; जिनमें लगभग 10% मूर्तियाँ कामकला (कंदारिया महादेव में 870+ मूर्तियाँ) से संबंधित हैं।
    • बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं, गंधर्वों, नर्तकियों, संगीतकारों, पशुओं और दैनिक जीवन के दृश्यों की आकृतियाँ उकेरी गई हैं।
  • कामकला मूर्तियाँ:
    • ये मूर्तियाँ उर्वरता, जीवन की सृजनात्मक शक्ति और आध्यात्मिक एकता का प्रतीक हैं।
  • योजना एवं संरचना:
    • पंचायतन योजना (जैसे लक्ष्मण मंदिर) और पूर्वाभिमुखी संरचना (जैसे चित्रगुप्त मंदिर)।
    • पश्चिमी समूह सबसे बड़ा (6 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ)।
    • नक्काशीदार स्तंभ, कमल आकृति वाली छतें (आदिनाथ जैन मंदिर) और तारा-आकार का आधार (चतुर्भुज मंदिर)।
  • निर्माण सामग्री:
    • ये मंदिर मुख्यतः बलुआ पत्थर से बने हैं, जो सूक्ष्म नक्काशी और बिना गारे के पत्थर जोड़ों को संभव बनाते हैं।
  • प्रतीकात्मकता और समन्वय:
    • ये मंदिर पौराणिक माउंट मेरू का प्रतीक माने जाते हैं, जिसे विश्व का धुरी माना जाता है।
    • यहाँ 80% हिंदू (शैव, वैष्णव, शक्त) और 20% जैन मंदिर हैं, जो धार्मिक सहिष्णुता और समन्वय को दर्शाते हैं।
  • निर्माणकर्ता – सम्राट अशोक (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व   
  • स्थान – सांची, मध्य प्रदेश
  • वास्तुकला – एक विशाल अर्धगोलाकार गुम्बद (अंडा), जो ब्रह्मांड का प्रतीक है
  • केंद्रीय अवशेष कक्ष – पवित्र बौद्ध अवशेषों को संजोए हुए
  • तोरण (द्वार) – चार सुंदर नक्काशीदार द्वार, जो जातक कथाओं और बुद्ध के जीवन को दर्शाते हैं
  • हर्मिका – शीर्ष पर स्थित चौकोर वेदिका, जो स्वर्ग का प्रतीक है
  • छत्र (छत्राकार संरचना) – उच्च पद और संरक्षण का प्रतीक
  • वेदिका (पत्थर की बाड़) – स्तूप को घेरकर पवित्र क्षेत्र को सांसारिक क्षेत्र से अलग करती है
Sanchi Stupa History of India

अकबर (1556–1605) ने मुगल स्थापत्य कला को एक नई दिशा दी और इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया।

मुख्य विशेषताएँ:
  • स्थापत्य शैली में स्वदेशी, फारसी, मध्य एशियाई और तैमूरी प्रभावों का समन्वय।
  • लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का व्यापक उपयोग।
  • स्थापत्य में “ट्यूडर आर्च” (चार केंद्रित मेहराब) का प्रयोग।
प्रमुख निर्माण कार्य:

1. किले:

  • अकबर ने कई किले बनवाए — इनमें आगरा का किला प्रमुख है, जो लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है (भीतर चारबाग शैली का बाग़)।
  • अन्य किले: लाहौर, इलाहाबाद, अजमेर (मैगज़ीन किला)

2. फतेहपुर सीकरी:

  • इसे “इतिहास में जमी हुई घड़ी” कहा जाता है क्योंकि यहां की इमारतें हिन्दू और फारसी स्थापत्य का अद्भुत मेल हैं।
  • यह एक राजमहल-सह-किला परिसर है, जिसे “विजय की नगरी” के रूप में स्थापित किया गया था।
  • इस परिसर में गुजराती और बंगाली शैली की कई इमारतें पाई जाती हैं।
  • सबसे भव्य निर्माण जामा मस्जिद और उसका प्रवेश द्वार बुलंद दरवाज़ा है, जिसकी ऊँचाई 176 फीट है। इसे गुजरात पर विजय की स्मृति में बनवाया गया था।
  • अन्य महत्वपूर्ण इमारतें: जोधाबाई का महल, पंच महल (पाँच मंज़िला), इबादत खाना, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, शेख़ सलीम चिश्ती की दरगाह।

3. अन्य निर्माण:

  • हुमायूँ का मकबरा (दिल्ली): इसमें संगमरमर का विशाल गुम्बद है। इसे ताजमहल का पूर्ववर्ती माना जाता है।
  • नीलकंठ मंदिर / इमारत-ए-दिलख़ुशा (मांडू): इसे अकबर के आदेश पर 1574 ई. में सूबेदार शाह बड़गाह ने बनवाया था।
  • वृंदावन में गोविंद देव मंदिर: राजा मानसिंह व अकबर ने मिलकर निर्माण कराया।
निष्कर्ष:

अकबर के काल में मुग़ल स्थापत्य कला ने सांस्कृतिक समन्वय की एक नई मिसाल पेश की। उन्होंने वास्तुकला को धार्मिक, क्षेत्रीय व विदेशी प्रभावों से जोड़ते हुए एक सर्वसमावेशी शैली विकसित की, जिसकी छाप आज भी देखी जा सकती है।

विशेषताएँ  पारंपरिक भारतीय  वास्तुकला  इंडो-इस्लामिक वास्तुकला
वास्तु -प्रभावनागरा और द्रविड़ियन जैसी क्षेत्रीय शैलियों से प्रभावितफारसी, तुर्की और भारतीय शैलियों का एक मिश्रण
सामग्री उपयोगज्यादातर पत्थर का उपयोग करके निर्मितलाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का उपयोग
सजावटी तत्वमूर्तियों, मूर्तियों और देवताओं और जानवरों के रूपांकनों से सजाया गयाज्यामितीय पैटर्न, पुष्प डिजाइन और कुरान की छंद के साथ सजाया गया
मेहराब और गुंबदमुख्य रूप से मंदिरों में लिनटेल्स और बीम का उपयोगलिनटेल और बीम स्टाइल की जगह मेहराब और गुंबदों का उपयोग
छतशिखरा शैली (पिरामिड या घुमावदार)बड़ी गुंबद वाली छतें (ताजमहल) 
उद्यान और आंगनसरल मंदिर के आंगन, कोई उद्यान नहीं              चारबाग शैली 
उदाहरणकांदरिया महादेव मंदिर, खजुराहो, सोमनाथ मंदिर, कोर्णाकसूर्य मंदिर आदि।ताजमहल, हुमायूं का मकबरा, गोल गुंबज़, कुतुब मीनार, जामा मस्जिद, फतेहपुर सीकरी, अलाई दारवाजा आदि।

भारत का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) के जन्म के साथ प्रारंभ होता है, जो लगभग 2500 ईसा पूर्व में वर्तमान पाकिस्तान और पश्चिमी भारत में फली-फूली। यह विश्व की प्रारंभिक नगरीय सभ्यताओं में से एक थी, जो अपनी उन्नत नगर योजना, स्थापत्य कला, जल निकासी प्रणाली, एवं कलात्मक उपलब्धियों के लिए प्रसिद्ध थी।

सिंधु घाटी सभ्यता: एक उन्नत नगरीय समाज
  • सुव्यवस्थित नगर और ग्रिड प्रणाली
    • हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, एवं धोलावीरा जैसे नगर ग्रिड पैटर्न पर निर्मित थे, जिनमें योजनाबद्ध रूप से सड़कों और इमारतों का निर्माण किया गया था।
    • सड़कें चौड़ी थीं और समकोण (right angle) पर एक-दूसरे को काटती थीं
    • आवासीय और सार्वजनिक क्षेत्रों को अलग-अलग रखा गया था।
  • उन्नत जल निकासी और स्वच्छता प्रणाली
    • ढकी हुई नालियाँ, सोखता गड्ढे (soak pits), एवं सार्वजनिक स्नानागार (जैसे मोहनजोदड़ो का महान स्नानागार) जल निकासी और स्वच्छता के प्रति जागरूकता दर्शाते हैं।
    • घरों में व्यक्तिगत स्नानघर और निकास नालियाँ थीं, जो उच्च स्तरीय स्वच्छता का प्रमाण हैं।
  • मानकीकृत निर्माण सामग्री
    • समान आकार की पकी हुई ईंटों का उपयोग किया जाता था, जो उन्नत निर्माण तकनीकों को दर्शाता है।
    • आंगन वाले बहु-कक्षीय मकान  विकसित गृह वास्तुकला को इंगित करते हैं।
  •  अन्नागार और सार्वजनिक संरचनाएँ
    • हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के विशाल अन्नागार संगठित खाद्य भंडारण प्रणाली को दर्शाते हैं।
    • लोथल में डॉकयार्ड समुद्री व्यापार के प्रारंभिक संकेत देते हैं।

भारतीय कला एवं वास्तुकला का प्रारंभिक केंद्र

  • मूर्तिकला और मिट्टी की प्रतिमाएँ
    • “नृत्यांगना” (मोहनजोदड़ो) कांस्य निर्मित मूर्ति, जो धातुकर्म और कलात्मक अभिव्यक्ति को दर्शाती है।
    • “याजक-राजा” (Priest-King) की मूर्ति, जो सजीवता, सूक्ष्म नक्काशी, और सौंदर्यबोध का उदाहरण है।
    • पशु आकृतियों और माता देवी (Mother Goddess) की मिट्टी की मूर्तियाँ, धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रतीकों को दर्शाती हैं।
  • मुद्राएँ और प्रारंभिक प्रतीकात्मकता
    • सिंधु मुद्राएँ (स्टियाटाइट निर्मित) जिनमें एक सींग वाला बैल, हाथी, एवं अन्य पशु आकृतियाँ उकेरी गई हैं।
    • “पशुपति मुद्रिका”, जिसमें तीन-मुखी आकृति चारों ओर पशुओं से घिरी हुई है, हिंदू धर्म की प्रारंभिक जड़ों का संकेत देती है।
  • मिट्टी के बर्तन और कलात्मक अभिव्यक्ति
    • काले और लाल रंग से चित्रित मृद्भांड (pottery) जिनमें ज्यामितीय और पुष्पीय डिज़ाइन उकेरे गए थे।
    • चमकदार (glazed) एवं छिद्रित (perforated) मृद्भांड, तकनीकी कौशल को दर्शाते हैं।
  • धार्मिक एवं सार्वजनिक संरचनाओं की वास्तुकला
    • मोहनजोदड़ो का “महान स्नानागार”, जिसे किसी धार्मिक अनुष्ठान के लिए उपयोग किया जाता था।
    • कालीबंगन में अग्नि वेदियाँ, जो प्राचीन धार्मिक अनुष्ठानों का प्रमाण देती हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता केवल एक विकसित नगरीय समाज नहीं थी, बल्कि इसने कला, स्थापत्य और धार्मिक परंपराओं की नींव रखी, जो आगे चलकर भारतीय संस्कृति के विकास में सहायक बनीं।

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