Sol –
समाजशास्त्रीय चिंतन के विकास में एम.एन. श्रीनिवास की भूमिका
- “संस्कृतीकरण” अवधारणा का परिचय दिया। (“रिलीजन एंड सोसायटी अमंग द कूर्ग्स ऑफ साउथ इंडिया”, “द कोहेसिव रोल ऑफ संस्कृताइजेशन”)
- सामाजिक परिवर्तन की अन्य अवधारणाओं पर चर्चा की- ब्राह्मणीकरण, पश्चिमीकरण, धर्मनिरपेक्षीकरण, शहरीकरण, आधुनिकीकरण। (“सोशल चेंज इन मॉडर्न इंडिया”)
- प्रमुख जातियों की अवधारणा दी (“डॉमिनेंट कास्ट्स एंड अदर एसेस”)
- व्यापक क्षेत्रीय कार्य किया, समाज को समझने में मदद की (‘द रिमेम्बर्ड विलेज’)।
- यूरोकेंद्रित सिद्धांतों को चुनौती दी, स्वदेशी ढांचे की वकालत की। (“इंडियन सोशल स्ट्रक्चर”).
- भारत में बाद के समाजशास्त्रीय अनुसंधान को प्रभावित किया।
- दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और बड़ौदा विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग की स्थापना की; इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।
- जातिगत गतिशीलता जैसे समसामयिक सामाजिक मुद्दों से जुड़े।
- समाजशास्त्रीय अनुसंधान (“इंडियास विलेजिस” ; “विलेज कास्ट जेंडर एंड मैथड”) में गाँव के अध्ययन के महत्व पर जोर दिया गया।
- “कास्ट इन मॉडर्न इंडिया” और “सोशल चेंज इन मॉडर्न इंडिया” जैसी प्रभावशाली रचनाएँ प्रकाशित।
Sol –
1914 | मुंबई विश्वविद्यालय में वैकल्पिक विषय के रुप में |
1917 | बृजेन्द्र नाथ सिंह के नेतृत्व में ऐच्छिक विषय के रूप में कलकत्ता विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र को पेश किया गया था। |
1919 | पैट्रिक गोडिस की अध्यक्षता में समाजशास्त्र विभाग की स्थापना। |
1921 | लखनऊ विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की शुरुआत। |
1923 | आंध्र व मैसूर विश्वविद्यालय में शुरुआत। |
1939 | इरावती कर्वे की अध्यक्षता में पुणे विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग की स्थापना की गई। |
1952 | पूरे भारत के समाजशास्त्रियों को जोड़ने के लिए इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसायटी का गठन किया गया। |
Sol –
डी.पी. मुखर्जी के अनुसार, भारतीय परंपराओं में परिवर्तन के तीन सिद्धांत
- श्रुति: यह वेद और उपनिषदों जैसी पवित्र पुस्तकों में निहित ज्ञान और परंपराओं का संदर्भ है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से या लिखित रूप में होता है
- स्मृति: यह स्मृति या याददाश्त से जुड़ी परंपराओं का संदर्भ है, जो धार्मिक और सामाजिक नियमों, रीति-रिवाजों और प्रथाओं को दर्शाती है
- अनुभव: यह व्यक्तिगत या सामूहिक अनुभव के माध्यम से प्राप्त ज्ञान और समझ का संदर्भ है, जो परंपराओं में परिवर्तन और विकास का स्रोत हो सकता है
डी.पी. मुखर्जी के अनुसार, अनुभव को क्रांतिकारी सिद्धांत माना गया है, क्योंकि यह परंपराओं को चुनौती देता है और उन्हें बदलता है
Sol –
- जाति नस्ल का एक उत्पाद है जो आर्यों के साथ भारत में आई” – हर्बर्ट रिस्ले
- सिद्धांत: जाति व्यवस्था नस्लीय मतभेदों से उत्पन्न हुई, जिसमें आर्यों (इंडो-आर्यन) ने भारत के मूल लोगों (द्रविड़ों) पर अपना वर्चस्व स्थापित किया।
- इस सिद्धांत के अनुसार, आर्यों ने मूल निवासियों को हराया और उनके रक्त की सर्वोच्चता की रक्षा के लिए जाति व्यवस्था विकसित की। रिस्ले का मानना था कि उच्च जातियाँ इंडो-आर्यन से उत्पन्न हुईं जबकि निचली जातियाँ गैर-आर्यन प्रजातियों से उत्पन्न हुईं।
- आलोचना: आलोचकों का तर्क है कि नस्लीय सिद्धांत जाति व्यवस्था की जटिलता को अधिक सरल बनाता है और व्यवसाय और सामाजिक भूमिकाओं जैसे अन्य महत्वपूर्ण कारकों की उपेक्षा करता है।
- अन्य समर्थक: घुर्ये (पुस्तक- भारत में जाति और नस्ल) ने आंशिक रूप से इस सिद्धांत का समर्थन किया; मजूमदार (भारत में पुस्तक-प्रजाति और संस्कृति)
Sol –
नहीं, जजमानी व्यवस्था पूरी तरह से शोषणकारी नहीं मानी जा सकती।
- यह पारिश्रमिक की एक पारस्परिक समझोता वाली प्रणाली थी जिसमें विभिन्न जातियाँ वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान करती थीं। सेवा प्राप्त करने वाली जाति को जजमान तथा सेवा प्रदान करने वाली जाति को प्रजा/कामीन कहा जाता था। हालाँकि इसने श्रम के सामाजिक विभाजन को बढ़ावा दिया, साथ ही इसने मौजूदा जाति पदानुक्रम को नकारात्मक रूप से मजबूत किया।
- लुई ड्यूमॉन्ट (होमो हायरार्किकस) – ने इसे एक शोषणकारी प्रणाली कहा जो असमानता को बढ़ावा देती है (उदाहरण- ब्राह्मणों को प्रजा नहीं कहा जाता था; सफाईकर्मियों को सेवा के लिए भुगतान नहीं किया जाता था), जबकि विलियम वाइजर (द हिंदू जजमानी सिस्टम) – ने इसे परस्पर निर्भरता को बढ़ावा देने वाली एक समानता आधारित प्रणाली माना। ( उदाहरण- जमींदार कुम्हार के साथ अच्छा व्यवहार करता था , क्योंकि उसे उसकी सेवा की आवश्यकता थी।
Sol –
आधुनिक शिक्षा, औद्योगीकरण और अन्य विकासों के कारण वर्ग व्यवस्था में कई परिवर्तन हुए हैं। वर्ग व्यवस्था के नवीन आयाम हैं-
- बौद्धिक वर्ग- शिक्षा और विज्ञान के साथ उभरा; समाज को एकजुट किया; शिक्षक, वैज्ञानिक, दार्शनिक आदि।
- प्रशासनिक या शासक वर्ग- सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के सदस्य; सामाजिक आर्थिक विकास सुनिश्चित करते हैं।
- किसान वर्ग– कृषि एवं संबंधित गतिविधियाँ।
- पूंजीपति या पूंजीवादी वर्ग– औद्योगिक और आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करता है; व्यवसायी, उद्योगपति।
- श्रमिक या कामकाजी वर्ग– दैनिक वेतन भोगी, विक्रेता, खेत और कारखाने के श्रमिक, रिक्शा चालक।
- अभिजात वर्ग – स्वतंत्र पेशेवर; ज्ञान और तर्क के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन लाना; डॉक्टर, वकील, कलाकार।
- नौकरशाही वर्ग- सरकार का स्थायी अंग; प्रशासन चलाना; कलेक्टर, एसडीओ।
Sol –
मजूमदार एवं मदान ने अपनी पुस्तक में लिखा है की जाति एक बंद समूह है। इसका अर्थ है कि भारतीय जाति व्यवस्था में जाति बदलना या किसी अन्य जाति में शामिल होना संभव नहीं है।
- जाति आधारित सदस्यता: सदस्यता जन्म से निर्धारित होती है, इसे चुना नहीं जा सकता।
- अंतर्विवाह: अपनी जाति के भीतर विवाह करना अपेक्षित होता है, जिससे जाति की विशिष्टता बनी रहती है।
- कठोर सीमाएँ: विभिन्न जातियों के बीच सामाजिक गतिशीलता अत्यधिक सीमित होती है, और विभिन्न जातियों के बीच बातचीत पर अक्सर कड़े प्रतिबंध होते हैं।
- निश्चित व्यवसाय: पारंपरिक रूप से, प्रत्येक जाति विशिष्ट व्यवसायों से जुड़ी होती है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहते हैं, जिससे व्यक्ति के पेशे को बदलने की क्षमता सीमित होती है।
- सामाजिक मानदंड: जाति प्रणाली सामाजिक व्यवहार को निर्धारित करती है, इस पर सख्त नियम लागू करती है कि किसके साथ जुड़ा जा सकता है, जिससे समूह की बंद प्रकृति को और सुदृढ़ किया जाता है।
Solution:
दलित पैंथर्स आंदोलन
- यह एक जातिविरोधी आंदोलन था जिसकी स्थापना 1972 में महाराष्ट्र में नामदेव धसाल, जे.वी. पवार, राजा ढाले और अन्य लोगों द्वारा की गई थी।
- यह अमेरिका के ब्लैक पैंथर आंदोलन से प्रेरित था।
- उद्देश्य → जातीय उत्पीड़न, अस्पृश्यता, सामाजिक अन्याय और दलितों के आर्थिक शोषण के खिलाफ संघर्ष करना।
- इसने साहित्य, उग्र प्रदर्शन और राजनीतिक सक्रियता को उपकरण के रूप में प्रयोग किया → दलित युवाओं को संगठित किया और सामाजिक व राजनीतिक ढांचे को चुनौती दी।
- इसने अंबेडकरवादी विचारधारा को बढ़ावा दिया, दलित गौरव और अधिकारों की मुखर अभिव्यक्ति पर बल दिया।
Sol –
जी.एस. घुर्ये {पुस्तक- जाति, वर्ग और व्यवसाय; भारत में जाति और वर्ग; भारत में जाति और नस्ल} जाति की विशेषताएँ निम्नानुसार हैं –
- समाज का खण्डीय विभाजन – समाज को वर्गों एवं उपवर्गों में विभाजित किया जाता है – सदस्यों की स्थिति निश्चित होती है। यह जन्म पर आधारित है और पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित होती है।
- संस्तरण – जाति एक बंद वर्ग है; धन, संपत्ति और प्रतिष्ठा के आधार पर संस्तरण को नहीं बदला जा सकता है। जाति मानदंडों को निर्धारित करता है और समाज में श्रम विभाजन के माध्यम से परिलक्षित होता है।
- भोजन और सामाजिक मेलजोल संबंधी प्रतिबंध – पवित्रता और प्रदूषण के सिद्धांत का पालन किया जाता है।
- नागरिक और धार्मिक प्रतिबंध व निर्योग्यता – जाति व्यवस्था में कट्टरता को दर्शाती हैं। उच्च और निम्न वर्गों के बीच विशेषाधिकारों और अक्षमताओं का असमान वितरण। जैसे- अछूतों को सार्वजनिक कुओं से पानी लेने और मंदिरों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी।
- व्यवसाय के चयन का अभाव– पूर्वनिर्धारित या पारंपरिक व्यवसाय; सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए इसे बदलने का कोई अधिकार नहीं है।
- अंतर्विवाह (विवाह संबंधी प्रतिबंध)- सबसे महत्वपूर्ण विशेषता; सदस्यों को समूह के भीतर ही विवाह करना चाहिए।
Sol –
आधार | जाति | वर्ग |
अर्थ | आनुवंशिकता और विवाह, व्यवसाय और जीवनशैली पर लगाए गए प्रतिबंधों के आधार पर समाज का खंडीय विभाजन। | स्तरीकरण की खुली प्रणाली जिसका आधार सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक स्थिति हो सकती है। |
सदस्यता | जन्मजात एवं आरोपित। | अर्जित करनी होती है |
व्यवसाय | पूर्वनिर्धारित; कोई गतिशीलता नहीं | पूर्वनिर्धारित नहीं; लचीलापन संभव |
मानदंड (Norms) | निर्धारित रीति-रिवाजों एवं मर्यादाओं का पालन करने की अपेक्षा की जाती है। | ऐसी कोई बाध्यता नहीं |
प्रकार | बंद और स्थिर व्यवस्था | खुली एवं गतिशील सामाजिक व्यवस्था |
विवाह | अंतर्विवाही | अपने वर्ग के बाहर विवाह कर सकते हैं। |
प्रकृति | स्थायी | अस्थायी |
धर्म | जाति व्यवस्था के धार्मिक निहितार्थ हैं। | वर्ग व्यवस्था किसी भी धर्म पर आधारित नहीं है। |
भेद | मनुष्य की हीनता-श्रेष्ठता पर आधारित। | सामाजिक स्थिति की हीनता – श्रेष्ठता पर आधारित |
लोकतंत्र | लोकतंत्र को बढ़ावा नहीं देता। | जरूरी नहीं कि यह लोकतंत्र के लिए बाधा के रूप में कार्य करे |
असमानता | संचयी असमानता । व्यापक सामाजिक अंतर | बिखरी हुई असमानता. सामाजिक अंतर इतना व्यापक नहीं है. |
Sol –
जाति व्यवस्था व्यक्तियों को जन्म के समय एक निश्चित सामाजिक स्थिति प्रदान करके सामाजिक गतिशीलता को सीमित करती है, जिसे वे बदल नहीं सकते। मुख्य कारकों में शामिल हैं:
- जन्म-आधारित पदानुक्रम: सामाजिक स्थिति विरासत में मिलती है और अपरिवर्तनीय होती है।
- सजातीय विवाह: एक ही जाति में विवाह करने से कठोर सामाजिक सीमाएँ बनी रहती हैं।
- व्यावसायिक पृथक्करण: व्यवसायों का निर्धारण जाति के आधार पर किया जाता है, कौशल के आधार पर नहीं। विशिष्ट जातियाँ कुछ नौकरियों से बंधी होती हैं, जिससे बदलाव के अवसर सीमित हो जाते हैं।
- सामाजिक मानदंड: सख्त मानदंड जातियों के बीच बातचीत और आवाजाही को रोकते हैं।
- शिक्षा तक सीमित पहुँच: ऐतिहासिक रूप से निचली जातियों की शिक्षा और संसाधनों तक पहुँच सीमित थी, जिससे ऊपर की ओर गतिशीलता बाधित होती थी।
आधुनिक परिदृश्य में वैश्वीकरण, पश्चिमीकरण, धर्मनिरपेक्षीकरण आदि सामाजिक परिवर्तन की विभिन्न प्रक्रियाओं के कारण जातियों की पारंपरिक भूमिका कमजोर हो रही है, जिससे सामाजिक गतिशीलता बढ़ रही है।
- जाति व्यवस्था में बदलाव के लिए ज़िम्मेदार कारक – योगेंद्र सिंह
- आधुनिकीकरण की प्रक्रियाएँ (शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, शिक्षा): ये सामाजिक गतिशीलता को तो बढ़ावा देती हैं, लेकिन जाति की पहचान को खत्म नहीं करतीं।
- संस्कृतिकरण: निचली जातियों द्वारा अपना सामाजिक दर्जा सुधारने के लिए ऊंची जातियों के रीति-रिवाजों को अपनाना।
- पश्चिमीकरण: लोकतांत्रिक और समानतावादी विचारों का प्रसार, जो जाति की कठोरता को चुनौती देते हैं।
- नए व्यवसाय और आर्थिक संबंध: औद्योगिक अर्थव्यवस्था जाति-आधारित पारंपरिक पेशों से हटकर रोज़गार के नए अवसर पैदा करती है।
- लोकतांत्रीकरण → आरक्षण नीतियां और राजनीतिक लामबंदी निचली जातियों को सशक्त बनाती हैं।
- कानून → छुआछूत और जातिगत भेदभाव के खिलाफ कानून (जैसे, 1955 का अधिनियम)।
- संचार और मीडिया: आधुनिक विचारों का प्रसार जातिगत बाधाओं और सामाजिक पूर्वाग्रहों को कमज़ोर करता है।
Sol –
सामाजिक परिवर्तन के लक्षण –
- सार्वभौमिकता: यह हर समाज में घटित होता है और जीवन के सभी पहलुओं को प्रभावित करता है, जिसमें सामाजिक संस्थान और संस्कृति शामिल हैं। यह निरंतर और अनिवार्य है। उदाहरण – लैंडलाइन से मोबाइल फोन की ओर वैश्विक बदलाव।
- असमरूपता: सामाजिक परिवर्तन की दर और प्रकृति विभिन्न स्थानों और समय के अनुसार भिन्न होती है। यह समाज की अनुकूलन क्षमता और तत्परता पर निर्भर करती है। उदाहरण – पश्चिमी देशों में अन्य देशों की तुलना में तेज औद्योगिकीकरण।
- विचारपूर्वक : इसे विचारपूर्वक या जानबूझकर प्रोत्साहित किया जाता है। इसमें प्रौद्योगिकी या सामाजिक प्रथाओं में नियोजित विकास शामिल हो सकता है। उदाहरण – ऊर्जा के लिए बायोगैस और उन्नत चिकित्सा शल्यक्रियाएं।
- अवधि में परिवर्तनशीलता : यह तेजी से या धीरे-धीरे हो सकता है, और इसका प्रभाव अल्पकालिक या दीर्घकालिक हो सकता है। यह विभिन्न समयावधियों में विकसित होता है। उदाहरण – हरित क्रांति का कृषि में त्वरित वृद्धि बनाम महिला शिक्षा का धीमा प्रसार।
- मूल्य निरपेक्ष : यह न तो अच्छा है और न ही बुरा; यह एक तटस्थ प्रक्रिया है। लोग इस परिवर्तन को कैसे देखते हैं, यह व्यक्तिगत और सामाजिक दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। उदाहरण – औद्योगिकीकरण रोजगार में सुधार और प्रदूषण दोनों को लाता है।
Solution:
जाति भारत में एक स्थायी सामाजिक संरचना बनी हुई है, हालांकि इसका स्वरूप बदल गया है।
- आर्थिक परिवर्तन: शहरीकरण और औद्योगीकरण के साथ जाति-आधारित पेशों में गिरावट आई है। लेकिन जॉब नेटवर्क में जातीय पहचान कायम है → ओबीसी उद्यमियों का उदय, दलित पूंजीवाद (जैसे: DICCI)।
- राजनीतिक लामबंदी: जाति-आधारित राजनीतिक दल (जैसे: बसपा, राजद, जद(यू))। वोट बैंक राजनीति → बिहार और उत्तर प्रदेश में जातिगत गठबंधन।
- आरक्षण प्रणाली: एससी/एसटी को शिक्षा और नौकरियों तक पहुँच प्रदान करती है। साथ ही, सार्वजनिक विमर्श में जातिगत पहचान को भी मजबूत करती है।
- शहरीकरण और प्रवासन: शहरी क्षेत्रों में धार्मिक पदानुक्रम को कमजोर करता है। लेकिन पहचान की राजनीति और जाति-आधारित एकजुटता को मजबूत करता है।
- जाति जनगणना की माँग: नीतिनिर्माण और कल्याणकारी लक्ष्यों में जाति की सतत प्रासंगिकता को दर्शाती है।
- डिजिटल जाति नेटवर्क: मैट्रिमोनियल ऐप्स और सोशल मीडिया जाति-आधारित विवाह (एन्डोगैमी) और फ़िल्टरिंग को बढ़ावा देते हैं।
योगेन्द्र सिंह: जाति स्थिर नहीं, बल्कि गतिशील है – यह सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के अनुसार स्वयं को ढालती है।
“पीछड़ेपन की दौड़” की अवधारणा और भारत में इसके उद्भव को समझाइए।
Solution:
- भारत में “पिछड़ेपन की दौड़” उस प्रतिस्पर्धा को दर्शाती है जिसमें विभिन्न जाति समूह आरक्षण (शिक्षा, रोजगार और राजनीति में) और कल्याणकारी लाभ प्राप्त करने के लिए पिछड़ा वर्ग दर्जा पाने का प्रयास करते हैं।
- यह प्रतिस्पर्धात्मक पहचान की राजनीति और सकारात्मक भेदभाव (Affirmative Action) की प्रोत्साहन नीतियों से प्रेरित है।
- यह स्वतंत्रता-उपरांत भारत में आरक्षण प्रणाली (अनुच्छेद 15 और 16) और मंडल आयोग (1980) द्वारा 27% OBC आरक्षण की सिफारिश के कारण उभरी। → सामाजिक-आर्थिक रूप से मजबूत जाति समूह भी पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल होने की माँग करने लगे।
- उदाहरण: पाटीदार (गुजरात), मराठा (महाराष्ट्र), जाट (हरियाणा), कपू (आंध्र प्रदेश)।
- राजनीतिक दल अक्सर इन माँगों का समर्थन चुनावी लाभ के लिए करते हैं → जिससे लोकलुभावन राजनीति, सामाजिक इंजीनियरिंग और विभाजित मतदाता समूहों का निर्माण होता है।
- यह प्रवृत्ति वास्तविक समावेशन, डेटा की शुद्धता और नीतियों के विकृतिकरण को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करती है।
यह परिघटना भारत के जटिल सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को दर्शाती है, जहाँ पिछड़ापन एक सामाजिक वास्तविकता भी है और एक राजनीतिक उपकरण भी।
