भारत में न्यायपालिका अनुच्छेद 25 के तहत आवश्यक धार्मिक प्रथाओं (ERP) को परिभाषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लेकिन इसके विस्तारित भूमिका ने धार्मिक स्वायत्तता बनाम संवैधानिक नैतिकता पर बहस छेड़ दी है।
संवैधानिक आधार:
- अनुच्छेद 25(1): विवेक और धर्म की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जो लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।
- न्यायिक व्याख्या: न्यायालय धर्मग्रंथों, रीति-रिवाजों और सिद्धांतों के आधार पर प्रथा की आवश्यकता का मूल्यांकन करते हैं।
- राज्य विनियमन की अनुमति: अनुच्छेद 25(2)(A) के तहत, राज्य धर्म से जुड़ी धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को नियंत्रित कर सकता है।
- अनुच्छेद 26: धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार देता है, लेकिन लोक व्यवस्था और स्वास्थ्य के अधीन—न्यायालयों को संतुलन की शक्ति प्रदान करता है।
प्रमुख न्यायिक हस्तक्षेप:
- शिरूर मठ मामला (1954): ERP सिद्धांत की शुरुआत; न्यायालय ने कहा कि धार्मिक समुदाय यह तय करते हैं कि क्या आवश्यक है, न कि राज्य।
- सबरीमाला मामला (2018): महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को गैर-आवश्यक माना, लैंगिक समानता को प्राथमिकता दी।
- ट्रिपल तलाक मामला (2017): तत्काल तलाक को असंवैधानिक ठहराया गया क्योंकि यह कुरानिक स्वीकृति से रहित था।
- हाजी अली दरगाह मामला (2016): बॉम्बे हाईकोर्ट ने महिलाओं को दरगाह के गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति दी, प्रतिबंध को गैर-आवश्यक माना।
- राम जन्मभूमि मामला (2019): सर्वोच्च न्यायालय ने ERP चर्चा से सावधानीपूर्वक बचते हुए, धार्मिक विश्वास में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं का संकेत दिया।
न्यायिक भूमिका की आलोचना :
- न्यायिक अतिरेक: न्यायालय धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या करके कानूनी दायरे से परे धर्मशास्त्री की भूमिका निभाने का जोखिम उठाते हैं।
- मानक परीक्षण की कमी: ERP निर्धारित करने की एकसमान पद्धति न होने से असंगति और अप्रत्याशितता बढ़ती है।
- धार्मिक स्वायत्तता का क्षरण: समुदायों को डर है कि धर्म पर राज्य का नियंत्रण बढ़ेगा।
- चयनात्मक लागू: ERP सिद्धांत का उपयोग अल्पसंख्यक प्रथाओं में अधिक होता है, जिससे पक्षपात और असंतुलन की चिंता बढ़ती है।
- लंबित संवैधानिक समीक्षा: 9-न्यायाधीशों की पीठ ERP की वैधता पर पुनर्विचार कर रही है, जो स्पष्टता और संयम की आवश्यकता को दर्शाता है।
डॉ. अंबेडकर ने संवैधानिक नैतिकता को इस रूप में परिभाषित किया—
- संवैधानिक प्रक्रियाओं के प्रति श्रद्धा: कानूनी प्राधिकरण का संविधान की सीमाओं में रहकर पालन, साथ ही असहमति और बहस के लिए स्थान।
- नैतिक शासन के सिद्धांत: न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे मूल्य लोक सेवकों के लिए नैतिक मार्गदर्शक बनते हैं।
- संस्थागत निष्पक्षता: व्यक्तिगत विवेक को संविधान की भावना से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
लोक सेवा में संवैधानिक नैतिकता की भूमिका:
व्यावहारिक चुनौतियाँ:
| भूमिका | उदाहरण |
| नैतिक दिशा-निर्देशन प्रदान करना | कानून और प्रक्रियाओं का पालन, असहमति के लिए सहनशीलता दिखाना |
| नियमों और विधि के शासन का पालन | 2019 महाराष्ट्र में राज्यपाल की भूमिका की आलोचना– फ्लोर टेस्ट की प्रक्रिया की अनदेखी |
| संविधान की प्रस्तावना में वर्णित मूल्यों को नीति-निर्माण में लागू करना | सबरीमाला मामला – केरल प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार लैंगिक समानता लागू की |
| मूल्य आधारित कार्यवाही करना, भेदभाव के बिना | IAS अर्मा आन्नंद (बिहार) ने अवैध बाल-विवाह रोकने के लिए परिवार वालों के विरोध के बावजूद हस्तक्षेप किया |
| मनमानी और विवेकाधीन निर्णयों को कम करना | सिविल सेवा आचरण नियम – अधिकारियों की सीमाओं को तय करता है |
| लोक जवाबदेही सुनिश्चित करना,राजनीतिक पक्षपात से मुक्त होकर कार्य करना | सीवीसी निगरानी, आरटीआई, लोकपाल जैसी संस्थाएं ।IAS टी.एन. चतुर्वेदी (पूर्व CAG) ने बोफोर्स घोटाले की रिपोर्ट दबाव के बावजूद प्रस्तुत की । |
| मौलिक अधिकारों की रक्षा करना, विशेषकर वंचित वर्गों के लिए | मैला ढोने की प्रथा पर रोक, आरक्षण, आकांक्षी जिलों का कार्यक्रम, अनुसूचित जाति/जनजाति कल्याण |
- राजनीतिक हस्तक्षेप संस्थानों की निष्पक्षता को कमजोर करता है (जैसे CBI/ED के चयनात्मक छापे)।
- ईमानदार अधिकारियों के बार-बार तबादले (जैसे IAS अशोक खेमका) से प्रशासनिक जवाबदेही घटती है।
- अध्यादेश और राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियाँ लोकतांत्रिक बहस को दरकिनार कर देती हैं।
निष्कर्ष:
संवैधानिक नैतिकता लोक सेवा में नैतिक निर्णय लेने का आधार बनती है और सुशासन के लिए एक दृढ़ नैतिक ढांचा प्रदान करती है
