भारत को तीव्र वैश्वीकरण तथा अपनी मौजूदा लेखांकन व्यवस्था की सीमाओं के कारण वैश्विक लेखांकन मानकों (भारतीय लेखांकन मानकों का अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रतिवेदन मानकों के साथ अभिसरण)को अपनाने की प्रबल आवश्यकता महसूस हुई।
अर्थव्यवस्था का वैश्वीकरण
- वैश्वीकरण के कारण भारत की कंपनियों द्वारा सीमा पार व्यापार, विदेशी निवेश तथा बहुराष्ट्रीय संचालन में भारी वृद्धि हुई।
- विदेशी बाजारों से धन जुटाने तथा वैश्विक विस्तार करने वाली भारतीय कंपनियों को सुगम अंतरराष्ट्रीय व्यवसाय के लिए एक समान लेखांकन ढांचे की आवश्यकता थी।
एकाधिक मानकों की समस्याएं
- भारतीय कंपनियों को भारतीय लेखांकन मानक, IFRS तथा US GAAP के अंतर्गत अलग-अलग वित्तीय विवरण तैयार करने पड़ते थे जिससे अनुपालन लागत बहुत अधिक हो गई।
- इससे जटिलता, असंगति, ऑडिट व्यय में वृद्धि तथा कंपनियों एवं निवेशकों पर संचालन भार बढ़ गया।
तुलनात्मकता की कमी
- विभिन्न राष्ट्रीय मानकों के कारण एक ही लेन-देन के लिए विभिन्न देशों में रिपोर्ट किए गए परिणामों में व्यापक भिन्नता आती थी।
- एक ही घटना एक मानक के अंतर्गत लाभ तथा दूसरे मानक के अंतर्गत हानि दिखा सकती थी (जैसे निवेशों की लागत बनाम उचित मूल्य), जिससे तुलना कठिन हो जाती थी।
निवेशकों की चिंताएं
- अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को भारतीय वित्तीय विवरणों को समझना तथा उन पर विश्वास करना अलग-अलग लेखांकन प्रथाओं के कारण कठिन लगता था।
- वे IFRS आधारित रिपोर्टिंग या भारी समाधान की मांग करते थे, जिससे विश्वास कम होता था तथा भारतीय कंपनियों की पूंजी की लागत बढ़ जाती थी।
भारतीय लेखांकन मानकों की सीमाएं
- मौजूदा भारतीय लेखांकन मानक नियम आधारित, पुराने तथा पट्टों, वित्तीय उपकरणों और उचित मूल्य जैसे जटिल आधुनिक लेन-देन पर मार्गदर्शन की कमी वाले थे।
- वे आर्थिक सार को ठीक से प्रतिबिंबित करने में असफल रहे तथा वैश्विक व्यवसाय की जटिलताओं के लिए सुसज्जित नहीं थे।
IFRS के साथ अभिसरण की आवश्यकता
- IFRS के साथ अभिसरण पारदर्शिता, विश्वसनीयता, तुलनात्मकता तथा भारतीय वित्तीय रिपोर्टिंग को वैश्विक स्वीकृति दिलाने के लिए आवश्यक था।
- इसका उद्देश्य सूचना असमानता को कम करना तथा भारत को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था के साथ गहराई से एकीकृत करना था।
नीतिगत प्रतिबद्धता
- भारत ने वर्ष 2009 में जी20 शिखर सम्मेलन में IFRS के साथ अभिसरण की औपचारिक प्रतिबद्धता की।
- इस नीतिगत निर्णय के परिणामस्वरूप 2016 से Ind AS के विकास तथा चरणबद्ध कार्यान्वयन की शुरुआत हुई।
भारत में लेखांकन मानकों को निर्धारित करने के लिए संस्थागत ढांचा एक सुव्यवस्थित बहु-स्तरीय प्रणाली है जिसमें पेशेवर, तकनीकी, नियामक तथा सरकारी निकाय शामिल हैं। प्रमुख लेखांकन मानक निर्धारण संस्थाएँ निम्नलिखित हैं:
1. आईसीएआई (भारतीय चार्टर्ड अकाउंटेंट्स संस्थान)
- स्थापना: ‘चार्टर्ड अकाउंटेंट्स अधिनियम, 1949’ के अंतर्गत स्थापित, यह भारत का प्रमुख व्यावसायिक लेखांकन निकाय है।
भूमिका एवं कार्य
- यह भारत में लेखांकन मानकों के निर्माण के लिए उत्तरदायी मुख्य पेशेवर निकाय है।
- यह गैर-निगमित संस्थाओं के लिए लेखांकन मानक (AS) जारी करता है।
- यह लेखांकन प्रथाओं में गुणवत्ता और एकरूपता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
2. लेखांकन मानक बोर्ड (ASB)
- स्थापना: यह आईसीएआई की एक इकाई है, जिसकी स्थापना 1977 में हुई थी।
भूमिका एवं कार्य
- यह लेखांकन मानकों का प्रारूप तैयार करने और उन्हें विकसित करने के लिए उत्तरदायी है।
- यह एक व्यापक और परामर्शदात्री प्रक्रिया का पालन करता है (जिसमें सार्वजनिक टिप्पणियाँ या सुझाव शामिल होते हैं)।
- यह भारतीय मानकों को वैश्विक मानकों के तुलनीय बनाने की दिशा में कार्य करता है।
- यह अनुमोदन के लिए उच्च प्राधिकारियों को मानकों का प्रारूप प्रस्तुत करता है।
3. राष्ट्रीय वित्तीय प्रतिवेदन प्राधिकरण (NFRA)
- स्थापना: यह कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत एक स्वतंत्र नियामक संस्था है।
भूमिका एवं कार्य
- यह लेखांकन और लेखापरीक्षण मानकों की गुणवत्ता की समीक्षा और निगरानी करता है।
- यह अंतिम अनुमोदन प्रक्रिया से पूर्व ASB से अनुशंसाएँ प्राप्त करता है।
4. कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय (MCA)
- स्थापना: यह भारत सरकार का कॉर्पोरेट मामलों का नोडल मंत्रालय है।
भूमिका एवं कार्य
- यह भारत में लेखांकन मानकों को अधिसूचित और लागू करने वाला अंतिम प्राधिकरण है।
- यह कंपनियों के लिए ‘लेखांकन मानक’ (AS) और ‘भारतीय लेखांकन मानक’ (Ind AS) जारी करता है।
- यह कंपनी अधिनियम के अंतर्गत विधिक प्रवर्तन सुनिश्चित करता है।
| आधार | अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रतिवेदन मानकों का अंगीकरण | अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रतिवेदन मानकों के साथ अभिसरण |
| अर्थ | अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रतिवेदन मानकों को अंतर्राष्ट्रीय लेखा मानक बोर्ड द्वारा जारी मूल स्वरूप में ही स्वीकार एवं लागू करना। | राष्ट्रीय लेखा मानकों को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रतिवेदन मानकों के अनुरूप बनाना तथा आवश्यकतानुसार कानूनी, आर्थिक एवं नियामकीय आवश्यकताओं के अनुसार संशोधन करना। |
| उद्देश्य | वित्तीय प्रतिवेदन में पूर्ण वैश्विक एकरूपता एवं तुलनीयता स्थापित करना। | राष्ट्रीय हितों एवं नियामकीय आवश्यकताओं की सुरक्षा करते हुए अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रतिवेदन मानकों के साथ पर्याप्त सामंजस्य स्थापित करना। |
| मानकों की प्रकृति | मानकों को बिना किसी परिवर्तन के मूल स्वरूप में लागू किया जाता है। | अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रतिवेदन मानकों के सिद्धांतों को आवश्यक संशोधनों सहित राष्ट्रीय मानकों में सम्मिलित किया जाता है। |
| परिवर्तन की अनुमति | भाषा, प्रारूप, मान्यता, मापन अथवा प्रकटीकरण संबंधी प्रावधानों में किसी प्रकार का परिवर्तन स्वीकार नहीं होता। | स्थानीय कानूनों, कर व्यवस्था, आर्थिक परिस्थितियों एवं नियामकीय ढाँचे के अनुसार सीमित संशोधन किए जा सकते हैं। |
| राष्ट्रीय मानक निर्धारण संस्था की भूमिका | राष्ट्रीय मानक निर्धारण संस्था केवल मूल स्वरूप में जारी मानकों को लागू करती है। | राष्ट्रीय मानक निर्धारण संस्था आवश्यक संशोधन करते हुए राष्ट्रीय मानकों को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय प्रतिवेदन मानकों के अनुरूप बनाती है तथा पर्याप्त समानता बनाए रखती है। |
| लचीलापन | अत्यंत सीमित लचीलापन क्योंकि मानकों का पालन यथावत करना अनिवार्य होता है। | स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार मानकों को अनुकूलित करने हेतु अपेक्षाकृत अधिक लचीलापन उपलब्ध होता है। |
| उपयुक्तता | उन देशों के लिए अधिक उपयुक्त जो बिना संशोधन के वैश्विक वित्तीय प्रतिवेदन प्रणाली को पूर्ण रूप से अपनाना चाहते हैं। | उन देशों के लिए अधिक उपयुक्त जहाँ कानूनी, आर्थिक, कराधान अथवा व्यावसायिक परिस्थितियाँ भिन्न हों। |
| उदाहरण | यूरोपीय संघ – सूचीबद्ध कंपनियों के लिए वर्ष 2005 से पूर्ण रूप से अंगीकृत। | भारत – भारतीय लेखा मानकों के माध्यम से अभिसरण पद्धति अपनाई गई है। |
