स्वदेशी आंदोलन (बंगाल विभाजन (1905) के विरोध में) आत्मनिर्भरता और ब्रिटिश शासन से आर्थिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देने के लिए चलाया गया।
प्रमुख आर्थिक प्रभाव:
- ब्रिटिश वस्तुओं और विक्रेताओं का बहिष्कार – भारतीयों ने मैनचेस्टर के कपड़े और लिवरपूल के नमक जैसी ब्रिटिश वस्तुओं को त्याग दिया।
- भारतीय उद्योगों को बढ़ावा – स्वदेशी उद्योग, जैसे बंगाल केमिकल्स (पी.सी. रे) और टाटा आयरन एंड स्टील (1907), ब्रिटिश आयात पर निर्भरता कम करने के लिए विकसित हुए।
- कुटीर उद्योगों का पुनरुद्धार – हथकरघा और खादी के उत्पादन में वृद्धि हुई, जिससे आत्मनिर्भरता और ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा मिला।
- स्वदेशी बैंक और उद्यम – पंजाब नेशनल बैंक, स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी (वी.ओ. चिदंबरम पिल्लई) जैसे स्वदेशी बैंक और बीमा कंपनियाँ स्थापित की गईं।
- आर्थिक राष्ट्रवादी नेता – आर.सी. दत्त और दादाभाई नौरोजी जैसे विचारकों ने ब्रिटिश आर्थिक नीतियों की आलोचना की और आत्मनिर्भरता का समर्थन किया।
- उपभोक्ता जागरूकता का उत्थान – इस आंदोलन ने राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत किया और भारतीयों को स्वदेशी वस्तुओं के समर्थन के लिए प्रेरित किया।
पूना पैक्ट (1932)
- तारीख: 24 सितंबर 1932
- परिस्थिति: कम्यूनल अवॉर्ड के समय गांधीजी यरवदा जेल में थे।
- 20 सितंबर 1932 को गांधीजी ने हरिजनों के लिए अलग निर्वाचक मंडल के विरोध में अनशन शुरू किया।
- मध्यस्थ: मदन मोहन मालवीय, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, पुरुषोत्तमदास टंडन।
- समझौता हुआ: महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव आंबेडकर के बीच, पूना में।
मुख्य प्रावधान
- अलग निर्वाचक मंडल समाप्त: आंबेडकर ने अलग निर्वाचक मंडल की माँग वापस ली; संयुक्त निर्वाचन को स्वीकार किया गया।
- आरक्षित सीटों में वृद्धि: विधानसभाओं में दलितों की सीटें 71 से बढ़ाकर 148 कर दी गईं।
- उचित प्रतिनिधित्व का वादा:
- निर्वाचन क्षेत्रों में निश्चित प्रतिशत सीटें दलित वर्गों के लिए सुरक्षित।
- सरकारी सेवाओं, स्थानीय निकायों में शैक्षिक योग्यता के आधार पर उचित प्रतिनिधित्व।
- टैगोर की प्रतिक्रिया: रवीन्द्रनाथ टैगोर ने गांधीजी को धन्यवाद दिया कि उन्होंने हिंदू समाज में विभाजन रोका।
मुख्य आलोचनाएँ
- कई विचारकों के अनुसार इस समझौते ने हिंदू सामाजिक व्यवस्था के अंधकार युग को जारी रखा।
- दलितों को राजनीतिक हथियार में बदल दिया गया।
- दलितों की राजनीतिक, वैचारिक और सांस्कृतिक कमजोरी बढ़ी; स्वतंत्र दलित नेतृत्व कमजोर हुआ।
- दलितों को एक अलग समुदाय के रूप में मान्यता नहीं मिली; उन्हें हिंदू सामाजिक ढांचे में बाँध दिया गया।
लखनऊ पैक्ट (1916) ने हिंदू–मुस्लिम संबंधों पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार के प्रभाव डाले:
सकारात्मक प्रभाव
- ऐतिहासिक राजनीतिक एकता: पहली बार कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने मिलकर संवैधानिक सुधारों की मांग की।
- अविश्वास में कमी: कांग्रेस द्वारा पृथक निर्वाचन स्वीकार करने से मुसलमानों की राजनीतिक सुरक्षा की चिंता कम हुई।
- राष्ट्रीय आंदोलन को मजबूती: संयुक्त मांगों से स्वतंत्रता आंदोलन में साझा संघर्ष की भावना बनी।
नकारात्मक प्रभाव
- सांप्रदायिक राजनीति को वैधता: पृथक निर्वाचन ने दोनों समुदायों को राजनीतिक रूप से अलग दिखाया।
- द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के बीज: राजनीति में सामुदायिक पहचान को मजबूती मिली।
- एकता अस्थायी रही: यह राजनीतिक एकता सामाजिक नहीं थी; 1920 के बाद सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया।
ऐनी बेसेंट के होम रूल लीग के उद्देश्य
- भारत के लिए स्वशासन (Home Rule) की माँग करना, ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर डोमिनियन स्टेटस जैसा अधिकार प्राप्त करना।
- अखबारों (New India, Commonweal), सभाओं और राजनीतिक शिक्षण के माध्यम से देश-भर में राजनीतिक जागरूकता फैलाना।
- शिक्षित भारतीयों, युवाओं और महिलाओं को एक संगठित राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रूप से जोड़ना।
- कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों से अलग एक साल-भर सक्रिय राष्ट्रीय संगठन खड़ा करना, जिसका लक्ष्य केवल होम रूल प्राप्त करना हो।
- उदारवादियों और उग्रवादियों के बीच एकता को बढ़ावा देना और युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्रीय प्रयास को मजबूत बनाना।
1947 में भारत का विभाजन ब्रिटिश संसद द्वारा भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित करने के बाद हुआ। यह विभिन्न कारकों के मिश्रण से उत्पन्न हुआ।
- ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति: शोषणकारी “फूट डालो और राज करो” रणनीति ने धार्मिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय मतभेदों को बढ़ा दिया।
- धार्मिक विभाजन: ऐतिहासिक शिकायतों और विशिष्ट पहचानों के कारण हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तनाव बढ़ रहा है।
- दो राष्ट्र सिद्धांत: जिन्ना जैसे नेताओं द्वारा समर्थित, पाकिस्तान की मांग को जन्म दिया।
- सांप्रदायिक हिंसा: बढ़ते दंगों, जिसका उदाहरण 1946 के प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस था, ने अविश्वास को गहरा कर दिया।
- कांग्रेस-मुस्लिम लीग मतभेद: सत्ता-साझाकरण व्यवस्था पर विचारों के टकराव ने आम सहमति में बाधा डाली।
- ब्रिटिश निकास रणनीति: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कमजोर हुई, विभाजन को ब्रिटिश हितों की रक्षा करते हुए सत्ता हस्तांतरण के समाधान के रूप में देखा गया।
- अल्पसंख्यक दर्जे का डर: मुसलमानों ने राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए एक अलग राज्य की मांग की।
- नेतृत्व की भूमिका: पाकिस्तान पर जिन्ना की जिद और विकल्प उपलब्ध कराने में कांग्रेस नेताओं की विफलता ने तनाव बढ़ा दिया।
- भौगोलिक और जनसांख्यिकीय कारक: भौगोलिक वितरण, विशेष रूप से पंजाब और बंगाल में, ने विभाजन की व्यवहार्यता को सुविधाजनक बनाया। उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व में संकेंद्रित मुस्लिम आबादी ने पाकिस्तान के निर्माण की नींव रखी।
- अंतर्राष्ट्रीय कारक: वैश्विक गतिशीलता, शीत युद्ध के विचार और ब्रिटिश रणनीतिक हितों ने विभाजन को प्रभावित किया।
इस ऐतिहासिक घटना ने भारत और पाकिस्तान के बीच स्थायी शत्रुता की विरासत छोड़ी, जिससे कश्मीर के विवादित क्षेत्र पर संघर्ष हुआ।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना 28 दिसंबर 1885 को गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज, बॉम्बे में हुई। इस सम्मेलन को ए. ओ. ह्यूम ने भारतीय नेताओं के सहयोग से आयोजित किया और डब्ल्यू.सी. बनर्जी पहले अध्यक्ष बने। कांग्रेस का उद्देश्य भारतीयों और ब्रिटिश सरकार के बीच राजनीतिक संवाद के लिए एक मंच तैयार करना था। आगे चलकर यही संस्था भारत के स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य स्तंभ बनी।
राजनीतिक महत्व
1. संगठित राष्ट्रीय राजनीति की शुरुआत
- बंगाल, बॉम्बे, मद्रास, पंजाब, पूना आदि क्षेत्रों के नेता एक मंच पर आए।
- क्षेत्रीय संस्थाओं (पूना सार्वजनिक सभा, मद्रास महासभा, बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन) से राष्ट्रीय संगठन की ओर संक्रमण हुआ।
2. भारतीय शिकायतों की संस्थागत अभिव्यक्ति
- भू-राजस्व की अधिकता, सैन्य व्यय, ‘धन-निकासी सिद्धांत’, एवं प्रशासनिक भेदभाव जैसे मुद्दों को व्यवस्थित रूप से उठाया गया।
- कांग्रेस ने लगातार मांग की:
- सिविल सेवाओं का भारतीयकरण
- सैन्य व्यय में कमी
- विधान परिषदों का विस्तार
- कांग्रेस के दबाव से भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 लाया गया।
3. राजनीतिक नेतृत्व का विकास एवं राजनीतिक शिक्षण
- दादाभाई नौरोजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, फिरोजशाह मेहता जैसे नेता कांग्रेस के माध्यम से तैयार हुए।
4. राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्ष राजनीति को बढ़ावा
- कांग्रेस ने हिंदुओं, मुसलमानों, पारसियों, ईसाइयों को एक ही मंच पर लाया।
- नौरोजी और बदरुद्दीन तैयबजी ने “भारत एक राष्ट्र है” की अवधारणा को मजबूत किया।
5. ब्रिटिश शासन पर प्रभावी दबाव समूह
- प्रस्तावों और याचिकाओं के माध्यम से कांग्रेस ने ब्रिटिश नीतियों पर प्रभाव डाला।
- ब्रिटिश कांग्रेस को प्रारंभ में “सेफ्टी वाल्व” मानते थे, परंतु कांग्रेस शीघ्र ही एक प्रबल राजनीतिक शक्ति बन गई।
6. भविष्य के जन आंदोलनों की आधारशिला
- कांग्रेस ने आगामी आंदोलनों के लिए वैचारिक और संगठनात्मक आधार तैयार किया:
- स्वदेशी आंदोलन (1905)
- होम रूल आंदोलन (1916)
- असहयोग, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो आंदोलन
- आरंभिक मध्यमार्गी नेताओं के कारण गांधी युग के जन आंदोलनों को एक संगठित राष्ट्रीय मंच मिला।
1885 में कांग्रेस की स्थापना भारत के आधुनिक राजनीतिक इतिहास की एक निर्णायक घटना थी। इसने भारतीय असंतोष को संगठित राष्ट्रीय आंदोलन का रूप दिया, नेतृत्व विकसित किया, एकता को मजबूत किया और स्वतंत्रता संग्राम की मजबूत नींव रखी। यह भारत में आधुनिक राष्ट्रीयता का वास्तविक आरंभ था।
1917 का चंपारण सत्याग्रह महात्मा गांधी का भारत में पहला बड़ा सत्याग्रह था, जिसमें उनकी भूमिका निर्णायक और परिवर्तनकारी रही।
1. किसानों की पीड़ा का अध्ययन और सत्य की खोज
- राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर गांधीजी चंपारण पहुँचे और तिनकठिया प्रथा (भूमि के 3/20 हिस्से पर नील की जबरन खेती) की बारीकी से जाँच की।
- उन्होंने राजेंद्र प्रसाद, मजहर-उल-हक, जे.बी. कृपलानी, महादेव देसाई, नरहरि पारिख आदि के सहयोग से विस्तृत सर्वेक्षण किए।
2. भारत में सत्याग्रह की पहली प्रयोग-शाला
- गांधीजी ने जिले से बाहर जाने के आदेश का शांतिपूर्वक उल्लंघन किया और सजा का सामना करने को तैयार रहे।
- इस अहिंसक नागरिक अवज्ञा ने ब्रिटिश शासन को आश्चर्यचकित कर दिया।
3. किसानों का संगठन और आत्मविश्वास जगाना
- बिखरे हुए किसानों को गांधीजी ने संगठित किया और उन्हें पहली बार अपनी बात साहस से रखने का विश्वास दिया।
4. रचनात्मक कार्य और नैतिक दबाव
- गांधीजी ने आंदोलन के साथ-साथ शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक सुधार के प्रयास भी किए।
- उनके अहिंसक रवैये ने सरकार पर नैतिक दबाव बनाया।
5. समझौता और उपलब्धियाँ
- गांधीजी को सरकारी जाँच आयोग में शामिल किया गया।
- उनकी दृढ़ता से महत्वपूर्ण परिणाम मिले:
- तिनकठिया प्रथा समाप्त
- अवैध वसूली का 25% किसानों को लौटाया गया
- यह भारत में पहली सफल असहयोग/सविनय अवज्ञा विजय बनी।
निष्कर्ष
चंपारण सत्याग्रह ने गांधीजी की नेतृत्व क्षमता, सत्याग्रह की शक्ति और अहिंसक आंदोलन की प्रभावशीलता सिद्ध कर दी। इसी सफलता के बाद रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें “महात्मा” की उपाधि दी।
1905–11 का स्वदेशी आंदोलन, जो बंग-भंग के विरोध से उत्पन्न हुआ, ने भारतीय राष्ट्रवाद को नई दिशा दी। पहली बार आर्थिक आत्मनिर्भरता, स्वदेशी उद्योग, बहिष्कार और राष्ट्रीय उपभोग राजनीतिक संघर्ष के मुख्य साधन बने। इसे भारत में आर्थिक राष्ट्रवाद की वास्तविक शुरुआत माना जाता है।
1. विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार—पहला संगठित आर्थिक हथियार
- मैनचेस्टर के कपड़े, लिवरपूल का नमक और ब्रिटिश तैयार माल का जन-स्तरीय बहिष्कार।
- विदेशी कपड़े की सार्वजनिक होली।
- 1905–08 में ब्रिटिश वस्त्रों के आयात में उल्लेखनीय गिरावट।
→ राजनीतिक संघर्ष पहली बार आर्थिक मोर्चे पर लड़ा गया।
2. स्वदेशी उद्योगों और भारतीय उद्यमिता का विस्तार: आंदोलन ने भारतीय उद्योगों को संगठित समर्थन दिया।
महत्वपूर्ण उदाहरण:
- बंगाल केमिकल्स (पी.सी. रे)
- टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (1907)
- नेशनल टैनरी, नेशनल सोप फैक्ट्री, नेशनल पेपर मिल्स
→ यह भारत में औद्योगिक आत्मनिर्भरता की प्रथम संगठित शुरुआत थी।
3. कुटीर उद्योगों और ग्रामीण रोजगार का पुनर्जागरण
- खादी, हथकरघा, और परंपरागत उद्योगों को बढ़ावा।
- ग्रामीण रोजगार में वृद्धि और विदेशी निर्भरता में कमी।
→ यही बाद में गांधी के खादी-स्वदेशी सिद्धांत की प्रेरणा बना।
4. स्वदेशी बैंकिंग, वित्त और नौवहन—वित्तीय राष्ट्रवाद का उदय
उदाहरण:
- पंजाब नेशनल बैंक, बंगिया और कोमिल्ला बैंक, भारतीय बीमा कंपनियाँ
- स्वदेशी स्टीम नेविगेशन कंपनी (वी.ओ. चिदम्बरम पिल्लै)
→ भारतीय पूँजी को ब्रिटिश नियंत्रण से मुक्त करने का प्रयास।
5. राष्ट्रीय शिक्षा—आर्थिक सशक्तिकरण का साधन
- नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशन (1906)
- बंगाल टेक्निकल इंस्टिट्यूट (बाद में जादवपुर विश्वविद्यालय)
→ तकनीकी, वैज्ञानिक और औद्योगिक शिक्षा का स्वदेशीकरण।
6. आर्थिक राष्ट्रवाद की बौद्धिक नींव
- दादाभाई नौरोजी (Drain of Wealth), आर.सी. दत्त (Economic History of India), गोखले–तिलक
इन विचारकों ने ब्रिटिश आर्थिक नीतियों की आलोचना कर स्वावलंबन और स्वदेशी उद्योग का समर्थन किया।
7. उपभोक्ता राष्ट्रवाद का उदय
- विदेशी वस्तु बनाम स्वदेशी वस्तु का नैतिक प्रश्न उत्पन्न हुआ।
- उपभोग को राष्ट्रभक्ति से जोड़ा गया—
“विदेशी वस्त्र पहनना, दासता पहनना है।”
→ जनता की आर्थिक पसंद राष्ट्रवाद का हिस्सा बनी।
स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में आर्थिक मोर्चा खोलकर आर्थिक राष्ट्रवाद की नींव रखी। स्वदेशी उद्योगों को समर्थन, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, कुटीर उद्योगों के पुनर्जीवन, स्वदेशी बैंकिंग और राष्ट्रीय चेतना के उत्थान ने भारत के आर्थिक स्वतंत्रता संघर्ष को नया आयाम दिया।
भारत छोड़ो आंदोलन एक जनसहभागिता पर आधारित औपनिवेशिक-विरोधी आंदोलन था। इसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में 8 अगस्त 1942 को बंबई (अब मुंबई) के गोवालिया टैंक मैदान (अगस्त क्रांति मैदान) से शुरू किया। इसका उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में भारत में ब्रिटिश शासन को तत्काल समाप्त करने की माँग करना था।
I. आंदोलन के योजनाबद्ध पक्ष
- रिणनीतिक निर्णय व वर्धा/एआईसीसी प्रस्ताव
- कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने वर्धा प्रस्ताव पेश कर AICC सत्र में Quit India प्रस्ताव पारित करने की रूपरेखा बनायी थी।
- गांधी का निर्देश और नारा
- गांधीजी का “करो या मरो” नारा और तत्काल स्वतंत्रता तथा अस्थायी सरकार बनाने का लक्ष्य स्पष्ट था।
- संगठनात्मक तैयारी व भूमिगत नेतृत्व
- जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, अरुणा आसफ अली, उषा मेहता आदि की भूमिगत व्यवस्था सक्रिय कर दी गई थी ताकि नेताओं की गिरफ्तारी पर आंदोलन जारी रहें।
- गुप्त संचार माध्यम
- कांग्रेस रेडियो व गुप्त पर्चे आदि पहले से योजना के तहत रखे गए थे।
- कार्यान्वयन के निर्देश
- सरकारी कर्मचारियों, सैनिकों, किसानों व स्थानीय संगठनों के लिए व्यवस्थित गतिविधियों के निर्देश दिए गए थे।
II. आंदोलन के स्वस्फूर्त पक्ष
- नेताओं की गिरफ्तारी → नेता-रहित विस्फोट
- ऑपरेशन ज़ीरो ऑवर (9 अगस्त 1942) में मुख्य नेताओं की गिरफ्तारी ने आंदोलन को लोक-स्तर पर नेता-रहित विद्रोह में बदल दिया।
- देशव्यापी स्वतःस्फूर्त विरोध
- मुंबई, कलकत्ता, इलाहाबाद, पटना, कानपुर, मद्रास आदि में अनियोजित हड़तालें, रैलियाँ और प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हुआ।
- स्थानीय हिंसक और विनाशकारी गतिविधियाँ
- थाना, डाकघर, रेलवे ट्रैक, पुल, टेलीग्राफ लाइनें पर हमले—ये ज्यादातर स्वस्फूर्त और अनियोजित थे।
- प्रति-सरकारों का लोक-स्तरीय गठन
- बलिया (चिट्टू पांडे), तामलुक (जातीय सरकार), सातारा (नाना पाटिल/वाई.बी. चव्हाण) जैसी प्रत्यक्ष सरकारें स्थानीय जनांदोलन से उभरीं, न कि केन्द्रीय आदेश से।
- विस्तृत सामाजिक भागीदारी
- छात्र, किसान, महिलाएँ (अरुणा आसफ अली), निचले स्तर के सरकारी कर्मचारी व पुलिस सहयोगियों तक की भागीदारी—यह सब भारी हद तक स्वस्फूर्त था।
III. परस्पर प्रभाव व नतीजे
- नेतृत्व-स्तरीय योजना + जनता-स्तरीय स्वाभाविक ऊर्जा ने व्यापक विद्रोह खड़ा किया।
- ब्रिटिश दमन (लगभग 60,000 से अधिक गिरफ्तारियाँ, कड़ी दमन नीति, अनेक हताहत) ने केन्द्रिय संचालन प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया पर स्थानीय अनुभव और राष्ट्रीय चेतना मजबूत हुई।
- इस द्वितीय चरित्र के कारण आंदोलन की ताकत भी थी और सीमाएँ भी — केंद्रित नेतृत्व के अभाव और हिंसात्मक घटनाओं ने दीर्घकालिक रणनीतिक सफलताओं को रोका।
निष्कर्ष
भारत छोड़ो आंदोलन ऊपर से योजनाबद्ध भी था और नीचे से स्वस्फूर्त भी। इसी द्वैध स्वभाव ने इसे स्वतंत्रता संग्राम का सर्वाधिक व्यापक-आंदोलन और सबसे जटिल चुनौती बना दिया।
1905 में अंग्रेजों द्वारा बंगाल के विभाजन के जवाब में स्वदेशी आंदोलन शुरू किया गया था, जिसका पूरे भारत में व्यापक स्तर पर विरोध हुआ।
यह निम्नलिखित कारणों से एक “मील का पत्थर” साबित हुआ –
- संघर्ष के नये रूप उभरे
- मैनचेस्टर कपड़ा और लिवरपूल नमक जैसी ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार
- बड़े पैमाने पर एकजुटता के लिए अश्विनी कुमार दत्ता की स्वदेश बंधब समिति (बारिसल में) जैसे स्वयंसेवकों की टोली का गठन
- प्रचार-प्रसार के लिए पारंपरिक लोकप्रिय त्योहारों और मेलों का उपयोग, आत्मनिर्भरता या आत्मशक्ति पर जोर
- राष्ट्रवादी आंदोलन का विस्तार – अब तक अछूते वर्गों – छात्रों, महिलाओं और शहरी और ग्रामीण आबादी के कुछ वर्गों – ने भाग लिया। इस प्रकार, ब्रिटिश शासन के खिलाफ भविष्य के जन आंदोलनों की नींव रखी गई।
- बिपिन चंद्र पाल, अरबिंदो घोष और बाल गंगाधर तिलक जैसे युवा नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं
- बाद के आंदोलन की प्रमुख प्रवृत्तियाँ उभरीं: राष्ट्रीय आंदोलन की सभी प्रमुख प्रवृत्तियाँ, क्रांतिकारी आतंकवाद से लेकर आरंभिक समाजवाद तक, याचिकाओं और प्रार्थनाओं से लेकर निष्क्रिय प्रतिरोध और असहयोग तक, स्वदेशी आंदोलन के दौरान उभरीं।
- स्वदेशी (राष्ट्रीय) शिक्षा का शुभारंभ:
- अरबिंदो घोष के नेतृत्व में बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना की गई, जिसने देशभर में राष्ट्रीय स्कूलों और कॉलेजों के निर्माण को प्रेरित किया।
- राष्ट्रीय शिक्षा परिषद की स्थापना एक व्यापक राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली को व्यवस्थित करने के लिए की गई थी, जिसमें साहित्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी शामिल थी।
- तकनीकी शिक्षा के लिए एक बंगाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की स्थापना की गई और छात्रों को उन्नत शिक्षा के लिए जापान भेजने के लिए धन जुटाया गया।
- सांस्कृतिक पुनर्जागरण – इसने भारतीय भाषाओं, कलाओं और शिल्पों के पुनरुद्धार को प्रोत्साहित किया, जिससे सांस्कृतिक पहचान और विरासत का पुनरुत्थान हुआ।
- इस अवसर पर टैगोर की आमार सोनार बांग्ला लिखी गई। तमिलनाडु में सुब्रमण्यम भारती ने सुदेश गीतम लिखा।
- चित्रकला में, अवनींद्रनाथ टैगोर ने भारतीय कला परिदृश्य पर विक्टोरियन प्रकृतिवाद के वर्चस्व को तोड़ा और अजंता, मुगल और राजपूत चित्रकला से प्रेरणा ली। उन्होंने भारत माता को चित्रित किया।
- स्वदेशी उद्योगों को बढ़ावा – जैसे पी.सी.रे द्वारा बंगाल केमिकल्स फैक्ट्री, बंगाल लक्ष्मी कॉटन मिल्स, मोहिनी मिल्स और नेशनल टेनरी, जहाज निर्माण उद्योग- वी.ओ. चिदम्बरम पिल्लई द्वारा शुरू किया गया
- ब्रिटिश आयात पर निर्भरता कम करके भारतीय अर्थव्यवस्था का पुनरुद्धार
- राजनीतिक जागृति –लोगों को राजनीति के अधिक साहसिक स्वरूप में शिक्षित किया गया। इसने राष्ट्रीय गौरव और एकता की भावना पैदा की, देशभक्ति की भावना को बढ़ावा दिया और ब्रिटिश आधिपत्य को कमजोर किया।
- अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव – इसने औपनिवेशिक उत्पीड़न का सामना करने वाले देशों में समान आंदोलनों को प्रेरित किया, साम्राज्यवाद के खिलाफ वैश्विक संघर्ष में योगदान दिया।
स्वदेशी आंदोलन, हालांकि एक पूर्ण जन विद्रोह नहीं था, उसने राष्ट्रवाद की विविध अभिव्यक्तियों की नींव रखी जो राष्ट्रीय आंदोलन के बाद के चरणों में विकसित होती रही।
The Two-Nation Theory, leading to the partition of India in 1947, evolved through various stages influenced by political, social, and religious factors. It asserted that Muslims and Hindus were distinct nations and could not coexist in a single nation-state.
Evolution of two nation theory :
Growth of Communalism
- British Policy of Divide and Rule : After the 1870s government reversed its policy of repression of Muslims and, instead, decided to rally them behind the government through concessions, favours and reservations, and used them against nationalist forces.
- Communalism in History Writing : the communal interpretation of Indian history portrayed the ancient phase as the Hindu phase and the medieval phase as the Muslim phase.
- Side-effects of Socio-religious Reform Movements : Reform movements such as the Wahabi Movement among Muslims and Shuddhi among Hindus with their militant overtones made the role of religion more vulnerable to communalism.
- Side-effects of Militant Nationalism : For instance, Tilak’s Ganapati and Shivaji festivals and anti-cow slaughter campaigns created much suspicion.
- Communal Reaction by Majority Community: Formation and first session of the Hindu Mahasabha.(1915)
Early Developments
- Anti-Congress Front (1887): Figures like Syed Ahmed Khan, supported by the government, opposed the Congress.
- Shimla Delegation (1906): Led by Agha Khan, demanded separate electorates and significant Muslim representation.
Rising Political Consciousness (Early 20th Century)
- All-India Muslim League (1906): Established to protect Muslim interests, advocating for political representation and safeguards.
- Separate Electorates (1909): Morley-Minto Reforms introduced separate electorates for Muslims. It institutionalised communal representation, heightening communal consciousness.
- Lucknow Pact (1916): Congress accepted separate electorates, legitimizing the Muslim League as a separate political entity.
- Khilafat Movement (1920-22): Highlighted communal elements in Muslim political outlook.
- Nehru Report (1928): Opposed by Muslim hardliners and the Sikh League, leading to Jinnah’s fourteen points demanding separate electorates.
- Civil Disobedience Movement (1930-34): Limited Muslim participation compared to earlier movements.
- Communal Award (1932): Accepted all Muslim communal demands.
Development of the Theory (1920s-1930s)
- Muhammad Iqbal: In 1930, proposed the idea of a separate Muslim state in northwest India to preserve Muslim identity.
- Muhammad Ali Jinnah: Became the Muslim League leader, arguing that Muslims were a separate nation with distinct political interests.
Demand for Pakistan (1940s)
- Shift to Extreme Communalism (After 1937): After the Muslim League performed badly in the 1937 provincial elections, it decided to resort to extreme communalism.
- Pakistan Resolution (1940): Passed by the Muslim League, demanding an independent Pakistan.
- World War II: British concessions gave the League a virtual veto, which it used to stick to its demand for Pakistan.
Path to Partition (1946-1947)
- Direct Action Day (1946): Led to communal riots, showing deep divisions and making a united India seem impossible.
- Mountbatten Plan (1947): British decision to partition India, creating India and Pakistan.
