राजस्थान मानवाधिकार आयोग राजस्थान राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है, जिसका उद्देश्य राज्य में मानवाधिकारों की रक्षा, संवर्धन तथा उल्लंघनों की जांच सुनिश्चित करना है। यह आयोग नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के साथ-साथ प्रशासनिक जवाबदेही को भी सुदृढ़ करता है। इसके माध्यम से राज्य में न्याय, समानता और मानव गरिमा की स्थापना को बढ़ावा मिलता है।
राजस्थान मानवाधिकार आयोग: परिचय एवं स्थापना
- आधार: संसद द्वारा पारित मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993।
- राज्य मानवाधिकार आयोग सांविधिक, वैधानिक तथा स्वायत्त शासी निकाय के रूप में जाना जाता है।
- परिभाषा (धारा 2-घ): मानवाधिकार से अभिप्राय संविधान में उल्लिखित या अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा में शामिल व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता और प्रतिष्ठा से संबंधित अधिकार हैं, जो न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय (लागू योग्य) हों।
मानवाधिकार अधिनियम 1993 की प्रमुख धाराएँ एवम् राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग
गठन व सरंचना (धारा – 21)
- राज्य मानव अधिकार आयोग के गठन व सरंचना का उल्लेख धारा – 21 में किया गया है।
- गठन :- 18 जनवरी 1999
- क्रियाशील :- मार्च, 2000 से (अध्यक्ष एवं चार सदस्यों की नियुक्ति कर)
- राज्य मानवाधिकार आयोग एक बहुसदस्यीय निकाय है।
- प्रारंभिक (1993 अधिनियम): 1 पूर्णकालिक अध्यक्ष + 4 सदस्य।
- संशोधित (2006 अधिनियम): 1 अध्यक्ष + 2 सदस्य (वर्तमान में यही प्रावधान है)।
राष्ट्रीय मानव अधिकार संरक्षण (संशोधित) अधिनियम, 2019 के अनुसार-
- राज्य मानव अधिकार आयोग की सदस्य संख्या में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की सदस्य संख्या 2 से बढ़ाकर 3 कर दी गई, जिसमें 01 महिला सदस्य को अनिवार्य किया गया।
- अध्यक्ष की योग्यता (2019 संशोधन के बाद):
- अध्यक्ष: उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश या सेवानिवृत्त अन्य न्यायाधीश। (पहले केवल मुख्य न्यायाधीश का प्रावधान था)।
- सदस्य 1: उच्च न्यायालय का न्यायाधीश (वर्तमान या पूर्व) अथवा जिला न्यायाधीश (कम से कम 7 वर्ष का अनुभव)।
- नोट: कार्यरत/पूर्व न्यायाधीश या ज़िला न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति हेतु HC के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श आवश्यक है।
- सदस्य 2: मानवाधिकारों के मामले का जानकार।
- प्रशासनिक नेतृत्व: आयोग सचिव राज्य सरकार के सचिव स्तर से कम का अधिकारी नहीं होगा।
- अन्वेषण एजेंसी: आयोग की अपनी जांच एजेंसी है, जिसका नेतृत्व पुलिस महानिरीक्षक (IGP) स्तर का अधिकारी करता है।
अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति (धारा – 22)
- आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा चयन समिति की सिफ़ारिश पर की जाती है। चयन समिति में –
- मुख्यमंत्री (समिति का अध्यक्ष)
- राज्य का गृह मंत्री
- विधानसभा अध्यक्ष
- विधानसभा में विपक्ष का नेता
- नोट:- जिन राज्यो में विधानपरिषद है उनमे दो सदस्य अतिरिक्त शामिल किए जाते है, जो क्रमशः विधानपरिषद का सभापति तथा विधानपरिषद में विपक्ष का नेता होता है।
- शपथ: राज्यपाल या उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति द्वारा।
हटाने की प्रक्रिया (धारा -23)
- राज्य मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल करता है परन्तु हटाने का कार्य केवल राष्ट्रपति करता है।
- राष्ट्रपति उन्हें उसी प्रक्रिया से हटा सकते है जिस प्रक्रिया द्वारा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग अध्यक्ष व सदस्यों को हटाया जाता है
- राष्ट्रपति अध्यक्ष व सदस्यों को तभी हटाता है जब भी सर्वोच्च न्यायालय की जाँच प्रक्रिया में दोषी साबित हो।
- इसके अतिरिक्त राष्ट्रपति अध्यक्ष व सदस्यों को हटा सकते है-
- यदि दिवालिया घोषित हो
- मानसिक व शारीरिक रूप से असक्षम हो ।
- कार्यकाल के दौरान कोई लाभ का पद धारण किया हो।
कार्यकाल (धारा 24)
- वर्तमान में – मानव अधिकार संरक्षण (संशोधित) अधिनियम, 2019 के अध्यक्ष व सदस्यों का कार्यकाल 3 वर्ष / 70 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो निर्धारित किया गया है।
- मूलतः अध्यक्ष व सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष /70 वर्ष जो भी पहले हो निर्धारित किया गया था।
- अध्यक्ष व सदस्य पुनर्नियुक्ति के पात्र होंगे, अगर आयु 70 वर्ष से कम हो।
- आयोग से कार्यकाल पूर्ण होने के पश्चात अध्यक्ष व अन्य सदस्य केंद्र सरकार या राज्य सरकार अधीन कोई सरकारी पद धारण नहीं कर सकते।
- त्यागपत्र – अध्यक्ष व सदस्य राज्यपाल को संबोधित करते हुए त्यागपत्र देकर मुक्त हो सकते है। उनका त्यागपत्र उस दिन से प्रभावी होगा जिस दिन वह राज्यपाल द्वारा स्वीकार किया जाएगा।
कार्यवाहक अध्यक्ष(धारा – 25)
- अध्यक्ष की मृत्यु होने व त्यागपत्र देने या अनुपस्थिति जैसी स्थिति उत्पन्न होने पर राज्यपाल द्वारा सदस्यों में से ही किसी एक को कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति किया जा सकता है।
सेवा शर्तें व वेतन भत्ते (धारा – 26)
- राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों के वेतन भत्तों व सेवा शर्तों का निर्धारण राज्य सरकार करती है।
- कार्यकाल के दौरान उनके वेतन भत्तों में अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाता है।
- अध्यक्ष व सदस्यों का वेतन उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व अन्य न्यायाधीश के समान निर्धारित है।
- अध्यक्ष – 2.50 लाख रुपये
- सदस्य – 2.25 लाख रुपये
धारा 27 (अधिकारी व अन्य कर्मचारिवृंद):
- राज्य सरकार आयोग के कार्यों के कुशल निष्पादन हेतु ‘सचिव’ स्तर के अधिकारी तथा ‘महानिरीक्षक’ (IGP) रैंक के अन्वेषण अधिकारी सहित अन्य आवश्यक कर्मचारी उपलब्ध कराएगी।
आयोग का प्रतिवेदन (धारा 28)
- राज्य मानवाधिकार आयोग अपना वार्षिक या विशेष प्रतिवेदन राज्य सरकार को सौंपता है। तथा राज्य सरकार इसे विधायिका के समक्ष प्रस्तुत करती है।
- इस प्रतिवेदन में यह बताया जाता है कि आयोग द्वारा दी गयी सलाह पर राज्य सरकार ने कौनसे कदम उठाये है।
- यदि आयोग की किसी सलाह को राज्य सरकार ने नहीं माना है तो इसके कारणो का तर्क पूर्ण उत्तर दिया जाता है।
- नोट: आयोग का सचिव राज्य सरकार का सचिव स्तर का अधिकारी होता है।
धारा 33 (निधि का प्रावधान):
- राज्य सरकार, विधानमंडल द्वारा विनियोजित धनराशि में से आयोग को ऐसी अनुदान राशि देगी जिसे वह इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आवश्यक समझे।
धारा 35 (लेखा व अंकेक्षण):
- आयोग उचित लेखा विवरण रखेगा और इसके खातों का अंकेक्षण (Audit) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) द्वारा किया जाएगा।
धारा 39 (लोक सेवक होना):
- आयोग के सभी सदस्य और अधिकारी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 21 के अर्थ के अंतर्गत ‘लोक सेवक’ (Public Servant) माने जाएंगे।
धारा 40 (केंद्र सरकार की नियम बनाने की शक्ति):
- इस अधिनियम के प्रावधानों को कार्यान्वित करने के लिए केंद्र सरकार के पास नियम बनाने की विशिष्ट शक्ति होगी।
धारा 41 (राज्य सरकार/आयोग की नियम बनाने की शक्ति):
- राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा उन विषयों पर नियम बना सकेगी जो राज्य आयोग की शक्तियों और कार्यों के प्रशासन से संबंधित हैं।
आयोग की भूमिका
- आयोग का कार्य मुख्य रूप से सलाहकारी प्रकृति का होता है। इसे मानवाधिकार का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को सजा देने का अधिकार नही होता है और नहीं पीड़ित व्यक्ति को आर्थिक सहायता देने का अधिकार
- आयोग की सलाह राज्य सरकार या अन्य किसी अधिकारी के लिए बाध्यकारी नहीं है।
- लेकिन इतना आवश्यक है आयोग द्वारा दी गयी सलाह पर क्या कदम उठाया गया इसकी जानकारी 1 माह के भीतर देना अनिवार्य है।
राज्य मानवाधिकार आयोग: कार्य, शक्तियाँ एवं अधिकार क्षेत्र
जांच एवं हस्तक्षेप की शक्तियाँ
- क्षेत्राधिकार: आयोग राज्य सूची तथा समवर्ती सूची से जुड़े विषयों पर मानवाधिकार उल्लंघन की जांच कर सकता है।
- स्वतः संज्ञान (Suo-motu): पीड़ित की अर्जी के अलावा आयोग घटना से संबंधित समाचार या जानकारी पर स्वतः संज्ञान लेकर भी जांच कर सकता है।
- न्यायिक हस्तक्षेप: किसी न्यायालय में लंबित मानवाधिकार संबंधी कार्यवाही में उस न्यायालय की अनुमति से दखल देने या जांच करने का अधिकार।
- समय सीमा: आयोग केवल 1 वर्ष की अवधि के भीतर के मामलों की ही सुनवाई कर सकता है (एक वर्ष से पुराने मामले इसके अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं)।
- न्यायालय की शक्ति: आयोग को अपने कार्यों को संपन्न करने के लिए दीवानी न्यायालय (Civil Court) की शक्तियाँ प्राप्त हैं।
निगरानी एवं निरीक्षण कार्य
- जेल एवं बंदीगृह: कारागारों, सुधार गृहों, मानसिक अस्पतालों या नजरबंदी केंद्रों का दौरा करना, वहां की स्थिति का अध्ययन करना तथा जीवन दशाओं में सुधार की सिफारिश करना।
- संवैधानिक समीक्षा: मानवाधिकारों की रक्षा हेतु बनाए गए संवैधानिक व विधिक उपबंधों की समीक्षा करना तथा उनके प्रभावी क्रियान्वयन की सिफारिश करना।
- बाधाओं का अध्ययन: आतंकवाद सहित उन सभी कारणों की समीक्षा करना जिनसे मानवाधिकारों के उपभोग में अवरोध पैदा होता है, तथा इनसे बचाव के उपाय सुझाना।
सामाजिक एवं शैक्षणिक उत्तरदायित्व
- बाल अधिकार: 14 वर्ष की आयु तक के बच्चों को आवश्यक एवं नि:शुल्क शिक्षा सुनिश्चित करना तथा बाल श्रम के शोषण व बाल वेश्यावृत्ति को रोकना।
- महिला एवं बाल कल्याण: गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत करने हेतु माताओं तथा बच्चों के कल्याण के लिए 11 प्राथमिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की सिफारिश करना।
- स्वास्थ्य एवं जागरूकता: माताओं में रक्त की कमी (अल्प रक्तता), बच्चों में जन्मजात मानसिक अपंगता और एचआईवी/एड्स पीड़ितों के अधिकारों पर ध्यान देना।
- शोध एवं शिक्षा: मानवाधिकार के क्षेत्र में शोध कार्य करना, उन्हें प्रोत्साहित करना तथा मीडिया, सेमिनार व अन्य साधनों से मानवाधिकार शिक्षा का प्रसार व जागरूकता बढ़ाना।
- NGOs को प्रोत्साहन: मानवाधिकार क्षेत्र में सक्रिय गैर-सरकारी संगठनों के प्रयासों को बढ़ावा देना।
जनहित एवं विशिष्ट सुरक्षा क्षेत्र
- जन स्वास्थ्य एवं प्रदूषण: प्रदूषण नियंत्रण, खाद्य पदार्थों एवं औषधियों में मिलावट की रोकथाम तथा अवधि पार (Expired) औषधियों पर रोक से संबंधित शिकायतों पर कार्यवाही।
- सामाजिक बुराइयां: हाथ से मैला ढोने की प्रथा का उन्मूलन तथा धर्म, जाति या उपजाति के आधार पर सामाजिक बहिष्कार के मामलों की जांच।
- हिरासत संबंधी मामले: हिरासत में हुई मौतों, बलात्कार और पुलिस/जेलों में होने वाले मानवीय उत्पीड़न को रोकना।
- मानवाधिकार प्रकोष्ठ: जिला मुख्यालयों पर ‘मानव अधिकार प्रकोष्ठ’ की स्थापना करना।
प्रशासनिक एवं अन्वेषण ढांचा
- अन्वेषण एजेंसी : आयोग की अपनी एक जांच एजेंसी है, जिसका नेतृत्व ऐसे पुलिस अधिकारी द्वारा किया जाता है जो पुलिस महानिरीक्षक (IGP) के पद से कम स्तर का न हो।
- सचिव की शक्तियाँ (2019 संशोधन): मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 2019 के अनुसार, आयोग के सचिव आयोग के नियंत्रणाधीन सभी प्रशासनिक व वित्तीय शक्तियों का उपयोग कर सकते हैं। आयोग का सचिव भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) का अधिकारी होता है, जो राज्य सरकार के सचिव स्तर (Rank) से कम के पद का नहीं होगा।”
जांच के पश्चात् आयोग द्वारा उठाए जाने वाले कदम
- क्षतिपूर्ति की सिफारिश: यह पीड़ित व्यक्ति को हुए नुकसान के भुगतान या हर्जाने हेतु संबंधित सरकार या प्राधिकरण को सिफारिश कर सकता है।
- अंतरिम सहायता: पीड़ित व्यक्ति को तत्काल अंतरिम राहत (Interim Relief) प्रदान करने की सिफारिश कर सकता है।
- दोषी लोकसेवक पर कार्यवाही: यदि जांच में कोई लोकसेवक दोषी पाया जाता है, तो उसके विरुद्ध बंदी-प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) की कार्यवाही शुरू करने या अभियोजन चलाने की सिफारिश कर सकता है।
- न्यायिक शरण: आयोग अपने किसी भी आदेश, निर्देश अथवा रिट (Writ) के अनुपालन के लिए सीधे सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) या उच्च न्यायालय (High Court) में याचिका दायर कर सकता है।
राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष
| क्र.सं. | नाम | कार्यकाल (वर्ष) | विशेष विवरण |
| 1. | न्यायाधिपति श्रीमती कान्ता भट्नागर | 2000 | प्रथम अध्यक्ष (न्यूनतम कार्यकाल)प्रथम महिलाराजस्थान हाई कोर्ट की जज भी रहीं। |
| 2. | न्यायाधिपति श्री एस. सगीर अहमद | 2001 – 2004 | |
| 3. | न्यायाधिपति श्री अमर सिंह गोदारा | 2004 – 2005 | प्रथम कार्यवाहक अध्यक्ष |
| 4. | न्यायाधिपति श्री एन.के. जैन | 2005 – 2010 | सर्वाधिक लम्बा कार्यकाल (स्थाई) |
| 5. | न्यायाधिपति श्री जगत सिंह | 2010 | कार्यवाहक अध्यक्ष |
| 6. | श्री पुखराज सिरवी | 2010 – 2011 | कार्यवाहक अध्यक्ष |
| 7. | श्री एच.आर. कुडी | 2012 – 2016 | सर्वाधिक लम्बे समय तक कार्यवाहक अध्यक्ष |
| 8. | न्यायाधिपति श्री प्रकाश टाटिया | 2016 – 2019 | |
| 9. | न्यायाधिपति श्री महेश चन्द्र शर्मा | 2019 – 2021 | कार्यवाहक अध्यक्ष |
| 10. | श्री गोपाल कृष्ण व्यास | 2021 – 2024 | |
| 11. | श्री रामचंद्र झाला | 2024 | अंतिम कार्यवाहक अध्यक्ष |
| 12. | श्री गंगा राम मूलचंदानी | 28.06.2024 से लगातार | वर्तमान अध्यक्ष |
राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के सदस्य
| क्र.सं. | सदस्य का नाम | कार्यकाल (वर्ष) | विशेष विवरण |
| 1 | जस्टिस अमर सिंह गोदारा | 2000 – 2005 | कार्यवाहक अध्यक्ष रहे। |
| 2 | श्री आर.के. आकोदिया | 2000 – 2005 | |
| 3 | श्री बी.एल. जोशी | 2000 – 2004 | |
| 4 | प्रोफेसर आलम शाह खान | 2000 – 2003 | |
| 5 | श्री नमो नारायण मीणा | 2003 – 2004 | पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री। |
| 6 | जस्टिस जगत सिंह | 2005 – 2010 | कार्यवाहक अध्यक्ष रहे। |
| 7 | श्री धर्म सिंह मीणा | 2005 – 2010 | |
| 8 | श्री पुखराज सीरवी | 2006 – 2011 | कार्यवाहक अध्यक्ष रहे। |
| 9 | श्री एच.आर. कुडी | 2011 – 2016 | कार्यवाहक अध्यक्ष रहे। |
| 10 | श्री एम.के. देवराजन | 2011 – 2016 | |
| 11 | जस्टिस महेश चंद्र शर्मा | 2018 – 2021 | कार्यवाहक अध्यक्ष रहे। |
| 12 | श्री महेश गोयल | 2021 – 2024 | |
| 13 | जस्टिस रामचंद्र सिंह झाला | 2023 – वर्तमान | कार्यवाहक अध्यक्ष रहे। |
| 14 | श्री अशोक कुमार गुप्ता | 2024 – वर्तमान |
