राजस्थान उच्च न्यायालय

राजस्थान उच्च न्यायालय राजस्थान की न्यायिक व्यवस्था का सर्वोच्च न्यायिक संस्थान है, जो राज्य में कानून के शासन और न्याय की स्थापना सुनिश्चित करता है। यह विषय “राजस्थान राजनीतिक व्यवस्था” के अंतर्गत महत्वपूर्ण स्थान रखता है, क्योंकि यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा तथा प्रशासनिक कार्यों की वैधानिकता की निगरानी करता है। जयपुर और जोधपुर में इसकी पीठें स्थापित हैं, जो राज्यभर में न्यायिक सेवाएँ प्रदान करती हैं।

  • इस समय देश में 25 उच्च न्यायालय हैं। इनमें से चार साझा उच्च न्यायालय हैं। 25वाँ उच्च न्यायालय 1 जनवरी, 2019 को आंध्रप्रदेश के अमरावती में स्थापित हुआ।  केवल दिल्ली ऐसा संघ राज्य क्षेत्र है, जिसका अपना उच्च न्यायालय (1966 से) है। 
  • भारत में सबसे पुराना उच्च न्यायालय कोलकाता उच्च न्यायालय है जिसकी स्थापना 1 जुलाई, 1862 को हुई थी।
  • उच्च न्यायालय चुनाव सम्बन्धी मुकदमों की भी सुनवाई कर सकता है।
  • मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मुकदमे उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालय में सुने जा सकते हैं।
  • मुम्बई(बम्बई), चेन्नई (मद्रास) उच्च न्यायालय को यह अधिकार प्राप्त है कि वह ईसाई व पारसियों की शादी व तलाक के मुकदमे प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत सुने। 
  • वसीयत, विवाह एवं तलाक, कम्पनी कानून के मामले, भूमि, कर तथा उससे वसूली सम्बन्धित मामले सीधे उच्च न्यायालय में लाए जा सकते हैं। उच्च न्यायालय की अवमानना सम्बन्धी मुकदमे भी उच्च न्यायालय में सुने जा सकते हैं। 
  • प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार- उच्च न्यायालय को राजस्व तथा संग्रह, मूल अधिकारों के उल्लंघन के मामले में प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार है। इसमें संसद सदस्यों और राज्य विधानसभा सदस्यों के निर्वाचन से संबंधित विवाद, संविधान की व्याख्या संबंधी  मामले, वसीयत, विवाह, तलाक, कम्पनी कानून एवं न्यायालय की अवमानना से संबंधित मामलों में आरम्भिक शक्तियाँ प्राप्त हैं।

राज्य न्यायापालिका से संबंधित अनुच्छेद

भारत के संविधान के अनुच्छेद 214 से 237 तक राज्य न्यायापालिका से संबंधित है –
  • भारतीय संविधान के भाग-6 तथा अध्याय-5 में अनुच्छेद 214 से अनुच्छेद 231 में उच्च न्यायालय की संरचना तथा कार्य का वर्णन किया गया है।
  • संविधान के भाग VI में अनुच्छेद 233 से 237 तक अधीनस्थ न्यायालयों के संगठन एवं कार्यपालिका’ से स्वतंत्रता सुनिश्चित करने वाले उपबंधों का वर्णन किया गया है।
अनुच्छेदविषय वस्तु (Subject Matter)
214राज्यों के लिए उच्च न्यायालय
215उच्च न्यायालयों का ‘अभिलेख न्यायालय’ (Court of Record) होना
216उच्च न्यायालयों का गठन
217उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति और पद की शर्तें
218सर्वोच्च न्यायालय से संबंधित कुछ प्रावधानों का उच्च न्यायालयों पर लागू होना
219उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
220स्थायी न्यायाधीश होने के बाद विधि व्यवसाय (Practice) पर प्रतिबंध
221न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते आदि
222एक न्यायाधीश का एक उच्च न्यायालय से दूसरे में स्थानांतरण
223कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति (Acting Chief Justice) की नियुक्ति
224अपर (Additional) और कार्यकारी न्यायाधीशों की नियुक्ति
224Aउच्च न्यायालयों की बैठकों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति
225विद्यमान उच्च न्यायालयों की अधिकारिता (Jurisdiction)
226कुछ रिट (Writs) निकालने की उच्च न्यायालय की शक्ति
227सभी न्यायालयों के अधीक्षण (Superintendence) की उच्च न्यायालय की शक्ति
228कुछ मामलों का उच्च न्यायालय को अंतरण (Transfer)
229उच्च न्यायालयों के अधिकारी, सेवक तथा व्यय
230उच्च न्यायालयों की अधिकारिता का संघ राज्यक्षेत्रों (UTs) पर विस्तार
231दो या अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय की स्थापना
अनुच्छेद 214- राज्यों के लिए उच्च न्यायालय
  • प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा।
अनुच्छेद 215 – उच्च न्यायालय अभिलेखों के न्यायालय के रूप में 
  • प्रत्येक उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा और उसको अपने अवमान के लिए दंड देने की शक्ति सहित ऐसे न्यायालय की सभी शक्तियाँ होंगी।
  • उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय अन्य न्यायालयों के लिए अनुकरणीय होगें।
  • अन्य न्यायालय उन निर्णयों की समीक्षा या आलोचना नहीं कर सकते हैं।
  • न्यायालय की अवमानना पर 6 माह की सजा अथवा 2 हजार रुपये जुर्माना अथवा दोनों की सजा दी जा सकती है।
अनुच्छेद 217 – उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं पद की शर्तें : 

    (1) 

  • इस अनुच्छेद के प्रावधानानुसार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति तथा संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श करने के पश्चातू राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर एवं मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा करता है। 
  • उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश एवं उस राज्य के राज्यपाल के परामर्श से की जाती है।
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का कार्यकाल 62 वर्ष की आयु होने तक निर्धारित किया गया है।
    • नोट : 15वें संविधान संशोधन 1963 द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति की आयु 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष की गई थी। 
    • संविधान समीक्षा आयोग ने भी न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु को 62 वर्ष से बढ़ाकर 65 वर्ष करने को अनुशंसा की थी।
    • परंतु-
      • (क) कोई न्यायाधीश, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा ;
      • (ख) किसी न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए अनुच्छेद 124 के खंड (4) में उपबंधित रीति से उसके पद से राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकेगा ;
    • [नोट:  अनुच्छेद 124 (4) – उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उसके पद से तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक साबित कदाचार या असमथर्ता के आधार पर ऐसे हटाए जाने के लिए  संसद के प्रत्येक सदन द्वारा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपिस्थत और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा समर्थित समावेदन,
      • राष्ट्रपति के समक्ष उसी सत्र में रखे जाने पर राष्ट्रपति ने आदेश नहीं दे दिया है।]
      • (ग) किसी न्यायाधीश का पद, राष्ट्रपति द्वारा उसे उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किए जाने पर या राष्ट्रपति द्वारा उसे भारत के राज्यक्षेत्र में किसी अन्य उच्च न्यायालय को, अंतरित किए जाने पर रिक्त हो जाएगा।

(2) 

  • कोई व्यक्ति, किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हत होगा जब वह भारत का नागिरक है और 
  • (क) भारत के राज्यक्षेत्र में कम से कम दस वर्ष तक न्यायिक पद धारण कर चुका है; या
  • (ख) किसी उच्च न्यायालय का या ऐसे दो या अधिक न्यायालयों का लगातार कम से कम दस वर्ष तक अधिवक्ता रहा है;

(3) 

  • यदि उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश की आयु के बारे में कोई प्रश्न उठता है तो उस प्रश्न का विनिश्चय भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श करने के पश्चात्‌ राष्ट्रपति का विनिश्चय अंतिम होगा।
अनुच्छेद 218 – उच्चतम न्यायालय से जुड़े कुछ नियमों का उच्च न्यायालय पर लागू होना
  • अनुच्छेद 124 के खंड (4) और खंड (5) में जो नियम उच्चतम न्यायालय के लिए लिखे गए हैं, वही नियम उच्च न्यायालय पर भी लागू होंगे। बस जहाँ-जहाँ “उच्चतम न्यायालय” लिखा है, वहाँ “उच्च न्यायालय” माना जाएगा।
अनुच्छेद 124(4):
  • उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उसके पद से तब तक नहीं हटाया जा सकता, जब तक कि उसके साबित कदाचार (गलत व्यवहार) या असमर्थता के आधार पर हटाने का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों द्वारा पास न किया जाए। यह प्रस्ताव प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत से और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पास होना चाहिए। इसके बाद उसी सत्र में यह प्रस्ताव राष्ट्रपति के सामने रखा जाता है और राष्ट्रपति के आदेश देने पर ही न्यायाधीश को पद से हटाया जाता है।
अनुच्छेद 124(5):
  • संसद कानून बनाकर यह तय कर सकती है कि खंड (4) के तहत प्रस्ताव कैसे लाया जाएगा और न्यायाधीश के कदाचार या असमर्थता की जांच और उसे साबित करने की प्रक्रिया क्या होगी।
  • अभी तक राजस्थान के किसी न्यायाधीश व मुख्य न्यायाधीश को हटाने की कार्यवाही कभी भी संसंद में विचाराधीन नहीं रही है।
अनुच्छेद 219 –  उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की शपथ या प्रतिज्ञान
  • उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए नियुक्त हर व्यक्ति को पद संभालने से पहले उस राज्य के राज्यपाल या राज्यपाल द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के सामने तीसरी अनुसूची में दिए गए प्रारूप के अनुसार शपथ या प्रतिज्ञान करना होगा और उस पर हस्ताक्षर करने होंगे।
अनुच्छेद 220 – स्थायी न्यायाधीश बहाल होने के बाद प्रैक्टिस पर प्रतिबंध 
  • कोई व्यक्ति, जिसने इस संविधान के प्रारंभ के पश्चात्‌ किसी उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में पद धारण किया है, उच्चतम न्यायालय और अन्य उच्च न्यायालयों के सिवाय भारत में किसी न्यायालय या किसी प्राधिकारी के समक्ष अभिवंचन या कार्य नहीं करेगा।
अनुच्छेद 221 – न्यायाधीशों का वेतन इत्यादि।
  1. प्रत्येक उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को ऐसे वेतनों का संदाय किया जाएगा जो संसद, विधि द्वारा, अवधारित करे और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक ऐसे वेतनों का संदाय किया जाएगा जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं।
  2. प्रत्येक न्यायाधीश ऐसे भत्तों का तथा अनुपस्थिति छुट्टी और पेंशन के संबंध में ऐसे अधिकारों का, जो संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन समय-समय पर अवधारित किए जाएँ , और जब तक इस प्रकार अवधारित नहीं किए जाते हैं तब तक ऐसे भत्तों और अधिकारों का जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं, हकदार होगा।
    • परंतु किसी न्यायाधीश के भत्तों में और अनुपस्थिति छुट्टी या पेंशन के संबंध में उसके अधिकारों में उसकी नियुक्ति के पश्चात्‌ उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा।
  • वर्तमान में प्रतिमाह वेतन
    • उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश – 2.50 लाख रुपये 
    • अन्य न्यायाधीश –  2.25 लाख रुपये 
  • न्यायाधीशों के वेतन तथा भत्ते राज्य की संचित निधि में से दिये जाते हैं, परन्तु पेंशन भारत की संचित निधि से प्रदान की जाती है तथा उनके कार्यकाल में उन्हें कम नहीं किया जा सकता है।
अनुच्छेद 222- किसी न्यायाधीश का एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरण
  1. राष्ट्रपति, अनुच्छेद 124A में बताए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की सिफारिश पर, किसी भी न्यायाधीश का एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरण कर सकता है।
  2. जब किसी न्यायाधीश का इस तरह स्थानांतरण किया जाता है, तो वह उस अवधि में, जब वह संविधान (पंद्रहवाँ संशोधन) अधिनियम, 1963 के लागू होने के बाद दूसरे उच्च न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में सेवा करता है, अपने वेतन के अलावा एक प्रतिपूरक भत्ता पाने का हकदार होगा। यह भत्ता संसद कानून बनाकर तय करेगी, और जब तक ऐसा कानून नहीं बनता, तब तक राष्ट्रपति आदेश द्वारा इसे तय करेगा।
अनुच्छेद 223 – कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति
  • जब किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद खाली हो, या मुख्य न्यायाधीश अनुपस्थिति या किसी अन्य कारण से अपने कर्तव्यों का पालन नहीं कर पा रहा हो, तब उस उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों में से किसी एक न्यायाधीश को, जिसे राष्ट्रपति इस काम के लिए नियुक्त करे, कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश के रूप में उस पद के कर्तव्यों का पालन करना होगा।
अनुच्छेद-224 – अपर और कार्यकारी न्यायाधीशों की नियुक्ति
  1. यदि किसी उच्च न्यायालय के कार्य में किसी अस्थायी वृद्धि के कारण या उसमें कार्य की बकाया के कारण राष्ट्रपति अधिकतम 2 वर्ष के लिए उस न्यायालय के अपर न्यायाधीश नियुक्त कर सकेगा।
  2. जब किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति से भिन्न कोई न्यायाधीश अनुपस्थिति के कारण या अन्य कारण से अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है या मुख्य न्यायमूर्ति के रूप में अस्थायी रूप से कार्य करने के लिए नियुक्त किया जाता है तब राष्ट्रपति सम्यक्‌ रूप से अर्हित किसी व्यक्ति को तब तक के लिए उस न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्य करने के लिए नियुक्त कर सकेगा जब तक स्थायी न्यायाधीश अपने कर्तव्यों को फिर से नहीं संभाल लेता है।
  3. उच्च न्यायालय के अपर या कार्यकारी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त कोई व्यक्ति बासठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात्‌ पद धारण नहीं करेगा।

15वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1963

  • उच्च न्यायालय को अपने क्षेत्राधिकार के बाहर भी किसी व्यक्ति या प्राधिकरण को प्रादेश जारी करने के लिए सक्षम बनाता है यदि कार्रवाई का कारण क्षेत्रीय सीमा के भीतर उत्पन्न होता है।
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु 60 से बढ़ाकर 62 कर दी। 
  • उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों और उसी न्यायालय के कार्यवाहक न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान किया।
  • एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय में स्थानांतरण के बाद न्यायाधीश को प्रतिपूरक भत्ते का प्रावधान किया।
  • उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को सर्वोच्च न्यायालय के लिए तदर्थ न्यायाधीश के रूप में कार्य करने में सक्षम बनाया।
  • उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की आयु निर्धारित करने की प्रक्रिया है।
अनुच्छेद 225 – विद्यमान उच्च न्यायालयों का अधिकार-क्षेत्र
  • संविधान के प्रारंभ के अधीन रहते हुए और इस संविधान के किसी उपबंध के अधीन रहते हुए, संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले जो अधिकार-क्षेत्र, शक्तियाँ और अधिकार किसी उच्च न्यायालय को प्राप्त थे, वे उसी प्रकार बने रहेंगे।
  • इनमें उन न्यायालयों के न्यायाधीशों की शक्तियाँ, एकल न्यायाधीशों या खंडपीठों द्वारा मामलों की सुनवाई करने की शक्ति और न्यायालय के नियम बनाने की शक्ति भी शामिल है।
अनुच्छेद 226 – कुछ रिट जारी करने की उच्च न्यायालय की शक्ति
  • प्रत्येक उच्च न्यायालय को यह शक्ति होगी कि वह अपने अधिकार-क्षेत्र के भीतर किसी भी व्यक्ति, प्राधिकरण या सरकार को निर्देश, आदेश या रिट जारी कर सके।
  • ये रिट हैबियस कॉर्पस, मांडमस, प्रोहिबिशन, सर्टियोरारी और क्वो-वारंटो के रूप में हो सकती हैं।
  • यह शक्ति मौलिक अधिकारों को लागू कराने के लिए तथा अन्य किसी उद्देश्य के लिए भी प्रयोग की जा सकती है।
अनुच्छेद 227 – सभी न्यायालयों पर उच्च न्यायालय की अधीक्षण शक्ति
  • प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने अधिकार-क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सभी न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण (superintendence) की शक्ति होगी।
  • इस शक्ति के अंतर्गत उच्च न्यायालय:
    • उन न्यायालयों से विवरण मंगा सकता है
    • उनके लिए नियम बना सकता है
    • कार्यवाही और अभिलेख रखने की विधि निर्धारित कर सकता है।
अनुच्छेद 228 – कुछ मामलों का उच्च न्यायालय में स्थानांतरण
  • यदि किसी अधीनस्थ न्यायालय में लंबित किसी मामले में संविधान की व्याख्या से संबंधित कोई महत्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न होता है, तो उच्च न्यायालय उस मामले को अपने पास मंगा सकता है।
  • उच्च न्यायालय उस प्रश्न का निर्णय कर सकता है और उसके बाद आवश्यक समझे तो मामला फिर से अधीनस्थ न्यायालय को भेज सकता है।
अनुच्छेद 229 – उच्च न्यायालय के अधिकारी और सेवक तथा व्यय
  • उच्च न्यायालय के अधिकारियों और सेवकों की नियुक्ति मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा की जाएगी या उनके द्वारा अधिकृत किसी अधिकारी द्वारा की जाएगी।
  • उनकी सेवा की शर्तें नियमों द्वारा निर्धारित की जाएंगी।
  • उच्च न्यायालय के प्रशासनिक व्यय, जिनमें वेतन और भत्ते शामिल हैं, राज्य की संचित निधि पर भारित होंगे।
अनुच्छेद 230 – संघ राज्य क्षेत्र तक उच्च न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र का विस्तार
  • संसद कानून बनाकर किसी राज्य के उच्च न्यायालय के अधिकार-क्षेत्र को किसी संघ राज्य क्षेत्र तक बढ़ा सकती है या उसे सीमित भी कर सकती है।
अनुच्छेद 231 – दो या अधिक राज्यों के लिए एक सामान्य उच्च न्यायालय
  • संसद कानून द्वारा यह व्यवस्था कर सकती है कि दो या दो से अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय स्थापित किया जाए।
  • ऐसा उच्च न्यायालय उन राज्यों के लिए समान रूप से कार्य करेगा।
अनुच्छेद 232 – यह अनुच्छेद संविधान से हटा दिया गया है (Omitted)।
  • राजस्थान एकीकरण (30 मार्च, 1949) के समय 5 उच्च न्यायालय थे।  
    • जोधपुर
    • जयपुर
    • बीकानेर
    • अलवर
    • उदयपुर (इसकी खंडपीठ कोटा थी)

पटेल समिति (Patel Committee) – 

  • राज्य की राजधानी तथा उच्च न्यायालय की सीट के स्थान का निर्धारण करना।
  • इस समिति में 3 सदस्य थे –
    • बी.आर. पटेल (अध्यक्ष) – तत्कालीन मुख्य सचिव, पेप्सू
    • टी.सी. पुरी (ले. कर्नल) – स्वास्थ्य सेवा निदेशक
    • एस.पी. सिन्हा – PWD के अधीक्षण अभियन्ता
  • सिफारिश – इस समिति ने 27 मार्च 1949 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए सिफारिश की कि –
    • नए राज्य की राजधानी जयपुर होगी।
    • उच्च न्यायालय जोधपुर में स्थित होगा।

राजस्थान उच्च न्यायालय अध्यादेश, 1949 – 

  • अध्यादेश 21 जून 1949 को जारी कर पाँचो उच्च न्यायालयों का क्षेत्राधिकार समाप्त कर दिया और पूरे राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय का स्थान जोधपुर रखा गया। तथा ऐसे अन्य स्थानों पर भी होगा जहाँ राजप्रमुख समय-समय पर स्थायी या निर्दिष्ट अवधि के लिए नियुक्त करेगा।
  • मुख्य न्यायाधीश को यह अधिकार दिया गया कि वह उच्च न्यायालय के लिए एक या अधिक न्यायाधीशों को अन्य स्थानों पर बैठने के लिए नामित कर सकेगा।

राजस्थान उच्च न्यायालय स्थापना

  • राजप्रमुख ने 25 अगस्त 1949 को अधिसूचना जारी कर 29 अगस्त 1949 को राजस्थान उच्च न्यायालय का उद्घाटन करने की तिथि निश्चित की।
  • प्रारंभिक बैठक स्थान
    • जयपुर (कोटा क्षेत्राधिकार सहित)
    • उदयपुर
  • उद्घाटन 29 अगस्त, 1949 को राजप्रमुख महामहिम महाराजा सवाई मानसिंह की अध्यक्षता में जोधपुर में किया गया तथा माननीय न्यायमूर्ति कमलकांत वर्मा (इलाहाबाद एवं उदयपुर उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश) ने अन्य 11 न्यायाधीशों के साथ शपथ ली।
    • न्यायमूर्ति लाला नवल किशोर, जोधपुर (29.08.1949 से) 
    • न्यायमूर्ति कुंवर अमर सिंह जसोल, जोधपुर 
    • न्यायमूर्ति कंवरलाल बाफना, जयपुर 
    • न्यायमूर्ति मोहम्मद इब्राहिम, जयपुर 
    • न्यायमूर्ति जवान सिंह राणावत, उयदपुर 
    • न्यायमूर्ति सादुल सिंह मेहता, उदयपुर 
    • न्यायमूर्ति दुर्गाशंकर दवे, बूंदी 
    • न्यायमूर्ति त्रिलोकचंद दत, बीकानेर 
    • न्यायमूर्ति आनंद नारायण कौल, अलवर 
    • न्यायमूर्ति केके शर्मा, भरतपुर 
    • न्यायमूर्ति खेम चंद गुप्ता, कोटा
  • कमलकांत वर्मा इसके पहले मुख्य न्यायाधीश थे जबकि संविधान लागू होने के बाद कैलाशनाथ  वांचु इसके पहले मुख्य न्यायाधीश बने।
  • 1950 में परिवर्तन –
    • 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने पर राजस्थान को संविधान की प्रथम अनुसूची में ‘बी श्रेणी’ का राज्य माना गया तथा न्यायाधीशों की संख्या घटाकर 6 कर दी गई। 
    • 8 मई 1950 को राजप्रमुख ने 1949 के उपयुक्त अध्यादेश की धारा 10 के अन्तर्गत अधिसूचना जारी करते हुए राजस्थान उच्च न्यायालय की पीठें बीकानेर, कोटा और उदयपुर को 22 मई 1950 को समाप्त कर दिया।
  • राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 का प्रभाव –
    • ‘बी’ श्रेणी के राज्यों के उच्च न्यायालय समाप्त किए गए तथा राजस्थान के मौजूद उच्च न्यायालय और अजमेर के न्यायिक आयुक्त का न्यायालय समाप्त कर दिए गए एवं अधिनियम की धारा 49(2) के तहत पुनर्गठित राजस्थान राज्य के लिए उच्च न्यायालय की स्थापना का उपबंध किया गया।
    • 27 अक्टूबर, 1956 को भारत सरकार ने सूचना जारी की कि 1 नवम्बर, 1956 से नव सृजित राजस्थान राज्य की राजधानी जयपुर रहेगी और राजस्थान उच्च न्यायालय का स्थान (मुख्यपीठ) जोधपुर रहेगा तथा 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनिमय को धारा 51(3) के तहत उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश राज्यपाल से अनुमोदन प्राप्त कर अन्य स्थानों पर अस्थायी पीठो  (Temporary Benches) को स्थापित करने का उपबन्ध था। इसी के तहत राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने 1 नवम्बर, 1956 को जयपुर में राजस्थान उच्च न्यायालय की अस्थायी पीठ स्थापित की।
    • 1 नवम्बर, 1956 को 6 न्यायाधीशों ने राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद पर नई शपथ ली। जिनका बैठने का स्थान निम्न है –
      • जयपुर की अस्थायी पीठ
        1. न्यायाधीश कैलाश नाथ बापना
        2. जसवंत सिंह राणावत
        3. कैलाश चन्द्र शर्मा 
        4. दौलत मल भण्डारी 
      • जोधपुर मुख्यपीठ 
        1. न्यायाधीश देवराज सिंह दवे 
        2. इन्द्रनाथ मोदी 
      • जोधपुर मुख्य पीठ और जयपुर अस्थायी पीठ – दोनों स्थान
        1. कैलाश नाथ वांचू

पी. सत्यनारायण राव समिति – 11 जुलाई 1957

  • सदस्य
    • पी. सत्यनारायण राव (अध्यक्ष)
    • वी. विश्वनाथन
    • बी.के. गुप्ता 
  • प्रतिवेदन – 26 फरवरी 1958
  • सिफारिशें-
    • राजस्थान की राजधानी जयपुर रहे
    • उच्च न्यायालय की मुख्य पीठ जोधपुर में रहे
    • जयपुर पीठ समाप्त कर दी जाए
  • 1958 में जयपुर पीठ समाप्त कर दी गई।

जयपुर स्थायी पीठ की पुनर्स्थापना – 

  • राष्ट्रपति ने 8 दिसंबर 1976 को आदेश जारी किया – राजस्थान उच्च न्यायालय (जयपुर स्थायी पीठ स्थापना) आदेश, 1976
  • जयपुर पीठ 31 जनवरी, 1977 को पुनः स्थापित हो सकी। इस आदेश में जयपुर स्थायी पीठ में न्यूनतम 5 न्यायाधीशों और उसके क्षेत्राधिकार का भी प्रावधान किया गया। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वेद प्रकाश त्यागी थे। 
  • राजस्थान में 2015 में न्यायाधीशों की कुल संख्या 50 कर दी गई थी।
  • राजस्थान उच्च न्यायालय का ध्येय वाक्य – “सत्यमेव जयते”
  • राजस्थान उच्च न्यायालय नियम- 1 अक्टूबर 1952 को राजस्थान उच्च न्यायालय नियम, 1952 प्रभावी हुए।
  • राजस्थान राज्य न्यायिक अकादमी –
    • राजस्थान उच्च न्यायालय की अकादमिक शाला है जो न्यायिक अधिकारियों एवं कर्मचारियों के प्रशिक्षण तथा क्षमता संवर्धन हेतु  कई तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करता है। इसकी स्थापना 16 नवंबर, 2001 को जोधपुर में हुई। वर्तमान में इसके अध्यक्ष न्यायमूर्ति संगीतराज लोढ़ा हैं।
  • जोधपुर में राजस्थान उच्च न्यायालय के नवीन भवन का लोकार्पण राष्ट्रपति रामनाथ कोविद ने 7 दिसम्बर 2019 को किया था।
  • राजस्थान में कुल 36 न्याय क्षेत्र हैं और 1250 से अधिक अधीनस्थ न्यायालय कार्यरत हैं।
  • हाईकोर्ट के वर्तमान (45 वें) रजिस्ट्रार जनरल – चंचल मिश्रा  (जनवरी 2025 से)

राजस्थान उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार

1. प्रारंभिक क्षेत्राधिकार

  • निम्नलिखित मामलों में सुनवाई का अधिकार सीधे राजस्थान उच्च न्यायालय को है अर्थात् पीड़ित व्यक्ति सीधे उच्च न्यायालय में अपनी अपील कर सकता है—
    • अधिकारिता का मामला
    • वसीयत से संबंधित मामले
    • विवाह से संबंधित मामले
    • तलाक से संबंधित मामले
    • कंपनी कानून से संबंधित मामले
    • न्यायालय की अवमानना से संबंधित मामले
  • इसके अतिरिक्त—
    • संविधान की व्याख्या के संबंध में अधीनस्थ न्यायालय से स्थानांतरित मामले।
    • नागरिकों के मूल अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामले।
    • राजस्व संबंधी या उसका संग्रहण करने संबंधी मामलों की सुनवाई।
    • संसद सदस्य तथा राज्य विधानमंडल के सदस्यों के निर्वाचन संबंधी मामलों की सुनवाई।

2. अपीलीय क्षेत्राधिकार

  • उच्च न्यायालय को अधीनस्थ न्यायालयों के सिविल व फौजदारी मामलों में अपील सुनने का अधिकार है।
  • संविधान के अनुच्छेद 136 के अनुसार भारत का उच्चतम न्यायालय उच्च न्यायालय की अनुमति के बिना भी उसके निर्णयों के विरुद्ध अपील करने की अनुमति दे सकता है।

3. अंतरण क्षेत्राधिकार

  • अनुच्छेद 228 – उच्च न्यायालय किसी अधीनस्थ न्यायालय के मामले को दूसरे न्यायालय में स्थानांतरित कर सकता है।

4. अधीक्षण क्षेत्राधिकार

  • अनुच्छेद 227 –  अधीनस्थ न्यायालयों का निरीक्षण, प्रशासनिक नियंत्रण, नियम बनाना
  • यदि उच्च न्यायालय को ऐसा प्रतीत होता है कि अधीनस्थ न्यायालय में लंबित किसी मामले में संविधान की व्याख्या से संबंधित महत्वपूर्ण विधि का प्रश्न है तो वह उसे अपने पास मंगा सकता है।

5. रिट अधिकारिता

  • अनुच्छेद 226- उच्च न्यायालय निम्नलिखित रिट जारी कर सकता है –
    1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)
    2. परमादेश (Mandamus)
    3. प्रतिषेध (Prohibition)
    4. उत्प्रेषण (Certiorari)
    5. अधिकार पृच्छा (Quo Warranto)
  • राजस्थान उच्च न्यायालय का लेख जारी करने का अधिकार विवेकाधीन होता है।
  • वह रिट जारी करने से इंकार भी कर सकता है।
  • इसके अलावा उच्च न्यायालय अन्य मामलों तथा अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में भी रिट जारी कर सकता है।

न्यायिक पुनरावलोकन- 

  • उच्च न्यायालय को अधिकार है कि वह संसद तथा राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी ऐसे कानून को असंवैधानिक घोषित कर सकता है, जो संविधान के किसी अनुच्छेद के विरुद्ध हो।

राजस्थान के मुख्य न्यायाधीशों की सूची

क्र. सं.

नाम

कार्यकाल 

महत्वपूर्ण तथ्य 

1

कमलकांत वर्मा

29 अगस्त 1949 – 24 जनवरी 1950

प्रथम मुख्य न्यायाधीश

2

कैलाश नाथ वांचू

2 जनवरी 1951   10 अगस्त 1958

  • संविधान लागू होने के बाद प्रथम 
  • सबसे लंबा कार्यकाल
  • भारत के 10वें CJI भी बने

3

सरजू प्रसाद

4

जे.एस. राणावत

5

डी.एस. दवे

6

दौलत मल भंडारी

12

चांदमल लोढ़ा

16

जे.एस. वर्मा

  • बाद में भारत के 27वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) बने।
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष

23

ए.आर. लक्ष्मणन 

 

विधि आयोग अध्यक्ष

28

दीपक वर्मा

29

जगदीश भल्ला

30

अरुण कुमार मिश्रा

31

अमिताव रॉय

32

सुनील अंबवानी

33

सतीश कुमार मित्तल

सबसे कम समय तक (मात्र 41 दिन)

34

नवीन सिन्हा

35

प्रदीप नंदराजोग

36

श्रीपति रविन्द्र भट

37

इंद्रजीत मोहंती

38

अकील कुरैशी

39

संभाजी शिवाजी शिंदे

40

पंकज मिथल

उत्तर प्रदेश के लोकायुक्त रहे

41

ए.जी. मसीह

42

मनिन्द्र मोहन श्रीवास्तव

2024 – 2025

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश

43

के.आर. श्रीराम

जुलाई – सितम्बर 2025

27 सितंबर 2025 को सेवानिवृत्त

राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जो भारत के उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश रहे

क्र. सं.मुख्य न्यायाधीश का नाम
1के.एन. वांचू 
2पी.एन. सिंघल 
3जे.एस. वर्मा 
4शिवराज वी. पाटिल 
5अरुण कुमार 
6ए.आर. लक्ष्मणन 
7जे.एम. पांचाल
8दीपक वर्मा 
9अरुण मिश्रा 
10अमिताव रॉय 
11नवीन सिन्हा 
12एस. रविन्द्र भट 
13पंकज मिथल 
14ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह 

राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जो भारत के उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश रहे

क्र. सं.माननीय न्यायाधीश का नाम
1ए.पी. सेन
2एन.एम. कासलीवाल
3एस.सी. अग्रवाल
4ए.के. माथुर
5पी.पी. नावलेकर
6जी.एस. सिंघवी
7राजेंद्र मल लोढ़ाभारत के 41वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) बने।
8बी.एस. चौहान
9जी.एस. मिश्रा
10ए.एम. सप्रे
11अजय रस्तोगी
12दिनेश माहेश्वरी
13बेला एम. त्रिवेदी
14संदीप मेहता
15विजय बिश्नोई
महत्वपूर्ण तथ्य 
  • राजस्थान उच्च न्यायालय  की वर्तमान महिला न्यायाधीश 
    1. न्यायमूर्ति रेखा बोराणा
    2. न्यायमूर्ति शुभा मेहता
    3. न्यायमूर्ति नूपुर भाटी
    4. न्यायमूर्ति संगीता शर्मा
  • न्यायाधीश जिन्होंने त्यागपत्र दिया –
    • एस. के. गर्ग  (2000 – 2005)
  • न्यायाधीश जिनका कार्यकाल के दौरान निधन (Died) हुआ-
    • श्री राजेंद्र प्रसाद व्यास: (2004 – 2006)
    • श्री सुरेश चंद्र सिंघल: (2005)
    • श्री राजेंद्र प्रकाश सोनी: (2023)
  • राजस्थान हाई कोर्ट के न्यायाधीश थे और उन्होंने बाद में राजस्थान सरकार में राज्यमंत्री पद पर कार्य किया – जस्टिस फ़ारूख़ हसन (1972 में)
  • राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जो राजस्थान के कार्यवाहक राज्यपाल रहे –
    1. जगत नारायण
    2. वेद पाल त्यागी
    3. के. डी. शर्मा
    4. पी. के. बनर्जी
    5. डी. पी. गुप्ता
    6. जगदीश शरण वर्मा
  • कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जो कार्यवाहक राज्यपाल भी रहे
    1. मिलापचंद जैन
    2. नवरंग लाल टिबरेवाल
  • राजस्थान हाईकोर्ट की महिला न्यायाधीश
    1. कांता भटनागर (प्रथम महिला न्यायाधीश)
    2. मोहिनी कपूर
    3. ज्ञान सुधा मिश्रा
    4. मीना बी. गोम्बर
    5. निशा गुप्ता
    6. बेला एम. त्रिवेदी
    7. जयश्री ठाकुर
    8. निर्मलजीत कौर
    9. प्रभा शर्मा
    10. सबीना
    11. रेखा बोराना (वर्तमान)
    12. शुभा मेहता (वर्तमान)
    13. डॉ. नुपुर भाटी (वर्तमान)
    14. संगीता शर्मा (वर्तमान)

अधीनस्थ न्यायालय (अनुच्छेद 233-237)

  • अधीनस्थ न्यायालयों का गठन राज्य अधिनियम के आधार पर किया जाता है।
  • ये न्यायालय प्रशासनिक तथा न्यायिक रूप से राजस्थान उच्च न्यायालय के अधीन कार्य करते हैं।
  • संविधान के भाग VI में अनुच्छेद 233 से 237 तक इन न्यायालयों के संगठन एवं कार्यपालिका’ से स्वतंत्रता सुनिश्चित करने वाले उपबंधों का वर्णन किया गया है।

अधीनस्थ न्यायालय से संबंधित अनुच्छेद

अनुच्छेद 233 : जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति 
  1.  किसी राज्य में जिला न्यायाधीश की नियुक्ति, पदस्थापना और पदोन्नति उस राज्य का राज्यपाल करता है। यह कार्य राज्यपाल उस राज्य के उच्च न्यायालय से परामर्श करके करता है।
  2.  जो व्यक्ति पहले से केंद्र सरकार या राज्य सरकार की सेवा में नहीं है, वह जिला न्यायाधीश बनने के लिए तभी योग्य होगा जब—
    • वह कम से कम 7 वर्ष तक अधिवक्ता (Advocate) या प्लीडर (Pleader) रहा हो, और
    • उसकी नियुक्ति के लिए उच्च न्यायालय ने सिफारिश की हो। 
अनुच्छेद 234:  न्यायिक सेवा में जिला न्यायाधीशों के अलावा अन्य व्यक्तियों की भर्ती से संबंधित।
  • जिला न्यायाधीशों के अलावा अन्य व्यक्तियों की राज्य की न्यायिक सेवा में नियुक्ति उस राज्य का राज्यपाल करता है। यह नियुक्ति निम्न के परामर्श से की जाती है—
    1. राज्य लोक सेवा आयोग
    2. उस राज्य के उच्च न्यायालय
  • साथ ही यह नियुक्ति राज्यपाल द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार की जाती है।
अनुच्छेद 235: जिला न्यायालयों और उनके अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण से संबंधित 
  • राज्य के जिला न्यायालयों और उनके अधीनस्थ न्यायालयों का नियंत्रण उच्च न्यायालय में निहित होता है।
  • इस नियंत्रण में शामिल हैं— न्यायिक सेवा के अधिकारियों की पदस्थापना, पदोन्नति , अवकाश देना
  • लेकिन इस अनुच्छेद का अर्थ यह नहीं है कि किसी व्यक्ति का अपील का अधिकार समाप्त हो जाता है।
  • उच्च न्यायालय को यह अधिकार भी नहीं है कि वह सेवा से संबंधित कानूनों के विरुद्ध जाकर निर्णय करे।
अनुच्छेद 236: “न्यायिक सेवा” शब्द को परिभाषित करता है।
  1. “जिला न्यायाधीश” पद में शामिल हैं— नगर सिविल न्यायालय का न्यायाधीश, अपर जिला न्यायाधीश, संयुक्त जिला न्यायाधीश, सहायक जिला न्यायाधीश, लघुवाद न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, अपर मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, सेशन न्यायाधीश, अपर सेशन न्यायाधीश, सहायक सेशन न्यायाधीश
  2. “न्यायिक सेवा”- न्यायिक सेवा से आशय ऐसी सेवा से है जिसमें वे व्यक्ति शामिल होते हैं— जो जिला न्यायाधीश के पद पर नियुक्त हो सकते हैं या जिला न्यायाधीश से नीचे के अन्य सिविल न्यायिक पदों को भर सकते हैं।
अनुच्छेद 237:
  • यह विधेयक राज्यपाल को इस अध्याय के प्रावधानों को राज्य में मजिस्ट्रेटों के किसी भी वर्ग या वर्गों पर लागू करने की शक्ति प्रदान करता है।

जिला एवं सत्र न्यायाधीश का न्यायालय

  • जिला एवं सत्र न्यायालय को दो भागों में बाँटा गया है—
    • दीवानी न्यायालय –
      • जब जिला न्यायाधीश दीवानी मामलों की सुनवाई करता है तो उसे जिला न्यायाधीश कहा जाता है।
      • दीवानी पक्ष के अधीन न्यायालय—
        • अधीनस्थ न्यायाधीश का न्यायालय
        • मुंसिफ अदालत
    • फौजदारी न्यायालय –
      • जब वही न्यायाधीश फौजदारी मामलों की सुनवाई करता है तो उसे सत्र न्यायाधीश कहा जाता है।
      • किसी कानून का उल्लंघन करना, चोरी, डकैती, अपहरण, जेब काटना, शारीरिक रूप से नुकसान पहुँचाना, हत्या करना ऐसे आपराधिक मुकदमे जिनमें जुर्माना, कैद या फिर मृत्युदण्ड भी दिया  जा सकता है, फौजदारी न्यायालय में सुने जाते हैं।
      • फौजदारी पक्ष के अधीन न्यायालय—
        • मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी का न्यायालय
        • दंडाधिकारी का न्यायालय
      • यदि किसी सत्र न्यायालय द्वारा किसी मुकदमे में मृत्युदण्ड की सजा सुनाई जाती है तो मृत्युदण्ड की पुष्टि या स्वीकृति उच्च न्यायालय द्वारा करनी आवश्यक है। 
      • सत्र न्यायालय और अतिरिक्त सत्र न्यायालय के निर्णय के खिलाफ उच्च न्यायालय में तब अपील की जा सकती है जब किसी को सात साल से अधिक सजा हुई हो। यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि सत्र न्यायालय या अतिरिक्त सत्र न्यायालय द्वारा दी गई सजा-ए-मौत (आमतौर पर मृत्यु दंड के रूप में जाना जाने वाला) पर कार्रवाई से पहले उच्च न्यायालय द्वारा इसकी पुष्टि की जानी चाहिए। चाहे सजा पाने वाले व्यक्ति ने कोई अपील की हो या न की हो।
      • जिला न्यायाधीश के पास न्यायिक एवं प्रशासनिक दोनों प्रकार की शक्तियां होती हैं।
  • प्रारम्भिक व अपीली दोनों प्रकार के अधिकार प्राप्त होते हैं। 
  • 10,000 रुपये से अधिक के विवाद इसके प्रारंभिक अधिकार क्षेत्र में आते हैं। 
  • इसके अतिरिक्त विवाह, वसीयत सम्बन्धी, आदि के मामले इसी न्यायालय की प्रारम्मिक अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

सिविल जज न्यायालय

  • जिला स्तरीय न्यायालय के नीचे दीवानी मामलों के लिए सिविल जज न्यायालय होते हैं। 
  • सिविल जज न्यायालय को 2000 से लेकर 10,000 रुपये तक के मुकदमे सुनने का प्रारम्भिक क्षेत्राधिकार प्राप्त है

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