राजनीतिक विकास एवं चरण राजस्थान की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू है, जो राज्य में समय-समय पर हुए राजनीतिक परिवर्तनों और उनके प्रभाव को दर्शाता है। इसमें एक-दलीय प्रभुत्व से लेकर गठबंधन सरकारों और द्विदलीय प्रतिस्पर्धा तक के विभिन्न चरण शामिल हैं। यह विषय राजनीतिक प्रवृत्तियों, नेतृत्व और चुनावी बदलावों को समझने में सहायक है।
राजस्थान की राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा के विभिन्न चरण
- भारत में एक संविधान और समान कानूनी व्यवस्था के बावजूद प्रत्येक राज्य की राजनीति की प्रवृत्तियाँ और दशाएँ राज्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, सामाजिक और आर्थिक ढाँचे पर निर्भर करती हैं। राजस्थान की राजनीति भी इस दृष्टिकोण से विशिष्ट महत्व रखती है।
राजस्थान प्रदेश कांग्रेस समिति
- 1948 में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद की राजस्थान क्षेत्रीय परिषद को राजपूताना प्रदेश कांग्रेस कमेटी में परिवर्तित किया गया जिससे राजस्थान में प्रदेश कांग्रेस समिति का औपचारिक उद्घाटन हुआ।
- गोकुल भाई भट्ट को प्रदेश कांग्रेस समिति का पहला अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
- वर्तमान अध्यक्ष- गोविंद सिंह डोटासरा (2020 से…….)
- 1966: कांग्रेस में बड़ा विभाजन, सुखाड़िया से नाराज होकर कुम्भा राम आर्य, कमला, दौलत राम सहारण, हरिश्चन्द्र सिंह व भीमसिंह मण्डावा आदि ने मिलकर जनता पार्टी बनाई।
- 1980 में कांग्रेस (ई) का नाम बदलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस रखा गया।
- 1971: कांग्रेस की एकमात्र महिला प्रदेशाध्यक्ष लक्ष्मी कुमारी चूंडावत बनीं।

स्वतंत्र भारत में राजस्थान की अवस्थिति
- राजस्थान में लंबे समय तक देशी राजाओं का शासन रहा और ब्रिटिश भारत में यह राज्य अंग्रेजों से अधिकार प्राप्त करने के लिए संघर्ष करता रहा।
- स्वतंत्र भारत में राजस्थान को वर्तमान स्वरूप में आने के लिए कई चरणों में विलय की प्रक्रिया हुई।
- 18 मार्च 1948: अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली का विलय कर ‘मत्स्य संघ’ का गठन हुआ, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी की सलाह पर।
- 25 मार्च 1948: कोटा, बूंदी, झालावाड़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, किशनगढ़, टोंक और शाहपुरा रियासतों का विलय कर ‘राजस्थान संघ’ का गठन हुआ।
- 18 अप्रैल 1948: उदयपुर रियासत का विलय कर ‘संयुक्त राजस्थान’ का निर्माण हुआ।
- जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर और सिरोही रियासतें अब तक पृथक् अस्तित्व में बनी हुई थीं।
- 30 मार्च 1949: जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर रियासतों का विलय कर ‘वृहद् राजस्थान’ का गठन हुआ, जिसमें सरदार पटेल ने उद्घाटन किया।
- मत्स्य संघ पहले स्वतंत्र था, लेकिन अब तक वृहद् राजस्थान का अंग नहीं बना था।
- धौलपुर और भरतपुर की अनिश्चितता की स्थिति, वे उत्तर प्रदेश या राजस्थान में से किसे शामिल करें, इसका निर्णय नहीं हो पाया।
- 15 मई 1949: मत्स्य संघ राजस्थान का अंग बना।
- सिरोही के विलय पर विवाद था, राजस्थानी और गुजराती नेतृत्व निर्णायक स्थिति में नहीं पहुंचे।
- सिरोही का विभाजन हुआ, आबू और दिलवाड़ा को बम्बई प्रांत को सौंपा गया, शेष भाग का 7 फरवरी 1950 को राजस्थान में विलय हुआ।
- इस निर्णय के खिलाफ राजस्थान निवासियों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई।
- 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के दौरान सिरोही के भाग पुनः राजस्थान में विलय कर दिए गए।
- 1 नवम्बर 1956: अजमेर, जो ‘सी’ श्रेणी राज्य था, राजस्थान में विलय किया गया।
- राजस्थान ने 19 देशी रियासतों और 3 चीफशिप (लावा, नीमराना व कुशलगढ़) के क्षेत्रों के विलय से अपना वर्तमान स्वरूप प्राप्त किया।
- इन क्षेत्रों ने एकतंत्र से मुक्त होकर लोकतांत्रिक स्वतंत्र वातावरण प्राप्त किया।
- इस प्रकार राजस्थान भारत के संघ की अन्य इकाइयों के समान एक इकाई बन गया।
राज्य की राजनीति का विश्लेषण
राजस्थान के प्रथम विधानसभा चुनाव से पूर्व (30 मार्च 1949 – 3 मार्च 1952)
- 30 मार्च 1949 को जयपुर के सिटी पैलेस में सरदार वल्लभभाई पटेल ने राजस्थान राज्य की आधारशिला रखी।
- जयपुर रियासत के शासक सवाई मान सिंह (द्वितीय) को राजप्रमुख और कोटा के शासक भीम सिंह को उपराज प्रमुख पद की शपथ दिलाई।
- 30 मार्च 1949 को सवाई मान सिंह (द्वितीय) ने हीरालाल शास्त्री को राजस्थान के प्रथम प्रधानमंत्री (मुख्यमंत्री) के रूप में शपथ दिलाई। 26 जनवरी 1950 से पहले मुख्यमंत्री का पदनाम प्रधानमंत्री था।
- शपथ ग्रहण समारोह में उचित व्यवस्था न होने के कारण जय नारायण व्यास, माणिक्य लाल वर्मा, मोहनलाल सुखाड़िया समेत कई नेताओं ने बहिष्कार किया।
- 30 मार्च 1949 से 1 नवंबर 1956 तक राजस्थान ‘B’ श्रेणी का राज्य था।
- ‘B’ श्रेणी राज्यों में विधानसभाएं थीं और निर्वाचित विधायकों की भागीदारी भी थी। लेकिन कार्यपालिका का नेतृत्व ‘राजप्रमुख’ करते थे, और वह भारत सरकार के रियासत विभाग (Ministry of States) के प्रति उत्तरदायी माने जाते थे।
- 1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के बाद ‘राजप्रमुख’ पद समाप्त कर ‘राज्यपाल’ कर दिया गया। (7वें संविधान संशोधन, 1956)
- श्री गुरुमुख निहाल सिंह को 25 अक्टूबर 1956 को राजस्थान का पहला राज्यपाल नियुक्त किया गया। उन्होंने अपना पदभार 1 नवंबर 1956 को संभाला।
प्रथम विधानसभा चुनाव बाद राजस्थान की राजनीति का खंडवार विश्लेषण

एक दलीय प्रभुत्व प्रणाली का दौर (कांग्रेस प्रभुत्व) – (1952-1977)

- 1952 से 1977 तक राजस्थान की राजनीति कांग्रेस के प्रभुत्व वाली रही, जिसे प्रो. रजनी कोठारी ने “एक दलीय प्रभुत्व प्रणाली” कहा।
- (1949-1954) काल को कांग्रेस में गृहयुद्ध या अंतर्कलह का युग कहा जाता है।
- 1949 से 1954 तक 6 मंत्रिमंडल बने, जिससे राजनीतिक अस्थिरता स्पष्ट थी।

- हीरालाल शास्त्री (30 मार्च 1949) – सरदार पटेल और गोकुल भाई भट्ट के समर्थन से मुख्यमंत्री (तात्कालिक पदनाम प्रधानमंत्री) बने। हीरालाल शास्त्री के मुख्यमंत्री बनने के बाद जयनारायण व्यास और माणिक्य लाल वर्मा ने उनके खिलाफ मुहिम छेड़ी।
- वैंकटाचारी (जनवरी 1951) – पटेल की मृत्यु के बाद व्यास-वर्मा गुट सक्रिय हुआ। जयनारायण व्यास और माणिक्य लाल वर्मा के विरोध के कारण शास्त्री को हटाकर वैंकटाचारी को नियुक्त किया गया। भारत सरकार के राज्य मंत्रालय के सचिव थे ।
- जयनारायण व्यास (अप्रैल 1951) – नेहरू के करीबी होने के कारण मुख्यमंत्री बनाए गए।
- टीकाराम पालीवाल (1952 चुनाव के बाद) – व्यास चुनाव हार गए, इसलिए पालीवाल मुख्यमंत्री बने। 3 मार्च 1952 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की।
- पुनः जयनारायण व्यास – विधायक बनने के बाद पालीवाल को हटाकर व्यास को पुनः मुख्यमंत्री बनाया गया। सामंतवादी विचारधारा के विधायकों को शामिल करने से पार्टी में असंतोष बढ़ा। माणिक्य लाल वर्मा, मोहनलाल सुखाड़िया और कुम्भा राम आर्य जैसे नेता विरोध में आ गए। 1954 में विधायक दल चुनाव में व्यास पराजित हुए और मोहनलाल सुखाड़िया मुख्यमंत्री बने।
- मोहनलाल सुखाड़िया (1954) – विधायक दल चुनाव में व्यास की हार के बाद मुख्यमंत्री बने।
- 1954 में सुखाड़िया के मुख्यमंत्री बनने के बाद कांग्रेस में स्थिरता आई।
- 1957 व 1962 के चुनाव सुखाड़िया के नेतृत्व में लड़े गये जिसमें कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला और सुखाड़िया मुख्यमंत्री बने।
- 1967 का चुनाव – कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला, 45 दिन का राष्ट्रपति शासन लगा।
- 1967 में पुनः सरकार गठन – सुखाड़िया फिर से मुख्यमंत्री बने।
- 1969 में राष्ट्रपति चुनाव में वी.वी. गिरी की जगह नीलम संजीव रेड्डी का समर्थन किया जिससे इंदिरा गांधी नाराज हुईं और 1971 में सुखाड़िया से इस्तीफा लेकर बरकतुल्ला खां को मुख्यमंत्री बनाया।
- 1972 के चुनाव में कांग्रेस को भारी बहुमत मिला।
- बरकतुल्ला खां मुख्यमंत्री बने, लेकिन एक साल बाद उनका निधन हो गया।
- अक्टूबर, 1973 में हरिदेव जोशी को मुख्यमंत्री बनाया गया। जो कि 29 अप्रैल, 1977 को लागू दूसरी बार राष्ट्रपति शासन तक मुख्यमंत्री रहे।
प्रथम विधानसभा (1952-57)
- मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास के नेतृत्व में पहला विधानसभा चुनाव हुआ।
- इस चुनाव में विधानसभा की 160 सीटें और लोकसभा की 22 सीटें थीं। विधानसभा के 140 निर्वाचन क्षेत्रों के लिए 616 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था। 20 दो सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र और 120 एकल सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र थे। इनमें से 139 विधानसभा क्षेत्र सामान्य वर्ग के लिए व 1 विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित था। जबकि अनुसूचित जाति के लिए कोई स्थान आरक्षित नहीं था।
- राजस्थान में कांग्रेस के अलावा भारतीय जनसंघ और राम राज्य परिषद जैसे अन्य राजनीतिक दलों ने भाग लिया।
अजमेर-मेरवाड़ा की पृथक विधानसभा
- अजमेर-मेरवाड़ा: पृथक 30 सदस्यीय विधानसभा (धारा सभा) थी, जिसमें 6 द्विसदस्यीय और 18 एकल सदस्यीय क्षेत्र थे।
- अजमेर-मेरवाड़ा राजस्थान का हिस्सा नहीं था।
चुनाव और परिणाम:
- इस चुनाव में 160 सीटों में से कांग्रेस के सात प्रत्याशी निर्विरोध चुने गए। इसलिए मतदान 153 सीटों पर हुआ।
- प्राप्त सीटें –
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | 82 (07 निर्विरोध) |
| राम राज्य परिषद् | 24 |
| भारतीय जनसंघ | 8 |
| कृषिकार लोक पार्टी | 7 |
| हिंदू महासभा | 2 |
| किसान मजदूर प्रजा पार्टी | 1 |
| सोशलिस्ट पार्टी | 1 |
| निर्दलीय | 35 |
| कुल | 160 |
- कुल मतदान 36.69% हुआ।
- अवैध मतों का प्रतिशत 2.31% था।
- कम्यूनिस्ट पार्टी (11), के.जी.एस.पी. (6), फारवर्ड ब्लॉक (1) और शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन(1) के उम्मीदवार असफल रहे।
- लोकसभा की 22 सीटों में कांग्रेस को केवल 11 सीटें मिलीं।
बड़े नेताओं की हार/जीत
- जयनारायण व्यास ने दो स्थानों से चुनाव लड़ा लेकिन दोनों स्थानों पर हार गए।
- जोधपुर बी – रामराज्य परिषद् के माधोसिंह से
- जालौर ए – महाराजा हनवंत सिंह से
- टीकाराम पालीवाल ने दो स्थानों से चुनाव लड़ा और दोनों स्थानों से जीत गए।
- महुआ
- मलारनाचौड़
- इसके बाद उन्होंने मलारना की सीट छोड़ी और वहां 1952 में उपचुनाव हुए जिसमें कांग्रेस के वी.सिंह विजयी रहे। दो सीटों पर पालीवाल विजयी होने वाले पहले उम्मीदवार रहे।
- हीरालाल शास्त्री ने चुनाव नहीं लड़ा।
- गोकुलभाई राजनीति छोड़कर सर्वोदय आंदोलन से जुड़ गए।
- माणिक्यलाल वर्मा ने लोकसभा चुनाव में हार के बाद उपचुनाव में जीत हासिल की।
- चार महिलाओं ने भाग लिया और चारों हार गईं।
- चिरंजी बाई
- वीरेन्द्राबाई
- शांताबाई
- रानी देवी
- निर्विरोध चुने गए सदस्य
- 6 प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित हुए जो सभी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के थे जिनमें
- श्री घासीराम यादव
- श्री सम्पत राम
- श्री जयचन्द
- श्री लक्ष्मण भील
- श्री हजारी लाल
- श्री हरीराम
पहली विधानसभा का गठन
- मतदान 4 जनवरी से 24 जनवरी 1952 तक हुआ।
- पहली विधानसभा 23 फरवरी 1952 को गठित हुई।
- 3 मार्च 1952 को राज्य की पहली चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार का गठन हुआ।
- कांग्रेस ने टीकाराम पालीवाल को विधायक दल का नेता चुना।
- 1952 में शुरू हुई पहली विधानसभा के 5 साल में मुख्यमंत्री पद के लिए 4 बार शक्ति प्रदर्शन हुआ और इस दौरान 3 बार मुख्यमंत्री बदले गए।
- टीकाराम पालीवाल
- जयनारायण व्यास
- मोहनलाल सुखाड़िया
सदस्यों का शपथ ग्रहण
- तारीख: 23 फरवरी, 1952
- राजप्रमुख: सवाई मानसिंह ने सभी सदस्यों को शपथ दिलाई।
टीकाराम पालीवाल मंत्रिमंडल (3 मार्च 1952)
- पहली बैठक 29 मार्च 1952 को जयपुर के सवाई मानसिंह टाउनहॉल में हुई।
- नरोत्तमलाल जोशी 31 मार्च 1952 को राजस्थान विधानसभा के पहले अध्यक्ष चुने गए जो झुंझुनूं से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते थे।
- पहली विधानसभा के प्रमुख पदाधिकारी :
- मुख्यमंत्री- टीकाराम पालीवाल
- विधानसभा अध्यक्ष – नरोत्तम लाल जोशी
- विधानसभा उपाध्यक्ष – लालसिंह शक्तावत
- नेता प्रतिपक्ष: जसवंत सिंह (निर्दलीय), तनसिंह
- सरकार में रामकिशोर व्यास, मोहनलाल सुखाड़िया, रामकरण जोशी आदि मंत्री बने।
- 31 अक्टूबर 1952 को इस सरकार ने त्यागपत्र दे दिया ताकि जय नारायण व्यास को मुख्यमंत्री बनाया जा सके ।
जयनारायण व्यास मंत्रिमंडल (1 नवम्बर, 1952)
- जयनारायण व्यास के लिए किशनगढ़ क्षेत्र के विधायक चांदमल मेहता से सीट खाली करवायी गयी ।
- अगस्त 1952 में जयनारायण व्यास ने किशनगढ़ क्षेत्र से विधायक का उपचुनाव जीता।
- 1 नवम्बर, 1952 को जयनारायण व्यास को राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाया गया।
- टीकाराम पालीवाल उपमुख्यमंत्री बने।
- श्रीमती यशोदा देवी ने 1953 में बांसवाड़ा से उपचुनाव में विजय प्राप्त की। वे राजस्थान विधानसभा की पहली महिला विधायक बनीं।
मोहनलाल सुखाड़िया मंत्रिमंडल (13 नवम्बर, 1954)
- मोहनलाल सुखाड़िया, कुंभाराम आर्य और मथुरादास माथुर ने माणिक्यलाल वर्मा के नेतृत्व में बगावत का बिगुल बजा दिया।
- बढ़ते असंतोष को देखते हुए कांग्रेस हाईकमान ने जयनारायण व्यास को विधायक दल का विश्वास प्राप्त करने के निर्देश दिए।
- 6 नवंबर 1954 में मोहनलाल सुखाड़िया ने व्यास को कांग्रेस विधायक मंडल की बैठक में 8 मतों से हराया।
- 13 नवम्बर 1954 को मोहनलाल सुखाड़िया ने अपनी सरकार बनाई।
- 1954: कमला बेनीवाल, विराट नगर उपचुनाव से दूसरी महिला विधायक बनीं और पहली महिला मंत्री (उपमंत्री) भी बनीं।
अजमेर का राजस्थान में विलय (1956)
- 1956 में अजमेर का राजस्थान में विलय हो गया।
- अजमेर की 30 सदस्यीय विधानसभा को राजस्थान की विधानसभा में मिला दिया गया। जिसके मुख्यमंत्री हरिभाऊ उपाध्याय थे।
- इस विधान सभा में सदस्यों की संख्या
- कांग्रेस – 20
- भारतीय जनसंघ – 3
- निर्दलीय – 4
- पुरुषार्थी पंचायत – 3
- द्वितीय विधानसभा चुनाव तक सदस्य संख्या 190 रही।
- हरिभाऊ उपाध्याय व सुखाड़िया के बीच मुख्यमंत्री पद के लिए शक्ति प्रदर्शन में ऐन वक्त पर हरिभाऊ ने अपना नाम वापस ले लिया और मोहनलाल सुखाड़िया फिर से पार्टी के नेता चुन लिए गए और मुख्यमंत्री पद पर बने रहे।
अन्य
- 1 नवम्बर, 1956: अजमेर-मेरवाड़ा के विलय से विधानसभा सदस्यों की संख्या 190 हो गई।
- प्रथम विधानसभा के कार्यकाल में 17 क्षेत्रों में उपचुनाव हुए।
- यह अब तक का सर्वाधिक उपचुनावों का रिकॉर्ड है।
- सत्र: कुल 12 अधिवेशन और 303 बैठकें हुईं।
द्वितीय विधानसभा (1957 – 1962)
- प्रथम विधानसभा की सदस्य संख्या 160 थी।
- 1 नवम्बर, 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के बाद अजमेर राज्य का राजस्थान में विलय हुआ।
- अजमेर विधानसभा के 30 सदस्य राजस्थान विधानसभा में शामिल किए गए।
- इस प्रकार 1957 के आम चुनाव तक राजस्थान विधानसभा की सदस्य संख्या 190 हो गई।
- बाद में विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्सीमन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप सदस्य संख्या घटकर 176 रह गई।
- 1957 में जब दूसरी विधानसभा के चुनाव हुए तो जयनायण व्यास प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष तथा मोहन लाल सुखाड़िया मुख्यमंत्री थे।
- दूसरे आम चुनाव से पूर्व 1956 में छोटे जागीरदारों ने ‘भू-स्वामी’ आन्दोलन चलाया था ।
- आज तक सर्वाधिक बैठकों (306) का आयोजन दूसरी विधानसभा में हुआ।
चुनाव और परिणाम:
- इस चुनाव में 176 सीटों में से 5 सीटों पर निर्विरोध निर्वाचन हुआ।
- अतः चुनाव केवल 171 सीटों पर हुआ।
- प्राप्त सीटें –
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | 119 (5 निर्विरोध) |
| राम राज्य परिषद् | 17 |
| भारतीय जनसंघ | 6 |
| प्रजा समाजवादी दल | 1 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी | 1 |
| निर्दलीय | 32 |
| कुल | 176 |
द्वितीय विधानसभा का गठन
- द्वितीय विधान सभा का गठन 2 अप्रैल, 1957 को हुआ।
- चुनाव परिणामों के बाद, कांग्रेस विधायक दल के नेता श्री मोहनलाल सुखाड़िया ने 11 अप्रैल, 1957 को अपना मंत्रिमंडल बनाया।
- यह मंत्रिमंडल 11 मार्च, 1962 तक कार्यरत रहा।
उपचुनाव:
- द्वितीय विधानसभा (1957-1962) की अवधि में कुल 6 उपचुनाव हुए, जिनमें सवाईमाधोपुर जिले के महुआ क्षेत्र में हुए दो उपचुनाव भी शामिल हैं।
- इसके बाद राम राज्य परिषद और जनसंघ का राजनीतिक प्रभाव कमजोर होने लगा। स्वतंत्र पार्टी का उदय हुआ।
राम राज्य परिषद का उदय
- 1948 में करपात्री महाराज (स्वामी हरिहरानंद सरस्वती) ने हिंदू राष्ट्र की संकल्पना के साथ इस पार्टी की स्थापना की।
- राजस्थान की राजनीति में धार्मिक मुद्दों को प्रमुखता देने वाली पहली पार्टी थी।
भारतीय जनसंघ का उदय
- 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई।
- संस्थापक अध्यक्ष: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जीराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सहयोग से जनसंघ की स्थापना हुई,
- जिससे उसे हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवादी दल की पहचान मिली।
स्वतंत्र पार्टी का उदय
- स्वतंत्र पार्टी का उदय राजस्थान की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटना थी।
- 1959 में सी राजगोपालचारी द्वारा स्थापित राजनीतिक दल ।
- यह दल भूतपूर्व देशी रियासतों के राजा-महाराजा द्वारा स्थापित किया गया था।पार्टी के उद्देश्य में निजी व्यापार को प्रोत्साहन, निजी उद्यमों का राष्ट्रीयकरण, भूमि हदबंदी और कांग्रेस नीतियों का विरोध शामिल था।
- स्वतंत्र पार्टी सामाजिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध थी और सभी को समान अवसर प्रदान करने का समर्थन करती थी, बिना धर्म, जाति, या राजनीतिक संबंध के भेदभाव के।
- जयपुर की महारानी गायत्री देवी 1961 में इस पार्टी में शामिल हुईं और पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनीं।
तृतीय विधानसभा (1962-67)
- इस चुनाव में निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्सीमन किया गया।
- द्वि-सदस्यीय क्षेत्र समाप्त कर सभी क्षेत्र एक सदस्यीय कर दिए गए।
चुनाव और परिणाम:
- इस चुनाव में 176 सीटों पर निर्वाचन हुआ।
- प्राप्त सीटें –
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | 88 |
| स्वतंत्र पार्टी | 36 (राज्य की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी।) |
| भारतीय जनसंघ | 15 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी | 5 |
| समाजवादी दल | 5 |
| राम राज्य परिषद् | 3 |
| प्रजा समाजवादी दल | 2 |
| निर्दलीय | 22 |
| कुल | 176 |
तृतीय विधानसभा का गठन
- तृतीय विधानसभा का गठन 3 मार्च, 1962 को हुआ।
- मोहनलाल सुखाड़िया के नेतृत्व में नये मंत्रिमंडल की शपथ 12 मार्च, 1962 को हुई।
- यह मंत्रिमंडल 13 मार्च, 1967 तक कार्यरत रहा, जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ।
उपचुनाव:
- तृतीय विधानसभा (1962-1967) के दौरान कुल 5 उपचुनाव हुए।
चतुर्थ विधानसभा (1967-1972)
- 1967 चुनाव के समय भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं।
- विपक्षी एकता के कारण अधिकांश उत्तर भारतीय राज्यों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।
चुनाव और परिणाम:
- नये पुनर्सीमन के बाद, विधानसभा सदस्यों की संख्या 176 से बढ़कर 184 हो गई।
- प्राप्त सीटें –
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | 89 |
| स्वतंत्र पार्टी | 49 |
| भारतीय जनसंघ | 22 |
| संयुक्त समाजवादी दल | 8 |
| निर्दलीय | 16 |
| कुल | 184 |
- कुल 184 सीटों में कांग्रेस ने 89 सीटें जीती, जो बहुमत से 4 सीटें कम थीं।
- इस चुनाव में किसी भी प्रत्याशी ने निर्विरोध निर्वाचन प्राप्त नहीं किया।
- स्वतंत्र पार्टी विधानसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी।
- सभी विरोधी दलों और निर्दलीय विधायकों ने मिलकर 96 सीटों के समर्थन का दावा किया।
- राज्यपाल सम्पूर्णानंद ने सबसे बड़ी पार्टी के नेता मोहनलाल सुखाड़िया को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया, जिसका विपक्ष ने विरोध किया।
- जोहरी बाजार, जयपुर में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग हुई, जिसमें 9 लोगों की मृत्यु हुई।
- इस घटना की जांच के लिए बेरी आयोग का गठन किया गया।
- अराजकता और विरोध के माहौल को देखते हुए सुखाड़िया ने सरकार बनाने से इनकार कर दिया।
- 1967 में तत्कालीन राज्यपाल सम्पूर्णानंद ने विपक्षी दलों को सरकार बनाने का मौका देने के बजाय केंद्र से राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी।
- राज्य की अस्थिरता और अशांति के कारण, 13 मार्च, 1967 को राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया और विधानसभा को निलंबित कर दिया गया। लेकिन भंग नहीं की गई थी ।
- लगभग 45 दिन तक राष्ट्रपति शासन लागू रहा।
- 15 अप्रैल, 1967 को राज्यपाल डॉ. सम्पूर्णानन्द का कार्यकाल समाप्त हुआ।
- 16 अप्रैल, 1967 को नए राज्यपाल सरदार हुकुमसिंह ने कार्यभार संभाला।
- राष्ट्रपति शासन के दौरान दल-बदल करवाकर सुखाड़िया ने बहुमत जुटा लिया। 26 अप्रैल, 1967 को सुखाड़िया को मुख्यमंत्री पद की शपथ राज्यपाल सरदार हुकुम सिंह ने दिलाई।
- 22 अक्टूबर, 1967 को सुखाड़िया ने अपने मंत्रिमंडल का पुनः विस्तार किया, जिसमें 4 संसदीय सचिव को शपथ दिलाई गई। राजस्थान में पहली बार राज्यमंत्री और संसदीय सचिव पद की व्यवस्था की गई।
- 1969 के राष्ट्रपति चुनाव में सुखाड़िया ने कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी का समर्थन किया।
- वे इंदिरा गांधी की “इंडिकेट कांग्रेस” के बजाय “सिंडिकेट कांग्रेस” के समर्थक बन गए।
- प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्देश पर, 8 जुलाई, 1971 को मोहनलाल सुखाड़िया ने अपने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया।
- इस प्रकार, सुखाड़िया ने 17 वर्षों तक प्रदेश का नेतृत्व किया और एक कीर्तिमान स्थापित किया, जो आज भी कायम है।
- सुखाड़िया के त्यागपत्र के बाद, बरकतुल्ला खां को मुख्यमंत्री नियुक्त किया।
- बरकतुल्ला खां की नियुक्ति से कांग्रेस आलाकमान के हस्तक्षेप की शुरुआत हुई, जो आज भी जारी है।
- 9 जुलाई, 1971 को बरकतुल्ला खां के मंत्रिमंडल ने शपथ ली।
- 4 सितंबर, 1971 को औंकारलाल चौहान को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया, लेकिन वे विधानसभा सदस्य नहीं थे। इसलिए 3 मार्च, 1972 को उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा।
पंचम विधानसभा (1972-1977)
- 1972 का विधानसभा चुनाव बांग्लादेश मुक्ति संग्राम की पृष्ठभूमि में हुआ।
- इस समय इंदिरा गांधी भारतीय राजनीति की एकछत्र नेता थीं।
- चुनाव के समय बरकतुल्ला खां राजस्थान के मुख्यमंत्री थे।
चुनाव और परिणाम:
- विधानसभा के कुल 184 क्षेत्रों में से पाली जिले के देसूरी (सुरक्षित अनुसूचित जाति) क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी निदेशराय डांगी निर्विरोध निर्वाचित हुए।
- इस प्रकार, मतदान 183 क्षेत्रों में हुआ।
- प्राप्त सीटें –
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | 145 (ऐतिहासिक रूप से सीटें जीतीं।) + 01(निर्विरोध) |
| स्वतंत्र पार्टी | 11 |
| भारतीय जनसंघ | 8 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) | 4 |
| ससमाजवादी दल | 4 |
| निर्दलीय | 11 |
| कुल | 184 |
- कांग्रेस ने रिकॉर्ड 145 सीटों पर जीत दर्ज की (कुल 184 में से)।
- स्वतंत्र पार्टी 11 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर रही।
- विधानसभा सीट प्रतिशत के हिसाब से यह कांग्रेस की सबसे बड़ी जीत थी, क्योंकि 1998 में कांग्रेस ने 153 सीटें जीती थीं, लेकिन कुल सीटें 200 थीं।
पंचम विधानसभा का गठन
- विधानसभा चुनावों के बाद, बरकतुल्ला खां को कांग्रेस विधायक दल का सर्वसम्मति से नेता चुना गया।
- पंचम विधानसभा का गठन 15 मार्च, 1972 को हुआ।
- बरकतुल्ला खां ने 16 मार्च, 1972 को दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
- 11 अक्टूबर, 1973 को उनकी आकस्मिक मृत्यु हो गई, जिससे राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए निधन होने वाले वे अब तक के एकमात्र मुख्यमंत्री बने।
- उसी दिन, हरिदेव जोशी को मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई।
- 22 अक्टूबर, 1973 को कांग्रेस विधायक दल की बैठक में हरिदेव जोशी और रामनिवास मिर्धा के बीच मुख्यमंत्री पद के लिए प्रतिस्पर्धा हुई।
- हरिदेव जोशी ने बहुमत प्राप्त कर, 25 अक्टूबर, 1973 (दीपावली के दिन) को पुनः मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
- हरिदेव जोशी 1977 तक मुख्यमंत्री रहे।
- यह विधानसभा अनुच्छेद 352 (राष्ट्रीय आपातकाल) और राष्ट्रपति शासन, दोनों का गवाह बनी।
- अनुच्छेद 352 (राष्ट्रीय आपातकाल):
- 1975-77 के दौरान इंदिरा गांधी ने आंतरिक अशांति के आधार पर देश में आपातकाल लागू किया।
- उस समय राजस्थान के राज्यपाल सरदार जोगेंद्र सिंह और मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी थे।
- राजस्थान में यह आपातकाल 54 दिन तक रहा।
- राजनीतिक गिरफ्तारियां, कठोर सरकारी नीतियां, दमन और नागरिक स्वतंत्रताओं का हनन हुआ, जिससे सरकार अप्रिय हो गई।
- अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन):
- फरवरी, 1977 में देश में चल रही आपात स्थिति के समाप्त होने के बाद मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव के बाद, केंद्र में जनता पार्टी की सरकार (केन्द्र में प्रथम बार बनी गैर कांग्रेस सरकार) आते ही 29 अप्रैल, 1977 को कार्यवाहक राज्यपाल वेदपाल त्यागी ने हरिदेव जोशी की सरकार को बर्खास्त करते हुए विधानसभा भंग कर दी।
- इस प्रकार, राज्य में राष्ट्रपति शासन (1967 के बाद दूसरी बार) लागू कर दिया गया।
- अनुच्छेद 352 (राष्ट्रीय आपातकाल):
- राजस्थान की अब तक की सबसे लंबी अवधि तक चलने वाली विधानसभा थी।
उपचुनाव:
- इस अवधि में कुल पांच क्षेत्रों में उपचुनाव हुए।
जनता पार्टी का उदय
- आपातकाल की समाप्ति के बाद विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं जैसे कांग्रेस (ओ), जनसंघ, भारतीय लोकदल, और सोशलिज्म पार्टी ने एक नई पार्टी “जनता पार्टी” का गठन किया।
- जनता पार्टी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर प्रतिरोध की भूमिका निभाई।
कांग्रेस प्रणाली का अंत (1977-1980)

छठी विधानसभा (1977-1980)
- 1977 का चुनाव इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल (1975-77) के खिलाफ जनमत था।
- आपातकाल के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस को केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर हार का सामना करना पड़ा।
- 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 25 में से केवल 1 सीट जीत पाई।
- नाथूराम मिर्धा नागौर से कांग्रेस के टिकट पर जीतने वाले एकमात्र सांसद थे।
- जनता पार्टी ने राजस्थान की शेष 24 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की।
चुनाव परिणाम:
- चुनाव से पहले परिसीमन हुआ, जिससे राजस्थान में विधानसभा सीटों की संख्या 184 से बढ़कर 200 हो गई। जिनमें से 33 अनुसूचित जाति व 24 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित थी।
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस | 41 |
| जनता पार्टी | 152 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)(M) | 1 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) | 1 |
| निर्दलीय (Independent) | 5 |
| कुल | 200 |
- जनता पार्टी ने 152 सीटें जीती और तीन-चौथाई बहुमत प्राप्त किया।
- राजस्थान में बहुदलीय राजनीति की बजाय द्विदलीय प्रणाली उभरने की संभावना बनी, लेकिन यह पूर्ण रूप से स्थापित नहीं हो पाई।
छठी विधानसभा का गठन
- छठी विधानसभा का गठन 22 जून, 1977 को हुआ।
- विधायक दल के नेता के रूप में भैरोंसिंह शेखावत और मास्टर आदित्येन्द्र के बीच मुकाबला हुआ, जिसमें भैरोंसिंह शेखावत विजयी रहे।
- 22 जून, 1977 को शेखावत ने राज्य के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
- शेखावत ने कांग्रेस सरकारों के भ्रष्टाचार की जांच के लिए बेरी कमीशन का गठन किया।
- भैरोंसिंह शेखावत ने जब मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब वे विधायक नहीं थे, बल्कि मध्यप्रदेश से राज्यसभा सांसद थे।
- बाद में उन्होंने 18 अक्टूबर, 1977 को कोटा जिले के छबड़ा क्षेत्र से उपचुनाव जीतकर विधानसभा सदस्यता प्राप्त की।
- छठी विधानसभा के अध्यक्ष महारावल लक्ष्मण सिंह बने, जो प्रथम गैर-कांग्रेसी विधानसभा अध्यक्ष थे।
- उनके इस्तीफे के बाद गोपाल सिंह आहोर को विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया।
- बाद में गोपाल सिंह आहोर गोवा के राज्यपाल बने।
- महारावल लक्ष्मण सिंह, दौलत राम सहारण आदि नेताओं ने अपनी ही सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया।
- हालांकि, यह प्रस्ताव असफल रहा और सरकार स्थिर बनी रही।
- जनता पार्टी की सरकार अपना पाँच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई।
- 1980 में केंद्र में इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार बनने के बाद राजस्थान में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया।
- इसके बाद, राज्यपाल रघुकुल तिलक ने 16 फरवरी, 1980 को भैरोंसिंह शेखावत की सरकार बर्खास्त कर विधानसभा भंग कर दी गई।
- यह राजस्थान में 1967 और 1977 के बाद तीसरा राष्ट्रपति शासन था।
- इसका कार्यकाल राजस्थान के इतिहास में सबसे कम रहा।
- छठी विधानसभा राजस्थान की पहली विधानसभा थी, जिसमें मध्यावधि चुनाव हुए।
- जनवरी, 1980 में लोकसभा मध्यावधि चुनावों के बाद कांग्रेस (इ) सरकार ने केंद्र में सत्ता हासिल की।
- कांग्रेस ने राजस्थान सहित कई राज्यों की विधानसभाओं को भंग कर दिया।
- कांग्रेस के खिलाफ साझा विपक्ष का प्रयोग सफल नहीं रहा।
उपचुनाव:
- छठी विधानसभा (1977-1980) की अवधि में कुल तीन उपचुनाव हुए।
भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) का उदय
- जनता पार्टी की असफलता के बाद, 1980 में जनता पार्टी के सदस्यों द्वारा एक नए दल भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) का गठन किया गया।
- राम मंदिर और हिंदुत्व के मुद्दों के साथ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया।
- 1980 में मुंबई में हुए भाजपा के उद्घाटन अधिवेशन में अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि भाजपा जनसंघ का नया रूप नहीं, बल्कि जयप्रकाश नारायण की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है।
कांग्रेस की पुनःस्थापना(1980-1990)

- 1971 में इंदिरा गांधी की जीत के साथ कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र समाप्त हो गया।
- 1970 के बाद से पार्टी पूरी तरह गांधी परिवार के वर्चस्व में आ गई।
- 1970 से 1990 तक राजस्थान में इंदिरा गांधी, संजय गांधी और राजीव गांधी द्वारा मनोनीत व्यक्ति ही मुख्यमंत्री बने।
- 1980 में जनता पार्टी बिखर गई, जिससे विपक्ष कमजोर हो गया।
- राम मंदिर और हिंदुत्व के मुद्दों के साथ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू किया।
- 1980 से 1990 के बीच कांग्रेस में विभिन्न गुटों के बीच आलाकमान की नजरों में चढ़ने की प्रतिस्पर्धा चलती रही।
- बोफोर्स तोप घोटाले ने कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाया और अंततः उसकी पकड़ को कमजोर कर दिया।
- विधानसभा चुनावों (1980 और 1985) में कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाई।
- इन 10 वर्षों में कांग्रेस के 6 अलग-अलग मंत्रिमंडल बने, जिससे अस्थिरता देखने को मिली।
- इस अवधि में राजस्थान में 6 मुख्यमंत्री बने:
- जगन्नाथ पहाड़िया (1980-81)
- शिवचरण माथुर (1981-1985)
- हीरालाल देवपुरा (1985, 15 दिन)
- हरिदेव जोशी
- फिर से शिवचरण माथुर
- पुनः हरिदेव जोशी
सातवीं विधानसभा (1980-1985)
- 1980 का विधानसभा चुनाव राजस्थान का पहला मध्यावधि चुनाव था (दूसरा 1993 में हुआ)।
- चुनाव और परिणाम:
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (I) | 133 |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 32 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)(M) | 1 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) | 1 |
| Indian National Congress (U) | 6 |
| Janata Party (SECULAR) – CH. CHARAN SINGH | 7 |
| जनता party (JP) | 8 |
| निर्दलीय (Independent) | 12 |
| कुल | 200 |
- कांग्रेस ने 133 सीटों पर जीत दर्ज की।
- नवगठित भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 32 सीटें जीती।
सातवीं विधानसभा का गठन
- सातवीं विधानसभा का गठन 6 जून, 1980 में हुआ, जो छठी विधानसभा के भंग होने के कारण हुआ था।
- सातवीं विधानसभा ने तीन मुख्यमंत्री देखे –
- जगन्नाथ पहाड़िया
- शिवचरण माथुर
- हीरालाल देवपुरा।
- 5 जून, 1980 को नई दिल्ली में संजय गांधी की उपस्थिति में आयोजित बैठक में जगन्नाथ पहाड़िया को कांग्रेस (ई) विधायक दल का नेता चुना गया।
- 6 जून, 1980 को जयपुर में उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की।
- पहाड़िया इस समय विधानसभा के सदस्य नहीं थे, वे बयाना (भरतपुर) क्षेत्र से लोकसभा के सदस्य और केंद्रीय मंत्री के रूप में कार्यरत थे।
- 23 नवंबर, 1980 को वे विधायक चुने गए, जब उन्होंने वैर (भरतपुर) विधानसभा सीट से चुनाव जीता, जो उनकी पत्नी शांति पहाड़िया के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी।
- संजय गांधी की मृत्यु के बाद पहाड़िया के खिलाफ विरोध शुरू हुआ।
- सत्तारूढ़ दल में आंतरिक विरोध और खींचतान के कारण, कांग्रेस (ई) के उच्च नेतृत्व के निर्देश पर 12 जुलाई, 1981 को पहाड़िया मंत्रिमंडल (13 महीने तक) ने त्यागपत्र दे दिया, जिसे 13 जुलाई, 1981 को स्वीकार कर लिया गया।
- पहाड़िया के इस्तीफे के बाद 14 जुलाई, 1981 को कांग्रेस (ई) विधायक दल की बैठक में शिवचरण माथुर को नए नेता के रूप में चुना गया।
- 14 जुलाई, 1981 को उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की और यह मंत्रिमंडल 1985 तक कार्य करता रहा।
- 21 फरवरी, 1985 को डीग में चुनाव प्रचार के दौरान निर्दलीय प्रत्याशी राजा मानसिंह की पुलिस गोली से हुई मृत्यु के कारण उत्पन्न अस्थिर स्थिति से निपटने के लिए कांग्रेस उच्च नेतृत्व (राजीव गांधी) के निर्देश पर शिवचरण माथुर ने 23 फरवरी, 1985 को अपने मंत्रिमंडल सहित त्यागपत्र दे दिया।
- 23 फरवरी, 1985 को हीरालाल देवपुरा को मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया और उन्होंने उसी दिन पद की शपथ ग्रहण की।
- यह मंत्रिमंडल 10 मार्च, 1985 तक कार्य करता रहा, जब तक चुनाव परिणाम घोषित नहीं हुए और नई सरकार का गठन नहीं हुआ।
- उनका कार्यकाल केवल 15 दिन का रहा, जो राजस्थान के इतिहास में सबसे कम अवधि का मुख्यमंत्री कार्यकाल है।
उपचुनाव:
- सातवीं विधानसभा (1980-1985) के दौरान कुल चार उपचुनाव हुए।
आठवीं विधानसभा (1985-1990)
चुनाव और परिणाम:
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 113 |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 39 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) | 1 |
| Lok Dal | 27 |
| जनता दल | 10 |
| निर्दलीय (Independent) | 10 |
| कुल | 200 |
- भाजपा ने राजस्थान की चुनावी राजनीति में प्रमुख विपक्ष के रूप में अपनी जगह बनाई।
- भाजपा की सीटों और मत प्रतिशत में वृद्धि हुई, जिससे राज्य की राजनीति कांग्रेस के एकदलीय प्रभुत्व से द्विदलीय प्रणाली की ओर बढ़ी।
आठवीं विधानसभा का गठन
- 9 मार्च, 1985 को आठवीं विधानसभा के गठन की अधिसूचना जारी की गई।
- आठवीं विधानसभा ने तीन मुख्यमंत्री देखे
- हरिदेव जोशी
- शिवचरण माथुर
- फिर से हरिदेव जोशी।
- 9 मार्च, 1985 को हरिदेव जोशी को कांग्रेस (इ) विधायक दल का नेता चुना गया।
- 10 मार्च, 1985 को उन्होंने दूसरी बार राज्य की बागडोर संभाली और मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की।
- 4 सितंबर 1987 को राजस्थान के सीकर जिले के दिवराला गांव में रूप कंवर सती कांड हो गया। इस मामले को लेकर विपक्ष हमलावर हो गया था।
- 18 जनवरी, 1988 को कांग्रेस (इ) के उच्च नेतृत्व के निर्देश पर हरिदेव जोशी ने अपने मंत्रिमंडल का त्यागपत्र राज्यपाल को सौंपा।
- यह त्यागपत्र 20 जनवरी, 1988 को स्वीकृत किया गया।
- हरिदेव जोशी के इस्तीफे के बाद 20 जनवरी, 1988 को शिवचरण माथुर दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।
- शिवचरण माथुर के कार्यकाल में कांग्रेस (इ) विधायक दल में असंतोष उत्पन्न हुआ।
- 17 मार्च, 1989 को असंतुष्ट विधायकों ने विधानसभा की कार्यवाही का बहिष्कार किया और नेतृत्व परिवर्तन के लिए दबाव डाला।
- नवम् लोकसभा चुनाव (नवंबर 1989) में कांग्रेस (इ) को अभूतपूर्व पराजय का सामना करना पड़ा। कांग्रेस को राजस्थान में एक भी सीट नहीं मिली (25 में से 25 सीटों पर कांग्रेस हार गई)। जिससे माथुर मंत्रिमंडल ने 29 नवंबर, 1989 को त्यागपत्र दे दिया, जिसे राज्यपाल ने उसी दिन स्वीकृत कर लिया।
- चुनाव में करारी हार के बाद शिवचरण माथुर ने इस्तीफा दे दिया।
- माथुर के त्यागपत्र के बाद, 3 दिसंबर, 1989 को हरिदेव जोशी को फिर से कांग्रेस (इ) विधायक दल का नेता चुना गया।
- हरिदेव जोशी को असम के राज्यपाल पद से बुलाकर तीसरी बार राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाया गया।
- उन्हें राज्यपाल द्वारा शपथ ग्रहण के लिए आमंत्रित किया गया, लेकिन शपथ ग्रहण समारोह में राज्यपाल निर्धारित समय तक नहीं पहुंचे, जिससे एक संवैधानिक संकट उत्पन्न हो गया।
- इस घटना के पीछे कारण था कि राष्ट्रपति ने जोशी का असम राज्यपाल पद से त्यागपत्र स्वीकार नहीं किया था, राज्यपाल सुखदेव प्रसाद ने उनकी शपथ ग्रहण प्रक्रिया को एक दिन के लिए टाल दिया।
- बाद में राष्ट्रपति ने जोशी का त्यागपत्र स्वीकार कर लिया।
- 4 दिसंबर, 1989 को राज्यपाल सुखदेव प्रसाद ने हरिदेव जोशी को तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई।
गठबंधन सरकारों का दौर (संक्रमण काल) (1990-98)

- दोनों बार भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, जिससे अस्थिरता बनी रही।
- इस दौर में अल्पमत की सरकारें रहीं, जिससे मुख्यमंत्री पद की गरिमा प्रभावित हुई।
- सरकार बचाने के लिए मंत्रिमंडल का अनावश्यक विस्तार करना पड़ा।
- दल-बदल की घटनाएँ बढ़ीं, जिससे राजनीतिक अस्थिरता बनी रही।
- 1989 में जनता दल के उदय से राजस्थान में तीसरी शक्ति के उदय की संभावना बनी थी, लेकिन राज्य में जनता दल के विभाजन और राष्ट्रीय स्तर पर इसके बिखराव के कारण यह संभावना जल्दी समाप्त हो गई।
नवम् विधानसभा (1990-1992)
चुनाव और परिणाम:
- विधानसभा में 200 सीटें यथावत रखी गईं।
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 50 |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 85 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI(M)) | 1 |
| जनता दल | 55 |
| निर्दलीय (Independent) | 9 |
| कुल | 200 |
- खण्डित जनादेश: भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी और 85 सीटें जीती।। जनता दल 54 सीटों के साथ दूसरे स्थान व कांग्रेस 50 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रही।
- 1967 की तरह किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला।
- नवम् विधानसभा चुनाव के परिणाम घोषित होने और कांग्रेस (इ) द्वारा बहुमत प्राप्त न करने के कारण, 1 मार्च, 1990 को जोशी मंत्रिमंडल ने राज्यपाल को त्यागपत्र प्रस्तुत किया, जिसे उसी दिन स्वीकार कर लिया।
- भा.ज.पा. के भैरोसिंह शेखावत दो स्थानों (छबड़ा और धौलपुर) से निर्वाचित हुए, जिससे भा.ज.पा. की सदस्य संख्या 84 रह गई।
नवम् विधानसभा का गठन
- 2 मार्च, 1990 को राज्यपाल द्वारा नवम् विधानसभा के गठन की अधिसूचना जारी की गई।
- 3 मार्च, 1990 को भैरोसिंह शेखावत को भा.ज.पा. विधायक दल का नेता चुना गया।
- बीजेपी ने जनता दल के साथ मिलकर सरकार बनाई और 4 मार्च, 1990 को भैरोंसिंह शेखावत दूसरी बार मुख्यमंत्री बने (पहली बार 1977-1980 में थे)।
- 1990 में राष्ट्रीय राजनीति में अस्थिरता आई:
- 23 अक्टूबर, 1990 को बिहार में लालू प्रसाद यादव ने लालकृष्ण आडवाणी की “रामरथ यात्रा” रोक दी।
- बीजेपी ने प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह (जनता दल) की सरकार से समर्थन वापस ले लिया।
- इसके जवाब में जनता दल ने राजस्थान में शेखावत सरकार से समर्थन वापस ले लिया।
- जनता दल में फूट पड़ गई और “जनता दल (दिग्विजय)” नामक नया गुट बना, जिसने शेखावत सरकार का समर्थन देकर उसे बचा लिया।
- 8 नवम्बर, 1990 को विधानसभा का विशेष सत्र शुरू हुआ, जिसमें मुख्यमंत्री शेखावत ने एक वाक्य का विश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत किया: “यह सदन वर्तमान सरकार में विश्वास व्यक्त करता है।”
- विश्वास प्रस्ताव पर बहस के बाद, मत विभाजन हुआ, जिसमें 116 वोट सरकार के पक्ष में और 80 वोट विरोध में आए।
- 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद केन्द्र सरकार द्वारा पाँच प्रतिबंधित संगठनों की गतिविधियों पर प्रभावी रोक लगाने में राज्य सरकार की असफलता के आधार पर, राज्यपाल ने रिपोर्ट प्रस्तुत की। राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की सिफारिश पर बीजेपी शासित राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश की सरकारों को बर्खास्त कर दिया।
- राजस्थान में शेखावत सरकार भी बर्खास्त हुई और 15 दिसम्बर, 1992 को विधानसभा भंग कर दी गई।
- भैरोंसिंह शेखावत की दूसरी सरकार (1990-1992) भी कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई और राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।
- राजस्थान में चौथी बार राष्ट्रपति शासन लागू किया गया (1967, 1977, 1980 के बाद)।
- राज्यपाल एम. चेन्नारेड्डी थे।
- नवीं विधानसभा राजस्थान की दूसरी विधानसभा थी जिसका कार्यकाल पूरा नहीं हुआ (पहली अधूरी विधानसभा 1977-1980 की छठी विधानसभा थी)।
- 1993 में मध्यावधि चुनाव की घोषणा की गई।
उपचुनाव:
- नवम् विधानसभा (1990-1992) के दौरान राज्य में कुल पांच उपचुनाव हुए।
दसवीं विधानसभा (1993-1998)
- 1993 में राष्ट्रपति शासन हटने के बाद राजस्थान में दूसरी बार मध्यावधि चुनाव हुए।
- 1993 के चुनावों ने राजस्थान की दलीय राजनीति में एक नया ट्रेंड शुरू किया – ‘द्विदलीय व्यवस्था’, जो आज तक कायम है।
- 1993 से राजस्थान की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस ही दो प्रमुख राजनीतिक दल रहे हैं।
- अन्य दलों का प्रभाव सीमित रहा और वे कोई मजबूत जनाधार नहीं बना सके।
चुनाव और परिणाम:
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 95+1(उपचुनाव में ) |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 76 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI(M)) | 1 |
| जनता दल (यूनाइटेड) (JD(U)) | 6 |
| निर्दलीय (Independent) | 21 |
| कुल | 200 |
- 12 अक्टूबर, 1993 को भारत निर्वाचन आयोग ने दसवीं विधानसभा के चुनाव के लिए अधिसूचना जारी की।
- खण्डित जनादेश: राम मंदिर और बाबरी विध्वंस की पृष्ठभूमि में हुए इन चुनावों में बीजेपी ने 95 सीटें जीती, जबकि कांग्रेस 76 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही।
- चुनाव के बाद जनता दल का विभाजन हुआ, जिसमें उसके 6 में से 3 सदस्य भाजपा में शामिल हो गए।
- इससे भा.ज.पा. की सदस्य संख्या बढ़कर 98 हो गई, जबकि जनता दल के सदस्य घटकर 3 रह गए।
दसवीं विधानसभा का गठन
- चुनाव परिणामों के बाद भारत निर्वाचन आयोग ने 4 दिसम्बर, 1993 को नई विधानसभा का गठन और निर्वाचित विधायकों के नामों की घोषणा की।
- केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने उसी दिन राज्य से राष्ट्रपति शासन को समाप्त करने की घोषणा की।
- किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला, निर्दलीयों के सहयोग से बीजेपी सरकार बनी और 4 दिसम्बर, 1993 को भैरोंसिंह शेखावत तीसरी बार मुख्यमंत्री बने।
- हरिशंकर भाभड़ा, जो 1990-92 में विधानसभा अध्यक्ष थे, दोबारा अध्यक्ष बने, लेकिन दो साल बाद त्यागपत्र देकर उपमुख्यमंत्री बन गए।
द्विदलीय राजनीति का प्रमुख कारण:
- एंटी-इनकमबेंसी फैक्टर का प्रभावी होना, जिसमें रोजगार, महंगाई और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी गई।
स्पष्ट द्विदलीय प्रणाली की स्थापना (1998 से अब तक)

- राज्य की राजनीति 2003 से न केवल द्विदलीय रही, बल्कि यह दो व्यक्तियों के बीच सीधी प्रतिस्पर्धा का रूप ले चुकी है।
- एक ओर भाजपा की ओर से वसुन्धरा राजे प्रमुख चेहरा रहीं, तो दूसरी ओर कांग्रेस का नेतृत्व अशोक गहलोत के हाथों में रहा।
- 2003 के बाद के चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता परिवर्तन का सिलसिला चलता रहा।
- बसपा ने 2008 और 2018 में 6-6 सीटें जीतीं, लेकिन वह स्थायी रूप से तीसरी बड़ी पार्टी के रूप में जनाधार नहीं बना पाई
राजनीतिक दौर:
- कांग्रेस की सरकार बनी:
- ग्यारहवीं विधानसभा (1998-2003)
- तेरहवीं विधानसभा (2008-2013)
- पंद्रहवीं विधानसभा (2018-2023)
- भाजपा की सरकार बनी:
- बारहवीं विधानसभा (2003-2008)
- चौदहवीं विधानसभा (2013-2018)
- सोलहवीं विधानसभा (2023 से लगातार)
ग्यारहवीं विधानसभा (1998-2003)
- नवंबर 1998 में हुए चुनावों में प्याज की बढ़ती कीमतों से जनता परेशान थी, जिससे शेखावत सरकार को नुकसान हुआ।
- इस कारण 1998 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा।
- 1998 में बारहवीं लोकसभा के चुनावों के बाद ग्यारहवीं विधानसभा के चुनाव हुए।
चुनाव और परिणाम:
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 153 |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 33 |
| बहुजन समाज पार्टी (BSP) | 2 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI(M)) | 1 |
| Rashtriya Janata Dal | 1 |
| जनता दल (यूनाइटेड) (JD(U)) | 3 |
| निर्दलीय (Independent) | 7 |
| कुल | 200 |
- कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष अशोक गहलोत के नेतृत्व में चुनाव हुये।
- कांग्रेस ने 153 सीटें जीतीं, जो राजस्थान में कांग्रेस का अब तक का सर्वोच्च रिकॉर्ड है। (पहले 1972 में 145 सीटें थीं)
- भाजपा सिर्फ 33 सीटें जीत पाई।
ग्यारहवीं विधानसभा का गठन
- 1 दिसम्बर, 1998 को ग्यारहवीं विधानसभा के गठन की अधिसूचना जारी हुई।
- कांग्रेस विधायक दल ने अशोक गहलोत को सर्वसम्मति से नेता चुना।
- गहलोत ने राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में बागडोर संभाली।
- गहलोत गैर-विधायक थे, और वह जोद्धपुर क्षेत्र से लोकसभा सदस्य थे। बाद में जोधपुर की सरदारपुरा विधानसभा सीट उनके लिए खाली की गई। सरदारपुरा से उस समय कांग्रेस के विधायक मानसिंह देवड़ा थे। 22 फरवरी, 1999 को जोधपुर नगर के सरदारपुर क्षेत्र में उपचुनाव हुआ, जिसमें अशोक गहलोत ने जीत हासिल की।
- परसराम मदेरणा विधानसभा अध्यक्ष बने।
- कार्यकाल के अंतिम वर्षों में बनवारी लाल बैरवा और श्रीमती कमला बेनीवाल को उपमुख्यमंत्री बनाया गया।
उपचुनाव
- ग्यारहवीं विधानसभा के कार्यकाल में कुल 13 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव हुए।
- सर्वप्रथम,
महिला विधायकों की संख्या:
- विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 14 थी।
बारहवीं विधानसभा (2003-2008)
- ग्यारहवीं विधानसभा का कार्यकाल 3 जनवरी, 2004 तक था, लेकिन निर्वाचन आयोग ने बारहवीं विधानसभा के चुनाव एक माह पूर्व 1 दिसम्बर, 2003 को आयोजित करवाए।
- 4 दिसम्बर, 2003 को मतगणना हुई और 8 दिसम्बर, 2003 को नई सरकार ने कार्यभार संभाला।
- इस चुनाव में पहली बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का उपयोग किया गया। मतदान केंद्रों की संख्या 35,703 थी।
चुनाव और परिणाम:
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 56 |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 120 |
| Indian National Lok Dal (INLD) | 4 |
| बहुजन समाज पार्टी (BSP) | 2 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI(M)) | 1 |
| Lok Jan Shakti Party | 1 |
| Rajasthan Samajik Nyaya Manch | 1 |
| जनता दल (यूनाइटेड) (JD(U)) | 2 |
| निर्दलीय (Independent) | 13 |
| कुल | 200 |
- बीजेपी ने 120 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस 56 सीटों पर सिमट गई।
- राजस्थान में यह पहली बार था कि बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिला। 1990 और 1993 में बनी भैरोंसिंह शेखावत सरकारों के पास पूर्ण बहुमत नहीं था।
- 2003 में हुए चुनावों में गहलोत सरकार जाट आरक्षण और सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी के कारण पराजित हुई।
- ‘परिवर्तन यात्राएं’, ‘वेशभूषा परिवर्तन’ और ‘महिलाओं की भागीदारी’ की रणनीति से बीजेपी को फायदा हुआ।
बारहवीं विधानसभा का गठन
- 5 दिसम्बर, 2003 को ग्यारहवीं विधानसभा भंग कर बारहवीं विधानसभा के गठन की अधिसूचना जारी की गई।
- भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) में वसुंधरा राजे को विधायक दल का नेता चुना गया।
- 8 दिसम्बर, 2003 को उन्होंने राज्य की तेरहवीं मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की।
- वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री बनीं, और सुमित्रा सिंह विधानसभा अध्यक्ष बनीं।
- यह पहली बार हुआ कि राज्य के दो शीर्ष पद महिलाओं ने संभाले।
- एक साल बाद प्रतिभा पाटिल राज्यपाल बनीं, जिससे तीनों बड़े पद महिलाओं के पास आ गए।
- 2003 के चुनावों में पहली बार पूरे राज्य में EVM (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) का उपयोग किया गया।
- बारहवीं विधानसभा में 12 महिला विधायक चुनी गईं।
तेरहवीं विधानसभा (2008-2013)
- परिसीमन के कारण अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षित विधानसभा क्षेत्रों में बदलाव हुआ।
- वर्तमान में राजस्थान में –
- विधानसभा में SC के लिए 34 और ST के लिए 25 सीटें आरक्षित हैं।
- लोकसभा में SC के लिए 4 और ST के लिए 3 सीटें आरक्षित हैं (कुल 25 में से)।
चुनाव और परिणाम:
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 96 |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 78 |
| बहुजन समाज पार्टी (BSP) | 6 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI(M)) | 3 |
| लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी | 1 |
| समाजवादी पार्टी | 1 |
| जनता दल (यूनाइटेड) (JD(U)) | 1 |
| निर्दलीय (Independent) | 14 |
| कुल | 200 |
- 2008 के चुनावों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला।
- 28 महिलाएँ विधायक बनीं (कांग्रेस और भाजपा से 13-13, 2 निर्दलीय)।
तेरहवीं विधानसभा का गठन
- 11 दिसम्बर, 2008 को ग्यारहवीं विधानसभा के गठन की अधिसूचना जारी हुई।
- निर्दलीयों और बसपा के समर्थन से कांग्रेस ने सरकार बनाई, 13 दिसम्बर, 2008 को अशोक गहलोत ने राज्य के 23वें मुख्यमंत्री के रूप में दूसरी बार शपथ ग्रहण की।
- दीपेन्द्र सिंह शेखावत विधानसभा अध्यक्ष बने।
- बाद में बसपा का कांग्रेस में विलय हो गया।
चौदहवीं विधानसभा (2013-2018)
चुनाव और परिणाम:
- 2013 में 199 सीटों पर ही चुनाव कराया गया था। इस दौरान चुरू विधानसभा क्षेत्र में बसपा उम्मीदवार जगदीश मेघवाल की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी।
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 163 |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 21 |
| निर्दलीय (Independent) | 7 |
| नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) | 4 |
| बहुजन समाज पार्टी (BSP) | 3 |
| नेशनल यूनियनिस्ट जमींदारा पार्टी (NUZP) | 2 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI(M)) | 0 |
| समाजवादी पार्टी (SP) | 0 |
| जनता दल (यूनाइटेड) (JD(U)) | 0 |
| कुल | 200 |
- भाजपा ने रिकॉर्ड 163 सीटें जीतीं, जो अब तक किसी भी दल द्वारा जीती गई सर्वाधिक सीटें थीं।
- कांग्रेस का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा, उसे केवल 21 सीटें मिलीं।
- 28 महिलाएँ विधायक बनीं (13वीं विधानसभा की तरह)।
चौदहवीं विधानसभा का गठन
- 11 दिसम्बर, 2013 को ग्यारहवीं विधानसभा के गठन की अधिसूचना जारी हुई।
- 11 दिसम्बर, 2013 को श्रीमती वसुंधरा राजे अपार बहुमत के साथ दूसरी बार मुख्यमंत्री बनीं।
- कैलाश मेघवाल (SC) राजस्थान के पहले अनुसूचित जाति के विधानसभा अध्यक्ष बने।
- 2003 की तरह, इस बार भी पूरे राज्य में EVM से चुनाव हुए।
राजस्थान 2014 लोकसभा चुनाव परिणाम
- राजस्थान से लोकसभा की सभी 15 सीटे भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने प्राप्त की।
पंद्रहवीं विधानसभा (2018-2023)
चुनाव और परिणाम:
- 199 सीटों पर चुनाव हुए (रामगढ़ सीट पर बसपा प्रत्याशी के निधन के कारण लोक प्रतिनिध्तव अधिनियन , 1951 की धारा 52 की उपधारा (1) (सी) के तहत रिटर्निंग अधिकारी ने मतदान को बाद में अधूसूचित होने वाली तारीख तक स्थगित कर दिया गया था। इस सीट पर 28 जनवरी 2019 को उप-चुनाव कराया गया था। उपचुनाव में कांग्रेस की सुफिया जुबेर जीतीं)।
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 100 |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 73 |
| बहुजन समाज पार्टी (BSP) | 6 |
| राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी(RLTP) | 3 |
| भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) | 2 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI(M) | 02 |
| राष्ट्रीय लोक दल(RLD) | 1 |
| निर्दलीय (IND) | 13 |
| नेशनल यूनियनिस्ट जमींदारा पार्टी (NUZP) | – |
| नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) | – |
| कुल | 200 |
- किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला।
- कांग्रेस ने बसपा और निर्दलीयों के समर्थन से सरकार बनाई।
- अशोक गहलोत: मुख्यमंत्री
- सचिन पायलट: उपमुख्यमंत्री
- सीपी जोशी: विधानसभा अध्यक्ष
- महिला विधायक:
- प्रारंभ में 23 महिलाएँ जीतीं।
- उपचुनावों के बाद संख्या 27 हो गई (2013 व 2008 में 28-28 महिलाएँ थीं)।
- विजयी महिला विधायक:
- कांग्रेस: 15
- भाजपा: 10
- रालोपा: 1
- निर्दलीय: 1(रमीला खड़िया, कुशलगढ़-बांसवाड़ा)
- अनुसूचित जाति की 8 और अनुसूचित जनजाति की 3 महिला विधायक निर्वाचित हुईं।
- मतदान प्रतिशत: 74.72% (पिछले चुनाव से 0.95% कम, 2013 में 75.67%)।
- महिला मतदान पुरुषों से 0.86% अधिक रहा।
- वोट प्रतिशत:
- कांग्रेस: 39.30%
- भाजपा: 38.77% (पिछली बार से 6.37% कम वोट, 91 सीटों का नुकसान)
- कांग्रेस को 6.23% अधिक वोट और 79 सीटों का फायदा हुआ।
- सबसे अधिक मतदान: पोकरण (जैसलमेर) 87.45%।
- सबसे कम मतदान: पाली जिला 64.65%।
- सितंबर 2019 में बसपा के 6 विधायक कांग्रेस में विलय हो गए, जिसे विधानसभा अध्यक्ष ने मंजूरी दी।
पंद्रहवीं विधानसभा का गठन
- 12 दिसम्बर, 2018 को पंद्रहवीं विधानसभा के गठन की अधिसूचना जारी हुई।
- कल्याण सिंह ने अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई, शपथ ग्रहण समारोह अल्बर्ट हॉल (रामनिवास बाग) में हुआ।
- जोधपुर से सर्वाधिक 4 महिला विधायक चुनी गईं।
- प्रोटेम स्पीकर: गुलाब चंद कटारिया (बाद में नेता प्रतिपक्ष बने)।
- सरकारी मुख्य सचेतक: महेश जोशी।
- सबसे बड़ी जीत: शाहपुरा (भीलवाड़ा) से भाजपा प्रत्याशी कैलाश मेघवाल (75542 मतों के अंतर से, वे सबसे बुजुर्ग विधायक भी थे)।
- सबसे कम अंतर की जीत: आसींद (भीलवाड़ा) से भाजपा प्रत्याशी झबर सिंह (154 मतों के अंतर से)।
राजस्थान 2019 लोकसभा चुनाव परिणाम
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 24 |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 0 |
| भारतीय ट्राइबल पार्टी (बीटीपी) | 0 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI(M) | 0 |
| राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी(RLTP) | 1 |
| कुल | 25 |
सोलहवीं विधानसभा (2023 से लगातार)
- श्रीगंगानगर जिले की श्रीकरणपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार गुरमीत सिंह कुन्नर का निधन हो जाने से चुनाव स्थगित कर दिया गया था।
- 5 जनवरी 2024 को श्रीकरणपुर सीट पर बाद में हुए चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रूपेन्द्र सिंह कुन्नर ने बीजेपी प्रत्याशी सुरेन्द्रपाल सिंह टीटी को चुनाव हरा दिया है। बीजेपी ने इस सीट को जीतने के लिए चुनाव से पहले ही अपने प्रत्याशी सुरेन्द्रपाल सिंह टीटी को मंत्री पद से नवाज दिया था।
पार्टी | चुनावचिन्ह | 199 सीट पर मतदान( 25 नवंबर 2023) | शेष 01 सीट पर मतदान (6 जनवरी 2023) होने के बाद 200 सीटो की स्थिति | वर्तमान स्थिति(उपचुनाव बाद) | |
| सीटे जीती | सीटे जीती | वोट शेयर प्रतिशत | |||
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | कमल | 115 | 115 | 42.1 % | 118 |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | हाथ | 69 | 70 (01 सीट कांग्रेस जीती) | 40 % | 67 |
| भारती आदिवासी पार्टी (BAP) | हॉकी- बॉल | 3 | 3 | 2.4 % | 4 |
| बहुजन समाज पार्टी (BSP) | हाथी | 2 | 2 | 1.8 % | 2 |
| राष्ट्रीय लोक दल(RLD) | हैंडपंप | 1 | 1 | – | 1 |
| राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी(RLTP) | बोतल | 1 | 1 | 2.4 % | 0 |
| निर्दलीय (IND) | – | 8 | 8 | 7.5 % | 8 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI(M) | हथौड़ा, हँसिया और सितारा | – | – | – | – |
| नेशनल यूनियनिस्ट जमींदारा पार्टी (NUZP) | टेलीफोन | – | – | – | – |
| नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP) | किताब | – | – | – | – |
| कुल | – | 199 | 200 | – | 200 |
- कुल 200 सीटे
- सामान्य -141
- अनुसूचित जाति – 34
- अनुसूचित जन जाति – 25
- 16वीं विधानसभा में उपचुनाव से पहले महिला विधायक संख्या 20 थी।
- उपचुनाव में सलूंबर विधानसभा सीट पर भाजपा की शांता मीणा ने जीत दर्ज की है जिस से महिला विधायक संख्या बढ़कर 21 हो गई है ।
- वर्तमान में महिला विधायक:
- भाजपा – 10
- कांग्रेस – 9
- निर्दलीय – 2
सोलहवीं विधानसभा का गठन
- 04 दिसम्बर, 2023 को सोलहवीं विधानसभा के गठन की अधिसूचना जारी हुई।
- भजन लाल शर्मा ने 15 दिसंबर 2023 को राजस्थान के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली, साथ में दो उपमुख्यमंत्री के रूप में दीया कुमारी और डॉ. प्रेम चंद बैरवा ने भी शपथ ली।
1. मतदान एवं मतगणना
- राजस्थान में 16वीं विधानसभा के लिए 25 नवंबर 2023 को चुनाव संपन्न हुए।
- 3 दिसंबर 2023 को मतगणना हुई।
- कुल मतदान प्रतिशत: 75.45% (2018 के 74.71% से 0.73% अधिक)।
- पोस्टल बैलेट से मतदान: 0.83%।
- ईवीएम से मतदान: 74.62%।
- पुरुष मतदाता: 74.53%
- महिला मतदाता: 74.72%
2. निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत
- सबसे अधिक मतदान:
- कुशलगढ़ (88.13%) – 2018 में 86.13% था।
- पोकरण (87.79%) – 2018 में 87.50% था।
- तिजारा (86.11%) – 2018 में 82.08% था।
- सबसे कम मतदान:
- आहोर (61.24%) – 2018 में 61.53% था।
- मारवाड़ जंक्शन (61.29%) – 2018 में 60.42% था।
- सुमेरपुर (61.44%) – 2018 में 60.89% था।
- महिला मतदाता अधिक:
- पोकरण (88.23%), कुशलगढ़ (87.54%), तिजारा (85.45%)।
- महिला मतदाता कम:
- जोधपुर (62.97%), टोडाभीम (63.22%), बामनवास (63.63%)।
3. मतदान में वृद्धि और गिरावट
- सबसे अधिक वृद्धि:
- बसेड़ी (+9.6%), तारानगर (+7.65%), आसपुर (+7.01%)।
- सबसे अधिक गिरावट:
- फलौदी (-7.15%), हिंडौन (-6.10%), जैसलमेर (-4.79%)।
4. कुल मतदान संख्याएँ
- ईवीएम से कुल वोट पड़े: 3,92,11,399।
- महिला वोट: 1,88,27,294।
- पुरुष वोट: 2,03,83,757।
- थर्ड जेंडर वोट: 348।
- वैध वोट: 3,98,30,823 (99.89%)।
- अमान्य वोट: 43,783 (0.11%)।
- कुल डाले गए वोट: 3,98,74,606 (75.33%)।
- पंजीकृत मतदाता: 5,29,31,152।
5. राजनीतिक दलों का प्रदर्शन
- भारतीय जनता पार्टी (भाजपा): 115 सीटें (बहुमत)।
- कांग्रेस: 69 सीटें।
- अन्य दल एवं निर्दलीय: 15 सीटें।
6. राजनीतिक रुझान एवं सामाजिक जनांकिकी
- जातीय समीकरण:
- जाट, गुर्जर, ओबीसी और एसटी मतदाताओं का झुकाव भाजपा की ओर बढ़ा।
- अनुसूचित जाति एवं जनजाति मतदाता पर कांग्रेस की पकड़ कमजोर हुई।
- महिला मतदाता:
- भाजपा की महिला केंद्रित योजनाओं ने महिलाओं का समर्थन आकर्षित किया।
- युवा मतदाता:
- भाजपा की रोजगार और विकास नीतियों का असर दिखा।
राजस्थान 2024 लोकसभा चुनाव परिणाम
| पार्टी | सीटे जीती |
| भारतीय जनता पार्टी (BJP) | 14 |
| भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) | 8 |
| भारत आदिवासी पार्टी (BAP) | 1 |
| भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI(M) | 1 |
| राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLTP) | 1 |
| कुल | 25 |
