पंचायती राज एवं नगर पालिकाओं का प्रशासन

पंचायती राज एवं नगर पालिकाओं का प्रशासन राजस्थान की राजनीति का एक महत्वपूर्ण विषय है, जो ग्रामीण एवं शहरी स्थानीय स्वशासन की संरचना और कार्यप्रणाली को स्पष्ट करता है। इसमें पंचायती राज संस्थाओं तथा नगर निकायों की भूमिका, शक्तियाँ और विकास में योगदान का अध्ययन किया जाता है। यह विषय विकेंद्रीकरण, स्थानीय प्रशासन और जनभागीदारी को समझने में सहायक है।

  • स्थानीय स्वशासन का अर्थ: स्थानीय स्वशासन, प्रशासन की एक प्रणाली है जहाँ लोगों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुनी गई स्थानीय संस्थाएं गाँवों, कस्बों या शहरों जैसी स्थानीय समुदायों के मामलों का प्रबंधन करती हैं।
  • स्थानीय सरकार की अवधारणा लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों “सार्थक भागीदारी और उद्देश्यपूर्ण जवाबदेही” को मजबूती देती है। 
  • यह शासन का वह स्तर है, जो आम नागरिकों के सबसे करीब होता है और उन्हें स्थानीय मुद्दों में भाग लेने का अवसर प्रदान करता है।
महत्वपूर्ण कथन:-
  • जवाहरलाल नेहरू –“स्थानीय स्वशासन लोकतंत्र की सच्ची पद्धति का आधार है और होना भी चाहिए”
  • लार्ड ब्राइस – “स्थानीय स्वशासन प्रजातंत्र के लिए प्रशिक्षण स्थली या पाठशाला का काम करती हैं”
  • डी. टाकविले – “नागरिकों की स्थानीय सभाए स्वतंत्र राष्ट्रों की वास्तविक शक्ति है”
  • महात्मा गांधी – “स्थानीय संस्थाएं मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के अध्ययन की प्रयोगशाला हैं”

भारत में स्थानीय सरकार की अवधारणा का विकास

  • प्रारंभिक विकास: अंग्रेजों ने सबसे पहले 1667 में मद्रास नगर परिषद की स्थापना की, जिसे 1687 में नगर निगम का दर्जा दिया गया।
  • राजस्थान में शुरुआत: 1864 में माउंट आबू में राजस्थान की पहली नगरपालिका स्थापित की गई।
  • लॉर्ड मेयो का विकेंद्रीकरण प्रस्ताव (1870): स्थानीय शासन के विकास के लिए विकेंद्रीकरण की पहल की।
  • लॉर्ड रिपन का योगदान (1882): ‘भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक’ कहे जाने वाले लॉर्ड रिपन (1880-1884) ने जिला बोर्ड, ग्राम पंचायत, और न्याय पंचायतों का गठन किया। उनका 1882 का संकल्प स्थानीय स्वशासन का ‘मैग्नाकार्टा’ माना जाता है।
  • रायल कमीशन (1907): हॉब हाउस की अध्यक्षता में गठित इस कमीशन ने 1909 में स्थानीय स्वशासन पर अपनी रिपोर्ट दी।
  • 1919 का भारत शासन अधिनियम (मान्टेग्यू चेम्स फोर्ड अधिनियम): इस अधिनियम ने स्थानीय स्वशासन को वैधानिक स्वरूप दिया और इसे हस्तांतरित विषयों में शामिल किया।
  • बीकानेर की पहल: राजस्थान में बीकानेर प्रथम रियासत थी जिसने 1928 में ग्राम पंचायत अधिनियम बनाया। उसके बाद जयपुर, सिरोही, भरतपुर, करौली ने ग्राम पंचायत अधिनियम बनाया ।
आधुनिक काल और संविधान में स्थान
  • 1935 का भारत सरकार अधिनियम: स्थानीय स्वशासन को राज्य सूची में रखा गया।
  • 1987 में स्थानीय सरकार के संस्थानों की समीक्षा शुरू हुई।
  • 1989 में पी.के. थुंगन समिति ने इन्हें संवैधानिक मान्यता देने की सिफारिश की।
  • 1992 में 73वां और 74वां संवैधानिक संशोधन पारित किया गया, जिससे पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ।
  • अनुच्छेद 40 (राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत): राज्य को ग्राम पंचायतों के गठन और उन्हें स्वायत्तता देने के निर्देश दिए गए।
  • गांधीजी का ग्राम स्वराज: गांधीजी ने अपनी पुस्तक “My Picture of Free India” में ग्राम स्वराज की परिकल्पना रखी, जिसमें आत्मनिर्भर ग्रामों का उल्लेख किया।
  • Note : 1964-67 – प्रथम पीढ़ी के पंचायती राज संस्थाओं का अवसान
पंचायती राज एवं नगर पालिकाओं का प्रशासन

ग्रामीण स्थानीय स्वशासन (पंचायती राज)

  • “गांवों के लोगों को व पंचायतों को अधिकार दो, वे हजार गलतियाँ करेंगे, पर घबराने की आवश्यकता नहीं है ”- नेहरू
  • महात्मा गांधी के अनुसार “भारत की आत्मा गांवों में बसती है इसलिए गांवों को आत्मनिर्भर  बनाए
  • ग्राम सभा की परिकल्पना ग्रामवासियों के एक ऐसे संस्थागत मंच के रूप में की गई है, जिसमें यह सुनिश्चित किया जाता है कि गांव की प्रत्येक आवाज को सुना जाए। समाज के प्रत्येक वर्ग की आवश्यकताओं और चिंताओं का निराकरण किया जाए। विकेन्द्रीकरण आंदोलन द्वारा लोकतांत्रिक मूल्यों को तृण-मूल (Grass root) स्तर तक सामाजिक-आर्थिक एवं राजनैतिक व्यवस्था के रूप में स्थापित किया जाना पंचायती राज का उद्देश्य है। महात्मा गांधी जी ने कहा था कि “यदि गाँव नष्ट होते हैं तो भारत नष्ट हो जाएगा।”

पंचायती राज व्यवस्था का विकास 

  • ग्रामीण विकास में जनसहभागिता बढ़ाने के लिए के.एम. मुंशी समिति की सिफारिश पर 2 अक्टूबर, 1952 को ‘सामुदायिक विकास कार्यक्रम’ लागू किया गया । 2 अक्टूबर 1953 को “राष्ट्रीय सविस्तार योजना” लागू की गई। 
  • इन कार्यक्रमों के लिए अमेरिका के फोर्ड फाउण्डेशन ने आर्थिक सहायता दी। लेकिन सरकारी मशीनरी (नौकरशाही) के अत्यधिक हस्तक्षेप व जनसहभागिता की कमी के कारण यह कार्यक्रम असफल रहा ।

बलवन्त राय मेहता समिति (1957):

  • गठन –  जनवरी 1957 (योजना आयोग द्वारा, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय।)
  • रिपोर्ट सौंपी – 24 नवम्बर 1957 को राष्ट्रीय विकास परिषद् को
  • रिपोर्ट का शीर्षक  – ‘लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण’
  • उद्देश्य – सामुदायिक विकास कार्यक्रम व राष्ट्रीय प्रसार सेवा कार्यक्रम की असफलता का मूल्यांकन/जांच करने हेतु तथा इनके बेहतर क्रियान्वयन के लिए सुझाव देने के लिए 
  • बलवंत राय मेहता ने अपने प्रतिवेदन में प्रशासनिक हस्तक्षेप के कारण इन दोनों कार्यक्रमों को असफल बताया तथा यह सिफारिश की कि सामुदायिक कार्यों में लोगों की भागीदारी सांविधिक प्रतिनिधि निकायों के माध्यम से आयोजित की जाए । उन्होंने भारत में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण लागू करने की अनुशंसा की थी ।
  • बलवन्त राय मेहता समिति की सिफारिश पर सर्वप्रथम 2 अक्टूबर, 1959 में नागौर जिले के बगदरी गांव (राजस्थान) से तात्कालिक प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने ‘त्रिस्तरीय पंचायती राज’ व्यवस्था का शुभारम्भ किया।
  • 11 अक्टूबर, 1959 के आन्ध्रप्रदेश प्रदेश (महबूबनगर जिले के शादनगर खंड) में पंचायती राज व्यवस्था को लागू किया गया।
  • इस प्रकार पंचायती राज व्यवस्था को लागू करने वाला प्रथम राज्य राजस्थान तथा दूसरा आन्ध्रप्रदेश था।
  • 11 अक्टूबर, 1959 को आन्ध्रप्रदेश भारत का पहला राज्य बना जहाँ पंचायत राज संस्थाओं के चुनाव हुए।
  • लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण शब्द बलवंत राय मेहता ने दिया था इसलिए इनको लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का जनक कहा जाता है ।
  • बलवंत राय मेहता को भारत में पंचायती राज का शिल्पकार कहा जाता है । 
  • बलवन्त राय मेहता समिति की मुख्य सिफारिशें –
  • त्रिस्तरीय पंचायती राज की स्थापना की जानी चाहिए। 
    • (i)  ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत (प्रति 1 हजार जनसंख्या पर)
    • (ii) खण्ड स्तर पर पंचायत समिति (प्रति 5 हजार आबादी पर) 
    • (iii) जिला स्तर पर जिला परिषद्‌। (प्रति 50 हजार आबादी पर)
  • पंचायत समिति स्तर यानि मध्यवर्ती स्तर, पंचायती राज का मुख्य आधार होगा अर्थात पंचायत समिति पर विशेष बल। पंचायत समिति (खंड स्तर) कार्यकारी निकाय के रूप में होगी जबकि जिला परिषद की भूमिका सलाहकारी, समन्वयक एवं पर्यवेक्षण की होगी।
  • ग्राम पंचायत का चुनाव प्रत्यक्ष एवं सीधा होगा जबकि पंचायत समिति एवं जिला समिति का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से होगा ।
  • जिला कलेक्टर को जिला परिषद का अध्यक्ष होना चाहिए ।
  • इन संस्थाओं के प्रभावी कार्यक्रम के लिए पर्याप्त संसाधन हस्तांतरित किया जाए और भविष्य में शक्तियों का केंद्रीकरण किया जाए ।
  • नोट : 
    • ऐसा राज्य जिसकी जनसँख्या 20 लाख से कम वहां पंचायतीराज का ढांचा द्विस्तरीय हो सकता है अर्थात वहां खण्ड स्तर (पंचायत समिति) नहीं होगी ।
    • 1965 के बाद देश में पंचायती राज व्यवस्था के चुनाव में अनियमितता उत्पन्न हुई । इसके लिए विभिन्न समितियों एवं कार्य दलों का गठन किया गया जिन्होंने अपनी-अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपी ।
  • 1965 के बाद पंचायतीराज व्यवस्था के पतन के कारण
    1. धन की कमी
    2. राजनीतिक चेतना की कमी 
    3. आंतरिक मतभेद 
    4. नियमित चुनाव प्रणाली का अभाव 
    5. अधिकारों का विकेन्द्रीकरण नाममात्र का
  • जी रामचंद्रन समिति – 1966 में पंचायतीराज प्रशिक्षण केन्द्रों पर गठित समिति 
  • दया चौबे समिति – 1976 में सामुदायिक विकास एवं पंचायतीराज पर गठित समिति 

अशोक मेहता समिति (1977):

  • गठन – दिसंबर 1977 में, जनता पार्टी की सरकार ने अशोक मेहता की अध्यक्षता में पंचायती राज संस्थाओं पर एक समिति को गठन किया। 
  • रिपोर्ट – अगस्त 1978 में 
  • उद्देश्य – देश में पतनोन्मुख पंचायती राज पद्धति को पुनर्जीवित और मजबूत करने हेतु 132 सिफारिशें कीं
  • सिफारिशें – 
    • त्रिस्तरीय पंचायती राज पद्धति को द्विस्तरीय पद्धति में बदलना चाहिए। अर्थात् ग्राम पंचायत के स्थान पर मंडल पंचायते गठित की जाये। 
    • समिति ने जिला स्तर को सर्वाधिक महत्व दिया तथा इसे जनपद स्तर पर योजनाओं के निर्माण के लिए उत्तरदायी और कार्यकारी निकाय के रूप में माना ।
    • ‘न्याय पंचायत’ को विकास पंचायत से अलग निकाय के रूप में रखा जाना चाहिए। एक योग्य न्यायाधीश द्वारा इनका सभापतित्व किया जाना चाहिए। 
    • पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता दी जानी चाहिए।
    • जिला कलक्टर सहित सभी अधिकारी जिला परिषद के अधीन रखे जाये। 
    • संस्थाओं के चुनाव दलगत आधार पर करवाए जाये। पंचायतों के चुनावों में सभी स्तरों पर राजनीतिक दलों की आधिकारिक भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
    • पंचायतों में SC और ST समुदायों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित की जानी चाहिए।
    • पंचायतों में महिलाओं के लिए एक तिहाई स्थान आरक्षित किए जाने चाहिए।
    • पंचायती राज व्यवस्था में स्वयं सेवी संस्थाओं की भूमिका बढ़ाई जाये।
    • पंचायतीराज संस्थाओं को करारोपण और अपने संसाधन जुटाने की शक्तियां प्रदान की जाएं।
    • जिला स्तरीय एजेंसियों के माध्यम से पंचायतीराज संस्थाओं की नियमित सामाजिक लेखा परीक्षा कराई जाए।
    • राज्य सरकारों को पंचायतीराज संस्थाओं के कार्यक्रमों में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना चाहिए।
    • “पंचायतीराज वित्त निगम” की स्थापना का सुझाव दिया गया।
    • पंचायतों के विघटन के बाद 6 महीने के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य होना चाहिए।
    • पंचायतीराज संस्थाओं के चुनावों की जिम्मेदारी राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को सौंपी जाए, जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त से परामर्श करें।
    • प्रत्येक राज्य में पंचायतीराज विभाग की स्थापना की जानी चाहिए।
    • पंचायतीराज संस्थाओं के मामलों की निगरानी के लिए राज्य मंत्रिपरिषद में एक पंचायतीराज मंत्री की नियुक्ति होनी चाहिए।
    • नोट :
      • जनता पार्टी सरकार के भंग होने के कारण केंद्रीय स्तर पर समिति की सिफारिशों पर कोई कार्यवाही नहीं हो सकी।
      • कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश ने समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए पंचायतीराज संस्थाओं के पुनरुद्धार के लिए कदम उठाए।
      • समिति ने 1959-1969 के समय को पंचायतीराज का उत्थान काल कहा।
      • 1978 में संसद में पंचायतीराज से संबंधित एक निजी विधेयक प्रस्तुत किया गया।

दांतेवाला समिति (1978) :

  • दाँतेवाला समिति ब्लॉक योजना के लिए संस्थागत और वैचारिक ढांचे का सुझाव देने के लिए 1977 में भारत सरकार द्वारा नियुक्त एक समिति थी। समिति ने 1978 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
  • दाँतेवाला समिति मुख्य रूप से ब्लॉक/खंड-स्तरीय योजना और ग्रामीण ऋण से संबंधित है।
  • इसने सिफारिश की कि ब्लॉक/खंड-स्तर पर योजनाओं (नियोजन) का निर्माण भारत में ग्रामीण विकास की आधारशिला होनी चाहिए।
  • इसने ग्रामीण गरीबों को ऋण प्रदान करने के लिए क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRB) की स्थापना की भी सिफारिश की।
  • गांव, जनपद और राष्ट्रीय स्तर की योजनाओं को आपस में जोड़कर एकीकृत करने पर बल दिया।

हनुमन्त राव कार्यकारी समूह (1984)

  • 1984 में सी.एच. हनुमन्त राव की अध्यक्षता में जिला योजना के संबंध में कार्यकारी समूह का गठन।
  • किसी मंत्री या कलेक्टर के अंतर्गत अलग से जिला योजना संस्था बनाने की अनुशंसा की।
  • विकेन्द्रित योजना में कलेक्टर की महत्त्वपूर्ण भूमिका सुनिश्चित करने का सुझाव।
  • नियोजन प्रक्रिया में पंचायतीराज संस्थाओं का सक्रिय सहयोग लेने की सिफारिश।

जी.वी.के. राव समिति(1985):

  • 1985 में योजना आयोग ने ग्रामीण विकास और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों के लिए मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा के लिए जी.वी.के. राव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। समिति ने रिपोर्ट 1986 में दी।  
  • इस समिति ने पाया कि पंचायतीराज व्यवस्था में नौकरशाही का प्रभाव बढ़ने से लोकतांत्रिक विकास प्रक्रिया कमजोर हो गई है। इसके परिणामस्वरूप, पंचायतीराज संस्थाओं को “बिना जड़ वाली घास” कहा गया। 
  • समिति ने पंचायती राज पद्धति को मजबूत और पुनर्जीवित करने हेतु कई महत्वपूर्ण सिफारिशें कीं, जो इस प्रकार थीं-
    1. पंचायतीराज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा दिया जाए ।
    2. पंचायतीराज को चार-स्तरीय बनाया जाए:
      •  (i)  गाँव स्तर पर ग्राम सभा
      • (ii) मण्डल स्तर पर मण्डल पंचायत
      • (iii)जिला स्तर पर जिला परिषद्‌
      • (iv)राज्य स्तर पर राज्य विकास परिषद्‌ (जिसके अध्यक्ष मुख्यमंत्री हों)।
  • जिला स्तरीय निकाय, अर्थात्‌ जिला परिषद को लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया जाना चाहिये। 
  • जिला परिषद्‌ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में ‘जिला विकास आयुक्त ‘ के पद का सृजन किया जाना चाहिए। 
  • प्रभावी जिला नियोजन विकेंद्रीकरण के लिए राज्य स्तर के कुछ नियोजन कार्यों को जिला स्तर पर हस्तांतरित किया जाना चाहिए ।
  • पंचायती राज संस्थानों में नियमित निर्वाचन होने चाहिए ।
  • इसमें स्वयंसेवी संगठनों को विकेंद्रीकरण प्रक्रिया में भाग लेने पर जोर दिया गया।
  • समिति ने विकेंद्रित क्षेत्रीय प्रशासन की अपनी योजना में पंचायती राज को स्थानीय आयोजना एवं विकास में प्रमुख भूमिका प्रदान की। यहाँ इसी बिन्दु पर जी.वी.के.राव समिति रिपोर्ट 1986, प्रखंड स्तरीय आयोजना पर दाँतवाला समिति, 1978 तथा जिला आयोजना पर हनुमंत राव समिति रिपोर्ट 1984 से अलग है। 
  • नोट  
    • इस समिति को कार्ड समिति के नाम से भी जाना जाता है ।

एल.एम. सिंघवी समिति(1986):

  • 1986 में राजीव गांधी सरकार ने “लोकतंत्र व विकास के लिए पंचायती राज संस्थाओं का पुनरुद्धार’ पर एक अवधारणा पत्र तैयार करने के लिए एक समिति का गठन एल.एम. सिंहवी की अध्यक्षता में किया। 
  • सिफारिशें –
    • पंचायतीराज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्रदान की जानी चाहिए।
    • पंचायतीराज के नियमित, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए संवैधानिक प्रावधान किए जाने की सिफारिश की गई।
    • गांवों के समूहों के लिए न्याय पंचायतों की स्थापना की जाए।
    • ग्राम सभा को प्रत्यक्ष लोकतंत्र की इकाई के रूप में स्थापित किया जाए। इसने ग्राम सभा को प्रत्यक्ष लोकतंत्र की मूर्ति बताया ।
    • पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव, विघटन और कार्यों से संबंधित विवादों के समाधान के लिए न्यायिक अभिकरणों का गठन किया जाए।
  • लक्ष्मीमल सिंघवी जोधपुर के प्रसिद्ध कानूनविद् थे।
  • सिंघवी समिति की सिफारिश पर पंचायतीराज को संवैधानिक दर्जा दिया गया, जो 73वें संविधान संशोधन 1992 के तहत 24 अप्रैल 1993 को लागू हुआ।
  • लोकपाल शब्द का प्रयोग सबसे पहले लक्ष्मीमल सिंघवी ने किया।

18वां प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन

  • ओडिशा सरकार के सहयोग से 08-10 जनवरी 2025 को भुवनेश्वर, ओडिशा में आयोजित किया गया। 
  • 2025 का विषय: “विकसित भारत में प्रवासी भारतीयों का योगदान” है।
  • 2003 से प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन हर साल आयोजित किए जाते रहे हैं, हालांकि 2015 से इसका प्रारूप संशोधित किया गया, और अब यह हर दो साल में एक बार मनाया जाता है।
  • प्रथम प्रवासी भारतीय दिवस 7-9 जनवरी, 2003 को नई दिल्ली में मनाया गया।

पी. के. थुंगन समिति(1988):

  • 1988 में, संसद की सलाहकार समिति की एक उप-समिति पी. के. थुंगन की अध्यक्षता में राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचे की जांच करने के उद्देश्य से गठित की गयी। 
  • इस समिति में पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए सुझाव दिया। 
  • अनुशंसाएं –
    • पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता प्राप्त होनी चाहिए। 
  • पंचायती राज संस्थाओं का पांच वर्ष का निश्चित कार्यकाल होना चाहिए। 
  • एक संस्था के सुपर सत्र की अधिकतम अवधि छह माह होना चाहिए। 
  • पंचायती राज के तीन स्तरों पर जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण होना चाहिए। 
  • महिलाओं के लिए भी आरक्षण होना चाहिए। 
  • इसी समिति की अनुशंसा पर इन संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देने हेतु विधेयक तैयार किये गये।
  • 1989 में पंचायत राज संस्थाओं हेतु 64वाँ तथा नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा देने हेतु 65वाँ संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में लाये गये। 

गाडगिल समिति (1988):

  • 1988 में वी.एन गाडगिल की अध्यक्षता में एक नीति एवं कार्यक्रम समिति का गठन कांग्रेस पार्टी ने किया था। 
  • इस समिति से इस प्रश्न पर विचार करने के लिए कहा गया कि ”पंचायती राज संस्थाओं को प्रभावकारी कैसे बनाया जा सकता।’” 
  • अनुशंसाएँ
    • पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया जाये। 
    • पचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल पाँच वर्ष सुनिश्चित कर दिया जाये।  
    • अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा महिलाओं के लिए आरक्षण होना चाहिए। 
    • पंचायती राज संस्थाओं को कर लगाने, वसूलने तथा जमा करने का अधिकार होगा। 
हनुमंत राव समिति (1983)
हरलाल सिंह खर्रा समिति (1990) 

संवैधानिकरण के प्रयास 

  • एम.एल. सिंघवी समिति व पी.के. थुंगन समिति की सिफारिशों के उपरान्त राजीव गांधी की सरकार ने स्थानीय व शहरी निकायों को संवैधानिक मान्यता देने हेतु जुलाई 1989 में क्रमशः 64वां  व 65वां संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया।
  • लोकसभा में पारित होने के बाद संघीय व्यवस्था में केन्द्र के बढ़ते दखल के मुद्दे पर यह राज्यसभा में पारित नहीं हो पाया।
  • राजीव गांधी को आधुनिक पंचायतीराज का जनक कहा जाता है। 
  • फिर 1992 में प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की सरकार ने 73वां संविधान संशोधन कर पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया और यह 24 अप्रैल, 1993 से प्रभाव में आया। इस संशोधन के बाद राज्यों के लिए पंचायती राज संस्थाओं की स्थापना करना बाध्यता हो गई।
  • 22 दिसम्बर, 1992 को यह विधेयक लोकसभा द्वारा पारित किया गया। 17 राज्यों द्वारा इसका अनुमोदन किया गया क्योंकि ‘ पंचायती राज सातवीं अनुसूची से सम्बन्धित विषय था जो कि संसद के विशेष बहुमत एवं आधे से अधिक राज्यों द्वारा अनुमोदित किया जाना था।
  • संविधान संशोधन से पहले स्थानीय स्वशासन से संबंधित निम्न समस्याएँ थी-
    • समय पर चुनाव नहीं होना।
    • संस्थाओं के कार्य निर्धारित नहीं थे।
    • धन का अभाव।
    • राज्य सरकारों का अत्यधिक हस्तक्षेप।

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