राज्यपाल : संवैधानिक प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 से 162 तक राज्यपाल के पद, शक्तियों एवं कार्यों का विस्तृत वर्णन किया गया है। “राजस्थान राजनीतिक व्यवस्था” के अध्ययन में राज्यपाल को राज्य का संवैधानिक प्रमुख माना जाता है, जो केंद्र और राज्य के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता है। राज्यपाल की नियुक्ति, शक्तियाँ तथा दायित्व संविधान द्वारा निर्धारित होते हैं, जो राज्य की शासन-प्रणाली को संतुलित एवं सुचारु बनाते हैं।
राज्यपाल : संबंधित संवैधानिक प्रावधान

- नोट: अनुच्छेद 152, राज्य की परिभाषा को स्पष्ट करता है।
- अनुच्छेद 152 की परिभाषा के मुताबिक, राज्यों के गठन में जम्मू और कश्मीर राज्य शामिल नहीं है।
- संविधान के छठे भाग के अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्य कार्यपालिका के बारे में बताया गया है।
- राज्य कार्यपालिका में शामिल होते हैं-
- राज्यपाल
- मुख्यमंत्री एवं मंत्रिपरिषद
- राज्य के महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल)।
- राज्यपाल, विधानमंडल का अभिन्न अंग होता है ।
- राज्य का प्रथम नागरिक ।
- राज्य प्रशासन के विधितः (डीज्यूरे) प्रमुख
राज्यपाल से संबंधित अनुच्छेद
अनुच्छेद 153 – राज्यों के राज्यपाल
- प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा।
- 7 वें संविधान संशोधन अधिनियम (1956) की धारा-6 के अनुसार एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल भी नियुक्त किया जा सकता है।
अनुच्छेद 154 – राज्य की कार्यपालिका शक्ति
- राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी और वह इसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा ।
- नोट :
- अधीनस्थ अधिकारियों से तात्पर्य मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद् से है, जो राज्य के प्रशासनिक कार्यों को संचालित करते हैं।
- राज्य का संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल होता है, जो स्वतंत्र और संवैधानिक पद है।
- राज्य का राजनैतिक प्रमुख मुख्यमंत्री है, जो सरकार का वास्तविक कार्यकारी प्रमुख होता है।
- राज्य का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी मुख्य सचिव होता है, जो विभिन्न विभागों के समन्वय के लिए जिम्मेदार होता है।
- भारत की संसदीय शासन प्रणाली में कार्यपालिका दो प्रकार की होती है – नाममात्र कार्यपालिका, जिसमें राज्यपाल शामिल हैं, और वास्तविक कार्यपालिका, जिसमें मुख्यमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद् शामिल होते हैं।
अनुच्छेद 155 :- राज्यपाल की नियुक्ति
- राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा नियुक्त करेगा ।
- राष्ट्रपति इस संदर्भ में वारण्ट जारी करता है। नियुक्ति संबंधी वारण्ट को राज्य का मुख्य सचिव पढ़कर सुनाता है।
- राज्यपाल की नियुक्ति संघीय मंत्रिपरिषद् की अनुशंसा पर राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है अर्थात् राज्यपाल राष्ट्रपति द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से नियुक्त किया जाता है । राज्यपाल की नियुक्ति के सम्बन्ध में दो परम्पराएँ हैं।
- राष्ट्रपति किसी व्यक्ति को उस राज्य का राज्यपाल नियुक्त नहीं करेगा जिसका वह निवासी है।
- राष्ट्रपति राज्यपाल की नियुक्ति से पहले सम्बन्धित राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श करता है ।
- नोट- यद्यपि दोनों परंपराओं का कुछ मामलों में उल्लंघन किया गया है । उदाहरण के लिए
- 1981 में जम्मू कश्मीर के राज्यपाल के रूप में जगमोहन की नियुक्ति मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला की सलाह के बिना की गई । अंतः विरोध स्वरूप राज्य मंत्रिपरिषद ने त्यागपत्र दे दिया ।
- 1988 में पश्चिम बंगाल में टीवी राजेश्वर राव को मुख्यमंत्री ज्योति बसु से सलाह किए बिना नियुक्त किया गया ।
- डॉक्टर एचसी मुखर्जी (पश्चिम बंगाल), डॉ. करण सिंह (जम्मू एवं कश्मीर), सरदार उज्जवल सिंह (पंजाब) आदि को संबंधित राज्यों के निवासी होने के बावजूद राज्यपाल नियुक्त किया गया ।
- सरकारिया आयोग ने यह अनुशंसा की थी कि अनुच्छेद 155 में संशोधन कर संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री के साथ विचार विमर्श को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने राज्यपाल की नियुक्ति के संदर्भ में कॉलेजियम व्यवस्था लागू करने की अनुशंसा की थी।
राज्यपाल की नियुक्ति: संविधान सभा की दृष्टि
- संविधान सभा में राज्यपाल के सीधे निर्वाचन का मुद्दा उठाया गया, लेकिन राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति के प्रावधान को अपनाया गया। इसके पीछे मुख्य तर्क निम्नलिखित थे:
- संसदीय व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव- राज्यपाल का सीधा निर्वाचन राज्य में स्थापित संसदीय व्यवस्था के लिए हानिकारक हो सकता था।
- मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच संघर्ष – सीधे चुनाव से मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच अधिकारों का टकराव होने की संभावना बढ़ जाती।
- संवैधानिक प्रमुख की भूमिका – राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख होता है। इसे निर्वाचित करने की प्रक्रिया जटिल और अव्यावहारिक मानी गई।
- तटस्थता का अभाव – निर्वाचित राज्यपाल किसी राजनीतिक दल से जुड़ा हो सकता था, जिससे उसकी तटस्थता पर सवाल उठते।
- राजनीतिक द्वंद्व और अलगाववाद – राज्यपाल का सीधा निर्वाचन राजनीतिक द्वंद्व और अलगाववाद को बढ़ावा देने का कारण बन सकता था।
- दोहरी भूमिका में कठिनाई – राज्यपाल राज्य का प्रमुख और केंद्र का एजेंट होता है। निर्वाचित होने की स्थिति में वह केंद्र के एजेंट के रूप में प्रभावी रूप से कार्य नहीं कर सकता
- अमेरिकी और कनाडाई मॉडल का विश्लेषण – संविधान सभा ने अमेरिकी मॉडल (जहाँ राज्यपाल का सीधा निर्वाचन होता है) को अस्वीकार कर कनाडाई मॉडल को अपनाया। कनाडाई मॉडल में राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र द्वारा की जाती है।
निष्कर्ष
- भारत की संघात्मक शासन प्रणाली केंद्र की ओर झुकी हुई है, क्योंकि देश की एकता और अखंडता के लिए मजबूत केंद्र का होना आवश्यक है। नियुक्त राज्यपाल के माध्यम से केंद्र राज्यों पर प्रभावी नियंत्रण रख सकता है। यदि राज्यपाल निर्वाचित होता, तो केंद्र का राज्यों पर प्रभावी नियंत्रण संभव नहीं हो पाता। इस प्रकार, राज्यपाल की नियुक्ति प्रणाली भारत के संघीय ढांचे को सुदृढ़ बनाने में सहायक है।
अनुच्छेद 156 – राज्यपाल का कार्यकाल
- राज्यपाल, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेगा ।
- राज्यपाल, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा ।
- इस अनुच्छेद के पूर्वगामी उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्यपाल अपने पदग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा :
- परन्तु राज्यपाल, अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी, तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी अपना पदग्रहण नहीं कर लेता है।
- राज्यपाल का यदि आकस्मिक निधन हो जाए तो संबंधित राज्य का मुख्य न्यायाधीश राज्यपाल का कार्य करता है
- राज्यपालों को हटाने के आधार का उल्लेख संविधान में नहीं है लेकिन वी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ (2010) में यह निर्णय दिया गया कि किसी भी राज्यपाल को राजनैतिक आधार पर नहीं हटाया जाना चाहिए।
- राष्ट्रपति किसी राज्यपाल का स्थानांतरण कर सकते है। स्थानांतरण करने पर राज्यपाल शेष अवधि के लिए कार्य करते है।
- किसी व्यक्ति को कितनी भी बार राज्यपाल बनाया जा सकता है।
- पूँछी आयोग ने राज्यपालों को हटाने के संदर्भ में महाभियोग की प्रक्रिया अपनाने का सुझाव दिया था।
- संविधान में राज्यपाल को हटाने की कोई स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित नहीं है। 1989 में वी.पी. सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार ने कांग्रेस द्वारा नियुक्त राज्यपालों से त्याग-पत्र मांगा, जिनमें से कुछ को हटाया गया और कुछ को पद पर बने रहने दिया गया। 1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार ने वी.पी. सिंह सरकार द्वारा नियुक्त 14 राज्यपालों को हटा दिया। राज्यपाल की नियुक्ति और हटाने का स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान न होने के कारण यह प्रक्रिया केंद्र सरकार की राजनीतिक प्राथमिकताओं पर निर्भर रहती है, जिससे संघीय ढांचे पर असर पड़ सकता है।
अनुच्छेद 157 – राज्यपाल नियुक्त होने के लिए अहर्ताएँ
- कोई व्यक्ति राज्यपाल नियुक्त होने का पात्र तभी होगा जब-
- वह भारत का नागरिक हो और;
- 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है।
अनुच्छेद 158 – राज्यपाल के पद की शर्तें
- संसद और विधानमंडल का सदस्य न हो। यदि है तो राज्यपाल का पद ग्रहण करते ही सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाएगी।
- राज्यपाल अन्य-कोई लाभ-का पद-धारण नहीं करेगा।
- बिना किराए का राजभवन, संसद द्वारा निर्धारित उपलब्धियाँ, विशेषाधिकार और भत्ते प्राप्त होंगे।
- (3A) – 7वाँ संविधान संशोधन 1956 की धारा 7 द्वारा जोड़ा गया – यदि दो राज्यों का या अधिक राज्यों का राज्यपाल है तो उपलब्धियाँ और भत्ते राष्ट्रपति द्वारा तय मानकों के हिसाब से राज्य मिलकर प्रदान करेंगे। अर्थात् यदि कोई व्यक्ति दो राज्यों का राज्यपाल होता है तो उसे वेतन एक ही राज्यपाल के बराबर मिलेगा लेकिन उसके वेतन का बंटवारा राज्यों में राष्ट्रपति द्वारा तय किये गये अनुपात में होगा।
- राज्यपाल की उपलब्धियां और भत्ते उसकी पदावधि के दौरान कम नहीं किए जाएंगे ।
- राज्यपाल के वेतन एवं भत्ते राज्य की संचित निधि पर भारित होते है।
- पेंशन भारत की संचित/समेकित निधि में से दी जाती है ।
- दूसरी अनुसूची के अनुसार वर्तमान में राज्यपाल को 3 लाख 50 हजार प्रतिमाह वेतन दिया जाता है । संविधान के लागू के समय राज्यपाल का वेतन 5500 रुपये प्रतिमाह था।
अनुच्छेद 159 – राज्यपाल द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
- प्रत्येक राज्यपाल और प्रत्येक व्यक्ति जो राज्यपाल के कृत्यों का निर्वहन कर रहा है, एक शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा।
- राज्यपाल को सम्बन्धित राज्य के उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश अथवा उसकी अनुपस्थिति की दशा में वरिष्ठतम न्यायाधीश पद की शपथ दिलाता है।
- अनुच्छेद 159 में इनकी शपथ के प्रारूप का उल्लेख है। राज्यपाल की शपथ प्रारूप अनुसूची – 3 में नहीं मिलता है ।
- राज्यपाल संविधान व विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण तथा राज्य के लोगों की सेवा व कल्याण की शपथ लेते है।
- किसी राज्य का अतिरिक्त प्रभार दिये जाने पर उन्हें पुनः: शपथ लेनी होती है।
अनुच्छेद 160 – कुछ आकस्मिकताओं में राज्यपाल के कृत्यों का निर्वहन
- राष्ट्रपति ऐसी किसी आकस्मिकता में, जो इस अध्याय में उपबंधित नहीं है, राज्य के राज्यपाल के कृत्यों के निर्वहन के लिए ऐसा उपबंध कर सकेगा जो वह ठीक समझता है।
नोट : ऐसी परिस्थिति में संबधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को अस्थायी तौर पर राज्यपाल का कार्यभार सौंपा जा सकता है ।
अनुच्छेद 161 – क्षमा आदि की और कुछ मामलों में दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की राज्यपाल की शक्ति
- किसी राज्य के राज्यपाल को किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की अथवा दंडादेश में निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति होगी, जो किसी ऐसे विषय से संबंधित किसी कानून के विरुद्ध अपराध के लिए दोषी ठहराया गया हो, जिस तक राज्य की कार्यपालिका शक्ति लागू होती है।
अनुच्छेद 162 – राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
- इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार उन विषयों तक होगा जिनके संबंध में राज्य के विधानमंडल को कानून बनाने की शक्ति है:
- परंतु किसी ऐसे विषय में, जिसके संबंध में राज्य के विधानमंडल और संसद को विधि बनाने की शक्ति है, राज्य की कार्यपालिका शक्ति इस संविधान द्वारा या संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा संघ या उसके प्राधिकारियों को अभिव्यक्त रूप से प्रदत्त कार्यपालिका शक्ति के अधीन होगी और उससे सीमित होगी।
अनुच्छेद 163: राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद –
- राज्यपाल को संविधान में दिए गए उसके विवेकाधीन कार्यों को छोड़कर अन्य सभी कार्यों के लिए एक मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता प्राप्त होगी, जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा।
- राज्यपाल द्वारा मंत्रिपरिषद् के परामर्श को पुनर्विचार हेतु लौटाने का प्रावधान संविधान में नहीं है। जबकि 44वें संविधान संशोधन 1978 द्वारा राष्ट्रपति के लिए यह प्रावधान अनुच्छेद 74(1) में किया गया।
- जिन मामलों में राज्यपाल को विवेकाधीन शक्तियाँ दी गई हैं, उनमें राज्यपाल का निर्णय अंतिम होगा।
- न्यायालय यह जाँच नहीं करेगा कि मंत्रिपरिषद ने राज्यपाल को सलाह दी थी या नहीं, और यदि दी थी, तो क्या सलाह दी थी।
अनुच्छेद 164 – मंत्रियों के बारे में अन्य उपबंध
- मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा।
- सामूहिक उत्तरदायित्व
- मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।
- इसका अर्थ है कि कैबिनेट द्वारा लिया गया कोई भी निर्णय मंत्रिपरिषद का सामूहिक निर्णय माना जाता है। कोई भी मंत्री इस निर्णय का विरोध नहीं कर सकता।
- कोई मंत्री इस निर्णय के विरूद्ध नहीं जा सकता सभी मंत्री साथ साथ तैरते है साथ साथ डूबते है
- अर्थात् मंत्री व्यक्तिगत रुप से राज्यपाल तथा सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी है।
अनुच्छेद 165 – राज्य का महाधिवक्ता
- प्रत्येक राज्य का राज्यपाल, उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित किसी व्यक्ति को राज्य का महाधिवक्ता नियुक्त करेगा।
- महाधिवक्ता का यह कर्तव्य होगा कि वह उस राज्य की सरकार को विधि संबंधी ऐसे विषयों पर सलाह दे और विधिक स्वरूप के ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करे जो राज्यपाल उसको समय-समय पर निर्देशित करे या सौंपे और उन कृत्यों का निर्वहन करे जो उसको इस संविधान अथवा तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन प्रदान किए गए हों।
- महाधिवक्ता, राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करेगा और ऐसा पारिश्रमिक प्राप्त करेगा जो राज्यपाल अवधारित करे।
अनुच्छेद 166 – राज्य की सरकार के कार्य का संचालन
- किसी राज्य की सरकार की सभी कार्यपालिका कार्रवाई राज्यपाल के नाम से की गई मानी जाएगी।
- राज्यपाल के नाम से निकाले गए और निष्पादित आदेशों और अन्य लिखतों को ऐसी रीति से अधिप्रमाणित किया जाएगा, जैसा राज्यपाल द्वारा बनाए जाने वाले नियमों में विनिर्दिष्ट किया जाए और इस प्रकार अधिप्रमाणित किसी आदेश या लिखत की वैधता इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि वह राज्यपाल द्वारा निकाला गया या निष्पादित आदेश या लिखत नहीं है।
- राज्यपाल राज्य सरकार के कार्य के अधिक सुविधाजनक ढंग से संचालन के लिए तथा उक्त कार्य के मंत्रियों के बीच आबंटन के लिए नियम बनाएगा, जहां तक वह ऐसा कार्य नहीं है जिसके संबंध में राज्यपाल को इस संविधान द्वारा या इसके अधीन अपने विवेक से कार्य करने की अपेक्षा है।
अनुच्छेद 167 -राज्यपाल को जानकारी देने आदि के सम्बन्ध में मुख्यमंत्री के कर्तव्य
- प्रत्येक राज्य के मुख्यमंत्री का यह कर्तव्य होगा कि वह-:
- राज्य के कार्यो के प्रशासन सम्बन्धी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राज्यपाल को संसूचित करें।
- राज्य के कार्यो के प्रशासन सम्बधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी जो जानकारी राज्यपाल मांगे, वह दे और
- किसी विषय को जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर दिया है किन्तु मंत्रिपरिषद ने विचार नहीं किया है, राज्यपाल द्वारा अपेक्षा किये जाने पर परिषद् के समक्ष विचार के लिए रखे।
अनुच्छेद 168 – राज्यों के विधान-मण्डलों का गठन
- प्रत्येक राज्य में एक विधान मण्डल होगा जो राज्यपाल और एक सदन अथवा दो सदनों से मिलकर बनेगी।
- जहां किसी राज्य के विधान-मंडल के दो सदन हैं वहां एक का नाम विधान परिषद् और दूसरे का नाम विधान सभा होगा और जहां केवल एक सदन है वहां उसका नाम विधान सभा होगा ।
अनुच्छेद 175 – सदन या सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का राज्यपाल का अधिकार
- राज्यपाल राज्य विधानमंडल के किसी सदन को, या संयुक्त रूप से समवेत दोनों सदनों को, अभिभाषित कर सकेगा, और उस प्रयोजन के लिए सदस्यों की उपस्थिति की अपेक्षा कर सकेगा।
अनुच्छेद 176 – राज्यपाल का विशेष अभिभाषण
- विधान सभा के प्रत्येक साधारण चुनाव के पश्चात् प्रथम सत्र के प्रारम्भ में तथा प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के प्रारम्भ में राज्यपाल विधान सभा को या विधान परिषद वाले राज्य की दशा में दोनों सदनों को एक साथ समवेत करते हुए अभिभाषण देगा तथा विधानमण्डल को अपने आह्वान का कारण बताएगा।
अनुच्छेद 180. अध्यक्ष के पद के कर्तव्यों का पालन करने या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति की शक्ति:
- जब विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त हो तब राज्यपाल, विधानसभा के किसी सदस्य को अध्यक्ष पद के कर्तव्यो का पालन करने के लिए नियुक्त कर सकता है ।
- विधान सभा की किसी बैठक से अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष या यदि वह भी अनुपस्थित है तो ऐसा व्यक्ति, जो विधान सभा की प्रक्रिया के नियमों द्वारा अवधारित किया जाए, या यदि ऐसा कोई व्यक्ति उपस्थित नहीं है तो ऐसा अन्य व्यक्ति, जो विधान सभा द्वारा अवधारित किया जाए, अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा ।
अनुच्छेद 192 – सदस्यों की निरर्हताओं से संबंधित प्रश्नों पर विनिश्चय
- यदि यह प्रश्न उठता है कि किसी राज्य के विधान-मंडल के किसी सदन का कोई सदस्य अनुच्छेद 191 के खंड (1) में वर्णित किसी निरर्हता से ग्रस्त हो गया है या नहीं तो वह प्रश्न राज्यपाल को विनिश्चय के लिए निर्देशित किया जाएगा और उसका विनिश्चय अंतिम होगा ।
- ऐसे किसी प्रश्न पर विनिश्चय करने से पहले राज्यपाल निर्वाचन आयोग की राय लेगा और ऐसी राय के अनुसार कार्य करेगा ।
- नोट :
- अनुच्छेद 191 में राज्य विधान मंडल के सदस्यों की सदस्यता समाप्त करने के आधारों का उल्लेख हैं ।
- दल बदल के संदर्भ में राज्यपाल की कोई भूमिका नहीं होती । दल बदल के संदर्भ में सभी निर्णय संबंधित सदन का अध्यक्ष करता है ।
- नोट :
अनुच्छेद 202 – वार्षिक वित्तीय विवरण
- राज्यपाल प्रत्येक वित्तीय वर्ष के सम्बन्ध में राज्य के विधान-मण्डल के सदन या सदनों के समक्ष उस राज्य के वर्ष के लिए प्राक्कलित प्राप्तियों और व्यय का विवरण रखवायेगा।
अनुच्छेद 203 – विधान मण्डल में प्राक्कलनों के संबंध में प्रक्रिया
- (3) किसी अनुदान की मांग राज्यपाल की सिफ़ारिश पर ही की जायेगी, अथवा नहीं।
अनुच्छेद 205 – अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान
- (1B) किसी वित्तीय वर्ष के दौरान किसी सेवा पर उस वर्ष और उस सेवा के लिए अनुदान की गई रकम से अधिक कोई धन व्यय हो गया है, राज्यपाल, यथास्थिति राज्य के विधान-मंडल के सदन या सदनों के समक्ष उस व्यय की प्राक्कलित रकम को दर्शित करने वाला दूसरा विवरण रखवायेगा या राज्य की विधान सभा में ऐसे आधिक्य के लिए मांग प्रस्तुत करवायेगा।
अनुच्छेद 207 – वित्त विधेयकों के बारे में विशेष उपबंध
- अनुच्छेद 199 के खण्ड (1) के उपखंड (क) से उपखण्ड (च) में विनिर्दिष्ट किसी विषय के लिए उपबंध करने वाला विधेयक या संशोधन राज्यपाल की सिफारिश से ही पुरःस्थापित या प्रस्तावित किया जाएगा, अन्यथा नहीं और ऐसा उपबन्ध करने वाला विधेयक विधान परिषद् में पुरःस्थापित नहीं किया जायेगा:
- परंतु किसी कर के घटाने या उत्सादन के लिए उपबंध करने वाले किसी संशोधन के प्रस्ताव के लिए इस खंड के अधीन सिफारिश की अपेक्षा नहीं होगी ।
अनुच्छेद 213 – राज्यपाल द्वारा अध्यादेश जारी करना
- जब विधानमण्डल का सत्र न चल रहा हो तब किसी कानून की अति आवश्यकता होने की स्थिति में राज्यपाल राज्यसूची और समवर्ती सूची के किसी विषय पर अध्यादेश जारी कर सकता है।
- इस अनुच्छेद के अधीन प्रख्यापित अध्यादेश का वही बल और प्रभाव होगा जो राज्य विधानमंडल के किसी अधिनियम का होता है जिसे राज्यपाल ने अनुमति दे दी हो, किन्तु ऐसा प्रत्येक अध्यादेश
- ऐसा अध्यादेश नये सत्र के शुरू होने से 6 सप्ताह की अवधि तक प्रभावी रहता है। राज्य विधानमण्डल इस अवधि से पूर्व भी इस अध्यादेश को समाप्त कर सकती है।
- राज्यपाल द्वारा इसे किसी भी समय वापस लिया जा सकता है।
- स्पष्टीकरण – जहां विधान परिषद वाले राज्य के विधान-मंडल के सदन भिन्न-भिन्न तारीखों पर पुनः समवेत होने के लिए आहूत किए जाते हैं, वहां इस खंड के प्रयोजनों के लिए छह सप्ताह की अवधि की गणना उन तारीखों में से पश्चातवर्ती तारीख से की जाएगी।
- राज्यपाल, अध्यादेश राष्ट्रपति/राज्य मंत्रिपरिषद् की सलाह से जारी करता है अर्थात यह राज्यपाल की स्वविवेकीय शक्ति नहीं है ।
- ऐसा अध्यादेश न्यायिक समीक्षा के अधीन होगा।
- अध्यादेश बैठक शुरु होने के 6 सप्ताह बाद तक विधान मण्डल द्वारा पारित होना आवश्यक है, अन्यथा रद्द हो जाता है । (यदि दोनों सदन अलग-अलग तारीख को समवेत होते है तो 6 सप्ताह की गणना बाद में शुरु होने वाल सदन की तारीख से की जाती है ।)
- अध्यादेश की अधिकतम अवधि 6 माह और 6 सप्ताह होती है ।
- अध्यादेश प्रक्रिया लोकतंत्र के विरुद्ध है । एक विषय पर कई बार अध्यादेश जारी किया जा सकता है ।
- अध्यादेश निम्न परिस्थितियों में जारी किया जाता है :जब विधान मण्डल के दोनों सदन सत्र में ना हो (विधान सभा, विधान – परिषद)जब विधान मण्डल के दोनों सदनों में से कोई एक सदन सत्र में ना हो और राज्य में ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो गई कि कानून बनाना अनिवार्य है ऐसी परिस्थिति में राज्यपाल (मंत्री परिषद की सलाह से) द्वारा अपने हस्ताक्षर से आदेश जारी किया जाता है जिसे अध्यादेश कहा जाता है ।
अनुच्छेद 217 – उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति और उनके पद की शर्ते
- भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से, उस राज्य के राज्यपाल से और मुख्य न्यायमूर्ति से भिन्न किसी न्यायाधीश की नियुक्ति की दशा में उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श करने के पश्चात्, राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा उच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति करेगा और वह न्यायाधीश अपर या कार्यकारी न्यायाधीश की दशा में अनुच्छेद 224 में उपबंधित रूप से पद धारण करेगा और अन्य दशा में तब तक पद धारण करेगा जब तक वह बासठ वर्ष की आयु प्राप्त नही कर लेता है।
अनुच्छेद 233 – राज्यपाल द्वारा जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति
- किसी राज्य में जिला न्यायाधीश नियुक्त होने वाले व्यक्तियों की नियुक्ति तथा जिला न्यायाधीश की पदस्थापना और प्रोन्नति उस राज्य का राज्यपाल ऐसे राज्य के सम्बन्ध में अधिकारिता का प्रयोग करने वाले उच्च न्यायालय से परामर्श करके करेगा।
अनुच्छेद 234 – राज्यपाल द्वारा न्यायिक सेवा के लिए नियुक्ति (जिला न्यायाधीशों को छोड़कर)
- जिला न्यायाधीशों के अलावा किसी राज्य की न्यायिक सेवा में नियुक्तियां राज्य के राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग और ऐसे राज्य के संबंध में अधिकारिता का प्रयोग करने वाले उच्च न्यायालय के परामर्श के बाद, उस संबंध में उनके द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार की जाएंगी।
अनुच्छेद 243 I – वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लिए वित्त आयोग का गठन
- राज्य का राज्यपाल, संविधान (तिहत्तरवाँ संशोधन) अधिनियम, 1992 के प्रारम्भ से एक वर्ष के भीतर यथाशीघ्र, और तत्पश्चात्, प्रत्येक पांचवें वर्ष की समाप्ति पर, वित्त आयोग का गठन करेगा जो पंचायतों की वित्तीय स्थिति का पुनर्विलोकन करेगा।
- राज्यपाल इस अनुच्छेद के अन्तर्गत वित्त आयोग द्वारा प्रत्येक संस्तुति करवाएंगे और उस पर कार्यवाही करने सम्बन्धी सुस्पष्ट टिप्पणी विधान सभा के पटल पर रखने के लिए तैयार करवाएंगे।
अनुच्छेद – 267 (2) – आकस्मिकता निधि
- राज्य का विधान मण्डल, विधि द्वारा, अग्रदाय के स्वरूप की एक आकस्मिकता निधि की स्थापना कर सकेगा जो ”राज्य की आकस्मिकता निधि” के नाम से ज्ञात होगी जिसमें ऐसी विधि द्वारा अवधारित राशियां समय-समय पर जमा की जाएंगी और अनवेक्षित व्यय का अनुच्छेद 205 या अनुच्छेद 206 के अधीन राज्य के विधान मण्डल द्वारा, विधि द्वारा प्राधिकृत किया जाना लंबित रहने तक ऐसी निधि में से ऐसे व्यय की पूर्ति के लिए अग्रिम धन देने के लिए राज्यपाल को समर्थ बनाने के लिए उक्त निधि राज्य के राज्यपाल के व्ययनाधीन रखी जायेगी।
अनुच्छेद 316 – सदस्यों की नियुक्ति और पदावधि
- लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति, यदि वह संघ आयोग या संयुक्त आयोग है तो, राष्ट्रपति द्वारा और, यदि वह राज्य आयोग है तो, राज्य के राज्यपाल द्वारा की जायेगी।
- परंतु प्रत्येक लोक सेवा आयोग के सदस्यों में से यथाशक्य निकटतम आधे ऐसे व्यक्ति होंगे जो अपनी-अपनी नियुक्ति की तारीख पर भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन कम से कम दस वर्ष तक पद धारण कर चुके हैं
अनुच्छेद 317 – लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य का हटाया जाना और निलंबित किया जाना।
- आयोग के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को, जिसके संबंध में खण्ड (1) के अधीन उच्चतम न्यायालय को निर्देश किया गया है, संघ आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में राष्ट्रपति और राज्य आयोग की दशा में राज्यपाल उसके पद से तब के लिए निलंबित कर सकेगा जब तक राष्ट्रपति ऐसे निर्देश पर उच्चतम न्यायालय का प्रतिवेदन मिलने पर अपना आदेश पारित नहीं कर देता है।
अनुच्छेद 333 – विधान सभाओं में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व
- यदि किसी राज्य के राज्यपाल की यह राय है कि उस राज्य की विधान सभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधि आवश्यक है और उसमें उसका प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है तो वह उस विधान सभा में उस समुदाय का एक सदस्य नामनिर्देशित कर सकेगा।
- नोट: अनुच्छेद 366(2) के अनुसार, आंग्ल-भारतीय (एंग्लो-इंडियन) वह व्यक्ति होता है, जिसके पिता/दादा यूरोपीय मूल के हों। व जिसकी माता भारतीय मूल की हो।
104वें संविधान संशोधन (2019) एंग्लो-इंडियन मनोनयन का समापन:
- अनुच्छेद 331: लोकसभा में दो एंग्लो-इंडियन सदस्यों के मनोनयन का प्रावधान समाप्त।अनुच्छेद 333: राज्य विधानसभाओं में एक एंग्लो-इंडियन सदस्य के मनोनयन का प्रावधान समाप्त।SC/ST आरक्षण का विस्तार:लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण को 10 वर्ष के लिए बढ़ाया गया।
- नोट:- 104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 ने जनवरी 2020 में भारत की संसद और राज्य विधानसभाओं में आंग्ल-भारतीय आरक्षित सीटों को समाप्त कर दिया।
अनुच्छेद – 355 – बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से राज्य की संरक्षा करने का संघ का कर्तव्य
- संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशान्ति से प्रत्येक राज्य की संरक्षा करे और प्रत्येक राज्य की सरकार का इस संविधान के उपबंधों के अनुसार चलाया जाना सुनिश्चित करे ।
अनुच्छेद – 356 – राज्यों में सांविधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में उपबंध
- यदि राष्ट्रपति का किसी राज्य के राज्यपाल से प्रतिवेदन मिलने पर या अन्यथा, यह समाधान हो जाता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें उस राज्य का शासन इस संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है तो राष्ट्रपति उद्घोषणा द्वारा –
- उस राज्य की सरकार के सभी या कोई कृत्य और राज्यपाल में या राज्य के विधान-मंडल से भिन्न राज्य के किसी निकाय या प्राधिकारी में निहित या उसके द्वारा प्रयोक्तव्य सभी या कोई शक्तियां अपने हाथ में ले सकेगा।
अनुच्छेद 356: राष्ट्रपति शासन (राज्य आपातकाल)
- संवैधानिक प्रावधान:
- अनुच्छेद 355: केंद्र का कर्तव्य है कि हर राज्य में संवैधानिक प्रावधानों का पालन हो।
- अनुच्छेद 356: यदि राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो, तो केंद्र सरकार राज्य सरकार को अपने नियंत्रण में ले सकती है।
- इसे ‘राष्ट्रपति शासन’, ‘राज्य आपात’ या ‘संवैधानिक आपातकाल’ कहा जाता है।
- घोषणा के आधार:
- (i) अनुच्छेद 356 के तहत:
- यदि राष्ट्रपति संतुष्ट हो कि राज्य सरकार संविधान के अनुसार कार्य करने में असमर्थ है।
- यह निर्णय राज्यपाल की रिपोर्ट या अन्य स्रोतों के आधार पर लिया जा सकता है।
- (ii) अनुच्छेद 365 के तहत:
- यदि राज्य केंद्र के निर्देशों का पालन करने में विफल रहता है, तो इसे संवैधानिक प्रावधानों की असफलता माना जाएगा।
- (i) अनुच्छेद 356 के तहत:
- अनुमोदन और अवधि:
- राष्ट्रपति शासन की घोषणा को संसद द्वारा 2 माह के भीतर साधारण बहुमत से अनुमोदित करना अनिवार्य है।
- एक बार अनुमोदन के बाद यह 6 माह तक लागू रहता है और 6-6 माह के लिए बढ़ाया जा सकता है।
- सामान्य परिस्थितियों में यह 1 वर्ष तक लागू रहता है।
- विशेष परिस्थितियों (अनुच्छेद 352 लागू हो या चुनाव आयोग चुनाव की अयोग्यता घोषित करे) में इसे अधिकतम 3 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।
- घोषणा की समाप्ति:
- राष्ट्रपति किसी भी समय इसे वापस ले सकता है।
- इस घोषणा को वापस लेने के लिए संसद की अनुमति आवश्यक नहीं है।
- राष्ट्रपति शासन के प्रभाव:
- राज्य की मंत्रिपरिषद और मुख्यमंत्री को भंग कर दिया जाता है।
- राज्यपाल, राष्ट्रपति के नाम पर शासन करता है।
- राज्य विधानसभा निलंबित या भंग कर दी जाती है।
- संसद, राज्य के विधेयकों और बजट प्रस्ताव को पारित करती है।
- विशेष नोट:
- राष्ट्रपति शासन के दौरान उच्च न्यायालय की शक्तियाँ प्रभावित नहीं होती हैं।
- राष्ट्रपत शासन के तहत केंद्र सरकार राज्य की संचित निधि का उपयोग और अध्यादेश जारी कर सकती है।
- राष्ट्रपति या संसद द्वारा बनाया गया कानून राष्ट्रपति शासन समाप्त होने के बाद भी प्रभावी रहेगा, जब तक इसे राज्य विधानमंडल द्वारा रद्द न किया जाए।
- स्मरणीय तथ्य:
- यदि राष्ट्रपति शासन लोकसभा के विघटन के समय लागू होता है, तो यह लोकसभा की पहली बैठक के 30 दिन तक बना रह सकता है, बशर्ते राज्यसभा इसे अनुमोदित करे।
- महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय:
- (i) एस.आर. बोम्मई केस (1994):
- राष्ट्रपति शासन का निर्णय न्यायालय की समीक्षा के अधीन है।
- अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग असंवैधानिक है।
- (i) एस.आर. बोम्मई केस (1994):
- सम्बंधित सिफारिशें:
- (i) राजमन्नार समिति (1971): अनुच्छेद 356 और 357 को हटाने की सिफारिश।
- (ii) सरकारिया आयोग (1988): अनुच्छेद 356 का अंतिम विकल्प के रूप में प्रयोग।
- (iii) पुंछी आयोग (2007): अनुच्छेद 356 और 355 में संशोधन की सिफारिश।
अनुच्छेद-361 – राष्ट्रपति और राज्यपालों और राजप्रमुखों का संरक्षण / उन्मुक्तियाँ (Immunities) :
- अपने कार्यों के लिए उसे न्यायालय के समक्ष उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता ।
- परंतु अनुच्छेद 61 के तहत, संसद के किसी सदन द्वारा नियुक्त निकाय या न्यायालय राष्ट्रपति के आचरण की जाँच कर सकता है, लेकिन यह किसी व्यक्ति के अधिकार को प्रभावित नहीं करता जो भारत सरकार या राज्य सरकार के खिलाफ समुचित कार्यवाही करना चाहता हो।
- कार्यकाल के दौरान उसके विरुद्ध कोई फौजदारी मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, न ही उसे बन्दी बनाया जा सकता है।
- किसी राज्य के राज्यपाल की पदावधि के दौरान उसकी गिरफ्तारी या कारावास के लिए कोई भी न्यायालय आदेश जारी नहीं कर सकता।
- किसी राज्य के राज्यपाल के रूप में पद ग्रहण करने से पहले या उसके पश्चात् उसके द्वारा अपने व्यक्तिगत कार्य के संबंध में कोई सिविल कार्यवाही जिसमें उसके विरूद्ध अनुतोष (Relief) का दावा किया गया है तो ऐसी कार्यवाही शुरू करने से पूर्व निम्न शर्ते पूरी करनी होती है-
- कम से कम दो महीने पूर्व राज्यपाल को लिखित सूचना देनी होती है।
- सूचना में पक्षकार को अपना नाम, पता, कार्यवाही की प्रकृति तथा मांगे गये अनुतोष का विवरण देना होता है। इस प्रकार दीवानी मुकदमा भी व्यक्तिगत रूप से राज्यपाल के विरुद्ध 2 माह की पूर्व सूचना के पश्चात् ही दायर किया जा सकता है।
- नोट: अनुच्छेद 361 में राष्ट्रपति व राज्यपाल के लिए विशेषाधिकारों का उल्लेख है। अनुच्छेद 361 में (उपराज्यपाल जैसे शब्द का उल्लेख नहीं है।)
