मेवाड़ (गुहिल–सिसौदिया राजवंश) राजस्थान के इतिहास में गौरवशाली वीरता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता का प्रतीक रहा है। गुहिल वंश से उत्पन्न सिसौदिया राजपूतों ने मेवाड़ में शासन करते हुए विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध निरंतर संघर्ष किया। राजस्थान का इतिहास मेवाड़ के शासकों, विशेषकर राणा प्रताप जैसे वीरों के अदम्य साहस और बलिदान को विशेष स्थान देता है।
मेवाड (गुहिल-सिसौदिया राजवंश )
- 6वीं शताब्दी ई. से 1947 ई. तक लगभग 1350 वर्षों तक मेवाड़ पर गुहिल–सिसोदिया राजवंश का शासन रहा।
- मेवाड़ को प्राचीन काल में शिवि जनपद, मेदपाट एवं प्राग्वाट कहा जाता था।
- प्रारम्भिक राजधानी माध्यमिका (नगरी) थी।
- पुराणों के अनुसार यह क्षेत्र सूर्यवंशी क्षत्रियों का माना जाता है।
- प्रारम्भ में इस क्षेत्र पर मालव गणराज्य, फिर उज्जैन के शक शासक, फिर औलिकर वंश तथा बाद में मौर्य वंश का शासन रहा।
- कर्नल टॉड एवं मुहणौत नैणसी के अनुसार गुहिलों की 24 शाखाएँ थीं।
- मौर्य वंश का अंतिम शासक मानमोरी मौर्य था, जिसे बप्पा रावल ने 734 ई. में पराजित किया।
- मेवाड़ का प्राचीन क्षेत्र आज के उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़ एवं प्रतापगढ़ जिलों में फैला था।

गुहिल वंश की उत्पत्ति से संबंधित मत
| विद्वान / स्रोत | गुहिल वंश की उत्पत्ति से संबंधित मत |
| अबुल फ़ज़ल | गुहिल ईरान के नौशखां के वंशज थे। |
| कर्नल टॉड | गुहिलों का उद्गम स्थल वल्लभी (गुजरात) माना। |
| कवि श्यामलदास | गुहिलों को वल्लभी मूल का बताया। |
| डी. आर. भण्डारकर | गुहिलों की उत्पत्ति आनंदपुर परम्परा से मानी। |
| कुंभलगढ़ प्रशस्ति एवं एकलिंग माहात्म्य | गुहिलों को सूर्यवंशी बताया गया है। |
| डॉ. ओझा | गुहिल सूर्यवंशी राजपूत थे। |
| ऐतिहासिक परम्परा | गुहिल के पिता शिलादित्य (वल्लभी शासक) माने जाते हैं। |
गुहिल वंश का संस्थापक – गुहिल / गुहिलादित्य –
- गुहिल को इस वंश का संस्थापक माना जाता है।
बप्पा रावल / कालभोज (734–753 ई.) –
- बप्पा रावल गुहिल वंश के वास्तविक संस्थापक माने जाते हैं।
- कर्नल टॉड के अनुसार ईडर के गुहिल वंशी राजा नागादित्य की हत्या के बाद उनकी विधवा पत्नी ने अपने पुत्र 3 वर्षीय बप्पा को कमलावती नामक बड़नगरा जाति की महिला के पास ले गई।
- राजधानी – नागदा (उदयपुर)।
- मूल नाम – कालभोज।
- उपाधियाँ – हिन्दुआ सूरज, राजगुरु, चक्कवै (चारों दिशाओं का विजेता)
- डॉ. जी. एच. ओझा के अनुसार कालभोज वास्तविक नाम और बप्पा उपाधि थी।
- सी. वी. वैद्य ने बप्पा की तुलना फ्रांसीसी सेनापति चार्ल्स मार्टेल से की।
- बप्पा हारीत ऋषि के शिष्य थे।
- कुंभलगढ़ प्रशस्ति (1460 ई.) में बप्पा को “विप्र” (ब्राह्मण) कहा गया है।
- 734 ई. (श्यामलदास) अथवा 713 ई. (टॉड) में मानमोरी मौर्य को पराजित कर मेवाड़ पर अधिकार किया।
- बप्पा का 115 ग्रेन का स्वर्ण सिक्का प्राप्त हुआ है।
- मुस्लिम आक्रांताओं से युद्ध हेतु मध्य एशिया तक अभियान किया।
- एकलिंगजी मंदिर (कैलाशपुरी, उदयपुर) का निर्माण बप्पा द्वारा करवाया गया।
- मेवाड़ के शासक आज भी एकलिंगजी को आराध्य देव और स्वयं को उनका दीवान मानते हैं।
- रावलपिंडी नगर का नामकरण भी बप्पा के नाम पर हुआ।
- समाधि स्थल – नागदा (बप्पा का मंदिर)।
अल्लट –
- उपनाम – आलूरावल।
- दूसरी राजधानी – आहड़ (उदयपुर)।
- मेवाड़ में प्रथम बार नौकरशाही व्यवस्था का गठन किया।
- आहड़ में वराह मंदिर का निर्माण करवाया।
- हूण राजकुमारी हरियादेवी से विवाह किया, जिससे रक्त मिश्रण हुआ।
नरवाहन –
- नरवाहन अल्लट के उत्तराधिकारी थे। इनके विषय में सीमित जानकारी उपलब्ध है।
शक्तिकुमार –
- मुंज परमार ने आहड़ पर आक्रमण कर नगर नष्ट कर दिया।
- शक्तिकुमार ने इसके बाद चित्तौड़ पर अधिकार किया।
- भोज परमार ने त्रिभुवन नारायण मंदिर का निर्माण करवाया।
रणसिंह (1158 ई.) –
- रणसिंह के समय गुहिल वंश दो शाखाओं में विभाजित हुआ –
- रावल शाखा – क्षेमसिंह द्वारा
- राणा शाखा – राहप द्वारा (सिसौदा ग्राम से)
क्षेमसिंह –
- पुत्र – सामन्तसिंह।
- सामन्तसिंह का विवाह पृथ्वीराज-II (चौहान) की बहन पृथ्वीबाई से हुआ। इस कारण कीर्तिपाल (कीतुपाल) ने सामन्तसिंह को मेवाड़ से निकाल दिया।
- सामन्तसिंह ने वागड़ क्षेत्र में गुहिल वंश की स्थापना की और बड़ौदा को राजधानी बनाया।
- सामन्तसिंह के भाई मंथनसिंह ने कीर्तिपाल को हराकर पुनः मेवाड़ प्राप्त किया।
- मंथनसिंह के उत्तराधिकारी – पद्मसिंह।
जैत्रसिंह (1213–1253 ई.) –
- समकालीन दिल्ली शासक – इल्तुतमिश, रुकनुद्दीन, रजिया, बहरामशाह, अलाउद्दीन मसूदशाह, नासिरुद्दीन महमूद।
- 1227 ई. – भूताला युद्ध (उदयपुर) में जैत्रसिंह ने इल्तुतमिश को पराजित किया। स्रोत – हम्मीरमदमर्दन (जयसिंह सूरी)।
- कर्नल टॉड – 1231 ई. में जैत्रसिंह ने इल्तुतमिश को नागौर के पास पुनः हराया।
- तीसरी राजधानी – चित्तौड़।
- सेनापति – मदन और बालक।
- जैत्रसिंह का काल – मेवाड़ का स्वर्णकाल।
- 1248 ई. – नासिरुद्दीन महमूद का आक्रमण असफल।
- इस काल में ओघनिर्युक्ति एवं पाक्षिकवृत्ति: नामक दो ग्रंथों की रचना हुई।
रावल तेजसिंह (1253–1273 ई.) –
- उपाधि – उमापतिवार लब्ध प्रौढ़ प्रताप।
- दिल्ली सुल्तान बलबन का आक्रमण विफल किया।
- पत्नी जेतलदे ने चित्तौड़ में श्याम पार्श्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया।
- कमलचन्द्र द्वारा श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि नामक चित्रित ग्रंथ की रचना।
समरसिंह (1273–1302 ई.) –
- चीरवा अभिलेख में समरसिंह को धर्म-मर्मज्ञ (जैन) कहा गया।
- दरबारी विद्वान – रत्नप्रभसूरी, पार्श्वचंद्र।
- पुत्र – रतनसिंह , कुंभकर्ण
- कुंभकर्ण ने नेपाल में राणा शाखा की स्थापना की।
- समरसिंह ने अलाउद्दीन खिलजी की गुजरात जाती सेना से हर्जाना वसूला।
रावल रतनसिंह (1302–1303 ई.) –
- समकालीन शासक – अलाउद्दीन खिलजी।
- रावल रतनसिंह गुहिल वंश की रावल शाखा के अंतिम शासक थे।
- इनके पश्चात मेवाड़ पर दिल्ली सल्तनत का प्रत्यक्ष शासन (1303–1326 ई.) स्थापित हुआ।
- विवाह – रावल रतनसिंह का विवाह रानी पद्मिनी (पद्मावती) से हुआ था।
- रानी पद्मिनी सिंहलद्वीप (श्रीलंका) के राजा गंधर्वसेन की पुत्री थी।
- राघव चेतन (राज्य से निष्कासित ब्राह्मण) ने पद्मिनी के सौंदर्य का वर्णन अलाउद्दीन खिलजी से किया था।
अलाउद्दीन खिलजी द्वारा चित्तौड़ पर आक्रमण:
आक्रमण के कारण –
- अलाउद्दीन की साम्राज्यवादी नीति।
- चित्तौड़ की सामरिक (रणनीतिक) स्थिति – मालवा और गुजरात का प्रवेश द्वार।
- अलाउद्दीन की रानी पद्मिनी को प्राप्त करने की लालसा।
युद्ध से पूर्व की प्रमुख घटना –
- अलाउद्दीन ने पद्मिनी को देखने के बहाने चित्तौड़ में प्रवेश किया।
- दर्पण में पद्मिनी का प्रतिबिंब दिखाया गया।
- वापसी के समय अलाउद्दीन ने धोखे से रतनसिंह को बंदी बना लिया।
- रानी पद्मिनी की योजना से पालकियों में छिपे राजपूत योद्धाओं द्वारा रतनसिंह को मुक्त कराया गया।
चित्तौड़ का युद्ध – 1303 ई. –
- इस युद्ध में रावल रतनसिंह ने वीरतापूर्वक प्रतिरोध किया।
- युद्ध में गोरा और बादल वीरगति को प्राप्त हुए।
- अंततः चित्तौड़ पर अलाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो गया।
- युद्ध में रावल रतनसिंह की मृत्यु हो गई।
- इसके बाद रानी पद्मिनी के नेतृत्त्व में महान जौहर हुआ (26 अगस्त 1303 ई.)।
युद्ध के पश्चात की स्थिति –
- चित्तौड़ का नाम बदलकर खिज्राबाद रखा गया।
- खिज्र खाँ को चित्तौड़ का गवर्नर नियुक्त किया गया।
- चित्तौड़ 1303 से 1326 ई. तक दिल्ली सल्तनत के अधीन रहा।
- रावल शाखा का पूर्ण अंत हो गया।
ऐतिहासिक स्रोत –
- अमीर खुसरो – “खज़ाइन-उल-फुतूह” (तारीख-ए-अलाई)।
- मलिक मुहम्मद जायसी – “पद्मावत” (अवधी भाषा)।
- हेमरतन सूरी – “गोरा–बादल चौपाई”।
- धायबी पीर शिलालेख।
- चित्तौड़ स्थित फारसी मकबरा अभिलेख – जिसमें अलाउद्दीन को सूर्य, ईश्वर की छाया और संसार का रक्षक कहा गया है।
राणा हम्मीर सिसोदिया (1326–1364 ई.) –
- इन्होंने मेवाड़ में राणा शाखा (सिसोदिया वंश) की वास्तविक स्थापना की।
- इन्होंने दिल्ली सल्तनत के अधीनता काल के बाद मेवाड़ को पुनः स्वतंत्र किया।
- राणा हम्मीर सिसौदा ग्राम के निवासी थे।
- अरिसिंह के सात पुत्र 1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध चित्तौड़ युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।
- 1311–1326 ई. तक चित्तौड़ दिल्ली सल्तनत के अधीन रहा।
- 1326 ई. में मालदेव सोनगरा का शासन समाप्त हुआ।
- जी. एच. ओझा के अनुसार, राणा हम्मीर ने पुनः मेवाड़ को स्वतंत्र राज्य बनाया।
- कर्नल टॉड – इन्हें स्वतंत्रताप्रिय एवं वीर शासक बताते हैं।
- राणा हम्मीर ने चित्तौड़ में अन्नपूर्णा माता (बरवड़ी माता) के मंदिर का निर्माण करवाया।
- राणा हम्मीर की उपाधियाँ –
- विषमघाटी पंचानन – कुम्भलगढ़ प्रशस्ति।
- वीर राजा – रसिकप्रिया (कुम्भा)।
- प्रबल शासक – कर्नल टॉड।
- कर्नल टॉड द्वारा भी इन्हें शक्तिशाली शासक माना गया है।
राणा हम्मीर एवं दिल्ली सल्तनत –
- 1326 ई. के बाद राणा हम्मीर ने दिल्ली सल्तनत की अधीनता स्वीकार नहीं की।
- कालांतर में दिल्ली सल्तनत के शासक मुहम्मद बिन तुगलक ने मेवाड़ पर पुनः अधिकार करने का प्रयास किया।
- 1336 ई. में सिंगोली का युद्ध (बांसवाड़ा) हुआ। इस युद्ध में राणा हम्मीर ने मुहम्मद बिन तुगलक की सेना को पराजित किया। यह विजय मेवाड़ की पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता का प्रतीक बनी।
राणा खेता / राणा क्षेत्रसिंह (1364–1382 ई.) –
- राणा क्षेत्रसिंह, राणा हम्मीर के पुत्र थे।
- इनके शासनकाल में मेवाड़–मालवा संघर्ष का प्रारंभ हुआ।
- मालवा के शासक दिलावर ख़ाँ को पराजित किया।
- 1382 ई. में बूँदी के साथ युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।
राणा लाखा / लक्षसिंह (1382–1421 ई.) –
- राणा लाखा, राणा क्षेत्रसिंह के पुत्र थे।
- बूँदी विजय की प्रतिज्ञा पूर्ण करने हेतु मिट्टी का नकली दुर्ग बनाकर युद्ध लड़ा गया। इस युद्ध में कुँंभा हाड़ा वीरगति को प्राप्त हुआ।
- जावर में चाँदी की खान की स्थापना राणा लाखा के समय हुई।
- पिछोला झील का निर्माण एक बंजारे छित्तर द्वारा करवाया गया। इसके समीप नटनी का चबूतरा स्थित है। जगमंदिर का प्रारंभ कर्णसिंह ने किया और पूर्ण जगतसिंह-प्रथम ने किया।
- वैवाहिक संबंध – मारवाड़ की हंसा देवी (रणमल की बहन तथा राव चुण्डा की पुत्री) का विवाह राणा लाखा से हुआ।
- हंसा देवी से उत्पन्न पुत्र मोकल मेवाड़ का उत्तराधिकारी बना।
- चुण्डा एवं भीष्मपितामह की उपाधि –
- राणा लाखा के पुत्र चुण्डा ने राजत्याग किया।
- त्याग के कारण चुण्डा को “मेवाड़ का भीष्मपितामह” कहा जाता है।
- चुण्डा को दिए गए विशेषाधिकार मेवाड़ के 16 प्रथम-श्रेणी ठिकानों में से 4 ठिकाने चुण्डा को दिए गए। इनमें सलूंबर सबसे बड़ा ठिकाना था। सलूंबर का सामंत मेवाड़ का राजतिलककर्ता एवं सेनापति होगा। मेवाड़ के सभी राजपत्रों पर राणा के साथ सलूंबर के सामंत के हस्ताक्षर अनिवार्य होंगे। राणा की अनुपस्थिति में सलूंबर का सामंत राजधानी का संचालन करेगा।
- दरबारी विद्वान – झोटिंग भट्ट ,धनेश्वर भट्ट
राणा मोकल (1421–1433 ई.) –
- राणा मोकल, राणा लाखा एवं हंसा देवी के पुत्र थे।
- 1428 ई. में नागौर के फिरोज़ ख़ाँ ने मेवाड़ पर आक्रमण किया।
- इसी समय मोकल ने गुजरात के शासक अहमदशाह को पराजित किया।
- हत्या एवं राजनीतिक संकट –
- चाचा मेरा एवं महंपा पंवार ने मिलकर मोकल की झीलवाड़ा (राजसमंद) में हत्या कर दी।
- यह घटना मेवाड़ के इतिहास की एक गंभीर राजनीतिक साज़िश थी।
हंसा बाई एवं रणमल प्रसंग –
- हंसा बाई को चुण्डा पर अविश्वास हो गया।
- चुण्डा, मांडू के दरबार चले गए।
- इसके बाद हंसा बाई ने अपने भाई रणमल (मारवाड़) को मेवाड़ बुला लिया।
- धार्मिक एवं स्थापत्य कार्य –
- चित्तौड़ में भोज द्वारा निर्मित त्रिभुवन नारायण मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया। यह मंदिर बाद में मोकल मंदिर कहलाया।
- समिद्धेश्वर मंदिर का भी पुनरुद्धार करवाया।
- चित्तौड़ स्थित द्वारकानाथ / द्वारकाधीश मंदिर का निर्माण करवाया।
महाराणा कुंभा (1433–1468 ई.)
- मेवाड़ के महानतम शासक।
- पिता – राणा मोकल
- माता – सौभाग्यदेवी (परमार राजकुमारी)

सारंगपुर का युद्ध (1437 ई.) –
- यह युद्ध कुंभा और महमूद खिलजी-I के बीच हुआ।
- महमूद खिलजी ने अपनी विजय के उपलक्ष्य में मांडू में 7 मंजिला मीनार बनवाई।
- कुंभा ने चित्तौड़ दुर्ग में विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया।
विजय स्तम्भ (चित्तौड़) –

- निर्माण काल – 1440 से 1448 ई.
- यह 9 मंजिला स्तम्भ है।
- समर्पित – भगवान विष्णु
- प्रमुख उपनाम – कीर्ति स्तम्भ , विष्णुध्वज, गरुड़ध्वज, भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष, मूर्तियों का अजायबघर
- प्रमुख शिल्पी – जैता, नापा, पोमा, पूंजा, भूमि, चूपी, बलराज
- प्रशस्ति लेखक – अत्रि भट्ट और महेश भट्ट
- तीसरी मंजिल पर अरबी भाषा में 9 बार “अल्लाह” लिखा है। नौवीं मंजिल पर बिजली गिरने से क्षति हुई।
- जीर्णोद्धार – राणा स्वरूपसिंह
- यह राजस्थान की पहली इमारत है जिस पर डाक टिकट जारी किया गया।
जैन कीर्ति स्तम्भ –
- यह चित्तौड़ दुर्ग में स्थित है।
- निर्माण – 12वीं शताब्दी
- निर्माता – जैन व्यापारी जीजाशाह बघेरवाल
- यह 7 मंजिला है।
- समर्पित – आदिनाथ (ऋषभदेव)
- उपनाम – आदिनाथ स्तम्भ
मालवा–मेवाड़ युद्ध अभियान –
- 1442–43 ई. में कुंभलगढ़ पर मालवा का आक्रमण हुआ।
- यह युद्ध अनिर्णित रहा।
- कुंभा के सेनापति दीपसिंह इस युद्ध में मारे गए।
- गागरोण पर आक्रमण – खिलजी की विजय।
- मांडलगढ़ पर तीन आक्रमण – 1446 व 1456 ई. – तीनों अनिर्णित।
- अजमेर पर आक्रमण – 1455 ई.
- कुछ समय के लिए मालवा का क्षेत्र मेवाड़ के अधीन रहा।
गुजरात–मेवाड़ संघर्ष –
- मुख्य कारण – नागौर का उत्तराधिकार विवाद
- कुंभा ने शम्स खाँ को नागौर का शासक बनने में सहायता दी। शम्स खाँ गुजरात चला गया।
- चंपानेर की संधि – 1456 ई.
- इसमें महमूद खिलजी-I और गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन शामिल थे।
- योजना – मेवाड़ को आधा-आधा बाँटना।
- कुंभा ने इस संधि को असफल कर दिया।
- बदनौर (बैराठगढ़) का युद्ध – 1457 ई. इस युद्ध में कुंभा विजयी हुआ।
- विजय के उपलक्ष्य में कुशाल माता मंदिर का निर्माण।
- 1468 ई. में कुंभा की हत्या उनके पुत्र ऊदा (उदयकरण) ने मामादेव तालाब पर कर दी।
- स्थापत्य में योगदान –
- कुंभा को “राजस्थान की स्थापत्य कला का जनक” कहा जाता है।
- श्यामलदास के अनुसार – मेवाड़ के 84 दुर्गों में से 32 दुर्गों का निर्माण कुंभा ने किया।
कुंभलगढ़ दुर्ग
- निर्माण / पुनर्निर्माण – 1448–1458 ई.
- शिल्पी – मण्डन
- उपनाम – संकटकालीन राजधानी
- मेवाड़-मारवाड़ का सीमा प्रहरी
- दीवार की लंबाई – 36 किलोमीटर
- भारत की पहली और विश्व की दूसरी सबसे लंबी दीवार।
- यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल।
- महाराणा प्रताप का जन्मस्थान
- प्रमुख स्मारक – कुंभश्याम मंदिर, बादल महल, झालीबाव बावड़ी , मामादेव तालाब
- कटारगढ़ दुर्ग:– अन्त: दुर्ग
- उपनाम– मेवाड़ की आंख
- कुंभा का निवास स्थान, उदयसिंह का राज्याभिषेक महाराणा प्रताप का जन्म।
- अचलगढ़ दुर्ग – सिरोही
- बसंतगढ़ दुर्ग – सिरोही
- मचानगढ़ दुर्ग – सिरोही
- भोमट दुर्ग – उदयपुर
- प्रमुख मंदिर –
- कुंभस्वामी (विष्णु) मंदिर – चित्तौड़, कुंभलगढ़, अचलगढ़
- शृंगार चंवरी मंदिर – चित्तौड़
- मीरा मंदिर (कुंभ मंडप) – कैलाशपुरी
- रणकपुर जैन मंदिर – पाली
- निर्माता – धरणा शाह
- शिल्पी – देपाक
- समर्पित – आदिनाथ
- 1444 स्तंभ – “खंभों का अजायबघर”
साहित्य एवं संगीत में योगदान –
- कुंभा की रचनाएं – संगीत ग्रन्थ, संगीतराज, संगीतमीमांसा, सूडप्रबंध , सुधा प्रबंध , कामराज रतिसार
- टीकाएँ – रसिक प्रिया टीका ( (जयदेव के गीतगोविन्द पर), चण्डीशतक वरटीका (बाणभट्ट) , संगीत रत्नाकर वरटीका (सारंगधर)
- कुंभलगढ प्रशस्ति- कुभा ने 4 नाटक लिखे (मेवाड़ी भाषा)
- संगीतराज के 5 भाग – पाठ्य / पथ रत्नकोश , वाद्य रत्नकोश, नृत्य रत्नकोश, गीत रत्नकोश, रस रत्नकोश / असि प्रकरण
- कान्ह व्यास – एकलिंग माहात्म्य
- नाथा, गोविन्द, मेहाजी
- हीरानन्द मुनि – कुंभा के गुरु, उपाधि – कविराम
- रमाबाई – कुंभा की पुत्री
- उपाधि – ” वागीश्वरी”
- अपने पिता की तरह संगीत में रुचि।
- “जावर” का परगना दिया गया।
- नोट:- कुंभा के संगीत गुरु “सांरग व्यास” थे तथा कुंभा स्वयं अच्छा संगीतज्ञ एवं “वीणा वादक” था।
कुंभा के दरबारी मंडन के ग्रन्थ एवं विषय-वस्तु
| ग्रन्थ | विषय-वस्तु |
| रूपमंडन | मूर्तिकला |
| देवमूर्ति प्रकरण | मूर्ति निर्माण एवं प्रतिमा |
| वास्तुमंडन | वास्तुकला |
| वास्तुसार | दुर्ग, भवन, नगर निर्माण |
| कोदण्ड मंडन | धनुर्विद्या |
| शाकुन मंडन | शगुन – अपशगुन |
| वैद्य मंडन | व्याधियाँ व निदान |
| प्रासाद मंडन | देवालय निर्माण |
| राजवल्लभ मंडन | सामान्य नागरिकों के आवास से लेकर नगर निर्माण तक |
महाराणा कुंभा की उपाधियाँ
| उपाधि | अर्थ |
| अभिनवभरताचार्य | संगीत ग्रंथों का रचयिता होने के कारण |
| हिन्दू सुरताण | मुस्लिम शासकों ने दी |
| राणारासौ | विद्वानों का आश्रयदाता |
| शैल / हालगुरू | पहाड़ी दुर्गो का निर्माता |
| छापगुरु | छापामार युद्ध पध्दति के |
| नरपति | मानवों में श्रेष्ठ |
| परमगुरु | समय का सर्वोच्च शासक |
| दानगुरु | महादानी |
- अन्य उपाधियाँ– महाराजाधिराज, रावराय, राणेराय, चापगुरु राय-रायन, अश्वपति, गजपति आदि।
- नोट:– राणा कुंभा की उपर्युक्त उपाधियाँ गीतगोविन्द (टीका) तथा कुंभलगढ प्रशस्ति में उत्कीर्ण है।

उदा / उदयकरण (1468–1473 ई.) –
- उसने 1468 ई. में मामादेव तालाब पर अपने पिता महाराणा कुंभा की हत्या कर दी।
- इस कारण उदा को “पितृहन्ता” कहा जाता है।
- उदा को उसके ही भाई रायमल ने “दाड़िमपुर विजय” के साथ अपदस्थ कर दिया।
रायमल (1473–1509 ई.) –
- शिल्पी – अर्जुन
- कृषि विकास – मेवाड़ में खेती को प्रोत्साहन दिया।
- निर्माण कार्य – राम तालाब, शंकर तालाब, संकट तालाब
- पत्नी – शृंगारदेवी
- घोसुण्डी बावड़ी का निर्माण करवाया।
- चार प्रमुख पुत्र – जयमल , राजसिंह , सांगा (संग्राम सिंह) , पृथ्वीराज सिसोदिया
- संतान – कवि श्यामल के अनुसार – 11 पुत्र, 2 पुत्रियाँ
- पृथ्वीराज सिसोदिया –
- उपनाम – उड़ना राजकुमार
- पत्नी – ताराबाई (अजमेर दुर्ग का नामकरण किया।)
- दासी पुत्र – बनवीर
- कुंभलगढ़ में छत्तरी – 12 खम्भों वाली छत्तरी
- पृथ्वीराज सिसोदिया –
संग्राम सिंह–I / राणा सांगा (1509–1528 ई.) –

- उपाधियाँ –
- कर्नल टॉड द्वारा – सैनिक भग्नावशेष
- हिन्दू पथ के प्रदर्शक
- प्रारम्भिक संघर्ष –
- भाइयों से विवाद के बाद कर्मचंद पंवार के यहाँ श्रीनगर (अजमेर) के पास शरण ली।
- समकालीन शासक (दिल्ली सल्तनत) –
- सिकन्दर लोदी
- इब्राहिम लोदी
- राणा सांगा और लोदियों के बीच लगातार युद्ध
- खातोली का युद्ध – 1517 ई. (कोटा) –
- प्रतिद्वन्द्वी – राणा सांगा बनाम इब्राहिम लोदी
- परिणाम – राणा सांगा की विजय
- राणा सांगा की शारीरिक क्षति – बायाँ हाथ कट गया। एक पैर तीर लगने से बेकार हो गया।
बाड़ी का युद्ध – 1518 ई. (धौलपुर) –
- प्रतिद्वन्द्वी – राणा सांगा बनाम इब्राहिम लोदी
- परिणाम – राणा सांगा की पुनः विजय
- इब्राहिम लोदी स्वयं युद्ध में उपस्थित नहीं था –
- सेनापति – मियां माक्खन, मियां हुसैन
- कर्मचंद पंवार को पुरस्कार –
- जागीर – अजमेर, परबतसर, मांडल, फूलिया, बनेड़ा,आदि।
- उपाधि – “रावत”
- मालवा और राणा सांगा –
- 1511 ई. – मालवा शासक नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु
- उसका पुत्र महमूद खिलजी–II शासक बना।
- साहिल खाँ ने उसे पदच्युत कर दिया
- मेदिनीराय ने पुनः महमूद खिलजी–II को शासक बनाया। मेदिनीराय प्रधानमंत्री बना।
- गुजरात शासक मुजफ्फरशाह ने मालवा पर आक्रमण किया।
- दोष मेदिनीराय पर लगाया गया → षड्यंत्र रचा गया। तब मेदिनीराय ने राणा सांगा से सहायता मांगी
- राणा सांगा ने मेदिनीराय को – गागरोण एवं चन्देरी की जागीर दी
गागरोण का युद्ध – 1519 ई. (झालावाड़) –
- प्रतिद्वन्द्वी –
- एक ओर – राणा सांगा + मेदिनीराय
- दूसरी ओर – महमूद खिलजी–II
- परिणाम – राणा सांगा विजयी
- महमूद खिलजी–II को 6 माह तक कैद में रखा। बाद में उदारता से मुक्त कर दिया।
- निजामुद्दीन अहमद (तबकात-ए-अकबरी) ने राणा सांगा के उदार व्यवहार की प्रशंसा की।
- ईडर, गुजरात और राणा सांगा –
- ईडर का क्रम –
- शासक भाण से
- उसके बाद पुत्र सूर्यमल्ल से
- उसके बाद पुत्र रायमल
- ईडर का क्रम –
- रायमल का चाचा भारमल – गुजरात शासक मुजफ्फरशाह की सहायता से रायमल को हटाकर स्वयं शासक बन गया। रायमल ने राणा सांगा से सहायता मांगी 1520 ई. में राणा सांगा ने भारमल और मुजफ्फरशाह को पराजित किया। रायमल को पुनः ईडर का शासक बनाया।
बयाना का युद्ध – 16 फ़रवरी 1527 ई. –
- सांगा की सेना और बाबर की सेना के बीच युद्ध हुआ।
- इस युद्ध में राणा सांगा की सेना ने विजय प्राप्त की।
- बाबर की सेना का सेनापति – मेंहदी ख्वाजा (बहनोई) था।
खानवा का युद्ध – 17 मार्च 1527 ई. –
- खानवा का युद्ध 17 मार्च 1527 ई. को हुआ।
- वीर विनोद ग्रंथ के अनुसार यह युद्ध 16 मार्च 1527 ई. को हुआ।
- युद्ध में घायल राणा सांगा को सिरोही के अखैराज की देखरेख में युद्ध क्षेत्र से बाहर लाया गया।
- बसवा (दौसा) स्थान पर राणा सांगा का चबुत्तरा बना हुआ है।
- घायल राणा का झाला अज्जा ने मेवाड़ मुकुट धारण किया।
- झाला अज्जा ने मुकुट धारण कर वीरगति प्राप्त की।
- झाला अज्जा के पुत्र सिम्हा को राणा सांगा ने सादड़ी की जागीर दी।

|
सांगा 153625_fa35f3-5c> |
बाबर 153625_9a1434-a9> |
|
|
|
सम्मिलित रियासतें-
|
|
राणा सांगा की मृत्यु
- कालपी (मध्य प्रदेश) – राणा सांगा की मृत्यु 30 जनवरी 1528 ई. को हुई। राणा सांगा का अन्तिम संस्कार किया गया।
- माण्डलगढ़ में ही राणा सांगा की समाधि की छतरी स्थित है।
राणा रतन सिंह – (1528 -1531ई) –
- एक दिन राणा रतन सिंह और बूंदी के सूरजमल हाड़ा दोनों अहेरिया उत्सव (शिकार) खेलते – खेतले आपस में झगड़ पड़े और दोनों ही मारे गए।
विक्रमादित्य (1531–1536 ई.) –
- संरक्षिका – रानी कर्मावती (हाड़ी रानी, बूंदी)
- गुजरात के शासक बहादुर शाह का आक्रमण (1533 ई.)–
- 1533 ई. में बहादुर शाह ने मेवाड़ पर आक्रमण किया।
- संधि के अंतर्गत बहादुर शाह को रणथंभौर का किला प्राप्त हुआ। यह आक्रमण दो बार हुआ।
- 1534 –35 ई. का आक्रमण –
- 1534–35 ई. में बहादुर शाह ने पुनः आक्रमण किया।
- केसरिया करने वाला – बाघसिंह (देवलिया)।
- रानी कर्मावती के नेतृत्त्व में राजूपत महिलाओं ने जौहर किया।
- यह चित्तौड़ का द्वितीय शाका कहलाता है।
- हुमायूँ को राखी भेजने की घटना –
- रानी कर्मावती ने बहादुर शाह के आक्रमण के समय पद्मशाह नामक दूत के माध्यम से हुमायूँ को राखी भेजी।
- उद्देश्य – अपनी रक्षा के लिए सहायता माँगना।
- हुमायूँ समय पर सहायता के लिए नहीं पहुँच सका।
- विक्रमादित्य और उदयसिंह का पलायन –
- आक्रमण के समय विक्रमादित्य और उदयसिंह अपने नाना के पास बूंदी चले गए।
- विक्रमादित्य की हत्या –
- 1536 ई. में विक्रमादित्य पुनः शासक बना।
- इसी वर्ष बनवीर ने उसकी हत्या कर दी।
बनवीर (1536–1540 ई.) –
- बनवीर, पृथ्वीराज सिसोदिया की दासी(पासवान) का पुत्र था।
- विक्रमादित्य की हत्या कर स्वयं मेवाड़ का शासक बना।
- पन्ना धाय –
- जाति – गुर्जर जाति की महिला।
- राणा उदयसिंह की धाय माँ।
- मेवाड़ की संरक्षिका के रूप में प्रसिद्ध।
- उदयसिंह की रक्षा की घटना – बनवीर विक्रमादित्य की हत्या के बाद उदयसिंह की भी हत्या करना चाहता था। पन्ना धाय ने अपने पुत्र चन्दन का बलिदान देकर उदयसिंह को बचाया। इस कार्य में कीरत बारी ने पन्ना का साथ दिया।
- उदयसिंह का सुरक्षित स्थानांतरण – पन्ना धाय उदयसिंह को पहले देवलिया (रायसिंह) ले गई। इसके बाद उदयसिंह को कुंभलगढ़ में आशा देवपुरा की शरण में पहुँचाया।
महाराणा उदयसिंह (1537–1572 ई.) –
- पिता – राणा सांगा
- माता – रानी कर्मावती / कर्णावती
- राज्याभिषेक – 1537 ई. में कुंभलगढ़ में राज्याभिषेक हुआ। यह मत जी.एच. औझा द्वारा दिया गया है।
- मावली का युद्ध – 1540 ई. –
- प्रतिद्वन्द्वी – उदयसिंह बनाम बनवीर
- सहयोगी – राव मालदेव (मारवाड़)
- उदयसिंह ने राव मालदेव की सहायता से बनवीर को पराजित किया।
- उदयसिंह ने चित्तौड़ पर पुनः अधिकार किया।
शेरशाह सूरी और चित्तौड़ – 1543 ई.
- 1543 ई. में उदयसिंह ने बिना युद्ध किए चित्तौड़ दुर्ग की चाबियाँ शेरशाह सूरी को सौंप दीं।
- शेरशाह सूरी ने चित्तौड़ में खवासखां को नियुक्त किया।
- खवासखां को केवल राजनीतिक प्रभाव बनाए रखने के उद्देश्य से नियुक्त किया गया।

हरमाड़ा का युद्ध – 1557 ई. –
- एक ओर – उदयसिंह
- दूसरी ओर – हाकीम हाजी खां (अजमेर) और राव मालदेव
- हाकीम हाजी खां ने उदयसिंह को पराजित कर दिया।
उदयपुर की स्थापना – 1559 ई. –
- 1559 ई. में महाराणा उदयसिंह ने उदयपुर नगर की स्थापना की।
- उदयपुर को मेवाड़ की राजधानी बनाया।
- उदयपुर में मोती मगरी के महलों का निर्माण करवाया।
- उदयसागर झील का भी निर्माण करवाया।
अकबर का आक्रमण – 1567–1568 ई. –
- अकबर ने 1567–68 ई. में चित्तौड़ पर आक्रमण किया।
- सरदारों की सलाह पर उदयसिंह ने चित्तौड़ का भार –
- जयमल (मेड़ता)
- फत्ता / फतहसिंह सिसोदिया (आमेट का सामंत) को सौंप दिया।
- स्वयं उदयसिंह उदयपुर की गिरवा पहाड़ियों में चला गया।
- कर्नल टॉड के अनुसार –“यदि राणा सांगा और महाराणा प्रताप के बीच उदयसिंह न होता, तो मेवाड़ का इतिहास और अधिक उज्ज्वल होता।”
- यह चित्तौड़ का तृतीय शाका कहलाता है।
- जयमल राठौड़ और अकबर के बीच भयंकर युद्ध हुआ।
- अंततः अकबर की विजय हुई। अकबर ने लगभग 30,000 निर्दोष लोगों का कत्ल करवा दिया, जिसे इतिहास में कलंक माना जाता है। जयमल राठौड़ संग्राम बन्दूक से घायल होकर वीरगति को प्राप्त हुए। फत्ता (फतहसिंह) भी वीरगति को प्राप्त हुए।
- ईसरदास चौहान ने चित्तौड़ के किले में प्रवेश करते समय अकबर के हाथी मधुकर की सूँड पर खंजर से वार किया।
- जौहर का नेतृत्त्व – फूलकंवर (फत्ता की पत्नी एवं जयमल की बहन)। इस जौहर में बड़ी संख्या में राजपूत स्त्रियों ने आत्मोत्सर्ग किया।
- अकबर द्वारा चित्तौड़ का प्रशासन –
- अकबर ने चित्तौड़ का भार अब्दुल मजीद आसफ खां को सौंपा। इसके बाद अकबर स्वयं वापस चला गया।
- अकबर ने जयमल और फत्ता की हाथी पर आरूढ़ पाषाण मूर्तियाँ आगरा दुर्ग के बाहर लगवाईं।
- इसका उल्लेख फ्रांस्वा बर्नियर ने किया है।
- राजपूताना में इस प्रकार की मूर्तियाँ बीकानेर के शासक रायसिंह ने जूनागढ़ दुर्ग में भी लगवाईं।
कल्लाजी राठौड़ –

- कल्लाजी राठौड़, आससिंह का पुत्र था।
- कल्लाजी राठौड़, जयमल का भतीजा था।
- नागणेची माता का आराध्य भक्त।
- सांवलिया (डूंगरपुर) – जहाँ इनकी मूर्ति पर केसर और अफीम चढ़ती है।
- उपनाम –
- चार हाथों वाला लोकदेवता
- शेषनाग का अवतार
- अस्त्र-शस्त्र एवं औषधि विज्ञान का ज्ञाता
- चित्तौड़ युद्ध में योगदान –
- अपने ताऊ जयमल को कंधों पर बैठाकर युद्ध किया।
- युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ।
महाराणा प्रताप (1572–1597 ई.) :

- पिता – महाराणा उदयसिंह
- माता – जैवन्ता बाई (अखैराज सौनगरा, पाली)
- रानी – अजब दे पंवार
- जन्म – 9 मई 1540 ई., कुंभलगढ़ (बादल महल)
- बचपन का नाम – कीका(भीलों द्वारा)
- देहान्त – 19 जनवरी 1597 ई., चावण्ड(धनुष प्रत्यंचा चढ़ाते समय)
- समाधि स्थल – बाड़ोली (8 खंभों की छतरी)
- चेतक की समाधि – बलीचा
- प्रमुख हाथी – रामप्रसाद (अकबर द्वारा नाम बदलकर ‘पीर प्रसाद’)
- मायरा की गुफा – राणा प्रताप का शस्त्रागार
उत्तराधिकार विवाद –
- उदयसिंह ने जगमाल को उत्तराधिकारी घोषित किया।
- भटियाणी रानी धीरबाई का पुत्र जगमाल शासक बना।
- विरोध करने वाले –
- अखैराज सौनगरा (पाली)
- रामसिंह तंवर (ग्वालियर)
राज्याभिषेक –
- 28 फरवरी 1572 ई., गोगुन्दा (विधिवत कुंभलगढ़)
- राजतिलक कराने वाले – रावत कृष्णदास चुण्डावत (सलूम्बर)
- राजकीय तलवार कमर पर बांधी।
- चन्द्रसेन मारवाड़ भी शामिल थे।
- जगमाल नाराज होकर अकबर की सेवा में चला गया।
- अकबर ने जगमाल को – ‘जहाजपुर’ का परगना दिया। 1583 ई. में आधा सिरोही राज्य दिया। 1583 ई. में दत्ताणी के युद्ध में राव सुरताण (सिरोही) से युद्ध में जगमाल मारा गया।
राजधानी परिवर्तन व सैन्य सुधार –
- मुगलों से बचने हेतु गोगुन्दा से कुंभलगढ़ राजधानी स्थानांतरित की।
- अंतिम राजधानी: चावंड महाराणा प्रताप की अंतिम राजधानी थी, जहाँ 1597 में उनका निधन हुआ।
- 1585 ई. लूणा चावण्डिया को हटाकर चावण्ड पर अधिकार कर चावण्ड को राजधानी बनायी।
- यह 1585-1615 ई. तक राजधानी रही ( प्रताप व अमरसिंह- I)
- प्रताप (अमरसिंह स्वर्णकाल) के समय ‘चावण्ड चित्र उपशैली’ का विकास हुआ जिसमें अमरसिंह का काल चावण्ड शैली का स्वर्णकाल था।
- चित्रकार निसारदीन / नासिरूद्दीन ने ढोलामारू (1592 ई.) तथा “रागमाला” (1605 ई. अमरसिंह- I) ग्रंथों का चित्रण किया
- चावंड को राजधानी बनाने का मुख्य कारण इसकी रणनीतिक स्थिति और मुगल साम्राज्य के खिलाफ प्रतिरोध को संगठित करने के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करना था।
- प्रताप ने चावण्ड में चामुण्डा माता का मंदिर तथा महलों का निर्माण करवाया।
- प्रताप ने पहली बार भीलों को सेना में उच्च पद दिए।
- प्रमुख भील – पूंजा भील
अकबर व शिष्टमण्डल –
- गुजरात विजय (1572) के बाद चार शिष्टमण्डल भेजे गए
- जलाल खां / जलालुद्दीन कोरची – अगस्त/नवम्बर 1572
- मानसिंह – जून 1573
- भगवन्तदास – अक्टूबर 1573
- टोडरमल – दिसम्बर 1573
- सभी शिष्टमण्डल असफल हुए।
- इसके बाद हल्दीघाटी का युद्ध हुआ।
हल्दीघाटी का युद्ध (18/21 जून 1576 ई.) –
- अन्य नाम –
- खमनौर का युद्ध – अबुल फजल
- गोगुन्दा युद्ध – अब्दुल कादिर बदायूनी
- मेवाड़ की थर्मोपल्ली – कर्नल टॉड
- हाथियों का युद्ध
- बनास का युद्ध
- आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव के अनुसार बादशाह बाग का युद्ध
- अकबर की योजना – अजमेर के क़िले में
- मुगल नेतृत्त्व – मानसिंह
- मानसिंह का मार्ग – माण्डलगढ़ → मोलेला → खमनौर
- राणा प्रताप का पड़ाव – लौहसिंहपुरा खमनौर (योजना – कुंभलगढ़)
- महाराणा प्रताप को सूचना देने वाले – दुरसा पूरबिया व नेता सिसोदिया
- युद्ध की व्यूह रचना –
- हरावल (अग्रिम पंक्ति – मेवाड़) – हकीम खां सूर (नेतृत्त्व ) , डोडिया भीमसिंह , रायसिंह राठौड़ , रावत कृष्णदास चूण्डावत, रावत सांगा, चन्दावल (पिछली पंक्ति – मेवाड़), पूंजा भील (पानरवा), पडियार कल्याण, महता रत्नचन्द्र, पुरोहित गोपीनाथ, महासानी जगन्नाथ, पुरोहित जगन्नाथ, चारण जैसा, चारण केशव, महता जयमल
- मुगल पक्ष – हरावल दायाँ भाग व चन्दावल – सैय्यद हाशिम खान, जगन्नाथ कच्छवाहा, आसफ खां, गाजी रखां बदख्शी, सैय्यद अहमद खां, मानसिंह, चन्दावल – मिहत्तर खां
- युद्ध परिणाम –
- मिहत्तर खां ने अकबर के आने की झूठी खबर फैलाई।
- अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार युद्ध – अनिर्णायक (गोपीनाथ शर्मा)
- प्रताप ने मानसिंह पर भाले से आक्रमण किया – अमरकाव्य वंशावली
- झाला बीदा ने राणा का छत्र धारण कर युद्ध किया और वीरगति पाई।
- शक्तिसिंह प्रताप का भाई (मुगल पक्ष में) ने प्रताप को घोड़ा दिया।
- हल्दीघाटी के बाद –
- प्रताप का इलाज – कोल्यारी (उदयपुर)
- अकबर ने उदयपुर का शासन – जगन्नाथ कच्छवाहा, फखरुद्दीन को सौंपा
- शाहबाज खां को तीन बार युद्ध के लिए भेजा – अक्टूबर 1577, दिसम्बर 1578, नवम्बर 1579 (दो बार असफल)
- कुंभलगढ़ का युद्ध (3 अप्रैल 1578) – शाहबाज खां व प्रताप की सेना में युद्ध। शाहबाज की विजय। कुंभलगढ़ दुर्ग पर अधिकार।
- अन्य मुगल अभियान –
- 1580–81 – अब्दुर रहीम खानेखाना को अजमेर का गवर्नर बनाया।
- अमरसिंह ने रहीम के परिवार को शेरगढ़ से उठा लिया।
- प्रताप ने परिवार को सम्मान सहित लौटाया।
दिवेर का युद्ध (अक्टूबर 1582) –
- युद्ध – प्रताप की ओर से अमरसिंह ने व अकबर की ओर से सुल्तान खां के बीच।
- प्रताप ने भाले से सुल्तान खां को घोड़े समेत मार गिराया।
- प्रताप की विजय।
- कर्नल टॉड – “मेवाड़ का मेराथन”
- प्रताप ने 36 मुगल चौकियाँ जीत लीं।
- दिसम्बर 1584 – जगन्नाथ कच्छवाहा का अंतिम मुगल अभियान।
- माण्डलगढ़ में जगन्नाथ कच्छवाहा की मृत्यु। 32 खंभों की छतरी।
दरबारी विद्वान –
- हेमरत्न सूरि – “गौरा बादल की चौपाई”
- चक्रपाणि मिश्र – राज्याभिषेक पद्धति, मुहूर्तमाला, विश्ववल्लभ, व्यवहार आदर्श
- प्रकाशक – श्रीकृष्ण जुगनू
- सादुलनाथ त्रिवेदी – मण्डेर जागीर दी गई। प्रमाण – 1588 का उदयपुर अभिलेख।
- भामाशाह / ताराचंद –
- चुलिया गाँव में प्रताप से भेंट।
- आर्थिक सहायता प्रदान की।
- प्रधानमंत्री नियुक्त।
- मेवाड़ का उद्धारक / दानवीर।
महाराणा अमरसिंह–I (1597–1620 ई.) :
- महाराणा अमरसिंह–I ने 1597 ई. में महाराणा प्रताप के उत्तराधिकारी के रूप में मेवाड़ का शासन संभाला।
- महाराणा अमरसिंह–I के समकालीन मुगल बादशाह अकबर एवं जहाँगीर थे।
- अकबर के शासनकाल के अंतिम समय में, वर्ष 1597 ई. में सलीम (भविष्य का जहाँगीर) के नेतृत्त्व में अमरसिंह के विरुद्ध एक मुगल अभियान भेजा गया था।
जहाँगीर द्वारा मेवाड़ के विरुद्ध सैन्य अभियान –
- जहाँगीर द्वारा मेवाड़ पर भेजे गए प्रमुख अभियान
- 1605 ई. – परवेज, आसिफ खाँ, जफर बेग
- 1608 ई. – महावत खाँ
- 1609 ई. – अब्दुल्ला खाँ
- 1612 ई. – राजा बासु
- 1613 ई. – अजीज कोका–II
- ये सभी अभियान असफल रहे।
- इसके पश्चात शहजादे खुर्रम (भविष्य का शाहजहाँ) के नेतृत्त्व में अभियान भेजा गया।
- खुर्रम के अभियान के परिणामस्वरूप मेवाड़ को संधि के लिए बाध्य होना पड़ा।
मुगल–मेवाड़ संधि (15 फरवरी 1615 ई.) –
- मुगलों की ओर से – शीराजी, सुन्दरदास, शहजादा खुर्रम
- राणा की ओर से – हरिदास झाला, शुभकर्ण
- संधि की प्रमुख शर्तें –
- अमरसिंह–I का मुगल दरबार में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना अनिवार्य नहीं।
- कुँवर कर्ण सिंह मुगल दरबार में रहेगा।
- राणा 1000 घुड़सवारों सहित मुगल सेवा के लिए तैयार रहेगा।
- चित्तौड़ दुर्ग राणा को लौटा दिया जाएगा।
- चित्तौड़ की मरम्मत एवं किलेबंदी नहीं की जाएगी।
- संधि के बाद की घटनाएँ –
- संधि से असंतुष्ट होकर राणा अमरसिंह-I नौ चौकी पाल (राजसमंद) चले गए।
- उनका अंतिम संस्कार आहड़ में किया गया।
- आहड़ की मेवाड़ के राणाओं की महासतियों में अमरसिंह-I की पहली छतरी निर्मित हुई।
- मुगलों की अधीनता स्वीकार करने वाला मेवाड़ का प्रथम शासक — अमरसिंह-I
- भामाशाह वंश के तीन प्रमुख प्रधानमंत्री:
- भामाशाह (प्रताप व अमरसिंह काल)
- जीवाशाह (अमरसिंह काल)—अमरसार के निर्माता
- अक्षराज (कर्ण सिंह काल)
- अमरसिंह-I का काल राजपूतों के लिए अभ्युदय काल माना गया।
कर्णसिंह (1620–1628 ई.) –
- कर्णसिंह मेवाड़ का प्रथम शासक था जो शासक बनने से पूर्व मुगल सेवा में रहा।
- वह मेवाड़ का प्रथम शासक था जिसे मुगल दरबार (जहाँगीर) द्वारा राज्याभिषेक के अवसर पर “राणा” की उपाधि तथा खिलअत भेजी गई।
- कर्णसिंह ने अपने राज्य को “परगनों” में विभाजित किया।
- कर्णसिंह द्वारा निर्मित प्रमुख भवन: – कर्णमहल , दिलखुश महल, बड़ा दरीबा खाना, पिछोला झील स्थित “जगमंदिर” का निर्माण कार्य कर्णसिंह ने प्रारंभ करवाया।
- शहजादा खुर्रम से संबंध (1622 ई.) –
- 1622 ई. में शहजादा खुर्रम ने जहाँगीर के विरुद्ध विद्रोह किया।
- इस विद्रोह के समय कर्णसिंह ने खुर्रम का स्वागत किया।
- कर्णसिंह ने खुर्रम को माण्डू के मार्ग से दक्षिण भेज दिया।
- कर्णसिंह और खुर्रम के मधुर संबंध थे।
जगतसिंह–I (1628–1652 ई.) –
- जगतसिंह–I का काल “मेवाड़ चित्रकला का स्वर्णकाल” कहलाता है।
- जगतसिंह–I ने पिछोला झील स्थित “जगमंदिर” के निर्माण को पूर्ण कराया।
- इसने “चितेरो री ओवरी / तस्वीरांरो कारखानो” नामक चित्रकला विद्यालय की स्थापना की।
- जगदीश / जगन्नाथ मंदिर, उदयपुर
- उपनाम: सपनों का मंदिर
- निर्माता: जगतसिंह–I
- निर्माण वर्ष: – 1650 ई.
- शिल्पी: –भाणा, मुकुन्द
- अर्जुन की देख रेख में
- शैली: – नागर / पंचायतन शैली
- जगन्नाथ प्रशस्ति इस मंदिर पर अंकित है।
- जगन्नाथ प्रशस्ति के रचयिता: कृष्णभट्ट
- कृष्णभट्ट ने हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप को विजयी बताया।
- जगतसिंह–I ने उदयपुर में अपनी ‘धाय माँ’ नेजू बाई का मंदिर भी बनवाया।
- महत्त्वपूर्ण नोट – शाहजहाँ ने 1631 ई. में प्रतापगढ़ को मेवाड़ से अलग कर स्वतंत्र रियासत का दर्जा दिया।
महाराणा राजसिंह–I (1652–1680 ई.) –
- उपाधि – विजयकटकातु (सेनाओं को जीतने वाला)
- राजसिंह को हाइड्रोलिक रूलर कहा जाता है।
- समकालीन शासक – शाहजहाँ व औरंगज़ेब
- औरंगज़ेब के उत्तराधिकार युद्ध में राजसिंह ने उसका साथ दिया।
- सैन्य व प्रशासनिक कार्य –
- राजसिंह ने चित्तौड़ दुर्ग की चारदीवारी का पुनर्निर्माण करवाया।
- शाहजहाँ ने इसे तुड़वाने के लिए सादुल्ला खाँ को भेजा।
- राजसिंह ने टीका-दौड़ का आयोजन कर ठिकानों को अपने क्षेत्र में मिलाया।
- गयासपुरा, डूंगरपुर, बांसवाड़ा के परगने भी प्राप्त किए।
- औरंगज़ेब ने राजसिंह को 6000 जात व सवार का मनसब दिया।
औरंगज़ेब–राजसिंह संबंधों में विवाद –
चारुमति प्रकरण (1659 ई.) –
- चारुमति – किशनगढ़ की राजकुमारी, रूपसिंह की पुत्री।
- भाई मानसिंह ने चारुमति का संबंध औरंगज़ेब से तय किया।
- चारुमति के आग्रह पर राजसिंह ने उससे विवाह कर लिया।
- यही औरंगज़ेब व राजसिंह के बीच अनबन का प्रमुख कारण बना।
हाड़ी रानी –
- वास्तविक नाम – संहल कँवर
- पिता – संग्रामसिंह हाड़ा (बूंदी)
- विवाह – सलूम्बर के रावत रतनसिंह चूंडावत
- कहावत – “चूण्डावत मांगी सेनाणी, सिर काट दे दियो क्षत्राणी।”
- “सेनाणी” रचना – मेघराज मुकुल
- हाड़ी रानी के नाम पर राजस्थान में महिला पुलिस बटालियन का नाम रखा गया है।
धार्मिक नीति –
- 1669 ई. में औरंगज़ेब ने हिन्दू मंदिर तुड़वाए।
- इसके विपरीत, राजसिंह ने हिन्दू मंदिरों का निर्माण करवाया।
- श्रीनाथजी का मंदिर –
- स्थान – सिहाड (राजसमंद)
- निर्माता – राजसिंह–I
- मूर्ति लाए – दाऊजी / दामोदर महाराज (मथुरा से)
- यह वल्लभ सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ है।
- प्रवर्तक – वल्लभाचार्य
- पूजा – कृष्ण के बाल रूप की
- संगीत – हवेली संगीत
- पिछवाईयाँ – काले कपड़े पर श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का चित्रांकन।
- अष्टछाप (वल्लभ सम्प्रदाय) –
- स्थापना – विट्ठलनाथ / विट्ठलाचार्य ने 8 शिष्यों की मण्डली बनाई।
- अष्टछाप के कवि – सूरदास , कुम्भनदास , परमानंददास , कृष्णदास , गोविन्दस्वामी , छीतस्वामी , चतुर्भुजदास , नंददास
- पुष्टिमार्ग का सिद्धांत – ईश्वर की कृपा से ही मोक्ष की प्राप्ति।
- पुष्टिमार्ग के प्रवर्तक – वल्लभाचार्य
- “पुष्टिमार्ग का जहाज” – सूरदास
- नोट : –
- अष्टप्रधान – शिवाजी के 8 केंद्रीय अधिकारी
- अष्टदिग्गज – कृष्णदेवराय के 8 दरबारी विद्वान
- द्वारकाधीश मंदिर –
- स्थान – कांकरोली (राजसमंद)
- मूर्ति लाए – दाऊजी / दऊजी
- निर्माता – राजसिंह–I
- अम्बिका माता मंदिर –
- स्थान – जगत (उदयपुर)
- उपनाम – मेवाड़ का खजुराहो
- द्वारकाधीश मंदिर –
- नोट: –
- राजस्थान का खजुराहो – किराडू (बाड़मेर)
- राजस्थान का मिनी / हाड़ौती का खजुराहो – भण्डदेवरा (बारां)
मारवाड़ उत्तराधिकार संघर्ष –
- 1678 ई. में महाराजा जसवंतसिंह (मारवाड़) का देहान्त।
- अजीतसिंह को उत्तराधिकारी न मानकर मारवाड़ को खालसा घोषित किया गया।
- राजसिंह ने इसे राजपूत नीति का उल्लंघन माना।
- दुर्गादास राठौड़ के साथ मिलकर औरंगज़ेब के विरुद्ध राठौड़–सिसोदिया गुट बनाया।
- अजीतसिंह को राजसिंह ने संरक्षण दिया तथा
- 12 गाँव सहित केलवा की जागीर दी।
- इस गुट को तोड़ने के लिए औरंगज़ेब ने पुत्र अकबर को भेजा,
- परंतु अकबर ने औरंगज़ेब के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।
- 1680 ई. में राजसिंह की मृत्यु के साथ गुट भंग हो गया।
- दुर्गादास राठौड़ ने औरंगज़ेब के विरुद्ध 30 वर्षों तक संघर्ष जारी रखा।
जजिया कर –
- 1679 ई. में औरंगज़ेब ने जजिया कर लगाया।
- जजिया – सामान्यतः अर्द्ध – धार्मिक व सैन्य कर
- सतीश चन्द्रा के अनुसार जजिया आर्थिक व राजनीतिक आधार पर लगाया गया।
- सांस्कृतिक योगदान –
- राजसमंद झील –
- निर्माण काल – 1 जनवरी 1662 से 14 जनवरी 1676 ई.
- गोमती नदी के तट पर जल रोककर निर्माण
- यह अकाल राहत हेतु निर्मित एकमात्र झील
- इसी झील के नाम पर राजसमंद जिला बना।
- राजप्रशस्ति शिलालेख – झील के किनारे
- रचयिता – रणछोड़ भट्ट
- त्रिमुखी बावड़ी / जया बावड़ी –
- निर्माता – राजसिंह की पत्नी “रामरस दे”
- राजसमंद झील –
- राजसिंह की मृत्यु – ओढ़ा गाँव में हुई।
- दरबारी विद्वान –
- किशोरदास – “राजप्रकाश”
- सदाशिव भट्ट – “राजरत्नाकर”
- रणछोड़ भट्ट तैलंग – “राजप्रशस्ति”, “वंशावली”
जयसिंह (1680–1698 ई.) –
- जयसिंह–औरंगज़ेब संधि (24 जून 1681 ई.) –
- इस संधि में राणा जयसिंह ने “जजिया कर” देना स्वीकार किया।
- मेवाड़–मुगल संधि दो बार हुई।
- जजिया के बदले दी गई जागीरें
- पुर, माण्डल व बदनौर की जागीरें मुगल पक्ष को दी गईं।
- जयसमंद झील का निर्माण –
- गोमती नदी पर जयसमंद झील (1687–1691 ई.) का निर्माण जयसिंह ने करवाया।
महाराणा अमरसिंह–II (1698–1710 ई.) –
- समकालीन मुगल शासक – औरंगज़ेब और बहादुरशाह–I
- उत्तराधिकार युद्ध में भूमिका –
- औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद हुए उत्तराधिकार युद्ध में
- मुअज्जम (बहादुरशाह–I) का साथ दिया।
- देबारी समझौता / अहदनामा (1708 ई., उदयपुर) –
- यह समझौता बादशाह के खिलाफ हुआ।
- पक्षकार शासक: –
- आमेर – सवाई जयसिंह
- मेवाड़ – अमरसिंह–II
- मारवाड़ – अजीतसिंह
- प्रमुख शर्तें: –
- सवाई जयसिंह को उसका राज्य दिलवाया जाएगा।
- सवाई जयसिंह का विवाह अमरसिंह–II की पुत्री चन्द्रकुँवरी से होगा।
- इस विवाह से उत्पन्न पुत्र आमेर का शासक / उत्तराधिकारी होगा।
- 1709 ई. में जागीरों की पुनः प्राप्ति
- 1 लाख रुपये (जजिया के रूप में) मुगल बादशाह को दिए गए।
- इसके बदले पुर, माण्डल व बदनौर की जागीरें पुनः प्राप्त की गईं।
- सामन्तों पर कठोर कार्रवाई
- डूंगरपुर, बांसवाड़ा एवं देवलिया के रावत सरदारों को दण्डित किया।
- जागीरदारों/सामन्तों का वर्गीकरण –
- 16वें उमराव – प्रथम श्रेणी
- 32वें उमराव – द्वितीय श्रेणी
- प्रशासनिक परम्परा –
- अमरसिंह–II ने “अमरशाही पगड़ी” की परंपरा आरंभ की।
- दुर्गादास राठौड़ से संबंध –
- दुर्गादास राठौड़ को शरण दी।
- विजयपुर की जागीर प्रदान की।
- दुर्गादास राठौड़ को रामपुरा का हाकिम नियुक्त किया।
महाराणा संग्रामसिंह–II (1710–1737 ई.) –
- उदयपुर में सहेलियों की बाड़ी का निर्माण करवाया।
- सिसारमा (उदयपुर) में वैद्यनाथ शिव मंदिर का निर्माण करवाया।
- वैद्यनाथ मंदिर प्रशस्ति (1719 ई.) –
- लेखक – रूपभट्ट
- इसी प्रशस्ति से बांसवाड़ा युद्ध की जानकारी मिलती है।
- इस युद्ध में संग्रामसिंह–II ने मुगल सेनापति रणबाज खाँ को पराजित किया।
- इसके काल में “कलीला-दमना” चित्रों का चित्रण हुआ।
- राणा के शासनकाल में मेवाड़ को रामपुरा की जागीर पुनः प्राप्त हुई, जो अकबर के समय से मुगलों के अधीन थी।
- मराठों ने मेवाड़ से पहली बार चौथ वसूली की (राजस्थान में प्रथम बार)।
- हुरड़ा सम्मेलन का आयोजन संग्रामसिंह–II के समय प्रस्तावित था, परंतु उनके अचानक देहान्त के कारण यह उनके जीवनकाल में नहीं हो सका।
- वैद्यनाथ मंदिर प्रशस्ति (1719 ई.) –
महाराणा जगतसिंह–II (1734–1751 ई.) –
हुरड़ा सम्मेलन (17 जुलाई 1734, भीलवाड़ा) –
- उद्देश्य – मराठों की समस्या का समाधान करना।
- मूल योजना – संग्रामसिंह–II
- आयोजनकर्त्ता – सवाई जयसिंह (जयपुर)
- अध्यक्षता – महाराणा जगतसिंह–II (मेवाड़)
- सम्मिलित रियासतें: –
- अभयसिंह – मारवाड़
- बख्तसिंह – नागौर
- जोरावरसिंह – बीकानेर
- दलेलसिंह – बूंदी
- दुर्जनशाल – कोटा
- राजसिंह – किशनगढ़
- गोपालपाल – करौली
- मराठा नीति –
- पेशवा बाजीराव–I जगतसिंह–II के समय मेवाड़ आया।
- चौथ वसूली का समझौता किया गया।
- बाजीराव–I के साथ उसकी माता राधाबाई भी यात्रा पर आई।
- समकालीन घटनाएँ –
- जगतसिंह–II के समय दिल्ली पर नादिरशाह का आक्रमण हुआ।
- सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद ईश्वरीसिंह व माधोसिंह के उत्तराधिकार युद्ध में माधोसिंह के पक्ष से राजमहल व बगरू के युद्धों में भाग लिया।
- स्थापत्य कार्य – जगनिवास महल (पिछोला झील) का निर्माण करवाया।
- दरबारी विद्वान –
- नेकराम – “जगतविलास” (ग्रन्थ)
- प्रतापसिंह–II (1751–1754 ई.) –
- राजसिंह–II (1754–1761 ई.) –
- अरिसिंह–II (1761–1773 ई.) –
- पेशवा व माधवराव सिंधिया से संबंध स्थापित किए।
- हम्मीर–II (1773–1778 ई.) –
महाराणा भीमसिंह (1778–1828 ई.) –
- अंग्रेजों से संधि (13 जनवरी 1818 ई.) –
- मराठों के भय से अंग्रेजों से संधि की।
- मेवाड़ की ओर से हस्ताक्षरकर्त्ता – ठाकुर अजीत सिंह (आसींद, भीलवाड़ा)
- अंग्रेजों की ओर से हस्ताक्षरकर्त्ता – चार्ल्स मैटकॉफ
- यह संधि लॉर्ड हेस्टिंग्स की अधीनस्थ आश्रित संधि के अंतर्गत थी।
कृष्णा कुमारी विवाद एवं गिंगोली युद्ध(1807 ई.) –
- पुत्री – कृष्णा कुमारी
- विवाह विवाद –
- जोधपुर – महाराजा मानसिंह
- जयपुर – महाराजा जयसिंह द्वितीय
- गिंगोली का युद्ध – मार्च 1807 ई. (परबतसर, नागौर)
- विजेता – जयसिंह द्वितीय
- अमीर खाँ पिण्डारी व अजीतसिंह चूंडावत की सलाह पर कृष्णा कुमारी को विष दिया गया।
- अंग्रेजी एजेंट – फरवरी 1818 ई. में कर्नल जेम्स टॉड उदयपुर में एजेंट बनकर आया।
- निर्माण कार्य –
- रानी पदमेश्वरी द्वारा पिछोला झील के तट पर भीमपदेश्वर शिवालय का निर्माण।
- भौमगढ़ दुर्ग एवं टॉडगढ़ दुर्ग का निर्माण इसी काल में हुआ।
- साहित्य –
- चारण कवि किसना आढ़ा – ‘भीम विलास’ ग्रंथ की रचना।
- महाराणा जवानसिंह (1828–1838 ई.) –
- G.G. विलियम बेंटिक से अजमेर में भेंट की।
- महाराणा सरदारसिंह (1838–1842 ई.) –
- भीलों पर नियंत्रण हेतु 1841 ई. में मेवाड़ भील कोर का गठन खैरवाड़ा में किया गया।
- महाराणा स्वरूपसिंह (1842–1861 ई.) –
- सिक्का एवं आर्थिक सुधार –
- ‘स्वरूपशाही’ नए सिक्के प्रारंभ किए।
- सिक्कों पर ‘दोस्ती लंदन’ अंकित करवाया गया।
- उद्देश्य – जाली सिक्कों से व्यापार को हो रहे नुकसान को रोकना।
- सामाजिक सुधार –
- 1844 ई. – कन्यावध निषेध
- 1853 ई. – डाकन प्रथा समाप्त
- 15 अगस्त 1861 ई. – मेवाड़ में सती प्रथा पर रोक का आदेश
- महाराणा के देहान्त के बाद पासवान ऐजाबाई सती हुई – यह मेवाड़ में महाराणा के साथ सती होने का अंतिम उदाहरण है।
- 1857 की क्रांति –
- अंग्रेजों का साथ दिया।
- नीमच से आए अंग्रेज शरणार्थियों को जगनिवास महल (पिछोला झील) में शरण दी।
- सिक्का एवं आर्थिक सुधार –
- महाराणा शंभूसिंह (1861–1874 ई.) –
- मेवाड़ में नई अदालतों की स्थापना।
- 1864 ई. उदयपुर में हड़ताल – नेतृत्त्व नगर सेठ चंपालाल।
- सती प्रथा का अंतिम रूप से अंत।
- 1870 ई. – लॉर्ड मेयो से अजमेर दरबार में भेंट।
- महाराणा सज्जनसिंह (1874–1884 ई.) –
- सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाएँ –
- 1883 ई. – परोपकारिणी हितकारिणी सभा की स्थापना –
- संस्थापक – दयानन्द सरस्वती
- अध्यक्ष – महाराणा सज्जनसिंह
- दयानन्द सरस्वती के उदयपुर आगमन पर
- चित्तौड़ में स्वागत – कवि श्यामलदास
- नवलखा महल (गुलाब बाग, उदयपुर) में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का द्वितीय संस्करण लिखा गया।
- 1883 ई. – परोपकारिणी हितकारिणी सभा की स्थापना –
- राजनीतिक एवं शाही कार्यक्रम –
- 1875 ई. – प्रिंस ऑफ वेल्स के स्वागत हेतु बम्बई गए।
- 1877 ई. – लॉर्ड लिटन के समय दिल्ली दरबार में भाग लिया।
- प्रशासनिक संस्थाएँ –
- इजलास-ए-खास (कौंसिल) – 15 अवैतनिक सदस्य
- स्थापना – 1877 ई. (कवि श्यामलदास की सलाह पर)
- महेन्द्रराज सभा – 20 अगस्त 1880 ई.
- नमक समझौता –
- 14 फरवरी 1878 ई. – महाराणा व अंग्रेज सरकार के मध्य नमक समझौता
- परिणाम –
- लोगों का रोजगार छीना गया।
- नमक महंगा हुआ।
- आम जनता को कठिनाई हुई।
- परिणाम –
- इजलास-ए-खास (कौंसिल) – 15 अवैतनिक सदस्य
- जनगणना व सम्मान –
- 1881 ई. – मेवाड़ में जनगणना
- 1881 ई. – G.G. लॉर्ड रिपन द्वारा महाराणा को ‘GCSI’ की उपाधि
- जी.जी.लॉर्ड नॉर्थब्रुक – उदयपुर आने वाला पहला गवर्नर जनरल
- निर्माण कार्य (उदयपुर) –
- सज्जनगढ़ पैलेस – बांसदरा पहाड़ी
- सज्जन यंत्रालय / मुद्रालय
- साप्ताहिक पत्र – ‘सज्जन कीर्ति सुधारक’
- सज्जन अस्पताल
- वाल्टर जनाना अस्पताल
- सज्जन वाणी विलास पुस्तकालय
- सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाएँ –
- महाराणा फतेहसिंह (1884–1921 ई.)
- 1889 ई. – वाल्टर राजपूत हितकारिणी सभा की स्थापना-
- उद्देश्य –
- राजपूतों में बहुविवाह पर रोक
- बाल-विवाह पर रोक
- फिजूलखर्ची पर नियंत्रण
- उद्देश्य –
- 1889 ई. – वाल्टर राजपूत हितकारिणी सभा की स्थापना-
- महाराणा भूपाल सिंह (1930–1955 ई.)
- महाराणा भूपाल सिंह मेवाड़ (उदयपुर) के अंतिम सिसोदिया शासक थे।
- मेवाड़ का शासनकाल: 1930–1948 ई.
- 18 अप्रैल 1948 ई. को संयुक्त राजस्थान के पहले राजप्रमुख बने। बाद में उनकी उपाधि राजप्रमुख से महाराजप्रमुख कर दी गई।
- राजस्थान के एकीकरण में निर्णायक भूमिका निभाई।
- Instrument of Accession पर हस्ताक्षर करने वाले प्रारंभिक शासकों में शामिल।
- 1931 ई. में उदयपुर रियासत में पूर्ण नशाबंदी लागू की।
- शिक्षा, स्वास्थ्य एवं न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण सुधार किए।
- 1955 ई. में महाराजप्रमुख पद पर रहते हुए निधन हुआ।
- उनके नाम पर महाराणा भूपाल कॉलेज एवं महाराणा भूपाल चिकित्सालय (MB Hospital), उदयपुर स्थापित हैं।
वागड़ / डूंगरपुर का गुहिल वंश
- वागड़ / डूंगरपुर का गुहिल वंश
- सामन्तसिंह (1178 ई.) –
- सामन्तसिंह का विवाह पृथ्वीराज–II की बहिन से हुआ।
- सामन्तसिंह का प्रमुख शत्रु कीतू चौहान था।
- सामन्तसिंह की राजधानी बड़ौदा (वटपद्रक) थी।
- गुहिल वंश की वागड़ में स्थापना 1178 ई. में मानी जाती है।
- चालुक्य शासक भीमदेव–II (गुजरात) ने सामन्तसिंह को वागड़ से निष्कासित कर दिया।
- तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज–III की ओर से लड़ते हुए सामन्तसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ।
- जयत (1221 ई.) –
- जयत ने पुनः वागड़ राज्य पर अधिकार किया।
- सीहड़देव (1221–1234 ई.)-
- विजय सिंह देव (1234–1250 ई.) –
- देवपाल (1250–1286 ई.)-
- देवपाल ने भीलों व परमारों को पराजित कर अपने राज्य का विस्तार किया।
- वीर सिंह (1286–1303 ई.) –
- (1303–1388 ई.) के मध्य –
- भजुण्ड शासक बना।
- डूंगरसिंह शासक बना।
- डूंगरसिंह ने राजधानी बड़ौदा के स्थान पर डूंगरपुर बनाई।
- कर्म सिंह शासक बना।
- कर्म सिंह की रानी माणक ने डेसा (डूंगरपुर) की बावड़ी बनवाई। “आहड़िया” कहलाए।
- कान्हड़देव (1388–1398 ई.) –
- कान्हड़देव ने डूंगरपुर के द्वार बनवाये।
- प्रताप सिंह (1398–1424 ई.) –
- प्रतापसिंह का उपनाम “पाता रावल” था।
- गोपीनाथ (1424–1447 ई.)-
- गुजरात के शासक अहमदशाह ने गोपीनाथ पर आक्रमण कर उसे अधीनता के लिए बाध्य किया।
- महाराणा कुम्भा ने गोपीनाथ को गुजरात के प्रभाव से मुक्त कराया। (कुम्भलगढ़ प्रशस्ति प्रमाण)
- गोपीनाथ ने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया।
- डूंगरपुर में “गेपसागर” का निर्माण करवाया।
- सोमदास (1447–1480 ई.)
- गंगादास (1480–1497 ई.)
- उदयसिंह (1497–1527 ई.)
- खानवा के युद्ध (1527 ई.) में उदयसिंह राणा सांगा के सहयोगी के रूप में वीरगति को प्राप्त हुआ।
- उदयसिंह ने अपनी पुत्री का विवाह मालदेव (मारवाड़) के साथ किया।
- उदयसिंह की मृत्यु के बाद राज्य दो भागों में विभाजित हुआ –
- पूर्वी भाग – जगमाल (बांसवाड़ा में गुहिल शाखा का संस्थापक)
- पश्चिमी भाग – पृथ्वीराज(डूंगरपुर)
- आसकरण (1549–1580 ई.)
- आसकरण ने बेणेश्वर शिवालय का निर्माण करवाया।
- आसकरण ने 1577 ई. में मुग़ल अधीनता स्वीकार की।
- आसकरण की रानी प्रेमल देवी ने 1586 ई. में डूंगरपुर में नौलखा बावड़ी का निर्माण कराया।
- महारावल सहसमल
- पुंजराज (पूंजा) (1609–1657 ई.)
- मुगल बादशाह शाहजहाँ ने पुंजराज को “माही मरातिब” का खिताब दिया।
- गिरधरदास
- जसवंतसिंह (1661–1691 ई.)
- रामसिंह
- 1728 ई. में रामसिंह ने बाजीराव–I से संधि कर चौथ वसूली स्वीकार की।
- शिवसिंह (1730–1785 ई.)
- शिवसिंह ने “शिवशाही पगड़ी” की परंपरा प्रारंभ की।
- बैरीशाल
- महारावल फतेहसिंह (1790–1808 ई.)
- 1805 ई. में महारावल फतेहसिंह ने दौलतराव सिंधिया के सेनापति सदाशिव को 2 लाख रुपये देकर डूंगरपुर को मराठा घेरे से बचाया।
- जसवंतसिंह–II (1808–1845 ई.)
- 1818 ई. में जसवंतसिंह–II ने जॉन मालकम के साथ संधि कर ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि स्वीकार की।
- जसवंतसिंह–II की राठौड़ रानी गुमान कंवरी ने डूंगरपुर में “केला बावड़ी” का निर्माण करवाया।
- उदयसिंह–II (1845–1898 ई.)
- 1857 ई. की क्रांति के समय उदयसिंह–II शासक था।
- 1883 ई. में उदयसिंह–II ने गेपसागर की पाल पर शाही परिवार के निवास हेतु “उदय विलास महल” का निर्माण करवाया।
- इसी परिसर में एकलिंगजी व राधाबिहारी के मंदिरों का निर्माण करवाया।
- कविकिशन ने इसके शासनकाल में “उदयप्रकाश” ग्रंथ की रचना की।
- विजयसिंह (1898–1918 ई.)
- विजयसिंह के समय डूंगरपुर का आधुनिकीकरण हुआ।
- आमजन हेतु रामलक्ष्मण बैंक की स्थापना की।
- देवेंद्र कन्या पाठशाला तथा उदयशाही सेर प्रारंभ किए।
- बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) को 10,000 रुपये की सहयोग राशि दी।
- महारावल लक्ष्मणसिंह (1918–1948 ई.)
- यह डूंगरपुर की गुहिल शाखा का अंतिम शासक था।
- यह “नरेन्द्र मंडल” (Chamber of Princes) की स्थायी समिति का 20 वर्षों तक सदस्य रहा।
- 25 मार्च 1948 को राजस्थान संघ में डूंगरपुर का विलय हुआ।
- यह संयुक्त राजस्थान का उपराज प्रमुख रहा।
- यह स्वयं संविधान सभा का सदस्य भी बनावागड़ / डूंगरपुर का गुहिल वंश
बांसवाड़ा का गुहिल वंश
- बांसवाड़ा का गुहिल वंश (पूर्वी शाखा)
- जगमाल –
- जगमाल बांसवाड़ा में गुहिल वंश का संस्थापक था।
- यह डूंगरपुर शासक उदयसिंह का पुत्र था।
- इसे उदयसिंह द्वारा राज्य का पूर्वी भाग प्राप्त हुआ।
- जगमाल ने बांसवाड़ा में भीलेश्वर महादेव मंदिर बनवाया।
- जगमाल ने फूलमहल का निर्माण करवाया।
- जगमाल ने “बाई का तालाब” बनवाया।
- जयसिंह –
- प्रतापसिंह –
- प्रतापसिंह ने 1576 ई. में अकबर की अधीनता स्वीकार की।
- मानसिंह –
- उग्रसेन –
- उदयभाण –
- समरसिंह (1615–1660 ई.) –
- समरसिंह ने 1617 ई. में जहाँगीर से भेंट की।
- समरसिंह ने संधि कर बांसवाड़ा को मेवाड़ से स्वतंत्र करवाया।
- कुशलसिंह (1660–1688 ई.) –
- अजबसिंह (1688–1706 ई.) –
- भीमसिंह (1706–1712 ई.) –
- विशनसिंह (1712–1737 ई.) –
- उदयसिंह (1737–1746 ई.) –
- पृथ्वीसिंह (1746–1786 ई.) –
- पृथ्वीसिंह की रानी अनोप कंवरी ने लक्ष्मीनारायण मंदिर बनवाया।
- विजय सिंह (1786–1816 ई.) –
- उम्मेदसिंह (1816–1819 ई.) –
- उम्मेदसिंह ने जॉन मालकम के साथ ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि कर अंग्रेजों का संरक्षण स्वीकार किया।
- भवानीसिंह (1819–1838 ई.) –
- बहादुरसिंह (1838–1844 ई.) –
- लक्ष्मणसिंह (1844–1905 ई.) –
- लक्ष्मणसिंह के समय सीमा विवाद हुए।
- इसके समय सरदारों के बीच झगड़े हुए।
- इन सभी विवादों को मैकेन्जी ने सुलझाया।
- 1857 ई. की क्रांति के समय लक्ष्मणसिंह शासक था।
- शंभूसिंह (1905–1913 ई.) –
- पृथ्वीसिंह (1913–1944 ई.) –
- पृथ्वीसिंह ने मेयो कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की।
- युवराज के समय मानगढ़ पहाड़ी पर आक्रमण कर
- “गोविन्द गिरी” को गिरफ्तार किया गया।
- महारावल चन्द्रवीर सिंह (1944–1948 ई.) –
- यह बांसवाड़ा के गुहिल वंश का अंतिम शासक था।
- इसने संयुक्त राजस्थान के विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।
- हस्ताक्षर करते समय कहा – “मैं अपने मृत्यु पत्र (Death Warrant) पर हस्ताक्षर कर रहा हूँ।”
प्रतापगढ़ का गुहिल वंश
- प्रतापगढ़ का गुहिल वंश
- इस शाखा के शासक “महारावल” कहलाते थे।
- क्षेमसिंह –
- क्षेमसिंह प्रतापगढ़ में गुहिल वंश का संस्थापक था।
- यह मेवाड़ महाराणा मोकल का द्वितीय पुत्र था।
- महाराणा कुंभा ने इससे सादड़ी छीन ली।
- बाद में राणा उद्दा के समय क्षेमसिंह ने सादड़ी पुनः प्राप्त कर ली।
- सादड़ी का पूर्ण भाग न मिलने पर इसके वंशजों ने मालवाके सुल्तान की सहायता से मालवा का एक भाग प्राप्त किया, जो “प्रतापगढ़” कहलाया।
- सूरजमल (1473–1530 ई.) –
- सूरजमल ने “देवलिया” को अपनी राजधानी बनाया।
- इसके पुत्र बाघसिंह ने बहादुरशाह के चितौड़ घेरे (1534–1535 ई.) में वीरगति प्राप्त की।
- बाघसिंह (1530–1535 ई.) –
- बाघसिंह चितौड़ के घेरे में वीरगति को प्राप्त हुआ।
- चितौड़ दुर्ग में इसकी छतरी बनी हुई है।
- रायसिंह (1535–1552 ई.) –
- विक्रमसिंह (1552–1563 ई.) –
- तेजसिंह (1563–1593 ई.) –
- हल्दीघाटी के युद्ध में इसके चाचा काँधल ने भाग लिया।
- भानूसिंह (1593–1597 ई.) –
- सिंहा (1597–1628 ई.) –
- सिंहा ने जहाँगीर के विरुद्ध विद्रोह करने वाले महावत खां को शरण दी।
- हरिसिंह (1628–1673 ई.) –
- हरिसिंह ने “हरिसारस्वत” ग्रंथ की रचना करवाई।
- यह ग्रंथ 1765 ई. में लिखा गया।
- गंगाराम ने “हरिभूषण महाकाव्य” (1653–1655 ई.) की रचना की।
- 1648 ई. में हरिसिंह ने शाहजहाँ से खिल्लत प्राप्त की।
- प्रतापसिंह (1673–1708 ई.) –
- 1699 ई. में प्रतापसिंह ने देवलिया के स्थान पर डोडेरिया खेड़ा में प्रतापगढ़ बसाकर राजधानी बनाई।
- पृथ्वीसिंह (1708–1718 ई.) –
- संग्रामसिंह (1718–1719 ई.) –
- उम्मेदसिंह (1719–1721 ई.) –
- गोपालसिंह (1721–1756 ई.) –
- गोपालसिंह ने मराठों, सवाई जयसिंह और मेवाड़ से अच्छे संबंध बनाकर प्रतापगढ़ की स्वतंत्रता बनाए रखी।
- सालिमसिंह (1756–1774 ई.) –
- सालिमसिंह ने गोपाल महल का निर्माण करवाया।
- सामंतसिंह (1774–1844 ई.) –
- मराठों (होलकर) ने इससे धन वसूला।
- सिंधिया ने भी जग्गूबापू को धन वसूली हेतु भेजा।
- 5 अक्टूबर 1818 को सामंतसिंह ने जॉन मेल्कम के साथ अंग्रेजों से संधि की।
- सामंतसिंह ने अपने पुत्र दीपसिंह को उत्पात मचाने पर ईस्ट इंडिया कम्पनी की सहायता से कैद करवाया।
- दलपतसिंह –
- 1857 की क्रांति के समय दलपतसिंह शासक था।
- अंग्रेजों ने डूंगरपुर शासक जसवंतसिंह को अयोग्य घोषित कर डूंगरपुर का शासन दलपतसिंह को सौंपा।
- अंग्रेजों ने 1862 ई. में इसे 15 तोपों की सलामी का सम्मान दिया।
- उदयसिंह (1864–1890 ई.) –
- उदयसिंह ने प्रतापगढ़ को पुनः राजधानी बनाया।1881 ई. में प्रतापगढ़ में पहली जनगणना कराई गई।
- रघुनाथसिंह (1890–1929 ई.) –
- 1904 ई. में शालिमशाही सिक्कों के स्थान पर कलदार सिक्कों का प्रचलन प्रारंभ किया।
- रामसिंह (1929–1948 ई.) –
- रामसिंह प्रतापगढ़ के गुहिल वंश का अंतिम शासक था।
- इसने प्रतापगढ़ का आधुनिकीकरण किया।
- 25 मार्च 1948 को प्रतापगढ़ का राजस्थान संघ में विलय हुआ।
