कच्छवाहा राजवंश (आमेर–जयपुर)

कच्छवाहा राजवंश (आमेर–जयपुर) राजस्थान का इतिहास में एक प्रमुख शाही परिवार है, जिसने आमेर और जयपुर पर लंबे समय तक शासन किया। इस राजवंश के प्रसिद्ध शासकों में पृथ्वीराज कच्छवाहा (1503–1527 ई.), राजा मानसिंह प्रथम (1589–1614 ई.), मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम (1621–1667 ई.) और सवाई जयसिंह द्वितीय (1700–1743 ई.) शामिल हैं। कच्छवाहा अपने प्रशासनिक कौशल और स्थापत्य कला के योगदान के लिए भी जाने जाते हैं।

भाटों के पारम्परिक वृत्तान्त अनुसार – 
  • कच्छवाहा अयोध्या से रोहतास (बिहार) आये।
  • यहाँ से ‘नल’ के नेतृत्त्व  में एक शाखा पश्चिम की ओर आई।
  • नल का 33वाँ वंशज – नरवर शाखा (मध्यप्रदेश) माना गया।
  • संस्थापक – सोढ़देव
  • पिता द्वारा राज्य से निकाले जाने पर 966 ई. में ढूंढाड़ राज्य की स्थापना (भाटों के अनुसार) की।
कर्नल टॉड का उल्लेख –
  • नल ने नरवर नगर (मध्यप्रदेश) बसाया।
  • ग्वालियर सहस्त्रबाहु मंदिर अभिलेख (1093 ई.) में महीपाल कच्छवाहा का उल्लेख मिलता है।
  • ग्वालियर क्षेत्र में लक्ष्मण इस राजवंश का प्रथम शासक बताया गया तथा वज्रदामन ने ग्वालियर जीता।
सूर्यमल्ल मीसण –
  • कूर्मवंशीय अर्थात् ‘कुर्म’ नामक रघुवंशी शासक की सन्तान – कुशवाहा / कच्छवाहा।
डॉ. जी.एच. ओझा –
  • मूल पुरुष – कच्छवाहा।
साधारण मान्यता –
  • कच्छवाहा स्वयं को अयोध्या के राजा श्रीराम के पुत्र कुश का वंशज मानते हैं, इसलिए कुशवाह / कच्छवाहा कहलाये।

कच्छवाहा राजवंश का उदय

  • कच्छवाहा राजवंश का उदय 12वीं शताब्दी में माना जाता है।
  • आमेर पर पहले मीणाओं का अधिकार था।
  • कच्छवाहा मूलतः नरवर (म.प्र.) के माने जाते हैं।
  • प्रारंभ में ये चौहानों के सामंत थे।

दूल्हेराय / धोलेराय –

  • दादा – तेजकर्ण।
  • पौत्र – ईशसिंह (नरवर), जिसने पैतृक राज्य अपने भाई को सौंपकर करौली आकर संन्यासी रूप धारण कर लिया।
  • विवाह –
    • दूल्हेराय का विवाह मौरा (लालसोट) के चौहान शासक रालणसिंह रालपसी की पुत्री सुजान कँवर से हुआ।
    • रालणसिंह ने दौसा दहेज में दिया।
  • 1137 ई. में दौसा के आसपास कच्छवाहा वंश की स्थापना कर ढूंढाड़ राज्य की नींव रखी।
  • प्रारंभिक राजधानी – दौसा (खोह)।
  • 1137 ई. में दौसा के बड़गुर्जरों को पराजित कर ढूंढाड़ राज्य पर अधिकार स्थापित किया।
  • दूल्हेराय ने जमुवारामगढ़ में मीणा शासक को पराजित कर इसे नई राजधानी बनाया।
  • जमुवारामगढ़ में **जमुवाय माता** का मंदिर बनवाया, जिन्हें कच्छवाहा वंश की कुलदेवी माना जाता है।
  • माची (रामगढ़), खोह (दौसा), गैटोर (गैता मीणा) तथा झोटवाड़ा (झोटा मीणा) पर चौहानों (ससुराल) की सहायता से अधिकार किया।
  • मृत्यु – 1127 ई. (भाटीय परम्परा में समयान्तर विरोध, पर तथ्य यथावत माने जाते हैं)।
  • भाट स्रोत – 
    • भाटों के साहित्य में कच्छवाहा वंश का संस्थापक सौढ़देव को माना गया है, जिसने 966 ई. में ढूंढाड़ राज्य की स्थापना की।

कोकिलदेव / कांकिल – 

  • 1207 ई. में आमेर को कच्छवाहों की तीसरी नई राजधानी बनाया।
  • आमेर के मीणा शासकों को पराजित किया।
  • यादवों से मेड़ व बैराठ जीते।
  • आमेर में अंबिकेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण करवाया।
  • इसी वंश के नरू कच्छवाहा से नरूका शाखा निकली –
    • क्षेत्र – फागी व अलवर।
  • शेखा से शेखावत शाखा निकली –
    • क्षेत्र – शेखावाटी।
राजदेव – 
  • 1237 ई. में आमेर में प्रसिद्ध कदमी महलों का निर्माण करवाया।
  • इन महलों की बनी छतरी में आमेर शासकों का राजतिलक होता था।
  • बाद में गोविन्ददेवजी का मंदिर बनने के बाद राजतिलक वहाँ होने लगा।
पंचवनदेव – 
  • शक्तिशाली व वीर शासक था।
अन्य क्रमिक शासक
  • मालसी
  • जिलदेव
  • रामदेव
  • किल्हण
  • कुन्तल
  • उदयकरण
  • नरसिंह
  • उदरण
  • चन्द्रसेन
    • ये सभी प्रारंभ में चौहानों तथा बाद में गुहिल (मेवाड़) के अधीन रहे, जब तक चौहानों का प्रभाव समाप्त नहीं हुआ।

पृथ्वीराज कच्छवाहा (1503–1527 ई.) – 

  • राणा सांगा का सामंत था।
  • मार्च 1527 में खानवा के युद्ध में राणा सांगा की ओर से मुगलों के विरुद्ध लड़ा।
  • खानवा के युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।
  • गलता के रामानुज सम्प्रदाय के संत कृष्णदास पयहारी के अनुयायी थे।
  • पत्नी – बालाबाई (बीकानेर के राव लूणकरण की पुत्री)।
पूरणमल कच्छवाहा (1527–1533 ई.) –
  • पृथ्वीराज व बालाबाई के प्रभाव के कारण, छोटा पुत्र होने पर भी आमेर की राजगद्दी पर बैठाया गया।
भीमदेव कच्छवाहा (1533–1536 ई.) – 
  • पृथ्वीराज का बड़ा पुत्र।
  • पूरणमल को पराजित कर गद्दी प्राप्त की।
  • इनके समय आमेर में गृहयुद्ध की स्थिति का प्रारंभ हुआ।
रतनसिंह कच्छवाहा (1536–1546 ई.) –
  • ऐय्याश प्रवृत्ति का शासक था।
  • सभी कार्य उसका विश्वासपात्र तेजसी रायमलोत देखता था।
  • शेरशाह सूरी की अधीनता स्वीकार की।
  • इसके चाचा ‘सांगा’ ने सांगानेर कस्बे की स्थापना की, जिसमें राव जैतसी (बीकानेर) का सहयोग था।
  • रतनसिंह को ज़हर देकर मार दिया गया।
  • इसके बाद इसका भाई आसकरण शासक बना।
आसकरण (1546–1547 ई.) –
  • अल्पकालीन शासन; बाद में इसे हटाकर भारमल स्वयं शासक बना।

भारमल (अमीर-उल-उमरा भारमल) (1547–1574 ई.)

  • आसकरण शेरशाह के पुत्र सलीमशाह की शरण में चला गया।
  • शेरशाह के सरदार हाजी खाँ पठान की सहायता से भारमल ने आसकरण को नरवर का राज्य दे दिया।
  • मुगल अधीनता स्वीकार करने वाला पहला प्रमुख राजपूत शासक।
  • मजनूँ खाँ की सहायता से दिसंबर 1556 में अकबर का घनिष्ठ मित्र बना।
  • जनवरी 1562 में अकबर, मुईनुद्दीन चिश्ती (अजमेर) की यात्रा से लौटते समय सांभर के पास रुका, यहीं 1562 ई. में भारमल ने अपनी पुत्री हरकुबाई / शाहीबाई / मानमती / मरियम-उज्जमानी का विवाह अकबर से किया (चगताई खाँ की मध्यस्थता से)।
    • जहाँगीर (सलीम) का जन्म मरियम-उज्जमानी से हुआ।
  • मुगलों से वैवाहिक संबंध स्थापित करने वाला प्रथम राजपूत शासक।
  • 20 जनवरी 1562 को अपने पुत्र भगवंतदास व पौत्र मानसिंह को अकबर की सेवा में भेजा।
  • अकबर ने भारमल को “अमीर-उल-उमरा राजा” की उपाधि तथा 5000 का मनसब दिया।
  • अकबर अपनी अनुपस्थिति में राजधानी का कार्यभार प्रायः भारमल को सौंपता था।
  • नोट – सूजा (पूरणमल का पुत्र) स्वयं को आमेर का वास्तविक हकदार मानता था; उसने मेवात के मुगल सूबेदार शर्फुद्दीन की सहायता से 1558 ई. में भारमल पर आक्रमण किया और बाद में पहाड़ों में छिपकर रहने लगा।

राजा भगवंतदास (1574–1589 ई.)

  • अकबर ने “अमीर-उल-उमरा राजा” की उपाधि व 5000 का मनसब दिया।
  • 1569 ई. के रणथंभौर समझौते में उपस्थित था।
  • महाराणा प्रताप के पास भेजे गये तृतीय शिष्टमंडल का नेतृत्त्व  किया।
  • कुंवर व शासक – दोनों रूपों में मुगलों की सेवा की।
  • **सरनाल (गुजरात) के युद्ध** में अफ़ग़ानों (इब्राहिम हुसैन मिर्जा) के विरुद्ध अपूर्व वीरता दिखाई; अकबर से नगाड़ा व झण्डा प्राप्त किया।
  • 1582 में पंजाब का सूबेदार नियुक्त (1582–1589), लाहौर का संयुक्त सूबेदार रहा।
  • 1585 में अपनी पुत्री मानबाई का विवाह सलीम (जहाँगीर) से किया।
  • मृत्यु – 1589 ई., लाहौर।

राजा मानसिंह प्रथम (1589–1614 ई.)

  • जन्म – दिसंबर 1550, मौजमाबाद (जयपुर)।
  • समकालीन मुगल सम्राट – अकबर व जहाँगीर।
  • मुगल सेवा में तीन पीढ़ियाँ –
    • दादा – भारमल (उच्च अमीर)
    • पिता – भगवंतदास
    • स्वयं – राजा मानसिंह।
  • राजतिलक के समय अकबर ने 5000 का मनसब दिया, 1605 में बढ़ाकर 7000 (अकबर के समय का सर्वोच्च मनसब) किया।
  • अकबर ने “फर्जन्द” (पुत्रवत्) व “मिर्जा राजा / राजा” की उपाधि दी।
  • अकबर के नौ रत्नों में से एक।
  • 1569 – रणथंभौर के विरुद्ध मुगल अभियान में सुर्जन हाड़ा को अधीनता दिलाने में मध्यस्थता।
  • 1572–73 – गुजरात अभियान में अकबर के साथ, 1573 के सरनाल युद्ध में इब्राहिम मिर्जा के विरुद्ध शाही सेना का नेतृत्त्व ।
  • गुजरात से लौटते समय (अप्रैल 1573) डूंगरपुर के शासक आसकरण को पराजित किया, जिसमें उसके भतीजे बाघा व दुर्गा वीरगति को प्राप्त हुए।
  • 1573 – राणा प्रताप के पास भेजे गये दूसरे शिष्टमंडल का नेतृत्त्व  कर भेंट की।
  • 1574 – बिहार में दाऊद खाँ के विद्रोह को दबाया।
  • 1576 – हल्दीघाटी युद्ध में मुगल सेना का सेनानायक।
  • 1581 – काबुल में मिर्जा हाकिम के विद्रोह का दमन।
  • 1585 – मिर्जा हाकिम की मृत्यु के बाद रोशनियाँ सरदारों को पराजित किया, स्मृति में आमेर में पचरंगी ध्वजा अपनाई।
  • 1587 – बिहार का सूबेदार नियुक्त।
  • 15 जनवरी 1589 – पटना में आमेर के शासक के रूप में औपचारिक राज्याभिषेक; बाद में आमेर में पुनः राज्याभिषेक, अकबर से 5000 मनसब व ‘राजा’ की उपाधि।
राज्याभिषेक के बाद –
  • गिधौर के शासक पूरणमल को पराजित किया।
  • खड़गपुर के संग्रामसिंह को हराया।
  • हाजीपुर के गणपत को परास्त किया।
  • उड़ीसा में अफगान विद्रोहियों कतलु खाँ व नासिर खाँ को पराजित कर उड़ीसा को मुगल साम्राज्य का हिस्सा बनाया।
  • 1594 – बंगाल का सूबेदार नियुक्त राजधानी – टांडा से हटाकर राजमहल (अकबरपुर) बनाई।
  • मृत्यु – 1614, एलिचपुर (महाराष्ट्र);
  • समाधि / छतरी – हाड़ीपुर, आमेर।
राजा मानसिंह प्रथम – सांस्कृतिक योगदान
  • आमेर महल का मुख्य निर्माता।
  • आमेर में शिलादेवी (शिलामाता) मंदिर निर्माण।
    • शिलामाता की मूर्ति बंगाल के शासक ‘केदार’ को पराजित कर जस्सौर से लाकर स्थापित की।
    • चैत्र व आश्विन नवरात्र (विशेषतः छठा दिन) पर मेला।
  • आमेर में  जगतशिरोमणि मंदिर –
    • पत्नी शृंगारदे / कनकावती ने अपने पुत्र जगतसिंह स्मृति में बनवाया; इसमें वही कृष्ण की काली मूर्ति स्थापित, जो पूर्व में चित्तौड़ में मीरा द्वारा पूजी जाती थी।
  • वृन्दावन में गोविन्द देवजी मंदिर का निर्माण।
  • आमेर झील (वर्तमान आमेर परिसर) का निर्माण।
  • रोहतासगढ़ (बिहार) में महलों का निर्माण।
  • मानपुर (बिहार) व अकबरपुर / राजमहल (बंगाल) नगर बसाए।
  • बैकुण्ठपुर (पटना) में भवानीशंकर मंदिर का निर्माण।
  • मीनाकारी कला को लाहौर से आमेर (जयपुर) लाए।
दरबारी विद्वान –
  • पुण्डरीक – रचनाएँ:
    • रागमाला
    • रागचन्द्रोदय
    • दूनी प्रकाश
    • नर्तन निर्णय
  • मुरारीदान – “मान-प्रकाश”
  • कवि जगन्नाथ – “मानसिंह कीर्ति-मुक्तावली”
  • कवि नरोत्तम – “मान-चरित्र”
  • कवि अमृतरायण– “मान-चरित्र”
  • दादूदयाल – साधुकड़ी / ढूंढाड़ी में वाणियाँ व दोहे।
  • नोट – “मान-चरित्र” व “महाराजकोष” जैसे ग्रंथों की रचना भी मानसिंह के काल से सम्बद्ध मानी जाती है।
भावसिंह (1614–1621 ई.) – 
  • राजा मानसिंह प्रथम का पुत्र।
  • निःसंतान मृत्यु।

मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम (1621–1667 ई.)

  • 11 वर्ष की आयु में शासक बना।
  • पिता – महासिंह (मानसिंह प्रथम के पोत्र),
  • माता – दमयंती।
  • जन्म – 1611 ई.; शासन अवधि लगभग 46 वर्ष।
  • मुगल सेवा – जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंगजेब – तीनों के अधीन।
  • जहाँगीर से जयसिंह को टीका दिलाने वाला – आमेर का वकील राय मुकुन्ददार।
  • 1623 – मात्र 12 वर्ष की आयु में मलिक अम्बर को पराजित कर अहमदनगर पर अधिकार।
  • 1625 – दलेल खाँ पठान को पराजित किया।
  • शाहजहाँ काल में महावन का जाट विद्रोह दबाया।
  • 1629 – उत्तर-पश्चिम सीमा पर उज्बेक विद्रोह दमन।
  • 1630 – खान-ए-जहाँ लोदी के विद्रोह का दमन।
  • 1636 – शाहजहाँ के साथ बीजापुर व गोलकुंडा (दक्षिण) अभियान में भाग।
  • 1637 – शाहजहाँ ने “मिर्जा राजा” की उपाधि देकर शूजा के साथ कंधार अभियान पर भेजा।
  • 1647 – शाहजहाँ के मध्य एशिया अभियान में भाग।
  • 1651 – सादुल्ला खाँ के साथ कंधार अभियान में हरावल (अग्रभाग) का नेतृत्त्व ।
  • दक्षिण (दक्कन) व काबुल – दोनों का सूबेदार रहा।
शाहजहाँ के उत्तराधिकार युद्ध –
  • बहादुरपुर का युद्ध (1658)  – दारा की ओर से, सूलेमान शिकोह के साथ; शाहशूजा पराजित।
  • धरमत व सामुगढ़ की हार के बाद आमेर लौटा।
  • 25 जून 1658 – मथुरा में औरंगजेब से भेंट कर सहयोग का वचन दिया।
  • दोराई का युद्ध (अजमेर, 1659) –
    • औरंगजेब की ओर से दारा के विरुद्ध
    • दारा को युद्ध से भागने पर पकड़कर औरंगजेब को सौंपा।
    • पुत्र रामसिंह ने सुलेमान शिकोह को पकड़कर औरंगजेब को सौंपा।
    • प्रसन्न होकर औरंगजेब ने जयसिंह को 7000 का मनसब व दक्षिण में नियुक्ति दी।
  • मुख्य कार्य – मराठा नेता शिवाजी को नियंत्रित करना।

पुरन्दर की संधि (11 जून 1665 ई.) – 

  • पक्ष – मिर्जा राजा जयसिंह (मुगल) व शिवाजी।
  • शर्तें –
    • शिवाजी ने मुगल अधीनता स्वीकार की।
    • शिवाजी को दरबार में व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट।
    • शिवाजी के पुत्र संभाजी को 5000 मनसब सहित मुगल सेना में नियुक्ति।
    • शिवाजी ने अपने 35 में से 23 दुर्ग मुगलों को दिए,12 दुर्ग अपने पास रखे।
    • बीजापुर व गोलकुंडा में शिवाजी को चौथ वसूली का अधिकार।
    • शिवाजी और मुगल – मित्रतापूर्ण संबंध रखेंगे।
    • नोट – जयसिंह के आग्रह पर ही शिवाजी आगरा दरबार में पहुँचे।बाद में बंदी बनाकर आगरा स्थित जयपुर महल में रखा गया, जहाँ से शिवाजी भाग निकले।
  • बीजापुर अभियान में जयसिंह पूर्ण सफलता प्राप्त न कर सका। जिससे औरंगजेब को उन पर संदेह हुआ।
  • मृत्यु – दक्षिण अभियान से लौटते समय बुरहानपुर (1667 ई.)के पास।

मिर्जा राजा जयसिंह प्रथम – वास्तुकला व साहित्य 

  • आमेर के महलों का व्यापक विस्तार कराया।
  • जयगढ़ दुर्ग के निर्माण को लेकर मतभेद –
    • डॉ. जगदीश सिंह व डॉ. गोपीनाथ शर्मा – जयसिंह प्रथम को मूल निर्माता मानते हैं।
    • अन्य मत – मूल निर्माण मानसिंह प्रथम का, वर्तमान स्वरूप जयसिंह द्वितीय का।
  • औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में जयसिंहपुरा नगर बसाया।
  • बहुभाषाविद् – हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, फ़ारसी, तुर्की, अरबी आदि भाषाओं का ज्ञान।

दरबारी विद्वान –

  • बिहारी – “बिहारी सतसई”; प्रत्येक श्रेष्ठ दोहे पर स्वर्ण मुद्रा पुरस्कार।
  • कुलपति मिश्र – लगभग 52 ग्रंथ; दक्षिण अभियानों की जानकारी भी।
  • रायकवि  – ‘जयसिंह चरित्र’।
  • गौपाल तैलंग  – ‘जयचम्पू’।
  • नरोत्तमदास  – ‘सुदामा चरित्र’।
  • इतिहासकार जदुनाथ सरकार  –
    • जयसिंह की मृत्यु की तुलना इंग्लैण्ड की महारानी एलिज़ाबेथ के दरबारी वॉल सिंघम से की, जिसने कठोर व एहसानफरामोश शासक के लिए भी प्राण न्योछावर किए।

रामसिंह प्रथम (1667–1688 ई.) – 

  • औरंगजेब ने इसे असम विद्रोह दबाने के लिए भेजा।
  • इनके समय रचनाएँ –
    • कुलपति मिश्र – ‘रस रहस्य’।
    • दलपतिराम  – ‘चगता पादशाही’।
    • शंकर भट्ट  – ‘वैद्य विनोद संहिता’।
    • गणेश देवल – ‘मुहूर्त तत्त्व’।
बिशनसिंह / विष्णुसिंह (1688–1700 ई.) – 
  • रामसिंह का पौत्र।
  • पिता – किशनसिंह (जिनकी मृत्यु दक्षिण भारत में हुई)।

सवाई जयसिंह द्वितीय (चाणक्य–राजा) (1700–1743 ई.)

  • परिचय
    • महान खगोलविद्, राजनीतिज्ञ व नगर–योजना विशेषज्ञ।
    • समकालीन 7 मुगल बादशाह – औरंगजेब, बहादुरशाह प्रथम, जहाँदारशाह, फर्रुखसियर, रफ़ी–उद्–दरजात, रफ़ी–उद्–दौला, मुहम्मदशाह रंगीला।
    • औरंगजेब ने वीरता व वाक्पटुता से प्रसन्न होकर “सवाई” की उपाधि दी।
    • डॉ. जी.एच. ओझा – इसे राणा कुंभा व राजा भोज के समान बताते हैं।

मुगल–राजनीति व युद्ध – 

  • जजाऊ का युद्ध (1707) –
    • औरंगजेब की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार संघर्ष;
    • जयसिंह ने आज़म का साथ दिया, पर विजयी मुअज्ज़म (बहादुरशाह प्रथम) हुआ।
    • बहादुरशाह ने जयसिंह को हटाकर विजयसिंह को आमेर का शासक बनाया।
    • फौजदार सैय्यद हुसैन खाँ ने आमेर का नाम बदलकर इस्लामाबाद / मौमिनाबाद रखा।
देबारी समझौता (1708)  –
  • सवाई जयसिंह, अजीतसिंह (मारवाड़), अमरसिंह द्वितीय (मेवाड़) – तीनों का संघ; सहयोग से जयसिंह ने आमेर पुनः प्राप्त किया।
  • 1710 ई. – जयसिंह पुनः आमेर का शासक बना।
  • सूबेदारी व मराठा–नीति – 
    • मालवा का सूबेदार– तीन बार (फर्रुखसियर, लगभग 1730, तथा मुहम्मदशाह काल)।
  • भरतपुर क्षेत्र में जाट विद्रोहों का दमन –
    • 1715 में चुण्डामन से संधि; बाद में उसके पुत्रों मोकल, वीर, रुमा के विद्रोह को दबाया।
    • चुण्डामन के बाद बदनसिंह को साथ लेकर विद्रोह दबाया; उसे डीग की जागीर व ‘बृजराज / राजा’ की उपाधि दी।
      • इस सफलता पर मुहम्मदशाह ने “राज राजेश्वर श्री राजाधिराज सवाई” की उपाधि दी।
  • 1729 – बूंदी की राजनीति में हस्तक्षेप; मराठों का प्रभाव बढ़ा।
हुरड़ा सम्मेलन (17 जुलाई 1734) –
  • उद्देश्य – मराठा शक्ति पर अंकुश।
धौलपुर समझौता (18 फरवरी 1741) –
  • पक्ष – सवाई जयसिंह (मुगलों की ओर से) व पेशवा बाजीराव प्रथम।
  • पेशवा को मालवा की सूबेदारी दी गई।
  • मराठा 500 सैनिक स्थायी रूप से मुगल सेना में रखेंगे; आवश्यकता पर और सैनिक भेजेंगे।
  • पेशवा मुगल अधीनता स्वीकार कर प्रार्थना–पत्र देगा।
  • सिंधिया व होल्कर लिखित में देंगे कि यदि पेशवा बेवफा हुआ तो उसका साथ छोड़ देंगे।

स्थापत्य, नगर–योजना व खगोल विज्ञान

  • गोविन्ददेवजी मंदिर (आमेर/जयपुर) –
    • 1714 में वृन्दावन से मूर्ति मंगाकर स्थापित की;
    • गौड़ीय सम्प्रदाय की प्रमुख पीठ
    • जयपुर शासकों का राज्याभिषेक स्थल (पूर्व में कदमी महल)।
  • जयपुर नगर की स्थापना – 18 नवम्बर 1727 
    • योजनाकार – विद्याधर भट्टाचार्य।
    • इस की नीव जगन्नाथ सम्राट ने रखी। 
    • 9 वर्गों के सिद्धांत पर नियोजित।
    • भारत का पहला नियोजित आधुनिक नगर।
    • 2019 – यूनेस्को विश्व धरोहर शहर।
  • नाहरगढ़ दुर्ग (1734 के आसपास) –
    • उपनाम – सुदर्शनगढ़ / जयपुर मुकुट;
    • मराठों से सुरक्षा हेतु; नाहर भौमियाँ की तपोभूमि।
  • जलमहल – मानसागर झील में; अश्वमेध यज्ञ हेतु विकसित।
    • अश्वमेध, वाजपेय व राजसूय यज्ञ सम्पन्न – पुरोहित पुण्डरीक रत्नाकर।
  • पंच वेधशालाएँ (जंतर–मंतर) –
    • जयपुर (सबसे बड़ी, 2010 से विश्व धरोहर), दिल्ली, उज्जैन, मथुरा, वाराणसी।
  • जयगढ़ दुर्ग – मूल निर्माण मानसिंह प्रथम;
    • वर्तमान स्वरूप सवाई जयसिंह द्वितीय का; ‘विजयगढ़ी’ अन्तर्दुर्ग; ‘दीया बुर्ज
    • तोप–ढलाई कारखाना, जलटैंक, गुप्त सुरंगें
    • ‘जयबाण’ तोप (निर्माण – जयसिंह; पहियों पर चढ़ाना – रामसिंह द्वितीय)।
  • हरमाड़ा नहर  – जयपुर की पेयजल आपूर्ति हेतु।
  • सिसोदिया रानी महल, ब्रजनाथ मंदिर, आनंदकृष्ण मंदिर आदि का निर्माण।

ज्योतिष, गणित व साहित्य – 

  • स्वयं की रचनाएँ –
    • “जीज मुहम्मदशाही” (1733) – ग्रह–नक्षत्र।
    • “जयसिंह कारिका” – खगोल शास्त्र।
  • गुरु पण्डित जगन्नाथ –
    • ‘सिद्धान्त सम्राट’; ‘सिद्धान्त कौस्तुभ’; यूक्लिड के रेखागणित का संस्कृत अनुवाद।
  • केवलराम – “विभाग सारणी” (Logarithm ग्रंथ का संस्कृत अनुवाद)।
  • सुधाकर पुण्डरीक – ‘साहित्यसार–संग्रह’।
  • पुण्डरीक रत्नाकर– ‘जयसिंह कल्पद्रुम’।
  • जनार्दन भट्ट गोस्वामी – शृंगार–शतक, वैराग्य–शतक, मन्त्रचन्द्रिका, ललितची–प्रदीपका।
  • चक्रपाणी – ‘पंचायतन–प्रकाश’।
  • श्रीकृष्ण भट्ट – ‘राघव–गीतम’; उपाधि – रामरसाचार्य’।
  • सूरत मिश्र  – ‘बिहारी सतसई’ की टीका।
  • प्रियदास  – भक्तमाला टीका व भागवत भाष्य (कृष्णदास पयहारी के शिष्य)।
  • नयनचन्द्र मुखर्जी – ‘उकर’ नामक अरबी पुस्तक का संस्कृत अनुवाद।
  • मुहम्मद मेहरी व मुहम्मद शरीफ – विदेशों से पुस्तकें लाने हेतु भेजे गये।

समाज–सुधार व कला – 

  • सती प्रथा पर नियंत्रण के प्रयास।
  • विधवा–पुनर्विवाह को मान्यता देने वाला प्रथम राजपूत शासक।
  • ब्राह्मणों (छन्यात) के आपसी भेद–भाव को कम करने का प्रयास।
  • ‘सूरतखाना’ – चित्रकला विभाग की स्थापना।
  • निधन – 1743 ई.

सवाई ईश्वरीसिंह (1743–1750 ई.)

  • सवाई जयसिंह द्वितीय व सूरज कँवरी का पुत्र।
  • भाई माधोसिंह के साथ उत्तराधिकार संघर्ष।
  • राजमहल का युद्ध – 1 मार्च 1747
    • पक्ष – ईश्वरीसिंह बनाम माधोसिंह(होल्कर से सहायता)।
    • ईश्वरीसिंह के समर्थक –
      • मुगल बादशाह अहमदशाह।
      • राणो जी सिंधिया।
      • सेनापति – हरगोविन्द नटाणी।
    • विजय – ईश्वरीसिंह।
    • विजय–स्मारक – त्रिपोलिया बाज़ार, जयपुर में 7 मंजिला ईसर लाट / सरगासूली(लाट मीनार)।
  • बगरू युद्ध – 1 अगस्त 1748
    • पक्ष – ईश्वरीसिंह बनाम माधोसिंह।
    • माधोसिंह के समर्थक –
      • पेशवा और होल्कर 
      • बूंदी – उम्मेदसिंह।
      • मेवाड़ – जगतसिंह प्रथम।
      • कोटा – दुर्जनशाल।
    • ईश्वरीसिंह की सहायता – भरतपुर राजकुमार सूरजमल।
    • वास्तविक विजय – मराठों व माधोसिंह की।
    • ईश्वरीसिंह ने 5 परगने (टोंक, टोडा, मालपुरा, निवाई,राजमहल) माधोसिंह को दिए।
    • उम्मेदसिंह को बूंदी का शासक माना।
    • मराठों को युद्ध–हर्जाना दिया।
  • अंत –
    • मराठों की बढ़ती माँग से परेशान।
    • मल्हारराव होल्कर जयपुर आ गया।
    • 13 दिसम्बर 1750 – ईसर लाट से कूदकर आत्महत्या की।
  • विशेष –
    • 1748 के मानपुर युद्ध में अहमदशाह अब्दाली की सेना को पराजित किया था।

माधोसिंह प्रथम (1751–1768 ई.)

  • पिता – सवाई जयसिंह द्वितीय; माता – मेवाड़ राजकुमारी चन्द्रकुंवरी।
  • ईश्वरीसिंह की मृत्यु के बाद मराठों की सहायता से शासक बना।
  • मराठा सरदार मल्हारराव होल्कर व जयप्पा सिंधिया ने जयपुर में लूटपाट व अत्याचार किए।
  • 10 जनवरी 1751 – जयपुर वासियों द्वारा ‘कल्ले–आम’ मंदिर देखने आये मराठों के द्वार बंद कर उन्हें मार गिराया।
  • माधोसिंह ने बादशाह अहमदशाह, महाराजा सूरजमल (भरतपुर) व अवध नवाब सफदरजंग के मध्य समझौता करवाया।
    • पुरस्कार – रणथंभौर दुर्ग (पहले कोटा के अधीन) मिला।
  • भटवाड़ा युद्ध (नवम्बर 1761)
    • माधोसिंह प्रथम बनाम कोटा शासक शत्रुशाल।
    • कारण – रणथंभौर दुर्ग को लेकर विवाद।
    • कोटा पक्ष के सेनापति – झाला जालिमसिंह।
    • परिणाम – शत्रुशाल की विजय।
  • 1763 – सवाई माधोपुर नगर की स्थापना।
  • जयपुर में मोती डूंगरी महलों का निर्माण।
  • मावंडा / मौंडा–मण्डौली युद्ध (1767) –
    • पक्ष – माधोसिंह, अलवर के प्रतापसिंह,
    • भरतपुर जाट शासक जवाहरसिंह।
    • विजय – जवाहरसिंह।
  • कामाँ युद्ध (1768) –
    • माधोसिंह बनाम जवाहरसिंह (भरतपुर)।
    • विजय – जवाहरसिंह।
  • शीतला माता मंदिर, चाकसू में निर्माण।
  • दरबारी विद्वान –
    • द्वारिकानाथ भट्ट – ‘वाणी वैराग्य’, ‘गलवा गीत’।
    • बृजलाल – प्रसिद्ध वीणा–वादक।
  • विशेष –
  • माधोसिंह प्रथम का कुर्ता – गाउन व पायजामा सिटी पैलेस म्यूज़ियम, जयपुर में सुरक्षित हैं।
सवाई पृथ्वीसिंह (1768–1778 ई.) – 
  • तुलनात्मक रूप से स्थिर शासनकाल; बड़ी राजनीतिक हलचल कम रही।

सवाई प्रतापसिंह (1778–1803 ई.)

  • सैन्य–राजनीतिक घटनाएँ
  • अंग्रेज सेनापति जॉर्ज थॉमस का जयपुर पर आक्रमण।
  • तूंगा का युद्ध – 28 जुलाई 1787
    • पक्ष – सवाई प्रतापसिंह व मराठा महादजी सिंधिया।
    • ‘राठौड़–कच्छवाहा’ गुट – विजयसिंह (मारवाड़) का समर्थन।
    • शिवपुर, करौली शासक व मुगल फौजदार मोहम्मद बैग हमदानी( महादजी के साथ)।
    • युद्ध अनिर्णायक – पर मराठे पीछे हटे।
    • महादजी का कथन – “यदि मैं जीवित रहा तो जयपुर को धूल चटा दूँगा।”
    • बिसाऊ के ठाकुर सूरजमल शेखावत – युद्ध में वीरगति।
  • पाटन का युद्ध – 20 जून 1790
    • पक्ष – प्रतापसिंह, विजयसिंह (मारवाड़),अफगान नेता इस्माइल बेग।
    • बनाम – मराठे व महादजी सिंधिया।
    • नेतृत्त्व  – डी. बोइन (फ्रांसीसी), लकवा दादा।
    • परिणाम – मराठों की विजय; अजमेर पर अधिकार।
    • अजमेर से धनराशि पुनः हर्जाने के रूप में ली गई।
  • मालपुरा युद्ध – 16 अप्रैल 1800
    • प्रतापसिंह व भीमसिंह राठौड़ (मारवाड़) बनाम मराठे।
    • विजय – मराठे; जयपुर संधि के लिए बाध्य।
स्थापत्य व संस्कृति – 
  • हवामहल – 1799 ई.
    • निर्माता – सवाई प्रतापसिंह।
    • वास्तुकार – उस्ताद लालचंद।
    • समर्पित – भगवान विष्णु (कृष्ण के मुकुट समान आकृति)।
    • बिना नींव के समतल भूमि पर 5-मंजिला इमारत।
    • पाँच मंजिलें – शरद मंदिर, रतन मंदिर, विचित्र मंदिर, प्रकाश मंदिर, हवा मंदिर।
    • 953 जालीदार खिड़कियाँ – जहाँ से रानियाँ तीज व गणगौर की सवारी देखती थीं।
  • ‘बृजनिधि’ उपनाम से काव्य–रचना
    • ‘बृजनिधि ग्रंथावली’ – कविताओं का संग्रह।
  • जयपुर में बड़े संगीत सम्मेलन का आयोजन –
    • अध्यक्ष – देवर्षि बृजपाल भट्ट।
  • ‘राधा–गोविन्द संगीत–सार’ की रचना।
  • संगीत–गुरु – चाँद ख़ाँ(बुद्ध प्रकाश की उपाधि प्रताप ने दी ) – ‘स्वर–सागर’ ग्रंथ।
  • काव्य–गुरु – गणपति भारती।
  • दरबार के 22 विद्वान – ‘गन्धर्व बत्तीसी / प्रताप बाईसी।
प्रमुख विद्वान –
  • राधाकृष्ण– ‘राग–रत्नाकर’।
  • पुण्डरीक विट्ठल – ‘नर्तन–निर्णय’, ‘राग–चन्द्रसूर’, ‘ब्रज–कलानिधि’।
  • बंशीधर भट्ट (महाराष्ट्र) – तमाशा लोक–नाट्य परम्परा की शुरुआत।
  • सवाई प्रतापसिंह का काल – जयपुर चित्रकला का स्वर्णकाल।

सवाईजगतसिंह द्वितीय (1803–1818 ई.) –

  • अंग्रेजों के साथ वैलेजली की सहायक संधि – दिसम्बर 1803।
  • 15 अप्रैल 1816 – लॉर्ड हेस्टिंग्स के साथ
  • अधीनस्थ–पार्थक्य (Subsidiary Alliance) की  संधि; उद्देश्य – मराठा व पिण्डारियों से सुरक्षा।
  • मारवाड़ शासक मानसिंह राठौड़ के साथ मेवाड़ की कृष्णा कुमारी विवाद में शामिल; 1807 का गिंगोली युद्ध।
  • वैश्या ‘रसकपूर’ के अत्यधिक प्रभाव के कारण बदनाम;
  • राजकोष लगभग खाली हो गया।
सवाई जयसिंह तृतीय (1818–1835 ई.) – 
  • शासन काल में अंग्रेज़ रेजीडेंट का प्रभाव अत्यधिक।
  • भट्टियानी रानी व रेजीडेंट के बीच तीव्र विवाद; दरबारी राजनीति प्रभावित।

सवाईरामसिंह द्वितीय (1835–1880 ई.)

  • नाबालिग अवस्था – प्रशासन ब्रिटिश संरक्षण में।
  • मेजर जॉन लुडलो – जनवरी 1843 से जयपुर प्रशासन में।
  • सामाजिक सुधार –
    • समाधि प्रथा पर प्रतिबंध।
    • सती प्रथा पर प्रतिबंध।
    • कन्या–वध पर रोक।
    • दास–प्रथा / मानव–व्यापार पर रोक।
  • 1857 की क्रांति में अंग्रेजों की सहायता;
    • बदले में ‘सितार–ए–हिन्द’ की उपाधि।
    • कोटपूतली परगना प्रदान।
शिक्षा व संस्थाएँ –
  • 1857 – ‘मदरसा–ए–हुनरी’ की स्थापना;
  • बाद में ‘राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट’(माधोसिंह द्वितीय द्वारा) बना।
  • 1844 – महाराजा कॉलेज, महारानी कॉलेज, संस्कृत स्कूल की स्थापना।
  • 1866 – कांतिचन्द मुखर्जी के सुझाव पर जयपुर का पहला कन्या–विद्यालय (राजस्थान का प्रथम)।
  • 1876 – पोथीखाना (राजकीय पुस्तकालय) निर्माण।
  • उत्तर भारत का प्रथम रंगमंच / सिनेमा – ‘रामप्रकाश थिएटर’ का निर्माण।
आगंतुक व स्थापत्य –
  • 1868 – प्रिंस ऑफ वेल्स (एडवर्ड पंचम) का आगमन; शहर को गुलाबी/गेरुआ रंग से पुतवाया, ‘Pink City’ की उपाधि मिली
    • (स्टेनली रीड – The Royal Town of India)।
  • 1870 – G.G. लॉर्ड मेयो की यात्रा।
  • दिसम्बर 1875 – G.G. लॉर्ड नॉर्थब्रुक का आगमन।
  • फरवरी 1876 – प्रिंस अल्बर्ट की यात्रा; स्मृति में ‘अल्बर्ट हॉल संग्रहालय’ व ‘रामनिवास बाग’ का निर्माण।
    • वास्तुकार – स्टीवन जैकब।
    • नींव – रामसिंह द्वितीय,
    • पूर्णता – माधोसिंह द्वितीय; शैली – हिन्दू + इस्लामिक + ईसाई।
  • रामगढ़ बाँध – बाणगंगा नदी पर (जयपुर की जल–आपूर्ति हेतु)।
  • कला–संस्कृति –
    • ब्लू–पॉटरी का उत्कर्ष।
    • जयपुर चित्रकला का ओर विकास हुआ।

सवाई माधोसिंह द्वितीय (1880–1922 ई.) – 

  • रामसिंह द्वितीय का दत्तक पुत्र
  • वास्तविक नाम – कायमसिंह (ईसरदा ठिकाने के ठाकुर का पुत्र)।
  • उपनाम – ‘बब्बर शेर’।
  • विदेश यात्रा व चाँदी के पात्र –
    • 1902 – इंग्लैण्ड में एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह में भाग।
    • अपने साथ गंगाजल से भरे दो विशाल चाँदी के पात्र ले गये।
    • ये पात्र आज सिटी पैलेस / चन्द्रमहल स्थित मुबारक महल में रखे हैं;
    • इन्हें दुनिया के सबसे बड़े चाँदी के पात्र (गिनीज रिकॉर्ड) माना जाता है।
  • डाक व डाक–टिकट –
    • 1904 – डाक–टिकट व पोस्ट–कार्ड सेवा शुरू करने वाली राजस्थान की पहली रियासत – जयपुर।
  • स्थापत्य व दान –
    • मुबारक महल – माधोसिंह द्वारा निर्मित (हिन्दू + ईसाई + इस्लामिक शैली)।
    • नाहरगढ़ पर नौ पासवानों के लिए समान नौ महल बनवाए।
    • BHU की स्थापना हेतु मदन मोहन मालवीय को लगभग 5 लाख रुपये की सहायता।

महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय (1922–1949 ई.)

  • माधोसिंह द्वितीय का दत्तक पुत्र
  • वास्तविक नाम – ‘मोर मुकुट सिंह (ईसरदा के ठाकुर सवाई सिंह का पुत्र)।
  • अंतिम कच्छवाहा शासक।
  • राजस्थान के प्रथम व अंतिम राजप्रमुख(1949–1956)।
  • शिक्षा –
    • मेयो कॉलेज, अजमेर।
    • रॉयल मिलिटरी अकादमी (इंग्लैण्ड)।
  • प्रधानमंत्री – मिर्ज़ा इस्माइल
  • ‘आधुनिक जयपुर का निर्माता’ कहा जाता है।
  • प्रमुख कार्य –
    • सिटी पैलेस संग्रहालय, जयपुर की स्थापना।
    • जयपुर का भारत संघ में विलय – 30 मार्च 1949 (वृहद राजस्थान)।
    • 1962 – राज्यसभा सदस्य निर्वाचित।
    • 1965 – ‘स्पेन’ में भारत के राजदूत नियुक्त।
    • SMS हॉस्पिटल, SMS स्टेडियम, SMS मेडिकल कॉलेज आदि उनके नाम से जुड़े।
  •  व्यक्तिगत जीवन –
    • विवाह – कूच बिहार की राजकुमारी गायत्री देवी से।
    • गायत्री देवी – 1962 में लोकसभा की पहली महिला सदस्य।
    • गायत्री देवी की मृत्यु – 29 जुलाई 2009 ई.
  • स्थापत्य –
    • पत्नी गायत्री देवी हेतु मोती डूंगरी पर अंग्रेजी शैली में ‘तख़्त–ए–शाही’ महलों का निर्माण।
  • निधन –
    • प्रसिद्ध पोलो खिलाड़ी थे।
    • 1970 ई. – लंदन में पोलो खेलते समय मृत्यु।

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