झालावाड़ का झाला वंश

झालावाड़ का झाला वंश राजस्थान का इतिहास में एक विशिष्ट स्थान रखता है, क्योंकि झालावाड़ राजस्थान की अंतिम रियासत के रूप में जाना जाता है। इस वंश के प्रमुख शासकों में झाला मदनसिंह (राजराणा) (1838–1845), राजराणा पृथ्वीसिंह (1845–1875), राजराणा जालिमसिंह द्वितीय (1875–1896), राजराणा भवानीसिंह (1899–1929), राजराणा राजेन्द्रसिंह (1929–1943) तथा राजराणा हरिश्चन्द्र (1943–1948) शामिल रहे। इन शासकों ने प्रशासन, न्याय व्यवस्था और क्षेत्रीय विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

झालावाड़ (राजस्थान की अंतिम रियासत)

  • राजधानी – राजधानी झालरापाटन थी, जिसे “घण्टियों का शहर” कहा जाता है।
  • झालरापाटन चन्द्रभागा नदी के किनारे स्थित है।
  • स्थापना (1831 ई.) – कोटा के शासक रामसिंह द्वितीय द्वारा 17/19 परगनों को मिलाकर नई रियासत की स्थापना की गई।
  • अप्रैल 1838 ई. में इस रियासत को अंग्रेजों द्वारा मान्यता दी गई।
  • झालावाड़ की अंग्रेजों से संधि कराई गई।
  • संधि की शर्तें –
    • झाला मदनसिंह को प्रथम शासक (राजराणा) के रूप में स्वीकार किया गया।
    • प्रतिवर्ष 80,000 रुपये ईस्ट इंडिया कम्पनी को देना अनिवार्य किया गया।
    • शासक को “राजराणा” की उपाधि प्रदान की गई।

झाला मदनसिंह (राजराणा) (1838–1845)

  • वह जालिमसिंह का पौत्र था।
  • वह झालावाड़ का प्रथम शासक बना।

राजराणा पृथ्वीसिंह (1845–1875) – 

  • 1857 की क्रान्ति में यह अंग्रेज-भक्त शासक था।
  • 1862 ई. में इसे गोद लेने का अधिकार प्रदान किया गया।
  • 1866 ई. में रेलवे लाइन निर्माण के लिए निःशुल्क भूमि प्रदान की गई।

राजराणा जालिमसिंह द्वितीय (1875–1896) – 

  • 1881 ई. में उसने ब्रिटिश सरकार के साथ “नमक समझौता” किया।
  • राज्य में नमक उत्पादन पर प्रतिबंध लगाया गया।
  • इस कारण अंग्रेजों से मतभेद उत्पन्न हो गए।
  • 1896 ई. में उसे सिंहासन से हटा दिया गया।
  • 1 जनवरी 1899 ई. को झालावाड़ के 15 परगने कोटा को लौटा दिए गए और राज्य का क्षेत्र छोटा कर दिया गया।

राजराणा भवानीसिंह (1899–1929) – 

  • 1901 ई. में ब्रिटिश कलदार सिक्के का प्रचलन प्रारम्भ किया।
  • नागदा–मथुरा रेलवे लाइन के निर्माण हेतु निःशुल्क भूमि प्रदान की।
  • 1911 ई. में दिल्ली दरबार में भाग लिया।
  • अपनी यूरोप यात्रा का विवरण ब्रिटिश साम्राज्य को समर्पित किया।

राजराणा राजेन्द्रसिंह (1929–1943)

  • मेयो कॉलेज तथा ऑक्सफोर्ड से शिक्षा प्राप्त की।
  • 1930 ई. के गोलमेज सम्मेलन में दर्शक के रूप में सम्मिलित हुए।
  • नरेन्द्र मण्डल (1921) के सक्रिय सदस्य रहे।
  • द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों का समर्थन किया।
  • “सुधारक” उपनाम से कविताएँ लिखता था।
  • राजकीय मंदिरों में हरिजनों को प्रवेश की अनुमति प्रदान की।
  • झालावाड़ में “काष्ठ प्रासाद” का निर्माण करवाया।

राजराणा हरिश्चन्द्र (1943–1948) – 

  • वह झालावाड़ का अंतिम शासक था।
  • उसने प्रजामण्डल आन्दोलन का समर्थन किया।
  • अक्टूबर 1947 ई. में उत्तरदायी शासन योजना लागू की।
  • उसने स्वयं प्रधानमंत्री पद संभाला।
  • मांगीलाल भव्य तथा कन्हैयालाल को मंत्री नियुक्त किया।
  • अंग्रेजों द्वारा स्थापित रियासतें
    • धौलपुर
    • टोंक
    • झालावाड़ (अंतिम)
  • नोट – शाहपुरा रियासत (1631 ई.)
    • बादशाह शाहजहाँ ने सुजानसिंह को शाहपुरा का स्वतंत्र राजा बनाया।
    • मेवाड़ राज्य को विभाजित कर नई रियासत की स्थापना की गई।
    • उस समय मेवाड़ का शासक राणा जगतसिंह द्वितीय था।
    • यह राजस्थान की सबसे छोटी रियासत थी।
    • सुजानसिंह, राणा अमरसिंह का पौत्र था।
    • वह फुलिया परगने का सामन्त था।
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