हाड़ौती का हाड़ा राजवंश राजस्थान का इतिहास का एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसमें बूँदी और कोटा के हाड़ा चौहान शासकों का विस्तृत वर्णन मिलता है। देवाजी से लेकर बहादुरसिंह तथा कोटा के महाराव माधोसिंह से भीमसिंह तक, इस राजवंश ने हाड़ौती क्षेत्र के राजनीतिक, सैन्य और प्रशासनिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हाड़ौती का हाड़ा राजवंश
बूँदी के हाड़ा चौहान
देवाजी (देवीसिंह हाड़ा) 1241 ई. –
- मीणाओं के सरदार जेता मीणा को पराजित कर बूँदी पर अधिकार। मेवाड़ के महाराणा की सहायता से विजय। इसी से हाड़ा वंश का बूँदी में शासन प्रारम्भ हुआ।
बरसिंह (1296–1323 ई.) –
- 1354 ई. में तारागढ़ दुर्ग का निर्माण कराया।
- तारागढ़ की ऊँचाई लगभग 1426 फीट।
- मांडू के महमूद खिलजी ने आक्रमण किए।
- बैरीसाल –
- महमूद खिलजी से युद्ध में वीरगति।
- बूँदी कुछ समय के लिए मालवा सल्तनत के अधीन चली गई।
- नारायणदास –
- बूँदी पर पुनः हाड़ा शासन स्थापित।
- राव सुरजन (1554–1585 ई) –
- रणथम्भौर का किलेदार नियुक्त।
- 1569 ई. में अकबर ने रणथम्भौर जीता। बदले में सुरजन को काशी क्षेत्र की जागीर मिली।
- राव भोज (1585–1607 ई.) –
- अकबर की सेवा में रहे।
- अहमदनगर अभियान में वीरता।
- बूँदी में निर्माण कार्य : बादल महल, फूल महल, हथिया साल, फूलसागर तालाब
- उनकी उपपत्नी फूललता ने झालो का तालाब बनवाया।
- राव रतन (1607–1631 ई.) –
- जहाँगीर के प्रिय सेनानायक।
- दक्षिण भारत अभियानों में भाग।
- निर्माण कार्य:- रतन दौलत खाना (दीवाने-आम), रतन विलास, खरबूजा महल, शहर का परकोटा
शत्रुशाल (1631–1658 ई.) –
- 52 युद्धों में भाग।
- सामूगढ़ युद्ध (1658) में वीरगति।
- प्रमुख निर्माण: – छत्र महल, चौगान दरवाज़ा, केशवराय पाटन का मंदिर
- दरबारी कवि: भूषण।
भावसिंह(1658–1682 ई.) –
- औरंगजेब की सेवा में। शिवाजी के विरुद्ध अभियानों में भाग।
- बूंदी में निर्माण: – मोती महल, फूलसागर फव्वारे
अनिरुद्धसिंह(1682–1695 ई.)
- दक्षिण में मराठों के विरुद्ध युद्धों में इन्होंने विशेष वीरता दिखायी और शाही बेगम (जहानज़ेब बानो बेगम) के शिविर को मराठों के हमले से बचाया, जिसके बदले बेगम ने स्वयं अपने गले की मोतियों की माला उन्हें भेंट की।
- इनके समय में अनिरुद्धसिंह महल का निर्माण कराया गया तथा इनकी विधवा रानी नाथावती ने बूंदी नगर में प्रसिद्ध “रानीजी की बावड़ी” (1700 ई.) बनवाई।
बुद्धसिंह (1695–1729 ई.) –
- औरंगज़ेब की मृत्यु (1707 ई.) के बाद मुगल उत्तराधिकार संघर्ष में इन्होंने शहज़ादा मुअज्ज़म (बहादुरशाह प्रथम) की तरफ से जजाऊ युद्ध में भाग लिया और बहादुरशाह की विजयों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- बहादुरशाह प्रथम ने उनकी सेवाओं से प्रसन्न होकर बुद्धसिंह को “महाराव राणा” की उपाधि तथा अतिरिक्त परगने जागीर में प्रदान किए।
- दलेल सिंह – (1729 -1748) –
उम्मेदसिंह (उम्मेदसिंह प्रथम) – ( 1748–1770 ई.) –
- महाराव राजा उम्मेदसिंह प्रथम ने 18वीं शताब्दी के मध्य में कई संघर्षों के बाद बूंदी पर पुनः स्वतंत्र शासन स्थापित किया।
- इन्होंने जयपुर, कोटा व मराठों की राजनीति के बीच संतुलन बनाते हुए बूंदी की गद्दी को बचाया और रामानुज सम्प्रदाय में दीक्षा लेकर वैष्णव परंपरा को राजाश्रय दिया।
- इनके काल में बूंदी दुर्ग में रंगनाथ जी और आनंदधन जी के मंदिरों की स्थापना करवाई गई तथा अपने राजचिह्न (मुहर) पर भी रंगनाथ का नाम अंकित करवाया।
- इन्होंने चित्रशाला महल बनवाकर बूंदी की चित्रकला को एक विशिष्ट राजकीय पहचान दी और नवल सागर तालाब सहित अनेक उद्यान और भवन बनवाए।
- लगभग 1770 ई. के आसपास इन्होंने वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण कर राजपाट अपने पुत्र अजीतसिंह को सौंप दिया और स्वयं केदारेश्वर एवं अन्य तीर्थों में साधु-जीवन व्यतीत किया।
- विष्णु सिंह (1804 -1831) –
- अंग्रेजों के साथ 1818 की सहायक संधि की ।
रामसिंह (1831–1889 ई.) –
- महाराव राजा रामसिंह 1804 से 1889 ई. तक लंबे समय तक बूंदी के शासक रहे और इनके समय को बूंदी की सांस्कृतिक पुनर्जागरण अवधि माना जाता है।
- इनके शासन काल में बूंदी नगर में लगभग 40 संस्कृत पाठशालाएँ चलती थीं, जिसके कारण बूंदी को “छोटी काशी” के नाम से प्रसिद्धि मिली।
- 1857 की क्रांति में अंग्रेजों का साथ नहीं दिया।
- ये अंग्रेज सरकार से सीधे संपर्क में रहे, लॉर्ड बेंटिक (1837) और लॉर्ड मेयो (1870) के अजमेर दरबारों में सम्मिलित हुए और ब्रिटिश नीति के साथ समन्वय बनाए रखा।
- इन्होंने बूंदी में फूलसागर के किनारे कुंड और महल, तथा तारागढ़ किले पर विशाल “भीम बुर्ज” का निर्माण कराया, जो आज भी बूंदी की सामरिक और स्थापत्य गरिमा का प्रतीक है।
- सूर्यमल्ल मीसण इनके समय के प्रसिद्ध कवि एवं इतिहासकार थे।
- रघुवीरसिंह (1889–1927 ई.) –
- इनके शासनकाल में बूंदी राज्य से होकर रेलवे लाइन निकली, जिससे बूंदी की आर्थिक व सैन्य दृष्टि से संपर्क-सुविधा बहुत बढ़ गई।
- ईश्वरीसिंह (1927–1945 ई.) –
- इनके काल में शहर के बाहर पहाड़ी काटकर नई परिक्रमा सड़क बनवाई गई, जिससे भारी वाहनों और यात्रियों को बिना शहर में घुसे ही गुजरने की सुविधा मिली।
- इनकी कोई संतान न होने के कारण इन्होंने कापरेन ठिकाने के बहादुरसिंह को गोद लिया और उत्तराधिकारी घोषित किया।
बहादुरसिंह (1945–1948 ई.) –
- महाराव राजा बहादुरसिंह बूंदी के अंतिम शासक रहे।
- इनका जन्म कापरेन ठिकाने में हुआ, शिक्षा मेयो कॉलेज (अजमेर), पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज (मुरादाबाद) तथा सैन्य प्रशिक्षण के बाद इन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी के रूप में भाग लिया।
- बर्मा मोर्चे पर मेकटिला (शा) की लड़ाई में असाधारण वीरता दिखाने पर इन्हें ब्रिटिश सरकार ने “मिलिट्री क्रॉस (Military Cross)” से सम्मानित किया – यह विरल सैन्य सम्मान है।
- स्वतंत्रता के बाद 25 मार्च 1948 को बूंदी राज्य का विलय संयुक्त राजस्थान (राजस्थान संघ) में हो गया और बहादुरसिंह ने राजसी अधिकारों की जगह संवैधानिक व्यवस्था स्वीकार की।
कोटा का हाड़ा राजवंश
प्रारंभिक स्थिति –
- प्रारंभ में कोटा, बूंदी राज्य का एक अंग था।
- राव भोज (1585–1607 ई.) ने अपने पुत्र हृदयनारायण को कोटा का शासक नियुक्त किया।
- इस नियुक्ति को मुगल सम्राट अकबर से स्वीकृति प्राप्त हुई।
- मुगल स्वीकृति के बाद कोटा का स्वतंत्र अस्तित्व स्थापित हुआ।
- राव रतन (बूंदी) के शासनकाल में भी हृदयनारायण बूंदी का अधीनस्थ रहा।
- खुर्रम के विद्रोह (1623 ई.) के दौरान सूसी के युद्ध में हृदयनारायण ने भाग लिया।
- इस कारण सम्राट जहाँगीर ने कोटा की जागीर छीन ली।
- बाद में राव रतन सिंह ने अस्थायी रूप से शासन संभालकर अपने पुत्र माधोसिंह को कोटा का राजा बनाया।
महाराव माधोसिंह (1631–1648 ई.)
- माधोसिंह कोटा का बूंदी से स्वतंत्र पहला शासक था।
- मुगल सम्राट शाहजहाँ ने उसे स्वतंत्र शासक के रूप में मान्यता दी।
- 1631 ई. में खाने-जहाँ लोदी के विद्रोह को दबाने में मुगलों की सहायता की।
- 1635 ई. में जुझारसिंह बुंदेला के विद्रोह को दबाने में मुगलों की सहायता की।
- मुगल सेना के कंधार अभियान में सहयोग किया।
- मुगल सेना के मध्य एशिया अभियानों में सहयोग किया।
- शाहजहाँ ने उसे “बाद-रफ्तार” नामक श्रेष्ठ घोड़े का पुरस्कार दिया।
महाराव मुकुन्दराव (1648–1658 ई.)
- “धरमत के युद्ध” में दाराशिकोह की ओर से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ।
- मुकुन्दरा (कोटा) में अपनी प्रेयसी अबली मीणी के लिए महल बनवाया।
- गागरोन स्थित मिट्ठे साहब की दरगाह को खड़िया गाँव की जागीर प्रदान की।
महा राव जगतसिंह (1653–1683 ई.)
- खजुवा के युद्ध में औरंगजेब के पक्ष में भाग लिया।
महाराव किशोरसिंह (1684–1696 ई.)
- किशोर सागर तालाब (कोटा) का निर्माण करवाया।
- जैन व्यापारी बघेरवाल ने चांदखेड़ी में भगवान आदिनाथ को समर्पित जैन मंदिर का निर्माण करवाया।
- पुनर्विवाह के समय छाली /छोली कर वसूली की प्रथा लागू की
रामसिंह प्रथम (1696–1707 ई.)
- आँवा के उत्तराधिकार युद्ध में विजय प्राप्त कर शासक बना।
- 1707 ई. में जजाऊ के युद्ध में आजम के पक्ष से लड़ते हुए मारा गया।
महाराव भीमसिंह (1707–1720 ई.)
- उपनाम – कृष्णदास था।
- बूंदी ने बहादुरशाह प्रथम के आदेश पर कोटा पर आक्रमण किया परंतु पराजित हुई।
- बूंदी का नाम “बूंदी फर्रुखाबाद” रखा गया।
- 1713 ई. में कोटा ने बूंदी पर आक्रमण कर राजकोष, धूलवाणी तोप और कड़क बिजली तोप पर अधिकार किया।
- सम्राट फर्रुखसियर से 5000 का मनसब प्राप्त किया।
- राणा अमरसिंह द्वितीय से “महाराव” की उपाधि प्राप्त की।
- कुरवई के युद्ध (1720 ई.) में सैयद बंधुओं के पक्ष में निजाम से लड़ते हुए मारा गया।
- वल्लभ सम्प्रदाय का अनुयायी था।
- कोटा का नाम “नंदगाँव” रखा।
- शेरगढ़ का नाम “बरसाना” रखा।
- निर्माण – भीमविलास, भीमगढ़ दुर्ग, ब्रजनाथजी मंदिर, आशापुराजी मंदिर, सांवरियाजी मंदिर (बारां)।
अर्जुनसिंह (1720–1723 ई.)
- अल्पकालीन शासन किया।
महाराव दुर्जनशाल (1723–1756 ई.)
- उदयपुरया के युद्ध में भाई श्यामसिंह को पराजित कर शासक बना।
- कोटा में मराठा प्रभाव स्थापित किया।
- कोटा से मुगल प्रभाव समाप्त किया।
- दीवान – झाला हिम्मतसिंह।
- पुत्र – झाला जालिमसिंह।
अजीतसिंह (1757 ई.)
- अल्पकालीन शासन।
महाराव शत्रुशाल (1757–1764 ई.)
- भटवाड़ा का युद्ध 1761 ई. में हुआ।
- झाला जालिमसिंह के नेतृत्त्व में कोटा की सेना ने जयपुर के शासक सवाई माधोसिंह को पराजित किया।
- इस समय झाला जालिमसिंह का प्रशासनिक प्रभाव अत्यधिक बढ़ा।
- उपनाम – “कोटा राज्य का दुर्गादास राठौड़”।
महाराव गुमानसिंह (1764–1770 ई.)
- झाला जालिमसिंह को कोटा से निष्कासित किया।
- नान्ता की जागीर जब्त की।
- मराठा वकील लालाजी बलाल की सहायता ली।
- पुत्र उम्मेदसिंह को संरक्षक नियुक्त किया।
महा राव उम्मेदसिंह (1770–1819 ई.)
- झाला जालिमसिंह की निरंकुश शक्ति चरम पर पहुँची।
- 1817 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि कर अधीनता स्वीकार की।
महाराव किशोरसिंह (1819–1828 ई.)
- मांगरोल (बारां) का युद्ध 1 अक्टूबर 1821 ई. को हुआ।
- युद्ध में झाला जालिमसिंह, अंग्रेज तथा किशोरसिंह सम्मिलित थे।
- किशोरसिंह पराजित हुआ और नाथद्वारा चला गया।
- कोटा को श्रीनाथजी को समर्पित किया।
- राणा भीमसिंह (मेवाड़) की मध्यस्थता से दिसंबर 1821 ई. में पुनः कोटा लौटा।
- 1824 ई. में झाला जालिमसिंह की मृत्यु हुई।
- उसके पुत्र माधोसिंह को कोटा का फौजदार (1824–1833) नियुक्त किया गया।
रामसिंह द्वितीय (1828–1865 ई.)
- 1837 ई. में अंग्रेजों ने कोटा से 17/19 परगने अलग कर झालावाड़ रियासत की स्थापना की।
- झाला मदनसिंह को झालावाड़ का शासक बनाया।
- 1838 ई. में अंग्रेजों से औपचारिक मान्यता प्राप्त हुई।
- 1857 की क्रांति में जयदयाल व मेहराब खां के साथ मिलकर जनता ने रामसिंह द्वितीय को नजरबंद किया।
- मेजर बर्टन की रक्षा न कर पाने पर तोपों की सलामी 17 से घटाकर 13 कर दी गई।
महाराव शत्रुशाल द्वितीय (1865–1888 ई.)
- इस काल में अंग्रेजों का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया।
- शासक केवल नाममात्र का रह गया।
- वास्तविक सत्ता अंग्रेजों के कृपापात्र फैजल अली के हाथों में रही।
- फैजल अली को तोपों की सलामी प्राप्त थी।
- उपनाम – “कोटा का दूसरा झाला जालिमसिंह”।
उम्मेदसिंह द्वितीय (1888–1940 ई.)
- कोटड़ा जागीरदार छगन सिंह का पुत्र था।
- मेयो कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की।
- 1896 ई. में शासन संबंधी अधिकार प्राप्त हुए।
- 1 जनवरी 1899 को 17 में से 15 परगने पुनः कोटा में मिला दिए गए।
- इनके शासनकाल में लॉर्ड कर्जन कोटा आया।
- कोटा राज्य का आधुनिकीकरण हुआ।
- अंग्रेजों के प्रति पूर्णतः वफादार शासक रहा।
महाराव भीमसिंह (1940–1948 ई.)
- कोटा का अंतिम शासक था।
- 25 मार्च 1948 ई. को कोटा को संयुक्त राजस्थान की राजधानी बनाया गया।
- महाराव भीमसिंह को राजप्रमुख नियुक्त किया गया।
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