गुर्जर प्रतिहार राजवंश का इतिहास राजस्थान में मध्यकालीन शक्ति संरचनाओं का महत्वपूर्ण भाग है। राजस्थान का इतिहास इस राजवंश के योगदान और उनके राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभावों को उजागर करता है। गुर्जर प्रतिहारों ने राजस्थान और उत्तर भारत में अपनी सैन्य और प्रशासनिक क्षमता के माध्यम से अपना अधिकार स्थापित किया।
गुर्जर प्रतिहार राजवंश
- गुर्जर प्रतिहार 6वीं–12वीं सदी तक उत्तर भारत के सर्वाधिक शक्तिशाली राजवंशों में से एक रहे।
- इन्होंने लगभग दो शताब्दियों तक उत्तर–पश्चिम से होने वाले अरब–तुर्क आक्रमणों को रोके रखा । इसी कारण इन्हें “भारत की ढाल” कहा जाता है।
- प्रथम स्पष्ट लेखीय उल्लेख – चालुक्य राजा पुलकेशिन–II के दरबारी जैन कवि रविकीर्ति द्वारा रचित ऐहोल अभिलेख में।

- मुख्य क्षेत्र – गुर्जरात्रा (राजस्थान व गुजरात की सीमा वाला भू–भाग), बाद में अवन्ती (उज्जैन) और कन्नौज।
- अर्थ – “प्रतिहार” = द्वारपाल; प्रारम्भ में सामन्त/द्वारपाल रहे, बाद में स्वतंत्र शासक बने।
उत्पत्ति व निवास स्थान: –
- नीलकुण्ड, राधनपुर, देवली, करडाह अभिलेखों मे प्रतिहारों को गुर्जर कहा गया है।
- स्कन्द पुराण में ‘पंच द्रविड़ों’ मे शामिल हैं।
- पूर्व मध्यकाल में आए अरब यात्री इन्हें जुर्ज या अल-गुर्जर कहते है, वही चीनी यात्री हवेनसांग इन्हें कू-चे-लो (गुर्जर) कहता है।
- ग्वालियर प्रशस्ति (मिहिर भोज) – नागभट्ट को राम के प्रतिहार अर्थात् लक्ष्मण का वंशज कहा गया है।
गुर्जर प्रतिहार उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में मत
| मत | विद्वान |
| ईरानी मूल के | कनेडी |
| शक व यूची जाति के वंशज | अलेक्ज़ैंडर कन्निंघम |
| हूणों के वंशज | स्मिथ, ब्यूलर, हर्नले |
| विदेशी गुर्जर जाति के | भण्डारकर |
| भारतीय मूल के | डॉ. गोपीनाथ शर्मा, दशरथ शर्मा, K.M. मुंशी |
जोधपुर व घटियाला शिलालेख-
- इनका मूल निवास स्थान गुर्जरात्रा (प. राज.) को माना।
- एच.सी.रे ने मूल स्थान मण्डौर (जोधपुर) को बताया।
- अमोघवर्ष (राष्ट्रकूट) के संजन ताम्रपत्र- उज्जैन के प्रतिहार (द्वारपाल)
- ज्यादातर विद्ववान इसका मूल निवास स्थान – अवंति (उज्जैन) को ही मानते है।
प्रतिहारों की शाखाएं
- नैणसी ने 26 शाखाओं का वर्णन किया है –
| शाखाएं | संस्थापक |
| मण्डौर सबसे प्राचीन | हरिश्चन्द्र |
| जालौर / भीनमाल | नागभट्ट- I / नाहड़ |
| राजोरगढ़ | मंथनदेव |
| कन्नौज | नागभट्ट – II |
| उज्जैन | नागभट्ट – I |
| मेड़ता | नागभट्ट – I |
| भड़ौच | दद्द / दद्ध |
मण्डोर के प्रतिहार
मण्डोर के प्रतिहार – सबसे प्राचीन शाखा
- जानकारी के स्रोत –
- जोधपुर शिलालेख
- घटियाला (कक्क) के 2 शिलालेख – 836 ई.
- संस्थापक – हरिश्चन्द्र (रोहिलासिद्ध)
- घटियाला अभिलेख के अनुसार इनकी दो पत्नियाँ थीं।
- ब्राह्मणी रानी से उत्पन्न संतान ब्राह्मण प्रतिहार कहलायी।
- क्षत्रिय रानी भद्रा से उत्पन्न संतान –
- भोगभट्ट, कद्दल, रज्जिल, दह – चारों क्षत्रिय प्रतिहार कहलाये।
- हरिश्चन्द्र व उनके चारों पुत्रों ने मिलकर मण्डोर (माण्डव्यपुर) को जीतकर अपनी राजधानी बनाई।
रज्जिल
- मण्डोर के प्रतिहारों की वंशावली रज्जिल से प्रारम्भ होती है।
- रज्जिल का पोता नागभट्ट इस वंश का प्रथम पराक्रमी शासक था।
- नागभट्ट ने मण्डोर से अपनी राजधानी मेड़ता स्थानान्तरित की।
- नागभट्ट का पुत्र तात मण्डोर में ही एक संन्यासी के रूप में रहा।
शीलूक (10वीं पीढ़ी का शासक)
- शीलूक की दो रानियाँ थीं – रानी पद्मिनी एवं रानी दुर्लभ देवी।
- रानी पद्मिनी से पुत्र बाउक उत्पन्न हुआ।
- रानी दुर्लभ देवी से पुत्र कक्कुक उत्पन्न हुआ।
बाउक
- बाउक ने 837 ई. की जोधपुर प्रशस्ति में अपने वंश का विस्तृत वर्णन करवाया।
कक्कुक
- बाउक के पश्चात उसका भाई कक्कुक शासक बना।
- कक्कुक ने घटियाला का शिलालेख (861 ई.) उत्कीर्ण करवाया।
- कक्कुक ने घटियाला तथा मण्डोर में जयस्तम्भ भी स्थापित करवाये।
- कक्कुक के पश्चात मण्डोर-प्रतिहारों के सम्बन्ध में प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती।
सहजपाल चौहान का मण्डोर अभिलेख – 1145 ई.
- इस अभिलेख से यह जानकारी मिलती है कि 12वीं शताब्दी के मध्य मण्डोर पर चौहान शासकों का प्रभुत्व स्थापित हो गया था।
- इसके बावजूद मण्डोर पर इन्दा शाखा के प्रतिहारों का अधिकार बना रहा।
- 1395 ई इन्दा शाखा के प्रतिहार हम्मीर परिहार के अनवरत आक्रमणों से परेशान हो गये।
- प्रतिहारों ने मण्डोर के दुर्ग को चूण्डा (राव वीरम राठौड़ के पुत्र) को दहेज में दे दिया।
- इसके बाद मण्डोर पर राठौड़ों का आधिपत्य स्थापित हो गया।
जालौर–उज्जैन–कन्नौज प्रतिहार एवं साम्राज्य विस्तार
सुवर्णगिरि जालौर दुर्ग
- जालौर दुर्ग का निर्माण मूल रूप से 8वीं शताब्दी में गुर्जर-प्रतिहार शासक नागभट्ट–I के समय माना जाता है।
- इस दुर्ग का प्राचीन नाम “सुवर्णगिरि” था।
- यह दुर्ग अरावली पर्वतमाला की एक ऊँची चट्टानी पहाड़ी पर स्थित है।
- दुर्ग सामरिक दृष्टि से मारवाड़–गुजरात–मालवा मार्ग को नियंत्रित करने वाला प्रमुख किला था।
- जालौर दुर्ग के प्रचलित नाम (उपनाम) – सुवर्णगिरि, सोनगढ़, जलालाबाद (मुस्लिम काल में), कांचनगिरि (स्वर्णिम चट्टानों के कारण)
- दुर्ग के प्रमुख दर्शनीय स्थल –
- आशापुरा माता मंदिर – यह जालौर दुर्ग का सबसे प्राचीन व प्रमुख शक्तिपीठ है।
- मल्लिक शाह की दरगाह – मुस्लिम काल का स्मारक।
- तोपखाना मस्जिद – इसे पहले भोज परमार द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला माना जाता है, जिसे बाद में मस्जिद में परिवर्तित किया गया।
- मानसिंह का महल – राजपूत शासकों का निवास स्थान।
- रानी का महल – राजपरिवार की महिलाओं का निवास।
- दुर्ग में प्राचीन जल-संचयन टांके, प्राचीरें और बुर्ज भी स्थित हैं।
जालौर, उज्जैन व कन्नौज के गुर्जर–प्रतिहार
- ये तीनों मण्डोर के प्रतिहारों से घनिष्ठ रूप से संबंधित थे।
- डॉ. ओझा के अनुसार –
- 739 ई. में चावड़ा राजपूतों से भीनमाल छीना गया।
- इसके बाद आबू, जालौर व उज्जैन पर अधिकार किया गया।
- उज्जैन को राजधानी बनाया गया।
- बाद में कन्नौज जीतकर उसे भी राजधानी बनाया गया।
नागभट्ट – I (730–760 ई.)
- जालौर, उज्जैन एवं कन्नौज के प्रतिहार वंश का संस्थापक था।
- इसका दरबार “नागावलोक का दरबार” कहलाता था।
- इसके सामन्त गुहिल, चौहान, परमार, राठौड़, चन्देल, कलचुरी, चालुक्य आदि थे।
- अरब लेखक अल–बलादुरी के अनुसार इसने सिन्ध गवर्नर जुनेद को पराजित कर अरबों को सिन्ध से बाहर खदेड़ दिया।( इस की पुष्टि नौसरी ताम्रपत्र से भी होती हैं)
- इसके उपनाम – नागावलोक, नारायण तथा मलेच्छों का नाशक थे।
- ग्वालियर प्रशस्ति (भोज) में इसे “मलेच्छों का नाशक नारायण” कहा गया।
- राष्ट्रकूट शासक दन्तिदुर्ग ने उज्जैन में हिरण्यगर्भ यज्ञ किया और नागभट्ट – I को वहाँ प्रतिहार (द्वारपाल) नियुक्त किया।
- डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार इसने जालौर दुर्ग, सुवर्णगिरि, सोनगढ़, जाबालिपुर, जलालाबाद व कांचनगिरि दुर्ग का निर्माण करवाया।
- साका – 1311 ई.
- अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय कान्हड़देव व जैतलदे का बलिदान हुआ।
कक्कुक (ककुस्थ) – 760–783 ई.
- देवराज ने भी शासन किया था।
- यह नागभट्ट – I का भतीजा था।
देवराज
- यह ककुस्थ का छोटा भाई था।
वत्सराज (783–795 ई.)
- यह शैव मत का अनुयायी था।
- इसकी उपाधियाँ – सम्राट एवं रणहस्तिन थीं।
- इसके दरबारी विद्वान उद्योतनसूरि (कुवलयमाला) तथा जिनसेन (हरिवंशपुराण) थे।
- इसने ओसियां में महावीर स्वामी (जैन) मंदिर का निर्माण करवाया। (पश्चिम भारत का प्राचीनतम जैन मंदिर )
- इसी के समय कन्नौज को लेकर त्रिपक्षीय संघर्ष की शुरुआत हुई।
- इस संघर्ष में गुर्जर प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूट तीन शक्तियाँ थीं।
- वत्सराज ने पाल शासक धर्मपाल को दोआब के युद्ध में पराजित किया।
- राष्ट्रकूट शासक ध्रुव से पराजित होकर इसे जाबालिपुर लौटना पड़ा।
- अंततः इस संघर्ष में अंतिम विजय नागभट्ट – II की हुई।
नागभट्ट – II (795–833 ई.)
- यह प्रथम प्रतिहार शासक था जिसने कन्नौज को अपनी राजधानी बनाया।
- बुचकला अभिलेख (815 ई.) में इसने परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की।
- इसके सामन्त गुवक – I ने सिन्ध गवर्नर बेगवारिस को पराजित किया।
- इसने पुष्कर के घाटों का निर्माण करवाया।
- 833 ई. में इसने गंगा नदी में जल समाधि ली।
रामभद्र (833–836 ई.)
- इसके शासनकाल को प्रतिहार शक्ति का ह्रास काल माना जाता है।
मिहिरभोज / भोज – I (836–885 ई.)
- यह प्रतिहार वंश का सबसे प्रतापी शासक था।
- पिता – रामभद्र, माता – अप्पा देवी।
- इसकी उपाधियाँ – परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर, आदिवराह (ग्वालियर अभिलेख) तथा प्रभास (दौलतपुर अभिलेख) थीं।
- अरब यात्री सुलेमान इसके शासनकाल में भारत आया।
- सुलेमान ने भोज को “इस्लाम का शत्रु” कहा तथा उसके साम्राज्य की प्रशंसा की।
- स्कन्ध पुराण के अनुसार भोज ने सिंहासन त्यागकर अपने पुत्र महेंद्र को सौपा।
- मिहिरभोज / भोज–I (836–885 ई.) के सामन्त राजा –
- बाउक – मण्डोर (जोधपुर क्षेत्र) 837 ई. की जोधपुर प्रशस्ति
- हर्षराज – गुहिल वंश (मेवाड़ क्षेत्र) (चाकसू अभिलेख (813 ई.) में उल्लेख।)
- कलचुरि – गुणामबोधि देव
- कांलिजर शासक – जयशक्ति चंदेल
महेन्द्रपाल – I (885–910 ई.)
- महेन्द्रपाल–I के गुरु तथा दरबारी विद्वान – राजशेखर थे।
- राजशेखर की प्रमुख रचनाएँ – कर्पूरमंजरी, काव्यमीमांसा, बालभारत, बालरामायण, विद्धसालभज्जिका, हरविलास, प्रचण्ड पाण्डव एवं भुवनकोष।
- राजशेखर द्वारा दी गई उपाधियाँ – रघुकुलचूडामणि, निर्भयराज, निर्भयनरेन्द्र।
- अन्य राजकीय उपाधियाँ – परमभट्टारक, परमभागवत, महाराजाधिराज, परमेश्वर।
भोज – II (910–913 ई.)
- भोज–II के समय उत्तराधिकार युद्ध प्रारम्भ हुआ।
- बिल्हरी अभिलेख के अनुसार भोज–II को कन्नौज के सिंहासन पर बैठाने में कोक्कलदेव–I (चेदि सामन्त) ने सहायता की।
महिपाल – I (913–943 ई.)
- खजुराहो अभिलेख के अनुसार क्षितिपालदेव (महिपाल–I) ने अपने भाई भोज–II को पराजित किया।
- महिपाल–I के राजगुरु व दरबारी विद्वान – राजशेखर थे।
- राजशेखर द्वारा दी गई उपाधियाँ –
- आर्यावर्त का महाराजाधिराज तथा रघुकुलमुकुटमणि।
- राष्ट्रकूट नरेश इन्द्र–III ने मालवा पर आक्रमण कर उज्जैन पर अधिकार कर लिया तथा यमुना नदी पार कर महोदय नगर (कन्नौज) राजधानी को नष्ट कर दिया।
- गुहिल सामन्त भट्ट ने राष्ट्रकूट शासक गोविन्द–IV को पराजित किया। (चाटसू अभिलेख, 813 ई.)
- अरब यात्री अल–मसूदी ने प्रतिहार–राष्ट्रकूट संघर्ष की पुष्टि की।
- अल–मसूदी के अनुसार बऊर (महिपाल–I) और बल्हर (राष्ट्रकूट) के बीच गहरी शत्रुता थी।
- अल–मसूदी 915 ई. में भारत आया था।
- महिपाल–I के उत्तराधिकारी
- महेन्द्रपाल – II (945–948 ई.)
- देवपाल (948–949 ई.)
- विनायकपाल (953–954 ई.)
- महिपाल – II (955–960 ई.)
- विजयपाल (960–990 ई.)
राज्यपाल (990–1019 ई.)
- इसी के समय महमूद गजनवी ने कन्नौज पर 1018–1019 ई. में दो बार आक्रमण किया।
त्रिलोचनपाल (1019–1027 ई.)
यशपाल (1027–1093 ई.)
- 1093 ई. में इसके सामन्त गहड़वाल नरेश चन्द्रदेव ने प्रतिहारों से कन्नौज छीन लिया।
- इस घटना के बाद कन्नौज में एक स्वतंत्र नवीन “गहड़वाल वंश” की स्थापना हुई
गुर्जर प्रतिहार राजवंश / गुर्जर प्रतिहार राजवंश / गुर्जर प्रतिहार राजवंश
