चौहान राजवंश राजस्थान इतिहास का एक प्रमुख और गौरवशाली अध्याय है, जिसने मध्यकालीन भारत की राजनीति और संस्कृति को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया। राजस्थान इतिहास के संदर्भ में चौहान शासकों की वीरता, प्रशासनिक क्षमता और सांस्कृतिक योगदान आज भी प्रेरणादायक माने जाते हैं।
चौहान राजवंश
चौहान वंश की उत्पत्ति – चौहान वंश राजस्थान के प्रमुख राजवंशों में से एक था, जिसका प्रारम्भिक क्षेत्र जांगलदेश तथा शाकम्भरी (सांभर) के आसपास का इलाका माना जाता है। इनका उद्भव सपादलक्ष नामक भू-भाग में माना जाता है और प्रारम्भिक राजधानी अहिच्छत्रपुर (नागौर) थी।
- सूर्यवंशी उत्पत्ति मत –
- कुछ प्राचीन ग्रंथ चौहान वंश को सूर्यवंशी क्षत्रियों का वंशज बताते हैं।
- हम्मीर महाकाव्य — नरपति नन्दन सूरी
- हम्मीर रासो — जोधराज
- पृथ्वीराज विजय — जयानक
- कुछ प्राचीन ग्रंथ चौहान वंश को सूर्यवंशी क्षत्रियों का वंशज बताते हैं।
- समर्थक विद्वान: –
- पं. गौरीशंकर हीराचंद ओझा
- चन्द्रवंशी उत्पत्ति मत –
- कुछ अभिलेख चौहानों को चन्द्रवंश से संबंधित बताते हैं।
- हांसी अभिलेख (हरियाणा)
- अचलेश्वर (आबू) शिलालेख
- कुछ अभिलेख चौहानों को चन्द्रवंश से संबंधित बताते हैं।
- ब्राह्मण वंशीय उत्पत्ति मत –
- कुछ ऐतिहासिक अभिलेख चौहानों को ब्राह्मण गोत्र से उत्पन्न बताते हैं, जो बाद में क्षत्रिय बने।
- बिजौलिया अभिलेख — “विप्र श्रीवत्स गोत्र”
- कुछ ऐतिहासिक अभिलेख चौहानों को ब्राह्मण गोत्र से उत्पन्न बताते हैं, जो बाद में क्षत्रिय बने।
- समर्थक विद्वान: –
- डॉ. दशरथ शर्मा
- कवि जान (कायमखानी रासौ)
सांभर /अजमेर के चौहान
वासुदेव चौहान (लगभग 551 ईस्वी) –
- चौहान वंश का प्रारम्भिक व वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
- 551 ईस्वी में नागौर (अहिच्छत्रपुर) में राज्य स्थापित।
- सांभर में राजधानी स्थापित।
- विदेशी विधर्मी जातियों से दीर्घ संघर्ष में विजय।
- जनता ने वासुदेव को विष्णु का अवतार मानकर सम्मान दिया।
- शाकम्भरी देवी को कुलदेवी माना।
- सांभर में नमक की झील का निर्माण करवाया।
- वंश का पुनः उत्थान व विस्तार वासुदेव से प्रारंभ माना जाता है।
- बिजौलिया शिलालेख (1170 ई., उत्कीर्णकर्ता: लोलाक)
- वासुदेव को राजस्थान का प्रथम राजपूत शासक कहा गया।
- सांभर झील निर्माण का उल्लेख।
- शाकम्भरी देवी मंदिर निर्माण का उल्लेख।
सामन्तराज (684–709 ई.) —
- वासुदेव के बाद पु्ष्यभूति वंश (थानेश्वर व कन्नौज शासक) का उत्कर्ष हुआ, इसलिए 551–684 ई. के बीच चौहानों का उल्लेख कम मिलता है।
- वासुदेव के लगभग 125 वर्ष बाद सामन्तराज ने सत्ता संभाली और चौहान वंश को पुनः सुदृढ़ किया।
- कर्नल टॉड ने सामन्तराज को “माणक्य राय” कहा है।
- सामन्तराज के बड़े भाई दूलाराज ने अरब आक्रमणकारियों से युद्ध में वीरगति पाई।
- 684 ई. में सामन्तराज ने सांभर पर पुनः अधिकार स्थापित किया।
- सामन्तराज ने राज्य का विस्तार किया, जिसके कारण अनेक सामंतों ने उसकी अधीनता स्वीकार की।
- इस तथ्य की पुष्टि बिजौलिया शिलालेख व पृथ्वीराज विजय से होती है।
नरदेव या पूर्णतल्ल (709 ई.) –
- बीजौलिया शिलालेख में इस शासक का नाम “नृप” लिखा मिलता है।
- पृथ्वीराज विजय ग्रंथ में इस शासक का नाम नहीं ।
अजयराज प्रथम / अजयपाल चक्री (लगभग 721–734 ई.) —
- उपनाम / अन्य नाम: अजयपाल चक्री
- कई युद्धों में विजय प्राप्त कर चक्रवर्ती पद धारण किया।
- अजयमेरु (अजमेर) व अजयमेरु दुर्ग (तारागढ़) का निर्माण इन्हीं ने करवाया।
- अखबार-उल-अखबार अनुसार भारत में पर्वत पर बनने वाले दुर्गों में यह सर्वप्रथम था।
- पृथ्वीराज विजय में संदर्भित अजयराज (बारहवीं शताब्दी) अलग है; परन्तु छत्रियों व जैन लेखों से सिद्ध होता है कि मूल बसावट अजयराज प्रथम से संबंधित है।
- श्री हरबिलास शारदा: छत्रियों व लेखों के आधार पर अजमेर की बसावट का श्रेय अजयराज प्रथम को।
- आज भी अजयबांबा नाम से उनका स्मारक व पूजा स्थल स्थित।
चन्द्रराज प्रथम और गोपेन्द्रराज
- विग्रहराज प्रथम के पुत्र
- प्रबंध कोष के अनुसार गोपेन्द्रराज ने बेग वरिश को हराया था।
- अरब विस्तार रोका → सांस्कृतिक व सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण
- प्रतिहार–चाहमान गठबंधन
दुर्लभराज प्रथम (784–809 ई.)
- चन्द्रराज का पुत्र व गोपेन्द्रराज का उत्तराधिकारी
- उपाधि: गौड़ रसास्वाद (पृथ्वीराज विजय)
- गंगासागर तक विजय, तलवार को गंगासागर में स्नान करवाया।
- बंगाल क्षेत्र में चौहान प्रभाव की शुरुआत
- प्रतिहार वत्सराज के काल में सामन्त प्रतिहारों का सामंत।
गुवक प्रथम / गोविन्दराज (809–836 ई.)
- उपनाम: गोविन्दराज।
- हर्ष शिलालेख में इसका उल्लेख मिलता है।
- उपाधि: प्रसिद्धवीर की उपाधि प्रतिहार नागभट्ट द्वितीय ने प्रदान की।
- सी. वी. वैद्य के अनुसार यह स्वतंत्र सम्राट था।
गुवक द्वितीय (863–890 ई.)
गुवक द्वितीय चन्द्रराज का पुत्र था, जिसने स्वयंवर आयोजित कर 12 सामंतों को बुलाया और अपनी बहन कलावती का विवाह कन्नौज के सम्राट भोज प्रथम से किया।
चन्द्रराज द्वितीय (836–863 ई.)
- उपनाम: शशिनृप ।
- वंशक्रम: गुवक द्वितीय का पुत्र।
- उल्लेख: पृथ्वीराज विजय में इसे वीर योद्धा कहा गया।
- सैन्य उपलब्धि: दिल्ली के तंवर राजा रुद्र (रूद्रदत्त/रूद्रदेव) को युद्ध में हराकर मौत के घाट उतारा(हर्ष शिलालेख के अनुसार)।
- धार्मिक कार्य: महारानी रुद्राणी (आत्मप्रभ) ने पुष्कर में 1000 शिवलिंगों की स्थापना करवाई।
वाक्पतिराज प्रथम
- उपनाम – वाक्पति , महारानी इन्द्राणी का पुत्र
- 188 युद्धों में विजय प्राप्त करने वाला (पृथ्वीराज विजय)।
- प्रतिहार सामंत तन्त्रपाल को हराकर बंदी बनाया।
- मांडलगढ़ व बीजौलिया को अपने राज्य में मिलाया।
- पुष्कर में शिव मंदिर का निर्माण करवाया।
सिंहराज
- नाडौल शाखा के संस्थापक लक्ष्मण का भाई
- तंवर राजा को हराकर बंदी बनाया।
- चारों दिशाओं में विजय प्राप्त करने वाला(हर्ष लेख)।
- अरब सेनापति हैतिम से संघर्ष (हम्मीर महाकाव्य)
- महाराजाधिराज की उपाधि धारण की। वास्तविक प्रथम स्वतंत्र शासक।
- हर्ष नाथ मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ किया।
- विग्रहराज द्वितीय—गुजरात के चालुक्य मूलराज(हम्मीर महाकाव्य के अनुसार युद्ध में मारा गया) को हराया, भृगुकच्छ में आशापुरा मंदिर और हर्ष मंदिर हेतु गाँव दान।
- दुर्लभराज द्वितीय (998–1012 ई.) — रतिसिंहन’ (रोहतक क्षेत्र) देश को जीतकर राज्य में मिलाया ।
- गोविन्दराज द्वितीय (1012–1026 ई.) – प्रबंध कोष के अनुसार महमूद ग़ज़नवी को पराजित किया।
- वाक्पतिराज द्वितीय (1026–1040 ई.) – इसने आहड़ के समीप उदयपुर प्रदेश में गुहिलोत शासक अम्बा प्रसाद (युद्ध में मृत्यु)पर आक्रमण किया। चाहमानों और मेवाड़ (गुहिलोत वंश) के बीच पहली प्रमुख भिड़ंत।
- वाक्पतिराज द्वितीय के बाद क्रमशः वीर्याराम (1040 ई.) , चामुण्डराज(1040–1065 ई.) , दुर्लभराज तृतीय (वीरसिंह) (1065–1070 ई.) , विग्रहराज तृतीय (1070–1090 ई.) , पृथ्वीराज प्रथम (1090–1110 ई.) ने शासन किया ।
अजयराज द्वितीय (1110–1135 ई.) —
- सैन्य उपलब्धियाँ –
- मालवा के सम्राट सुल्हण / नरवर्मन के सेनापति को युद्ध में हराकर कैद किया।
- धार्मिक व प्रशासनिक कार्य –
- अजमेर में बड़ी टकसाल स्थापित की जिस ने चाँदी व ताँबे के सिक्के जारी किए।
- ये सिक्के मथुरा तक प्रचलित रहे।
- सिक्कों पर एक ओर घोड़े पर सम्राट का चित्र, दूसरी ओर साम्राज्ञी सोमलदेवी का नाम।
- पत्नी सोमलेखा / सोमलदेवी नें स्वयं भी सिक्के चलवाए (चाँदी व ताँबा)।
- अजमेर का विस्तार – अजमेर नगर उससे पहले बसा था, पर इन्होंने उसका विस्तार किया।
- राजत्याग – पुत्र अर्णोराज को गद्दी सौंपकर स्वयं पुष्कर में धर्म–सन्यास हेतु चले गए।
अर्णोराज –
- इन्होंने अजमेर में 1137 ई. में आनासागर झील का निर्माण करवाया।
- इन्होंने चालुक्य शासक जयसिंह की पुत्री कांचन देवी से विवाह किया था।
- गुजरात के चालुक्य शासक कुमारपाल ने अर्णोराज को माउण्ट आबु के निकट युद्ध में पराजित किया था।
- अर्णोराज ने पुष्कर में वराह मंदिर का निर्माण करवाया।
- इनके प्रमुख दरबारी विद्वानों में देवबोध तथा घर्मघोष का नाम मिलता है।
- अर्णोराज की हत्या उनके पुत्र जगदेव के द्वारा कर दी गई।

विग्रहराज चतुर्थ / बीसलदेव चौहान (1158–1163 ई.) —
- अर्णोराज का पुत्र; 1158 ई. में अपने भाई जगदेव को पराजित कर अजमेर का शासन प्राप्त किया।
- दिल्ली के तोमर शासक तंवर को पराजित कर दिल्ली को राज्य में मिलाया — चौहान वंश का प्रथम जिसने दिल्ली पर अधिकार किया।
- दिल्ली विजय के बाद “विग्रहराज चतुर्थ” की उपाधि ग्रहण की।
- कुमारपाल के सामंत सज्जन को हराकर चित्तौड़ को राज्य में मिलाया।
- कवियों एवं विद्वानों के आश्रयदाता — जयानक कृत ‘पृथ्वीराज विजय’ में “कविबांधव” उपाधि।
- नरपति नाल्ह – बीसलदेव रासौ
- सोमदेव – ललित विग्रहराज
- हरिकेली नाट्य का रचनाकार –
- विषय:- महाभारत → शिव (किरात)–अर्जुन संवाद
- भाषा:- संस्कृत
- उल्लेख: – राजाराम मोहन राय स्मारक (ब्रिस्टल), संस्कृत पाठशाला (अजमेर)
- विद्वान किलहोर्न ने इनकी तुलना “कालीदास व भवभूति” से की।
- सरस्वती कंठाभरण पाठशाला का निर्माण (अजमेर) — थार प्रदेश की संस्कृत पाठशाला की तर्ज़ पर।
- बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक (1198 ई.) ने मस्जिद रूप में परिवर्तित किया
- वर्तमान नाम: अढ़ाई दिन का झोपड़ा
- नामकरण: प्रथम बार जॉन मार्शल ने कहा

- 1163 ई. में दिल्ली में शिवालिक स्तंभ का निर्माण।
- पशु वध पर प्रतिबंध लगाया।
- टोंक में बीसलपुर नगर बसाया एवं बीसलपुर बाँध का निर्माण।
- दशरथ शर्मा ने इनके शासनकाल को “चौहान वंश का स्वर्णकाल” कहा।
अमरगांगेय (अपारगांगेय ) (1164–1165 ई.) —
- विग्रहराज चतुर्थ का पुत्र, अल्पायु और अविवाहित था।
- एक वर्ष के भीतर ही जगदेव के पुत्र पृथ्वीराज द्वितीय द्वारा युद्ध में पराजित होकर पदच्युत।(रूठी रानी शिव मन्दिर शिलालेख के अनुसार)
पृथ्वीराज द्वितीय (1165–1168 ई.) —
- अमरगांगेय को युद्ध में पराजित कर सिंहासन प्राप्त किया।
- प्रजा में लोकप्रिय; देश-रक्षा व वीरता के कारण “राम का अवतार” माना गया।
- अल्प शासनकाल; संतान नहीं थी।
- मृत्यु के बाद सिंहासन पर चाचा सोमेश्वर बैठा।
- धोड़ गाँव शिलालेख वि.सं. 1225 —रूठी रानी के मन्दिर पर अभिलेख।
सोमेश्वर –
- उपाधि – प्रताप लंकेश्वर
- अजमेर में कल्प वृक्ष लगाया।
पृथ्वीराज तृतीय (1177–1192 ई.) —
- चौहान वंश का अंतिम शक्तिशाली शासक, जन्म 1166 ई.; पिता सोमेश्वर, माता कर्पूरी देवी (अनंगपाल तोमर की पुत्री)।
- उपनाम – रायपिथौरा
- 11 वर्ष की आयु में शासन, प्रारंभिक शासन में वज़ीर कदम्बवास/कैमास का मार्गदर्शन।
- उपाधि – दलपुंगल / विश्वविजेता (विजय अभियानों के कारण)।
- सैन्य अभियान –
- अमरगांगेय (चाचा) को पराजित कर सत्ता सुरक्षित की।
- नागार्जुन विद्रोह दमन, गुडापुरा क्षेत्र पर अधिकार (कैमास की सहायता से)।
- भंडानकों का विद्रोह दमन (भरतपुर–मथुरा क्षेत्र), 1182 ई. — जिनपति सूरि वर्णन।
- महोबा पर विजय (1182 ई.), चंदेल शासक परमार्दिदेव पराजित। इस युद्ध में आल्हा व ऊदल वीरगति को प्राप्त (लोक परंपरा में प्रसिद्ध)। महोबा पर अधिकार, पन्जुनराय को अधिकारी नियुक्त।
- गुजरात–चालुक्य संघर्ष (1184 ई.), भीमदेव द्वितीय के प्रधानमंत्री जगदेव प्रतिहार से युद्ध → बाद में संधि।
- प्रथम तराइन युद्ध (1191 ई.) → पृथ्वीराज की विजय
- मुहम्मद गौरी घायल, दिल्ली के गोविन्दराज द्वारा, गौरी भागा।
- मुहम्मद गौरी का पीछा न करना पृथ्वीराज की ऐतिहासिक भूल माना गया।
- द्वितीय तराइन युद्ध (1192 ई.) → पृथ्वीराज पराजित
- सहयोगी → समरसिंह (मेवाड़), गोविन्दराज (दिल्ली)
- ताजुल-मासिर (हसन निज़ामी): गौरी ने युद्ध पूर्व संधि प्रस्ताव भेजा था।
- युद्ध बाद → अजमेर व दिल्ली पर गौरी का अधिकार।
- जयचंद–संयोगिता प्रसंग –
- कन्नौज में राजसूय यज्ञ व संयोगिता स्वयंवर, पृथ्वीराज को आमंत्रण नहीं।
- संयोगिता का हरण, जिससे जयचंद ने तराइन द्वितीय में सहयोग नहीं दिया।
- चंद्रबरदाई (लोक परंपरा) पंक्ति —
चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ठ प्रमाण।
ता ऊपर सुलतान है, मत चूके चौहान।।
- शासन मूल्यांकन –
- दिल्ली और अजमेर का प्रशासनिक नियंत्रण खोने से उत्तर भारत में मुस्लिम सत्ता का मार्ग प्रशस्त हुआ।
रणथम्भौर के चौहान
गोविंदराज चौहान —
- चौहान वंश की रणथम्भौर शाखा का संस्थापक।
- पृथ्वीराज तृतीय (रायपिथौरा) का पुत्र था।
- तराइन के युद्ध (1192 ई.) में पृथ्वीराज पराजित होने के बाद गोविंदराज ने मुहम्मद गौरी से समझौता कर अजमेर का शासन प्राप्त किया।
- गौरी की अधीनता स्वीकार करने पर पृथ्वीराज के चाचा हरिराज ने गोविंद को अजमेर से निकाल दिया।
- गोविंदराज ने रणथम्भौर जाकर स्वतंत्र राज्य स्थापित किया (1194 ई.)
- कुतुबुद्दीन ऐबक ने भी गोविंदराज को रणथम्भौर का शासक माना/स्वीकृत किया।
वाल्हणदेव (रणथम्भौर चौहान शाखा) —
- गोविन्दराज का पुत्र
- मंगलाना के शिलालेख (संवत्1272) के अनुसार वाल्हणदेव ने रणथम्भौर, गोर एवं गज़नी के सुल्तान समसूद्दीन के अधीन रहकर शासन किया।
- मंगलाना शिलालेख में सामन्त जैत्रसिंह (पद्मसिंह देव दधिबट कुल) द्वारा निर्मित कुएँ का उल्लेख मिलता है।
- उपाधि / पद — “गढ़पति वाल्हणदेव”
- प्रहलादन – सिंह के शिकार के दौरान घायल होकर मृत्यु हुई; उत्तराधिकारी पुत्र वीरनारायण को बनाया तथा भाई वाग्भट को संरक्षक नियुक्त किया।
वीरनारायण –
- प्रहलादन का पुत्र।
- आमेर के कच्छवाहा नरेश बीजलदेव की पुत्री से विवाह किया।
- दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने रणथम्भौर पर आक्रमण किया। रणथम्भौर दुर्ग मजबूत होने से इल्तुतमिश सीधे विजय नहीं कर सका, धोखे से मित्रता का प्रस्ताव भेजा। वीरनारायण दिल्ली जाकर इल्तुतमिश के संरक्षण में रहा, पर भोजन में विष देकर हत्या करवा दी गई (लगभग 1226 ई.)।
वाग्भट –
- वाग्भट — वाल्हणदेव का पुत्र व वीरनारायण का चाचा।
- मालवा के नरेश की हत्या कर वहाँ प्रभाव स्थापित किया।
- दिल्ली के राजनीतिक संकट (1236 ई.) का लाभ उठाकर रणथम्भौर दुर्ग पुनः ले लिया।
- 1248 व 1253 ई. में नासिरुद्दीन के सेनापति उलूगखाँ के आक्रमण को विफल किया।
- मिनहाज-उस-सिराज ने उसे भारत का सबसे शक्तिशाली राजा कहा।
- लगभग 12 वर्ष तक रणथम्भौर पर शासन किया।
- उत्तराधिकारी — जैत्रसिंह।
जैत्रसिंह –
- जैत्रसिंह को जयसिंह भी कहा जाता है; दो मुख्य शिलालेख → कुंवालजी व अटरू।
- बलवन शिलालेख के अनुसार—जैत्रसिंह मालवा के राजा जयसिंह (परमार) के लिए कड़ी धूप-सा प्रचंड था।
- उसने आमेर के राजा के कंठ पर कुल्हाड़ी चलाने का साहस दिखाया।
- तिहूंगढ़ (करौली) के यदुवंशी राजा जैत्रसिंह को नियमित कर देता था।
- जैत्रसिंह के समय दिल्ली सुलतान की सेना ने (8 फरवरी 1259 ई.) रणथम्भौर दुर्ग पर मलिक उल-नवाब के नेतृत्त्व में आक्रमण किया पर असफल रहे।
- जैत्रसिंह के तीन पुत्र — सुरताण, वीरम व हम्मीर थे।
- जैत्रसिंह ने सबसे योग्य हम्मीर को उत्तराधिकारी बनाया।
हम्मीर देव चौहान –
- हम्मीरदेव लगभग 1283 ई.(वि.सं.1339) में रणथम्भौर के शासक बने।
- चौहानों का अंतिम महान शासक माना जाता है।
- प्रमुख स्रोत –
- हम्मीर महाकाव्य – नयनचन्द्र सूरि
- अमीर खुसरो, जियाउद्दीन बरनी
- तबकात-ए-नासिरी – मिन्हाज-उस-सिराज
- जोधराज – हम्मीर रासो
- हम्मीर हठ – चन्द्रशेखर
- बलवन व गढ़ के शिलालेख
- हम्मीर की दिग्विजय –
- मालवा के परमार राजा अर्जुन को पराजित किया।
- मांडलगढ़, उज्जैन, आबू, चित्तौड़, वरधनपुरा, चंपा, पुष्कर, मारेठ, खंडेटा, चाटसू – इन सभी से कर/विजय प्राप्त की।
- ककराला (त्रिभुवनगढ़/तिमनगढ़) के यदुवंशी राजा ने कर दिया।
- शरणागत नीति –
- हम्मीर ने अलाउद्दीन के विद्रोहियों(1298 ईस्वी) – क़ामीजी,केहब्रू और मुहम्मद शाह को शरण दी।
- यही रणथम्भौर पर अलाउद्दीन के आक्रमण का मुख्य कारण।
- हम्मीर का कथन: “क्षत्रिय की शरण आये की रक्षा हमारा धर्म है।”
- जलालुद्दीन खिलजी के विरुद्ध युद्ध (1290–1292 ईस्वी)-
- जलालुद्दीन खिलजी के प्रथम और द्वितीय आक्रमणों को हम्मीर ने विफल किया।
- रणथम्भौर के बाहर झाई में प्रथम भीड़ंत — 70 हिन्दू वीरगति को प्राप्त।
- परिणाम — जलालुद्दीन को सफलता नहीं मिली।
- अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध प्रारम्भिक संघर्ष (सन् 1299 ईस्वी)-
- अलाउद्दीन के सेनापति उलुगखाँ को बनास नदी के तट के निकट पराजित किया।
- भीमसिंह (हम्मीर का सेनापति) ने युद्ध में उलुगखाँ के नगाड़े व हाथी छीने।
- भीमसिंह की मृत्यु का कारण — प्रधान मंत्री धर्मसिंह की गलत सलाह।
- विश्वासघात / गद्दारी (सन् 1300 ईस्वी)-
- अलाउद्दीन ने छल से निम्न को फुसलाया –
- रतिपाल – मुख्य गद्दार
- रणमल – सेना का अग्रणी
- इनकी गद्दारी ने किले की रक्षा कमजोर की।
- घेराबंदी लंबी चली, अन्न खत्म होने लगा।
- कोठयारी (अन्न अधिकारी) ने झूठ कहा कि अन्न भरपूर है, बाद में कोठार खाली मिले। हम्मीर ने कोठयारी को मरवा दिया।
- सन् 1301 ईस्वी – तीन माह की घेराबंदी, भीषण युद्ध।
- अलाउद्दीन ने छल से निम्न को फुसलाया –
- जौहर व अंतिम युद्ध –
- मुहम्मदशाह (शरणागत) ने अपने परिवार का बलिदान पहले दिया।
- महारानी रंगदेवी, देवलदेवी सहित स्त्रियों ने जौहर किया।
- हम्मीरदेव ने केसरिया बाना धारण कर अंतिम युद्ध लड़ा।
- भाई वीरम, टांक, गंगाधर, क्षेत्रसिंह, राजड़ आदि वीरगति को प्राप्त।
- हम्मीर ने पकड़े जाने से पहले अपनी तलवार से स्वयं शीश काटा।
- 10 जुलाई 1301 ईस्वी – हम्मीरदेव ने अंतिम युद्ध किया।
रणथम्भौर का पतन –
- 12 जुलाई 1301 ई.(हम्मीर द्वारा 8 वर्ष शासन के बाद हम्मीर चौहान का शासन समाप्त)
- युद्ध के बाद –
- अलाउद्दीन ने गद्दार रतिपाल की खाल निकलवाकर मरवाया।
- रणमल और उसके साथियों को तलवार से मरवाया।
- मुहम्मदशाह ने उपचार के बाद कहा: “मैं जीवित हुआ तो अलाउद्दीन को मार दूँगा।” सुनकर अलाउद्दीन ने उसे हाथी से कुचलवा कर मरवाया।
- साहित्य में हम्मीर –
- “सिंह सवन सतपुरुष वचन, कदली फलत इक बार। त्रिया तेल हम्मीर हठ, चढ़े न दूजी बार।”
- लोक मान्यता: “हठी हम्मीर” = शरणागत का त्याग न करने वाला वीर।
नाडोल के चौहान
राव लक्ष्मण / राव लाखन — नाडोल शाखा का मूल पुरुष
- वंश – शाकंभरी शासक वाक्पतिराज प्रथम के तीन पुत्रों में एक।
- बड़ा पुत्र सिंहराज (944 ई.) साँभर का शासक बना।
- राव लाखन अपनी पत्नी और एक हरीजन के साथ साँभर छोड़कर चला गया।
- नाडोल आगमन – नाडोल पहुँचकर मंदिर के बाहर ठहराव किया और अपने पौरुष बल से नाडोल में स्वतंत्र राज्य स्थापित किया।
- मेड़ों (मेवों) का दमन – नाडोल तथा मारवाड़ क्षेत्र को आतंकित करने वाले मेवों का संहार कर क्षेत्र में शांति स्थापित की।
- कुलदेवी आशापुरा का वरदान – कथानुसार रात्रि में दर्शन देकर विजय और महान राज्य स्थापित होने का आशीर्वाद।
- 12,000 घोड़ों की कथा – कहा जाता है कि मालवा के 12,000 घोड़े अपने-आप नाडोल पहुँच गये।
- बड़ा दुर्ग निर्माण – नाडोल की पहाड़ी पर सुदृढ़ दुर्ग तथा भव्य राजमहल बनवाया, जिसके मुख्य द्वार पर आशापुरा माता का मन्दिर स्थापित किया।
- सूरजपोल – नाडोल में प्रसिद्ध सूरजपोल का निर्माण भी राव लाखन ने कराया।
- वैश्य सेठ की पुत्री से विवाह – उससे उत्पन्न पुत्रों को राजभण्डारों का अधिकारी बनाया। वर्तमान भण्डारी वैश्य इन्हीं के वंशज माने जाते हैं।
- गुजरात व मेवाड़ पर प्रभाव – एक प्राचीन पद के अनुसार राव लाखन इतना शक्तिशाली था कि गुजरात की राजधानी पाटन से चुंगी वसूल करता था, और मेवाड़ का धणी उसे कर देता था।
- मन्दिर निर्माण – नीलकण्ठ महादेव मंदिर में स्थित शिलालेख (विक्रम संवत् 1025) से पता चलता है कि राव लक्ष्मण ने लक्ष्मण-स्वामी विष्णु मंदिर बनवाया।
- ‘शाकम्भरीरिद्ध’ और ’शाकम्भरीमाणक्य’ उपाधि – सुंधा पर्वत शिलालेख में राव लाखन को‘शाकम्भरीरिद्ध’ कहा गया है।
- माउण्ट आबू शिलालेख में ‘शाकम्भरीमाणक्य’। इसका अर्थ है: – शाकम्भरी का महाराजकुमार / साँभर का हीरा।
- सोभित – लगभग 982–990 ई.
- धारा (मालवा) पर अधिकार
- सेवड़ी ताम्रपत्र (वि.सं. 1076) में उल्लेख
- बलराज – लगभग 990–996 ई.
- परमार शासक मुंज (974–995 ई.) की सेना को हराया।
- विग्रहपाल – अल्पकाल (लगभग 996 ई.)
- महेन्द्र – लगभग 994–1005 ई.
- अपनी बहिनों का विवाह चालुक्य दुर्लभराज से कराया जिसका उल्लेख द्वाश्रय काव्य में मिलता हैं।
- अश्वपाल – लगभग 1005–1015 ई.
- आश्लेश्वर शिव मंदिर का निर्माण करवाया।
- अहिल – लगभग 1015–1024 ई.
- अनहिल – लगभग 1024–1055 ई.
- महमूद गजनवी से युद्ध किया।
- नाडोल शाखा का सबसे शक्तिशाली शासक था।
- बालाप्रसाद – लगभग 1055–1070 ई.
- नाडोल शाखा पर सबसे अधिक समय तक शासन किया।
- जेंद्रराज / जेंदुराज – लगभग 1070–1110 ई.
- जेंद्रराजेश्वर मंदिर (नाडोल) का निर्माण करवाया।
- पृथ्वीपाल – लगभग 1110–1120 ई.
- पृथ्वीपालेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया।
- जोजलदेव – लगभग 1120–1140 ई.
- धार्मिक सहिष्णुता के आदेश जारी करने वाला शासक।
- आसराज – लगभग 1140–1160 ई.
- चालुक्य सिद्धराज जयसिंह का सामंत बना।
- रायपाल – लगभग 1160–1180 ई.
- पुनः नाडोल पर अधिकार कर लिया।
- सहजपाल – लगभग 1180–1190 ई.
- आल्हणदेव – लगभग 1140–1163 ई.
- जीवहत्या निषेध आदेश जारी किया।
- पुत्र: कीर्तिपाल (जालौर शाखा संस्थापक)
- केल्हणदेव – लगभग 1163–1178 ई.
- मुहम्मद गोरी को 1178 ई. में कासहरड़ा (कायंद्रा) में हराया। इस विजय की खुशी में एक सुनहरी तोरणद्वार बना कर भगवान सोमनाथ के अर्पण कर दिया।
- जयसिंह – लगभग 1178–1197 ई.
- कुतुबुद्दीन ऐबक से युद्ध में हार के बाद नाडोल पर मुस्लिम शासन आरंभ। ➡️ 1197 ई. में नाडोल शाखा का अंत
सोनगरा चौहान (जालौर)
कीर्तिपाल –
- कीर्तिपाल नाडोल के शासक आल्हणदेव का सबसे छोटा पुत्र था तथा उसकी माता अनलदेवी थी।
- वि.सं. 1218 में आल्हणदेव ने कीर्तिपाल को नाडोलाई के 12 गाँवों की जागीर प्रदान की थी।
- कीर्तिपाल ने मेवाड़ के शासक सामंतसिंह को पराजित कर मेवाड़ पर अधिकार किया था।
- बाद में कीर्तिपाल ने परमार राजा कुंतलपाल को पराजित कर जालौर और सिवाना पर अधिकार किया।
- कीर्तिपाल ने वि.सं. 1238 में जालौर (सोनगिरी) राज्य की स्थापना की।
- कीर्तिपाल ने मुहम्मद गोरी को युद्ध में पराजित किया था।
- कीर्तिपाल सूर्य, शिव और अग्निदेव की उपासना करता था तथा वह जैन धर्म का भी संरक्षक था।
- कीर्तिपाल की मृत्यु वि.सं. 1239 में हुई थी।
- जालौर पर्वत का प्राचीन नाम सोनगिर था, इसलिए इस शाखा को सोनगिरा चौहान कहा गया।
- समरसिंह – कीर्तिपाल का पुत्र और उत्तराधिकारी था।
उदयसिंह
- उदयसिंह ने दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश से संधि कर 400 ऊँट और 200 घोड़े देकर उसे लौटाया था।
- उदयसिंह ने दिल्ली के सुल्तान आरामशाह और इल्तुतमिश दोनों को पराजित किया था।
- उदयसिंह ने सिन्ध देश के राजा को पराजित किया था।
- उदयसिंह का प्रधानमंत्री यशोवीर था, जो एक प्रसिद्ध कवि भी था।
- उदयसिंह जालौर के चौहान शासकों में सबसे शक्तिशाली शासक माना जाता है।
चाचिगदेव
- चाचिगदेव ने महाराजाधिराज और महामंडलेश्वर की उपाधियाँ धारण की थीं।
- दिल्ली के सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद और बलबन के समय चाचिगदेव पर कोई आक्रमण नहीं हुआ।
- चाचिगदेव ने ब्राह्मणों का कर माफ किया और सूंधा माता की पूजा की।
सामन्तसिंह –
- सामन्तसिंह के काल में जालौर राज्य पूर्णतः स्वतंत्र बना रहा।
- सामन्तसिंह ने अपने पुत्र कान्हड़देव को शासन कार्य में सहभागी बनाया।
कान्हड़देव
- अंतिम महान सोनगिरा चौहान शासक
- कान्हड़देव ने अलाउद्दीन खिलजी को जालौर से गुजरात जाने का मार्ग देने से स्पष्ट इनकार किया।“तुम्हारी सेना धर्म, स्त्री, गौ और ब्राह्मणों का नाश करेगी, इसलिए मार्ग नहीं दिया जाएगा।”
सिवाना दुर्ग –
- अलाउद्दीन खिलजी ने 1308 ईस्वी में सिवाना दुर्ग पर आक्रमण किया।
- उस समय सिवाना दुर्ग का शासक सातलदेव(कान्हड़देव का भतीजा) था।
- अलाउद्दीन खिलजी ने विशाल सेना के साथ सिवाना दुर्ग को चारों ओर से घेर लिया।
- राजपूतों ने दुर्ग की रक्षा के लिए धेंकुली, पत्थर और प्रबल सैन्य प्रतिरोध का प्रयोग किया।
- खिलजी सेना ने धोखे से दुर्ग के जल-स्रोत को अपवित्र कर दिया, जिससे दुर्ग में भयंकर जल संकट उत्पन्न हो गया। जल संकट के कारण दुर्ग में निवास करना असंभव हो गया। इसके बाद 1584 राजपूत स्त्रियों ने जौहर किया। जौहर के पश्चात् राजपूतों ने केसरिया धारण कर अंतिम युद्ध किया। इस अंतिम युद्ध में दुर्गपति सातलदेव वीरगति को प्राप्त हुआ। सिवाना दुर्ग पर अलाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो गया।
- विजय के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने सिवाना दुर्ग का नाम बदलकर “खैराबाद” रख दिया।
- सिवाना की विजय के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर पर आक्रमण की योजना बनाई।
जालौर दुर्ग –
- अलाउद्दीन खिलजी ने 1311 ईस्वी में जालौर दुर्ग पर अंतिम और निर्णायक आक्रमण किया। दुर्ग की रक्षा स्वयं वीर कान्हड़देव चौहान के नेतृत्त्व में की जा रही थी। दुर्ग में लंबे समय तक रसद और जल की आपूर्ति बनाए रखी गई, जिससे प्रारंभिक चरण में खिलजी सेना असफल रही।
- अलाउद्दीन खिलजी ने छल और विश्वासघात की नीति अपनाई। एक देशद्रोही दहिया राजपूत “बीका” ने गुप्त मार्ग से खिलजी सेना को दुर्ग में प्रवेश करा दिया। बीका की पत्नी(हीरा दे) ने देशद्रोह का रहस्य कान्हड़देव को बता दिया, परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
- अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर को जीतकर मारवाड़ की स्वतंत्र राजपूत सत्ता को समाप्त कर दिया।
- इस भीषण युद्ध में वीर कान्हड़देव वीरगति को प्राप्त हुए।
- जालौर दुर्ग का नाम अलाउद्दीन खिलजी ने जलालाबाद रखा।
