भरतपुर व धौलपुर का जाट वंश राजस्थान का इतिहास का एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसमें जाट शासकों द्वारा स्थापित शक्तिशाली राज्यों के राजनीतिक, सैन्य और प्रशासनिक विकास का अध्ययन किया जाता है। महाराजा सूरजमल जैसे प्रतापी शासकों के नेतृत्व में इन राज्यों ने उत्तर भारत की राजनीति में प्रभावी भूमिका निभाई। यह विषय क्षेत्रीय सत्ता, किले निर्माण और सामाजिक संरचना को समझने में सहायक है।
भरतपुर का जाट वंश
उदय व प्रारंभिक जाट आंदोलन –
- उदय–स्थल – सिनसिनी गाँव (ब्रज क्षेत्र)।
- जाट – मूलतः कृषक जाति, एक संगठित राजनीतिक शक्ति के रूप में उदय औरंगजेब के शासनकाल में हुआ।
- शाहजहाँ के उत्तराधिकार युद्ध (1658–59) का लाभ उठाकर अलीगढ़ परगने के जाटों ने नन्दराम के नेतृत्त्व में कृषि–कर देना बंद कर दिया।
- 1660 ई. – नन्दराम ने बादशाह औरंगजेब के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।
- 1669 ई. – गोकुल (तिलपत का जमींदार) के नेतृत्त्व में मथुरा व आगरा में जाट आंदोलन हुआ।
- औरंगजेब स्वयं इस आंदोलन के दमन हेतु गया।
- गोकुल को गिरफ्तार किया गया और नृशंसता से उसकी हत्या करवाई गई।
- 1681 – जाटों ने पुनः आगरा क्षेत्र के मुगल फौजदार ‘मुल्फ़त खाँ’ की हत्या कर दी।
- ‘ब्रज’ के नेतृत्त्व में जाटों ने डीग (भरतपुर) के निकट ‘आऊ’ के शाही थाने पर अधिकार कर लिया।
- सिनसिनी ग्राम के जमींदार ‘खानचंद’ के पुत्र राजाराम ने आगे जाटों का नेतृत्त्व संभाला।
- राजाराम ने सिकंदरा (आगरा) में अकबर की कब्र से हड्डियाँ निकलवाकर जलवा दीं, जिससे औरंगजेब अत्यंत क्रोधित हुआ।
- औरंगजेब ने सेनानायक ‘खान–ए–जहाँ’ को राजाराम के विद्रोह को कुचलने भेजा (असफल रहा)।
- तत्पश्चात आमेर नरेश रामसिंह प्रथम को मथुरा का फौजदार नियुक्त किया गया, रामसिंह की मृत्यु के बाद उसके पुत्र बिशनसिंह को जाट दमन का कार्य सौंपा गया।
- राजाराम की मृत्यु के बाद उसके पुत्र ‘फतेहसिंह’ ने नेतृत्त्व संभाला।
- बिशनसिंह ने फतेहसिंह को पराजित कर सिनसिनी पर कच्छवाहों का अधिकार स्थापित किया।
- इसके बाद जाट शक्ति का अगला चरण – चुण्डामन के साथ जुड़ा।
चुण्डामन (1695–1721 ई.)
- ‘ब्रज’ का पुत्र और राजाराम का भतीजा।
- फतेहसिंह के स्थान पर जाटों का नेता चुना गया।
- महत्त्व –
- भरतपुर के स्वतंत्र जाट राज्य का वास्तविक संस्थापक व निर्माता माना जाता है।
गतिविधियाँ –
- मथुरा व आगरा के मुगल इलाकों पर लगातार धावे बोलकर मुगल शक्ति को गंभीर चुनौती दी।
- सोखेर, उज्जैन, सोगर, कासोट, अवायर, रसूलपुर आदि पर अपने थाने कायम किए।
- थून को अपना सुदृढ़ गढ़ बनाया।
- दमन हेतु मुगल प्रयास
- मुगल सम्राट ने कच्छवाहा नरेश बिशनसिंह को चुण्डामन के दमन हेतु भेजा।
- बिशनसिंह ने चतुराई से जाट नेता ‘ऊदा’ को अपने पक्ष में कर लिया,फिर भी चुण्डामन को दबाने में पूर्णतः सफल नहीं हो सका।
- औरंगजेब की नाराज़गी – बिशनसिंह को मथुरा की फौजदारी से हटा दिया गया।
- जजाऊ का युद्ध (1707 ई.) –
- औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात उत्तराधिकार युद्ध हुआ।
- चुण्डामन ने आज़म की पराजित सेना को लूटा और बाद में नए बादशाह बहादुरशाह प्रथम की सेवा में उपस्थित हुआ।
बहादुरशाह प्रथम द्वारा –
- चुण्डामन को 1500 जात व 500 सवार का मनसब दिया गया तथा दिल्ली–आगरा शाही मार्ग पर नियंत्रण रखने का दायित्व सौंपा गया।
- 1708 ई. – सांभर के युद्ध में चुण्डामन ने राजपूतों को पराजित करने में मुगल सूबेदार की सहायता की।
- मुगल सम्राट के सिक्खों के विरुद्ध अभियान में भी चुण्डामन ने सहयोग दिया।
- जहांदारशाह के समय चुण्डामन ने पुनः शाही मार्गों को लूटना प्रारंभ कर दिया।
फर्रुखसियर काल –
- आगरा सूबेदार छबीलराम को जाटों को कुचलने भेजा गया (असफल रहा)।
- खान–ए–दौरा को मथुरा की फौजदारी दी गई जिसने चुण्डामन और बादशाह के बीच शांति स्थापित करवाई।
- चुण्डामन को माफ़ी व राव की उपाधि मिली तथा बारामूला से सिकंदरा तक के शाही मार्ग की राहदारी वसूलने का अधिकार मिला।
- थून किला – चुण्डामन ने इसे सुदृढ़ कर अपना प्रमुख निवास बनाया।
- बाद में चुण्डामन ने पुनः लूटमार प्रारंभ की, जिस पर फर्रुखसियर ने सवाई जयसिंह को दमन हेतु भेजा।
- 1721 ई. – सवाई जयसिंह ने चुण्डामन को पराजित कर थून किले पर अधिकार कर लिया।
- चुण्डामन ने विष पीकर आत्महत्या कर ली।
- कालिकारंजन कानूनगो का मत –
- “चुण्डामन असफल देशभक्त और सफल विद्रोही था; उसे राजोचित सम्मान व पदवियाँ नहीं मिलीं, पर उसके चरित्र में मराठों की चालाकी व राजनीतिक दूरदर्शिता का अद्भुत मिश्रण दिखाई देता है।”
बदनसिंह (1722–1756 ई.) –
- संबंध –
- चुण्डामन का भतीजा
- भाई भावसिंह का पुत्र था।
- चुण्डामन की मृत्यु के बाद उसके पुत्र मोहकमसिंह व भतीजा बदनसिंह के बीच उत्तराधिकार–संघर्ष हुआ।
- मोहकमसिंह ने बदनसिंह को कैद कर लिया, परन्तु बदनसिंह किसी प्रकार छूटकर सवाई जयसिंह के पास पहुँचा।
- अगस्त 1722 – सवाई जयसिंह ने थून के किले पर अधिकार कर मोहकमसिंह को वहाँ से हटा दिया; वह जोधपुर के महाराजा अजीतसिंह के पास चला गया।
- जाटों की आपसी फूट का लाभ उठाकर सवाई जयसिंह ने जाट क्षेत्र पर अपना प्रभाव स्थापित किया।
- बदनसिंह ने जयसिंह की अधीनता स्वीकार कर उसका सामन्त बनना स्वीकार किया।
- जयसिंह ने बदनसिंह को ‘ब्रजराज / राजा’ की उपाधि तथा कई जागीरें प्रदान कीं।
- 19 जून 1725 – जयसिंह व बदनसिंह के बीच औपचारिक समझौता हुआ।
- सबसे बड़ी उपलब्धि – जाट–कच्छवाहा परम्परागत वैमनस्य का अंत कर मैत्री संबंध स्थापित करना।
- जयसिंह के आगरा सूबेदार बनने पर दिल्ली–आगरा–जयपुर शाही मार्गों की सुरक्षा का दायित्व बदनसिंह को सौंपा गया।
- 1730 – मेवात क्षेत्र के मेवों का दमन कर जयसिंह को प्रसन्न किया।
स्थापत्य–कला व निर्माण –
- डीग को अपना प्रमुख निवास स्थान बनाया।
- डीग में सुदृढ़ गढ़ का निर्माण करवाया।
- डीग में सुंदर जलमहल बनवाए और बाग–बगीचे लगवाए।
- डीग, कुम्हेर, भरतपुर और वैर के दुर्गों का निर्माण करवाया।
- वृन्दावन में एक मंदिर भी बनवाया।
- 2 नवम्बर 1745 – दूसरे पुत्र प्रतापसिंह (वैर का राजा) की मृत्यु हुई।
- जीवनकाल में ही योग्य पुत्र सूरजमल को शासन की बागडोर सौंप दी।
- इस बागडोर–वर्णन का उल्लेख फ्रेज़र गॉटलियब की पुस्तक “Persian History of the Jats” में मिलता है।
- 7 जून 1756 – बदनसिंह की डीग में मृत्यु हुई।
महाराजा सूरजमल (1756–1763 ई.) –

- बदनसिंह का उत्तराधिकारी।
- खेमकरण से भरतपुर का दुर्ग (गढ़ी) लेकर भरतपुर नगर की स्थापना की और इसे राजधानी बनाया।
- भरतपुर दुर्ग की मूल निर्माण–तिथि – 1700 ई.,
- निर्माता – रुस्तम सोगरिया।
- भरतपुर नगर के वास्तविक संस्थापक तथा इसे स्थायी निवास बनाने वाले शासक – सूरजमल।
नीति –
- पिता की तरह जयपुर के साथ मैत्रीपूर्ण व सहयोगी नीति अपनाई।
- 1743 – सवाई जयसिंह द्वारा किए गए अश्वमेध यज्ञ में सम्मिलित हुए।
- सवाई जयसिंह की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार युद्ध में ईश्वरीसिंह (1743–50) का पक्ष लिया।
- ईश्वरीसिंह की सिफारिश पर मुगल बादशाह ने 1750 ई. में सूरजमल को ‘राजा’ की उपाधि दी।
सराय सोभाचन्द का युद्ध (1750 ई.) –
- पक्ष – सूरजमल बनाम मीर बख्शी सलावत खाँ (मुगल सेनापति)।
- परिणाम – सूरजमल विजयी रहे।
- वज़ीर सफदरजंग सूरजमल की वीरता से प्रभावित होकर उसका मित्र बन गया।
- शर्तें –
- सूरजमल के पास अलीगढ़ क्षेत्र पूर्ववत रहेगा।
- बदले में सूरजमल 26 लाख रुपये मुगलों को देगा।
- सूरजमल सिकंदरा का गढ़ खाली करेगा।
- 1756 – बदनसिंह की मृत्यु के बाद सूरजमल विधिवत भरतपुर का शासक बना, परन्तु पुत्र जवाहरसिंह ने विद्रोह किया।
- अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण – दो आक्रमण
- 1757 – अब्दाली के आक्रमण के समय जाटों ने मथुरा की रक्षा में प्राणों की आहुति दी।
- तीसरा पानीपत युद्ध – 14 जनवरी 1761
- पक्ष – अहमदशाह अब्दाली बनाम मराठा सेनापति सदाशिवराव भाऊ।
- सूरजमल ने भाऊ को गुरिल्ला युद्ध की सलाह दी, भाऊ खुला युद्ध चाहता था और इमाद–उल–मुल्क को वजीर बनाने के वचन से भी मुकर गया, सूरजमल भाऊ के व्यवहार से दुखी होकर भरतपुर लौट आया।
- परिणाम – युद्ध में मराठों की करारी हार हुई।
- युद्ध–परिणाम के बाद पराजित मराठों को सूरजमल ने अपने राज्य में शरण दी।
- बाजीराव के भाई शमशेर बहादुर के घावों का उपचार करवाया तथा मृत्यु होने पर डीग में उसकी स्मृति में छतरी बनवाई।
- 12 जून 1761 – सूरजमल ने आगरा किले पर अधिकार कर लिया, जो मुगलों की दूसरी राजधानी थी।
- 1763 – रुहेलों के विरुद्ध युद्ध में नजीब खाँ रुहेला से संघर्ष करते हुए सूरजमल वीरगति को प्राप्त हुए।
- नजीब खाँ ने सूरजमल की मृत्यु की पूर्ण पुष्टि के बाद ही विश्वास किया,
- कहावत – “जाट मर जाए तब जानिए जब तेरहवाँ हो जाए।”
- उपाधि –
- “जाट जाति का प्लेटो (अफलातून)” – सैय्यद गुलाम
- अली नक़वी (ग्रंथ – ‘इमाद–उल–सादात’) ने कहा।
- कालिकारंजन कानूनगो का मत –
- सूरजमल में जाट जाति के सभी गुण – शक्ति, साहस, चतुराई, निष्ठा तथा पराजय न स्वीकार करने वाली अदम्य भावना थी।
- रुपाराम कटारी दरबारी इतिहासकार के अनुसार अब्दाली के विरुद्ध सूरजमल की सफलताओं में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
लोहागढ़ दुर्ग –
- निर्माण – युवराज रहते हुए 1733 ई. में सूरजमल द्वारा।
- उपनाम – राजस्थान का सिंहद्वार, पूर्वी सीमा का प्रहरी।│
जवाहरसिंह (1765–1768 ई.) –
- सूरजमल का पुत्र व उत्तराधिकारी।
- कुछ सरदार नाहरसिंह को शासक बनाना चाहते थे, जिससे मतभेद उत्पन्न हुए।
- 1764 – मल्हारराव होल्कर की सहायता से रुहेला सरदार नजीबुद्दौला (नजीब खाँ) को पराजित किया।
- बाद में होल्कर, सिक्ख सैनिकों एवं अपने ही सेनापति के नजीब खाँ से मित्रता के दबाव से क्षुब्ध होकर दिल्ली से लौट आया।
- जवाहर बुर्ज –
- दिल्ली विजय की स्मृति में लोहागढ़ दुर्ग में बनवाया।
- अष्टधातु किवाड़ –
- 1765 में मुगल शाही खजाना लूटते समय
- लाल किले के ऐतिहासिक द्वार को उतारकर लोहागढ़ में लगवाया।
- अपने सरदारों पर बल–प्रयोग कर उन्हें जेल में डालना व धन–वसूली करना।
- सेना में जाट वर्चस्व कम करने हेतु विदेशी सैनिकों की भर्ती
- 1765 – समरू की बटालियन,
- जुलाई 1767 – रेने मेटुके की टुकड़ी।
- 1765 – वैर के जागीरदार बहादुरसिंह को पराजित कर वैर पर अधिकार किया।
- 1766 – नाहरसिंह व होल्कर को पराजित कर धौलपुर पर अधिकार किया।
- गोहद के राणा छत्रशाल जाट की मराठों के विरुद्ध सहायता की।
- 1767 – पेशवा के आदेश से जाट–मराठा संधि हुई, परन्तु जवाहरसिंह मराठों को उत्तर भारत से निकालने के प्रयास में लगा रहा।
- 6 दिसम्बर 1767 – पुष्कर में विजयसिंह (मारवाड़) को भाई बनाकर मराठों के विरुद्ध शांति कायम की।
- मावण्डा युद्ध (1767) –
- माधोसिंह प्रथम (जयपुर) से पराजित हुआ (कच्छवाहा संघर्ष का संदर्भ)।
- 1768 – जवाहरसिंह की हत्या कर दी गई; वीर शासक का अंत हुआ।
रतनसिंह (1768–1769 ई.) –
- जवाहरसिंह का भाई था।
- अप्रैल 1769 – वृन्दावन में रूपानंद गुसाईं द्वारा उसकी हत्या कर दी गई।
केहरीसिंह / केसरीसिंह (1769–1775 ई.) –
- रतनसिंह का डेढ़ वर्ष का पुत्र – शासक घोषित हुआ।
- संरक्षक – सेनापति दानशाह।
- नवलसिंह (रतनसिंह का भाई) व रणजीतसिंह इस व्यवस्था से असंतुष्ट रहे; गद्दी–संघर्ष प्रारंभ हुआ।
- बरसाना का युद्ध – 30 अक्टूबर 1773
- पक्ष – मुगल सेनापति नजफखाँ बनाम नवलसिंह।
- परिणाम – नवलसिंह की पराजय हुई
- बरसाना के बाद कोटवन नगर (सीताराम रक्षक) पर भी नजफखाँ का अधिकार हुआ।
- 1774 – आगरा किला नवलसिंह से छीन लिया गया।
- 11 अगस्त 1775 – नवलसिंह की डीग में मृत्यु हुई।
- अंततः 1775 में रणजीतसिंह को गद्दी मिली।
रणजीतसिंह (1775–1805 ई.) –
- केसरीसिंह को हटाकर शासक बना।
- 1776 – मुगल सेनापति नजफखाँ ने डीग किले पर कब्जा कर लिया।
- रणजीतसिंह ने कुम्हेर को अपना नया आधार–स्थान बनाया और यहीं से मुगलों से अपने क्षेत्र पुनः लेने लगे।
- 1778 – किशोरी देवी (रणजीतसिंह की माता) की मध्यस्थता से नजफखाँ व रणजीतसिंह के बीच संधि हुई।
- सितम्बर 1803 – अंग्रेज सेनापति लॉर्ड लेक से संधि की, एक–दूसरे की सहायता का वचन दिया गया।(गवर्नर जनरल द्वारा जनवरी 1804 को पुष्टि)।
- अक्टूबर 1804 – रणजीतसिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध होल्कर का साथ देकर संधि तोड़ दी।
- अंग्रेजों ने भरतपुर का घेरा डाला परन्तु किला जीतने में असफल रहे।
- अप्रैल 1805 – भरतपुर ने होल्कर का साथ छोड़कर अंग्रेजों से पुनः संधि कर ली।
रणधीरसिंह (1805–1823 ई.) –
- रणजीतसिंह का ज्येष्ठ पुत्र।
- 1814 – फतेहपुर सीकरी में गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स से मुलाकात की।
- नेपाल युद्ध, पिण्डारियों के दमन व मराठों के विरुद्ध अंग्रेजों का साथ दिया।
- 1806 – मोतीराम को भरतपुर का कोतवाल नियुक्त किया।
- मोतीराम की निगरानी में रणजीतसिंह की छतरी व महल बनवाए।
बलदेवसिंह (1823–1825 ई.) –
- रणधीरसिंह (निःसंतान) का भाई।
- अंग्रेज अधिकारी डेविड ऑक्टरलोनी को बुलाकर
- अपने पुत्र बलवंतसिंह को युवराज घोषित करवाया।
- स्वयं का शासनकाल अल्पकालिक रहा।
बलवंतसिंह (1826–1853 ई.) –
- अंग्रेज सेनापति लॉर्ड केम्बरमैयर की सहायता से राजा बना।
- अल्पवयस्क होने के कारण माता अमृतकुँवरी के नेतृत्त्व में ‘रीजेन्सी कॉसिल’ बनी तथा शासन–प्रबंधन अंग्रेज ‘पॉलिटिकल एजेंट’ के अधीन रहा।
- इनके शासनकाल में पहली बार अंग्रेजों ने लोहागढ़ किले पर अधिकार किया।
- भरतपुर की जामा मस्जिद का निर्माण पूर्ण हुआ, जो फतेहपुर सीकरी के बुलन्द दरवाज़े के नक़्शे पर आधारित थी।
- इन्हीं के समय से अंग्रेज–प्रभाव का दौर मजबूत हुआ।
जसवंत / यशवंतसिंह (1853–1893 ई.) –
- अल्पवयस्क; प्रारंभ में शासन पॉलिटिकल एजेंट मॉरीसन के हाथ में रहा।
- 1857 की क्रान्ति –
- शासक व भरतपुर की प्रजा – क्रांति के पक्ष में रहे, मॉरीसन को भरतपुर छोड़कर जाना पड़ा।
- 1879 – ब्रिटिश सरकार के साथ नमक–संधि की।
- 1890 – तोप–सलामी की संख्या 17 से बढ़ाकर 19 कर दी गई।
- 1893 – जसवंतसिंह की मृत्यु हुई।
रामसिंह (1893–1900 ई.) –
- 1897 – पूर्वी राजपूताना राज्यों के पॉलिटिकल एजेंट का कार्यालय धौलपुर से स्थानांतरित होकर भरतपुर आ गया।
- 1900 – माउंट आबू में अपने निजी सेवक की हत्या के अपराध में रामसिंह को गद्दी से हटा दिया गया तथा दिल्ली छावनी भेज दिया गया।
- 1929 – रामसिंह की मृत्यु हुई।
किशनसिंह (1900–1929 ई.) –
- शासन–अधिकार देने से पूर्व भरतपुर की सेना का उपयोग सोमालीलैण्ड, तिब्बत व प्रथम विश्व युद्ध में किया गया।
- 1918 – वायसराय चेम्सफोर्ड भरतपुर आए और किशनसिंह को पूर्ण शासनाधिकार दिया गया।
- भाषा–नीति –
- भरतपुर में उर्दू के स्थान पर ‘हिन्दी’ को राजभाषा बनाया तथा देवनागरी को आधिकारिक लिपि मान लिया गया।
- 1925 – पुष्कर में आयोजित जाट अधिवेशन के अध्यक्ष रहे।
- राज्य के आधुनिकीकरण के प्रयास किए। परन्तु शासन में अंग्रेज अधिकारियों के अत्यधिक हस्तक्षेप से मतभेद बढ़े।
- 1928 – पी.जी. मैकेन्जी को भरतपुर का दीवान नियुक्त किया गया। वित्त व प्रशासन संबंधी अधिकांश अधिकार उसी को दे दिए गए।
- किशनसिंह का काल – प्रशासनिक सुधार एवं आधुनिक संस्थाओं की नींव का काल माना जाता है।
बृजेन्द्रसिंह (1929–1947 ई.) –
- भरतपुर के जाटों का अंतिम शासक।
- उपाधियाँ – ‘सवाई’ व ‘बहादुरजंग’ (वीरता के कारण)।
- 31 जुलाई 1947 –
- भारत संघ के साथ अधिमिलन–पत्र पर हस्ताक्षर किए।
- 18 मार्च 1948 – भरतपुर रियासत ‘मत्स्य संघ’ में विलय होकर भारतीय संघ का अंग बन गई।
धौलपुर का जाट वंश
उदय व गोहद की पृष्ठभूमि
- उदय–स्थल – गोहद गाँव (वर्तमान मध्यप्रदेश)
- 16वीं शताब्दी – जाट राजा महासिंह ने गोहद में एक सुदृढ़ किला बनवाया।
- आरम्भ में गोहद के जाटों के मराठों से अच्छे संबंध थे।
- धीरे–धीरे जाट–मराठा संबंध बिगड़ने लगे।
- 1761 ई. – तृतीय पानीपत युद्ध के समय जब मराठे उत्तर भारत में व्यस्त थे। गोहद के राणा भीमसिंह ने ग्वालियर सहित मराठों के 10 किलों पर अधिकार कर लिया।
- आगे चलकर इन्हीं गोहद के जाट शासकों से धौलपुर रियासत का गठन हुआ।
राणा लोकेंद्रसिंह –
- राणा भीमसिंह के बाद गोहद का शासक
- 1767 ई.
- पेशवा माधवराव ने गोहद पर आक्रमण किया।
- गोहद से ख़िराज (लगान/नज़राना) वसूला। तथा लोकेंद्रसिंह को गोहद का स्वतंत्र राजा माना।
- 1779 ई. – प्रथम आंग्ल–मराठा युद्ध के दौरान कम्पनी सरकार ने गोहद का क्षेत्र मराठों से छीन लिया।
- गोहद पुनः लोकेंद्रसिंह को दे दिया।
- ग्वालियर किला भी उसके अधिकार में सौंप दिया।
- 1782 ई. – महादजी सिंधिया ने आक्रमण कर गोहद व ग्वालियर दोनों पर पुनः अधिकार कर लिया। लोकेंद्रसिंह को क़ैद कर लिया गया। कैद में ही लोकेंद्रसिंह की मृत्यु हो गई।
राणा कीरतसिंह (1805–1836 ई.)
- लोकेंद्रसिंह के पुत्र
- द्वितीय आंग्ल–मराठा संघर्ष की पृष्ठभूमि
- 17 जनवरी 1804 ई.
- कम्पनी सरकार ने महादजी सिंधिया को पराजित कर गोहद क्षेत्र पर पुनः अधिकार कर लिया।
- इसके बाद अंग्रेजों ने कीरतसिंह को पुनः गोहद का शासक बनाया।
- कीरतसिंह ने अंग्रेजों के साथ सहायक संधि (Subsidiary Alliance) की बाद में महादजी सिंधिया ने अंग्रेजों से संधि कर ली
- कम्पनी ने गोहद व ग्वालियर फिर से सिंधिया को लौटा दिए।
- 1805 ई. – ग्वालियर रियासत से धौलपुर, बाड़ी व राजाखेड़ा परगने अलग कर ‘धौलपुर रियासत’ का गठन किया गया।
- धौलपुर रियासत के प्रथम शासक राणा कीरतसिंह बने।
- इसके बाद शासक की उपाधि ‘गोहद के राणा’ के स्थान पर ‘धौलपुर के राणा’ हो गई
- मृत्यु – 1836 ई.
राणा भगवंतसिंह (1836–1873 ई.)
- राणा कीरतसिंह के पुत्र
- धौलपुर के द्वितीय शासक
- 1857 की क्रान्ति के समय धौलपुर के शासक
राणा निहालसिंह (1873–1901 ई.)
- उपनाम – ‘प्यारे राजा साहब’
- राणा भगवंतसिंह के पौत्र
- नाबालिग होने के कारण धौलपुर राज्य का प्रशासन सर दिनकर राव को सौंपा गया।
- 1875 ई. राणा निहालसिंह ने मिस्टर स्मिथ को बुलाया राज्य का भूमि–बंदोबस्त कराने हेतु।
- 1877 ई. तक मुंशी कन्हैयालाल व दुर्गाप्रसाद के सहयोग से भूमि–बंदोबस्त का कार्य पूर्ण हुआ।
- निहालसिंह के समय धौलपुर में आधुनिक राजस्व–प्रशासन की नींव रखी गई।
राणा रामसिंह (1901–1911 ई.)
- निहालसिंह के ज्येष्ठ पुत्र
- धौलपुर के शासक बने
- निःसंतान मृत्यु – 1911 ई.
राणा उदयभानसिंह (1911–1948 ई.)
- धौलपुर के अंतिम शासक
- राणा निहालसिंह के छोटे पुत्र
- ‘नरेन्द्रमण्डल’ (Chamber of Princes) के सदस्य प्रथम गोलमेज सम्मेलन में सम्मिलित हुए।
- राजस्थान के प्रमुख समकालीन शासक –
- महाराजा गंगासिंह (बीकानेर)
- महाराजा जयसिंह (अलवर)
- 18 मार्च 1948 ई.
- धौलपुर रियासत का ‘मत्स्य संघ’ में विलय।
- मत्स्य संघ के राजप्रमुख – राणा उदयभानसिंह बनाए गए
- इसके साथ ही धौलपुर का जाट–राणा शासन भारतीय संघीय ढांचे में समाहित हो गया।
