राजस्थान के प्रागैतिहासिक स्थल

राजस्थान के प्रागैतिहासिक स्थल राजस्थान इतिहास के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये मानव सभ्यता के प्रारंभिक विकास, जीवनशैली और सांस्कृतिक प्रगति के प्रामाणिक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। इन स्थलों से प्राप्त उपकरणों, अवशेषों और चित्रों के माध्यम से हम प्रागैतिहासिक मानव के रहन-सहन और सामाजिक विकास को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

  • परिभाषा – पुरातात्विक स्थल उसे कहा जाता हैं जिस स्थल से अतीत में मानव निवास या मानव की भौतिक गतिविधियों के साक्ष्य प्राप्त हुये हो।
  • मानव विकास की प्रक्रिया = शिकारी → पशुपालक → कृषि 
  • मानव द्वारा धातु का प्रयोग  = पाषाण → ताम्र → कांस्य  → लौह
राजस्थान के प्रागैतिहासिक स्थल

अध्ययन की सुविधा के लिए मानव द्वारा किए गए धातु के उपयोग के आधार पर काल निर्धारण किया गया हैं जो निम्नलिखित रेखाचित्र से समझाया गया हैं ।

  • 1870 – सी. ए. हैकेट – 
    • जयपुर और इंद्रगढ़ (बूंदी) से हस्तकुठार (Hand Axe)क्लीवर (Cleaver) प्राप्त किए।
    • ये उपकरण वर्तमान में कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित हैं।
  • 1871 – ए. सी. एल. कार्लाइल – 
    • राजस्थान में पुरातात्त्विक सर्वेक्षण कार्य प्रारंभ किया।
    • दौसा क्षेत्र से पाषाण उपकरण व मानव अस्थिपंजर (human skeletal remains) की खोज की।
  • 1908 – सेटन कार – 
    • झालावाड़ क्षेत्र से पाषाण कालीन उपकरण खोजे।
    • इन उपकरणों से प्रारंभिक मानव की तकनीकी दक्षता का संकेत मिलता है।
  • 1953–54 – भारतीय पुरातात्त्विक सर्वेक्षण विभाग (ASI) एवं डॉ. वीरेंद्र नाथ मिश्र
    • चित्तौड़गढ़ जिले में गंभीरी और बेड़च नदी के पेटे से पाषाण उपकरण प्राप्त हुए।
    • ये उपकरण प्रागैतिहासिक मानव के जीवन और निवास स्थल को दर्शाते हैं।

पाषाण काल को मुख्य रूप से तीन भागो में बांटा गया हैं

राजस्थान के प्रागैतिहासिक स्थल

पुरा पाषाण काल

हस्त कुठार
  • इस काल में मानव शिकारी था संग्राहक नहीं। पुरा पाषाण काल को मुख्य रूप से तीन भागो में बांटा गया हैं – 
    • निम्न पुरा पाषाण काल
    • मध्य पुरा पाषाण काल
    • उच्च पुरा पाषाण काल
  • प्रमुख औज़ार:- हस्त कुठार,चॉपर – चॉपिंग,स्क्रेपर – बोरर ,वेधनी,ब्लेड एंड ब्युरीन
  • नोट:- क्वार्टज़ाइट,चर्ट ,जैस्पर, आदि पत्थरों का औज़ार बनाने में उपयोग किया जाता था।   
  • प्रमुख स्थल:- बुढ़ा पुष्कर,जायल (डीडवाना),इंद्रगढ़ (बूंदी),विराटनगर (कोटपूतली-बहरोड़),गोगा खेड़ा (राजसमंद)
राजस्थान के प्रागैतिहासिक स्थल

मध्य  पाषाण काल

  • परिभाषा : – 
    • मध्य पाषाण काल” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग H. M. वेस्तूप (H.M. Westropp) ने किया।
    • यह काल प्रारंभिक और उत्तर पाषाण काल के बीच का संक्रमण काल था।
    • इस युग में मानव ने शिकार के साथ पशुपालन प्रारंभ किया।
  • प्रमुख विशेषताएँ : – 
    • मानव अब केवल शिकारी नहीं रहा, उसने पशुपालन आरंभ किया।
      • पशुपालन मुख्यतः मांस के उपयोग हेतु किया जाता था, न कि दूध या डेयरी उपयोग के लिए।
    • निवास स्थलों की खोज प्रारंभ की – नदी तटों, शैलाश्रयों व गुफाओं में बसना शुरू किया।
    • प्रक्षेपास्त्र तकनीक (Projectile Technology) का विकास हुआ – मानव ने तीर, भाला, चाकू और बाणों का निर्माण किया।
    • सूक्ष्म उपकरणों (Microliths) का प्रयोग – पत्थर को नुकीला कर छोटे औज़ार बनाए।
    • शैलाश्रय चित्रकला (Rock Shelter Art) की शुरुआत इसी काल में हुई।
      • मानव ने अपने शिकार, नृत्य और दैनिक जीवन के दृश्य चित्रित किए।
  • प्रमुख औज़ार:- माइक्रोलोथिक,सूक्ष्म औज़ार,हड्डी के औज़ार,ज्यामितीय आकार के औजार                          
  • प्रमुख स्थल:- बागौर (भीलवाड़ा),तिलवाड़ा (बालोतरा),सोजत (पाली),निम्बाहेडा (चित्तौड़गढ़),पंचपद्रा (बाड़मेर)
राजस्थान के प्रागैतिहासिक स्थल

बागौर (भीलवाड़ा)5000 ई.पू. से  500 ई.पू.

  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  – इस स्थल का उत्खनन कार्य 1967-68 ई. से 1970 ई. तक वी.एन.मिश्र , डॉ.एल.सी.लैसनिक एवम् डेक्कन कॉलेज पूना के सहयोग से किया गया।
  • नदी क्षेत्र  – कोठारी 
  • प्रमुख विशेषताएँ  –
    • उपनाम – माहसतियों का टीला , आदिम संस्कृति का संग्रहालय 
    • इस स्थल से पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
    • इस सभ्यता के लोगो द्वारा मृतक के साथ खाद्य सामग्री व मृद भांड रखने की परंपरा से सिद्ध होता हैं की ये लोग मृत्यु के बाद भी जीवन की अवधारणा को मानते थे।
    • इस स्थल से बहुतायत में लघु पाषाण मिले हैं।
    • आवास बनाने के लिए पत्थर के साथ – साथ ईटों का प्रयोग भी किया गया हैं।
    • मृत शरीर को उत्तर – दक्षिण में लिटाया जाता था।
  • इस स्थल के उत्खनन में तीन सांस्कृतिक चरण प्राप्त हुए हैं

नोट :- मध्यपाषाण युगीन, ताम्र युगीन, लौह युगीन सभ्यताओं के साक्ष्य मिले हैं परन्तु नव पाषाण के साक्ष्य प्राप्त नहीं हुए हैं।

तिलवाड़ा(बालोतरा)

  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  –  इस स्थल का उत्खनन कार्य 1967-68 ई. में वी.एन.मिश्र , विजय कुमार एवं एल.सी.लैसनिक (हिडलबर्ग विश्वविद्यालय) के नेतृत्त्व में किया गया।
  • नदी क्षेत्र  – लूनी नदी 
  • प्रमुख विशेषताएँ  –
    • इस सभ्यता से प्राचीनतम पशुपालन के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
    • इस स्थल से मानव हस्ती भस्म प्राप्त हुई हैं।
    • इस स्थल से गोलाकार अग्नि कुंड प्राप्त हुए हैं।
    • इस स्थल से पाँच आवास स्थलों के साक्ष्य मिले हैं।

नव पाषाण काल

  • नव पाषाण शब्द का प्रयोग जॉन लुब्बाक ने सर्व प्रथम किया।
  • मानव मस्तिष्क में मूल्यों का विकास – उदारता ,नैतिकता ,दया , करुणा , लालच , छीना झपटी , झूठ आदि मूल्यों का विकास।
  • कृषि की शुरुआत 
  • जंगली जानवरों को पालतू बनाना 
  • स्थिर ग्रामीण जीवन 
  • मृदभांडों का निर्माण 
  • कुम्हार के चाक का प्रयोग 
  • पॉलिशदार पाषाणिक उपकरणों का प्रयोग 
  • प्रमुख औज़ार:- कुल्हाड़ी,छेनी,बसूला,घर्षित औज़ार  
  • प्रमुख स्थल:- विराटनगर (कोटपूतली-बहरोड़),हम्मीरगढ़ (भीलवाड़ा),भरनी (टोंक),सोहनपुरा (सीकर),हरसौरा (अलवर),समदड़ी (बाड़मेर),आलनीया (कोटा)
नवपाषाण कालीन स्थल
  • परिभाषा : – 
    • ताम्र पाषाण काल (Chalcolithic Age) वह युग था जब मानव ने ताँबे (Copper) के साथ पत्थर (Stone) के औज़ारों का प्रयोग किया।
    • यह युग पाषाण और लौह काल के बीच का संक्रमण काल माना जाता है।
  • कालक्रम और तकनीकी स्थिति : – 
    • तकनीकी दृष्टि से ताम्र पाषाणिक सभ्यताएँ हड़प्पा सभ्यता से पहले की मानी जाती हैं।
    • लेकिन कालक्रम की दृष्टि से अधिकांश ताम्र पाषाणिक सभ्यताएँ हड़प्पा काल के बाद विकसित हुईं।
  • प्रमुख विशेषताएँ : – 
    • इस काल में स्थायी ग्रामीण संस्कृति (Permanent Rural Culture) का विकास हुआ।
    • मानव ने कृषि और पशुपालन को जीवन का मुख्य आधार बनाया।
    • मृदभांडों (Pottery) पर चित्रांकन प्रारंभ हुआ – ज्यामितीय और प्राकृतिक आकृतियाँ बनाई जाती थीं।
    • पक्की ईंटों (Baked Bricks) का प्रयोग नहीं किया जाता था।
    • पशुपालन केवल मांस प्राप्ति के लिए किया जाता था,
      डेयरी उपयोग (दूध, घी आदि) के लिए नहीं।
    • ताम्र पाषाणिक लोग लेखन कला से अपरिचित थे।
    • धातु के साथ पत्थर के औज़ारों का संयुक्त उपयोग किया जाता था।
  • पतन के कारण : – 
    • ताम्र पाषाणिक सभ्यताओं के लुप्त होने का मुख्य कारण वर्षा की कमी (Climatic Aridity) माना जाता है।
    • जलस्रोतों के सूखने और कृषि संकट के कारण ये सभ्यताएँ समाप्त हो गईं।

राजस्थान की प्रमुख ताम्र पाषाणिक संस्कृतियाँ

गणेश्वर (नीम का थाना )2800 ई.पू.

  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  – R.C. अग्रवाल – 1972
  • नदी – कांतली 
  • प्रमुख विशेषताएँ  –
    • इस संस्कृति को ताम्र संस्कृतियों की जननी कहा जाता हैं। 
    • इस स्थल के लोग हड़प्पा को ताँबे का निर्यात करते थे। 
    • इस स्थल से ताँबे की वस्तुएँ ,चूड़ियाँ ,बाण,भाला, मछली पकड़ने के काँटे आदि प्राप्त हुए हैं।
    • इस स्थल से प्राप्त वस्तुओं में 99% शुद्ध तांबा मौजूद हैं।         
    • इस स्थल से ताँबा गलाने की भट्ठियाँ नहीं मिली
    • इस स्थल से काले व नीले रंग से अलंकृत मृदभांड मिले जिन्हें कपिषवर्णी  मृद भांड भी कहा जाता है।
    • इस स्थल से पत्थर से बने बांध के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं।
    • इस स्थल से दोहरी पेचदार सीरेवाली ताम्र पिन भी प्राप्त हुई है।

आहड़(उदयपुर)4000 ई.पू.

अनाज रखने के गोरे
  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  –
    • अक्षय कीर्ति व्यास – 1953  
    • वी.एन.मिश्र 
    • रतन चन्द्र अग्रवाल
    • डॉ.H.D.साँकलिया
    • पी.एल.चक्रवर्ती – 1961-62
  • नदी – आयड/बेड़च
  • प्रमुख विशेषताएँ  –
    • बनास नदी के आस – पास होने के कारण बनास संस्कृति के नाम से भी जाना जाता हैं।
    • उपनाम – ताम्रवती , आघाटपुर,आघाट दुर्ग,धूलकोट 
    • इस स्थल के लोग मकान बनाने में नींव के अंदर काले शिष्ट पत्थरों का प्रयोग करते थे।
    • इस स्थल के निवासी मकान निर्माण में पत्थरों व धूप में सुखाई हुई ईटों का प्रयोग करते थे।
    • इस स्थल से बैल की मृणमूर्ति(बनासियन बुल)प्राप्त हुई हैं। 
    • इस स्थल से तीसरी शताब्दी ई.पू. से प्रथम शताब्दी ई.पू. ताँबे की छः यूनानी मुद्राएँ , तीन मोहरें  व लेपिस लेजुली मिला हैं।
    • इस स्थल के लोग मृतक को आभूषणों के साथ दफनाते थे।
    • अनाज रखने के बड़े मृद भांड मिले हैं जिन्हें गोरे /कोठे /काठे नाम से जाना जाता था।
    • इस स्थल से ईरानी जल पात्र भी मिले हैं।
    • इस स्थल से छपाई के ठप्पों के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं।
    • इस स्थल से प्राप्त मोहरों पर यूनानी देवता अपोलो का चित्र मिला हैं।
    • इस स्थल से तोलने के बाँट मिले है जिससे प्रतीत होता हैं की वाणिज्य उन्नत अवस्था में था।
    • इस स्थल से 6-7 चूल्हों के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं जिनसे पता चलता हैं की यहाँ संयुक्त परिवार प्रथा मौजूद थी।

रंग महल (हनुमानगढ़) 1000 से 300 ई.पूर्व

  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  – लुण्ड विश्वविद्यालय के स्वीडन दल द्वारा पुरातत्व शास्त्री हन्ना राईड , हॉलगर , अर्बमेन – 1952-54 
  • नदी – घग्घर नदी
  • प्रमुख विशेषताएँ  –
    • यहाँ से डॉ.टेसीटॉरी को 1918 में प्रारंभिक गुप्तकाल की मृणमूर्तियाँ प्राप्त की।  
    • यहाँ से कनिष्क प्रथम व कनिष्क तृतीय की पंचमार्क मुद्रा के सिक्के मिले हैं।
    • यहाँ से 105 ताँबे को सिक्के मिले हैं।
    • गुरु शिष्य की मूर्तियाँ मिली, गांधार शैली की मूर्तियाँ मिली हैं।
    • यहाँ से घंटाकार मृदपात्र, टोंटींदार घड़े, प्याले, कटोरे, बर्तनों के ढक्कन, दीपक, दीपदान, धूपदान मिले।
    • यहाँ से बच्चों के खेलने की मिट्टी की छोटी पहियेदार गाड़ी मिली।
    • यहाँ से कृष्ण लीला के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं। 

ओझियाना(ब्यावर)

  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  –  बी.आर.मीणा एवम् आलोक त्रिपाठी (1999-2000)
  • नदी – यह स्थल नदी के किनारे ना होकर एक पहाड़ी की ढलान पर स्थित हैं।
  • प्रमुख विशेषताएँ  –
    • यहाँ से अनाज पीसने के लिए फर्श पर एक बड़ी काठी-चक्की प्राप्त हुई हैं।
    • यह स्थल आहड़ सभ्यता से संबंधित स्थल हैं।
    • यहाँ से बैल व गाय की मृण मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं जिन पर सफ़ेद रंग का अंकन हैं।
    • यहाँ से कार्नेलियन ,फ़ियांस ,पत्थर के मनके ,शैंक एवं  ताम्र चूड़ियाँ प्राप्त हुई हैं।

लाछुरा(भीलवाड़ा)

  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  – बी.आर.मीणा के निर्देशन में बी.आर.सिंह , एस.सी.सरन कँवर सिंह द्वारा 1998-99 में उत्खनन किया गया। 
  • नदी – यह सभ्यता हनुमान नाला (नदी)के पेटे में अवस्थित हैं यह नाला मानसी नदी की  एक सहायक नदी है।
  • प्रमुख विशेषताएँ  –
    • यहाँ से प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों को मुख्य रूप से चार भागों  में बाटा जा सकता हैं।
      • पूर्व बौद्ध कालीन
      • मौर्य कालीन 
      • शुंग कालीन 
      • कुषाण कालीन
  • यहाँ से ललितासन  में एक नारी की मृण मूर्ति प्राप्त हुई हैं। 
  • यहाँ से प्राप्त मिट्टी की मोहरों पर ब्राह्मी लिपि में चार अक्षर अंकित हैं। 

गिलूण्ड सभ्यता (राजसमंद)

  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  –बी.बी.लाल के निर्देशन में सन् 1957 – 58 ई. में उत्खनन कार्य प्रारंभ किया गया।
    • पूना विश्व विद्यालय के प्रो.वी.एस.शिंदे एवम् पेंसिलवेनिया विश्वविद्यालय(आमेरिका) के प्रो. ग्रेगरी पोशाल के निर्देशन में सन् 1998 से 2003 तक उत्खनन कार्य किया गया।  
  • नदी – बनास 
  • प्रमुख विशेषताएँ  –
    • गिलूण्ड सभ्यता के खुदाई स्थल को मोडिया मगरी के नाम से जाना जाता हैं।
    • दीवारों के मध्य अनाज भरने के कोठे/कोठी के अवशेष भी प्राप्त  हुए हैं।
    • इस स्थल से जानवरों की हड्डियाँ प्राप्त हुई हैं जिनसे अनुमान लगाया जाता हैं की गिलूण्ड निवासी मांसाहारी थे।
    • इस स्थल से एक मटके में गेहूं के दाने भी प्राप्त हुए हैं।
    • इस स्थल से पाँच प्रकार(काले,पॉलिशदार,सादे,भूरे व लाल ) के मृदभांड प्राप्त हुए हैं।
    • गिलूण्ड से मिट्टी के खिलौने ,पत्थर की गोलियाँ , ताम्र निर्मित औजार , हाथी दांत की चूड़ियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। 
    • मृद भांडों पर ज्यामितीय अलंकरण के साथ – साथ प्राकृतिक अलंकरण भी मिलता हैं।
    • गिलूण्ड सभ्यता आहड़ सभ्यता की ही एक उपशाखा मानी जाती हैं।
    • आहड़ सभ्यता में भवन निर्माण में पक्की ईंटों का प्रयोग नहीं हुआ हैं परंतु गिलूण्ड सभ्यता में पक्की ईंटो का बहुतायत में प्रयोग हुआ हैं।
  • परिभाषा : – 
    • कांस्य  युग (Bronze Age) वह काल है जब मानव ने कांस्य (Copper + Tin Alloy) का निर्माण और प्रयोग आरंभ किया।
      • यह युग ताम्र पाषाण काल के बाद तथा लौह युग से पहले का संक्रमण काल था।
    • इस युग की सभ्यता को प्रायः “धातु युग का स्वर्ण काल” भी कहा जाता है।
  • तकनीकी प्रगति : – 
    • धातु प्रगलन (Metal Smelting) की खोज से मानव ने ताँबे और राँगे को मिलाकर कांस्य तैयार किया।
    • इससे कृषि उपकरण, औज़ार, हथियार और आभूषण अधिक मजबूत व उपयोगी बने।
    • पहिए का आविष्कार (Invention of Wheel) इसी युग की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी।
    • इस युग में मानव ने लेखन प्रणाली (Script/Writing System) का भी विकास किया —  जिससे प्रशासन और व्यापार अधिक संगठित हुआ।
  • सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन : – 
    • धातु निर्माण और व्यापार के विकास से घनी आबादी वाले समाजों का गठन हुआ।
    • मानव अब स्थायी बस्तियों (Permanent Settlements) में रहने लगा।
    • वर्ग विभाजन (Social Stratification) की प्रक्रिया प्रारंभ हुई — शासक वर्ग, पुरोहित वर्ग, व्यापारी वर्ग और श्रमिक वर्ग के रूप में समाज विभाजित हुआ।
    • संगठित राज्यों (Organized States) की स्थापना हुई — जो प्रारंभिक शासन व्यवस्था का संकेत देती है।
    • व्यापारिक मार्गों का विस्तार हुआ; धातु वस्तुओं का आदान-प्रदान बढ़ा।
  • सांस्कृतिक विशेषताएँ :
    • कला और स्थापत्य में धातु का व्यापक प्रयोग हुआ।
    • मूर्तिकला और आभूषण निर्माण में निपुणता बढ़ी।
    • इस काल में नगर नियोजन (Urban Planning) और सिंचाई व्यवस्था का आरंभ हुआ।
    • हड़प्पा सभ्यता (Indus Valley Civilization) इस काल की प्रमुख और विकसित संस्कृति मानी जाती है।

कालीबंगा सभ्यता / सिंधु सरस्वती सभ्यता(हनुमानगढ़

  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  – 
    • अमलानंद घोष ने सन् 1952 ई. में इस पुरातात्विक स्थल की खोज की।
    • इस स्थान का उत्खनन कार्य सन् 1961 ई. से 1969 ई.के बीच ‘श्री बी. बी. लाल‘, ‘श्री बी. के. थापर‘, ‘श्री डी. खरे‘, के. एम. श्रीवास्तव एवं ‘श्री एस. पी. श्रीवास्तव’ के निर्देशन में हुआ था।
    • नोट:- दशरथ शर्मा ने क़ालीबंगा को सिंधु सभ्यता की तीसरी राजधानी कहा हैं। 
  • नदी – घग्घर नदी (प्राचीन सरस्वती नदी) 
  • प्रमुख विशेषताएँ  –
    • यहाँ से उत्खनन में पाँच सांस्कृतिक चरण प्राप्त हुए हैं। 
    • यहाँ मिली तांबे की काली चूड़ियों के कारण ही इस स्थान को ‘कालीबंगा’ कहा गया हैं।
    • यहाँ से अलंकृत ईंटों के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। 
    • यहाँ से भूकम्प  के प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
  • मस्तिष्क शोध के प्रमाण (6छिद्र वाली बालक की खोपड़ी)
  • यहाँ की लिपि दायें से बायें लिखी जाती थी।
  • यहाँ के उत्खनन में लघु पाषाण उपकरण,मिट्टी के मनके, शंख, कांच व मिट्टी की चूड़ियां, खिलौना, गाड़ी के पहिए, बैल की खण्डित मृण्मूर्ति, सिलबट्टे आदि के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
  • यहाँ से तांबे के धातु से बने हथियार मिले हैं। इससे पता चलता है कि वे लोग हथियारों से और तांबे की धातु से परिचित थे।
  • कृषि – 
    • यहाँ से दोहरे जुते हुए खेत के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
    • यहाँ से एक साथ दो फसलों के प्रमाण भी मिले हैं – चना व सरसों  
    • अन्य प्रमुख फसलों के साक्ष्य – सरसों,चना,राई,बाजरा,गेहूं ,जौ,कपास 
    • इस स्थल को वैदिक साहित्य में बहुधान्यदायक प्रदेश के नाम से जाना जाता था।
    • यहाँ से ताँबे की बैल मूर्ति प्राप्त हुई हैं।
  • मोहरें –   
    • यहाँ से शैलखड़ी की मुहरें और मिट्टी की छोटी मुहरें मिली हैं। 
    • मिट्टी की मुहरों पर सरकंडे की आकृति छपी मिली है।
    • यहां से प्राप्त मुहरें ‘मेसोपोटामिया’ की मुहरों से मिलती हैं।
    • यहाँ से बेलनाकार यूनानी मोहरें भी प्राप्त हुई हैं।
  • वाणिज्य – 
    • यहाँ से प्राप्त पत्थर के  बने बाट से पता चलता है कि यहाँ के लोग तौलने के लिए बाट का उपयोग किया करते थे।(विकसित वाणिज्य का संकेत)
    • यहाँ से विदेशी सामग्री प्राप्त होने से अनुमान लगाया जाता हैं की कालीबंगा के निवासियों के व्यापारिक संबंध विदेशियों से रहे होंगे। 
  • धार्मिक मान्यताएँ – 
    • सात अग्नि वैदियाँ प्राप्त हुई हैं।
    • कालीबंगा के मृदभांडों से स्वस्तिक  के चित्र प्राप्त हुए हैं। 
    • यहाँ अंत्येष्ठी संस्कार की तीन विधियां प्रचलित थीं: पूर्ण समाधीकरण, आंशिक समाधिकरण और दाह संस्कार।
  • राजस्थान का कांस्य  युग और सभ्यता का विकास
    • कालीबंगा पुरातात्विक संग्रहालय की स्थापना 1983 ई.में की गई थी।
    • इस पुरातात्विक संग्रहालय में कालीबंगा की 1961ई. से 1969 ई.के बीच की गई खुदाई से प्राप्‍त सामग्रियों को रखा गया।
  • कालीबंगा में प्राप्त टीले – 
राजस्थान के प्रागैतिहासिक स्थल

कालीबंगा से प्राप्त सामग्रियों के चित्र – 

राजस्थान के प्रागैतिहासिक स्थल

बरोर (अनूपगढ़) पुरातात्विक स्थल

  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  – 
    • इस पुरातात्विक स्थल बरोर की पहचान 1916 -17 ई. में लुईजीपीयो टेस्सीटोरी ने की थी। 
    • भारत की स्वतंत्रता के बाद अमलानंद घोष (पूर्व महानिदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ) ने इस स्थल का विस्तृत सर्वेक्षण किया।
    • इस स्थल का उत्खनन कार्य 2003 ई. में प्रारंभ हुआ।
  • नदी – घघर नदी 
  • प्रमुख विशेषताएँ  –
    • यह सभ्यता प्राक् हड़प्पा एवम् विकसित हड़प्पा कालीन मानी जाती हैं।
    • इस पुरातात्विक स्थल से एक पात्र में लगभग 8000 सेलखड़ी मनके प्राप्त हुए हैं।
    • इस स्थल से लाजवर्द मनके प्राप्त हुए हैं जो केवल अफगानिस्तान में मिलते हैं संभवत:बरोर वासियों ने इन मनकों को अफगानिस्तान से ही मँगवाया होगा।
    • इस सभ्यता की प्रमुख विशेषता यह हैं की यहाँ से सुनियोजित नगर विन्यास , भवन निर्माण में कच्ची ईंटो का प्रयोग(कालीबंगा सभ्यता की तरह),उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था के प्रमाण मिले हैं।
    • इस स्थल से प्राप्त मृदभाण्डों में काली मिट्टी मिली हैं जो की इनकी विशिष्ट पहचान हैं।
    • इस स्थल से तराशी हुई चूड़ियाँ , अंगूठी व बोरला भी प्राप्त हुआ हैं।
    • इस स्थल से बटन के आकर की मोहरे भी प्राप्त हुई हैं।

सौथीं(बीकानेर) पुरातात्विक स्थल

  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  –
    • इस स्थल की खोज लुइगी पिओ टेस्सितोरी ने की थी।
  • इस स्थल का उत्खनन कार्य अमलानन्द घोष के निर्देशन में किया गया। 
  • अन्य व्यक्तित्व – ऑरेल स्तीन , क्षेत्रम दलाल 
  • नदी – घग्गर और चौतांग नदी 
  • प्रमुख विशेषताएँ  – 
    • इस स्थल से पाए गए मिट्टी के बर्तनों के आधार पर इसे एक अलग पुरातात्विक संस्कृति/उपसंस्कृति के रूप में वर्गीकृत किया गया है। 
    • इस स्थल से प्राप्त चीनी मिट्टी के बर्तनों पर पीपल के पत्तों व फ़िश स्केल के चित्रों का अंकन प्राप्त हुआ हैं।
    • इस स्थल को क़ालीबंगा प्रथम के नाम से भी जाना जाता हैं।
    • इस संस्कृति के अवशेष  राजस्थान, हरियाणा और भारतीय पंजाब में व्यापक रूप से प्राप्त हुए हैं।

बैराठ(कोटपूतली-बहरोड़) पुरातात्विक स्थल

  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता 
    • प्रारंभिक खोज 1837 ई.में कैप्टन बर्ट ने की थी।
  • बैराठ का उत्खनन कार्य दयाराम साहनी के नेतृत्व में 1936-37 ईस्वी में नीलरत्न बनर्जी और कैलाशनाथ दीक्षित द्वारा किया गया।
  • नदी – बाणगंगा नदी
  • प्रमुख विशेषताएँ  –
    • मत्स्य महाजनपद की राजधानी थी – विराटनगर या बैराठ।
    • बैराठ से निम्न पहाड़ियों पर पुरातात्विक साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। 

भाब्रू शिलालेख – 

  • 1837 में कप्तान बर्ट द्वारा बीजक पहाड़ी से अशोक का भाब्रू शिलालेख खोजा गया। 
  • भाब्रू शिलालेख में शंख लिपि प्रयुक्त हुई है।
  • भाब्रू शिलालेख से प्रतीत होता है कि अशोक बौद्ध धर्म का अनुयायी था।
  • भाब्रू शिलालेख में बौद्ध धर्म के त्रिरत्नों का उल्लेख मिलता हैं-बुद्ध,धम्म और संघ।
  • वर्तमान में यह शिलालेख कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित हैं।

बैराठ के मंदिर – 

  • दयाराम सहानी को 1936 ई.में बैराठ उत्खनन के समय गोलाकार बौद्ध  मंदिर व चैत्य के अवशेष प्राप्त हुए।
  • गोलाकार बौद्ध  मंदिर के परिसर में उत्कीर्ण शक संवत् 1509 के शिलालेख से इस के निर्माण की जानकारी मिलती हैं।
  • बैराठ में 16 वीं शताब्दी का एक पार्श्वनाथ मंदिर भी विद्यमान हैं।
  • विक्रम संवत् 1743 का सती शिलालेख भी विद्यमान हैं।
  • बैराठ से प्राप्त स्तूप,मंदिरों का निर्माण पत्थरों की मौजूदगी के बावजूद ईटों से किया गया हैं।  
  • इन ईटों की बनावट मोहनजोदड़ो की ईटों के समान हैं।

बैराठ का दूसरा शिलालेख – 

  • इस लघु शिलालेख की खोज कार्लाईल ने 1871-72 में की थी।
  • यह अशोक के रूपनाथ व सहसाराम शिलालेख की प्रतिलिपि हैं।
  • इस शिलालेख की लिपि ब्राह्मी हैं।
  • वर्तमान में यह काल प्रभाव के कारण पढ़े जाने योग्य नहीं हैं।  
  • चीनी यात्री ह्वेनसांग – 
    • ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृतांत में बैराठ में आठ बौद्ध मठो का उल्लेख किया हैं।
    • चीनी यात्री ह्वेनसांग बैराठ में बौद्ध मठो के भग्नावशेषों को देखने आया था।
    • सी-यू-की में ह्वेनसांग ने राजस्थान के दो स्थलों – बैराठ और भीनमाल का उल्लेख किया है। 
  • बैराठ से मुग़ल संबंध – 
    • अकबर के सेनापति आमेर शासक मानसिंह ने बैराठ में एक दरवाज़े का निर्माण करवाया जिसे मुग़ल दरवाजे(अकबर का विश्राम गृह) के नाम से जाना जाता हैं। 
    • आमेर शासक मानसिंह ने यहाँ एक बाग का निर्माण करवाया।
    • मुग़ल काल में यहाँ टकसाल थी।
    • बैराठ अकबर का पसंदीदा शिकारगाह था।
  • बैराठ पुराताविक स्थल के अन्य तथ्य – 
    • जयपुर नरेश रामसिंह द्वितीय के समय यहां पर उत्खनन कार्य करवाया गया। इस उत्खनन कार्य में एक स्वर्ण-मंजूषा प्राप्त हुई। 
    • इस स्वर्ण-मंजूषा में बौद्ध अवशेष मिले हैं।
    • बैराठ से सूती वस्त्र में बंधी हुई 36 मुद्रायें मिली हैं।
    • इन मुदाओं में से  28 इंडो-ग्रीक(16 मिनांडर की ) शासकों की और 8 पंचमार्क/आहत मुद्रायें हैं। 
    • बैराठ का विध्वंस मिहिरकुल ने किया था।

भीनमाल(जालौर) पुरातात्विक स्थल

  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  – R.C अग्रवाल द्वारा सन् 1953 – 54 ई.में किया गया।
  • भीनमाल पुरातात्विक स्थल के अन्य तथ्य – 
    • भीनमाल का प्राचीन नाम श्रीमल/श्रीमाल  था।
    • चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भीनमाल की यात्रा की थी और इसका नाम पीलोमोलो बताया। 
    • भीनमाल से शक शत्रपों(शक शासकों के सामंत) के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
    • यहाँ से प्राप्त मृदभाण्डों पर विदेशी प्रभाव दृष्टि गोचर होता हैं।
    • यहाँ से यूनानी सुराही मिली हैं जिससे प्रतीत होता हैं की भीनमाल का यूनान से व्यापारिक संबंध था।
    • यहाँ से रोमन सुरा पात्र भी प्राप्त हुआ हैं।
    • यह स्थल प्रसिद्ध गणितज्ञ-खगोलशास्त्री ब्रह्मगुप्त का जन्मस्थान है।
    • शिशुपाल वध महाकाव्य के लेखक माघ की जन्म स्थली। 
    • यह गुर्जर देश राज्य की प्रारंभिक राजधानी थी।

बालाथल की सभ्यता(उदयपुर)

  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  – 
    • इस स्थल की खोज सन् 1961- 62 ई. में वी.एन.मिश्रा ने की थी। 
    • इस स्थल का उत्खनन कार्य 1993 ई. में वी.एन.मिश्रा के नेतृत्व में हुआ।
  • नदी क्षेत्र – बेड़च नदी  (बनास की सहायक नदी घाटियों में)
  • प्रमुख विशेषताएँ  –
    • बालाथल पुरातात्विक स्थल के उत्खनन में दो सांस्कृतिक चरण प्राप्त हुए हैं – 1.ताम्र युगीन  2.लौह युगीन 
    • इस स्थल से सांड की अनेक मृण मूर्तियाँ मिली हैं जिनका प्रयोग संभवतया पूजा करने में किया जाता था।
    • इस स्थल से अपरिष्कृत मृद भांड मिले हैं जो पूरी तरह पके हुए भी नहीं हैं।
    • इस स्थान से योगी मुद्रा में शवादान प्राप्त हुए हैं।
    • यहाँ से प्राप्त ताम्र उपकरणों पर हाथी व चंद्रमा की आकृति का अंकन प्राप्त हुआ हैं।                                                                                              
    • इस स्थल से पाँचवी सदी पूर्व का एक हाथ से बना हुआ कपड़ा प्राप्त हुआ हैं।
    • इस स्थल से 4000 ई.पूर्व का एक कुष्ठ रोगी का कंकाल प्राप्त हुआ हैं।
    • इस स्थल से लौह के औजार प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुए हैं।
    • इस स्थल से पाँच लोहा गलाने की भट्टियाँ प्राप्त हुई हैं।

नगरी सभ्यता (चितौड़गढ़)

  • प्रमुख विशेषताएँ  – 
    • इस स्थल की साम्यता पाणिनि की अष्ठाध्याय में उल्लेखित माध्यमिका  से की जाती हैं।
    • इस स्थल से शिवि जनपद के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
    • इस स्थल से कुषाण कालीन एक सुरक्षा प्राचीर प्राप्त हुई।
    • इस स्थल से लेख युक्त शिलाएँ , अलंकृत ईटें , मृण मूर्तियाँ आदि प्राप्त हुई  हैं।
    • इस स्थल से गुप्तकालीन मंदिर के अवशेष मिले हैं जिसमें शिव की प्रतिमा विराजमान हैं।
    • ग्रीक – रोमन प्रभाव से युक्त एक पुरुष शीर्ष प्राप्त हुआ हैं।
    • इस स्थल से चार चक्रात्मक कुओं के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।

सुनारी(झुंझुनू)

  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  – इस स्थल का उत्खनन कार्य राजस्थान पुराताविक विभाग द्वारा सन् 1980 – 81 ई. में करवाया गाया था।
  • नदी क्षेत्र – कांतली नदी 
  • प्रमुख विशेषताएँ  – 
    • इस पुरातात्विक स्थल से लौह गलाने की प्राचीनतम भट्टियों के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
    • इस सभ्यता के लोग भोजन में चावल का उपयोग करते थे।
    • इस सभ्यता के निवासियों द्वारा घोड़ों से रथ खिंचने के प्रमाण मिले हैं।
    • इस पुरातात्विक स्थल से शुंग,मौर्य व कुषाण कालीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
    • इस स्थल से मातृ देवी की मृणमूर्ति व धान संग्रह का कोठा प्राप्त हुआ हैं।

नोह(भरतपुर)पुरातात्विक स्थल

राजस्थान के प्रागैतिहासिक स्थल
  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  – 
    • इस पुराताविक स्थल का उत्खनन कार्य रतन चन्द्र अग्रवाल के निर्देशन में सन् 1963 – 64 ई. में प्रारंभ हुआ।
    • इस पुराताविक स्थल का उत्खनन कार्य 1963 ई. से 1972 ई. तक सात चरणों में चला।
    • रेडियो कार्बन पद्धति से इस स्थल से प्राप्त सामग्री का काल निर्धारण 1100 ई.पूर्व से 900 ई.पूर्व का हुआ हैं।
  • नदी क्षेत्र – रूपारेल नदी 
  • प्रमुख विशेषताएँ  – 
    • इस स्थल से पाँच सांस्कृतिक चरण प्राप्त हुए हैं।
    • इस स्थल से पत्थर की एक विशाल प्रतिमा मिली हैं जिसे जाख बाबा के नाम से जाना जाता हैं।
    • इस स्थल से हुविष्क व वासुदेव कुषाण के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।
    • इस पुरातात्विक स्थल की सबसे महत्त्वपूर्ण  बात यह हैं की यहाँ से ताम्र युगीन , वैदिक कालीन व महाभारत कालीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
    • इस स्थल से कृषि उपकरणों के साथ – साथ 16 चक्रकूपो के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। 

नगर (टोंक) पुरातात्विक स्थल

  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  –
    • इस पुराताविक स्थल की खोज ए.सी. एल कार्लाइल ने सन् 1871 – 72 ई. में की थी।
    • इस पुरातात्विक स्थल के उत्खनन से कृष्ण देव व के.वी.सौंदराजन भी जुड़े हुए हैं।
  • प्रमुख विशेषताएँ  – 
    • इस स्थल से 6000 ताँबे के मालव सिक्के प्राप्त हुए हैं जिनसे अनुमान लगाया जाता हैं की यहाँ मालव जनपद की टकसाल रही होगी।
    • इन सिक्को की खोज का श्रेय ए.सी. एल कार्लाइल को जाता हैं।
    • इन मुद्राओ का अध्ययन  बिन्सेट स्मिथ ने किया।
    • इस पुरातात्विक स्थल से कलात्मक अनाज भरने के मटके प्राप्त हुए हैं।
    • इस स्थल से शुंग कालीन इंद्र – इंद्राणी व कामदेव – रति की प्रतिमा मिली हैं।
    • इस स्थल से गुप्तोत्तर कालीन महिषासुर मर्दनी की प्रतिमा , एक मुखी शिवलिंग , लक्ष्मी , गणेश , दुर्गा आदि की प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं।

रेढ़(टोंक)पुरातात्विक स्थल

  • खोज कर्त्ता  /उत्खनन कर्त्ता  – इस पुराताविक स्थल का उत्खनन सन् 1938 ई.में दयाराम सहानीके.एन.पूरी द्वारा करवाया गाया।
  • नदी क्षेत्र – ढेल/ढील  नदी 
  • प्रमुख विशेषताएँ  – 
    • इस स्थल से लोहे के औजार अत्यधिक मात्रा में मिले हैं इस कारण से इस स्थल को प्राचीन भारत का टाटा नगर कहा जाता हैं।
    • इस पुरात्विक स्थल से 3075 आहत मुद्राएँ मिली हैं इन मुद्राओं में मालवा , मित्र शासकों , इंडोनियन सिक्के व यूनानी शासक अपोलोडॉट्स का खंडित सिक्का प्रमुख हैं।
    • इस स्थल से 115 चक्रकूपों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
    • इस स्थल से प्राप्त सीसे के सिक्के पर मालव जनपद अंकित हैं जिससे सिद्ध होता हैं की ये क्षेत्र मालव जनपद के आधिपत्य में था।
    • सीसे की मोहर जिस पर “जनपदस्य “ लिखा हुआ हैं।
    • इस स्थल से सेलखड़ी(बौद्ध भिक्षुओं की डिब्बियों के समान) की डिब्बियाँ प्राप्त हुई हैं।
सभ्यता काल प्रमुख सभ्यता स्थल कालानुसार प्रमुख विशेषता 
पुरापाषाण जायल(डीडवाना) , इंद्रगढ़ (बूंदी) , विराटनगर (कोटपूतली-बहरोड़) , गोगा खेड़ा (राजसमंद), बुढ़ा पुष्करशिकारी घुमक्कड़ 
मध्यपाषाण बागौर(भीलवाड़ा) , तिलवाड़ा (बालोतरा) , सोजत(पाली) , निम्बाहेडा (चित्तौड़गढ़) , पंचपद्रा (बाड़मेर)पशुपालन की शुरुआत, लघु पाषाण औजार 
नवपाषाण विराटनगर (कोटपूतली-बहरोड़) , हम्मीरगढ़ (भीलवाड़ा) , भरनी (टोंक) , सोहनपुरा (सीकर) , हरसौरा (अलवर) , समदड़ी (बाड़मेर) , आलनीया (कोटा)कृषि की शुरुआत, मृदभांडों का निर्माण, स्थिर ग्रामीण जीवन, पहिये का अविष्कार, अग्नि से परिचय 
ताम्रपाषाण नन्दलालपूरा , किराड़ोत , चौथी बाड़ी(जयपुर) ,साबनिया , पुंगल (बीकानेर) कुराड़ा(डीडवाना) , पिण्ड पालडियाँ(चित्तौड़गढ़)  गणेश्वर(नीमकाथाना) , पलाना(जालौर) , कोल माहौली(सवाई माधोपुर) , मलाह(भरतपुर) , झाड़ोल(उदयपुर)मृद भांडों पर चित्रों का अंकन, ताँबे का उपयोग 
कांस्य  युग कालीबंगा सभ्यता / सिंधु सरस्वती सभ्यता(हनुमानगढ़) , बरोर (अपूपगढ़) , सौथीं(बीकानेर) धातु प्रगलन की खोज, संगठित राज्यों का उदय
लौह युग भीनमाल(जालौर) , चक – 84 , तरखानवाला  डेरा(श्रीगंगानगर) , नोह(भरतपुर) , विराटनगर , जोधपुरा , सांभर(जयपुर ग्रामीण) , सुनारी (नीमकाथाना) ,ईसवाल(उदयपुर)नगरी(चितौड़) ,नगर , रेढ़  (टोंक)नैनवा(बूंदी)कृषि का विकास, कठोर व मजबूत औज़ारो का निर्माण 
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