राजस्थान के संत एवं संप्रदाय राज्य की समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा और सांस्कृतिक चेतना के महत्वपूर्ण आधार स्तंभ रहे हैं। राजस्थानी कला व संस्कृति के अंतर्गत इन संतों की शिक्षाएँ, लोकभक्ति परंपराएँ तथा विभिन्न संप्रदायों की विचारधाराएँ समाज में नैतिकता, समरसता और लोकजागरण को सुदृढ़ करती हैं। राजस्थान की धार्मिक विरासत में संत परंपरा का विशिष्ट और प्रभावशाली स्थान है।
प्रमुख संत एवं संप्रदाय
संत जाम्भोजी(निर्गुण)
- जन्म – पीपासर गाँव (नागौर) में 1451 ईस्वी (विक्रम संवत् 1508) में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (जन्माष्टमी)
- पिता – लोहटजी पंवार तथा माता – हंसा बाई
- पंवार गोत्र, बचपन का नाम – धनराज
- विष्णु के अवतार, गुरु का नाम – गोरखनाथ
- विश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना
- 1485 ईस्वी को कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन सम्भराथल (बीकानेर) में
- अनुयायियों को उनतीस सिद्धान्तों (20+9) का पालन करने का आदेश
- जाम्भोजी द्वारा रचित ग्रंथ –
- जम्भसागर (29 नियम)
- जम्भवाणी (120 शब्द संग्रहित)
- जम्भसंहिता / जम्भगीता – जम्भोजी के अनुयायी 151 शब्दों का संकलन को पाँचवाँ वेद एवं उन्नीसवाँ पुराण मानते हैं।
- विश्नोई धर्मप्रकाश
- आराध्य स्थल-
- मुकाम (नोखा, बीकानेर) –
- समाधि स्थल (1536 ई., टोपी की पूजा)
- मेला – प्रतिवर्ष फाल्गुन और अश्विन की अमावस्या
- पीपासर (नागौर, खड़ाऊ पूजन)
- लालासर (बीकानेर)
- रामड़ावास (जोधपुर ग्रामीण)
- जांगलू (बीकानेर, भिक्षापात्र और चोला की पूजा)
- जाम्भा (फलोदी)
- लोहावट (जोधपुर) –
- दूसरा मुकाम कहा जाता है
- जाम्भोजी के पैर के निशान की पूजा
- मुकाम (नोखा, बीकानेर) –
- शिक्षाएँ-
- नीले कपड़े नही पहनने चाहिए (सफेद कपड़े प्रिय)
- जीव हत्या नही करनी चाहिए
- विधवा विवाह को बढ़ावा दिया
- हरे पेड़ नहीं काटने चाहिए
- शब्दी / गयणा – संप्रदाय के ग्रंथों को पढ़ने वाला
- पाहल संस्कार – जाम्भोजी द्वारा तैयार अभिमंत्रित जल, इसे पिलाकर जाम्भोजी ने आज्ञानुवर्ती समुदाय को विश्नोई पंथ में दीक्षित किया (पुल्होजी प्रथम व्यक्ति)
- साथरी – विश्नोई सम्प्रदाय का उपदेश स्थल
- पर्यावरण वैज्ञानिक – पर्यावरण के प्रति लगाव होने के कारण (पर्यावरण आन्दोलन का प्रथम प्रणेता) – सिर साटे रूख रहे, तो भी सस्तों जाण
- डॉ. पेमाराम → गूंगा बहरा/गेहला-गूंगा संत कहा
- मोटो – खेजड़ी वृक्ष
- कथा जैसलमेर की –
- संत कवि वील्होजी द्वारा लिखित प्रसिद्ध कविता।
- जाम्भोजी के समकालीन 6 राजाओं के बारे में जानकारी, जो उनके अनुयायी थे
- सिकन्दर लोदी (दिल्ली बादशाह), नवाब मोहम्मद खाँ (नागौर), राव दूदा (मेड़ता), राव जैतसी (जैसलमेर), राव सातलदेव (मारवाड़), राणा सांगा (मेवाड़), राव लूणकरण (बीकानेर)
जसनाथजी (निर्गुण)
- जन्म – 1482 ई. (विक्रम संवत् 1539), कतरियासर गाँव (बीकानेर), कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी)
- पिता – हम्मीर जी, माता – रूपादे (पौष्य पुत्र), बचपन का नाम जसवंतसिंह
- जाट जाति से संबंधित, (ज्याणी जाट), गुरु – गोरखनाथ
- ज्ञान प्राप्ति – 12 वर्ष तपस्या के बाद बीकानेर के गोरखमालिया नामक स्थान पर, आश्विन शुक्ल सप्तमी को
- समाधि – 1506 ई., आश्विन शुक्ल सप्तमी (कतरियासर)
- जसनाथी सम्प्रदाय की स्थापना –
- 1504 ई. में कतरियासर (बीकानेर)
- कुल 36 नियम,
- लोग गले में काले रंग का धागा बांधते हैं
- जाल वृक्ष तथा मोर पंख पवित्र मानते हैं
- अग्नि नृत्य (‘फतह -फतह’ का जयघोष)
- परमहंस – सम्प्रदाय के अनुयायी, जो पूरी तरह से इस संसार से विरक्त हो गए (अविवाहित, गले में काली मोटी ऊन का धागा)
- सिद्ध – जसनाथी सम्प्रदाय के अनुयायी, जिन्होंने भगवा धारण किया
- इस सम्प्रदाय के प्रमुख ग्रंथ सिंभुदड़ा (जसनाथजी के उपदेशों का संकलन), कोंडा, जलम झूमरो, गोरख छंद, सिद्ध जी रो सिरलोको, जसनाथी पुराण (36 नियम)
- जसनाथजी के प्रमुख शिष्य हंसो जी, रुस्तम जी, हीरा जी
- दिल्ली के बादशाह सिकन्दर लोदी ने जसनाथजी के चमत्कारों से प्रभावित होकर कतरियासर (बीकानेर) में 500 बीघा जमीन भेंट की थी
- जसनाथी सम्प्रदाय के प्रमुख संत –
- लालनाथ जी (जीव समझोतरी)
- रामनाथ जी (यशोगान पुराण – जसनाथी सम्प्रदाय का बाईबल)
- रुस्तम जी (अग्नि नृत्य)
- चौखनाथ जी
- सवाईदास जी
- जियोजी एव हारोजी
- जसनाथी सम्प्रदाय पीठें –
- कतरियासर (बीकानेर – प्रधान पीठ)
- मालासर (बीकानेर) – टोड़रजी द्वारा
- लिखमादेसर (बीकानेर) – हंसोजी द्वारा
- पूनरासर (बीकानेर) – हालोजी द्वारा
- बम्बलू (बीकानेर) – हारोजी द्वारा
- पांचला सिद्धा (नागौर) – बोयत जी द्वारा
- मेला- वर्ष में तीन बार (चैत्र, आश्विन तथा माघ माह की शुक्ल सप्तमी को)
संत दादू दयाल जी (निर्गुण)
- जन्म अहमदाबाद (गुजरात) में 1544 ई. में फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को, बचपन का नाम महाबली
- लोक मान्यता – दादूदयालजी साबरमती नदी में लोदीरामजी नामक एक ब्राह्मण को संदूक में मिले
- पालन-पोषण – लोदीरामजी एवं उनकी पत्नी सावित्री देवी ने
- दो पुत्रियाँ – शोभा कंवरी, रूप कंवरी
- आमेर शासक मानसिंह, भगवंतदास के समकालीन, ‘राजस्थान का कबीर’ के नाम से भी प्रसिद्ध
- 1585 ई. में दादूदयालजी ने आमेर के राजा भगवंतदास के साथ इबादतखाना (फतेहपुर सीकरी) में अकबर से मुलाकात की थी
- गुरु – बुड्ढन बाबा (वृद्धानंदजी / ब्रह्मानंद) → ये कबीर दास जी के शिष्य थे।
- प्रधान पीठ – नरैना (दूदू)
- मुख्य मेला – फाल्गुन शुक्ल अष्टमी
दादू पंथ की स्थापना –
- स्थापना – 1574 ई. में सांभर में दादू पंथ/निपंख सम्प्रदाय/ब्रह्म सम्प्रदाय की स्थापना की
- अभिवादन शब्द – सत्तराम (सत्यराम)
- सत्संग स्थल – ‘अलख दरीबा’
- उपदेश – ब्रह्मा, जगत और मोक्ष पर सरल मिश्र हिन्दी+ढूंढाडी (सधुक्कड़ी) में, साहित्यिक भाषा – ढूँढाड़ी, भक्ति धर्म से बढ़कर साम्प्रदायिक पथ से परे होती है (निपख भक्ति)
- दादू पंथी अविवाहित रहते है, पुत्र गोद लेकर पंथ का प्रसार करते है
- निधन – 1603 ई. में ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी – नरैना / नारायणा (फुलेरा)
- 5 शाखा – दादूजी की मृत्यु के पश्चात दादू पंथ 5 शाखा में विभक्त हो गया था,
- खालसा – गरीबदासजी की आचार्य परम्परा से संबंधित साधु, मुख्य पीठ नारायणा
- विरक्त – घूम-घूम कर दादू पंथ का उपदेश देने वाले साधु
- उत्तरादे या स्थानधारी – वे साधु जो राजस्थान को छोड़कर उत्तरी भारत में दादू पंथ का प्रचार-प्रसार करने गए। इस शाखा के संस्थापक दादूजी के शिष्य बनवारीदास जी थे
- खाकी – वे साधु जो अपने शरीर पर भस्म लगाते हैं एवं लम्बी जटा रखते हैं
- नागा – इस शाखा के प्रवर्तक सुन्दरदासजी थे। ये साधु कृषि व व्यापार का कार्य करते थे एवं शस्त्र रखते थे।
- दादूखोल / दादूपालका – दादूदयालजी के शव को जयपुर स्थित भैराणा की पहाड़ियों में जिस गुफा के सामने रखा गया
- दादूपंथ में मृत व्यक्ति को जलाते या दफनाते नहीं है, बल्कि खुले मैदान में पशु पक्षियों के खाने के लिए रख दिया जाता है।
- पंथ के पंचतीर्थ स्थल– 1. कल्याणपुर 2. सांभर 3. आमेर 4. नरैना 5. भैराणा
- प्रमुख ग्रंथ – दादूरी वाणी, दादू रा दूहा, दादू हरडे वाणी, अंग वधू दादू, ‘कायाबेलि’ ग्रन्थ (दादूदयाल द्वारा), संत गुण सागर, नाम माला, वाणी
- कुल 152 शिष्य (52 शिष्य प्रमुख)
- राघवदास ( राघौदास ) द्वारा रचित भक्तमाल में 52 शिष्यों का उल्लेख
- इन शिष्यों ने घूम-घूमकर अपने दादू द्वारों की स्थापना की, जिन्हें दादू पंथ में 52 थाम्बें (स्तम्भ) कहते हैं। 52 शिष्यों में इनके दो पुत्र गरीबदासजी व मिस्किनदासजी थे।
- दादूदयाल जी के प्रमुख शिष्य –
गरीबदासजी
- दादूदयालजी के पुत्र
- दादू दयाल जी की मृत्यु के पश्चात दादू पंथ के उत्तराधिकारी
- जहाँगीर से मुलाक़ात की
- प्रमुख रचनाएँ-
- आध्यात्म बोध
- अनभै प्रबोध
- सासी पद
संत रज्जब जी –
- जन्म – 1567 ई , सांगानेर (जयपुर), मृत्यु सांगानेर , पठान जाति
- प्रधान पीठ – सांगानेर (जयपुर)
- रज्जबजी विवाह के लिए जाते समय रास्ते में दादूदयालजी के उपदेश सुनकर दादू दयाल जी के शिष्य बन गए। और जीवन पर्यन्त दूल्हे के वेष में रहते हुए ही दादू के उपदेशों का बखान किया।
- दादू की मृत्यु के बाद इन्होंने भी अपनी आँखे बंद कर ली थी।
- निवास स्थान – ‘रज्जब द्वार’
- शिष्यों – ‘रज्जबपंथी या ‘रज्जबात’
- प्रमुख रचनाएँ-
- रज्जब वाणी
- सर्वंगी
सुन्दरदास जी
- जन्म – 1596, दौसा
- पिता – परमानंद जी खण्डेलवाल, माता – सती
- प्रधान पीठ- दौसा
- सुन्दरदासजी को ‘दूसरा शंकराचार्य और राजस्थान का शंकराचार्य’ कहा जाता है।
- सुन्दरदासजी श्रृंगार रस के घोर-विरोधी थे
- इनके द्वारा 42 ग्रंथों की रचना (भाषा पिंगल) की गई थी, जिनमें प्रमुख हैं-
- हरिबोल चितावनी, ज्ञान सर्वेया, सुन्दर ग्रंथावली, सुन्दर विलास, ज्ञान समुन्दर, सुन्दर सार, सुख समाधि, बावनी,रामजी अष्टक, पीरमुरीद अष्टक, बारह अष्टक, सबैया
बड़ा सुन्दरदास
- वास्तविक नाम – भीमराज (बीकानेर के शासक जैतसी के पुत्र)
- इन्होंने ‘नागा पंथ’ चलाया था
- नागा शाखा के साधुओं ने मराठों के खिलाफ जयपुर के राजा प्रतापसिंह की सहायता की
- रहने का स्थान – छावनी कहा जाता था।
जगगोपालजी
- प्रधान पीठ – फतेहपुर सीकरी (उत्तरप्रदेश)
- प्रमुख रचनाएँ-
- प्रह्लाद चरित्र
- चौबीस गुरुओं की लीला
- दादू जन्म लीला पर्ची
- ध्रुव चरित्र आदि।
मंगलाराम जी –
- सुन्दरोदय सर्वोतम ग्रंथ की रचना , जिसमें नागा सम्प्रदाय का वर्णन है।
संतदासजी
- अग्रवाल जाति के
- समाधि – 1639 ई. में जीवित समाधि
- संत बालिंद जी राघवदास चरित “भक्तमाल ग्रंथ के अनुसार एक हिरणी का शिकार करते समय मन में उत्पन्न दयाभाव के कारण इन्होने दादू पंथ अपना लिया
- इनकी प्रसिद्ध रचना आरिलों है।
जगन्नाथ दास जी
- प्रसिद्ध ग्रंथ – वाणी और गुण गंजनाम
- हरड़ेवाणी का संकलन संतदास व जगन्नाथ दास ने किया
अन्य शिष्य-
| बखनाजी | जगन्नादास जी |
| मिस्किनदासजी | बनवारीदास |
| माधोदासजी | राघवदास |
| जगजीवनजी | माताबाई |
| जनगोपालजी | नाईबाई, शोभाबाई |
चरणदास जी (सगुण-निर्गुण)
- जन्म – डेहरा गाँव (अलवर) 1703 ई. भाद्रपद शुक्ल तृत्तीय को, निधन – 1782 ई. (नई दिल्ली)
- पिता – मुरली धर, माता – कुँजो बाई
- बचपन का नाम – रणजीतसिंह
- गुरु – शुकदेव जी
- प्रधान पीठ – नई दिल्ली
- एकमात्र संप्रदाय जिसकी प्रधानपीठ राजस्थान से बाहर स्थापित है
- मेला – बसंत पंचमी (समाधि पर, नई दिल्ली)
- चरणदासी सम्प्रदाय –
- चरणदासजी ने भाद्रपद शुक्ल तृत्तीय को
- सम्प्रदाय निर्गुण एवं सगुण भक्ति का मिश्रण
- कुल 42 नियम, अनुयायी पीले वस्त्र धारण करते
- अत्यधिक प्रभाव – मेवात क्षेत्र एवं दिल्ली
- जयपुर के कच्छवाहा वंश के शासक सवाई प्रतापसिंह चरणदासजी के अनुयायी थे।
- चरणदास जी ने नादिरशाह के आक्रमण की भविष्यवाणी की थी। (1739 ई. में आक्रमण किया था)
- चरणदासी पंथ के संत रामरूपजी की गद्दी पानों की दरीबा (जयपुर)
- चरणदासी सम्प्रदाय का ‘बड़े रियापाड़ी वाला मंदिर’ व ‘टोली के कुएँ वाला मंदिर’ अलवर जिले में स्थित है
- डेहरा में चरणदास जी के टोपी, माला, गुदड़ी, चोला सुरक्षित है।
- प्रमुख ग्रंथ –
- ब्रह्म ज्ञान सागर
- भक्ति सागर
- ब्रह्म चरित्र
- ज्ञान सर्वोदय
- प्रमुख शिष्याएँ – दयाबाई, सहजोबाई
- दयाबाई – पुस्तक दयाबोध, विनय मल्लिका है।
- सहजोबाई – पुस्तक सहज प्रकाश, सोलह तिथि, सात वार निर्णय है।
संत मावजी (सगुण+निर्गुण)
- जन्म – साबला गाँव (डूंगरपुर) 1714 ई. (माघ शुक्ल पंचमी)
- पिता – दालरूमसी, माता – केसर बाई
- प्रधान पीठ– साबला गाँव (डूंगरपुर)
- संत मावजी भगवान कृष्ण भक्त थे
- इन्होंने निष्कलंक सम्प्रदाय की स्थापना की
- मावजी को ‘भगवान विष्णु का कल्कि अवतार’ माना जाता है
- इन्होंने कर्म, भक्ति और योग पर बल दिया था
- बेणेश्वर धाम
- संत मावजी ने सोम, माही व जाखम नदियों के संगम पर की स्थापना की
- मेला – प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा (आदिवासियों का कुम्भ)
- चौपड़ा –
- संत मावजी की वाणियाँ, वाद विवाद शैली में लिखित, भविष्यवाणी हेतु प्रसिद्ध,
- पाँच खण्ड – सामसागर, मेघसागर, रत्नसागर, प्रेम सागर, अनंत सागर
- भाषा ‘वागड़ी’
- इसमें भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएँ वर्णित
- चौपड़े दीपावली के दिन ही बाहर निकालते एवं मकर संक्रांति को इनका वाचन होता है
- चौपड़े पाँच प्रकार के होते हैं-
- प्रेम सागर
- मेघ सागर
- सोम सागर
- रत्न सागर
- अनन्त सागर
- इस पुस्तक में तीसरे विश्व युद्ध की भविष्यवाणी है
- मावजी के अनुयायियों को ‘साधु’ कहा जाता है।
- संत मावजी ने छूआछूत मिटाने के लिए लसोडिया आंदोलन चलाया।
- एक चौपड़ा साबला मंदिर में, दूसरा पुंजपुर मंदिर में, तीसरा मेवाड़ के अन्तर्गत शेषपुर (सलूंबर के पास ) के मंदिर में, चौथा बाँसवाड़ा के विश्वकर्मा मंदिर में सुरक्षित है। पाँचवें चौपड़े के बारे मे मान्यता है कि वह मराठों द्वारा आक्रमण करने पर वे उसे अपने साथ ले गये।
संत रामचरण जी(निर्गुण)
- राम स्नेही संप्रदाय के प्रवर्तक, प्रधान पीठ – शाहपुरा
- जन्म सोड़ा गाँव (टोंक) में 1719 ई., माघ शुक्ल चतुर्दशी को
- पिता – बख्ता रामजी, माता – देवजी या देऊजी
- पत्नी – गुलाब कँवर, गुरु – गुदड़ संप्रदाय के कृपारामजी (1751 ई. में दीक्षा प्राप्त की)
- रामकिशन – बचपन का नाम (गुरु कृपाराम जी ने रामचरण नाम दिया)
- भगवान राम की निर्गुण उपासना
- रामचरण जी द्वारा भीलवाड़ा में साधना करते समय मूर्ति पूजकों द्वारा परेशान करने पर कुहाड़ा गाँव चले गए
- शाहपुरा के शासक रणसिंह के निमंत्रण प्राप्त होने पर रामचरण जी शाहपुरा पहुँचे और इन्होंने शाहपुरा में रामस्नेही सम्प्रदाय की मुख्य गद्दी स्थापित की, 1798 ई. में शाहपुरा में रामचरण का देहान्त हुआ
- फूलडोल उत्सव –
- शाहपुरा में, होली के दूसरे दिन
- चैत्र कृष्ण प्रतिपदा – पंचमी
- ग्रंथ –
- अणभै वाणी (अणभवाणी) – रामचरणजी के उपदेश संकलित (ब्रज भाषा में)
- सम्प्रदाय के नियम
- संत गुलाबी वस्त्र धारण करते हैं
- लोग दाड़ी मूंछ और सिर पर बाल नहीं रखते है
- मूर्ति पूजा नहीं करते है
- रामचरणजी के 12 प्रधान शिष्य थे।
- रामद्वारा – प्रार्थना स्थल को
- रामस्नेही सम्प्रदाय की अन्य पीठें
- शाहपुरा शाखा, भीलवाड़ा
- संस्थापक – संत रामचरण जी
- ये रामस्नेही सम्प्रदाय की प्रधान पीठ है
- रैण शाखा मेड़ता सिटी, नागौर
- इसके संस्थापक- संत दरियावजी
- जन्म – 1676 ई. में जैतारण (ब्यावर) में
- पिता – मानसा धुनिया तथा माता – गीगा
- इनका कथन – नारी सारे संसार की जननी है, पालन-पोषण करती है
- गुरु का नाम – पेमदास जी
- 1758 ई. में दरियावजी का निधन हुआ
- खेड़ापा शाखा – जोधपुर ग्रामीण
- संस्थापक – संत रामदासजी
- जन्म – 1726 ई. बीकमकोर (जोधपुर)
- पिता- शार्दुल जी, माता – अणमी
- गुरु – हरिरामदासजी
- सिंहथल शाखा – बीकानेर
- जन्म स्थान – सिंहथल (बीकानेर)
- पिता – भाग्यचन्द, माता – रामी देवी
- पत्नी – चम्पा, पुत्र – बिहारी
- गुरु – जैमल दास जी
- उन्होंने कहा था कि गुरु पारस पत्थर के समान है।
- मंत्र राजप्रकाश ‘ और ‘ श्री हरिपुरुष की वाणी ‘ संत हरिदास के आध्यात्मिक विचारों का संकलन
- इनकी प्रमुख रचनाएँ –
- निशानी, योग गृहस्थ
- अंगवद्ध अनुभववाणी
- चेतावनी, भक्तमाल
- शाहपुरा शाखा, भीलवाड़ा
संत लालदास जी(निर्गुण)
- जन्म – 1540 ई. धौलीदूब गाँव (अलवर) श्रावण कृष्ण पंचमी, 1648 ई. में देहांत
- लालदासजी, मेव जाति के लकड़हारे, गोत्र – दूलोत गोत्र
- पिता – चाँदमल तथा माता – समदा पत्नी – मोगरी
- पुत्री – स्वरूपा, पुत्र – पहाड़ा, कुतुब
- गुरु – फ़कीर गाड़न चिश्ती
- प्रधानपीठ – नगला (भरतपुर), अलवर व भरतपुर की मेव जाति में अत्यधिक मान्यता
- उपदेश – मेवाती भाषा में
- जयराम – अभिवादन शब्द
- समाधि स्थल – शेरपुर (कोटपुतली- बहरोड़)
- मेला – आश्विन शुक्ल एकादशी एवं माघ पूर्णिमा
- प्रमुख ग्रंथ – लालदासजी की चेतावनियाँ
- लालदासी सम्प्रदाय की स्थापना की
- शिक्षाएँ –
- राम की निर्गुण उपासना, हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल, पुरुषार्थ का महत्व
- इस सम्प्रदाय में दीक्षित करने हेतु व्यक्ति को सबसे पहले काला मुँह करके गधे पर उल्टा मुँह करके बिठाकर गाँव की गलियों में घुमाया जाता है, ताकि उसके जीवन में कोई भी अभिमान नहीं रहे
- महानंद कायस्थ – पहला दीक्षित व्यक्ति था
- शाहजहां का पुत्र औरंगजेब, जब लालदासजी से मिलने आया था, तब लालदासजी ने भविष्यवाणी की थी, कि वह दिल्ली का शासक बनेगा, जो अपने भाईयों का वध करेगा।
हरिदास निरंजनी(निर्गुण)
- जन्म – कापड़ोद (डीडवाणा) में 1455 ई. में, मृत्यु गाढ़ा गाँव डीडवाना
- मूल नाम – हरिसिंह सांखला, उपनाम – ‘कलयुग का वाल्मीकि’ (पहले डकैत थे, फिर साधु बने)
- प्रधान पीठ – गाढा (डीडवाणा)
- तीखी डूंगरी पर तपस्या की
- उपदेश – निर्गुण और सगुण भक्ति
- मेला – फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से फाल्गुन शुक्ल द्वादशी तक
- प्रमुख ग्रंथ- मंत्र राजप्रकाश, हरिपुरुष की वाणी
- हरिदासजी ने निरंजनी / निराला सम्प्रदाय की स्थापना की थी।
- इस संप्रदाय में परमात्मा को ‘अलख निरंजन’ या ‘हरि निरंजन’ कहा जाता है
- शाखाएँ
- निहंग – ये भिक्षा से उदरपूर्ति करते हैं, खाकी रंग की गुदड़ी गले में डाले रखते हैं
- घरबारी – ये गृहस्थ जीवन जीने वाले अनुयायी
संत पीपा(निर्गुण)
- राजस्थान में निर्गुण भक्ति आन्दोलन के प्रथम संत
- जन्म गागरोन दुर्ग में 1425 ई. में चैत्र पूर्णिमा
- पिता – राजा कड़ावाराब खींची, माता – लक्ष्मीवती
- जाति खींची राजपूत, गुरु – रामानन्दजी
- वास्तविक नाम – प्रतापसिंह खींची
- संत पीपा की छतरी – गागरोन दुर्ग
- संत पीपा की गुफा – टोडा ग्राम (केकड़ी) अन्य गुफा-गागरोण
- संत पीपा का मंदिर – समदड़ी ग्राम (बाड़मेर)
- ग्रंथ – पीपा पर्ची, पीपा कथा, जोग चिन्तामणि
- मेला – चैत्र पूर्णिमा
- वैराग्य – पीपा जी के अनुरोध पर द्वारिका जाते समय रामानंद अनेक शिष्यों (कबीर, रैदास) के साथ गागरोन आए। इसी समय इन्होंने राजपाट अपने भतीजे को सौंपकर वैराग्य धारण किया था
- राज्य त्याग के पश्चात् पीपा जीविका के लिए सिलाई का काम करते थे। इसलिए दर्जी समुदाय के लोग इन्हें अपना आराध्य मानते हैं।
- गुरु ग्रन्थ साहिब में पीपा के भजन शामिल
- मोक्ष प्राप्ति का प्रमुख साधन भक्ति को माना (भक्ति बिना मुक्ति नहीं)
- फिरोज शाह तुगलक को युद्ध में परास्त किया था
सर्वगी सम्प्रदाय(निर्गुण)
- प्रमुख केंद्र – सांगलिया, धोद तहसील (सीकर)
- संस्थापक – लक्कड़दास महाराज (1649 ई.)
- अभिवादन शब्द – जय साहेब
- अमावस्या व पूर्णिमा को आश्रम में सत्संग का आयोजन होता
परनामी संप्रदाय (सगुण+ निर्गुण )
- प्राणनाथ द्वारा स्थापित इस संप्रदाय के अनुयायी निर्गुण विचारधारा
- जन्म – जामनगर (गुजरात)
- प्रधान पीठ – पन्ना, मध्य प्रदेश।
- राजस्थान में इसका प्रभाव आदर्श नगर (जयपुर) में
- ग्रंथ – कुजलम स्वरूपम्
दासी संप्रदाय
- यद्यपि मीराबाई ने किसी सम्प्रदाय की स्थापना नहीं की किन्तु कालान्तर में उनके अनुयायी मीरा दासी सम्प्रदाय के नाम से जाने गये
- जन्म – 1498 में वैशाख शुक्ल तृत्तीय (आखातीज), कुड़की (ब्यावर)
- पिता – रतन जी राठौड़ (बाजोली के जागीरदार)
- माता – वीर कँवर, दादा – राव दूदा,
- बचपन का नाम – पेमल, उपनाम – राजस्थान की राधा
- विवाह – 1516 ई. में भोजराज से (राणा सांगा का ज्येष्ठ पुत्र)
- आध्यात्मिक गुरु – गोस्वामी संत रैदास
- रूप गुरु (शिक्षक) – पंडित गजाधर
- जीव गोस्वामी, रैदास से दीक्षा ग्रहण की
- मीरा भगवान श्रीकृष्ण के मुरली मनोहर स्वरूप की आराधना अपने पति रूप में करती थी
- रचनाएँ –
- पदावली
- मीराबाई के पद विश्व में भक्ति आंदोलन में साहित्य के रत्न – महादेवी वर्मा),
- हरजस – मीरा के पंद
- नरसी मेहता की हुंडी, रुक्मिणी मंगल, मीरा री गरीबी, सत्यभामाजी नू रुसणो, गीत गोविंद, मीरांबाई : एक्स्टेटिक पोयम्स (रॉबर्ट ब्लाई)
- पदावली
- नरसी जी रो मायरो – मीरा के निर्देशन में रतना खाती ने, ब्रज भाषा में
- मीरा बाई ने सगुण भक्ति का सरल मार्ग भजन, नृत्य एवं कृष्ण स्मरण को बताया
- द्वारका के रणछोड़ राय मंदिर (डाकोर जी) में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति में विलीन हो गई
- मीरा महोत्सव चित्तौड़गढ़ (आश्विन पूर्णिमा)
- डाक टिकट – 10 अक्टूबर, 1952 को
- 525 वीं जयंती पर डाक टिकट और 525 रुपये का सिक्का जारी किया गया
संत रैदास
- रायदास सम्प्रदाय
- कबीर ने इनको संतों का संत कहा
- मीरा के समय चित्तौड़ आए
- रैदास की छतरी चित्तौड़ दुर्ग में स्थित है
- रैदास की पर्ची में उपदेश संकलित है
रसिक सम्प्रदाय
- संस्थापक – अग्रदास जी (कृष्णदास पयहारी के शिष्य) ने
- स्थापना – सीकर जिले के रैवासा नामक स्थान पर
- राम को रसिक नायक मानते हुए पूजा
- अग्रदास स्वामी रामानंद की शिष्य परंपरा की चौथी पीढी (रामानंद, अन॑तानंद, श्रीकृष्णदास पयहारी, अग्रदास)
- ग्रंथ – भक्तमाल (नाभादास द्वारा), श्रीराम भजन मंजरी, हितोपदेश भाषा, उपासना बावजी, ध्यान मंजरा, अग्रसार
निम्बार्क सम्प्रदाय(सगुण)
- अन्य नाम – सनकादि सम्प्रदाय / हंस संप्रदाय
- संस्थापक – आचार्य निम्बार्क
- राधा व श्री कृष्ण की युगल रूप में उपासना
- ग्रंथ – वेदान्त पारिजात भाष्य
- दर्शन – द्वैताद्वैत या भेदाभेद प्रारम्भ किया
- पीठ –
- प्रधान पीठ – सलेमाबाद, किशनगढ़ (अजमेर) शिष्य परशुराम देव द्वारा
- दूसरी पीठ – उदयपुर
माननाथी संप्रदाय
- प्रधान पीठ – महामंदिर (जोधपुर)
- महामंदिर जोधपुर का निर्माण 1805 ई. मानसिंह राठौड़ द्वारा, गुरु आयस देवनाथ के लिए
तेरापंथी संप्रदाय
- संस्थापक आचार्य भिक्षु स्वामी (भीखणजी)
- स्थापना – 1760 ई.
- जन्म – कंटालिया गाँव (मारवाड़ जंक्शन, पाली)
- समाधि – सिरयारी (पाली)
- भीखण जी के सिद्धांत को मानने वाले आरंभिक साधुओं की संख्या 13 थी इसलिए यह यह तेरापंथी कहलाया।
- ये तेरापंथ के प्रथम आचार्य थे
- आचार्य तुलसी –
- तेरापंथ के 9 वें आचार्य
- जन्म – 1914, लाडनूं (डीडवाना)
- पिता – झूमर मल, माता – वंदना
- 1949 – अणुव्रत सिद्धांत का प्रतिपादन
- मर्यादा महोत्सव सरदारशहर से
- प्रसिद्ध कथन – “इंसान पहले इंसान फिर हिंदू और मुसलमान”
- जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना – लाडनूं
- महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन हारा हकीम ख़ाँ सूर सम्मान
- आचार्य महाप्रज्ञ –
- तेरापंथ के 10 वें आचार्य
- वास्तविक नाम – नथमल चौरड़िया
- प्रेक्षाध्यान सिद्धान्त
- आचार्य महाश्रमण –
- तेरापंथ के 11 वें आचार्य
- वास्तविक नाम – मोहन दुग्गड़
- मुदित मुनि – दीक्षा के समय नाम
गुदड़ संप्रदाय (निर्गुण )
- संस्थापक – सन्त दास जी
- मुख्य केन्द्र – दांतड़ा (भीलवाड़ा)
नवल संप्रदाय (निर्गुण)
- जन्म स्थान – हरसोलाव (नागौर)
- विक्रम संवत् 1840 भाद्रपद कृष्ण अष्टमी
- मुख्य केन्द्र- जोधपुर
- नवल संप्रदाय की स्थापना की
- पुस्तक – नवलेश्वर अनुभववाणी
- अस्पृश्यता का विरोध, बाल विवाह, रूढ़िवादी दृष्टिकोण का विरोध
अलखिया संप्रदाय (निर्गुण)
- संस्थापक – स्वामी लालगिरि
- जन्म – सुलखनीया गाँव, चूरू
- प्रधान पीठ – बीकानेर
- प्रमुख ग्रंथ – अलख स्तुति प्रकाश, कुण्डलियाँ
- सर्वाधिक अनुयायी मोची जाति के
- समाधि – गलता जी जयपुर
राजाराम संप्रदाय
- प्रवर्तक – राजाराम जी
- मुख्य केन्द्र – शिकारपुरा (जोधपुर ग्रामीण)
- पटेल जाति के मुख्य सन्त
- विश्नोई समाज की तरह पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया
बैरागी नाथ सम्प्रदाय
- प्रधान पीठ – राताडूंगा (पुष्कर, अजमेर)
कुण्डा पंथ
- प्रवर्तक – राव मल्लीनाथ जी
- वाममार्गी पंथ
- इसमें आध्यात्मिक साधना की विचित्र प्रणाली का प्रावधान किया गया है
ऊंदरिया पंथ
- अति मार्गी पंथ
- जयसमंद के भीलों में प्रचलित
काँचलिया पंथ
- अति मार्गी पंथ
लश्करी सम्प्रदाय(सगुण)
- संस्थापक – बालनदाचार्य (बचपन नाम – बलवंत)
- जन्म – 1635 ई., गढ़मुक्तेश्वर
- गुरु – बिरजानंद (सैन्य प्रशिक्षण लिया)
- मुख्य केन्द्र – लोहार्गल (झुंझुनू), मालकेतु पर्वत पर, हनुमान जी के उपासक
- लश्कर संत – अपने पास सेना रखने के कारण
- इस सम्प्रदाय के लोग एक हाथ में तलवार और दूसरे में चरण पादुकाएं रखते है
- कार्य –
- 1675 – हरिद्वार के धार्मिक विद्रोह का नेतृत्व
- औरंगजेब के समय 52 मूर्तियों की सुरक्षा की
- अपनी सेना भेजकर मेवाड़ के महाराणा राजसिंह तथा मारवाड़ के दुर्गादास राठौड़ की औरंगजेब के खिलाफ सहायता की
संत धन्ना(निर्गुण)
- जन्म स्थान- धुवन कला (टोंक, 1415 ई.)
- जाट परिवार में जन्म हुआ
- गुरु – रामानन्द (राजस्थान छोड़कर काशी बनारस चले गए वहाँ रामानंद के शिष्य बने)
- इन्होंने राजस्थान में भक्ति आंदोलन की शुरुआत, पंजाब क्षेत्र में भी लोकप्रिय
- धन्न के उपदेश सिक्खों के आदि ग्रंथ में संकलित है।
- मुख्य मंदिर – बोरानाडा (जोधपुर)
संत सुन्दरदास (निर्गुण)
- प्रधान पीठ – फतेहपुर
- संत सुन्दरदास जी ने काशी के 80 घाट पर गोस्वामी तुलसीदास के साथ निवास किया था।
- परमहंस – जसनाथी सम्प्रदाय के विरक्त सन्त
भक्त कवि दुर्लभ जी (सगुण)
- जन्म – 1696 ई. वागड़ में
- कार्यक्षेत्र – डूंगरपुर – बांसवाड़ा
- कृष्ण भक्त, राजस्थान का नरसिंह कहते हैं
महिला संत
|
संत 157979_d2534d-99> |
विशेषता 157979_ab7a29-9c> |
|
मीराबाई(सगुण) 157979_33cdef-f6> |
|
|
गवरी बाई(सगुण) 157979_416a08-d7> |
|
|
संत रानाबाई(सगुण) |
|
|
संत करमा बाई(सगुण) 157979_5c06ea-ff> |
|
|
संत करमेती बाई 157979_311b88-ea> |
|
|
संत रानी रूपादे 157979_19ad61-15> |
|
|
संत भूरी बाई अलख 157979_50f192-5f> |
|
|
संत ताजबेगम 157979_563c49-76> |
|
|
संत ज्ञानमती बाई 157979_d1ef6f-97> |
|
|
संत नन्ही बाई 157979_e57492-40> |
|
|
संत फूली बाई 157979_44fc2a-c3> |
|
मुस्लिम संत
|
संत 157979_93f11b-7a> |
विशेषता 157979_4ab751-ce> |
|
ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती 157979_65b365-16> |
|
|
शेख हमीदुद्दीन नागौरी 157979_e61246-b4> |
|
|
नरहड़ के पीर 157979_c386e2-7a> |
|
|
पीर फखरुद्दीन 157979_5c6627-2d> |
|
EXTRA में है
| संत | धार्मिक साहित्य |
| रैदासी | रैदास री परची |
| संत मावजी | मावजी के चौपड़े |
| प्राणनाथ जी | कुजलम स्वरुपम् |
| लालगिरी | अलख स्तुति प्रकाश |
| नवलदास नवलेश्वर | अनुभव वाणी |
| रामचरण जी | अर्णभवाणी, रामरस अम्बुधि |
| संत रामदास | गुरु ग्रंथ महिमा, ग्रंथ भक्त माल, ग्रंथ रामरक्षा |
| हरिराम जी | निसाणी |
| लालदास जी | लालदास जी री वाणी (साखी, सबद), लालदास जी री चेतावनीयां, लालदास जी री कथा |
| संत हरिदास जी | मंत्र राजप्रकाश, हरि पुरुष जी वाणी, साखी |
| चरणदास जी | ब्रहम ज्ञान सागर, ब्रहम ज्ञान चरित्र, नासकेत लीला |
| रज्जब जी | संर्वगी, रज्जबवाणी, अंग वधू |
| दया बाई | दयाबोध, विनयमलिका |
| सहजोबाई | सहज प्रकाश, सोलह तिथि, सात वार निर्णय |
| जसनाथ जी | सिंभुदड़ा, कोंड़ा, गोरख छंद, सिद्ध जी रो सिरलोकों, जलम झूलरौ |
| रामनाथ जी | यशोनाथ पुराण (जसनाथी सम्प्रदाय की बाईबिल) |
| लालनाथ जी | जीव सझौतरी |
| संत जम्भोजी | जम्भगीता / जम्भसंहिता, विश्नोई धर्म प्रकाश, जम्भसागर |
| संत दादू जी | दादू जी रो दूहा, दादू जी री वाणी, कायावेलि |
| माधोदास | संतगुण सागर |
| राघवदास | भक्तमाल |
| लालदास | नाममाला |
| जगगोपाल | दादू जन्म लीला परची |
| संतदास, जगन्नाथ | हरडेवाणी, गुण गंजनामा, गीतसार, योग, वशिष्ठसार |
| सुन्दरदास | सुंदर ग्रंथावली, ज्ञान समुद्र, सुंदरसार, सुंदर विलास |
| संत बालिंद जी | ओरिलो |
| मंगलराम जी | संदुरोदय |
| गरीबदास | आध्यात्म प्रबोध, अनभै प्रबोध, साखी |
| संत अग्रदास | श्रीराम भजन मंजरी, हितोपदेश भाषा, उपासना बावजी, ध्यान मंजरा, अग्रसार |
| कृष्णदास पयहारी | जुगल मैन चरित्र, ब्रहम गीता |
| गवरी देवी | कीर्तन माला |
| संत समान बाई | पति सतक, कृष्णबाल लीला, सौलो |
| मीरा बाई | मीरा पदावली, नरसी मेहता नी हुण्ड़ी, सत्यभामा जी नी रुसनौ, रुकमणी मंगल |
| संत परशुराम | साखी का जोड़ा, परसुराम सागर, श्री बावनी लीला, अमरबोध लीला |
| वल्लभाचार्य | अणुभाष्य |
| रामानुजार्च | श्री भाष्य |
| रामानंद जी | रामरक्षास्त्रोत, ज्ञानलीला, ज्ञानतिलक, सतनामी ग्रंथ |
| निम्बकाचार्य | वैदांत परिजात भाष्य, दसश्लौकी ग्रंथ |
| मध्वाचार्य | पूर्ण प्रज्ञ भाष्य |
