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लोक देवी
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विवरण
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करणी माता
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- ‘चारणों की कुलदेवी’ तथा ‘बीकानेर के राठौड़ों की आराध्य देवी
- जन्म – 1387 ई. सुआप गाँव (फलौदी)
- पिता – मेहाजी चारण, माता – देवल बाई
- अन्य नाम – ‘दाढ़ी वाली ढोकरी’/ चूहों वाली देवी / डोकरी / जोग माया / जगत माता का अवतार / रिद्धि बाई (बचपन का नाम)
- विवाह – देशनोक (बीकानेर) निवासी देपाजी बीठू के साथ
- करणी माता के छ: बहिने थी (छठी करणी माता, सातवीं गुलाब कंवर)
- [करणी माता ने बहन गुलाब कंवर के बेटे लाखन को अपना दत्तक पुत्र बनाया जो श्रावण मास की पूर्णिमा को कोलायत झील में डूब कर मर गया, इसलिए चारण समुदाय के लोग कपिलमुनी के मेले (कोलायत) में नहीं जाते]
- प्रमुख मंदिर- देशनोक बीकानेर (दुर्गा देवी को समर्पित), बाला का किला (अलवर) – मंदिर को मठ भी कहा जाता है
- चार रूपों की पूजा – दाड़ी वाली डोकरी, अर्द्धनारीश्वर, विष्णुरूप, संभली (चील रूप)
- मेला – चैत्र अश्विन नवरात्रि में देशनोक में (वर्ष में दो बार)
- प्रिय भक्त – दशरथ मेघवाल, सारंग विश्नोई
- मृत्यु – 1538 ई. में देशनोक में
- करणी माता ने 12 मई, 1459 को मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव अपने हाथों से रखी
- बीकानेर के राव बीका ने करणी माता की कृपा से राठौड़ वंश की स्थापना की
- महाराजा गंगा सिंह ने करणी माता के मंदिर में चाँदी के किवाड़ चढ़वाये
- काबा – करणीमाता के मंदिर में सफेद चूहों को
- नेहड़ी – जाल वृक्ष के नीचे स्थित प्रारंभिक पूजा स्थल को
- चिंरजा – माता की स्तुति में रात्रि जागरण में गाया जाने वाला भक्ति गीत
- सावन-भादों कड़ाही – मंदिर में स्थित दो कड़ाईयों के नाम
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तनोट माता
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- अन्य नाम – थार की वैष्णो देवी / रुमाल वाली देवी / युद्ध देवी / भारतीय सैनिकों की इष्ठ देवी / भाटी शासको की इष्ठ देवी
- मंदिर – तनोट (जैसलमेर), 9वीं सदी, भाटी शासक तणुराव द्वारा
- BSF के जवान पूजा करते हैं
- मेला – चैत्र एवं आश्विन नवरात्रि (प्रतिवर्ष)
- तनोट माता मंदिर के सामने भारत-पाक युद्ध 1965 ई. में भारत की विजय का प्रतीक ‘विजय स्तम्भ’ स्थापित है
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जीण माता
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- जन्म – घांघू गाँव, चुरू
- बचपन का नाम – जयन्ती / जैवण बाई
- पिता – घंघ, भाई – हर्ष (भैरव का रूप)
- मंदिर – रैवासा (सीकर), आड़ावला की पहाड़ियों पर
- मेला – चैत्र अश्विन नवरात्रि में
- कुलदेवी – सीकर के चौहान
- आराध्य देवी – सीकर के मीणाओं की
- अन्य नाम – जयंती देवी (पुराणों में) / भ्रामरी देवी / भूरी की राणी
- मधुमक्खियों की देवी – औरंगजेब का आक्रमण असफल किया
- अष्टभुज रूप प्रतिमा, सामने घी व तेल के दो अखण्ड दीपक
- हर्ष पर्वत शिलालेख – मंदिर का निर्माण पृथ्वीराज चौहान प्रथम के सामन्त हट्टड़ द्वारा 1064 ई. में
- मंदिर के पास स्थित जोगी तालाब – पाण्डवों की आदमकद प्रतिमाए
- लोक साहित्य
- गीत राजस्थान के सभी देवी-देवताओं में सबसे लम्बा लोकगीत (करुण रस)
- गायक – कनफटे जोगी केसरिया कपड़े पहन माथे पर सिंदूर लगाकर
- वाद्य – डमरू एवं सारंगी
- प्रथा –
- पहले ढाई प्याले शराब चढ़ाई जाती थी (अब प्रतिबंधित)
- पहले बकरे की बलि , वर्तमान में केवल बकरे के कान चढ़ाते
- राजस्थान के भाई – बहिन की जोड़ी जो देवी – देवता के रूप में जाने जाते है
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आई माता
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- जन्म – अंबापुर (गुजरात)
- मंदिर – बिलाड़ा (जोधपुर)
- पिता – बीका डाबी
- बचपन का नाम – जीजी बाई
- कुलदेवी – सीरवी जाति के क्षत्रियों
- रामदेव जी की शिष्या
- नवदुर्गा का अवतार
- आई पंथी
- आई माता द्वारा बनाये गये 11 नियमों का पालन करते हैं
- अतः इन्हें 11 डोरा पंथी कहते हैं
- आई माता मंदिर में अखण्ड दीपक जलता है जिसकी जोत से केसर टपकता है।
- बडेर – माता का थान (समाधि स्थल)
- दरगाह – मंदिर को कहा जाता
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शीतला माता
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- अन्य नाम – महामाई / माई अनामा / बच्चों की संरक्षिका / सैढल माता / बास्योड़ा की देवी / चेचक निवारक माता / बोदरी की देवी
- मुख्य मंदिर – शील की डूंगरी, चाकसू (जयपुर ग्रामीण) में, माधोसिंह द्वितीय द्वारा, सुहाग मंदिर के नाम से भी जाना जाता है
- मन्दिर में मूर्ति की जगह पाषाण (पत्थर) के खण्ड हैं
- सबसे प्राचीन मंदिर – गोगुंदा, उदयपुर
- अन्य मंदिर – कागा, जोधपुर
- प्रतीक चिह्न – जलता हुआ दीपक / मिट्टी का बर्तन
- वाहन – गधा, पुजारी – कुम्हार जाति के लोग
- खेजड़ी वृक्ष – शीतला माता के रूप में पूजन
- मेला –
- चैत्र कृष्ण अष्टमी को चाकसू (जयपुर)
- अन्य नाम – बैलगाड़ी मेला
- शीतला माता एकमात्र ऐसी देवी है, जिनकी खंडित मूर्ति की पूजा होती है
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कैला देवी
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- उपनाम – जोगमाया / अंजनी माता
- करौली के यादव वंश/जादौन वंश की कुलदेवी
- मंदिर – 1900 में गोपाल सिंह द्वारा कालीसिल नदी के किनारे त्रिकूट पर्वत पर, करौली जिला
- लांगुरिया गीत – कैला देवी की भक्ति में (घुटकण नृत्य, जोगणिया नृत्य)
- मेला – लक्खी मेला (चैत्र शुक्ल अष्टमी)
- इष्ट देवी – गुर्जरों व मीणाओं की
- बोहरा भगत की छतरी – कैला देवी मंदिर के सामने
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नागणेची माता
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- कुलदेवी – मारवाड़ के राठौड़ वंश की
- धाम – बालोतरा का नगाणा गाँव
- मूर्ति – काष्ठ से निर्मित 18 हाथ, शस्त्र लिए
- मंदिर – नीम के वृक्ष के नीचे
- इनको महिषासुर मर्दिनी कहा जाता है तथा इनका दूसरा रूप बाज/चील है
- राठौड़ वंश के धूहड़ के समय कन्नौज के सारस्वत ब्राह्मण लहोड़ा लुंब ऋषि ने देवी की मूर्ति कर्नाटक से लाकर नगाणा गांव, पचपदरा (बालोतरा) में स्थापित की
- बाद में राव जोधा ने नगाणा गाव से मूल मूर्ति मँगवाकर जोधपुर दुर्ग में स्थापित करवाकर वहाँ मंदिर बनवाया
- प्रमुख मंदिर – बालोतरा, नागौर, सिटी पैलेस उदयपुर, मेहरानगढ़, किशनगढ़, जूनागढ़
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सुगाली माता
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- मूर्ति – 10 सिर और 54 हाथ
- इष्ठ देवी – कुशाल सिंह चम्पावत (आऊवा,पाली)
- कुलदेवी – आउवा के चम्पावत ठाकुरों की
- 1857 की क्रांति की देवी, मूर्ति वर्तमान में बागड़ संग्रहालय (पाली)
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चामुण्डा माता
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- दुर्गा माता का सातवाँ अवतार
- इष्ठ देवी – मारवाड़ के राठौड़ों की
- कुलदेवी – इंदा प्रतिहारों की
- मंदिर का निर्माण – राव जोधा ने मेहरानगढ़ दुर्ग जोधपुर
- जसराज चौपड़ा कमेटी – 30 सितम्बर, 2008 नवरात्र के अवसर पर मंदिर में भगदड़ मची थी, जिसमें 214 लोगों की मृत्यु हुई। इस दुर्घटना की जाँच के लिए
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शिला देवी
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- मन्दिर – जलेब चौक, आमेर दुर्ग (जयपुर)
- इष्ठ देवी – आमेर के कच्छवाहा वंश की
- मूर्ति – अष्टभुजी भगवती काले पत्थर की, 16वीं सदी में मिर्जा राजा मानसिंह-प्रथम ने पूर्वी बंगाल के राजा केदार को हराकर जस्सौर नमक स्थान से
- मेले – नवरात्रि में षष्ठी एवं अष्टमी पर
- वर्तमान मंदिर स्वरूप – मिर्जा राजा जयसिंह
- संगमरमर का कार्य – सवाई मानसिंह द्वितीय
- प्रथा –
- पहले नरबली, बाद में छागबली (वर्तमान में बंद)
- ढाई प्याला शराब चढ़ती है, भक्तों को शराब व जल का चरणामृत
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कैवाय माता
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- स्थान – किणसरिया गाँव, परबतसर(नागौर)
- मंदिर का निर्माण – राजा चच्चदेव
- कैवायमाता के मन्दिर के सभामण्डप की बाहरी दीवार पर 999 ई. का एक शिलालेख उत्कीर्ण
- इस शिलालेख में चौहान शासकों वाक्पतिराज, सिंहराज और दुर्लभराज की प्रशंसा की गई है
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जमुवाय माता
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- अन्य नाम – अन्नपूर्णा माता / जामवंती (पौराणिक नाम)
- कुलदेवी – ढूँढाड़ के कछवाहा वंश की
- मंदिर – जमवारामगढ़ (जयपुर)
- कच्छवाह शासक दुल्हराय (तेजकरण) ने देवी माँ के आर्शीवाद से शत्रुओं पर विजय प्राप्त की और विजय प्राप्ति के बाद जमुवाय माता मन्दिर बनाया
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ज्वाला माता
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- कुलदेवी – खंगारोत राजवंश, जोबनेर (जयपुर)
- मंदिर – जोबनेर
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स्वांगिया माता
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- अन्य नाम – स्वांगिया/सांगिया जी /सुग्गा माता/ उत्तर की ढाल / तेमड़ा ताई (तेमड़ा भाखर पर स्थान बना होने के कारण) / हिंगलाज माता
- कुलदेवी – जैसलमेर के भाटी राजवंश की
- मंदिर – लोद्रवा (जैसलमेर)
- चिरजा – माता का पाठ
- ठाला – इनके सात देवियों के सम्मिलित प्रतिमा स्वरूप को
- सुगनचिड़ी आवड़ माता का ही स्वरूप है
- हिंगलाज माता का अवतार – चारण मानते हैं
- स्वांगिया का अर्थ – मुड़ा हुआ भाला
- जैसलमेर के भाटी राजवंश के राज्य चिह्न में सबसे ऊपर पालम चिड़िया (शगुन) तथा स्वांग (भाला) को मुड़ा हुआ देवी के हाथ में दिखाया गया है
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राणी सती
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- स्थान – झुंझुनू
- उपनाम – दादीजी / नारायणी बाई
- पति – तन धन दास अग्रवाल
- कुलदेवी – अग्रवालों की
- सती – हिसार के नवाब के सैनिकों द्वारा अपने पति की हत्या के पश्चात् इन्होंने अपनी पति की चिता पर प्राणोत्सर्ग कर दिये, सती कहलायी (माघ कृष्ण नवमी)
- मेला – भाद्रपद कृष्ण अमावस्या
- राणी सती – भारत का सबसे बड़ा सती मंदिर
- खेमी सती – भारत का दूसरा बड़ा सती मंदिर (झुंझुनू)
- नोट – 1987 में रूप कंवर सती कांड के बाद से सती पूजन एवं सती महिमा मंडन/मेले पर रोक लगा दी गयी है
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शाकम्भरी माता
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- अन्य नाम – सकराय/शंकरा
- स्थान – मलयकेतु पर्वत, उदयपुरवाटी (नीम का थाना) (लोहागर्ल तीर्थ)
- कुलदेवी – खण्डेलवालों की
- मेले – चैत्र व आश्विन नवरात्र में
- शाकम्भरी नाम – अकाल पीड़ित लोगों को बचाने के लिए इन्होंने फल, सब्जियां, कन्दमूल उत्पन्न किए थे
शाकम्भरी माता जयपुर –
- मंदिर – एक सांभर तथा दूसरा सहारनपुर में
- निर्माण – वासुदेव चौहान द्वारा
- कुलदेवी – सांभर के चौहानों
- मेले – चैत्र व आश्विन नवरात्र में
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सच्चियाय माता
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- स्थान – ओसियाँ (जोधपुर ग्रामीण)
- मन्दिर – आठवीं सदी में परमार राजकुमार उपलदेव ने प्रतिहार शैली में
- कुलदेवी – ओसवालों की
- गुर्जर प्रतिहार ने महामारू शैली में इस मंदिर का निर्माण करवाया
- मूर्ति – काले प्रस्तर की महिषासुर मर्दिनी की
- साम्प्रदायिक सद्भाव की देवी
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पथवारी माता
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- लोकदेवी के रूप में इनकी पूजा तीर्थयात्रा की सफलता की कामना हेतु, माता गाँव के बाहर स्थापित की जाती है
- इनके चित्रों में नीचे काला-गौरा भैंरू तथा ऊपर इनके चित्रों में नीचे काला-गौरा भैंरू तथा ऊपर कावड़िया वीर एवं गंगोज का कलश बनाया जाता है
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कालिका माता
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- चितौड़ दुर्ग के भीतर पद्मिनी के महलों के विशाल गुंबद के रूप में है
- मूलत: – सूर्य मंदिर था
- कुलदेवी – गहलोत वंश
- 12 वीं शताब्दी में प्रतिहार कालीन शैली
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त्रिपुर सुंदरी माता
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- स्थान – तलवाड़ा (बांसवाड़ा)
- प्रतिमा – काले पत्थर की अष्टादश भुजा वाली
- कुलदेवी – पांचाल जाति की
- भक्त जनों द्वारा ‘तुरताई माता’ के नाम से भी संबोधित की जाती है
- पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की इष्ट देवी
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नारायणी देवी
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- जन्म – मोरागढ़, जयपुर
- पिता- विजयराम नाई, माता- रामवती
- बचपन का नाम – करमेती बाई
- कुलदेवी – नाई जाति की
- मुख्य मंदिर – बरवा डूंगरी, राजगढ़ (अलवर)
- मेला – वैशाख शुक्ल एकादशी
- पति के साथ सती हुई थी
- मीणा जनजाति द्वारा भी इनकी उपासना की जाती है
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सुंधा माता
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- मंदिर – जसवंतपुरा की पहाडी (भीनमाल, जालौर)
- सुंधा पहाड़ी पर स्थित होने के कारण सुंधा माता
- धड़रहित प्रतिमा की पूजा की जाती है।
- 2006 में राजस्थान का प्रथम रोपवे यही बना
- यहाँ भालू अभयारण्य स्थित है
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बडली माता
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- मुख्य मंदिर – अकोला (चित्तौड़गढ़)
- छोटे बच्चों का इलाज यहाँ पर किया जाता है
- यहाँ की ताँती बांधने से बीमारी ठीक हो जाती है
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आसावरी/आवरी माता
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- मंदिर – निकुम्भ गाँव चित्तौड़गढ़
- शारीरिक बीमारियों जैसे लकवा के इलाज हेतु प्रसिद्ध, 2 तिवारियों में से बच्चे को निकाला जाता है
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बाण माता जी
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- चित्तौड़गढ़ दुर्ग में विजय स्तम्भ से थोड़ी दूर
- निर्माण – हम्मीर सिसोदिया द्वारा
- कुलदेवी – सिसोदिया शासकों की कुलदेवी
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तुलजा भवानी
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- मन्दिर – चित्तौड़गढ़ दुर्ग के मुख्य द्वार रामपोल के पास
- शिवाजी की आराध्य देवी
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अम्बिका माता
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- मुख्य मंदिर – जगत गाँव उदयपुर में
- इस मंदिर को ‘मेवाड़ के खजुराहो’ के नाम से जाना जाता है। चन्देल शासकों द्वारा निर्मित खजुराहो के मंदिर मध्य प्रदेश में स्थित है
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दधिमति माता
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- मंदिर – गोठ मांगलोद (जायल, नागौर)
- कुलदेवी – दाधीच ब्राह्मणों की
- मेला – चैत्र अश्विन माह नवरात्र
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लुटियालामाता
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- कुलदेवी – कल्लों की
- मन्दिर – फलौदी में
- खेजड़ बेरी राय भवानी – इनके मन्दिर के आगे खेजड़ी का वृक्ष होने के कारण
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ब्रह्माणी माता
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- मंदिर – सौरसेन (अंता-बारां)
- कुल देवी – कुम्हारों की
- मेला – माघ शुक्ल सप्तमी को गधों का मेला
- एकमात्र ऐसी देवी जिसकी पीठ की पूजा की जाती
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घेवर माता-
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- मंदिर – राजसमन्द झील की पाल पर
- पाल का पहला पत्थर घेवर बाई के हाथों से ही रखा गया
- एकमात्र लोक देवी है जो बिना पति सती हुई
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आमजा माता
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- मंदिर – रीछड़ा गाँव (गढ़बोर, राजसमंद)
- भीलों की कुलदेवी
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आशापुरा माता
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- कुलदेवी – बिस्सा ब्राह्मणों की
- मंदिर – नाडौल (देसूरी, पाली), मोंदरा (जसवंतपुरा, जालौर)
- प्रथा – महिलाओं द्वारा पूजा करते समय घूँघट निकालना
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कुशाल माता
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- स्थान – बदनौर (ब्यावर)
- महाराणा कुम्भा ने 1437 र्ई में मालवा के महमूद खिलजी प्रथम पर विजय के उपलक्ष में
- यह चामुण्डा देवी का अवतार है।
- इसी के पास बैराठ माता का मंदिर है
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चौथ माता
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- मंदिर – चौथ का बरवाड़ा गांव (सवाईमाधोपुर)
- कंजर जाति की आराध्य देवी
- करवा चौथ (कार्तिक कृष्ण चतुर्थी) को महिलाएं चौथ माता के नाम पर अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत करती हैं
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अन्य महत्वपूर्ण लोकदेवी
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- विरात्रा माता –
- चौहटन (बाड़मेर)
- भोपों की कुल देवी
- वांकल माता –
- चौहटन (बाड़मेर)
- रेबारी जाति की कुल देवी
- मंशापूर्ण करणी माता –
- उदयपुर
- राजस्थान का दूसरा रोपवे
- ईडाणा माता –
- बम्बोरा (सलूम्बर)
- राजस्थान की एक मात्र देवी जो अग्नि स्नान करती है
- अर्बुदा माता –
- माउंट आबू (सिरोही)
- राजस्थान की वैष्णों देवी कहा जाता है
- एक मात्र देवी जिसके होंठो की पूजा होती है (अधर देवी)
- भ्रमर माता / भंवर माता –
- छोटी सादड़ी, प्रतापगढ़
- यह गुप्तकालीन मंदिर है
- हिचकी माता –
- सारिका माता
- उपनाम – उष्ट्रवाहिनी देवी
- राजस्थान की एकमात्र देवी जो ऊँट पर सवार है
- मधुमेह रोग निवारक देवी
- मंदिर – जोधपुर तथा बीकानेर में
- राजेश्वरी माता
- भरतपुर में मुख्य मंदिर
- कुलदेवी – भरतपुर के जाट राजवंश की
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