राजस्थान की लोककला राज्य की पारंपरिक जीवनशैली, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक मूल्यों का जीवंत प्रतिबिंब है। यह विषय राजस्थानी कला व संस्कृति के अंतर्गत महत्वपूर्ण स्थान रखता है, क्योंकि इसके माध्यम से लोकनृत्य, लोकसंगीत, चित्रकला और हस्तशिल्प की समृद्ध परंपरा का अध्ययन किया जाता है। राजस्थान की लोककला सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यह लोगों की कला है, जो लोगों द्वारा और लोगों के लिए निर्मित होती है। इसे ऐसे कलाकारों द्वारा बनाया जाता है, जिन्हें किसी प्रकार का औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त नहीं होता
लोककलाओं का वर्गीकरण
मांडणा

- यह एक तरह का अलंकरण है जो महिलाओं द्वारा शुभ अवसर पर गैरू तथा खड़िया की सहायता से बनाया जाता है
- सजावट स्थान – घर की देहरी, चौखट, दीवारों, चबूतरे, आँगन और पूजा-स्थल
- उद्देश्य – सजावट के साथ-साथ नकारात्मक शक्तियों से रक्षा हेतु
- मांडनों के विषय
- विवाह पर – गणेश-लक्ष्मी के चरणचिह्न, स्वस्तिक, मोर-मोरनी, फूलदान, पशु व पुष्प आकृतियाँ
- तीर्थयात्रा से लौटने पर – ‘पैड़ी’ व ‘पथवारी’
- बच्चे के जन्म पर – साट्या/सातिये मांडणा (स्वास्तिक)
- आकृति – त्रिभुज, वर्ग, षट्भुज, अष्टभुज और वृत्त जैसी ज्यामितीय आकृतियाँ प्रचलित
- मांडणे के भाग इकाई को बेलभरत, फुलड़ी, झंबरा आदि नामों से जाना जाता है।
साँझी
- श्रीकृष्ण के समय से प्रचलित, राजस्थान में यह वृंदावन से आयी
- श्राद्ध पक्ष में कुंवारी कन्याओं द्वारा सफेद पुती हुई दीवार पर गोबर से उकेरी विभिन्न आकृतियाँ
- उद्देश्य – पार्वती माता का प्रतीक मानकर सुयोग्य वर की कामना
- प्रथम दस दिन – प्राकृतिक चिह्न, वाद्ययंत्र, मिष्ठान आदि आकृतियाँ
- अंतिम पाँच दिन – बड़े आकार की साँझी (संझया कोट)
- भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या
- संझया कोट – बड़े आकार की साँझी।
- प्रसिद्ध साँझी –
- उदयपुर के मत्स्येन्द्रनाथ मंदिर की। इस मंदिर को संझया मंदिर भी कहते हैं।
- केले की साँझी श्रीनाथजी मंदिर, नाथद्वारा। यहाँ कदली पत्तों की साँझी बनायी जाती है जो पूरे देश में प्रसिद्ध है।
- लाडलीजी मंदिर (जयपुर) में श्राद्ध पक्ष में प्रतिदिन उत्कृष्ट सांझी बनाने का प्रचलन है।
फड़ चित्रण

- लोक देवताओं की ऐतिहासिक, धार्मिक व पौराणिक जीवन गाथाओं को कपड़े पर चित्रित स्वरूप में उकेरना
- विधि – मोटे कपड़े (खादी या रेजी का) पर, गेहूँ या चावल के माड़ में गोंद मिलाकर कपड़े पर लेप किया जाता है, फिर उसे घोटकर चिकना किया जाता है
- उद्गम – मेवाड़ चित्रशैली से
- भोपा – फड़ वाचन क्रेन वाला
- मुख्य केन्द्र – शाहपुरा (भीलवाड़ा) – जोशी परिवार
- मुख्य कलाकार – श्रीलाल जोशी (2006 पद्मश्री), पांचोजी जोशी (सर्वप्रथम चित्रण का कार्य)
- वर्तमान कलाकार – दुर्गेश जोशी, शांतिलाल जोशी, विजय जोशी, पार्वती जोशी (फड़ चितेरी महिला), गौतली देवी, प्रदीप मुखर्जी (जयपुर निवासी श्री लाल जोशी के शिष्य), प्रदीप मुखर्जी (गीत-गोविन्द व श्रीमद्भागवत का चित्रण)
- विशेषताएँ-
- लम्बाई लगभग 30 फीट व चौड़ाई 5 फीट होती
- सात रंग – नारंगी, लाल, पीला, काला, नीला, हरा, भूरा
- रंगों का प्रतीकात्मक प्रयोग – देवियाँ नीले, देवता लाल, राक्षस काले तथा ऋषि श्वेत या पीले रंग में चित्रित
- चित्र संयोजन में मुख्य आकृति को सबसे बड़ा बनाकर प्रधानता दी जाती है।
- चातुर्मास में फड़ चित्रण नहीं होता है क्योंकि देवता सो जाते हैं। पुनः देवउठनी ग्यारस (कार्तिक शुक्ल ग्यारस) से फड़ चित्रण का कार्य आरम्भ हो जाता है
- फड़ ठंडी करना- फड़ के फट जाने या जीर्णशीर्ण हो जाने पर पुष्कर सरोवर में विसर्जित कर दिया जाना, इस अवसर पर भोपे समाज में ‘सवामणी’ का आयोजन करते हैं।
रामदेवजी की फड़ –
- कामड़ जाति के भोपों द्वारा रावणहत्था वाद्ययंत्र के साथ
- सर्वप्रथम चित्रांकन – चौथमल चितेरे द्वारा
पाबूजी की फड़ –
- वाचन थोरी या नायक जाति के भोपों द्वारा रावणहत्था वाद्ययंत्र के साथ
- वाचन रात्रिकालीन में पाबूजी की घोड़ी केसर कालमी को काले रंग से चित्रित कर युद्ध के दृश्यों के चित्रांकन के साथ
- भाले का चित्र मुख के सामने होता है।
भैंसासुर की फड़ –
- इस फड़ को ‘बागरी’ या ‘बावरी’ जाति के लोग चोरी करते समय शकुन के रूप में पूजते हैं।
- इस फड़ का वाचन नहीं करते है। (दर्शन करते हैं)
देवनारायण जी की फड़ –
- यह फड़ सर्वाधिक चित्रांकन वाली, सबसे पुरानी तथा सबसे लम्बी फड़ (24 हाथ लम्बी) है
- वाचन गुर्जर जाति के भोपों द्वारा ‘जंतर’ वाद्ययंत्र के साथ
- इस फड़ में मौखिक साहित्य, गायन, नाट्य एवं चित्रकला का सम्मिश्रण मिलता है।
- डाक टिकट – 2 सितम्बर, 1992 ई. में देवनारायण जयन्ती पर
- वाचन करते समय मुख के सामने सर्प का चित्रांकन होता है तथा देवनारायणजी की घोड़ी ‘लीलागर’ को हरे रंग से चित्रित किया जाता है।
- श्री लाल जोशी द्वारा बनायी गई देवनारायणजी की फड़ जर्मनी के एक संग्रहालय में रखी गई है।
- इस फड़ का वाचन भी रात्रिकालीन में दो या दो से अधिक भोपों द्वारा किया जाता है।
रामदला – कृष्णदला की फड़ –
- वाचन – हाड़ौती क्षेत्र में भाट जाति के भोपों द्वारा दिन में बिना वाद्ययंत्र के राम व कृष्ण भगवान के प्रसंगों पर किया जाता है।
- धूलजी चितेरे – इस फड़ सर्वप्रथम चित्रांकन
- गोगाजी की फड़ का वाचन डेरू वाद्य यंत्र के साथ किया जाता है।
- रामलाल व पतासी देवी ने अमिताभ बच्चन की फड़ का निर्माण किया।
पाने (सांगानेर जयपुर)
- पाने – मांगलिक अवसरों पर कागज पर निर्मित देवी-देवताओं के चित्रों
- शुभ संकेत व समृद्धि के स्त्रोत
- श्रीनाथ जी के पाने में 24 प्रकार के श्रृंगारों का चित्रांकन है। अतः यह अधिक कलात्मक है।
- गणेशजी, राम- कृष्ण, श्रवणकुमार, लक्ष्मीजी, श्रीनाथजी, रामदेवजी, देवनारायणजी, गोगाजी आदि के पाने प्रचलित हैं।
- गणेश जी के पाने – सर्वाधिक प्रयोग, शिव जी – सर्वाधिक मँहगा
पगल्या
- मांडणे के जैसा, घर में देवों के पदचिह्नों के प्रतीक के रूप में चित्रित
मेहंदी
- राजस्थान में मेहंदी को सुहाग एवं सौभाग्य का शुभ चिह्न माना जाता है।
- सोजत (पाली) मेहंदी के लिए प्रसिद्ध
- इसको G.I. टैग (सितम्बर, 2021) प्राप्त है।
- लाल सुर्ख की मेहंदी गिलुण्ड रेलमगरा राजसमंद की प्रसिद्ध है।
- बिस्सा जाति की महिला मेहंदी नहीं लगाती है।
गोदना
- किसी तीखे औजार से शरीर की ऊपरी चमड़ी खोदकर उसमें काला रंग भरने से चमड़ी में पक्का निशान बन जाता है, जिसे गोदना कहा जाता है।
- गोदना सौंदर्य के साथ अंधविश्वासों से भी जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि अनगुदा शरीर असुरक्षित होता है।
- आकृतियाँ – त्रिशूल, ओम, स्वास्तिक, राम-लक्ष्मण तथा प्राकृतिक चिह्न जैसे सूर्य, चंद्र, फूल, वृक्ष आदि
- कार्य – नट जाति के स्त्री-पुरुषों द्वारा
थापे
- ग्रामीण क्षेत्रों में शुभ अवसरों पर महिलाओं द्वारा परम्परागत रंगों का मिश्रण कर हाथों द्वारा छापे गए चित्र, थापे कहलाता है।
- इसमें देवी- देवताओं के प्रतीक का स्वरूप बनाया जाता है।
गोड़लिया
- पशुओं के शरीर पर विविध आकृतियों के बड़े कलात्मक दाग दिये जाते हैं। दागने की यह क्रिया अटेरना तथा दाग के निशान गोड़लिया कहलाते हैं।
- उद्देश्य – पशुओं की पहचान तथा चुराये गये पशुओं की शिनाख्त करना।
- लोहे के सरिये को गर्म कर, मिट्टी की ढ़कनी, लोहे पीतल के अक्षर अथवा वृक्ष विशेष की डोली को गर्म करके दागे जाते हैं।
- इन चिन्हों में प्राकृतिक, धार्मिक, मानवीय, चिह्नों का समावेश होता है।
अन्य लोक कलाएं
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पिछवाई 157635_a6785f-bb> |
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पथवारी 157635_eef1da-ec> |
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हीड़ 157635_970bce-27> |
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देवरे /थान 157635_28789e-69> |
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ओका-नाका गुणा 157635_21b48c-64> |
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वील 157635_77a378-a9> |
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घोड़ा बावसी 157635_559c43-e1> |
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बटेवड़े या थापड़ा 157635_2e7586-37> |
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ठप्पा 157635_0c1cb6-9a> |
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