ओजोन परत का क्षय

ओजोन परत का क्षय विश्व भूगोल का एक महत्वपूर्ण विषय है, जो पृथ्वी के पर्यावरणीय संतुलन और मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है। ओजोन परत सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी की रक्षा करती है, लेकिन मानव गतिविधियों के कारण इसका क्षय लगातार बढ़ रहा है। यह समस्या वैश्विक चिंता का विषय बन चुकी है, जिसके समाधान हेतु सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।

ओजोन परत

  • ओजोन परत पृथ्वी के वायुमंडल में स्थित एक पतली परत है, जो समताप मंडल (पृथ्वी की सतह से 15 से 35 किमी ऊपर) में पाई जाती है। इसमें ओजोन (O₃) गैस की उच्च मात्रा होती है और यह सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी (UV-B एवं UV-C) किरणों को अवशोषित कर पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है।
  • पराबैंगनी विकिरण के कारण ओजोन अणु लगातार टूटते और पुनः बनते रहते हैं, इस रासायनिक प्रक्रिया के कारण समताप मंडल को “केमोस्फियर” कहा जाता है।
Depletion of the ozone layer | ओजोन परत का क्षय

पराबैंगनी (UV) किरणें

  • UV किरणें सूर्य द्वारा उत्सर्जित विद्युत चुंबकीय विकिरण का एक प्रकार हैं।
  • इनकी तरंगदैर्ध्य 100 से 400 नैनोमीटर (nm) के बीच होती है।
  • पराबैंगनी किरणों के प्रकार:
  1. UV-A: 315–400 nm
  2. UV-B: 200–315 nm
  3. UV-C: 100–280 nm – सबसे हानिकारक किरणें, लेकिन ओजोन परत द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं।
  • समतापमंडलीय ओजोन को “अच्छा ओजोन” कहा जाता है, क्योंकि यह 95% हानिकारक UV किरणों को अवशोषित कर पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करता है।
  • इसलिए इसे “पृथ्वी की सुरक्षात्मक ढाल” या “पृथ्वी की छतरी” भी कहा जाता है।

ओजोन का निर्माण:

  • जब ऑक्सीजन अणु (O₂) पराबैंगनी (UV) विकिरण को अवशोषित करते हैं, तो वे टूटकर ऑक्सीजन परमाणु (O) में बदल जाते हैं, जो बाद में O₂ के साथ मिलकर ओजोन (O₃) का निर्माण करते हैं।

O₂​ + UV → 2O

O + O₂ ​→ O₃

ओजोन परत के क्षय के कारण:

  • हैलोजनीकृत गैसें ओजोन क्षय के मुख्य कारण हैं, जिनमें क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs), क्लोरीन, ब्रोमीन, मिथाइल क्लोरोफॉर्म, कार्बन टेट्राक्लोराइड आदि शामिल हैं।
  • एक क्लोरीन परमाणु लगभग 1,00,000 ओजोन अणुओं को नष्ट कर सकता है।
  • समताप मंडल में UV विकिरण के कारण CFCs से क्लोरीन परमाणु मुक्त होते हैं।
  • CFCs एवं हैलोन की बढ़ी हुई मात्रा ओजोन क्षय को तेज करती है।
  • क्लोरीन एवं ब्रोमीन परमाणु अनेक रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा ओजोन अणुओं को तोड़ते हैं।
  • इससे ओजोन परत पतली हो जाती है, जिसे ओजोन छिद्र कहा जाता है।
  • CFCl₃ सूर्य की पराबैंगनी किरणों (UV किरणों) से प्रभावित होता है।
  • पराबैंगनी किरणें CFCl₃ अणु में उपस्थित बंधों को तोड़ देती हैं।
  • परिणामस्वरूप, CFCl₃ से एक क्लोरीन मुक्त मूलक (Cl•) तथा CFCl₂ अणु बनता है।

CFCl₃ + hv → CFCl₂ + Cl•

  • इस चक्र का सरल उदाहरण: क्लोरीन परमाणु ओजोन अणु (O₃) के साथ अभिक्रिया कर उसके एक ऑक्सीजन परमाणु को ग्रहण करता है, जिससे ClO बनता है तथा एक ऑक्सीजन अणु मुक्त होता है।

Cl• + O₃ → ClO• + O₂

  • क्लोरीन मोनोऑक्साइड (ClO•) एक अन्य ओजोन अणु (O₃) के साथ अभिक्रिया कर पुनः एक क्लोरीन परमाणु तथा दो ऑक्सीजन अणु बनाता है।

ClO• + O₃ → Cl• + 2O₂

ओजोन की इकाई एवं मापन 

  • वायुमंडलीय ओजोन का मापन डॉबसन स्पेक्ट्रोफोटोमीटर द्वारा किया जाता है तथा इसे डॉबसन इकाई (DU) में व्यक्त किया जाता है।
  • एक डॉबसन इकाई (DU) मानक ताप एवं दाब पर शुद्ध ओजोन की 0.01 मिमी मोटी परत के बराबर होती है।
वायुमंडलीय ओजोन का मापन निम्न उपकरणों द्वारा किया जाता है:
  1. डॉबसन स्पेक्ट्रोमीटर
  2. फ़िल्टर ओजोन मीटर
  3. ओजोन मैपिंग स्पेक्ट्रोमीटर
ओजोन छिद्र 
  • ओजोन छिद्र वास्तव में बिना ओजोन वाला छेद नहीं है, बल्कि दक्षिणी गोलार्ध के वसंत ऋतु (अगस्त–अक्टूबर) के दौरान अंटार्कटिका के ऊपर समताप मंडल में ओजोन की अत्यधिक कमी वाला क्षेत्र है।
  • वायुमंडल में औसत ओजोन सांद्रता लगभग 300 डॉबसन इकाई (DU) होती है।
  • वह क्षेत्र जहाँ ओजोन सांद्रता 220 DU से कम हो जाती है, उसे ओजोन छिद्र का भाग माना जाता है।
  • अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र की पहचान पहली बार 1985 में जोसेफ फार्मन के नेतृत्व में ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण टीम द्वारा की गई।
अंटार्कटिका के ऊपर अधिकतम ओजोन क्षय के कारण 
  1. ध्रुवीय भंवर प्रभाव – ध्रुवों के चारों ओर चक्रवात जैसी वायु परिसंचरण प्रणाली बनती है। ध्रुवीय भंवर में तापमान लगभग –80°C तक गिर जाता है, जिससे ध्रुवीय समतापमंडलीय बादल (PSC) बनते हैं, जो ओजोन-क्षयकारी क्लोरीन यौगिकों को संग्रहित करते हैं।
  2. ध्रुवीय समतापमंडलीय बादल – इन्हें “मदर ऑफ पर्ल क्लाउड्स” भी कहा जाता है। ये ध्रुवीय समतापमंडल में बनते हैं। इनमें नाइट्रिक अम्ल एवं सल्फ्यूरिक अम्ल होते हैं तथा क्लोरीन यौगिकों से संबंधित रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए सतह प्रदान करते हैं। ये प्रक्रियाएँ क्लोरीन को सक्रिय कर ओजोन क्षय को तेज करती हैं तथा अप्रत्यक्ष रूप से ओजोन निर्माण को धीमा करती हैं। ये दक्षिणी गोलार्ध में अधिक सामान्य हैं क्योंकि वहाँ ध्रुवीय भंवर अधिक मजबूत होता है।
  3. सक्रिय क्लोरीन का प्रभाव – वायुमंडलीय परिसंचरण के कारण ओजोन-क्षयकारी गैसें ठंडे ध्रुवीय भंवर में एकत्रित हो जाती हैं। ये ठंडी परिस्थितियाँ रासायनिक अभिक्रियाओं को उत्प्रेरित करती हैं, जिससे सक्रिय क्लोरीन मुक्त होता है और ओजोन क्षय की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
ओजोन क्षयकारी पदार्थों की सूची
  1. CFCs (क्लोरोफ्लोरोकार्बन)
  2. HCFCs (हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन)
  3. हैलोन
  4. HBFCs (हाइड्रोब्रोमोफ्लोरोकार्बन)
  5. CCl₄ (कार्बन टेट्राक्लोराइड)
  6. CH₃CCl₃ (मिथाइल क्लोरोफॉर्म)
  7. CH₃Br (मिथाइल ब्रोमाइड)
  8. CH₂BrCl (ब्रोमोक्लोरोमीथेन)
  9. NOx (नाइट्रोजन ऑक्साइड)

विभिन्न ओजोन क्षयकारी पदार्थों की ओजोन क्षय क्षमता तथा वैश्विक ताप वृद्धि क्षमता

पदार्थप्रयोगओजोन विघटनकारी क्षमता (DU)वैश्विक तापन क्षमता
क्लोरोफ्लोरोकार्बन(CFC)रेफ्रिजरेंट्स, क्लीनिंग सॉल्वेंट्स, एरोसोल प्रोपेलेंट्स तथा प्लास्टिक फोम के निर्माण में ब्लीचिंग एजेंट के रूप में उपयोग किया जाता है।6-104,680-10,720
हैलोनअग्निशमन तथा विस्फोट सुरक्षा प्रणालियों में उपयोग3-101,620-7,030
कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCl₄)CFCs के उत्पादन, सॉल्वेंट्स तथा अग्निशामक यंत्रों में उपयोग1.11,380
मेथिल क्लोरोफॉर्म (CH₃CCl₃)सफाई के लिए औद्योगिक सॉल्वेंट के रूप में, स्याही में उपयोग0.1144
मेथिल ब्रोमाइड (CH₃Br)कीटनाशकों तथा फसल रोग नियंत्रण में उपयोग0.65
हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFC)CFC के विकल्प के रूप में रेफ्रिजरेंट्स में, सॉल्वेंट्स में, प्लास्टिक फोम निर्माण में, ब्लीचिंग एजेंट के रूप में उपयोग0.001-0.576-2,270
हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC)CFC के विकल्प के रूप में रेफ्रिजरेंट्स, एरोसोल प्रोपेलेंट्स तथा अग्निशामक यंत्रों में उपयोग0122-14,130

ओजोन परत क्षरण के प्रभाव

  1. UV विकिरण के संपर्क में वृद्धि: त्वचा रोग, कैंसर, सनबर्न, मोतियाबिंद, समय से पहले बुढ़ापा तथा प्रतिरक्षा क्षमता में कमी।
  2. समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव: UV विकिरण फाइटोप्लैंकटन को नुकसान पहुंचाता है, जिससे पूरी समुद्री खाद्य श्रृंखला प्रभावित होती है।
  3. प्रकाश संश्लेषण पर नकारात्मक प्रभाव: पौधों की वृद्धि तथा कृषि उत्पादकता में कमी।
  4. फसल उत्पादन एवं गुणवत्ता में गिरावट: कुछ फसलें UV विकिरण के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती हैं, जिससे उत्पादन कम होता है।
  5. प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर होना: UV विकिरण के अधिक संपर्क से मनुष्य एवं पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटती है।
  6. भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में तापमान वृद्धि: अत्यधिक गर्मी उत्पन्न होती है, जिससे शारीरिक एवं मानसिक विकास प्रभावित होता है।

ओजोन कालानुक्रम 

  • 1930: चैपमैन चक्र की खोज (ओजोन के निर्माण एवं क्षय की व्याख्या)।
  • 1970: ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वेक्षण द्वारा ओजोन परत के क्षय की भविष्यवाणी।
  • 1974: ओजोन क्षय में CFCs की भूमिका की पहचान।
  • 1985: जोसेफ फार्मन की टीम द्वारा अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन क्षय के प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत।

ओजोन परत को बचाने के प्रयास

वियना कन्वेंशन

  • 1988 में प्रभावी हुआ।
  • उद्देश्य: ओजोन परत का संरक्षण तथा CFC के उपयोग में कमी।
  • गैर-बाध्यकारी समझौता।
  • सार्वभौमिक सत्यापन प्रणाली वाली पहली अंतरराष्ट्रीय संधि।

टोरंटो विश्व सम्मेलन (1988) – कनाडा

  • वैश्विक तापन और ओजोन क्षय से निपटने हेतु 2005 तक CFC उपयोग में 20% कमी का आह्वान।

हेलसिंकी सम्मेलन – 1989

  • 2 मई 1989 को CFC उपयोग में कमी के प्रयासों को तेज करने के लिए आयोजित।
  • 2 मार्च 1990 को लंदन में “ओजोन परत संरक्षण” पर एक संगोष्ठी आयोजित की गई।

मॉन्ट्रियल समझौता – 

  • 16 सितंबर 1987 को अपनाया गया (विश्व ओजोन दिवस के रूप में मनाया जाता है)।
  • 1989 में प्रभावी हुआ।
  • भारत ने 1992 में इस प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए।
  • ODS (ओजोन क्षयकारी पदार्थ) के उत्सर्जन को कम करने हेतु बाध्यकारी समझौता।
  • 197 देशों ने इस प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए।
  • कार्यान्वयन में UNEP ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • विकसित देशों को 2000 तक CFC के उत्पादन एवं उपयोग को पूर्णतः समाप्त करना था।
  • विकासशील देशों को 2010 तक CFC के उत्पादन एवं उपभोग को बंद करने का समय दिया गया।
  • 2010 के बाद से HCFCs (हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन) को समाप्त करने पर ध्यान केंद्रित किया गया।

किगाली समझौता 2016 

  • उद्देश्य: HFCs (हाइड्रोफ्लोरोकार्बन) के उत्सर्जन को कम करना, जो वैश्विक ताप वृद्धि में योगदान देते हैं।
  • लक्ष्य: वर्ष 2100 तक वैश्विक तापमान में 0.5°C की कमी लाना।
  • 2019 से कानूनी रूप से बाध्यकारी।
  • मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के सभी 197 हस्ताक्षरकर्ता देशों ने 2047 तक HFCs को समाप्त करने पर सहमति दी।
  • विकसित देशों ने 2019 से, चीन ने 2024 से तथा भारत ने 2028 से HFCs को कम करना शुरू किया।
  • भारत के लिए लक्ष्य:
    • अगस्त (2021) में भारत ने HFCs को चरणबद्ध रूप से समाप्त करने हेतु किगाली समझौते की पुष्टि करने का निर्णय लिया।
    • भारत को 2028 से HFCs के उपयोग को स्थिर करना होगा तथा 2025 के स्तर से 2047 तक 80% तक कम करना होगा।
    • भारत द्वारा HFCs उपयोग में कमी की समय-सीमा-
  1. 2028: HFCs के उपयोग को स्थिर करना।
  2. 2032: 2025 के स्तर से 10% की कमी।
  3. 2037: 2025 के स्तर से 20% की कमी।
  4. 2042: 2025 के स्तर से 30% की कमी।
  5. 2047: 2025 के स्तर से 80% की कमी।
नोट – 
  • कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCl₄) एक हानिकारक ओजोन-क्षयकारी रसायन है, जिसका उपयोग इस्पात निर्माण इकाइयों द्वारा किया जाता है।
  • UNDP, मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाते हुए, 2030 तक HCFCs को चरणबद्ध रूप से समाप्त करने में भारत की सहायता कर रहा है।

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