मन्दिरों की वास्तुकला प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत की धार्मिक आस्था, कला-बोध और तकनीकी दक्षता का सजीव प्रतिबिंब है। इसमें नागर, द्रविड़ और वेसर जैसी स्थापत्य शैलियों के माध्यम से तत्कालीन समाज की सांस्कृतिक और वैचारिक चेतना को समझा जा सकता है।
मन्दिरों की वास्तुकला

प्रारम्भिक उल्लेख
- मंदिर स्थापत्य का प्रथम उल्लेख: शतपथ ब्राह्मण
- गुप्तकाल में वर्गाकार गर्भगृह और स्तम्भयुक्त द्वारमंडप के साथ मंदिर वास्तुकला का आरम्भ।
- प्रारंभिक चरण में मंदिर सपाट छत वाले, एकाश्म (single rock-cut) होते थे।
- बाद में तक्षित शिखरों का विकास हुआ।
मंदिर वास्तुकला के पाँच चरण
1. प्रथम चरण
विशेषताएँ:
- सपाट छत
- वर्गाकार योजना
- उथले स्तम्भों पर द्वारमंडप
- कम ऊँचाई के मंच (जगती)
उदाहरण: साँची – मंदिर संख्या 17

2. द्वितीय चरण
विशेषताएँ:
- पूर्व चरण की विशेषताएँ जारी
- मंच (वेदी) की ऊँचाई बढ़ी
- कहीं-कहीं दो-मंजिला मंदिर
- गर्भगृह के चारों ओर आवृत प्रदक्षिणा-पथ
उदाहरण: नाचना-कुठार का पार्वती मंदिर (MP)

3. तृतीय चरण
विशेषताएँ:
- सपाट छत के स्थान पर कम ऊँचाई वाले शिखर
- लगभग वर्गाकार/वक्ररेखीय शिखर
- पंचायतन शैली का विकास—
- मुख्य मंदिर + चार सहायक मंदिर
- सामने लम्बा मंडप → प्रमुख मंदिर आयताकार
- भू-विन्यास क्रूस (cruciform) जैसा
उदाहरण:
- देवगढ़ का दशावतार मंदिर (UP)
- एहोल का दुर्गा मंदिर (कर्नाटक)

4. चतुर्थ चरण
विशेषताएँ:
- संरचना लगभग पूर्व जैसी
- केवल मुख्य मंदिर अधिक आयताकार
उदाहरण: शोलापुर का तेर मंदिर
5. पंचम चरण
विशेषताएँ:
- बाहर की ओर उथली आयताकार किनारों वाले वृत्ताकार मंदिर
- पूर्ववर्ती चरणों की अन्य सभी विशेषताएँ बनी रहीं
उदाहरण: राजगीर का मनियार मठ

गुप्तकालीन वास्तुकला पर टिप्पणी
- यद्यपि आरंभिक गुप्त शासक बौद्ध थे और उन्होंने बौद्ध वास्तुकला की परंपरा को जारी रखा। लेकिन मंदिरों की वास्तुकला उत्तरवर्ती गुप्तकाल में हिन्दू शासकों के संरक्षण में प्रसिद्ध हुई।
- इस अवधि में मंदिरों की वास्तुकला अपने शिखर पर पहुँची। इसी प्रकार बौद्ध और जैन कला भी गुप्त काल में अपने शिखर पर पहुँची।
- मुख्य रूप से उत्तरवर्ती गुप्त शासक ब्राह्मणीय शासक थे। फिर भी उन्होंने अन्य धर्मों के लिए उदाहरणीय सहिष्णुता का प्रदर्शन किया।
- इस काल में भारत के उत्तरी और मध्य भाग में विष्णु, दक्षिणी भाग में शिव और भारत के पूर्वी भाग और साथ ही साथ मालाबार समुद्र तट या भारत के दक्षिण-पश्चिम भाग में शक्ति, जैसे तीन मुख्य देवों की पूजा की जाती थी।
मंदिर निर्माण की प्रमुख शैलियाँ

हिन्दू मंदिर – मूल अवयव
1. गर्भगृह
- छोटा बंद कक्ष
- मुख्य देवता की प्रतिमा स्थापित
- मंदिर का सबसे पवित्र भाग
2. मंडप
- प्रवेश/सभा स्थल
- स्तंभयुक्त
- पूजा करने वालों के लिए बड़ा स्थान
3. शिखर
- पर्वत जैसा ऊर्ध्व भाग
- आकार: पिरामिडीय से वक्ररेखीय
- मंदिर का ऊँचा प्रतीकात्मक भाग
4. वाहन
- देवता का वाहन/आसन
- गर्भगृह के ठीक सामने स्थापित
नागर शैली
सामान्य परिचय
- उत्तर भारत की शैली (आर्य शैली)
- 5वीं सदी के बाद विकसित
- पश्चिम, मध्य, पूर्व में कई उप-शैलियाँ विकसित
नागर शैली की प्रमुख विशेषताएँ
1. स्थल योजना
- पंचायतन शैली प्रचलित:
मुख्य मंदिर + 4 गौण मंदिर (क्रूस आकार में) - मुख्य मंदिर के सामने मंडप
- गर्भगृह के बाहर गंगा–यमुना की प्रतिमाएँ
- जलाशय/टैंक का अभाव
- ऊँचे मंच (जगती) पर निर्माण
- द्वारमंडप—स्तम्भयुक्त
2. शिखर प्रकार
- रेखा-प्रसाद
- वर्गाकार आधार
- ऊपर जाते हुए दीवारें भीतर की ओर वक्र
- फमसाना
- चौड़ा आधार, कम ऊँचाई
- सीधी रेखा में ढलान
- वल्लभी
- आयताकार आधार
- अर्द्धगोलाकार/गुंबदाकार छत
3. शिखर का शीर्ष
- ऊर्ध्व भाग पर आमलक (नालीदार चक्र)
- उसके ऊपर कलश (गोलाकार)
4. दीवार संरचना (रथ)
- दीवारों को तीन क्षैतिज खंड → त्रिरथ
- आगे पंचरथ, सप्तरथ, नवरथ रूप
- इन भागों में कथात्मक मूर्तियाँ
5. प्रदक्षिणा पथ
- गर्भगृह के चारों ओर
- ढका हुआ (आवृत)
6. परिसर संरचना
- मंदिर चारदीवारी से घिरा नहीं
- अलग से प्रवेश द्वार नहीं


नोट – पंचायतन शैली – मुख्य देवालय को एक वर्गाकार वेदी पर बनाया जाता है और चार कोनों में चार छोटे सहायक देवालय बनाए जाते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर पाँच छोटे-बड़े देवालय बनाए जाते हैं इसीलिए इस शैली को पंचायतन शैली कहा जाता है
नागर शैली के अंतर्गत उभरीं तीन उप-शैलियाँ –
1. ओडिशा शैली (कलिंग शैली)
- कलिंग साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में विकसित।
- विशेषताएँ:
- बाहरी दीवारों पर अत्यधिक बारीक नक्काशी; भीतरी दीवारें साधारण।
- ड्योढ़ी (Porch) में खम्भों का प्रयोग नहीं, छत लोहे के गार्डरों पर टिकी।
- शिखर को रेखा-देउल कहा जाता; ऊपर जाते हुए भीतर की ओर मुड़ता।
- मंडप को जगमोहन कहा जाता।
- मुख्य मंदिर वर्गाकार।
- मंदिर परकोटे (प्राकार) से घिरा – द्रविड़ शैली जैसा।
उदाहरण: कोणार्क सूर्य मंदिर, पुरी जगन्नाथ मंदिर, लिंगराज मंदिर।


2. खजुराहो शैली (चंदेल/मध्य भारतीय शैली)
- चंदेल शासकों द्वारा विकसित; मध्य भारत में प्रमुख।
- विशेषताएँ:
- बाहरी-भीतरी दोनों दीवारों पर बारीक नक्काशी।
- मूर्तियाँ कामुक शैली की; वात्स्यायन के कामसूत्र से प्रेरित।
- निर्माण सामग्री: बलुआ पत्थर।
- तीन कक्ष – गर्भगृह, मंडप, अर्ध-मंडप।
- कुछ में गर्भगृह तक जाने वाला अंतराल (corridor)।
- मंदिर अधिकतर पूर्वमुखी/उत्तरमुखी।
- पंचायतन शैली; सहायक मंदिरों में भी रेखा-प्रसाद शिखर → मंदिर समूह पर्वत शृंखला जैसा लगता।
- ऊँचे चबूतरे पर निर्मित।
- उदाहरण: कंदरिया महादेव मंदिर, लक्ष्मण मंदिर।

3. सोलंकी शैली (गुजरात–राजस्थान क्षेत्र)
- सोलंकी शासकों के संरक्षण में विकसित।
- विशेषताएँ:
- दीवारें बिना नक्काशी की।
- गर्भगृह अंदर-बाहर दोनों ओर से मंडप से जुड़ा।
- बरामदों में सजावटी धनुषाकार तोरण।
- परिसर में एक विशिष्ट बावड़ी (सूर्य-कुंड)।
- बावड़ी की सीढ़ियों पर छोटे-छोटे मंदिर; लकड़ी की नक्काशी।
- निर्माण सामग्री विविध – बलुआ पत्थर, काला बेसाल्ट, नरम संगमरमर।
- मंदिर प्रायः पूर्वमुखी; विषुव पर सूर्य-किरणें सीधे गर्भगृह में गिरें—ऐसा वास्तु।
- उदाहरण: मोढेरा सूर्य मंदिर (निर्माण: 1026–27, भीम I)।

गुप्तकालीन मंदिर स्थापत्य
- भारत में सर्वप्रथम गुप्तकाल में मंदिर निर्माण कला का जन्म हुआ। पहली बार शिखर युक्त मंदिर बनाए गए व सभा मंडपों का प्रयोग किया गया।
- इस काल में मन्दिर वास्तु के विकास के साथ-साथ इसके शास्त्रीय नियम भी निर्धारित हुए।
- गुप्तकालीन मन्दिर नागर शैली के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। आधार पीठिका, गर्भगृह, सभा-मण्डप, शिखर, अन्तराल, प्रदक्षिणा पथ तथा द्वार पर गंगा-यमुना की मूर्तियां आदि इनकी सामान्य विशेषताएं हैं। यह ईंटों व पत्थरों से निर्मित है।
- तिगवां का विष्णु मन्दिर, भूमरा का शिव मन्दिर, नाचना कुठार का पार्वती मन्दिर, भितरीगांव का लक्ष्मण मन्दिर व देवगढ़ का दशावतार मन्दिर आदि प्रमुख मन्दिर हैं।
- इनमें क्रमशः मन्दिर की योजना व आकृति में सतत् विकास दृष्टिगोचर होता है। इनके अतिरिक्त विहार, स्तूप, गुहा, चैत्य आदि निर्मित हुए, जिनमें अजंता, बाघ, एलोरा, उदयगिरी के गुहा के मन्दिर धमेख स्तूप व महाबोधि विहार (बोधगया) मुख्य है।
गुप्तकालीन मंदिरों की विशेषताएँ :
- गुप्तकाल की वास्तुकला में मंदिर सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।
- ईंट व पत्थर से निर्माण होता था।
- मंदिर निर्माण ऊँचे व सपाट चबूतरे पर होता था। चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ थीं।
- गर्भगृह के द्वारपाल के रूप में मकरवाहिनी (गंगा) व कूर्मवाहिनी (यमुना) आकृति अंकित होती थी।
- प्रारम्भ में मंदिर की छत चपटी थी व बाद में शिखर भी बनाए जाने लगे।
- मंदिर के अन्दर वर्गाकार कक्ष होता था जिसमें प्रतिमा रखते थे, इसे ही गर्भगृह कहा जाता था।
- कालिदास ने गुप्तकालीन मंदिरों पर शंख व पद्म के अंकन का उल्लेख किया।
- गुप्त काल में सिरपुर व भीतर गाँव के मंदिर ही ईंटों से बने हैं, दूसरे मंदिर पत्थरों से निर्मित हैं।
- गुप्त काल में चार सिंहों की मूर्तियाँ एक–दूसरे से पीठ सटाए हुए वर्गाकार स्तम्भों के शीर्ष भाग पर होते थे।
गुप्तकालीन प्रमुख मंदिर :
- साँची का मंदिर
- भूमरा का शिव मंदिर
- तिगवां का विष्णु मंदिर
- एरण का विष्णु मंदिर
- नचना – कुठार का पार्वती मंदिर
- देवगढ़ का दशावतार मंदिर
- भीतर गाँव का विष्णु मंदिर
- मंदिरों की मुहर
पहाड़ी क्षेत्र
मंदिर वास्तुकला
- कुमाऊँ, गढ़वाल, हिमाचल और कश्मीर के पहाड़ी क्षेत्रों में वास्तुकला का एक अनोखा रूप विकसित हुआ।
- पाँचवीं शताब्दी तक कश्मीर की कला पर गांधार शैली का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखने लगा, वहीं गुप्त और गुप्तोत्तर काल की परंपराएं भी इसमें सम्मिलित होने लगीं।
- स्वयं पहाड़ी क्षेत्रों की भी अपनी एक अलग परंपरा थी जिसके अंतर्गत लकड़ी के मकान बनाए जाते थे, जिनकी छतें ढलवा होती थीं।
- कई स्थानों पर मंदिरों के मुख्य गर्भगृह और शिखर रेखा-प्रासाद शैली में बने होते थे, जबकि मंडप काष्ठ-शैली के पुराने रूप में निर्मित होते थे। कभी-कभी ये मंदिर पैगोडा या स्तूप जैसे स्वरूप धारण कर लेते थे।
- कश्मीर के कारकोटा काल में वास्तुकला ने उल्लेखनीय प्रगति की। इस काल में बने मंदिरों में पंड्रेथान का मंदिर सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, जो आठवीं और नौवीं शताब्दी में निर्मित हुआ था। इस मंदिर की विशिष्टता यह है कि यह जलाशय के बीच में बनी एक वेदी पर स्थित है, जो देवालय के पास जलाशय होने की परंपरा को दर्शाता है।
- कुमाऊँ क्षेत्र के मंदिरों में भी नागर वास्तुकला की उत्कृष्टता दिखाई देती है। इस क्षेत्र के दो प्रमुख मंदिर अल्मोड़ा के पास स्थित जगेश्वर और दूसरा पिथौरागढ़ के पास चंपावत में हैं। ये मंदिर पहाड़ी क्षेत्रों की वास्तुकला के समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक हैं।
मूर्तिकला
- शामलाजी और चंबा में प्राप्त प्रतिमाओं में स्थानीय परंपराओं और गुप्तोत्तर शैली का अद्भुत संगम दृष्टिगोचर होता है।
- लक्षणा देवी मंदिर में महिषासुरमर्दिनी और नरसिंह की प्रतिमाओं में गुप्तोत्तर कालीन परंपरा का स्पष्ट प्रभाव दिखता है।
- इन मूर्तियों में कश्मीर की धातु-प्रतिमा परंपरा के साथ-साथ गुप्तोत्तर काल के सौंदर्यशास्त्र का समावेश किया गया है।
- प्रतिमाओं का पीलापन जस्ते और तांबे के मिश्रण का परिणाम माना जाता है, जो उन दिनों कश्मीर में मूर्ति निर्माण में प्रचलित था।
दक्षिण भारत में मंदिर वास्तुकला
1. महेन्द्रवर्मन शैली (610–640 ई.)
- पल्लव वास्तुकला का पहला चरण।
- कठोर चट्टानों को काटकर गुहा मंदिर बनाए गए जिन्हें मण्डप कहा गया।
- (ध्यान: नागर शैली में मंडप = सभा हॉल; यहाँ = रॉक-कट गुफा)
- मण्डप स्तंभयुक्त बरामदे, पीछे 1–2 कक्ष।
- उदाहरण:
- पल्लवरम का पंचपांडव मंडप
- भैरवकोण्डा मंडप
- त्रिमूर्ति मंडप
2. मामल्ल शैली (640–680 ई.)
- वास्तुकला विकास का दूसरा चरण।
- विकासकर्ता: नरसिंहवर्मन I (मामल्ल)।
- चट्टानों को काटकर अत्यंत सुंदर मूर्तिकला से सजाए गए मंदिर।
- दो प्रकार के स्मारक:
- मण्डप (रॉक-कट हॉल)
- रथ / एकाश्मक मंदिर (एक ही पत्थर से निर्मित)
- कुल 8 रथ मंदिर; सभी संभवतः शिव मंदिर।
- महत्वपूर्ण रथ:
- द्रौपदी रथ – सबसे छोटा
- नकुल–सहदेव रथ
- अर्जुन रथ
- भीम रथ
- धर्मराज रथ – सबसे बड़ा और सुंदर, इस पर नरसिंहवर्मन की मूर्ति।
- गणेश रथ
- पिण्डारी रथ
- वलयकंट्टैथ रथ
- रथों पर शिव, गंगा, पार्वती, गणेश, द्वन्द्व, हरिहर, ब्रह्मा की मूर्तियाँ।
- इन रथ मंदिरों को “सात पैगोड़ा / सप्तपेगोड़ा” कहा जाता है।
- महाबलीपुरम अपनी मूर्तिकला के लिए प्रसिद्ध।
- नोट: द्रविड़ शैली का मूल रूप धर्मराज रथ से विकसित हुआ।

3. राजसिंह शैली (680–800 ई.)
- रॉक-कट के स्थान पर ईंट + पाषाण के इमारती मंदिर।
- विकासकर्ता: नरसिंहवर्मन II (राजसिंह)
- प्रमुख उदाहरण:
- कांची का कैलाशनाथ मंदिर
- निर्माण प्रारंभ: नरसिंहवर्मन II
- पूर्ण: परमेश्वरवर्मन II
- महाबलीपुरम का सी-शोर (समुद्र तटीय) मंदिर
- अर्काट का पनमलाई मंदिर
- कांची का वैष्णव—वैकुंठ पेरूमल मंदिर
- कांची का कैलाशनाथ मंदिर

4. नंदिवर्मन / अपराजित शैली (800–900 ई.)
- पल्लव वास्तुकला का अंतिम चरण।
- छोटे आकार के इमारती मंदिर।
- अन्य विशेषताएँ द्रविड़ शैली के समान।
- उदाहरण:
- कांची का मुक्तेश्वर मंदिर
- मतंगेश्वर मंदिर
- गुडी मल्लम का परशुरामेश्वर मंदिर

महाबलीपुरम
- तमिलनाडु में पल्लव राजवंश के अंतर्गत प्राचीन पत्तन शहर मामल्लपुरम में कई प्रकार की वास्तुकलाएं फली-फूलीं।
- सातवीं शताब्दी के इन पल्लव स्थलों को, जिन्हें “महाबलीपुरम के स्मारक समूह” के रूप में जाना जाता है, वर्ष 1984 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।
इनमे सम्मलित हैं:
- रथ मन्दिर या पंच रथ – इन्हें पांडवरथ के नाम से भी जाना जाता है। ये चटानों को काट कर बनाये गये भारत के सबसे प्राचीन मन्दिर हैं। रथों में धर्मराज रथ, भीम रथ, अर्जुन रथ, नकुल रथ और सहदेव रथ और द्रौपदी रथ हैं। सभी सातवीं सदी के आसपास के हैं। धर्मराज रथ, पांच ढांचों में सबसे बड़ा है।
- चट्टानों से काट कर बनाई गयी गुफाएँ – जिनमें वराह गुफा मन्दिर, कृष्ण गुफा मन्दिर, पंच पांडव गुफा मंदिर और महिषासुरमर्दनी मंडप (देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध करते हुए नक्काशीदार प्रतिमा)।
- खुली हवा में नक्काशी – इनमें गंगा अवतरण सम्मलित है, जिसमें दो विशाल शिलाखंडों पर अर्जुन की तपस्या या भागीरथ की तपस्या को उकेरा गया है। गंगा अवतरण, को स्थानीय रूप से अर्जुन की तपस्या के रूप में जाना जाता है। यह भागीरथ के प्रयासों से स्वर्ग से गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा का वर्णन करती हैं। इसकी चौड़ाई 15 मीटर एवं लंबाई 30 मीटर है।
- नोट – कुछ इसे किरातार्जुनीयम् की कथा से जोड़ते हैं और कुछ अर्जुन की तपस्या से।
- तटीय मन्दिर परिसर – इसमें दो छोटे और एक बड़ा मन्दिर सम्मलित है। यह एक दो मंजिले दीवार से घिरे प्रांगण में स्तिथ है, जिस पर शिव के वाहन नंदी की प्रतिमाएं अंकित हैं। मुख्य रूप से यह मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है, परिसर में स्थित तीनों मन्दिरों में से एक में भगवान विष्णु की एक अनंतशयन प्रतिमा भी है।

पल्लव वंश के पतन के बाद चोल शासकों के काल में मंदिर वास्तुकला की एक नई शैली विकसित हुई, जिसे मंदिर स्थापत्य की द्रविड़ शैली के रूप में जाना जाता है। इसे दक्षिण भारत में मंदिरों के निर्माण में एक नया युग माना जाता है। इसके बाद इस क्षेत्र में तीन अन्य शैलियों का विकास हुआ-वेसर शैली, नायक शैली और विजयनगर शैली।
चोल कला
चोलकालीन कला की विशेषताएँ
- पल्लवों की आरंभ की हुई द्रविड़ मंदिर शैली चोलकाल में चरम पर पहुँची।
- चोलकालीन मंदिर आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक केन्द्र थे।
- फर्ग्यूसन का कथन— “चोल कलाकारों ने मंदिरों का निर्माण दानवों की तरह और विन्यास रत्नकारों की तरह किया।”
द्रविड़ शैली (चोल काल) की मुख्य विशेषताएँ
- मंदिर ऊँची चारदीवारी से घिरे होते थे।
- मुख्य दीवार में ऊँचा गोपुरम् (प्रवेशद्वार)।
- पंचायतन व्यवस्था – एक मुख्य मंदिर + चार गौण मंदिर।
- पिरामिडनुमा शिखर (विमान) – ऊपर की ओर सीधे, बिना घुमाव।
- विमान के शीर्ष पर अष्टकोणीय शिखर (नागर शैली का कलश नहीं)।
- द्रविड़ परंपरा में केवल मुख्य मंदिर पर विमान, सहायक मंदिरों पर नहीं।
- अंतराल (गर्भगृह–सभा हॉल को जोड़ने वाली गलियारा)।
- गर्भगृह पर द्वारपाल, यक्ष, मिथुन प्रतिमाएँ।
- परिसर के भीतर जलाशय (कल्याणी/पुष्करिणी) अनिवार्य।
चोलकालीन प्रमुख मंदिर
- बृहदेश्वर मंदिर, तंजौर – 1011 ई., राजराज चोल द्वारा।
- गंगईकोंड चोलपुरम मंदिर – राजेंद्र प्रथम द्वारा, गंगा-विजय के उपलक्ष्य में।



चोल कला-
- चोलकाल में पौराणिक, शैव एवं वैष्णव धर्मों का पुनर्जागरण हुआ।
- नयनार (शैव) व आलवार (वैष्णवों) ने अपने प्रवचनों तथा भजनों से दक्षिण को आप्लवित किया।
- चोल स्वयं शैव धर्मानुयायी थे तथापि वे धार्मिक सहिष्णु थे।
- उन्होंने शैव मन्दिरों के निर्माण के साथ-साथ वैष्णव मन्दिरों का निर्माण तथा जैन बौद्ध विहारों को अनुदान दिया।
- मन्दिरों ने सांस्कृतिक, धार्मिक व आर्थिक जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- चोल कला प्रेमी एवं महान् निर्माता थे। उन्होंने विशाल राज प्रासाद, कृत्रिम झीलें, विस्तीर्ण बाँध, सुन्दर नगर, धातु एवं पाषाण की मूर्तियां तथा भव्य मन्दिरों का निर्माण कराया।
- चोलकालीन प्रारम्भिक मंदिरों में तिरुकट्टलाई का सुन्दरेश्वर मंदिर, नरतमलाई का विजयालय चोलेश्वर मन्दिर प्रसिद्ध है।
- राजराज का वृहदेश्वर, राजेन्द्र प्रथम का गंगैकोण्डचोलपुरम तथा कोरंग नाथ, ऐरातेश्वर, त्रिभुवनेश्वर आदि अन्य प्रमुख मन्दिर हैं।
तंजौर का राजराजेश्वर अथवा बृहदीश्वर मंदिर
- राजराज प्रथम द्वारा निर्मित
- इस मंदिर के निर्माण में द्रविड़ कला शैली का पूर्ण विकास हुआ है।
- मंदिर का निर्माण (1003 ई0 -1111 ई0) में।
- मंदिर का आयाताकार प्रांगण 160 मीटर लम्बा एवं 80 मीटर चौड़ा है।
- मंदिर का सर्वाधिक आकर्षण भाग है, गर्भगृह के ऊपर पश्चिम में बना 60 मीटर ऊँचा विमान, उसके ऊपर 3.50 मीटर ऊँचा पिरामिडाकार का शीर्षभाग है।
- मंदिर के आधार तल के वर्गाकार कक्ष में 2.25 मीटर चौड़ा प्रदक्षिणा-पथ निर्मित है। ग
- र्भगृह में एक विशाल शिवलिंग की स्थापना की गयी।
- पर्सी ब्राउन ने तंजौर के बृहदीश्वर मंदिर के विमान को ‘भारतीय वास्तुकला का निकष’ माना।
- 1987 वर्ष में इसे यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत (धरोहर) सूची में शामिल किया गया था।
गंगेकोण्डचोलपुरम का मंदिर
- निर्माण राजेन्द्र प्रथम ने।
- मंदिर का आधार 105 मीटर लम्बा एवं 50 मीटर चौड़ा है।
- आठ मंजिला विमान लगभग 50 मीटर ऊँचा है।
- मंदिर को द्रविड़ चोल मंदिर कला की परिणति कहा जा सकता है।
- इस काल के कुछ अन्य मन्दिरों में तंजौर में स्थित दार सुरम् का ऐरावतेश्वर मंदिर उल्लेखनीय है।
- त्रिभुवनेश्वर मंदिर- कुलोत्तुंग III- त्रिभुवन तंजौर
- कंपहरेश्वर मंदिर – कुलोत्तुंग III – त्रिभुवन (कुंभकोणम)
- विजयालय चोल ने नार्त्तामलाई में चोलेश्वर मन्दिर का निर्माण करवाया। कन्ननूर में आदित्य I ने सुब्रह्मण्यम मन्दिर का निर्माण करवाया।
- परांतक II के शासनकाल में श्रीनिवासनालयूर में कोरंगनाथ मंदिर का निर्माण हुआ।
- चोल कला का प्रभाव इण्डो-चीन तथा सुदूर पूर्व के देशों पर पड़ा, जिसका प्रमुख उदाहरण अंकोरवाट का महान् मन्दिर है।
चालुक्य वास्तुकला
1. चालुक्य मंदिर वास्तुकला का आधार
- दक्षिण भारत में चालुक्यों ने मुलायम बलुआ पत्थर से मंदिर निर्माण की तकनीक शुरू की।
- दो प्रकार के मंदिर:
- गुफा मंदिर
- संरचनात्मक मंदिर
- बादामी – दोनों प्रकार के मंदिरों के लिए प्रसिद्ध।
- पट्टदकल और एहोल – संरचनात्मक मंदिरों के लिए विख्यात।
2. एहोल (अय्यावोल) – चालुक्य कला का प्रयोगशाला केंद्र
- निर्माण: 634 ईस्वी, अय्यावोल व्यापारी संघ का मुख्यालय, प्रमुख व्यापार केंद्र।
- लगभग 70 मंदिर।
- लाड खान मंदिर – सबसे प्राचीन; उत्तरी शैली से भिन्न बड़ा स्तंभ।
- दुर्गा मंदिर – बौद्ध चैत्य मॉडल पर; अर्धवृत्ताकार ऊँचे मंच पर।
- हुच्चिमल्लिगुड़ी मंदिर – आयताकार योजना।
- मेगुती जैन मंदिर – जैन मंदिर-परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण।
- मंडप-प्रकार की गुफाएँ भी यहाँ संरक्षित हैं।

3. बादामी (वातापी)
- यहाँ चार गुफाएँ स्थित।
- सबसे बड़ी गुफा – मंगलश द्वारा निर्मित; विष्णु को समर्पित।
- विष्णु की अनंत-शयन मुद्रा और नरसिंह अवतार – चालुक्य कला के श्रेष्ठ उदाहरण।
- सभी धर्मों के मंदिरों में एक समान वास्तुशैली – शिल्पकार व संरक्षक की धर्मनिरपेक्ष सोच का परिचायक।
4. पट्टदकल – शाही अनुष्ठान केंद्र
- कर्नाटक के बागलकोट जिले में एक मंदिर-समूह।
- यहाँ चालुक्यों ने 10+ मंदिर बनाए, जो वास्तुकला के विकास को दर्शाते हैं।
- दो शैली-समूह:
- इंडो-आर्यन (नागर शैली तत्व)
- द्रविड़ शैली
विरुपाक्ष मंदिर
- निर्माण: रानी लोकमहादेवी द्वारा (विक्रमादित्य II की कांचीपुरम विजय के उपलक्ष्य में)।
- ममल्लपुरम में बने नरसिंहवर्मन के संरचनात्मक मंदिर से प्रेरित।
- वास्तुकार को त्रिभुवनाचार्य उपाधि।
- दीवारों पर शिल्पकारों के हस्ताक्षर खुदे हुए।

पापनाथ मंदिर
- योजना virupaksha मंदिर जैसी, पर शिखर उत्तरी (इंडो-आर्यन) शैली का।
- दीवारों पर रामायण के दृश्य।
- पूर्वी दीवार पर एक छोटा कन्नड़ शिलालेख है, जिसमें उस वास्तुकार रेवडी ओवज्जा का नाम है, जिसने इस मंदिर की रचना की थी।

कला की अन्य शैलियाँ
1. नायक शैली (मदुरै शैली)
| बिंदु | विवरण |
| काल | 16वीं–18वीं सदी |
| संरक्षक | नायक शासक |
| प्रकृति | द्रविड़ शैली जैसी, पर अधिक व्यापक; इस्लामी प्रभाव भी |
| प्रमुख विशेषताएँ | • गर्भगृह के चारों ओर बड़ा पराक्रम (गलियारा)• छतदार प्रदक्षिणा पथ• विशाल गोपुरम् (मीनाक्षी मंदिर का गोपुरम् विश्व का सबसे ऊँचा)• हर स्थान पर बारीक नक्काशी |
| उदाहरण | मदुरै का मीनाक्षी मंदिर |

2. वेसर शैली (कर्नाटक शैली)
| बिंदु | विवरण |
| क्षेत्र | विन्ध्याचल–कृष्णा नदी के बीच |
| आरंभ | 7वीं सदी, चालुक्य शासक |
| प्रकृति | नागर + द्रविड़ का मिश्रण |
| प्रमुख विशेषताएँ | • विमान व मंडप को अधिक महत्व• खुले प्रदक्षिणा पथ• स्तंभ, दरवाजे, छत पर बारीक नक्काशी• वक्र शिखर (नागर प्रभाव)• जटिल नक्काशी व सीढ़ीदार शिखर (द्रविड़ प्रभाव) |
| प्रमुख राजवंश | बादामी व कल्याणी चालुक्य, राष्ट्रकूट, होयसला |
| उदाहरण | डोडा बसप्पा मंदिर (डांबल), चेन्नाकेशव मंदिर (हासन), लाडखान मंदिर (ऐहोल), बादामी मंदिर, एलोरा का कैलाशनाथ |

3. विजयनगर शैली
| बिंदु | विवरण |
| काल | 1335–1565 ई. |
| राजधानी | हम्पी |
| प्रकृति | चोल + होयसल + पांड्य + चालुक्य शैली का मिश्रण; हिंद-इस्लामी प्रभाव |
| प्रमुख विशेषताएँ | • दीवारें नक्काशी व ज्यामितीय पैटर्न से अलंकृत• गोपुरम् चारों दिशाओं में• एकाश्म स्तंभ• स्तंभों पर यली (घोड़े जैसा जीव)• बड़े परकोटे, कई मंडप (कल्याण मंडप)• ‘अम्मान मंदिर’ की परंपरा• मंदिर परिसर में धर्मनिरपेक्ष इमारतें |
| उदाहरण | विठ्ठलस्वामी मंदिर, विरुपाक्ष मंदिर, कमल महल, हज़ारा मंदिर, शेष पर नरसिंह मूर्ति |

4. होयसल शैली
| बिंदु | विवरण |
| क्षेत्र | कर्नाटक (बेलूर, हलेबिड) |
| काल | 1050–1300 ई. |
| प्रकृति | विशिष्ट तारा-आकृति आधारित शैली |
| प्रमुख विशेषताएँ | • तारे के आकार का जटिल प्लान• मुलायम ब्लैक स्टोन (शिस्ट) का प्रयोग• अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी, आभूषण भी तराशे हुए• उभरे मंच (जगती) पर निर्माण• शिखरों की क्षैतिज पट्टियों में संरचना• ज़िगज़ैग दीवारें व सीढ़ियाँ |
| उदाहरण | हलेबिड का होयसलेश्वर मंदिर, बेलूर के मंदिर |

5. पाल–सेन शैली
| बिंदु | विवरण |
| क्षेत्र | बंगाल (भारत + बांग्लादेश) |
| काल | 8वीं–12वीं सदी |
| संरक्षक | पाल (बौद्ध), सेन (हिन्दू) |
| प्रकृति | बौद्ध + हिन्दू संयुक्त वास्तुकला |
| प्रमुख विशेषताएँ | • ‘बंगाल छत’ – ढलुआँ/कर्व्ड छत (बांस के घर की तरह)• टेराकोटा ईंटें प्रमुख सामग्री• वक्राकार ऊँचा शिखर, शीर्ष पर अमलक (उड़ीसा शैली जैसा)• मूर्तिकला में प्रस्तर व धातु दोनों, अत्यंत चमकदार फिनिश |
| पाल काल के स्मारक | नालंदा, विक्रमशिला, ओदंतपुरी, जगद्दल; सोमपुरु महाविहार |
| सेन काल के स्मारक | ढाकेश्वरी मंदिर |
| उदाहरण | बराकर का सिद्धेश्वर महादेव मंदिर, विष्णुपुर के मंदिर |
असम – असम में इस काल में दो प्रमुख शैलियों का विकास हुआ (1) गुप्तकालीन शैली का आयात (छठी सदी से 10वीं सदी तक) (ii) अहोम शैली का विकास (12 से 14वीं सदी के बीच) यथा-
(i) गुप्तकालोत्तर शैली का आयात – तेजपुर के पास डापर्वतिया में एक पुराना छठी शताब्दी में बना दरवाजे का ढाँचा मिला है और तिनसुकिया के पास स्थित ‘रंगागोरा चाय बागान’ से तरह-तरह की कुछ प्रतिमाएँ मिली हैं, जिनसे इस क्षेत्र में गुप्तकालीन शैली के आगमन का पता चलता है। यह गुप्तकालोत्तर शैली इस क्षेत्र में दसवीं शताब्दी तक बराबर जारी रही।
(ii) अहोम शैली का विकास – 12वीं से 14वीं शताब्दी के बीच असम में एक अलग क्षेत्रीय शैली विकसित हो गयी। ऊपरी उत्तरी बर्मा से जब असम में टाई लोगों का आगमन हुआ तो उनकी शैली बंगाल की प्रमुख पाल शैली से मिल गई और उसके मिश्रण से एक नई शैली का विकास हुआ, जिसे आगे चलकर गुवाहाटी और उसके आस-पास के क्षेत्र में अहोम शैली कहा जाने लगा।
भारत में बौद्ध तीर्थस्थल
- महाबोधि मन्दिर, बोध गया (बिहार)
- नालंदा, विक्रमशिला, सोमपुरा, ओदंतपुरी, पुष्पगिरी और जगद्दल के महाविहार
- छतीसगढ़ में सिरपुर
- ओडिशा में ललितगिरी, वज्रगिरी और रत्नागिरी
- वाराणसी (उत्तरप्रदेश) के निकट सारनाथ। बुद्ध के पहले धर्मोपदेश का स्थान।
- उत्तरप्रदेश में कुशीनगर
- नेपाल सीमा पर पिपरह्वा (UP)
- मध्यप्रदेश में साँची और भरहुत
- तमिलनाडु में नागपट्टीनम
- पुणे (महाराष्ट्र) में भजा और कार्ले गुफाएं
- औरंगाबाद (महाराष्ट्र) में अजन्ता, एलोरा और पीथलकोरा गुफाएं
- महाराष्ट्र, मुम्बई में कन्हेरी गुफाएं, नाशिक में पांडवलेनी गुफाएं
- पश्चिमी बंगाल में घूम मठ
- सिक्किम में रूमटेक, पेमायांगसे और एनचे मठ
- लद्दाख में अल्वी मठ, स्पितुक मठ, शेय मठ आदि।
- हिमाचल प्रदेश में धनकर मठ, नाको मठ (किन्नौर), क्ये मठ, ताबो मठ द्धस्पीति घाटीऋ अदि।
- अरुणाचल प्रदेश में त्वांग मठ (भारत में सबसे बड़ा मठ) और बोमडिला मठ
- नामड्रोलिंग मठ, बायेलाकुप्पे, कर्नाटक।
- ओडिशा के धौली में चट्टान से कटे हुए हाथी और अशोक के राजादेश
भारत में जैन तीर्थस्थल
- पालिताना मंदिर, काठियावाड़ गुजरात में शत्रुंजय पहाड़ी पर स्थित हैं। इसे विशेष रूप से श्वेताम्बर संप्रदाय का पवित्रतम स्थल माना जाता है। यह मुख्यतः पहले तीर्थंकर ऋषभ को समर्पित है। इसमें 800 से अधिक संगमरमर के मन्दिर हैं।
- शिखरजी, पारसनाथ झारखण्ड में है। यह पवित्रतम तीर्थस्थानों में से एक है और यह विश्वास किया जाता है कि 20 तीर्थंकरों ने यहीं मोक्ष प्राप्त किया था।
- गिरनार मन्दिर, जूनागढ़ जिला (गुजरात) में स्थित हैं। यहाँ 16 मन्दिरों में सबसे बड़ा मन्दिर नेमिनाथ (22वें तीर्थंकर) का है।
- पावापुरी, बिहार के नालंदा जिला में है। मोक्ष प्राप्ति के पश्चात अंतिम तीर्थंकर महावीर का अंतिम संस्कार यहीं किया गया था।
- दिलवाड़ा मन्दिर, माऊंट आबू राजस्थान में हैं, जिसमें संगमरमर से निर्मित, जटिल नक्काशीदार पांच अद्भुत मन्दिर हैं। जिनमें प्राचीनतम मन्दिर विमल वसाही का निर्माण 11 वीं शताब्दी में विमल शाह द्वारा कराया गया था। अन्य मन्दिर हैं लूना वसाही, पित्तलहार, पाश्वनाथ और महावीर स्वामी, जिनका निर्माण 13वीं से 17वीं शताब्दी में हुआ था।
- श्रवण – बेलगोला कर्नाटक में है। गोमेतेश्वर प्रतिमा, पहले जैन तीर्थकर के पुत्र भगवान बाहुबली की है। इसका निर्माण दसवीं शताब्दी में गंगा राजवंश के एक मंत्री चामुंडाराय द्वारा कराया गया था। इसमें कई ‘बसाडी’ या जैन मन्दिर हैं।
- शांतिनाथ मन्दिर परिसर उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के ललितपुर जिले के देवगढ़ में है। इसमें सुंदर प्रतिमाओं सहित 31 मन्दिर हैं।
- बावनगजा मध्यप्रदेश के बड़वानी जिला में है। इसमें भगवान आदिनाथ की एक ही चटान से काट कर बनाई गयी एक 84 फीट ऊंची प्रतिमा है।
- मध्यप्रदेश में ग्वालियर, चंदेरी और खजुराहो में विभिन्न जैन मन्दिर हैं।
- कपुर मन्दिर, राजस्थान के पाली जिला में है। इसे 15वीं शताब्दी में बनाया गया था और इसकी वास्तुकला में बहुत कुछ होयसल वास्तु जैसा है, न कि नागर जैसा। 1400 से अधिक स्तम्भ हैं जिन पर विस्तृत नक्काशी की गयी है और प्रत्येक दूसरे से भिन्न (अद्भुत) हैं।
- चौसा (बिहार) और हांसी (हिसार, हरियाणा) अकोटा (वडोदरा, गुजरात) में कांस्य की जैन प्रतिमाओं की खोज हुई है।
- कंकाली टीला, उत्तर प्रदेश में मथुरा के निकटरू प्रारम्भिक सदियों में दान और पूजा के लिए उपयोग में लायी जाने वाली आयागपट्ट नामक मन्नती पटिकाओं की खोज हुई है। इन पटिकाओं को जैन उपासना से सम्बन्धित वस्तुओं और डिजाइनों से सजाया गया है, जैसे स्तूप, धर्मचक्र और त्रिरत्न। ये एक ही साथ छवि और प्रतीकों की पूजा के रुझान को प्रस्तुत करते हैं। इन पटिकाओं को दान करने की प्रथा को पहली शताब्दी से तीसरी शताब्दी में प्रलेखित किया गया है।
- ओडिशा में उदयगिरी और खंडागिरी गुफाएँ दूसरी और पहली शताब्दी ईसापूर्व की बीच की हैं और जैन धर्म को समर्पित हैं। इन्हें राजा खारवेल के शासनकाल में तराशा गया था। उदयगिरी में मौजूद गुफाओं की संख्या 18 और खंडागिरी में 15 है। यहाँ की प्रसिद्ध गुफाओं में हाथी गुम्फा, रानी गुम्फा और गणेश गुम्फा हैं। इन पर नक्काशी द्वारा हाथीगुम्फा शिलालेखों सहित जैन तीर्थंकरों और देवताओं को उकेरा गया है। राजा खारवेल द्वारा लिखे गये हाथीगुम्फा शिलालेख पर ब्राह्मी लिपि में 17 पंक्तियाँ गहरी उकेरी गयी हैं और मुख्य रूप से इनमें राजा की विभिन्न विजयों का उल्लेख है।
- अजमेर में णसियन मन्दिर, इन्हें सोनीजी की णसियन भी कहा जाता है और यह पहले तीर्थकर भगवान ऋषभदेव को समर्पित है।
- हाथी सिंह जैन मन्दिर, अहमदाबाद।
- सित्तानवासल गुफाएं तमिलनाडु।
- मांगी-तुंगी महाराष्ट्र में तहाराबाद के निकट अवस्थित है। जैन धर्म को समर्पित यह एक जुड़वां-शीर्ष के बीच पठारी तल है, जिसे ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रवेश द्वार का रूप माना जाता है। इसमें तीर्थंकरों की पद्मासन और कायोत्सर्ग जैसी विभिन्न मुद्राओं में चित्र है और इन्हें छठी शताब्दी के आसपास बनाया गया था। हाल ही में, 2016 में पत्थर से निर्मित 108 फीट ऊंची अहिंसा मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा की गयी थी। इसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में विश्व की सबसे ऊंची जैन प्रतिमा के रूप में दर्ज किया है।
