मध्यकालीन भारत के धार्मिक आन्दोलन और धर्म दर्शन
मध्यकालीन भारत में भक्ति और सूफी जैसे धार्मिक आंदोलनों ने समाज को आडंबरों से मुक्त कर सरल, मानवीय और नैतिक मूल्यों की ओर प्रेरित किया। ये विचारधाराएँ प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत विषय के अंतर्गत सामाजिक-धार्मिक चेतना, समन्वय और सहिष्णुता के विकास को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
सूफी आन्दोलन
सूफीवाद इस्लाम के आंतरिक या गूढ़ पक्ष और रहस्यमय आयाम का प्रतिनिधित्व करता है। सूफी संतों ने धार्मिक और सामुदायिक भेदों को पार करते हुए मानवता के कल्याण के लिए कार्य किया। सूफी एक दार्शनिक वर्ग थे जो अपनी धार्मिक व्यापकता और सहनशीलता के लिए प्रसिद्ध थे।
- सूफियों का मानना था कि भगवान सर्वोच्च सुंदरता हैं और उन्हें श्रद्धा से देखना चाहिए, उनकी सोच में आनंद लेना चाहिए और केवल उन्हीं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
- उनका विश्वास था कि भगवान ‘माशूक’ (प्रिय) हैं और सूफी ‘आशिक’ (प्रेमी) हैं।
सूफी शब्द :-
- सूफी शब्द ‘अरबी’ भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘पवित्रता’।
- सूफी शब्द ‘सफा’ से बना है जो यूनानी भाषा के शब्द ‘सोफिया’ का रूपान्तरण है सोफिया का शाब्दिक अर्थ “रहस्यमयी ज्ञान” होता है।
- सूफी लोगों ने जिस विचारधारा को आगे बढ़ाया उसे सूफीवाद कहते हैं।
- अन्य तर्क
- अरब देशों में सफा भेड़ की ऊन से बने हुए वस्त्रों को धारण करने वाले लोग ‘सूफी’ कहलाए।
- इतिहासकार युसुफ मोहम्मद के अनुसार, हजरत पैगम्बर मोहम्मद साहब ने ‘सफा’ नामक पहाड़ी पर एक मस्जिद का निर्माण करवाया जिसमें आश्रय लेने वाले लोग जिन्होंने अल्लाह का प्रचार किया, वे सूफी कहलाए।
सम्पूर्ण सूफीवाद 12 सिलसिलों (सम्प्रदाय) में विभाजित था।
सूफी आंदोलन के कारण –
- कर्मकाण्डी व्यवस्था को समाप्त करना।
- जनता के नैतिक उत्थान व वर्ण व्यवस्था में सुधार करना।
नोट – सूफी जन सामान्य भाषा में प्रचार- प्रसार किया करते थे। वे राजनीति से दूर रहते थे।
सूफी आंदोलन की प्रमुख शिक्षाएँ
- एकेश्वरवादी
- इबादत पर अत्यधिक बल (पूजा)
- एकेश्वरवाद की भावना पर केन्द्रित।
- साधक का लक्ष्य-मानवीय प्रेम से ईश्वरीय प्रेम की ओर अग्रसर होना।
- परोपकार और गरीबों की भलाई पर मुख्य बल।
- गुरु की प्रधानता।
- इस्लाम की कट्टरता के स्थान पर रहस्यवाद पर बल दिया।
- दिन में पाँच बार नमाज़ अदा करना।
- दान-दक्षिणा देना।
- हज-यात्रा करना।
सूफीवाद की मुख्य विशेषताएँ:
- मौलिक सिद्धांतः ईश्वर एवं मनुष्य के बीच प्रेम का संबंध सूफीवाद का आधार है।
- केंद्रीय विचारः आत्मा का विचार, दैवीय निकटता, दिव्य प्रेम और आत्म- विनाश सूफीवाद के सिद्धांत के केंद्र में हैं।
- मानव प्रेमः सूफीवाद के अनुसार, ईश्वर से प्रेम का अर्थ मानवता से प्रेम है और इस प्रकार उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ईश्वर की सेवा मानवता की सेवा के अलावा और कुछ नहीं है।
- समानता में विश्वासः सूफीवाद सभी धार्मिक और सांप्रदायिक भेदों से परे है तथा सभी मनुष्यों को समान मानता है।
- आत्म अनुशासनः सूफीवाद आत्म अनुशासन पर भी ज़ोर देता है और इसे ईश्वर का ज्ञान प्राप्त करने के लिये आवश्यक मानता है।
- आंतरिक पवित्रताः यह रूढ़िवादी मुस्लिम संप्रदायों (जो कि बाहरी आचरण पर ज़ोर देते हैं) के विपरीत सूफीवाद आंतरिक शुद्धता पर ज़ोर देता है।
सूफी आंदोलन का प्रारंभ-
- सूफी आंदोलन का प्रारंभ ईरान से माना जाता है।
- यह 12 सिलसिलों में विभाजित था तथा प्रत्येक सिलसिले का एक धार्मिक गुरु जिसे “पीर” कहा जाता था।
- इस विचारधारा में गुरु (पीर) व शिष्य (मुरीद) के संबंधों पर अत्यधिक बल दिया जाता था।
भारत में सूफी आंदोलन का प्रारंभ –
- प्रथम तुर्क आक्रांता महमूद गजनवी के समय पहली बार सूफी संत भारत आए।
- 1005 ई. में महमूद की पंजाब विजय के समय शेख इस्माइल भारत आने वाले प्रथम सूफी संत थे।
- भारत आने वाले दूसरे सूफी संत “शेख अली बिन उस्मान उल हुजबेरी” थे।
- 12वीं शताब्दी में एक और अन्य संत “सैय्यद अहमद सखी सखर” भारत आए जो ‘लखदाता’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
- मोहम्मद गौरी के तराइन के द्वितीय युद्ध के समय (1192 ई.) ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भारत आए।
सूफी शब्दावली –
- पीर – गुरु को पीर कहा जाता था।
- मुरीद- शिष्य को कहते थे।
- वली – गुरु का उत्तराधिकारी वली कहलाता था।
- खानकाह – दरगाह (मठ) सूफियों का निवास स्थान
- फना & समा – सूफी विचारधारा के लोग ईश्वर को अपना महबूब मानते हैं तथा स्वयं को महबूबा मानते हैं। ईश्वर को रिझाने हेतु “संगीत (कव्वाली) गाते हैं जिसे समा कहा जाता है। इसी के माध्यम से ईश्वर में विलीन हो जाना (अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति) फना कहलाता है।
- मजार – समाधि स्थल को कहते हैं।
- तसव्वुफ – विभिन्न रहस्यात्मक प्रवृत्तियाँ या आंदोलन।
- मलफूजात – सूफी संतों की विचारधारा या उनके उपदेशों का संकलन।
- मकतुबात – सूफी संतों के पत्रों का संकलन।
- विलायत – राज्य नियंत्रण से मुक्त क्षेत्र।
- खलीफा – इस्लाम धर्म का सर्वोच्च धार्मिक गुरु
- उलेमा- धार्मिक गुरु।
- काजी- धार्मिक न्यायाधीश।
भारत में इस्लाम रहस्यवाद पर लिखी गई प्रथम पुस्तक “कश्फ – उल – महजूब” इसके लेखक हुजवेरी थे।
भारत में प्रथम दो रहस्यवादी संत हुए-
- राबिया (8वीं सदी) – इनकी तुलना महान महिला संत मीराबाई के साथ की जाती है।
- मसूर बिल अल हज्जाज (10वीं सदी) – इन्होंने अपने आप को अनलक (अर्थात् ईश्वर) घोषित कर दिया लेकिन लोगों ने इन्हें फाँसी पर लटका दिया।
सूफी विचारधारा में दो मत माने जाते हैं-
- वहदत-उल-वुजूद- यह एक ही ईश्वर में विश्वास करने वाले (एकेश्वरवादी) इनके प्रर्वतक इब्न-उल-अरबी को माना जाता है।
- वहदत-उल-सुदूब – यह आत्मा व परमात्मा में दास व मालिक का संबंध मानते हैं, इसके प्रवर्तक शेख – अहमद सरहिन्दी हैं।
नोट – इन दोनों विचारधारों का परम लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति करना है।
सूफी आंदोलन की दो विचारधाराएँ-
बा-शरा-
- इस विचारधारा में इस्लामी कानून शरीयत में विश्वास रखने वाले लोग थे तथा यह विचारधारा आगे चलकर अनेक शाखाओं में विभाजित हुई। जैसे- चिश्ती, सुहरावर्दी, कादरी, नक्शबंदी, फिरादौसी व सतारी।
बे-शरा-
- इस विचारधारा में लोग शरीयत में विश्वास नहीं करते थे वे भम्रणशील हुआ करते थे। –
- यह विचारधारा आगे जाकर समाप्त (पतन) हो गई। अबुल फ़ज़ल ने अपनी पुस्तक आइने अकबरी में 14 सूफी सिलसिले का उल्लेख किया है परन्तु भारत आने वाले मुख्य सूफी सिलसिले छह थे
भारत में इनके आगमन का क्रम – चिश्ती ➟ सुहरावर्दी ➟ फिरदौसी ➟ शत्तारी ➟ कादिरी ➟ नक्शबन्दी था।
प्रमुख सूफी सिलसिले एवं भारत में उनके संस्थापक
| सिलसिला | संस्थापक | स्थान | |
| 1. | चिश्ती | ख्वाजा मुईनद्दीन चिश्ती (12 वीं सदी) | अजमेर |
| 2. | सुहरावर्दी | शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी (12 वीं सदी) | मुल्तान |
| 3. | फिरदौसी (सुहरावर्दी से प्रभावित) | शेख बदरूद्दीन समरकन्दी (13 वीं सदी) | बिहार |
| 4. | शत्तारी (सुहरावार्दी से प्रभावित) | शाह अब्दुला शत्तारी | जौनपुर |
| 5. | कादिरी | शाह नियामतुल्ला एवं नासिरूद्दीन मुहम्मद जिलानी (15 वीं सदी) | उच्छ |
| 6. | नक्शबन्दी | ख्वाजा बाकी बिल्लाह (16 वीं सदी) | उच्छ |
चिश्ती सिलसिला
- भारत में चिश्ती सिलसिले के संस्थापक ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती को माना जाता है, तथा भारत से बाहर हैरात में इस सिलसिले का संस्थापक अबु अब्दाल चिश्ती (खुरासान निवासी) को माना जाता है।
- सुफियों में सांसारिक वस्तुओं के प्रति मोह-माया नहीं होती है, वें विश्व परित्याग की भावना रखते हैं व वैरागी जीवन व्यतीत करते हैं (जिसे तर्क-ए- दुनिया कहा जाता है।)
- शिक्षा/सिद्धांत
- गरीबी एवं दरिद्रता का जीवन
- सम्पत्ति को आध्यात्मिक मार्ग का बाधक
- राजनीति से दूर सरल व सादा जीवन व्यतीत करना चाहिए।
- प्राणी मात्र के प्रति प्रेम व उदारता का भाव
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती – (1143 – 1236)
- इनका जन्म 1143 ई. में सिस्तान (ईरान) के सिंजरी नामक स्थान पर हुआ था।
- इनके पिता का नाम हजरत मोहम्मद गयासुद्दीन व माता का नाम बीबी माहेनूर था।
- इनकी उपाधि सुल्तान-उल-हिन्द (हिन्द का आध्यात्मिक गुरु) मोहम्मद गौरी द्वारा प्रदान की गई।
- इनके गुरु का नाम ख्वाजा अब्दुल्ला अंसारी तथा हजरत शेख उस्मान हारूनी था।
- ख्वाजा साहब चिश्ती सिलसिले के 8वें संत (गुरु) थे।
- मोइनुद्दीन चिश्ती 1192 ई.में तराइन के द्वितीय युद्ध के समय मोहम्म्द गौरी के साथ पृथ्वीराज चौहान III के शासन काल के दौरान भारत आए थे।
- इनकी मृत्यु के बाद (1230 ई.) इनकी दरगाह का निर्माण अजमेर में ही किया गया।
- कुछ इतिहासकारों के अनुसार “ख्वाजा साहब” की कच्ची मजार का निर्माण इल्तुतमिश द्वारा व पक्की मजार का निर्माण मालवा के सुल्तान मोहम्मद खिलजी के द्वारा 1464 ई. में करवाया गया।
- ख्वाजा साहब का उर्स रज्जब की प्रथम तारीख से रज्जब की छठी तारीख तक अजमेर में लगता है। इसे साम्प्रदायिक सद्भाव का मेला भी कहा जाता है।
- ख्वाजा साहब के भक्त इन्हें गरीब नवाज (गरीबों का हितैषी) कहकर पुकारते थे।
- ख्वाजा साहब ने बृज भाषा में अनेक साहित्यों की रचना की।
- ख्वाजा साहब की जीवनी मजीस उल अखाह के नाम से जहांआरा ने लिखी / “मिर्ज़ा वहाउद्दीन बेग” द्वारा लिखी गई।
- मुहम्म्द बिन तुगलक पहला सुल्तान जो ख्वाजा साहब को दरगाह पर आया था।
- मुगल बादशाह अकबर ने अजमेर दरगाह 18 गांव दान दी व दो बार पैदल इबादत हेतु दिल्ली से अजमेर आया था।
- मालवा सुल्तान महमूद खिलजी ने 15 वीं शताब्दी में आधुनिक दरगाह का निर्माण किया। सन् 1911 में हैदराबाद हैदराबाद के निजाम उस्मान अली भारत दरगाह का मुख्य भाग व दरवाजा दरवाजा बनाया इसी कारण खानकाह के मुख्य गेट को निजामगेट कहते हैं।
- ख्वाजा साहब के दो शिष्य शेख हमीमुद्दीन नागौरी व कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी हुए।
शेख हमीमुद्दीन नागौरी-
- कुतुबुद्दीन ऐबक व इल्तुतमिश के समकालीन।
- प्रथम सूफी संत जिनका जन्म हिंदुस्तान में।
- इन्होंने मोइनुद्दीन चिश्ती के आदेश पर नागौर को अपनी कर्मस्थली बनाया।
- एक मात्र सूफी संत जिन्होंने शाकाहार को अपनाया।
- उपाधियाँ:- सुल्तान-उल-तारकीन- यह उपाधि मोइनुद्दीन चिश्ती द्वारा दी गई थी। जिसका अर्थ होता है संन्यासियों का सुल्तान
- इन्होंने अपना संपूर्ण जीवन- कृषि के माध्यम से निर्वाह किया (किसान के रूप में)।
- मृत्यु-1174 ई. में।
- इनकी दरगाह का निर्माण नागौर में निगाणी तालाब के समीप किया गया, यहीं पर इनके उर्स का आयोजन कृष्ण जन्माष्टमी के दिन किया जाता है, जो राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा उर्स माना जाता है।
- प्रसिद्ध तारकीन का दरवाजा नागौर में इल्तुतमिश ने बनवाया।
कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी:-
- इनका जन्म 1186 ई. में फरगना (उज़्बेकिस्तान) में हुआ।
- यह दिल्ली सल्तनत के शासक कुतुबुद्दीन ऐबक के समकालीन थे तथा ऐबक के आध्यात्मिक गुरु भी थे।
- दिल्ली को इन्होंने अपनी कार्य स्थली बनाया।
- ऐबक ने इन्हीं के नाम पर कुतुबमीनार का निर्माण करवाया।
- ऐबक ने इन्हीं के नाम पर उत्तर भारत की प्रथम मस्जिद कुत्वत-उल-इस्लाम का निर्माण करवाया।
- इल्तुतमिश ने नासिर उद्दीन कुबाचा को पराजित करने के बाद गुरु को शेख उल इस्लाम उपाधि देनी चाहिए किंतु काकी ने इसे लेने से इनकार कर दिया
- बख्तियार काकी के शिष्य- शेख फरीदुद्दीन (गज-ए-शक्कर) बाबा फरीद हुए।
शेख फरीदुद्दीन (“बाबा फरीद – गज-ए-शक्कर”) 1175-1265 ई.
- जन्म- मुल्तान में हुआ।
- बाबा फरीद के परिवार को प्रोत्साहित करने के कारण यह मुल्तान से अजोधन चले गए इसे ही अपनी कर्मस्थली बनाया।
- सिख परम्परा में इन्हें बाबा फरीद के नाम से जाना जाता है।
- गुरु नानक इनसे बेहद प्रभावित थे।
- इनकी कुछ रचनाएँ “आदिग्रंथ” में शामिल हैं।
- बाबा फरीद पंजाबी भाषा के प्रथम कवि माने जाते हैं।
- भारत में चिश्ती सिलसिले के तीसरे प्रसिद्ध संत थे।
- वृद्धावस्था में इन्होंने तीन विवाह किए।
- बलबन के दामाद थे।
- इनकी मजार अजोधन (पाक) में है।
निजामुद्दीन औलिया (1238-1325 ई.)
- निजामुद्दीन औलिया का मूल नाम मोहम्मद बिन अहमद बिन दानियल अल बुखारी था।
- इनका जन्म बदायूं (उत्तर प्रदेश) में हुआ।
- इनके पिता का नाम अहमद बदायनी व माता का नाम बी.बी. जुलैखा था।
- इन्हें महबूब ए इलाही (ईश्वर का प्रेमी) सुल्तान फुल औलिया (सूफियों का राजा) भी कहते हैं।
- इनके गुरु बाबा- फरीद (गज-ए-शक्कर) थे जिनसे इनकी मुलाकात अजोधन (पाक) में हुई थी।
- औलिया आजीवन अविवाहित रहे।
- औलिया सूफी सिलसिले के सबसे प्रसिद्ध संत माने जाते हैं। इन्होंने योग व प्राणायाम के माध्यम से सूफी आंदोलन को लोकप्रिय बनाया।
- योग व प्राणायाम की विधि को “हब्स-ए-दम” कहा जाता था, इसी कारण इन्हें “योगी फकीर, सिद्ध योगी व प्रथम योगी” भी कहा जाता है।
- यह हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रवर्तक थे।
- दोनों समुदायों के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण रखने के कारण इन्हें “महबूब-ए-इलाही” (ईश्वर का सच्चा प्रेमी) व “कुतुब-ए-देहली” कहा जाता था।
- इन्होंने दिल्ली के सात सुल्तानों का शासनकाल देखा था, परन्तु किसी के दरबार में नहीं गए।
- गयासुद्दीन तुगलक ने इनकी लोकप्रियता से प्रभावित होकर जब वह बंगाल अभियान पर थे तब औलिया को पत्र लिखकर “दिल्ली छोड़ने” का आदेश दिया, औलिया ने प्रत्युत्तर में लिखा कि “दिल्ली अभी दूर है” गयासुद्दीन तुगलक की अफगानपुर (दिल्ली के समीप) में लकड़ी के महल गिरने से दिल्ली पहुंचने से पहले ही मृत्यु हो गई।
- अलाउद्दीन खिलजी ने पत्र लिखकर ‘औलिया से मिलने की अनुमति मांगी’ लेकिन औलिया ने प्रत्युत्तर में लिखा कि मेरे घर के दो दरवाजें है सुल्तान एक से अंदर आएगा तो मैं दूसरे से बाहर चला जाऊँगा।
- ओलिया का कथन है कि कुछ हिंदू जानते हैं इस्लाम इस्लाम एक सच्चा धर्म है किन्तु फिर भी उसे अपनाते नहीं है।
- निजामुद्दीन औलिया का मकबरा दिल्ली में स्थित है।
- इनकी अंतिम इच्छा थी कि इनकी कब्र पर कोई मकबरा ना बनाए पर ‘मोहम्मद बिन तुगलक’ ने इनका मकबरा बनवा दिया।
- इनके मकबरे के समीप इनके परम शिष्य अमीर खुसरो व शाहजहाँ की पुत्री ‘जहांआरा’ की कब्र भी बनी हुई है।
- औलिया के उपदेशों व कथनों का संकलन “हसन सिज्जी” द्वारा फारसी भाषा में “फवायद-उल-फवाद” के नाम से किया गया।
- निजामुद्दीन औलिया के दो प्रमुख शिष्य-
1. नासिरुद्दीन (चिराग-ए-दिल्ली)
- इनके ग्रंथ का नाम तौहिद-ए-वजूदी है। 100 वार्ताओं का संकलन “खैर-ए-मजलिस” कहलाता है जिसका संकलन हामिद कलंदर द्वारा किया गया।
- नासिरुद्दीन के शिष्य का नाम सैय्यद महमूद गेसूदराज (बंदा नवाज) था, जिन्होंने दक्षिण भारत के गुलबर्गा (कर्नाटक) में चिश्ती सिलसिले की नींव रखी।
2. अमीर खुसरो
- अमीर खुसरो को तोता-ए-हिंद कहा जाता है।
- इन्होंने सितार और तबले का आविष्कार किया।
- हिन्दी ग्रंथों का अरबी भाषा में अनुवाद किया।
- इनके ग्रंथ का नाम “नूर-ए-सिपेहर” जिसका शाब्दिक अर्थ “खुला आसमान” होता है।
- इन्हें उर्दू का प्रथम शायर माना जाता है।
अन्य महत्त्वपूर्ण सूफी संत –
शेख सलीम चिश्ती-
- यह मुगलकाल में सबसे लोकप्रिय चिश्ती संत माने जाते थे तथा यह अकबर के आध्यात्मिक गुरु थे।
- इनके आशीर्वाद से जहाँगीर का जन्म हुआ तथा इन्हीं के नाम पर जहांगीर के बचपन का नाम सलीम रखा गया।
- शेख सलीम चिश्ती का मकबरा फतेहपुर सीकरी में स्थित है।
शेख अब्दुल कद्दस –
- इनका उपनाम गांगोही था। यह सिकन्दर लोदी व बाबर के समकालीन माने जाते।
- इनकी मजार गांगौह सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) में स्थित है।
- इनकी कविताओं का संग्रह अलख के नाम से प्रसिद्ध है। (अलखदासी संप्रदाय)
सैय्यद मोहम्मद गेसुदराज
- गुलबर्गा को अपना खानकाह बनाया
- बहमनी सुलतान ताजुद्दीन फिरोजशाह के साथ मतभेद
- इन्हें इतिहास में बन्दा नवाज ईश्वर के प्राणियों का हितैषी कहा जाता है
- चिराग का शिष्य
शेख बुरहानुद्दीन गरीब
- अमिर खुसरो का शिष्य।
- गरीब ही उत्तर भारत से दक्षिण भारत में सूफी परम्परा को लेके गया इसीलिए इसे दक्षिण में चिश्ती सिलसिला का संस्थापक मानते है ।
- चिश्ती संप्रदाय की तीन शाखाएँ- नागौरी, साबरी व निजामी मानी जाती है।
सुहरावर्दी संप्रदाय
- इसकी स्थापना बगदाद में शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी के द्वारा की गई।
- भारत में इसकी स्थापना (पंजाब व सिंध) शेख बहाउद्दीन जकारिया द्वारा की गई।
- इसने भारत के मुल्तान नामक स्थान पर सुहरावर्दी सिलसिले की स्थापना।
- जकारिया ने इल्तुतमिश की नासिरुद्दीन कुबाचा व ताजुद्दीन याल्दौज के विरुद्ध सहायता की अतः इल्तुतमिश ने जकारिया को शेख उल इस्लाम की उपाधि दी।
- बहाउद्दीन जकारिया के बाद इनके पुत्र शेख सदरुद्दीन इस सिलसिले के प्रमुख संत हुए। इन्होंने उत्तराधिकार में प्राप्त सारी सम्पत्ति को दान कर दिया। इन्होंने बलबन के पुत्र मुहम्मद की पत्नी से विवाह किया था।
- शेख सदरुद्दीन के बाद इनके पुत्र शेख रुक्नुद्दीन अब्बुलफत सबसे बड़े सूफी संत हुए। इनके समय सुहरावर्दी सिलसिले का सर्वाधिक प्रचार-प्रसार हुआ। इनका सुल्तानों एवं अमीरों से घनिष्ठ सम्बंध था। इन्होंने कहा कि लालच, क्रोध, अहंकार को छोड़ देना चाहिए क्योंकि ये लोगों को जानवर बना देते हैं।
- इसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय जलालुद्दीन तबरीजी को माना जाता है। इसने इस सिलसिला का पूर्वी भारत में विस्तार किया तथा बंगाल को अपनी खानकाह बनाया।
- इस सिलसिले के सबसे प्रसिद्ध संत शेख जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी जिन्होंने 36 बार मक्का की यात्रा की जिस कारण इन्हें “जहानीयाँ-ए- जहाजश्त” (विश्व भ्रमण करने वाला) कहा जाता है। सिंध में खानकाह।
- सुहरावर्दी संप्रदाय की विशेषता-
- चिश्ती सिलसिले के विपरीत जीवन यापन करते थे।
- यह भोग विलास का जीवन व्यतीत करते थे।
- सक्रिय राजनीति में भाग लेते थे।
- यह बड़े-बड़े राजकीय पद धारण करना जैसे “सद्र – ए – विलायत”
फिरदौसी सिलसिला
- यह सुहरावर्दी सिलसिला का उप सिलसिला था। इस सिलसिले के मुख्य सूफी निम्न थे-
- बदरुद्दीन समरकंदी –
- फिरदौसी सिलसिला का संस्थापक।
- बिहार में खानकाह,
- यह सिलसिला तुगलक वंश के समकालीन था। समरकंदी, मोहम्मद बिन तुगलक का मित्र था ।
- शेख सरफुद्दीन याहिया बिन मुनिरी
- यह फिरोज शाह तुगलक का समकालीन था, इसी के कहने पर सुलतान अने दीवान ए बन्दगान विभाग की स्थापना।
- मुनिरी को ही मक्तुबात का संकलन करता माना गया।
शत्तारी सिलसिला
- सुहरावर्दी सिलसिले का उप सिलसिला था अर्थात आराम पसंद जीवन।
- सिलसिले के मुख्य संत निम्न –
- शाह अब्दुल्ला शत्तारी –
- संस्थापक,
- खानकाह- जौनपुर
- 1485 लोदी वंश के समकालीन व अब्दुला शत्तारी बहलोल लोदी तथा सिकंदर लोदी के काल में सक्रिय राजनीति में शामिल था।
- मोहम्मद गॉस –
- चिश्ती संतो के बाद भारत का सबसे प्रभावशाली सूफी संत।
- मुग़ल बादशाह हुमांयू एवं प्रसिद्द सगीतज्ञ तानसेन का गुरु था।
- खानकाह- ग्वालियर
- हठ योग विद्या में महारत हासिल थी, उसने संस्कृत की प्रसिद्ध हठ योग आधारित पुस्तक अमृत कुड का फ़ारसी अनुवाद बहार ए हयात किया।
- गौस ने हठ योग पर जवाहर ए खाम्शाह तथा खालिद ए मुखाजिन नामक पुस्तके लिखी ।
कादिरी सिलसिला
- सिलसिला इस्लाम का प्रथम रहस्यवादी पंथ माना जाता है।
- संस्थापक शेख अब्दुल कादिर जिलानी को माना जाता है।
- तेहरान इरान में सिलसिले को स्थापित।
- भारत में इसका संस्थापक नासिरुद्दीन मोहम्मद सैयद जिलानी को माना जाता है।
- खानकाह – सिंध
- जहाँगीर भी इज्जत करता था।
- इस सिलसिले का सबसे बड़ा केंद्र पंजाब के मुल्तान में था।
- कादरी सिलसिले की विशेषता-
- कादिरी सिलसिले के अनुयायी गाने-बजाना पसंद नहीं करते थे और इसके घोर विरोधी थे।
- इस सिलसिले के अनुयायी हरे रंग की पगड़ियाँ सिर पर धारण करते थे। गुलाब का फूल लगाते थे जो शांति का प्रतीक था।
- इस सिलसिला के संतों ने रूढ़िवादी तत्वों को खारिज कर दिया।
- इस सिलसिले के संत शासकीय सेवा को अच्छा मानते थे
- दारा शिकोह इसी सिलसिले से प्रभावित थे।
- लाहौर में इस संप्रदाय के सबसे प्रसिद्ध संत “शेख मीर मोहम्मद” (मियाँ मीर) हुए जो उदारवादी विचारधारा के संत थे जिन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया।
- पाँचवे सिख गुरु “अर्जुनदेव” ने स्वर्ण मंदिर की नींव “मियाँ मीर” से रखवाई थी।
- शेख मुल्ला शाह – खानकाह कश्मीर, मुग़ल बादशाह शान्हाजहाँ, राजकुमार दारशिकोह, जहाँआरा के गुरु थे।
नक्शबंदी सिलसिला
- इसकी स्थापना बगदाद में ख्वाजा बहाउद्दीन द्वारा की गई।
- भारत में इस सिलसिले का संस्थापक ख्वाजा बाकी बिल्लाह को माना जाता है।
- नक्शबंदी सिलसिले की विशेषता-
- इस सिलसिले को इस्लाम में सबसे कट्टर सिलसिला माना जाता है।
- इस सिलसिले में शरीयत के पालन पर पूर्णतः बल दिया जाता था।
- शिया और हिन्दू के समान विरोधी थे।
- ये धर्म परिवर्तन में शक्ति के प्रयोग को अच्छा मानते थे और संगीत विरोधी भी थे।
- सरकारी सेवा को अच्छा मानते थे।
- ख्वाजा बाकी बिल्लाह 1597 ई. में अकबर के समय काबुल से दिल्ली आए और यहीं अपनी खानकाह स्थापित किए। ये सुफियों में काफी कट्टर थे जो अकबर की उदार नीतियों का प्रतिकार करने दिल्ली आए।
- बाकी बिल्लाह के शिष्य “शेख अहमद सरहिन्दी” ने स्वयं को मुजहिद (ईश्वर) घोषित कर बादशाह अकबर के विरुद्ध फतवा जारी किया था। 1619 ई. में जहाँगीर ने इसे जेल में डाल दिया।
- सरहिन्दी ने भारत में इस्लाम धर्म का भरपूर प्रचार- प्रसार किया इसीलिए इन्हें मुजादिया/मुजादिद (पुनर्जागरण करने वाला) की उपाधि दी गई। इन्होंने अपने आप को कयूम घोषित किया।
- दूसरे कयूम-शेख मुहम्मद मासूम थे। औरंगजेब इन्हीं का शिष्य था। औरंगजेब नक्शबंदी से प्रभावित था इसी कारण उसने हिन्दु मंदिरों को तुड़वाया।
भक्ति आन्दोलन
- भक्ति आंदोलन ने मोक्ष प्राप्त करने के लिए भक्ति की पद्धति को अपनाकर धार्मिक सुधार लाने का प्रयास किया।
- शुरुआत आठवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में प्रमुख सुधार के रूप में हुई, जो बाद में उत्तर भारत में विस्तार हुआ।
- भक्ति का मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्ति के लिए सर्वोच्च देवता के प्रति भक्ति और आत्मसमर्पण था, जो भगवद गीता में भी उल्लेखित था।
- यह आंदोलन जैन और बौद्ध धर्म की नैतिकता और नास्तिकता के खिलाफ था और वैदिक आस्तिकता ने इनसे कुछ विशेषताएँ अपनाई।
- आदि शंकराचार्य ने बौद्ध और जैन मतों का प्रतिकार करने के लिए अद्वैत वेदांत के सिद्धांतों को प्रस्तुत किया, जो मुख्य रूप से बौद्धिक स्तर तक सीमित था।
- महान शैव नयनारों और वैष्णव आलवारों ने अपनी प्रेरक कविताओं के माध्यम से भक्ति सिद्धांत को स्वरूप प्रदान किया और जनसमर्थन प्राप्त किया। इतिहासकार इसे भक्ति आंदोलन के रूप में संदर्भित करते हैं।
- भक्ति आंदोलन ने शासकों के समर्थन से समाज, राजनीति, धर्म, संस्कृति और भाषा सभी क्षेत्रों पर गहरा प्रभाव डाला।
- 7वीं से 10वीं शताब्दी में दक्षिण भारत धार्मिक पुनर्जागरण का केंद्र बन गया, और रामानुज जैसे धर्मशास्त्रियों के साथ यह एक दार्शनिक और वैचारिक आंदोलन में परिणत हुआ। 11वीं शताब्दी के बाद संत-कवियों की प्रेरणा से भक्ति आंदोलन पूरे भारत में फैल गया।
दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन
- एक आदिम जनजातीय समाज का सुव्यवस्थित सामाजिक संरचना में रूपांतरण और एक शक्तिशाली राजतंत्रीय शासन प्रणाली का उदय, प्राधिकार को वैधता प्रदान करने के लिए किसी न किसी धर्म के संरक्षण की आवश्यकता को जन्म देता था। बौद्ध और जैन धर्म का प्रायः व्यापारी वर्ग द्वारा संरक्षण किया गया, और उन्हें राज्यों का भी समर्थन प्राप्त था।
- भक्ति आंदोलन का उद्भव भूमि-स्वामी जातियों के बीच हुआ और यह बौद्धों एवं जैनों की आलोचना में मुखर था। इसका परिणाम राजकीय संरक्षण के लिए संघर्ष के रूप में भी सामने आया।
| अलवार | नयनार |
| विष्णु भक्त | शिव भक्त |
| अलवार संतों का मुख्य काव्यः नलयिरादिव्यप्रबंधम (इसका महत्व चारों वेदों के समान बताया गया है) | नयनार संतों का मुख्य काव्यः तेवरम । |
| अंडाल सबसे प्रसिद्ध महिला अलवार संत थीं। | कराईकल अम्मैयार सबसे प्रसिद्ध महिला नयनार संत थीं। |
अलवार और नयनार परंपरा
- अलवार और नयनार संत एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करते हुए तमिल में अपने ईष्ट की स्तुति में भजन गाते थे।
- स्त्री भक्तः संभवतः इस परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता इसमें स्त्रियों की उपस्थिति थी। इन स्त्रियों ने अपने सामाजिक कर्तव्यों का परित्याग किया। वह किसी वैकल्पिक व्यवस्था अथवा भिक्षुणी समुदाय की सदस्य नहीं बनीं। इन स्त्रियों की जीवन पद्धति और इनकी रचनाओं ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती दी। जैसेः अंडाल (अलवार संत) और कराईकल अम्मैयार (शिव भक्त या नयनार परंपरा की अनुयायी)
वीरशैव और लिंगायत आंदोलन
- बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक में एक नवीन आंदोलन का उद्भव हुआ, जिसका नेतृत्व ‘बासवन्ना’ (1106-68) नामक एक ब्राह्मण ने किया था।
- बासवन्ना मूल रूप से एक जैन और चालुक्य राजा के दरबार में मंत्री थे।
- इनके अनुयायी ‘वीरशैव’ (शिव के वीर) या ‘लिंगायत’ (लिंग धारण करने वाले) कहलाए।
- लिंगायतों का विश्वास है कि मृत्योपरांत भक्त शिव में लीन हो जाएंगे तथा इस संसार में पुनः नहीं लौटेंगे। इसलिए, वे धर्म शास्त्रों में बताए गए श्राद्ध संस्कार का पालन नहीं करते हैं और अपने मृतकों को विधिपूर्वक दफनाते हैं।
- लिंगायतों ने जाति की अवधारणा और कुछ समुदायों के ‘दूषित’ होने की ब्राह्मणीय अवधारणा का विरोध किया। पुनर्जन्म के सिद्धांत पर भी उन्होंने प्रश्नवाचक चिन्ह लगाया।
- इन समस्त कारणों से ब्राह्मणीय सामाजिक व्यवस्था में जिन समुदायों को गौण स्थान मिला था, वे सभी लिंगायतों के अनुयायी हो गए थे।
- धर्मशास्त्रों में जिन आचारों को अस्वीकार किया गया था (जैसे वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह) लिंगायतों ने उन्हें मान्यता प्रदान की।
- वीरशैव परंपरा की व्युत्पत्ति उन वचनों से है, जो कन्नड़ भाषा में उन स्त्री और पुरुषों द्वारा रचे गए, जो इस आंदोलन में शामिल हुए थे।
उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन का प्रसार
- जब दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन की लोकप्रियता अपने शिखर पर पहुँच गई, तब भक्ति सिद्धांत को वैष्णव विद्वानों और संतों की एक श्रृंखला द्वारा दार्शनिक स्तर पर विस्तार दिया गया। रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत (विशिष्ट एकेश्वरवाद) नामक दर्शन का प्रतिपादन किया। उन्होंने आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत वेदांत (अर्थात ‘परम’ और ‘जीवात्मा’ की पूर्ण एकता) को संशोधित रूप में प्रस्तुत किया।
- यदि भक्ति आंदोलन सातवीं शताब्दी से तमिल क्षेत्र में फला-फूला, तो उत्तर भारत में पंद्रहवीं शताब्दी से ही भक्ति काव्य का असाधारण प्रस्फुटन हुआ। उस समय उत्तर भारतीय समाज जाति-आधारित भेदभाव, अलगाव, बहुदेववाद और मूर्तिपूजा की प्रथाओं से ग्रस्त था।
- इस समय के संतों और कवियों ने समाज को एक नई दिशा प्रदान की, जिसमें जातिगत भेदभाव और धार्मिक रूढ़ियों का विरोध शामिल था।
भक्ति आन्दोलन का स्वरूप :-
- निर्गुण स्वरूप (निराकार) सबसे लोकप्रिय संत कबीर, नानकदेव थे।
- सगुण (साकार) लोकप्रिय संत तुलसीदास, सूरदास वल्लभाचार्य, मीरा, चैतन्य थे।
भक्ति करे क्यों? प्राचीन दर्शन के अनुसार :-
- मोक्ष प्राप्ति के लिए 3 मार्ग बताए गए है-
- ज्ञान- उपनिषद् वेद
- कर्म-कर्मकाण्ड
- भक्ति- (i) निर्गुण (ii) सगुण
भक्ति :- प्रथम उल्लेख
- उल्लेख – “श्वेताश्वेत्तर उपनिषद्” में
- विस्तृत उल्लेख – “श्रीमदभगवतगीता” मोक्ष का साधन बताया गया है।
भक्ति आंदोलन की प्रमुख विशेषताएँ:
- एकेश्वरवाद का प्रचार: भक्ति सुधारकों ने ईश्वर की एकता (एकेश्वरवाद) के सिद्धांत का प्रचार किया।
- जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति: उन्होंने यह विश्वास व्यक्त किया कि मुक्ति केवल गहरी भक्ति और भगवान में विश्वास से ही प्राप्त की जा सकती है।
- आत्मसमर्पण का महत्व: भक्ति सुधारक मानते थे कि भगवान की कृपा और आनंद प्राप्त करने के लिए आत्मसमर्पण आवश्यक है।
- गुरु का मार्गदर्शन: गुरु का मार्गदर्शन महत्वपूर्ण था, जो भक्तों को सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते थे।
- उन्होंने सार्वभौम भ्रातृत्व के सिद्धांत का समर्थन किया।
- उन्होंने मूर्ति पूजा की आलोचना की।
- उन्होंने गहरे भक्ति के साथ भजनों के गायन पर बल दिया।
- यह तर्क करते हुए कि सभी जीव, मनुष्य सहित, भगवान के बच्चे हैं, उन्होंने जन्म के आधार पर लोगों को विभाजित करने वाली जाति व्यवस्था की कड़ी आलोचना की।
- उन्होंने अनुष्ठानवाद, तीर्थयात्राओं और उपवासों की निंदा की।
- उन्होंने किसी भी भाषा को पवित्र नहीं माना और सामान्य जन की भाषा में कविताएँ रचीं।
आदिगुरु शंकराचार्य :-

- जन्म – 788 ई.
- कहाँ – केरल में पूर्णानदी के किनारे “कालडी” गाँव में।
- पिता – शिवगुरु
- माता – सुभद्रा/अयप्पा
- गुरु – गोविन्ददेवपाद ने उपाधि दी शंकर को – परमहंस
- उपाधि – प्रच्छन्न बौद्ध यह महायान शाखा से प्रभावित थे।
- माता ने शंकर को 5 वर्ष की आयु में विद्या अध्ययन हेतु कालड़ी गुरु के पास भेजा। 8 वर्ष की आयु में माता से आज्ञा लेकर सन्यास ग्रहण कर लिया।
- मतः अद्वैतवाद – ब्रहम सत्य जगत मिथ्या
- शाब्दिक अर्थ – दो न होना अर्थात एकत्व
- सर्वप्रथम गौड़ पादाचार्य ने अद्वैत को बताया और कहा कि जीव और ब्रह्म दोनों एक है। इसके शिष्य गोविन्दाचार्य ने बताया कि आत्मा व परमात्मा में भेद माया का है।
- गोविन्दाचार्य के शिष्य शंकराचार्य ने माया का अर्थ अविद्या / अज्ञानता बताया।
- उत्तर भारत के महान आचार्य कुमारिल से मिले। मिलने के बाद कुमारिल ने कहा “मेरे पास वैदिक कर्मकाण्ड के विद्वान पति-पत्नी है” (1. मण्डनमिश्र 2. भारती)
- दोनों को नर्मदा तट पर बुलाकर शास्त्रार्थ किया।
- इसमें शंकर ने दोनों को पराजित किया, पति-पत्नी दोनों शंकर के शिष्य बन गए, दोनों को दक्षिण भारत ले गए। वहाँ तुंगभद्रा नदी के किनारे श्रृंगेरी पीठ की स्थापना की,
- उत्तरी भारत के सबसे बड़े विद्वान कुमारिल्ल ने वैदिक धर्म को पुनः स्थापित किया।
- श्रृंगेरी में शंकराचार्य को अपनी माता सुभद्रा की मृत्यु का सामाचार मिला। यह सुनकर आँखों से अश्रु निकले, संन्यास त्याग दिया।
- इसके बाद यह पूर्वी घाट आए – पुरी, ओडिशा
- अपने अंतिम समय में केदारनाथ पहुँचे और 32 वर्ष की आयु में मृत्यु (820 ई.) हो गई।
- सम्प्रदाय – स्मृति/स्मार्त सम्प्रदाय
- चार पीठों की स्थापना की –
- शृंगेरी पीठ – 804 ई. में मैसूर (कर्नाटक) में। पीठ शिवजी को समर्पित है। आचार्य मण्डल मिश्र थे।
- गोवर्धन पीठ – 808 ई. में जगन्नाथ पुरी (ओडिशा) में। यह पीठ विष्णु, भैरवी, सुभद्रा, बलराम को समर्पित है।
- ज्योतिपीठ – 910 ई. में ब्रदीनाथ (उत्तराखण्ड) में। यह पीठ विष्णु को समर्पित है। इसके आचार्य त्रोटकाचार्य थे।
- शारदा पीठ – द्वारका गुजरात में। यह पीठ भगवान कृष्ण को समर्पित है।
- प्रमुख ग्रंथ :- (संस्कृत भाषा में)
- ब्रह्मसूत्र पर भाष्य
- वेद, उपनिषद् (12), गीता पर भाष्य
- सौन्दर्यलहरी
- विवेक चुड़ामणि
- मनीषा पंचम्
- अपरोक्षानुभूति
- शारीरिक भाष्य “भामती”
- नोट –
- शंकराचार्य रामानुज माध्वाचार्य जितने प्रसिद्ध नहीं हो पाए क्योंकि वे संस्कृत बोलते थे जो जनसामान्य की भाषा नहीं थी।
- रामानंद – प्रसिद्ध हुए तथा हिन्दी को आधार बनाया।
- भक्ति आन्दोलन का सेतु
- द्रविड़ उपजी लाए रामानंद
- भक्ति को दक्षिण से उत्तर भारत में लाए।
रामानुजाचार्य :-
- वाद – विशिष्टाद्वैतवाद
- ‘विशेष्टाद्वैत’ का अर्थ है ‘ब्रह्म’ अर्थात् ईश्वर अद्वैत होते हुए भी जीव तथा जगत की शक्तियाँ द्वारा विशिष्ट है। जीव व जीवात्मा दोनों भिन्न भिन्न है किन्तु ब्रह्म से पैदा हुए है तथा ब्रह्म से ठीक उसी प्रकार से विशिष्ट प्रकार से जुड़े हुए है जैसे किरणें सूर्य से। किरणें सूर्य से धरती पर अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखते है किन्तु वे विशिष्ट रूप से सूर्य से संबंध रखती है ऐसा ही संबध जीव व ब्रह्म का है।
- सम्प्रदाय “श्री सम्प्रदाय”
- जन्म – 1017 ई. पेराम्बदुर में हुआ। (तमिलनाडु)
- भक्ति को दर्शनिक आधार बनाया।
- प्रमुख केन्द्र – काँची, श्रीरंगम् (तमिलनाडु) को बनाया।
- मंदिर में कई समय तक शिक्षण का कार्य किया।
- गुरु – यमुनाचार्य (आलवार विष्णु के प्रति समर्पण भाव दक्षिण संत थे)
- काँची में यादवप्रकाश को अपना गुरु बनाया। इनसे वेदों और उपनिषदों की शिक्षा प्राप्त की।
- रामानुज – “ज्ञान मोक्ष का साधन नहीं, मोक्षप्राप्ति के लिए भक्ति से बढ़कर कुछ नहीं”
- तमिल शासक चोल वंशीय कुलोतुंग-I, जो कि नयनार पक्ष का था, उसने रामानुज का विरोध किया। रामानुज को श्रीरंगम् छोड़कर जाना पड़ा। छोड़ने के बाद तिरुपति (आन्ध्रप्रदेश) को अपना केन्द्र बनाया।
- सगुणविचारधारा के थे।
- प्रमुख ग्रन्थ :-
- वेदान्तसंग्रहम्
- श्रीभाष्यम्
- गीताभाष्यम्
- वेन्दान्त दीपम्
- वेदान्तसारम्
- शरणगतिगद्यम्
मध्वाचार्य :- (12-13वीं शताब्दी के संत)
- वाद – द्वैतवाद (आत्मा, परमात्मा) 2 तत्त्व
- सगुण धारा – विष्णु को ही परमात्मा माना।
- जन्म – 2 मत है। [1199-1276 ई., 1238-1317 ई.]
- कहाँ – मूलतः दक्षिण भारत उडूपी (पाजक गाँव में) केरल शिवल्ली स्थान पर
- उपाधियाँ – “पूर्णप्रज्ञ”, “आनंदतीर्थ”, “वायु का तीसरा अवतार” (पहला हनुमानजी, दूसरा भीम)
- सामाजिक कार्य – यज्ञ के समय दी जाने वाली पशुबलि पर रोक लगा दी।
- सम्प्रदाय – “ब्रह्मसम्प्रदाय”
- द्वैतवाद – उन्होंने बताया की जीव और ब्रह्म एक न होकर भिन्न भिन्न है यह ही द्वैत है।
- मध्वाचार्य ने इस अंतर को बताने के लिए पंचभेद वाद सिद्धांत दिया जो निम्न प्रकार से है-
- इश्वर का जगत से नित्य भेद है
- इश्वर का जीवात्मा से नित्य भेद है।
- जगत का जीवात्मा से भी नित्य भेद है।
- एक जीव का दुसरे जीव से नित्य भेद है।
- एक जड़ पदार्थ का दुसरे जड़ पदार्थ से नित्य भेद है।
प्रमुख ग्रंथ :-
- अणुभाष्यम्
- न्यायविवरणम्
- गीताभाष्यम्
- ऋग्भाष्यम् (ज्ञान ऋग्वेद के प्रथम 30 सूक्त पर भाष्य)
- रामानुज तथा शंकराचार्य – दोनों के दर्शनों का विरोध किया (वाद का खण्डन)
- माध्वाचार्य के अनुसार दो प्रकार के लोग मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते।
- नित्य संसारी- जो सांसारिक चक्र में बंधे हुए है।
- तमोयोग्य – जिन्हें नरक जाना है।
निम्बार्काचार्य :- (12/14वीं शताब्दी)
- जन्म – चेन्नई, वेल्लारी (तेलुगु ब्राह्मण)
- वाद – द्वैताद्वैत/भेदाभेद- इनके अनुसार जीव व ब्रह्म में एकता हा या भिन्नता यह जीव पर ही निर्भर करता है । इन्होंने बताया कि जीव ब्रह्म को पा भी सकता है नहीं भी किन्तु दोनों का मूल जीव है। जैसे सर्प कुंडलिकार या सर्पिलाकार, सोना तरल या आभूषण, मिट्टी घाट या मटका, दीपक प्रज्ञा या बत्ती आदि।
- सम्प्रदाय – सनक सम्प्रदाय
- रामानुज के समकालीन माना जाता है।
- मथुरा-ब्रज में अपना प्रमुख आश्रम स्थापित किया।
- निम्बार्काचार्य अवतारवाद में विश्वास करते थे।
- राधा = लक्ष्मी
- कृष्ण = विष्णु का अवतार
- “सुदर्शन चक्र के अवतार” माने जाते हैं। राधाकृष्ण की युगल रूप में पूजा की जाती है।
- राजस्थान में निम्बार्क पीठ अजमेर के सलेमाबाद में स्थित।
- दाम्पत्य भक्ति को सर्वश्रेष्ठ माना।
वल्लभाचार्य :-
- जन्म – 1479-1531 तेलंगाना के ब्राह्मण परिवार में
- पिता – लक्ष्मणभट्ट
- माता – इल्लमा देवी
- शिक्षा- वाराणसी
- वाद – शुद्धाद्वैतवाद – जीव सत्य है, जगत सत्य तथा आत्मा भी सत्य है। सबका उद्गम ब्रह्म से है अतः ब्रह्म ही सत्य है।
- समकालीन शासक – विजयनगर (प्रथम हिन्दू साम्राजय) के शासक कृष्णदेवराय के समय वैष्णव सम्प्रदाय की स्थापना की थी।
- कृष्णदेवराय के समय 2 ग्रंथ लिखे –
- सुबोधिनी,
- सिद्धान्त रहस्य
- इन्होंने श्रीकृष्ण के बालरूप की पूजा की व इसे ही शुद्ध माना। “श्रीनाथजी” के रूप में पूजा की
- वृंदावन में श्रीनाथजी का भव्य मंदिर बनाया व उनकी मूर्ति स्थापित की।
- औरंगजेब के समय यह मूर्ति उदयपुर पहुँचा दी गई। जिसे बाद में नाथद्वारा, राजसमंद में स्थापित किया गया।
- 1668 में औरंगजेब ने मूर्तियाँ तोड़ने का आदेश जारी किया।
- राजसिंह जी के समय इनके पुत्र विठ्ठल यह मूर्ति उदयपुर लाए थे।
- “रूद्र सम्प्रदाय” की स्थापना की वल्लभाचार्य ने की।
- वल्लभाचार्य चैतन्य महाप्रभु के समकालीन थे।
- रूद्र सम्प्रदाय के अनुयायी पुष्टिमार्ग व भक्तिमार्ग में विश्वास रखते है।
- विठ्ठलनाथ को अकबर ने गोकुला व जेतपुरा की शासन की जागीर प्रदान की।
- विठ्ठलनाथ ने अष्टछाप मण्डली की स्थापना 1565 ई. में की।
- विठ्ठलनाथ के शिष्य
- केशवदास
- गोविन्दस्वामी
- सूरदास
- छीतस्वामी
- परमानंद दास
- चतुर्भुज दास
- कृष्णदास
- नंददास
चैतन्य महाप्रभु :-

- जन्म – 1486 ई.
- कहाँ – बंगाल, नदिया नामक गाँव में
- पिता – जन्नाथमिश्र
- माता – शचिदेवी
- बचपन का नाम – विश्वम्भर नाथ
- वास्तविक नाम – “निमाई”
- प्रथम गुरु – गंगादास
- वास्तविक गुरु – केशवभारती
- सम्प्रदाय – बंगाल में मध्यम गौड़ीय सम्प्रदाय की स्थापना।
- चैतन्य का पुनरुत्थानवादी आंदोलन था, न कि समन्वयात्मक, जो विष्णु के एक आकर्षक रूप, प्रेमपूर्ण और उल्लसित कृष्ण की पूजा की ओर एक वापसी था।
- बंगाल के वैष्णव ने हिंदू धर्म को सुधारने का प्रयास नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने कृष्ण के प्रति भक्ति को महत्व दिया। चैतन्य ने हालांकि सभी वर्गों से शिष्य बनाए। उन्होंने समूह भक्ति गीतों के गायन और उल्लसित नृत्य के अभ्यास को लोकप्रिय बनाया। उनका आंदोलन बंगाल और उड़ीसा में लोकप्रिय हुआ।
- वाद – अचिंत्य भेदाभेद वह ज्ञान जो तर्क गम्य नहीं हो। अर्थात जो अभेद्य को भेद्य, असंभव को संभव बना दे। उसी शास्त्र आधारित ज्ञान को अचिन्त्य ज्ञान कहते है।
- महाप्रभु के अनुसार जीव व ब्रह्म के अंतर को तर्क तथा बुद्धि से नहीं समझा सकता है। समझने का एकमात्र तरीका शास्त्र अध्ययन है ।
- संसार का प्रत्येक प्राणी कृष्णभक्ति के योग्य है।
- चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी उन्हें विष्णु, कृष्ण का अवतार मानते थे।
- अन्य नाम – गौरांग महाप्रभु, चैतन्य, बलदेव विद्या भूषण
- इनके प्रमुख शिष्य – हरिदास – सखी सम्प्रदाय संस्थापक
- चैतन्य के विचार व उपदेशों का संकलन कविराज कृष्णदास ने “चैतन्य चिरतामृत” नाम से किया।
- इनके द्वारा रचित केवल 8 श्लोक प्राप्त होते हैं। जिन्हें शिक्षाष्टांग कहा जाता है।
- कीर्तन परम्परा का प्रवर्तक। इन्होने ही सर्वप्रथम गाया हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे रामा हरे कृष्ण
- श्री कृष्ण के पुत्र ने तीन मूर्तिया बनाई – वक्ष, चरण, धड़
- महमूद गजनवी के, मथुरा आक्रमण से मूर्तियों को बचाने हेतु छुपाया गया ।
- आमेर नरेश मानसिंग प्रथम ने इन मूर्तियों हेतु वृन्दावन में मंदिर बनाया।
- कालांतर में सवाई जयसिंह द्वितीय के काल में मूर्तियां जयपुर लाइ गयी ।
- राजस्थान में इस संप्रदाय की पीठ गोविन्द देव जी (मुख) जयपुर, अन्य पीठ गोपीनाथ जी मंदिर (वक्ष) जयपुर, मदन मोहन जी मंदिर (पैर) – करौली –
- राजस्थान में इस पीठ के संस्थापक सनातन गोस्वामी व रूप गोस्वामी माने गए ।
- आमेर के कछवाहा वंश ने न केवल इस मत को शरण दिया बल्कि अपने राज्य का स्वामी गोविन्द देव जी मानते है तथा स्वयं को उसका दीवान कहते है।
- इसी परंपरा में जीव गोस्वामी थे जिन्होंने मीरा बाई को कीर्तन सिखाया।
रामानंद :- (15वीं शताब्दी के)
- भक्ति आंदोलन को लोकप्रिय बनाने का श्रेय
- कथन – द्रविड़ भक्ति उपजी, लायो रामानंद
- दक्षिण भारत से उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन लाने का श्रेय। अतः इन्हें उत्तर व दक्षिण भक्ति आंदोलन का रामसेतु कहा जाता है।
- रामानंद कुछ समय तक श्री सम्प्रदाय के संत राघवानन्द के साथ रहे तथा उन्हें अपना गुरु बनाया था।
- गुरु – 1. रामानंद रामानुज के शिष्य थे।
- जन्म – इलाहाबाद में कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में
- किन्तु यह प्रमाणिक नहीं क्योंकि कुछ विद्वान इनका जन्म दक्षिण में मानते हैं।
- पिता – पुण्यसदन
- माता – सुशीलादेवी
- विष्णु के स्थान पर राम की पूजा की
- रामानंद की कुछ शिक्षाएं- आदिग्रंथ में भी है।
- सगुण भक्ति धारा के उपदेश हिन्दी भाषा में दिए इसलिए सबसे लोकप्रिय संत
- शैव v/s वैष्णव दोनों में प्रयाग में समन्वय स्थापित करवाया।
- जाति प्रथा में विश्वास नहीं
- जाति प्रथा एवं बाह्य आडम्बरों का विरोध किया तथा सभी जातियों के लोगों को अपना उपदेश दिया था।
- इसलिए सभी जातियों को समान माना और सभी जातियों के शिष्य बनाए।
- कुल 12 शिष्य (2 महिला शिष्य): कबीर (जुलाहा), सेन (नाई), रैदास (चमार), पीपा (राजपूत, क्षत्रिय), सुरसुरानंद, सुखानंद, धन्ना (जाट), नरहरीदास, अनंतानंद, भावानंद, पद्मावती, सुरसरी आदि।
- रामानंद के विचारों से प्रभावित होकर जिन्होंने हिंदू धर्म त्याग कर इस्लाम स्वीकार कर लिया था, उन्होंने पुनः हिंदू धर्म ग्रहण कर लिया था।
- राजस्थान में इस मत की प्रधान पीठ गलता तीर्थ जयपुर है जिसे गालव तपोभूमि, उत्तर तोताद्री, मंकी वेल्ली, जयपुर का बनारस, दूसरा काशी आदि नामो से भी जानते है। जिसकी स्थापना कृष्ण दास पयहारी ने की व उप पीठ रेवासा धाम सीकर है इस पीठ की स्थापना अग्रदास जी ने की इस मत के साधुओं को बैरागी कहते है।
- आमेर के कछवाहा वंश ने भी इस वंश को शरण दिया ।
- प्रमुख ग्रंथ :-
- वैष्णवमताब्ज भास्कर
- रामरक्षास्रोत्रतम् टीका
- सिद्धान्तपटल
- ज्ञानलीला
- योग चिंतामणि
- सतनामपंथी
मीरा बाई :-

- जन्म – 1498 ई.
- बचपन नाम – पेमल दे
- कहाँ – मेड़ता कुड़की पाली (वर्तमान नागौर)
- पिता – राजा रतनसिंह
- पति – राणा सांगा के पुत्र भोजराज (1516 ई. में विवाह)
- भक्तिकाल की महान महिला संत इनकी तुला सूफी महिला संत “राबिया” से की जाती है।
- गुरु – जीवस्वामी – चैतन्य सम्प्रदाय
- आध्यात्मिक गुरु- रैदास/रविदास
- पति भोजराज की मृत्यु के बाद कृष्ण भक्ति में लीन हो गई।
- कृष्ण को अपना पति (प्रियतम) माना, माधुर्य तथा कांतभाव भक्ति की
- उनकी भक्ति को पदावली कहा जाता है।
- भाषा- राजस्थानी मिश्रित ब्रज भाषा थी
- रस – वियोग श्रृंगार और शांत
- द्वारका में रणछोड़राय के मंदिर में विलीन हो गई। (किवदन्ती)
- प्रमुख ग्रंथ :-
- नरसी जी रो मायरो [रतना खाती को प्रेरित करके]
- गीत गोविन्द का टीका
- राग गोविन्द
- मीरा बाई का मल्हार
- राग सोरठा
- सत्यभामा रो रूसणो
- रुकमणी मंगल
कबीरदास :-

- जन्म – 1440 ई. (1398 ई. भी जन्म माना गया है।)
- कहाँ – काशी (वाराणसी) वरुणा और असी नदियों के संगम पर
- माता – अज्ञात (किन्तु लोक किवदन्तियों के अनुसार विधवा ब्राह्मण महिला के गर्भ से जन्में जिसने लोकलाज के भय से इन्हें एक टोकरी में “लहरतारा तालाब” के किनारे छोड़ दिया)
- पालन – नीरू नीमा (जुलाहा दंपत्ति) ने इनका पालन पोषण किया।
- नामकरण – कबीर (अरबी भाषा का शब्द अर्थ “महान”)
- गुरु – रामानंद [वेदांत दर्शन सीखा।]
- लोकप्रिय तज़कीरा-ए-औलिया-ए-हिंद (मुस्लिम संतों के जीवन) के अनुसार, वे मुस्लिम सूफी शेख तकी के शिष्य थे।
- भक्तिमार्ग – निर्गुण भक्ति धारा
- कबीर संन्यास विचारधारा में विश्वास नहीं रखते थे।
- पहले निर्गुणधारा के संत जिन्होंने गृहस्थ जीवन यापन किया।
- पत्नी – लोई
- पुत्र-पुत्री – कमाल-कमाली
- प्रभाव – अद्वैतवाद/एकेश्वरवाद, विशुद्ध द्वैतवाद
- समकालिक सभी समाज सुधारकों में फक्कड़ संत/क्रांतिकारी विचारधारा के संत
- कबीर एक धार्मिक उग्रवादी थे जिन्होंने हिंदू और इस्लाम दोनों के संप्रदायवाद की संकीर्णता की समान रूप से आलोचना की। उनका संदेश हिंदू समुदाय के निचले वर्गों को बहुत आकर्षित करता था। उनके उपदेशों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताएँ थे: बहुदेववाद, मूर्तिपूजा, और जाति व्यवस्था का विरोध। वे मुस्लिम औपचारिकतावाद की भी उतनी ही निंदा करते थे।
- वे भगवान के सच्चे साधक थे और उन्होंने हिंदू-मुस्लिम के बीच जो दीवारें थीं, उन्हें तोड़ने का हर संभव प्रयास किया। हालांकि, उनके अनुयायियों को जो सबसे ज्यादा आकर्षित करता था, वह था उनका गहरा विश्वास कि उन्होंने ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता पा लिया है, जो नीचे से लेकर उच्चतम वर्ग तक सभी के लिए सुलभ है।
- सामाजिक वर्ण व्यवस्था के कटु आलोचक थे।
- धनसंचय व वैभव विलासिता का पक्ष नहीं लिया।
- कबीर के समकालीन शासक सिकन्दर लोदी
- अबुल फजल ने कबीर को “मुवाहिद” कहा। (एकेश्ववादी)
- अपने अंतिम समय में काशी से मगहर (UP) चले गए।
- पद व दोहों की रचना की ग्रंथ नहीं रचा।
- कबीर को “संतों का संत कहा गया”
- कबीर के पद गुरुग्रंथ साहिब (आदिग्रंथ) में संकलित हैं।
- कबीर की शिक्षाओं का संकलन बीजक में जो कि इनके शिष्य (धर्मदास/भागदास) द्वारा संकलित हैं।
- कबीर की छतरी मगहर में है।
- बीजक :–
- साखी दौहा शैली, शिक्षा सिद्धान्तों का संकलन
- सबद शब्द पद शैली, प्रेम व अंतरंग साधना
- रमैनी – रामायनी दोहा शैली, दार्शनिक विचार प्रकट
- पंथ – कबीरपंथ की स्थापना कबीरचौरा (काशी) में।
- कबीर की मृत्यु के बाद धर्मदास गद्दी पर बैठे।
- कबीर के प्रमुख अनुयायी – मलूकदास (1574)
- इलाहाबाद में जन्मे। उन्होंने कबीर विचारधारा का सर्वाधिक प्रचार किया।
- डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को “युगपुरुष”, “युगावतार”, “युगप्रवर्तक”, “वाणी का डिक्टेटर” कहा।
रविदास/रैदास :-

- जन्म – काशी 1398 ई. में
- पिता – राहु (चमार जाति)
- माता – कर्मा
- पालक दम्पत्ती – संतोकदास तथा कलसादेवी
- पत्नी – लोना
- गुरु – रामानंद
- जानकारी का स्रोत कबीर परचई
- मन की पवित्रता पर जोर दिया।
- रैदास तीर्थयात्रा, व्रत, नदियों में स्नानादि के विरोधी थे।
- मानवसेवा ही सच्चा धर्म है।
- आजीवन व्यवसाय में लगे रहे। समाज को कर्म के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति की शिक्षा दी।
- सिकंदर लोदी को प्रवचन दिए। बाबर, हुमायूँ, शेरशाह सूरी के समकालीन थे।
- कबीर ओर रैदास – दोनों गुरु भाई थे।
- कबीरदास ने रैदास को संतों का संत कहा।
- रैदास सम्प्रदाय की स्थापना काशी में की।
- चित्तौड़ की रानी “झाली” तथा भक्त शिरोमणि मीरा के आध्यात्मिक गुरु थे।
तुलसीदास :-
- जन्म – 1511/1532 राजापुर, वर्तमान नाम कासगंज
- कहाँ – राजापुर, बांदा जिला UP
- पिता – आत्माराम दुबे
- माता – हुलसी देवी
- पत्नी – रत्नावली
- गुरु – नरहरीदास (अयोध्या के)
- बचपन का नाम- रामबोला
- अकबर के समकालीन
- 1574 ई. (1631 वि.संवत्) में अवधी भाषा में “रामचरितमानस” की रचना।
- रचना में समय- 2 वर्ष 9 माह 26 दिन
- अन्य नाम – तुलसी रामायण
- संसार के सर्वश्रेष्ठ 100 ग्रन्थों में 46वाँ स्थान हैं।
- कुल श्लोक – 10902
- 7 काण्ड – बाल (सबसे बड़ा), अयोध्या, अरण्य, किष्किंधा (सबसे छोटा), सुन्दर काण्ड, लंका/युद्ध, उत्तर
- तुलसीदास को “अभिनव वाल्मीकि” कहा जाता है।
- तुलसी का दर्शन विशिष्टाद्वैत का अनुसरण
- तुलसी की मृत्यु – अस्सीघाट (काशी)
- तुलसी जी का मंदिर – काँच मंदिर (चित्रकूट मध्य प्रदेश) प्रतिमा स्थापित है।
- प्रमुख ग्रंथ :-
- विनयपत्रिका (तुलसी का अंतिम ग्रंथ)
- वैरागय संदीपनी
- दोहावली
- कवितावली व कृष्ण गीतावली
- गीतावली
- पार्वती मंगल
- जानकी मंगल
- रामलला नहछू
- बरवै रामायण
- हनुमान बाहुक
- रामाज्ञा प्रश्न
सूरदास :-
- जन्म – 1478 ई. रुनकता में
- कहाँ – आगरा-मथुरा मार्ग पर/दिल्ली के निकट “सीही” नामक गाँव में
- पिता – रामदास
- बचपन का नाम – मदनमोहन
- सूरदास को वल्लभाचार्य का शिष्य माना जाता है,
- सूरदास अकबर के दरबार में रहते थे और उन्हें आगरा के अंधे कवि के रूप में जाना जाता था।
- भगवान श्रीकृष्ण के भक्त सगुण भक्त में कृष्ण भक्ति धारा के संत।
- सूरदास ने प्रेम और भक्ति के मार्ग का प्रचार किया और भगवान श्री कृष्ण के प्रति विशेष प्रेम और भक्ति का उपदेश दिया। उन्होंने भगवान श्री कृष्ण के जीवन और उनकी बाल लीलाओं पर प्रेरणादायक हिंदी कविताएँ लिखीं।
- उनके अनुसार, प्रेम एक उच्च आध्यात्मिक भावना है, जो बृज की गोपियों द्वारा श्री कृष्ण के प्रति अप्रतिरोधी आकर्षण के रूप में व्यक्त होती है। गोपियों की तीव्र भक्ति और प्रेम कृष्ण के प्रति मानव आत्मा के दिव्य आत्मा की ओर स्वाभाविक आकर्षण का प्रतीक है।
- सम्पूर्ण काव्य सर्जन ब्रजभाषा में।
- प्रमुख ग्रंथ :-
- सूरसागर – सबसे प्रसिद्ध रचना/अकबर के समय में रची गई थी। श्री कृष्ण के जीवन की कथा है, जो उनके जन्म से लेकर मथुरा जाने तक की घटनाओं का वर्णन करता है।
- सूरसारावली – अनुक्रमणिका
- साहित्य लहरी
- अकबर और जहाँगीर के समकालीन कवि थे।
- मृत्यु – 1583 ई. पारसौली गोवर्धन उत्तर प्रदेश
- सूर की मृत्यु पर गोस्वामी विठ्ठलनाथ ने कहा “पुष्टि मार्ग को जहाज जात है सो जाको कछु लेनो होए सो लेऊ।।”
दादूदयाल :-
- जन्म/जन्म स्थल- 1544-1603 ई. अहमदाबाद, साबरमती नदी के तट पर
- मृत्यु – नरैना में (जयपुर)
- पिता – पालकपिता- लोदीराम ब्राह्मण
- गुरु – कबीर के सर्वश्रेष्ठ शिष्य (वृद्वानंद)
- दादयाल “राजस्थान का कबीर” कहा जाता है।
- दादूदयाल ने “दादूपंथ” की स्थापना जयपुर के पास 1554 ई. नरैना (नारायणा) में की यह उनकी प्रधान पीठ मानी जाती है।
- मूर्तिपूजा व जातिप्रथा का विरोध किया।
- दादूपंथ की 5 शाखाएँ – खालसा, नागा, खाकी, उत्तरादे, विरक्त
- दादू के उपदेश – “दादू रा दूहा” “दादूवाणी” में 5000 श्लोक – ढूंढाड़ी सधुक्कड़ी भाषा में (पश्चिमी हिन्दी)
- दादूपंथ के सत्संग स्थल – अलख दरीबा
- दादू ने दादूपंथ सम्प्रदाय का उपदेश दिया।
- दादू के कुल 152 शिष्य थे।
- दादू ने निपख सम्प्रदाय का उपदेश दिया
- दादू 52 शिष्य 52 स्तंम्भ कहलाते हैं।
- प्रमुख शिष्य :-
- सुन्दरदास
- गरीबदास
- रज्जब जी
- मिस्किनदास
- बालिन्द
- बखना
- रज्जब जी ने “यह संसार वेद है, यह सृष्टि कुरान है।”
- दादू की मृत्यु के बाद गरीबदास गद्दी पर बैठे।
- दादूपंथी शव को जलाने के बजाए जानवरों के भक्षण हेतु जंगलों में छोड देते हैं। (किन्तु वर्तमान में दाह संस्कार प्रचलित)
- गरीबदास ने 1 ही कमण्डल 1 झोली से बहुतों को भोजन खिला दिया था।
- दादू दयाल को अकबर ने धार्मिक मंत्रणा हेतु फतेहपुर सीकरी बुलाया था। इन्ही से प्रभावित होकर अकबर ने गौहत्या पर रोक लगाई।
गुरुनानक :-
- जन्म – 1469 ई.
- कहाँ – तलवण्डी (पंजाब) / ननकानासाहिब कहा जाता है।
- पिता – लाल कल्याणराय – “मेहताकालु जी” उपाधि
- माता – तृप्ता देवी
- पत्नी – सुलखनादेवी
- निर्गुण भक्ति धारा के संत थे।
- जात-पात में विश्वास नहीं करते थे।
- निर्गुण ईश्वर की उपासना की ईश्वर को अकाल पुरुष कहा।
- गुरुनानक के शिष्य का नाम मरदाना सारंगी बजाता
- गुरुनानक स्वयं – रबाब के साथ भजन करते थे।
- गुरुनानक के गीतों व उपदेशों को आदिग्रंथ गुरुग्रंथ साहिब में संकलित।
- उदासियाँ – भारत, अफगान, अरब, फारस इन देशों की 4 बार यात्रा की ,उसे उदासियाँ कहा जाता है।
- इन्होंने श्रीलंका, मक्का व मदीना का भी भ्रमण किया।
- विभिन्न देशों की यात्रा करने के बाद वे अन्ततोगत्वा करतारपुर में रहकर उपदेश करने लगे।
- गुरु नानक का निधन करतारपुर में हुआ था।
- सिख धर्म में कुल 10 गुरु प्रथम गुरु नानक इन्हीं के शिष्य “सिख” कहलाए।
- गुरुनानक
- गुरुअंगद
- गुरु अमरदास
- गुरु रामदास
- गुरु अर्जुनदेव (आदिग्रंथ के संकलन कर्ता)
- गुरु हरगोविन्द
- गुरु हरराय
- गुरु हरकिशन
- गुरु तेगबहादुर
- गुरु गोविन्दसिंह (खालसा पंथ की स्थापना)
नरसी मेहता :- (15वीं सदी के)
- जन्म – जूनागढ़ तलजा नामक गाँव में (गुजरात)
- पिता – कृष्ण दामोदर
- पत्नी – मणिकबाई
- कृष्ण भक्ति की 1 लाख दोहे लिख।
- “गुजराती साहित्य का सूरदास” कहा जाता है।
- भजन – वैष्णवजन तो तेने कहिए, पीर पराई जानि रे….
- महात्मा गांधी का प्रिय नरसी जी ने रचना की।
- प्रमुख ग्रंथ :- 9
- श्यामलदास नो विवाह
- श्रृंगारमाला
- हारमाला
- सूरतसंग्राम
- गोविन्दगमन
शंकरदेव :-
- कहाँ के – असम के – “असम का चैतन्यमहाप्रभु”
- भगवान श्री कृष्ण की भक्ति किन्तु मूर्ति पूजा के विरोधी संत थे।
- सम्प्रदाय – एकशरण सम्प्रदाय की स्थापना की थी।
- निर्गुण संत – संन्यास में विश्वास नहीं करते थे।
- भगवान की महिला सहयोगिनी को नहीं मानते थे।
- इनके मंदिरों में भगवद्पुराण की पूजा होती थी।
- प्रमुख ग्रंथ शंकरदेव का “भक्ति रत्नाकर”
महाराष्ट्र में भक्ति आन्दोलन :-
- प्रेरक :- विठ्ठोबा (पंढरपुर का देवता, विष्णु का अवतार)
- महाराष्ट्र धर्म 2 भागों में विभाजित था।
- बारकरी/वरकरी – वार करी परिक्रमा करने वाले लोग सौम्य स्वभाव के लोग, भावुक लोगों का धर्म, ये कृष्ण की पूजा करते थे।
- ” संस्थापक – संत तुकाराम
- धरकरी/ धरना – एक जगह ही रहने वाले रामदास पंथ के थे, राम की पूजा करते हैं, ये सैद्धान्तिक लोग थे।
- ” धरकरी सम्प्रदाय के संस्थापक- रामदास
- बारकरी/वरकरी – वार करी परिक्रमा करने वाले लोग सौम्य स्वभाव के लोग, भावुक लोगों का धर्म, ये कृष्ण की पूजा करते थे।
- विठ्ठोबा के प्रमुख संत वरकरी सम्प्रदाय के प्रमुख संत ज्ञानदेव, नामदेव, तुकारामा
संत ज्ञानेश्वर :- (1285-1353 ई.)

- जन्म 1285 ई. औरंगाबाद, महाराष्ट्र में
- गुरु – निवृत्तिनाथ
- पिता – विट्ठापंत
- माता – रुक्मणी बाई
- ज्ञानदेव के ग्रंथ:-
- मराठी भाषा में श्रीमद्भगवतगीता का टीका इसे “ज्ञानेश्वरी” और “भावार्थ दीपिका” कहा जाता।
- अमृतानुभव
- चंगदेवप्रशस्ति
संत नामदेव :- (1270-1350 ई.)

- जन्म 26 अक्टूबर, 1270
- कहाँ – पंढरपुर, MH नदी नरसी बामणी गाँव में (कृष्णा नदी किनारे)
- पिता – दामासेठ
- माता – गौणदेवी
- पत्नी – राजाबाई
- गुरु – विसोबा खेचर (विठ्ठोबा)
- नामदेव छीपा जाति के थे।
- नामदेव बचपन में डाकू थे हृदय परिवर्तन होने से संत बन जाते हैं।
- पंढरपूर के विठोबा (विष्णु का अवतार) के परम भक्त नामदेव ने अपना अधिकांश समय पूजा में बिताया, और अपने अनुयायियों के साथ मुख्य रूप से अपनी रचनाओं में स्तुति गाते थे।
- उन्होंने मराठी और हिंदी में कई अभंग (संतों द्वारा भगवान की महिमा में रचित और गाए गए गीत) लिखे।
- उनका संदेश यह था कि “ईश्वर से प्रेम करो और समर्पण के साथ अपनी पूरी निष्ठा से जीवन जिओ।”
- 61 पद्य (कविताएँ) आदिग्रंथ में शामिल हैं।
- दिल्ली में सूफी संतों के साथ वाद-विवाद किया।
- नामदेव ने संत ज्ञानेश्वर के साथ कई स्थानों का भ्रमण किया तथा उनकी मृत्यु के बाद नामदेव महाराष्ट्र छोड़कर पंजाब के गुरदासपुर जिले में स्थित धोमन गाँव में जाकर बस गए थे।
- हिन्दू तथा सिख दोनों ही नामदेव के भक्त थे।
संत तुकाराम

- जन्म – 1608 में पुणे के पास एक गांव में [महाराष्ट्र]
- पिता – बोलहोबा/बहेला
- माता – कनकाई
- पत्नी – जीजाबाई
- जाति – शुद्र – होने के बावजूद स्वयं विठ्ठोबा की पूजा करते
- ग्रंथ – तुकाराम री वाणी, उन्होंने अपने अभंग मराठी में लिखे।
- वे मराठा शिवाजी के समकालीन थे और संत एकनाथ तथा रामदास जैसे संतों के समकालीन थे।
- अपने व्यापारिक जीवन के बाद उन्होंने अपना समय अपने पसंदीदा देवता पंढरपूर के विठोबा की स्तुति में भक्ति गीत गाने में बिताना शुरू किया।
- तुकाराम ने निराकार ईश्वर में विश्वास किया।
- उनके अनुसार, सांसारिक गतिविधियों के साथ आध्यात्मिक आनंद को प्राप्त करना संभव नहीं था। उन्होंने ईश्वर की सर्वव्यापिता को प्रमुखता दी।
- उन्होंने वैदिक यज्ञ, अनुष्ठान, तीर्थयात्रा, मूर्तिपूजा आदि को नकारा। उन्होंने पवित्रता, क्षमा और मानसिक शांति की महत्ता का प्रचार किया।
- उन्होंने समानता और भाईचारे का संदेश फैलाया और हिंदू-मुसलमान एकता को बढ़ावा देने का प्रयास किया।
एकनाथ जी :- (1533-1599 ई.)
- जन्म – पेठन, औरंगाबाद (महाराष्ट्र)
- गुरु – जनार्दनस्वामी
- संत ज्ञानेश्वर से प्रभावित थे। “ज्ञानेश्वरी” का विश्वसनीय अंक प्रकाशित करवाया।
- ग्रंथ –
- भगवत गीता के चार श्लोक पर टीका
- चतुश्लोकी भागवत
- भावार्थ रामायण
- रुक्मिणी स्वयंवर
समर्थ गुरु रामदास :- (1608-1681 ई.)
- शिवाजी के आध्यात्मिक गुरु थे।
- इन्होंने परमार्थ सम्प्रदाय चलाया।
- प्रमुख ग्रंथ – दासबोध
