भारत में चित्रकला व मूर्तिकला

भारत में चित्रकला व मूर्तिकला का इतिहास अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और विविधतापूर्ण रहा है, जो देश की सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक चेतना को अभिव्यक्त करता है। प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत के अंतर्गत ये कलाएँ गुफा चित्रों, मंदिर स्थापत्य और प्रतिमाओं के माध्यम से तत्कालीन जीवन, आस्थाओं एवं सौंदर्यबोध को दर्शाती हैं।

1. गुप्तकालीन चित्रकला

  • श्रेष्ठ उदाहरण: अजंताग्वालियर की बाघ गुफाएँ
  • विषय: प्राकृतिक सौंदर्य, बुद्ध-बोधिसत्व, जातक कथाएँ।
  • विशेषताएँ: रंगों की प्रभा, रेखाओं का लालित्य, विविधता, भावाभिव्यक्ति, कल्पनाशीलता।
  • अजंता गुफा 16: मरणासन्न राजकुमारी, अवलोकितेश्वर, यशोधरा-राहुल।
  • गुफा 17 = “चित्रशाला”; माता-शिशु चित्र प्रसिद्ध।
  • बाघ गुफाएँ (9 गुफाएँ): लौकिक जीवन, वेशभूषा, केश-विन्यास, संगीत-नृत्य दृश्य।
  • समुद्रगुप्त के वीणा वाले सिक्के = संगीत प्रेम प्रमाण।

2. कला की पाल शैली (750–1150 ई.)

  • स्थान: बंगाल-बिहार (पाल शासन)।
  • माध्यम: ताड़पत्र / चर्मपत्र पर बौद्ध पांडुलिपियाँ (वज्रयान देवता)।
  • विशेषताएँ: लहरदार रेखाएँ, शांत पृष्ठभूमि, अकेली आकृतियाँ, सरल रचना, हल्के रंग।
  • प्रमुख चित्रकार: धिम्मन, वितपाल
  • मूर्तिकला-चित्रकला में समान शैली (अजन्ता समानान्तर)।
  • अष्टसहस्त्रिका प्रज्ञापारमिता – श्रेष्ठ पाल पांडुलिपि; नालंदा, शासक: रामपाल; 11वीं सदी; 6 पृष्ठ व लकड़ी के आवरण।

3. अपभ्रंश चित्रकला शैली (11वीं–15वीं सदी)

  • क्षेत्र: गुजरात व राजस्थान (मेवाड़)।
  • विषय: प्रारंभ में जैन, बाद में वैष्णव (गीत गोविंद, लौकिक प्रेम)।
  • माध्यम: ताड़पत्र → बाद में कागज।
  • रंग: प्रतीकात्मक — लाल, पीला, गेरू; बाद में उजला/सोना।
  • आकृतियाँ: मछली-आकार की उभरी आँखें, तीखी नाक, दोहरी ठोड़ी, कृशकाय चेहरे, कठोर आकृतियाँ।
  • महिलाओं के विस्तृत कूल्हे/स्तन; पशु-पक्षी खिलौना-जैसे।
  • प्रमुख ग्रंथ: कल्पसूत्र, कालकाचार्य कथा, संग्राहिणी सूत्र, उत्तराध्ययन सूत्र
  • जैन परंपरा: भंडार में सचित्र पांडुलिपि दान = धार्मिक पुण्य।
भारत में चित्रकला व मूर्तिकला

4. चोल चित्रकला

  • पल्लव-पांड्य परंपरा का विकसित रूप।
  • प्रमुख स्थान: तंजावुर
  • बृहदेश्वर मंदिर – अजन्ता से प्रभावित धार्मिक भित्तिचित्र: शिव, कैलाश, नंदी आदि।

5. चालुक्य चित्रकला

  • स्थान: बादामी (विष्णु गुफा)।
  • शैली: वाकाटक शैली अपनाई।
  • विषय: विष्णु के अवतार, लौकिक जीवन।
  • प्रसिद्ध उदाहरण: राजा मंगलेश (597–609) के महल का “गेंद का खेल” दृश्य।

6. विजयनगर भित्ति चित्रकला

  • प्रारंभिक नमूने: तिरुपराकुनरम् (त्रिची के पास)।
  • हम्पी – विरूपाक्ष मंदिर: मंडप की छत पर रामायण, महाभारत, वंश का इतिहास।
  • प्रसिद्ध दृश्य: बुक्काराय के गुरु विद्यारण्य की पालकी यात्रा; विष्णु के अवतार।
  • लेपाक्षी (आंध्र) – शानदार भित्तिचित्र, विभिन्न देशों की जीवनशैली दर्शित।
  • शैली विशेषताएँ:
    • चेहरों को पार्श्वचित्र (profile) में, आकृतियाँ 2D में।
    • सरल, स्थिर रेखाएँ; समतल उपखंडों में संयोजन।

7. नायककालीन भित्ति चित्रकला (17वीं–18वीं सदी)

  • स्थान: तिरुपराकुनरम्, श्रीरंगम्, तिरुवरूर, चेंगम (श्रीकृष्ण मंदिर)।
  • विषय:
    • रामायण-महाभारत प्रसंग
    • कृष्णलीला
    • मुचुकंद कथा
    • शिव (भिक्षाटन), विष्णु (मोहिनी)
  • शैली विशेषताएँ:
    • विजयनगर शैली का विस्तृत रूप + क्षेत्रीय परिवर्तन
    • पतली कमर वाले पुरुष (विजयनगर में मोटे पैर)
    • पार्श्व चित्र, समतल पृष्ठभूमि
    • चित्रों में गतिशीलता उत्पन्न करने का प्रयास
    • उदाहरण: तिरुवलंजुलि का नटराज चित्र

1. गुप्तकालीन मूर्तिकला (Gupta Sculpture)

  • धातु, पत्थर व मिट्टी की मूर्तियाँ।
  • विशेषताएँ: वस्त्रों की महीनता, अलंकृत प्रभामंडल, विशिष्ट केशरचना, मुद्रा-आसन, आध्यात्मिकता, सरसता, भारतीयकरण।
  • मूर्तियाँ शास्त्रीय नियमों के अनुसार निर्मित।
  • उत्कृष्ट मूर्तियाँ:
    • सुल्तानगंज बुद्ध (7.5 फीट, ताम्र, अब बर्मिंघम संग्रहालय)
    • मथुरा महावीर
    • देवगढ़/मथुरा की विष्णु
    • ऐरण/उदयगिरि का वराह
    • अर्द्धनारीश्वर (मथुरा संग्रहालय)
  • कुषाणकालीन नग्नता-कामुकता का पूर्ण अभाव।
  • शैलियाँ/केंद्र:
    • मथुरा: खड़े बुद्ध
    • सारनाथ: बैठे बुद्ध (वस्त्र बिना तहों के)
    • पाटलिपुत्र: सुल्तानगंज बुद्ध
  • मथुरा शैली की एक मात्र कुषाण-प्रभावित बुद्ध — मनकुंवर (प्रयागराज)।
  • शैव मूर्तियाँ:
    • करमदण्डा – चतुर्मुखी शिव
    • खोह – एकमुखी शिवलिंग
    • भूमरा – गर्भगृह में शिवलिंग
    • विदिशा – हरिहर
    • मयूरासनसीन कार्तिकेय (पटना संग्रहालय)

2. चोल मूर्ति कला (Chola Sculpture)

  • मंदिर सजावट में मूर्तिकला का विशेष महत्व।
  • उत्कृष्ट पाषाण/कांस्य/अष्टधातु प्रतिमाएँ: ब्रह्मा, विष्णु, नटराज, राजा-रानी।
  • शैव देवताओं (पार्वती, स्कन्द, कार्तिकेय, गणेश) की अनेक कांस्य प्रतिमाएँ।
  • मूर्तिकला भवन-कला की सहायक कला—दीवारों/छतों पर विशेष प्रयोग।
  • नटराज (मुख्य विशेषताएँ):
    • दाहिने ऊपरी हाथ—डमरू (सृष्टि)
    • बाएँ ऊपरी हाथ—अग्नि (प्रलय)
    • दाहिना निचला—अभय मुद्रा
    • बायाँ निचला—उठे पैर की ओर (मोक्ष का मार्ग)
    • पाँव के नीचे बौना—अविद्या
    • उड़ती जटाएँ—गंगा प्रवाह
    • एक कान में पुरुष/दूसरे में स्त्री बाली—अर्धनारीश्वर भाव
    • सर्प—कुण्डलिनी शक्ति
    • प्रकाश-वृत्त—काल चक्र
भारत में चित्रकला व मूर्तिकला

3. भारत में जैन कांस्य प्रतिमाओं का विकास

(a) प्राचीन – कुषाण काल

  • सर्वप्रथम जैन कांस्य प्रतिमाएँ।
  • निर्वस्त्र तीर्थंकर प्रतिमाएँ (चौसा – बिहार)।
  • आदिनाथ की लटदार केशरचना प्रसिद्ध।

(b) 5वीं–7वीं शताब्दी

  • अकोटा (गुजरात) — विशाल संग्रह।
  • ‘लुप्त-मोम विधि’ से निर्मित; बाद में चाँदी-ताँबे से नेत्र/मुकुट सजावट।
  • हाँसी (हरियाणा), चौसा (बिहार), तमिलनाडु, कर्नाटक से भी प्रतिमाएँ।

(c) 6वीं–9वीं शताब्दी (गुजरात/पश्चिम भारत)

  • तीर्थंकर—सिंहासन पर; समूह (3–24) प्रतिमाएँ।
  • यक्षिणी/शासन देवी प्रतिमाएँ।
  • गुप्त-वाकाटक प्रभाव।

4. भारत में बौद्ध कांस्य प्रतिमाओं का विकास-क्रम

(a) उत्तर प्रदेश–बिहार (गुप्तकाल/5–7वीं सदी)

  • अधिकांश खड़ी मूर्तियाँ—अभय मुद्रा।
  • मथुरा शैली — परिधान में तहें।
  • सारनाथ शैली — वस्त्र में बिना तहें।
  • विशेष उदाहरण:
    • धानसेरखेड़ा प्रतिमा (मथुरा जैसी तहें)
    • सुल्तानगंज बुद्ध (सारनाथ शैली)

(b) महाराष्ट्र – वाकाटक काल

  • फोफनार (महाराष्ट्र)
  • अमरावती शैली का प्रभाव।
  • भिक्षुओं के वस्त्र पहनने की शैली में परिवर्तन।

(c) बिहार–बंगाल – पाल काल (9वीं–12वीं सदी)

  • नालंदा, कुर्किहार — नई शैली।
  • गुप्त परंपरा का पुनर्जीवन।
  • विशिष्ट प्रतिमा: चतुर्भुज अवलोकितेश्वर (त्रिभंग मुद्रा)।
  • वज्रयान प्रभाव — तारा देवी की कांस्य प्रतिमाएँ अत्यंत लोकप्रिय।

5. पल्लवकालीन शिव मूर्ति

  • 8वीं शताब्दी।
  • शिव अर्धपर्यंक आसन में।
  • दाहिना हाथ — आचमन मुद्रा (विषपान का संकेत)।

6. विजयनगर मूर्तिकला

  • चित्रकला के साथ मूर्तिकला का व्यापक विकास।
  • पत्थर व कांस्य दोनों माध्यम।
  • शासकों की विशाल मूर्तियाँ — कृष्णदेवराय, वेंकट प्रथम आदि।
  • तिरुपति में आदमकद कांस्य प्रतिमाएँ — कृष्णदेव राय अपनी रानियों तिरुमालंबा व चित्रदेवी के साथ।
  • कांस्य ढलाई में विजयनगर कारीगर अत्यंत कुशल।
error: Content is protected !!
×
New RAS course according to updated syllabus
Visit youtube channel now
Scroll to Top
Telegram WhatsApp Chat