मध्यकालीन ललित कला

मध्यकालीन ललित कला भारतीय संस्कृति की सौंदर्यपरक अभिव्यक्ति का सशक्त स्वरूप है, जिसमें चित्रकला, मूर्तिकला, वास्तुकला और संगीत का समृद्ध विकास दिखाई देता है। प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत विषय के अंतर्गत यह कला तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक परिवेश को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम मानी जाती है।

इंडो – इस्लामिक स्थापत्य

सामान्य विशेषताएँ

  • तुर्क मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और अरब–रोमन परंपरा वाली शैलियाँ साथ लाए।
  • स्थानीय हिन्दू, बौद्ध, जैन शैली से इंडो–इस्लामिक मिश्रण विकसित।
  • पहली बार चूना–गारा (सीमेंट) का प्रयोग।
  • भारतीय स्थापत्य की मुख्य विशेषता: शहतीर/धरनी प्रणाली
  • मुसलमानों ने मेहराब, मीनार, गुम्बद जोड़े।
  • सजावट: ज्यामितीय पैटर्न, कूफ़ी लिपि, अरबी आयतें, बेल-बूटे, कमल, स्वास्तिक → इसे अरेबेस्क कहा गया।
  • जॉन मार्शल: सल्तनत स्थापत्य = हिन्दू–इस्लामी कला

प्रारम्भिक सल्तनत शैली (गुलाम वंश)

कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद (1197)

  • भारत की पहली तुर्की मस्जिद।
  • कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा निर्माण, 27 जैन मंदिर/विष्णु मंदिर की जगह।
  • विस्तार: इल्तुतमिश और अलाउद्दीन खिलजी (स्तंभों पर कुरान की आयतें)।
  • मेहरौली लौह स्तंभ इसके प्रांगण में।

अढ़ाई दिन का झोपड़ा (अजमेर, 1200)

  • यह अजमेर में विग्रह राज-4 द्वारा बनाए गए संस्कृत महाविद्यालय के स्थान पर कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनाया गया।

कुतुबमीनार

  • शुरुआत: 1206, ऐबक ने; पूर्ण: 1232, इल्तुतमिश
  • वास्तुकार: फजल इब्न अबुल माली
  • शिल्प: पहली मंजिल सितारा-आकृति; मिश्रित लाल बलुआ पत्थर व श्वेत संगमरमर; अरबी-फ़ारसी लेख।
  • ऊँचाई: मूल 225 फीट → फ़िरोज तुगलक द्वारा 240 फीट (5 मंजिल)।
  • उपयोग: अजान व विजय-स्तम्भ।
  • मरम्मत: मोहम्मद बिन तुगलक (1326), सिकन्दर लोदी (1505)।

मकबरा परंपरा (गुलाम वंश)

इल्तुतमिश 

  • सुलतान इल्तुतमिश स्थापत्य प्रमी रहे।
  • उन्होंने कुतुबमीनार की तीन मंजिले बनवायी।
  • अपने पुत्र नासिरूद्दीन महमूद की याद में मदरसा ए नासिरी की स्थापना की।
  • इल्तुतमिश को भारत में गुम्बद निर्माण का पिता कहा जाता है।
  • दिल्ली में  सुल्तानगढ़ी का मकबरा बनवाया।
  • नागौर में अतारकिन दरवाजा बनवाया।
  • बदायुं में जामा मस्जिद , हौज शम्शी एवं शम्शी ईदगाह का निर्माण करवाया।
हौज ए शम्सी
सुल्तान गढ़ी का मकबरा

बलबन का योगदान

  • भारत का पहला शुद्ध इस्लामी शैली का मकबरा – दिल्ली में बलबन मकबरा
  • पहली बार वैज्ञानिक रूप से सही मेहराब (सच्ची अरेंज/true arch)।
  • लाल महल (कसर-ए-लाल), कसर-ए-सफेद (इल्तुतमिश का श्वेत महल)।
  • पुत्र शहजादा मोहम्मद का मकबरा।
  • दार-उल-अमन (इब्न बतूता उल्लेख)।

खिलजी कालीन स्थापत्य

सामान्य विशेषताएँ

  • इमारतें पूर्ण इस्लामिक सोच के अनुरूप।
  • मजबूत नींव, कुर्सी, वेदिका; तहखानों का अभाव।
  • नुकीली (घोड़े की नाल) मेहराब, डाटदार छतें, बेल-बूटे।

अलाउद्दीन खिलजी

  • कुव्वत-उल-इस्लाम विस्तार।
  • 1311 – अलाई दरवाजा (कुतुब परिसर) →
    • भारत का पहला वैज्ञानिक गुम्बद
    • पहली इमारत जिसमें केवल इस्लामी शैली + संगमरमर का प्रथम प्रयोग।
    • चतुर्भुज/ट्यूडर/चतुष्केन्द्रीय मेहराब।
    • मार्शल: “सल्तनत स्थापत्य का सबसे सुंदर हीरा।”
    • अलाउद्दीन: ‘गुम्बद निर्माण का पिता’
  • जमात खाना मस्जिद – निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर, पूर्ण ईरानी शैली।
  • सीरी फोर्ट, हजार खंभों वाला महल (हजार सितून)।
  • हौज-ए-अलाई / हौज-ए-खास।
  • अलाई मीनार – कुतुब से दोगुनी ऊँचाई की योजना (एक मंज़िल पर रुकी)।
  • चित्तौड़ – गम्भीरी नदी पर पुल।
  • मुबारक खिलजी काल – मलिक काफूर द्वारा ऊखा मस्जिद, बयाना

तुगलक वंश – तुगलक शैली

विशेषताएँ

  • वास्तुकला का “संकट काल”।
  • भारी, स्थूल, खुरदरे मेहराब; न्यून अलंकरण।
  • धूसर बलुआ पत्थर, सस्ते सामग्री का प्रयोग।
  • ढलवां दीवारें (‘बट्टार’ शैली) → मजबूती का आभास।
  • प्रवेश द्वार: मेहराब + सरल शैली का संयोजन।

प्रमुख निर्माण:

गयासुद्दीन का मकबरा (1321)

  • तुगलकाबाद किले से जुड़ा; अनियमित पंचभुजाकार प्रांगण।
  • 3 कब्रें (गयासुद्दीन, बेगम, मोहम्मद बिन तुगलक)।
  • तुगलकाबाद किला, जहांपनाह, फिरोजाबाद नगर।
  • आदिलाबाद किला, खिर्की मस्जिद, बारह खम्भा
  • निजामुद्दीन औलिया का मकबरा
  • छप्पन कोट्ट (दिल्ली) – गयासुद्दीन का महल, “सुनहरी ईंटों” से निर्मित।

सैयद व लोदी काल

सैय्यद वंश (पश्चगामी काल)

  • तैमूर आक्रमण से अर्थव्यवस्था खराब → वास्तुकला का ह्रास।
  • अष्टकोणीय मकबरे मुख्य।
  • विशेषताएँ:
    • नीली टाइलें
    • गुम्बद पर कमल आकृति
    • गुलदस्ते/डेकोरेशन

उदाहरण:

  • मुबारकशाह सैय्यद का मकबरा
  • मोहम्मदशाह सैय्यद का मकबरा

लोदी वंश – दोहरे गुम्बद का काल

  • पश्चगामी प्रवृत्ति जारी; मुख्यतः मकबरे निर्मित।
  • विशिष्टता: दोहरे (Double) गुम्बद – मजबूती + भीतरी ऊँचाई कम।
  • सादे, बिना अलंकरण वाले मकबरे; व्यास लगभग 15 मीटर।
  • दो प्रकार के मकबरे:
    • अष्टकोणीय बरामदा युक्त
    • वर्गाकार बरामदा रहित

उदाहरण:

  • सिकन्दर लोदी का मकबरा (1517–1518, दिल्ली) –
    भारत का पहला दोहरे गुम्बद वाला मकबरा
  • लोदी गार्डन
  • मोठ की मस्जिद – सिकन्दर लोदी के वजीर मियाँ भूआ द्वारा; सामने पाँच मेहराबदार द्वार।
  • आगरा नगर की नींव इसी काल में।

वास्तुकला की प्रांतीय ‘शैलियां

  • इस अवधि के दौरान इंडो-इस्लामी शैली ने स्थानीय स्थापत्य शैलियों को भी प्रभावित करना आरंभ कर दिया था। बंगाल, बीजापुर, जौनपुर और मांडू वास्तुकला के विकास के महत्वपूर्ण केंद्र बन चुके थे।

बंगाल शैली 

  • वास्तुकला की बंगाल शैली की विशेषता ईंटों और काले संगमरमर का प्रयोग थी। 
  • इस अवधि के दौरान बने मस्जिदों में ढलवां ‘बांग्ला छतों’ का उपयोग जारी रहा। पहले इसका मंदिरों के लिए उपयोग किया जाता था।
  • उदाहरण –  गौर की कदम रसूल मस्जिद, पांडुआ की अदीना मस्जिद आदि।

मालवा शैली

  • मालवा के पठार में स्थित धार और मांडू के नगर वास्तुकला के प्रमुख स्थल बन गए थे। 
  • यहां के भवनों की सबसे प्रमुख विशेषता विभिन्न रंगों के प्रस्तरों और संगमरमरों का प्रयोग था। 
  • भवनों में विशालकाय खिड़कियां लगी थीं जो शायद यूरोपीय प्रभाव का परिणाम थीं और ये मेहराब एवं स्तंभों के शैलीकृत प्रयोग से अलंकृत थे।
  • यहाँ तक कि सीढ़ियों का उपयोग भी निर्माण का सौंदर्यबोध बढ़ाने के लिए किया गया था। 
  • हालांकि, वास्तुकला की इस शैली में मीनारों का उपयोग नहीं किया गया था।
  • वास्तुकला की पठान शैली के रूप में भी ज्ञात मालवा शैली निम्नलिखित विशेषताओं के चलते इस अवधि की पर्यावरण अनुकूलन के सर्वश्रेष्ठ नमूनों में से एक है – 
    1. विशालकाय खिड़कियों का उपयोग भवनों और कक्षों को भली-भांति हवादार बनाता था।
    2. मंडप थोड़े धनुषाकार होते थे। यह विशेषता उन्हें हवादार बनाती थी और गर्मियों में भी ये भवन ठंडे बने रहते थे।
    3. परिसर में जल भंडारण हेतु ‘बावड़ी’ के रूप में ज्ञात कृत्रिम जलाशयों का निर्माण करवाया गया था।
    4. भवनों के निर्माण में स्थानीय पत्थर और संगमरमर की सुलभता का लाभ उठाया गया था। 
    5. तुगलकों द्वारा प्रचलित बट्टार प्रणाली का उपयोग करके भवनों को मजबूत बनाया गया था।
  • उदाहरण – रानी रूपमती का मंडप, जहाज महल, अशरफी महल [एक मदरसा] आदि।

मांडू की वास्तुकला 

  • मांडु नगर मध्य प्रदेश में इन्दौर से 60 मील की दूरी पर स्थित है।   
  • मांडु की स्थिति प्राकृतिक रूप से बहुत सुरक्षित है।
  • उसकी इसी सामरिक विशेषता को देखकर परमार राजपूतों, अफगानों और मुगलों ने इसे अपना आवास बनाया। 
  • होशंगशाह द्वारा 1401-1561 ई. में स्थापित गौरी राजवंश की राजधानी के रूप में इस शहर ने काफी मशहूरी पाई। । 
  • उसके बाद मांडु का इतिहास सुल्तान बाज बहादुर और रानी रूपमती के प्रेम प्रसंगों से जुड़ा रहा। 
हिंडोला महल 
  • एक बड़े रेल पुल की तरह दिखाई देता है जिसकी दीवारें बड़े-बड़े असमानुपातिक पुस्तों पर टिकी हुई हैं।  
  • सुल्तान का दीवाने आम था, [सुल्तान अपनी प्रजा को दर्शन दिया करता था।] 
  • हिंडोला का प्रभाव उत्पन्न करने के लिए इन दीवारों पर ढाल का बखूबी इस्तेमाल किया गया है। 
जहाज महल 
  • दो-मंजिली इमारत, शक्ल पानी के जहाज जैसी। 
  • दो जलाशयों के बीच में स्थित है और इसकी छत, बरामदे, बारजे और मंडप मानों पानी पर लटके हुए हैं।
  • निर्माण – सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी ने । 
  • इसमें नहरें व नालियाँ हैं और छत पर तरण-ताल बना हुआ है।
रानी रूपमती का मंडप 
  • दक्षिणी प्राचीर पर बना हुआ है जहां से नर्मदा घाटी का अति सुंदर दृश्य दिखाई देता है। 
होशंगशाह का मकबरा 
  • इसमें सुंदर गुंबद, संगमरमर की जाली का काम, ड्योढ़ियाँ, प्रांगण, मीनारें और बुर्जे देखने लायक हैं। 
  • इसे अफ़गान शैली के पौरुष/मर्दानगी का उदाहरण माना जाता है लेकिन इसका जालीदार काम, उकेरे हुए टोड़े और तोरण निर्माण कार्य की कोमलता प्रकट करते हैं।

जौनपुर शैली

  • शर्की शासकों के संरक्षण में जौनपुर कला और सांस्कृतिक गतिविधियों का महान केंद्र बन गया था। 
  • वास्तुकला की इस शैली को शर्की शैली के रूप में भी जाना जाने लगा था और पठान शैली की भांति इसमें भी मीनारों के उपयोग से बचा गया था। 
  • यहां के भवनों की एक अनूठी विशेषता प्रार्थना हॉल के केंद्र और बगल के खण्डों में विशाल स्क्रीनों पर चित्रित मोटे और सशक्त अक्षरों का उपयोग है। 
  • उदाहरण – अटाला मस्जिद, आदि

बीजापुर शैली 

  • आदिल शाह के संरक्षण के अंतर्गत बीजापुर शैली या वास्तुकला की दक्कन शैली का विकास हुआ। 
  • उसने अनेक मस्जिदों, मकबरों और महलों का निर्माण करवाया था। 
  • इनका अनूठापन 3-मेहराबों वाले अग्रभाग और बल्बनुमा गुंबदों का उपयोग था। ये सभी लगभग गोलाकार और संकरी गर्दन वाले थे। 
  • उसने कार्निस का उपयोग भी प्रचलित किया। 
  • बीजापुर शैली की एक प्रमुख विशेषता इसकी छतों का व्यवहार था। छतें किसी भी स्पष्ट सहारे के बिना टिकीं थीं। 
  • लोहे के क्लैम्पों और गारे के मजबूत प्लास्टर का उपयोग भवनों को मजबूती देने के लिए किया गया था। 
  • दीवारें समृद्ध नक्काशियों से अलंकृत थीं।
  • उदाहरण – बीजापुर में गोल गुम्बद, आदिल शाह का मकबरा।

गोल गुम्बद 

  • बीजापुर, कर्नाटक में स्थित। 
  • बीजापुर के आदिलशाही राजवंश के सातवें सुल्तान मुहम्मद आदिलशाह (1626-56 ई.) का मकबरा है। 
  • स्वयं सुल्तान ने अपने जीवन काल में बनवाना शुरू किया था। इसका काम पूरा न होने के बावजूद यह एक शानदार इमारत है।
  • मकबरे में कई छोटी-बड़ी इमारतें हैं, जैसे- भीतर आने के लिए विशाल दरवाजा, एक नक्कारखाना, एक मस्जिद और एक सराय जो दीवारों से घिरे एक बड़े बाग के भीतर स्थित है।
  • सल्तनतकालीन चित्रकला के अवशेष सीरी एवं बेगमपुर के मध्य स्थित मखदूमवली मस्जिद से प्राप्त होते हैं।
  • नियामतनामा (पाकशास्त्र का एक ग्रन्थ) एवं मिफताह उल फुजाला (फारसी शब्दकोष) से लघुचित्र प्राप्त होते हैं।
  • नियामतनामा की खोज राबर्ट स्कैलटन ने की थी।
  • इस्लाम में जीवित प्राणियों के चित्र बनाना प्रतिबन्धित होने के कारण अधिकांश सल्तनत कालीन सुल्तानों ने चित्रकला में रूचि नहीं ली।
  • सल्तनत कालीन चित्रकला का प्रथम उल्लेख बैहाकी द्वारा लिखित गजनवियों के इतिहास में मिलता है।
  • फुतूह-उस-सलातीन के अनुसार इल्तुतमिश के समय में चीन के चित्रकार दिल्ली आये।
  • शम्स-ए-सिराज अफीफ ‘तारीख-ए-फिरोजशाही’ में सल्तनत कालीन चित्रकला का कुछ वर्णन देता है। उसके अनुसार फिरोज तुगलक ने यह आदेश दिया कि आरामगृहों में हिन्दू नरेशों के चित्र नहीं लगाने चाहिये।
  • मालवा, जौनपुर व बंगाल के सुल्तानों ने चित्रकला को संरक्षण दिया।
  • सल्तनत चित्रकला की चौर पंचाशिका, लौर चंदा और इंडो पर्शियन शैली की चित्रकला ने मुगल चित्रकला का मार्ग प्रशस्त किया।
  • सर्वप्रथम 1947 ई. में हरमन गोइट्स ने ‘दी जनरल ऑफ दी इण्डियन सोसाइटी ऑफ ओरिएन्टल आर्ट’ में अपने लेख में कहा कि दिल्ली सल्तनत के काल में चित्रकला का अस्तित्व था।
  • मध्यकालीन चित्रकला की प्रारम्भिक अवस्था जो एलोरा एवं अजन्ता के अवशेषों के साथ मिली हुई है, की विशेषताएँ है- पैनी रेखाएं, पैने कोण, रंगीन मॉडलिंग का अभाव तथा रंग बिरंगी सजावट की तरफ झुकाव ।

इस्लाम व संगीत

  • इस्लाम में संगीत वर्जित, फिर भी सुल्तानों ने संरक्षण दिया।
  • तुर्क अपने साथ रबाब और सारंगी लाए।

अमीर खुसरो

  • मध्यकालीन संगीत का संस्थापक
  • सितार (वीणा + तम्बूरा का समन्वय) एवं तबला (मृदंग में परिवर्तन) का श्रेय।
  • कव्वाली, कौल, तराना का प्रचलन।
  • 19 रागों (जैसे—तिलक, औनम, सनम आदि) को प्रचलित करने पर नायक उपाधि।

मुख्य संगीत ग्रंथ

  • संगीत रत्नाकर – शारंगदेव द्वारा (1210–47)।
    • टीकाएँ – कल्लीनाथ, केशव, सिंह भूपाल।
  • पहली बार हिन्दुस्तानी–कर्नाटक संगीत का विभाजन (14वीं सदी, गुजरात)।
  • संगीत सुधाकर – हरिपाल देव को समर्पित।
  • घुनियात-उल-मुन्या – मलिक शमसुद्दीन अबू राजा द्वारा; अर्थ–इच्छा का आनंद।
  • रागदर्पण (फिरोज तुगलक काल) का फारसी अनुवाद।
  • लज्जत-ए-सिकन्दरी – सिकंदर लोदी काल।
  • गुनयात-उल-मुन्या – 1375, प्रथम मुस्लिम द्वारा संगीत ग्रंथ।
  • मानसिंहमान कौतूहल (ध्रुपद का विकास)।
  • स्वरमेल कलानिधि – रमामात्य, विजयनगर।
  • अन्य ग्रंथ:
    • संगीत शिरोमणि इब्राहीम शाह शर्की काल
    • संगीतराज, संगीत मीमांसामहाराणा कुम्भा
    • रागतरंगिणी लोचन कवि
    • संगीत दर्पणदामोदर
    • संगीत चूड़ामणि जगदेकमल्ल
    • रागविबोध सोमदेव

सल्तनत काल के संगीतज्ञ एवं संरक्षण

  • कैकूबाद के समय दिल्ली संगीत से गूंज उठी (बरनी)।
  • जलालुद्दीन खिलजी – शाहचुंगी, मेहर अफरोज, नुसरत खातून (गायिकाएँ)।
  • अलाउद्दीन खिलजी – तुरमती खातून, वजीर खान, अमीर खुसरो, गोपाल नायक।
  • गयासुद्दीन तुगलक – संगीत का विरोध, साम्राज्य में प्रतिबंध; निजामुद्दीन औलिया पर मुकदमा।
  • मुहम्मद बिन तुगलक – संगीत प्रेमी; दरबार में 1200 गायक।
  • लोदी काल – संगीत लोकप्रिय; लज्जत-ए-सिकन्दरी की रचना।

शर्की सुल्तान एवं जौनपुर संगीत परंपरा

  • हुसैन शाह शर्की
    • उत्तरी भारत का पहला संगीत सम्मेलन।
    • गन्धर्व उपाधि धारण।
    • ख्याल को कलावंती ख्याल के रूप में प्रस्तुत।
    • नए राग – जौनपुर तोड़ी, सिन्धु भैरवी, सिन्दुरा, रसूली तोड़ी, मल्हार श्याम, गौर श्याम, भोपाल श्याम।
  • इब्राहीम शाह शर्कीसंगीत शिरोमणि ग्रंथ।
  • पीर बोधन – प्रसिद्ध सूफी संगीतज्ञ।
अन्य संगीतज्ञ
  • बाज बहादुर और रूपमती – मालवा, संगीत प्रेमी।
  • मानसिंह (ग्वालियर) – ध्रुपद शैली का उदय।
  • जैनुल अबीदीन (कश्मीर) – बुद्धिदत्त द्वारा संगीत ग्रंथ; मानसिंह ने दुर्लभ पुस्तकें भेजीं।
  • बहमनी व आदिलशाही – फिरोजशाह, महमूदशाह, युसूफ आदिलशाह संगीत संरक्षक।
  • इब्राहीम आदिलशाह II – ‘किताब-ए-नौरस’ (हिंदी गीत संग्रह)।
  • चाँद बीबी (अहमदनगर) – संगीतज्ञ।
संत, कवि व क्षेत्रीय योगदान
  • सूफियों ने गजल, कव्वाली लोकप्रिय की।
  • गजल – स्त्रीलिंग अरबी शब्द; पहला शेर मल्ल, अंतिम मक्त
  • चैतन्य महाप्रभु – कीर्तन शैली।
  • असम – संगीतकार शंकरदेव
  • बिहार – चिन्तामणि को “बिहारी बुलबुल”।
  • तिरहुत – विद्यापति, कजरी रचना।
  • बंगाल – चण्डीदास, राधा–कृष्ण गीत।

उर्दू शायरी

  • आधुनिक उर्दू शायरी के जन्मदाता – वली दकनी (शमसुद्दीन वली); ग्रंथ – दीवान
  • वली दकनी के गुरु – सादुल्ला गुलशन

मुगल वास्तुकला

  1. मुगल वास्तुकला बड़े बल्बनुमा गुंबदों , कोनों पर संकीर्ण मीनारों , विशाल हॉल , बड़े गुंबददार प्रवेशद्वार और नाजुक अलंकरण के लिए जानी जाती है ।
  2. इसने भारत में पूर्ववर्ती इस्लामी वास्तुकला के साथ-साथ ईरानी और मध्य एशियाई वास्तुकला और हिंदू वास्तुकला से भी प्रभाव ग्रहण किया।
  3. महलों और उद्यानों के अन्दर और आसपास बहता पानी मुगल वास्तुकला की एक विशेष विशेषता थी।

मुगलकाल स्थापत्य 

बाबर की स्थापत्य कला 

  • संस्कृति एवं सौंदर्य को प्रोत्साहन दिया।
  • रूपात्मक बगीचों का शौकीन था।
  • बगीचों के उदाहरण –
    • शालीमार बाग (लाहौर)
    • पिंजौर बाग (कालका)
    • आराम बाग (आगरा)
    • निशात बाग (कश्मीर)

नोट – बाबर ने आगरा में ज्यामितीय पद्धति में नूर ए बाग़ लगवाया, जिसे दिल ए आराम बाग़ कहते है।

मुगलकाल के उद्यान

उद्याननिर्माता
आराम बाग (आगरा)बाबर
शालीमार बाग एवं निशात बाग (श्रीनगर)जहाँगीर
शालीमार बाग (लाहौर)शाहजहाँ
चश्मा-ए-शाही बाग (श्रीनगर)शाहजहाँ
पिंजौर का बाग (हरियाणा)औरंगजेब
  • बाबर ने पानीपत में काबुली बाग़ की मस्जिद एवं रोहेलखंड के संभल की जामी मस्जिद बनवाई।
  • 1528 में बाबर के सेनापति मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद [अयोध्या] का निर्माण करवाया | (9 नवंम्बर 2019 सर्वोच्च न्यायालय का एतिहासिक फैसला राम मंदिर के पक्ष में रहा, विवादित 2.77 एकड़ राम लला ट्रस्ट तथा 5 एकड़ भूमि सुनी वक्फ बोर्ड को दी गई, 5 अगस्त 2020 राम मंदिर की नींव रखी गई।
  • इसके अलावा बाबर ने गज ए बाबरी नामक सड़क माप शुरू करवाया।

हुमायूँ कला स्थापत्य 

हुमायूँ का काल अव्यवस्थित रहा फिर भी उसने स्थापत्य में ध्यान दिया व्याख्या करे – 

  • हुमायूँ ने दिल्ली में इंद्रप्रस्थ के खंडहरों पर दीन पनाह नगर बसाया। जो की गरीबो की शरण स्थली थी।
  • दिल्ली के किले दीनपनाह के शेरमंडल नामक पुस्तकालय बनाया गया जिसमे पांडू लिपिया रखी गई।
हुमायूँ का मकबरा
  • फारसी स्थापत्य कला से प्रेरित
  • निर्माण – 1565ई. में हुमायूँ की विधवा बेगा बेगम (हाजी बेगम) ने शुरू करवाया। 
  • हुमायु के मकबरे को अकबर काल की प्रथम इमारत माना जाता है।
  • ताजमहल और जहाँगीर का मकबरा इसकी वास्तुकला से ही प्रेरित है। इसे ताजमहल का पूर्वगामी कहा जाता है।
  • दो (2) मंजिला इमारत है।
  • विशाल चबूतरे पर स्थित है।
  • लाल और बलुआ पत्थर से निर्मित
  • पहली बार गुलाबी बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर का प्रभावी रूप से प्रयोग किया गया।
  • फारसी वास्तुकार मिर्ख मिर्जा ग्यास के नेतृत्व में बनवाया गया यह भारत की पहली ईमारत जिसमे चार बाग़ शैली का इस्तेमाल हुआ है।
  • इसमें दोहरे गुम्बद का उपयोग हुआ है।

नोट –

  • हुमायूँ ने अपना राजदरबार सूफियाना ढंग से सुसज्जित किया था।
  • उनकी सौतेली बहन गुलबदन बेगम ने उनकी जीवनी हुमायूंनामा लिखी।

शेरशाह सूरी की स्थापत्य कला में महान उपलब्धिया उल्लेखित है

सासाराम का मकबरा – 
  • स्वयं शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित। 
  • चारो और पानी से गिरा हुआ मकबरा। 
  • चारों ओर बरामदा
  • दीवारें मेहराब युक्त बड़े विस्तृत गुम्बद द्वारा ढ़का हुआ हॉल।
  • यह बिहार के बलुआ पत्थर से निर्मित है। 
  • पुरातत्ववेता कनिंघम ने इसे ताजमहल से भी सुन्दर इमारत बताया।
मध्यकालीन ललित कला
  • शेरशाह ने रोहताश गढ़ नामक किला बनवाया था।
  • सूरी ने कनौज नगर को नष्ट करके शेरसूर  नगर बसाया।
  • दिल्ली का पुराना किला बनवाया।
  • किला-ए-कुहना मस्जिद – पुराने किले में स्थित है। जिसका निर्माण शेरशाह सूरी द्वारा ही करवाया गया था।
  • शेरशाह ने पटना नगर की स्थापना की थी।
  • अपने शासन को चिन्हित
  • करने के लिए, उसने अफगान शैली में पटना में शेर शाह सूरी मस्जिद का निर्माण कराया।
  • शेरशाह सूरी ने कुल 1700 सराए बनायी। इसका मुख्य कारण था डाक एवं सूचनाओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक दूर्त गति से पहुँचाना। इतिहासकार हेमचन्द्र कानूनगो ने इन सराय को साम्राज्य रुपी शरीर की धमनिया कहा है। 
  • सूरी ने व्यापारिक समृद्धि के लिए एवं सांस्कृतिक आदान प्रदान के लिए चार सड़कों का निर्माण करवाया –
  1. सड़क-ए-आजम- यह सड़क बंगाल के सोनार गांव से लेकर पंजाब में अटक तक जाती थी। लगभग 1500 मील लम्बी थी। अन्य नाम ग्रांड ट्रंक रोड।
  2. आगरा से बुरहानपुर (up )तक।
  3.  आगरा से जोधपुर होते हुए चितोडगढ़ तक।
  4. लाहौर से मुल्तान तक।

अकबर कला स्थापत्य 

अकबर कालीन स्थापत्य कला
  • कला एवं वास्तुकला में रुचि रखता था।
  • इस काल में हिन्दू-मुस्लिम कला का समन्वय देखा जा सकता है। (निर्माण +अलंकरण)
  • अकबर के शासनकाल के दौरान निर्माण कार्यों की प्रमुख विशेषता लाल बलुआ प्रस्तर का उपयोग था। उसने ‘ट्यूडर आर्क’ ‘चतुष्कोणीय मेहराब” के उपयोग का भी प्रचलन किया। 
आगरा का किला
  • निर्माण – 1565 -74 ई.
  • यह अकबर के शासनकाल के दौरान आरंभ किए गए पहले निर्माण कार्यों में से एक था। हालांकि, इस किले के अंदर अब भी वर्तमान अधिकांश संरचनाएं शाहजहां के शासनकाल के दौरान बनवाई गई थीं। 
  • कासिम खाँ की देखरेख में।
  • प्राचीर की दीवार में अवनत पत्थर का प्रयोग। (पहली बार)
  • विशेषताएँ
    • बुर्ज
    • विशाल सभागृह
    • महल [जहांगीरी महल (शाहजहां को यहीं पर नजरबंदी में डाला गया था)।]
    • मस्जिद, हमाम, बगीचे
    • दरबारियों और अभिजात वर्ग के लोगों के लिए घर।
मध्यकालीन ललित कला
दिल्ली दरवाजा
  • आगरा किले का पश्चिमी दरवाजा।
  • 1566 ई. में बनकर तैयार हुआ।
फतेहपुर सीकरी
  • आगरा से 23 किमी. दूर सीकरी नामक गाँव में स्थित।
  • लगभग सभी इमारतें ‘शहतीरी शिल्प पद्धति’ में निर्मित हैं।
  • इस नगर में जोधाबाई का महल, मरियम का महल, बीरबल का महल, पंचमहल, खास महल, जामा मस्जिद, बुलंद दरवाजा, शेख सलीम चिश्मी का मकबरा, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास आदि स्थित है।
  • शेख सलीम चिश्ती का मकबरा – 
    • निर्माण – 1581 ईस्वी में। 
    • इसमें सफेद संगमरमर की जाली का काम किया गया है। 
    • दीवारों पर अरबी शैली में कुरान की आयतें अंकित। 
    • यह एक शाही परिसर में स्थित है, जिसमें बुलंद दरवाजा और जामा मस्जिद भी हैं। 1606 में इसे जहांगीर द्वारा भी सजाया गया था।
मध्यकालीन ललित कला
पंचमहल
  • पाँच मंजिला इमारत है।
  • फतेहपुर सीकरी की सबसे ऊँची इमारत।
  • हिन्दू शैली पर आधारित।
  • यह खम्बों पर निर्मित है और फारसी बदगीर (Wind Catcher) की अवधारणा से प्रेरित है।
  • विशेषता – इमारत के शीर्ष के ऊपर रखा सर्वोच्च गुंबद वाला मण्डप इसके मध्य में नहीं है। (अपवाद)
मध्यकालीन ललित कला
दीवान-ए-खास
  • चौकोर कक्ष
  • तीन ओर से खुले द्वार
  • मध्य में नक्काशीदार स्तंभ जिसके शीर्ष पर पुष्पाकृति निर्मित है।
  • जालीदार खिड़कियाँ
  • पहली मंजिल पर सभागृह, जिसके चारों ओर आकर्षक छज्जा बना हुआ है।
तुर्कीबेगम का महल
  • अंदर-बाहर सुंदर नक्काशी
  • पशु-पक्षियों, वृक्षों सहित जंगल के दृश्यों को दर्शाया गया है।
  • इसमें काष्ठकला का अनुसरण किया गया है।
मध्यकालीन ललित कला
बुलंद दरवाजा
  • निर्माण – 1601 ई. में
  • गुजरात पर अकबर का विजयोत्सव मनाने के लिए लाल बलुआ पत्थर की 40 मीटर ऊंची भव्य सरंचना के रूप में निर्मित।
  • विश्व का सबसे बड़ा प्रवेश द्वार
  • आयताकार
  • किनारे के दोनों भाग तीन (3) मंजिला एवं तीनों मंजिलों पर खिड़कियाँ
  • मध्य भाग – मेहराब युक्त
  • दरवाजे की दीवार और स्तम्भों पर कुरान की आयतें उत्कीर्ण की गई हैं।
  • दरवाजे के तोरण पर ‘ईसा मसीह’ से संबंधित कुछ लाइनें लिखी हैं।
मध्यकालीन ललित कला
जोधाबाई का महल
  • जोधाबाई का महल या मरियम-उज-जमानी का महल (युग का मेरी) में घंटियों और फूलों के सुंदर हिन्दू भित्तिचित्र हैं।
  • पचीसी आंगन एक आंगन है जहाँ अकबर शतरंज खेला करता था।
  • हिरन मीनार का निर्माण अकबर के चहेते हाथी हिरण की याद में कराया गया था। यह यात्रियों के लिए एक प्रकाश स्तम्भ के रूप में भी कार्य करता था। इसे अनूठे रूप से डिजाइन किया गया और इसकी बाह्य दीवारों पर हाथी के दांत जैसे नुकीले कोने हैं।

जहाँगीर कालीन स्थापत्य कला

  • जहांगीर के शासनकाल के दौरान, वास्तुकला की अवनति हुई क्योंकि उसने चित्रकला और कला के अन्य रूपों पर अधिक ध्यान दिया। 
  • इसके शासनकाल में सफेद संगमरमर पर ‘पच्चीकारी’ प्रारंभ हुई।
  • इसके समय बनी सबसे पहली इमारत – ‘अकबर का मकबरा’
  • कश्मीर में शालीमार बाग जैसे अनेक उद्यानों का विकास करवाया था। 
  • लाहौर में मोती मस्जिद का भी निर्माण करवाया था।
  • नूरजँहा ने आगरा में अपने पिता मिर्ज़ा गियास बेग के लिए “ऐतमादुद्दोला” का मकबरा” बनवाया जो “पित्राड्यूरा शैली” में निर्मित प्रथम मकबरा है। मुगल काल के अन्य मकबरों से अपेक्षाकृत छोटा होने से, इसे कई बार श्रंगारदान भी कहा जाता है।
    • एतमादुद्दौला का मकबरा भारत का पहला ऐसा स्मारक है जिसका निर्माण पूरी तरह से संगमरमर से किया गया है।
    • निर्माण 1622-1628 के बीच कराया गया था। 
    • यह मकबरा यमुना नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है।
    • इसका गुंबद फारसी वास्तुकला शैली में बनाया गया है
मध्यकालीन ललित कला
  • जहाँगीर का मकबरा (शाहदरा) – लाहौर में शाहदरा नगर में रावी नदी के निकट स्थित जहांगीर मकबरा मुगल सम्राट जहांगीर को समर्पित है। इसे जहांगीर की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी नूरजहां ने बनवाया था। मकबरे की योजना स्वयं जहांगीर द्वारा की गई, लेकिन इसको पूरा नूरजहां ने करवाया ।
अकबर का मकबरा (सिंकदरा, आगरा)
  • चारों तरफ 1 मील के घेरे में फैला हुआ एक बगीचा, जिसके मध्य यह मकबरा बना हुआ है।
  • 1613 में निर्माण 
  • पाँच (5) मंजिला इमारत है।
  • सबसे ऊपर की मंजिल पर संगमरमर से बनी दीवार से घिरा एक आँगन है।
  • आँगन में फारसी भाषा में 36 दोहे लिखे हैं।
  • इस मकबरे को इस्लामी, हिन्दू, ईसाई और बौद्ध कलाओं का मिश्रित रूप माना जा सकता है।
मध्यकालीन ललित कला

शाहजहाँ कालीन स्थापत्य 

  • उनके शासनकाल को मुगल वास्तुकला के स्वर्ण युग के रूप में जाना जाता है। 1631 में, उन्होंने अपनी प्यारी पत्नी मुमताज महल की याद में ताज का निर्माण शुरू किया ।
  • मस्जिद और किले का निर्माण कार्य उनके शासनकाल में चरम पर था। 
  • शाहजहानाबाद- इसकी स्थापना 1639 में शाहजहानाबाद नामक एक चारदीवारी से घिरे शहर के रूप में की गई थी
  • शाहजहाँ (तत्कालीन मुगल सम्राट) ने मुगल साम्राज्य की राजधानी को आगरा से स्थानांतरित करने का फैसला किया था।
  • शाहजहाँ ने तख्त-ए-ताऊस(मयूर सिंहासन) का निर्माण कराया।
    • सिंहासन का प्रारुपकर्ता जेरोनियो-विरोनियो नामक एक यूरोपीय था। 
    • “तख्त-ए-ताउस” का शिल्पकार बेबादल खाँ। 
    • ‘तख्त-ए-ताऊस’ में विश्व का सर्वाधिक महंगा हीरा कोहिनूर लगा था।
  • इसने आगरा व लाहौर के किलों में अकबर द्वारा बनवाई गई इमारतों को तुड़वाकर नई इमारतों का निर्माण करवाया।
  • इसके द्वारा आगरा किले में कई इमारतें बनवाई गईं –
    • दीवान-ए-आम
    • दीवान-ए-खास
    • मच्छी भवन
    • शीश महल
    • अंगूरी बाग
    • मोती मस्जिद – संगमरमर से निर्मित है।
    • नगीना मस्जिद
स्थापत्य कला के अन्य उदाहरण
  • जामा मस्जिद (आगरा)
  • जामा मस्जिद (दिल्ली)
  • लाल किला (दिल्ली)
  • दीवान-ए-आम
  • दीवान-ए-खास
  • मोती महल
  • हीरा महल
  • रंग महल
  • नहर-ए-बहिश्त
ताज महल
  • ताजमहल में मध्यकालीन भारत की विकासात्मक वास्तु प्रक्रिया अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई। 
  • ताजमहल मुगल वास्तुकला का सर्वश्रेष्ठ नमूना है। यह भव्यता और ऐश्वर्य की प्रचुरता का प्रदर्शन करता है। 
  • इसके संरचनात्मक और अलंकरणात्मक, दोनों ही प्रकार के तत्वों में मुगलों द्वारा हिंदुस्तान लाए गए व यहां पहले से उपस्थित तथा शाहजहाँ व उसके वास्तुकारों द्वारा ताज के लिए परिकल्पित, सभी प्रकार के प्रभावों का संगम दिखाई देता है।
मध्यकालीन ललित कला
  • निर्माण अर्जुमन बानो बेगम या मुमताज महल की स्मृति में 
  • वास्तुकार – इंशा खाँ एवं उस्ताद अहमद लाहौरी
  • निर्माण कार्य लगभग 1632 में आरंभ हुआ। इस भव्य समाधि को 1638-39 तक पूरा करने के लिए भारत, फारस, ऑटोमन साम्राज्य और यूरोप से 20,000 से अधिक कारीगरों को नियोजित किया गया। सहायक भवन 1643 तक निर्मित हो गए, और सजावट का कार्य 1647 तक चलता रहा।
  • मुमताज का मकबरा
  • स्थापत्य विशेषताए 
    • इसमें अलंकरण के लिए सुलेखन, पित्रा दूरा के काम, अग्रदृश्य तकनीक, चार बाग शैली के उद्यान के उपयोग और परिसर में पानी के उपयोग सहित मुगल स्थापत्य कला की सभी विशेषताएं विद्यमान हैं। 
    • ताजमहल में जाली का काम बहुत सर्वश्रेष्ठ है।
    • संगमरमर पर नक्काशियां कम उभार वाली हैं।
    • चबूतरे पर बना वर्गाकार मकबरा
    • अष्टभुजाकार आकृति
    • मकबरे के ऊपर ‘दोहरा गुम्बद’
    • प्रवेश द्वार संकरा लेकिन ऊँचा।
    • ईंटों से बनी इमारत जिसे संगमरमर से ढ़का गया है। इसमें मकराना से लाया गया संगमरमर प्रयुक्त किया गया है।
    • चबूतरे के किनारों पर चार मीनारें खड़ी हैं जो ऊपर की ओर पतली होती जाती हैं। इन मीनारों की ऊंचाई 132 फुट है।
दिल्ली का लाल किला
  • निर्माण – 1639 ई. में शुरुआत
  • आकार – अनियमित अष्टभुजाकार
  • दीवारें तथा प्रवेश द्वार लाल बलुआ पत्थर से निर्मित हैं।
  • दीवान-ए-आम – ‘प्येत्रा द्यूरा’ पद्धति में बनाया गया है। यह संगमरमर से निर्मित तीन तरफ से खुली इमारत है। यहीं पर शाहजहां का तख्त-ए-ताउस (मयूर सिंहासन) रखा जाता था।
  • दीवान-ए-खास –
    • ऊँचा अलंकृत स्तंभों वाला सभागृह। 
    • यह भी संगमरमर से निर्मित इमारत है।
    • इसकी दीवार पर अमीर खुसरो का एक दोहा लिखा है जो इन इमारतों को उपयुक्त श्रद्धा प्रदान करता है-
    • अगर फिरदौस बररुये जमी अस्त
    • हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त।।
  • रंग महल :- यह शाहजहां का अपना महल था। यह संगमरमर से निर्मित इमारत थी।
  • शीश महल :- यह शाही परिवार का स्नानागार था।
  • दिल्ली की जामा मस्जिद –  लाल किले के बाहर 1644 में इसका निर्माण प्रारंभ, हुआ और 1658 में बनकर यह तैयार हो गई। यह लाल पत्थर की इमारत है। इसके ऊपर संगमरमर के तीन गुम्बद बने हैं।
  • निर्माण की तारीख अंकित की गई है।
  • खर्च का अंकन भी किया गया है।
मध्यकालीन ललित कला

औरंगज़ेब कालीन स्थापत्य कला

  • औरंगजेब के शासनकाल के दौरान, मुगल वास्तुकला की अवनति हुई। कट्टरतावादी होने के नाते, उसने कला और स्थापत्य के विकास में कोई सक्रिय रुचि नहीं ली।

फिर भी कई कार्य सम्पन्न हुए – 

  • मोती मस्जिद (दिल्ली लाल किला में) – 1662 में निर्माण। संगमरमर से निर्मित ईमारत। 
  • राबिया-उद्-दुरानी [औरंगजेब की पत्नी] का मकबरा –
    • औरंगाबाद
    • निर्माण 1678 में राजकुमार आज़म शाह (औरंगज़ेब के बेटे) द्वारा किया गया था।
    • इसको बीबी का मकबरा और दक्षिण का ताजमहल भी कहा जाता है।
  • बादशाही मस्जिद (लाहौर) – 1672 में निर्माण, मस्जिद में 8 मीनारों का निर्माण।
  • औरंगजेब का मकबरा दौलताबाद (खुल्दाबाद) में स्थित है
  • इसके अतिरिक्त मथुरा और वाराणसी में भी इसने मस्जिद बनवाई जो लाल पत्थर से निर्मित है।

प्रमुख मुगलकालीन इमारतें

इमारतवास्तुकार
ताजमहलउस्ताद ईसा खाँ एवं उस्ताद अहमद लाहौरी
दिल्ली का लाल किलाहमीद एवं अहमद लाहौरी
फतेहपुर सीकरीबहाउद्दीन
हुमायूँ का मकबरामिर्जा गयास
आगरा का किलाकासिम खाँ

मुगल काल के दौरान, राजस्थान और पंजाब क्षेत्र में वास्तुकला की दो शैलियां विकसित हुईं – 

सिक्ख शैली

  • वास्तुकला की सिक्ख शैली का विकास आधुनिक पंजाब क्षेत्र में हुआ। यह वास्तुकला की मुगल शैली से काफी प्रभावित थी। 
  • सिक्ख शैली की कुछ विशेषताएं इस प्रकार हैं:
    • निर्माण के शीर्ष पर कई छतरियों या कियोस्क का उपयोग।
    • उथले कार्निस का उपयोग।
    • भवनों के गुंबद लंबे धारीदार थे। गुंबदों पर अलंकरण और सहारे के लिए सामान्यतः पीतल और तांबे की परत चढ़ाई गई थी।
    • मेहराबों का अलंकरण अनेकानेक पत्रकों का उपयोग करके किया गया था।
      • उदाहरण –  हरमंदिर साहिब या स्वर्ण मंदिर। इसका निर्माण 1585 में शुरू हुआ और 1604 में इसे अर्जुन देव द्वारा पूरा करवाया गया था।
मध्यकालीन ललित कला

राजपूत शैली

  • इस अवधि के राजपूत निर्माण भी मुगल शैली से प्रभावित थे, लेकिन निर्माण के अपने आकार और क्षेत्र में अद्वितीय थे।
  • राजपूतों ने सामान्यतः भव्य महलों और किलों का निर्माण करवाया। 
  • राजपूत स्थापत्य कला की कुछ अनूठी विशेषताएं – 
    • राजपूतों ने लटकती हुई बालकनी की अवधारणा प्रचलित की। इन्हें सभी आकृतियों और आकारों में बनवाया गया था।
    • कार्निस को मेहराब के आकार में इस प्रकार बनवाया गया था कि छाया धनुष का आकार ग्रहण कर लेती थी

मध्यकालीन चित्रकला

लघु चित्रकला

  • “Miniature” लैटिन शब्द ‘मिनियम’ से लिया गया है, सामान्यतः “minimum” के अर्थ में थोड़ी असंगति पैदा होती है, जिसका अर्थ आकार में छोटा होता है। 
  • भारतीय उप-महाद्वीप में इन लघु चित्रों की लंबी परंपरा रही है और साथ ही कई शैलियों का भी विकास हुआ है जिनमें संरचना और अनुपात की दृष्टि से अंतर है। लघुचित्र छोटे और विस्तृत विवरण देने वाले होते थे।
  • लघु चित्रकला की तकनीकें
  • लघु चित्र बनाने की कई पूर्व शर्तें है, जिन्हें लघु चित्र बनाने के लिए पूरा करना आवश्यक है।
    • चित्र 25 वर्ग इंच से बड़े नहीं होने चाहिए।
    • चित्र का विषय वास्तविक आकार के 1/6 से अधिक पर नहीं चित्रित किया जाना चाहिए।
  • अधिकांश भारतीय लघु चित्रों में, मानव आकृति एकपृष्ठीय रूपरेखा के साथ दिखाई देती है। सामान्यतः बाहर की ओर उभरी आँखें, नुकीली नाक और पतली कमर है। 
  • राजस्थानी लघु चित्रों में पात्रों की त्वचा का रंग भूरा जबकि मुगल चित्रों में यह सामान्यतः उजला है। 
  • इसके अतिरिक्त, भगवान कृष्ण की भांति दिव्य प्राणियों का रंग नीला है। 
  • महिला आकृतियों के लंबे बाल हैं और उनकी आंखों और बालों का रंग सामान्यतः काला है। 
  • पुरुष सामान्यतः पारंपरिक कपड़े पहने हुए हैं और उनके सिर पर पगड़ी है।
  • प्रारंभिक लघुचित्र
    • लघु चित्रों को बहुधा कागज, ताड़ के पत्तों और कपड़ों सहित नष्टप्राय सामग्रियों पर, पुस्तकों या एलबमों के लिए चित्रित किया जाता था। 
    • लगभग विशाल भित्ति चित्रों की प्रतिक्रिया स्वरूप विकसित, लघु चित्रकला का विकास 8वीं और 12वीं शताब्दी के बीच हुआ। इस प्रकार की चित्रकला के लिए पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों को श्रेय दिया जा सकता है।
    • दो प्रमुख प्रकार हैं-
      • कला की पाल शैली
      • कला की अपभ्रंश शैली

दिल्ली सल्तनत में लघु चित्रकला

  • बारहवीं शताब्दी के अंत में मध्य एशिया के सल्तनत राजवंशों के शासन में आने के बाद, स्पष्टतः फ़ारसी, तुर्क और अफ़गान के प्रभाव को चित्रों में देखा जा सकता है।
  • मध्य एशियाई कलाकारों के साथ स्थानीय कलाकारों द्वारा चित्रों के निर्माण से, स्वदेशी शैलियों और फ़ारसी शैलियों के परस्पर मिश्रण से एक नई शैली का उदय हुआ, जिसे सल्तनत चित्रकला के रूप में जाना जाता है।
  • इनमें सचित्र पांडुलिपियों को वरीयता दी गई। 
  • नासिर शाह खिलजी (1500-10 ई.) के शासन काल के दौरान मांडू में चित्रित, निमतनामा (पकवानों की किताब) इस शैली का सर्वोत्तम उदाहरण है।
  • नोट – यह व्यंजनों की पुस्तक है, जिसके एक खंड में शिकार का भी उल्लेख किया गया है। इसके साथ ही साथ दवाओं, सौंदर्य प्रसाधन, इत्र के निर्माण और उनके उपयोग के दिशानिर्देश भी दिए गए हैं।
  • इसके अतिरिक्त लोदी खुलादर नामक एक और शैली भी इस अवधि में प्रचलित थी। इसका दिल्ली और जौनपुर के बीच कई सल्तनत प्रधान्य क्षेत्रों में अनुसरण किया गया। यह सल्तनत सूत्र का भी आधार बनी। 
  • मध्ययुगीन परिदृश्य में तीन प्रमुख शैलियों मुगल, राजपूत और बाद में दक्कनी; का उदय हुआ। इन्होंने सल्तनतकालीन परम्परा को ग्रहण किया लेकिन अपनी अलग पहचान का विकास भी किया।

मुगल चित्रकला

  • सोलहवीं शताब्दी से उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य विकसित मुग़ल चित्रकला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हुई। यह परिष्कृत तकनीक और विषयवस्तु की विविधता के लिए जानी जाती है। 
  • इस शैली ने कई परवर्ती चित्रकला शैलियों व भारतीय चित्रकला शैलियों को प्रेरित किया जिसके कारण भारतीय चित्रकला में मुगल चित्रकला शैली का एक विशिष्ट स्थान है।
  • मुग़ल शासकों ने सुलेखन, वास्तुकला, और पुस्तक चित्रण जैसे कलारूपों को संरक्षण और प्रोत्साहन दिया। 

मुगल चित्रकला पर विभिन्न प्रभाव

  • मुगल चित्रकला में देशीय विषयवस्तु और चित्रकला शैली, फ़ारसी शैली व उसके बाद यूरोपीय शैली का सम्मिश्रण रहा। 
  • मुगल चित्रकला शैली अपने चरम पर इस्लामिक, भारतीय व यूरोपीय दृश्य संस्कृति और सौंदर्य के अति परिष्कृत मिश्रित रूप को प्रस्तुत करती है। 

इस काल में चित्रकारी के प्रमुख विषय –

  • शिकार
  • युद्ध विजय
  • राज दरबार
  • विवाह समारोह आदि।

प्रारंभिक मुगल चित्रकला

बाबर 
  • उसने ईरान व मध्य एशिया की संस्कृति और सौंदर्यात्मक संवेदनशीलता का सम्मिश्रण किया था। 
  • वह कला प्रेमी और विद्वान थे, उनकी आत्मकथा बाबरनामा में उनके कलात्मक रुचियों का उल्लेख है। 
  • छवि चित्रण में बाबर की गहरी रुचि थी।
  • चित्रकार 
    • बिहज़ाद (पूर्व का राफेल) – ईरान का चित्रकार
      • इसके चित्र सुंदर, पर चेहरों का उत्तम चित्रण नहीं
    • शाह मुजफ़्फ़र (केशसज्जा का आकर्षक चित्रण करने वाला उत्कृष्ट चित्रकार)
हुमायूँ 
  • निर्वासन के दौरान शाह तहमास के दरबार में फ़ारसी लघु चित्रकला से परिचय।
  • मीर सैयद अली व अब्द उस समद को मुगल दरबार में आमंत्रित कर शाही चित्रशाला स्थापित करवाई। दोनों चित्रकार छवि चित्रण के लिए जाने जाते।
  • उसने ‘निगार खाना’ (चित्रों की कार्यशाला) स्थापित किया, जो उसके पुस्तकालय का हिस्सा था।    
  • ‘हम्ज़ानामा’ चित्रण शुरू करवाया, जिसे अकबर ने पूरा कराया।
  • नोट – प्रिंसेज ऑफ़ द हाउस ऑफ़ तैमूर (1545-50) 
    • प्रसिद्ध चित्र “प्रिंसेज ऑफ़ द हाउस ऑफ़ तैमूर” (1545-50), अब्द उस समद द्वारा जलीय रंगों से निर्मित। 
अकबर 
  • इस काल में पांडुलिपियों के अनुवाद और चित्रण की बड़ी परियोजनाएँ पूरी हुईं।
  • अकबरकालीन चित्रकार – दसवंत, बसावन, लालमुकुन्द, गोवर्धन, मिस्किन, केशव, महेश, माधव, जगन्नाथ, खेमकरण तारा, हरिवंश
  • अकबरकालीन मुगल चित्रकला में  विषयवस्तु –  राजनैतिक विजय, दरबार के मौलिक दृश्य, धर्म निरपेक्ष ग्रंथ, , महत्वपूर्ण व्यक्तियों की छवियों के साथ-साथ हिंदू पौराणिक, फ़ारसी व इस्लामिक विषय।
  • नोट – हम्जानामा
    • आरंभ: हुमायूँ ने मीर सैयद अली व अब्द उस समद को सौंपा, अकबर ने इसे पूरा कराया।
    • विषयवस्तु: पैगंबर मोहम्मद के चाचा हम्ज़ा के वीरतापूर्ण कार्यों का चित्रण।
    • पूरा नाम: दास्ताने अमीर हमजा
    • 1200 चित्र, 14 खंडों में विभाजित।
    • चित्र बड़े आकार के, सतह कागज़ पर चिपकाए गए कपड़े की
    • गाउच (अपारदर्शी रंग) तकनीक व सफ़वी शैली का प्रयोग।
    • 1400 पन्नों के चित्रण में 15 वर्ष लगे
  • अकबर ने संस्कृत ग्रंथों का फ़ारसी में अनुवाद और चित्रण करवाया।
    • महाभारत → रज़्मनामा (1589), दसवंत के निरीक्षण में 169 चित्र, मोहम्मद शरीफ द्वारा पर्यवेक्षित।
    • रामायण का भी अनुवाद व चित्रण हुआ।
    • अकबरनामा: अकबर की व्यक्तिगत व राजनैतिक ज़िंदगी पर आधारित असाधारण पांडुलिपि।
  • चित्रकला में नवाचार:
    • फॉरशॉर्टनिंग का उपयोग (निकट और दूर की वस्तुओं को परिप्रेक्ष्य में दिखाने की तकनीक, यूरोपीय प्रभाव)।
    • यूरोपवासियों के संपर्क से चित्रों में यथार्थवाद का झुकाव बढ़ा।
    • “मेडोना एंड चाइल्ड” (1580) – प्रारंभिक मुगल शैली का महत्वपूर्ण चित्र (मनोहर, बसवन द्वारा)।
  • अकबर कालीन चित्रकला में
    • चित्रकला पर ईरानी प्रभाव में कमी 
    • राजपूत चित्रकला का प्रभाव – लाल एवं गहरा फिरोजा रंग का प्रभाव। 
  • अकबर कालीन चित्रकला – नीला लाल पीला हरा गुलाबी एवं सिंदूरी रंग का प्रयोग। 
जहांगीर 
  • स्वयं चित्रकला का परखी, चित्रकला का स्वर्ण काल 
  • प्रमुख चित्रकार – फारूख बेग, दौलत, मनोहर, मुराद, बिसन दास, मंसूर तथा अबुल हसन
  • अबुल हसन और मनोहर द्वारा 1620 में चित्रित जहाँगीरनामा (कई संग्रहों में बिखरा हुआ) का चित्र ‘दरबार में जहाँगीर’ एक विलक्षण चित्र है। 
  • अबुल हसन 
    • ‘नादिर अल ज़मान’ खिताब से नवाज़ा गया था। 
    • प्रसिद्ध चित्र – जहाँगीर का स्वप्न (1618-22)
    • रेतघड़ी (आवरग्लास) पर विराजमान जहाँगीर का चित्र, दरबारी चित्रकार बिचित्र द्वारा चित्रित किया गया। यह चित्र 1625 में बनाया गया था।
  • उस्ताद मसूर 
    • नादिर उल असन 
    • दुर्लभ पशु, विरले पक्षियों, अनोखे पुष्पों के चित्रण हेतु प्रसिद्ध 
    • कृति – साइबेरिया सारस एवं बंगाल का एक पुष्प
  • बिसन दास को फारस भेजकर शाह और अमीरों के यथार्थ चित्र बनवाए।
  • हैरत का अगा रजा / अका रिज़ा और उसके पुत्र अबुल हसन को नियुक्त किया। अगा रजा नेतृत्व में आगरा में चित्रशाला की स्थापना की।
  • चित्रण की प्राथमिकता बदली:
    • हस्तलिखित ग्रंथों की बजाय छवि चित्र व प्राकृतिक दृश्यों को महत्व।
    • युद्ध व कहानियों से हटकर दरबार दृश्य, शाही छवियाँ, वनस्पति व जीव-जंतु प्रमुख विषय बने।
    • मंसूर ने मानव व पशु चित्रण में ख्याति अर्जित की।
  • उसके संरक्षण में मुगल चित्रकला शैली ने उच्चतम दर्जे की वास्तविकता व वैज्ञानिक शुद्धता हासिल की। 
  • मुरक्का चित्र (एल्बम में संग्रहित एकल चित्र) लोकप्रिय हुए, जिनके हाशिए सोने मिश्रित रंगों से सजाए जाते थे।
  • यूरोपीय प्रभाव से यथार्थवाद व जीवंतता बढ़ी, साथ ही ईसाई धार्मिक उत्सवों के चित्र बनाए गए।
  • पर्सी ब्राउन के अनुसार, जहाँगीर के काल में मुगल चित्रकला की आत्मा लुप्त, लेकिन भारतीय पद्धति का विकास व यूरोपीय प्रभाव जारी रहा।
शाहजहाँ
  • यथार्थवाद से हटकर आदर्शीकरण और शैलीकरण पर जोर
  • शाही छवियाँ सम्राट के वैभव, हीरे-जवाहरात और समृद्धि को दर्शाती थीं।
  • प्रमुख चित्रकार: गोवर्धन, चतुर, चिंतारमण, अनूप, बालचंद्र।
  • महत्वपूर्ण कृति: पदशाहनामा – भारतीय लघु चित्रकला की उत्कृष्ट उपलब्धि।
  • विशेषताएँ:
    • शाही, ऐतिहासिक व रहस्यवादी विषयों को सम्मोहक रंगों व जटिल संयोजनों में चित्रित किया गया।
    • प्रसिद्ध यूरोपीय चित्रकार रेम्ब्रां मुगल चित्रकला की बारीकियों व रेखाओं से प्रभावित हुआ, जिससे मुगल चित्रकला को वैश्विक पहचान मिली।
दारा शिकोह 
  • सूफी रहस्यवाद के लिए दारा की प्रतिबद्धता और वेदांतिक दर्शन में उसकी गहरी रुचि उल्लेखनीय है। 
  • प्रसिद्ध चित्र – ‘दारा शिकोह विद सेजेज इन गार्डेन’ 1635 
  • वह कवि व कला पारखी था। 
  • उसने अपनी पत्नी को भेंट करने के लिए चित्रों का एक विशेष एल्बम बनवाया।
आलमगीर औरंगज़ेब 
  • औरंगज़ेब ने मुगल चित्रशाला में चित्रों को निर्मित करने के काम को आगे नहीं बढ़ाया।
  • हालाँकि शाही चित्रशाला को तुरंत बंद नहीं किया गया और सुंदर चित्रों का चित्रण जारी रहा।

उत्तरकालीन मुगल चित्रकला

  • कला के प्रोत्साहन और संरक्षण में सतत गिरावट के कारण अति कुशल कलाकारों ने मुगल कार्यशालाओं को छोड़ दिया।
  • इन कलाकारों का प्रांतीय मुगल शासकों ने स्वागत किया। 
  • ये राजा मुगल राजवंश की अनुकृति पर अपने राजकुल के गौरव तथा दरबार की कार्यवाही या घटनाओं को चित्रों में प्रदर्शित करना चाहते थे।
  • हालाँकि मोहम्मद शाह रंगीला, शाह आलम द्वितीय और बहादुर शाह ज़फर के समय में कुछ उत्कृष्ट चित्र बने, लेकिन वे चित्र मुगल लघु चित्रकला शैली की बुझती शमा की आखिरी लौ के समान थे। 
  • 1838 में ‘बहादुर शाह ज़फर’ शीर्षक का चित्र बनाया गया। यह चित्र अंग्रेज़ों द्वारा उन्हें बर्मा से देश निकाला दिए जाने के करीब दो दशक पहले बनाया गया था। 
  • बहादुर शाह ज़फर अंतिम मुगल बादशाह था जो कवि, विद्वान और कला पारखी था।

अन्ततोगत्वा मुगल लघु चित्रकला शैली अन्य प्रांतीय चित्रकला शैली और कंपनी चित्रकला शैली में विलीन हो गई।

मुगल चित्रकला के रंग और तकनीक

  • मुगल चित्रकला में रंग और तकनीक विशेष रूप से उत्कृष्ट थे। ये चित्र प्रायः हस्तनिर्मित कागज पर बनाए जाते थे।
  • रंग अपारदर्शी और प्राकृतिक स्रोतों से बनाए जाते थे, जैसे हिंगुल से सिंदूरी, लाजवर्त से नीला, हरताल से चमकीला पीला, सीप से सफेद और लकड़ी के कोयले से गहरा काला रंग। रंगों को अधिक मूल्यवान बनाने के लिए सोने और चांदी का चूरा मिलाया जाता था।
  • चित्रकारी में गिलहरी या बिल्ली के बच्चों के बालों से बनी बारीक तूलिकाओं का उपयोग होता था। 
  • चित्र बनाने की प्रक्रिया सामूहिक होती थी, जिसमें एक कलाकार खाका बनाता, दूसरा रंग तैयार करता और अन्य रंग भरने और बारीकियों को जोड़ने का काम करते थे। चित्र के पूरा होने पर एगेट पत्थर से उसे घिसकर पालिश किया जाता था ताकि रंग पक्के और चमकदार दिखें।

चित्रकला की पहाड़ी शैलियां

  • चित्रकला की इस शैली का विकास मुगल आधिपत्य की छत्रछाया के अधीन आने वाले उप-हिमालयी राज्यों में हुआ। 
  • छोटे राज्यों में फल-फूल रही कई शैलियां थीं जो ‘पहाड़ी’ चित्रकला के अंतर्गत आती हैं। इनमें जम्मू से लेकर अल्मोड़ा तक फैली लगभग 22 रियासतों के दरबारों की चित्रशालाएं सम्मिलित थीं। 
  • इसलिए, पहाड़ी चित्रकला को दो समूहों में बांटा जा सकता है:
    • जम्मू या डोगरा शैलीः उत्तरी श्रृंखला
    • बशौली एवं कांगड़ा शैलीः दक्षिणी श्रृंखला
  • चित्रित विषय पौराणिक कथाओं से लेकर साहित्य तक से सम्बन्धित थे जिसमें नई तकनीकों का प्रयोग किया गया। 
  • एक सामान्य पहाड़ी चित्रकला शैली कैनवास में कई आकृतियां लाती थी और ये सभी गतिशीलता से भरी होती थीं। 
  • प्रत्येक आकृति संरचना, रंग और रंजकता में भिन्न थी। 
  • इस शैली की दो सबसे महान चित्रकार ‘नैनसुख’ और ‘मनकू’ थे।

बशौली शैली

  • 17वीं सदी में पहाड़ी शैली में बनाए गए चित्रों को बशौली शैली कहा जाता है। 
  • यह प्रारंभिक चरण था और इसकी विशेषता कमल की पंखुड़ियों सदृश बड़ी आंखें तथा घटते चले जाने वाले बालों की रेखा के साथ भाव अभिव्यक्ति करने वाला अर्थपूर्ण चेहरा था। इन चित्रों में बहुतायत में प्राथमिक रंगों अर्थात् लाल, पीले और हरे रंग प्रयोग किया गया था। 
  • इस शैली में कपड़ों पर चित्रण की मुगल तकनीक का प्रयोग किया जाता था, लेकिन इसने अपनी स्वयं की शैली और तकनीक का विकास किया।
  • इस शैली के पहले संरक्षक राजा कृपाल सिंह थे। उन्होंने भानुदत्त की रसमंजरी, गीत-गोविंद और रामायण के चित्रों का चित्रण करने का आदेश दिया। 
  • इस शैली का सबसे प्रसिद्ध चित्रकार देवी दास था। वह राधा कृष्ण और राजाओं के छविचित्र का उनकी पोशाक में और सफेद कपड़ों में अपने चित्रण के लिए प्रसिद्ध था। 
  • रंगों की विषमता इस शैली से जुड़ी हुई है और उन्होंने शैलीगत ढंग से मालवा चित्रकला से भी उधार लिया।

कांगड़ा शैली

  • मुगल साम्राज्य के पतन के बाद कई कलाकार कांगड़ा क्षेत्र में चले गए क्योंकि 1774 में उन्हें राजा गोवर्धन सिंह से संरक्षण मिला था। इससे चित्रकला की गुलेर कांगड़ा शैली का जन्म हुआ। 
  • इसका सबसे पहले विकास गुलेर में हुआ तत्पश्चात् यह कांगड़ा में आयी। 
  • यह शैली राजा संसार चंद के संरक्षण में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गयी। उसकी चित्रकला की विशेषता संवेदनशीलता और बुद्धिमत्ता थी जिसका अन्य शैलियों में अभाव था।
  • सबसे लोकप्रिय विषय – गीत गोविंद, भागवत पुराण, बिहारीलाल की सतसई और नल-दमयंती थे। कृष्ण की रासलीला के दृश्य बहुत प्रमुख थे। चित्रों का दूसरा बहुत ही प्रसिद्ध समूह ‘बारह महीने’ अथवा ‘बारह मासा’ का है जिसमें कलाकार ने मनुष्य की भावनाओं पर बारह महीनों के प्रभाव को आगे लाने का प्रयास किया है। 
  • यह भावपूर्ण शैली 19वीं सदी तक लोकप्रिय बनी रही। 
  • कांगड़ा शैली कुल्लू, चंबा और मंडी के दरबार में विकसित होने वाली अन्य चित्रशालाओं की जनक शैली बन गयी।

रागमाला चित्रकला

  • रागमाला चित्रकला विभिन्न भारतीय संगीत रागों का चित्रण करने वाली रागमाला या ‘रागों की माला’ पर आधारित मध्यकालीन भारत की दृष्टांत योग्य चित्रकला की श्रृंखला है। 
  • रागमाला चित्र 16वीं और 17वीं ‘शताब्दी में आरंभ होने वाली भारतीय चित्रकला की अधिकांश शैलियों में बनाए गए थे और आज पहाड़ी रागमाला, राजस्थान या राजपूत रागमाला, दक्कनी रागमाला और मुगल रागमाला के रूप में तद्नुसार इनका नाम लिया जाता है।
  • इन चित्रों में प्रत्येक राग का एक विशेष भाव में नायक और नायिका (हीरो और हिरोइन) की कहानी का वर्णन करने वाले रंग से वैयक्तिकरण किया गया है। यह ऋतु तथा दिन और रात के उस समय का भी वर्णन करता है जिसमें कोई विशेष राग गाया जाता है। 
  • रागमाला में उपस्थित छह प्रमुख राग हैं- राग भैरव, दीपक, श्री, माल्कौस, मेघ और हिंडोल।

दक्कनी चित्रकला शैली

  • दक्कनी चित्रकला के इतिहास को सोलहवीं शताब्दी के अंत से सत्रहवीं दक्कनी शताब्दी के अंत तक देखा जा सकता है- जब मुगलों ने दक्कन पर आधिपत्य स्थापित किया। 
  • दक्कनी चित्रकला शैली को लंबे समय तक ‘इंडो पर्शियन शैली’ समझा जाता था। इसके उद्गम का आधार मध्य पूर्वी सफ़ाविद, फ़ारसी, तुर्की चित्रकला शैली या मुगल चित्रकला शैली को माना जाता है।
  • इस चित्रकला शैली को दक्कन के कई राजाओं का संरक्षण प्राप्त हुआ जिनकी प्रखर राजनैतिक व सांस्कृतिक दृष्टि थी। 
  • इन राजाओं ने चित्रकारों को बहाल किया, संरक्षण प्रदान किया और उनकी कलात्मक संवेदनशीलता में वृद्धि करते हुए अपनी शासकीय आवश्यकताओं के अनुरूप चित्रण करवाया।
  • इस शैली के चित्रण उत्कृष्ट हू-ब-हू चित्र के लिए मशहूर थे।
  • बीजापुर, गोलकुंडा और अहमदनगर के शासकों ने चित्रकला की अति परिष्कृत विशिष्ट शैली को विकसित किया।

अहमदनगर चित्रकला शैली

  • दक्कनी चित्रकला के शुरुआती उदाहरण अहमदनगर के हुसैन निज़ामशाह प्रथम (1553-65) के कविता संग्रह से मिलते हैं। 
  • चित्रों में दृश्यों, उज्ज्वल आकाश और विशाल क्षितिज में फारसी प्रभाव देखा जा सकता है।
  • दक्कन की रागमाला चित्रकला श्रृंखला के चित्रों में नारी चित्रण में वेशभूषा का चित्रण काफी रोचक है। इसमें सोलहवीं शताब्दी के दक्कनी चित्रकला का विकास दिखाई देता है। 
  • नारी चित्रण में बालों का जूड़ा लिपाक्षी भित्ति चित्रों की तरह गर्दन पर टिका हुआ है। 
  • बालों को बनाने की शैली के अलावा अन्य सभी विशेषताओं में उत्तर भारतीय या फ़ारसी शैली के चिह्न मिलते हैं।
  • पुरुषों की वेशभूषा भी निश्चित रूप में उत्तर भारतीय है। लंबी नुकीली चाक वाला जामा प्राक् अकबरी लघु चित्रकारी में काफी दिखाई देता है। 

बीजापुर चित्रकला शैली

  • सोलहवीं शताब्दी के बीजापुर के चित्रों में 1570 ई. का चित्रित विश्वकोश नुजूम-अल-उलूम महत्वपूर्ण है। इसके 876 लघु चित्रकारियों में कई चित्र पात्र (बरतन), अस्त्र-शस्त्र और नक्षत्र के हैं। इसमें नारियों का चित्रण रागमाला चित्रकला की तरह लंबी और पतली तथा दक्षिण भारतीय वेशभूषा में हुआ है। 
  • बीजापुर चित्रकला शैली को अली आदिलशाह प्रथम (1558-80) और उसके अधिकारी इब्राहिम द्वितीय (1580-1627) ने संरक्षण दिया। इब्राहिम द्वितीय भारतीय संगीत के मर्मज्ञ थे और उन्होंने भारतीय संगीत पर नौरस-नामा पुस्तक लिखी। यह नुजूम-अल-उलूम के भी लेखक थे। 
  • रागमाला के आध्यात्मिक व भावपक्ष (अंतरात्मा) से संबंधित चित्र भारतीय प्रभाव में हैं, जिनमें लेपाक्षी शैली की झलक दिखाई देती है। ये आदिल शाह के दरबार के सुरुचिपूर्ण चित्रों में समृद्ध तीखे रंग, वेगपूर्ण रेखाएँ और सहज संयोजन सौंदर्यबोध का अनुकरण करते हैं।
  • चित्रकला की एक अन्य विषयवस्तु योगिनी है। योगिनी अर्थात् योग में विश्वास करने वाली, शारीरिक व मानसिक रूप से अनुशासित जीवन जीने वाली, आध्यात्मिकता व बौद्धिकता की खोज में अंततः सब कुछ का त्याग कर असाधारण जीवन जीने वाली। इसे एक अज्ञात चित्रकार ने बनाया है। 

गोलकुंडा चित्रकला शैली

  • गोलकुंडा 1512 से एक स्वतंत्र राज्य था और सोलहवीं शताब्दी के अंत तक वह दक्कन राजवंश का सबसे समृद्ध राज्य था।
  • सत्रहवीं शताब्दी में जब डच व्यापारियों द्वारा सुल्तानों की छवियों को यूरोप लेकर जाया गया तब गोलकुंडा कला प्रसिद्ध हुई। ये संभवतः बाज़ार के लिए किया गया था और राजदरबारी चित्रकला के लिए संदर्भित थे। 
  • 1635-50 के बीच में, गोलकुंडा चित्रकला से पूर्व ये पट आठ फ़िट ऊँचे और दीवार पर लटकन के तौर पर इस्तेमाल किए गए। ये चित्रण सांकेतिक डिज़ाइन से आच्छादित हैं, जिसमें आमतौर पर वास्तु संरचनाएँ विभिन्न आकृतियों के चित्र चित्रित होते थे।
  • अभी तक गोलकुंडा की कला के तहत पहचानी गई शुरू की पाँचों लघु चित्रकारियाँ 1463 के हाफिज के दीवान में पाई गई हैं। कुछ भित्ति चित्रों के चित्रण में एक चित्र में नीली लोमड़ियों व सियारों का रोचक चित्रण किया गया है।
  • मोहम्मद कुतुब शाह (1611-20) का एक चित्र है, जिसमें वह अपने शासन के शुरुआती काल में दीवान पर बैठे हैं। 
  • सूफी कविता की पांडुलिपि में पद का सचित्र चित्रण है जिसमें पदों की व्याख्या के साथ लगभग 20 लघु चित्रकारियाँ हैं। 
error: Content is protected !!
×
New RAS course according to updated syllabus
Visit youtube channel now
Scroll to Top
Telegram WhatsApp Chat